Thursday, 25 July 2019

सवालों में उलझे हुए लोग ( अजब मंज़र ) डॉ लोक सेतिया

   सवालों में उलझे हुए लोग ( अजब मंज़र ) डॉ लोक सेतिया 

 हमने कथाओं कहानियों में पढ़ा था कोई किसी से जाकर कहता है मैंने कहीं ऐसा अजब मंज़र देखा जिसको देख मन विचलित है क्योंकि उसका मतलब नहीं समझ आता मुझे। और उस अनहोनी असंभव लगती बात का अर्थ कोई समझाता है। आज ऐसे सवाल बहुत हैं हमारे सामने मगर शायद कोई जवाब देने वाला ही दिखाई नहीं देता है और हम भी विचलित नहीं होते चाहे कुछ भी सामने घटता रहे हम अपनी आंखें बंद कर सोचते हैं दृश्य गायब हो गया है। कायरता ने हमें सच देखने सुनने से बचने का आसान रास्ता दिखाया है हम सोचते हैं समाज में किसी से क्या होता है हमें क्या चिंता की ज़रूरत है। आजकल की घटनाओं को समझने को देखते हैं देश में समाज में क्या क्या घट रहा है कोई बता सकता है ये समाज की कैसी तस्वीर सामने आ रही है और इस का आने वाला कल भविष्य कैसा हो सकता है। चलो कुछ समाचारों घटनाओं को ध्यान से समझते हैं। 

सरकार संवैधानिक संस्थाओं को बदलने का हर संभव जतन कर रही है जिन नियम कानून से मनमानी पर अंकुश लगता है हटाया जा रहा है। हर जगह चाटुकार लोग बैठाए जा रहे हैं देश के संविधान की अनुपालना करवाने को बनी हुई संस्थाओं के पदों पर। संसद विधानसभा को इक अखाड़ा बना दिया गया है और चर्चा नहीं विचार विमर्श नहीं दांव पेच इस्तेमाल कर जीत हासिल करने पर ध्यान है। उचित अनुचित की कोई व्याख्या नहीं है जिसकी लाठी उसकी भैंस की मिसाल है। लोकलाज की परवाह नहीं है अपनी गलती को गलती नहीं मानते हैं इल्ज़ाम किसी और पर धरते हैं। दलबदल का मौसम है जो पापी अपराधी सत्ता की चौखट पर चला आता है माथा टेकता है उसके गुनाह माफ़ हो जाते हैं। कानून की तलवार चलती है विपक्षी नेताओं को ठिकाने लगाने को उनकी कीमत घटाने को गड़े मुर्दे उखाड़ मुकदमे दर्ज किये जाते हैं मोल भाव तय होने के बाद फिर दफ़्ना देते हैं उन सभी आपराधिक आरोपों को किसी फाइल में। ईमानदारी का शोर बहुत है इश्तिहार भी मगर कोई अदालत से भगोड़ा आपराधिक मुकदमे का दोष लिए आरोपी किसी संस्था पर नियुक्त कर देते हैं। 

सत्ता पक्ष विपक्ष दोनों के नेता नफरत की आग भाषण में लगाते हैं भाषा की मर्यादा को ताक पर रखकर। नैतिकता की कहीं कोई बात नहीं है। धर्म के नाम पर दंगे करवाने की बात की जाती है। उधर भवन बनाये जाते हैं ऊंचे ऊंचे मचानों की तरह ऊपर चढ़कर नज़ारा देखने को , जिस मकसद से विभाग बनाया हुआ न्याय और निष्पक्षता से सबको समान न्याय देने को उस की हालत जर्जर गिरती इमारत की तरह है। बीस साल बाद कोई अदालत किसी को निर्दोष घोषित करती है , अपराध साबित नहीं हुआ या झूठा दोष लगाया गया था दोनों ही तरह से अन्याय हुआ है। अदालत को इतना समय लगता है ज़िंदगी खत्म हो जाती है फिर भी हम न्याय की उम्मीद की बात करते हैं क्योंकि न्याय मिलता है ख़ास लोगों को तुरंत ही मरते हैं सामान्य नागरिक छोटे छोटे अपराध के आरोप में जेलों में कोई नहीं देखता है। सरकार को वोटों की खातिर बड़े बड़े अपराधी साधु संत लगते हैं उनकी हर बात को अनदेखा किया जाता है संरक्षण दिया जाता है। धर्म सबसे बड़ा अड्डा बन गया है जहां पर हर गुनाह खुलेआम किया जाता है। हम धर्म की अफीम के नशे में सच झूठ पाप पुण्य का अंतर नहीं समझते और अपराधी को गुरु मान उसकी जय-जयकार करते हैं अधर्म को धर्म बताते हैं। 

जिनको सच बताना था टीवी अख़बार वाले चुनाव तक सत्ता का गुणगान करते रहे और मुंह बंद रखा लालच की खातिर। अब चुनाव के बाद दिखावे को जनता की जनहित की बात करने लगे हैं अपने पर लगे बिक चुके लोगों का समूह का दाग़ मिटाने की कोशिश भर है। कर्तव्य ईमानदारी से नहीं निभाते चाहते हैं निष्पक्षता का दिखावा कर छवि को सुधार सकें मगर इतने बदनाम हैं अब कोई चाहकर भरोसा नहीं कर सकता है। पैसे और स्वार्थ ने अंधा बना दिया है खबर नहीं अनावश्यक बहस दिन भर उलझाने को करते हैं। किसी सवाल का जवाब नहीं खोजते सवाल को सवाल से भिड़ाने का मज़ा लेते हैं। जुर्म अपराध दुर्घटना उनके लिए बेचने का सामान है। अपनी सूरत को पहचानते ही नहीं हैं कोई उनको आईना कैसे दिखाए जिनका कारोबार है आईने बेचने का हर शहर हर गांव गली गली। 

हम आधुनिक जानकर स्मार्ट फोन पर मनोरंजन के नाम पर समय बिताने को बेकार संदेश भेजते हैं उनकी सच्चाई को जाने समझे बिना ही। विचलित करने वाली बात को किनारे खड़े तमाशा देखने वाले आदमी की तरह समंदर के उठते तूफान किसी जलती हुई बस्ती की आग को रौशनी बताते हैं मगर जानते हैं। झूठ सच को मिला कर हमने जाने क्या बना दिया है। अपने छोटे छोटे मासूम बच्चों को स्मार्ट फोन से खेलने देकर उनको ऐसी अंधी गली में जाने देते हैं जिसका दूसरा छोर बंद है वापस निकलने को राह नहीं वापस मुड़ने की जगह नहीं है। पढ़ना भाता नहीं किसी गंभीर विषय पर चर्चा करना लगता है नाहक की परेशानी है। सामाजिक संबंधों को हमने अपने मतलब को बदलने और तबाह करने को कोई कसर नहीं बाकी छोड़ी है। अब हम स्वस्थ संवाद नहीं करते हैं या किसी की हां में हां मिलाते हैं या किसी की चाटुकारिता से खुश होते हैं झूठा गुणगान सुन कर। वैचारिक मतभेद को हम विरोध मानते हैं और अपनी जगह दोनों की बात सही और अलग भी हो सकती है इस को समझना छोड़ दिया है। हम जैसे बातचीत करने नहीं लड़ने भिड़ने को तैयार रहते हैं जो वास्तव में हमारी कमज़ोरी है ताकत नहीं है। निष्कर्ष नहीं निकालते सच को नहीं परखते बस उलझन को उलझाने को लगे रहते हैं। 

चांद की बात करते हैं दौड़ने की बात होती है मगर सरकार खुद दंगे फसाद अपराध होने तक सोई रहती है। कोई विधायक सत्ता का भागीदार सहयोगी दल का छह महीने पहले लिखित जानकारी देता है कि उस जगह अन्याय अत्याचार होता है सरकारी अधिकारी भू माफिया से मिलकर शोषण करते हैं गरीबों को डराते हैं धमकाते हैं मगर राज्य का मुख्यमंत्री कोई कारवाई नहीं करता है और कुछ लोग अपनी सेना बनाकर खुले आम हथियार लहराते हुए लोगों को कत्ल कर लाशें बिछा देते हैं तब सरकार ब्यान देने और न्याय कानून की बात कहने लगती है मगर अपने दोष को पिछली सरकारों पर डालना चाहती है। इंसानियत की आदमी की जान की कोई कदर नहीं उसकी कीमत लगाई जाती है हर मरने वाले को चंद रूपये मुवावज़ा देते हैं उसके परिवार को ये न्याय नहीं है किसी लाश को कफ़न से ढकने की बात है। लेकिन हम को किसी बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है कल की घटना भूल जाती है आज अभी की नई घटना पर वीडियो देख रहे हैं। भावनाशून्य समाज बनता जा रहा है हम सहानुभूति जताते हैं संवेदना व्यक्त करते हैं दिखावे की दो आंसू बहाते हैं पल भर बाद फिर कोई चुटकुला सुनते सुनाते हैं। 

                                 ( जारी है चर्चा अगली पोस्ट पर )

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