Thursday, 18 July 2019

ज़मीर बिकने लगे मंडी में ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

     ज़मीर बिकने लगे मंडी में ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

     दलबदल का मौसम क्या जैसे कोई तूफ़ान है सबको उड़ाए ले जा रहा है। तिनकों की जैसी हैसियत हो गई है। सस्ते दाम बिकते बिकते थोक के भाव बिकने लगे हैं। हद तो अब हुई है जब कोई दल जगह जगह माल खरीदने को मेला लगाने का इश्तिहार देने लगा है। टके सेर भाजी टके सेर खाजा अंधेर नगरी चौपट राजा की कहानी का नया अध्याय है। विचार होते तो बदलने की बात होती जब कोई सोच विचार है ही नहीं और मकसद भीड़ जमा करने का है तो आदमी भेड़ बकरी बनने को राज़ी है हरियाली दिखाई देनी चाहिए। मगर चालाक गाड़ी वाला गधे के सामने कुछ इस तरह से चारा हवा में लटका देता है जिसको देख गधा भागता है और चारा उस से आगे आगे चलता रहता है। जो लोग विधायक सांसद बनकर खुद किसी के बंधक बनने को तैयार हैं उनसे देश की आज़ादी की बात करना फज़ूल है। गुलामों की मंडी फिर लगने लगी है खरीदार एक है बिकने को तैयार अनेक हैं ऐसे में कीमत मत पूछना। गुलाम दो वक़्त रोटी मिलने की उम्मीद पर खुद को बेचना चाहते हैं ज़मीर इतना सस्ता हो गया है कि लोक-लाज शर्मो-हया छोड़ नुमाईश में चले आये हैं। कानून किसी की बांदी है रखैल की तरह नाच रही है तमाशा देखने वालों को मज़ा आ रहा है। अपने कैसे कैसे लोगों को सर पर बिठा रखा है जो अपनी आज़ादी अपने आदर की नहीं सोचते आपकी आज़ादी और अधिकार की क्या चिंता करेंगे वो। गली गली बाजार सजा रहे हैं अमुक नेता इतने समर्थकों के साथ उधर से इधर आ रहे हैं। इस तरह भी अपनी कीमत बढ़ा रहे हैं एक के साथ दस मुफ्त खोटा सिक्का चला रहे हैं। आप भी देश को महान घोषित करने वाला गीत गुनगुना रहे हैं सत्यमेव जयते लिखा है जिस जगह झूठ का गुणगान गा रहे हैं। ये कैसी गंगा बहा रहे हैं हम्माम में सभी नंगे नहा रहे हैं। ऊपर जाना है गिरते जा रहे हैं दाग़दार को बेदाग़ बतला रहे हैं कोई नया डिटरजैंट बाजार में ला रहे हैं अपने रंग में रंगकर सबको स्वच्छ बना रहे हैं।

        मुल्तानी की इक गाथा है कोई खूबसूरत औरत बेवा हो जाती है तो कितने कुंवारे जिनकी शादी नहीं हो रही थी आस लगाए रहते हैं। मगर ऐसी महिला कटी पतंग की तरह होती है लुटते हैं और कई लूटने वालों के हाथ डोर हो तो मिलती नहीं किसी को बर्बाद हो जाती है। कभी कभी किसी बदनसीब का नसीब खुलता है अन्यथा मझधार में डोलती नाव की सी हालत रहती है। ज़माना बदला हुआ है समझने को ढंग बदलना होगा किसी कंपनी के शेयर के भाव नीचे गिरते हैं तो कई लोग खरीदने लगते हैं कौड़ियों के दाम ताकि जब कभी फिर उसके भाव शेयरबाज़ार में ऊंचे चढ़ते हैं तो मुनाफा कमा सकें बेचकर। अचानक कई कंपनियों की हालत खराब हो गई है ये राजनीति की मंडी है पहले उसका कारोबार मंदा करवाते हैं शोर मचाते हैं उनके पास सब माल नकली है बाद में उसी नकली सामान को मुफ्त के भाव खरीद अपने लेबल से असली बताकर बाज़ार में खरीदने वालों को चिपका देते हैं। ये जो आज सस्ते में बिक रहे हैं कल महंगे दाम बिक सकते हैं , कीमत खरीदने वाले की ज़रूरत पर निर्भर होती है।                     


   जो बात हम नहीं समझते वो ये है कि सौदा उनका नहीं उस जनता के भरोसे का किया जाता है जिस ने उनको बनाया था। हमको बताया जाता है हमारे साथ आपकी भी भलाई है चुपचाप धारा के साथ बहने में। धर्म नैतिकता उसूल ईमानदारी सच्चाई बड़ी बड़ी बातें खोखली लगती हैं जब हमारा इम्तिहान होता है। अपने जाति धर्म परिवार के व्यक्ति के अनुचित ही नहीं आपराधिक कर्म करने पर भी उसका बचाव करते हैं जबकि आपको खड़ा पीड़ित पक्ष के साथ होना चाहिए। किसी घटना की बात नहीं करना चाहता क्योंकि ये किसी एक समुदाय की बात नहीं है बल्कि हमारे समाज की भयानक तस्वीर है उसके दोगलेपन और आडंबर को सामने लाती है। जिस पर शर्मिंदा होना जब उस पर गर्व करने का काम करते हैं तो हम देश समाज धर्म उसूल सभी को दरकिनार करते हैं और अपने भविष्य को अंधकार में धकेलते हैं। बबूल बोने वाले आम नहीं खा सकते जो आज बोया है कल उसे ही काटना भी होगा।

    इश्तिहार देना पड़ता है जब बेचना हो और बिकने को सामान भी हो। तो क्या राजनीति भी घोड़ा मंडी है जो आजकल संसद विधायक बिकते खरीदे जाते हैं। इंसान जब बिकने लगता है तो इंसान नहीं रह जाता और नेता शायद इंसान नहीं कुछ और होते हैं असली कम नकली माल ज़्यादा। चमकती हुई हर चीज़ सोना नहीं होती है लोग ठगे जाते हैं पैकिंग या बाहरी चमक दमक आवरण की सज धज देख कर। जिस्मफरोशी के बाज़ार की रौशनियां आंखों को चुंधियाती हैं मेकअप का कमाल है जो वैश्या हरदम सुंदर और जवान लगती है। जाने सत्ता कोई अमृत कलश है जो बूढ़े भी पहले से जवान फुर्तीले होने लगते हैं। आजकल अजब ज़माना है लोग खाली शोरूम से ऑनलाइन सभी बेचते हैं खुद पास कुछ भी नहीं होता न कुछ बनाते हैं। इधर उधर से उठाते हैं बेचते हैं खूब मुनाफा कमाते हैं। बड़े धोखे हैं इस राह में बाबूजी ज़रा संभलना। राजनीति अब भरोसे की बात नहीं रही इस हाथ ले उस हाथ दे यही बन गई है। इश्तिहार पढ़कर लगता है कोई अपना माल लुटवा रहा है एक के साथ एक मुफ्त या 50 फीसदी ऑफ लुभाता है दुकानदार पहले से कई गुणा बढ़ी कीमत का लेबल लगाता है। खरीदार इसी लालच में फंसता है मार खाता है मॉल में सौ रूपये वाला सामान फुटपाथ पर दस रूपये में मिल जाता है मगर सस्ता माल घटिया कहलाता है। बाज़ार का इश्तिहार से गहरा नाता है पीतल झूठ का शाम तक सारा बिक जाता है खरा सोना बिना बिका रहकर खुद पर शर्माता है। देख लो झूठ अपने पर कितना इतराता है।

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