Friday, 21 June 2019

माई री मैं कासे कहूं पीर अपने जिया की ( व्यथा-कथा ) डॉ लोक सेतिया

      माई री मैं कासे कहूं पीर अपने जिया की ( व्यथा-कथा ) 

                                           डॉ लोक सेतिया 

    बैठे हैं नदी किनारे और प्यासे हैं , सामने मयखाने हैं साकी भी बहुत हैं कितने ही पैमाने हैं। हम अजनबी हैं इस दुनिया की रस्मो रिवाज़ से बेगाने हैं। हर तरफ यही अफ़साने हैं लोक हो गए क्या दीवाने हैं। इक ग़ज़ल से शुरू करते हैं। 


प्यार की बात मुझसे वो करने लगा - लोक सेतिया "तनहा"

प्यार की बात मुझसे वो करने लगा ,
दिल मेरा क्यों न जाने था डरने लगा।

मिल के हमने बनाया था इक आशियां ,
है वही तिनका तिनका बिखरने लगा।

दीनो-दुनिया को भूला वही प्यार में ,
जब किसी का मुकद्दर संवरने लगा।

दर्दमंदों की सुन कर के चीखो पुकार ,
है फ़रिश्ता ज़मीं पे उतरने लगा।

जो कफ़स छोड़ उड़ने को बेताब था ,
पर सय्याद उसी के कतरने लगा।

था जो अपना वो बेगाना लगने लगा ,
जब मुखौटा था उसका उतरने लगा।

उम्र भर साथ देने की खाई कसम ,
खुद ही "तनहा" मगर अब मुकरने लगा।

कल तक डराता था जो उसी को आज प्यार आने लगा है खुदा खैर करे। ये ज़ालिम लोग भी बड़े अजीब होते हैं सितम करने से थक जाते हैं तो मुहब्बत जताने लगते हैं। कल घर से निकलने को कहते थे आज पास बुलाने लगते हैं। दास्तां अपनी सुनाने लगते हैं सितमगर हैं फिर भी दिल को भाने लगते हैं चोरी चोरी चुपके चुपके दिल चुराने लगते हैं। भ्र्ष्टाचार कुछ ऐसे मिटने लगते हैं नहीं पीने वाले पीने लगते हैं नहीं खाने वाले खाने लगते हैं।

बहस भ्र्ष्टाचार पर वो कर रहे थे -लोक सेतिया "तनहा"

बहस भ्रष्टाचार पर वो कर रहे थे ,
जो दयानतदार थे वो डर रहे थे।

बाढ़ पर काबू पे थी अब वारताएं ,
डूब कर जब लोग उस में मर रहे थे।

पी रहे हैं अब ज़रा थक कर जो दिन भर ,
मय पे पाबंदी की बातें कर रहे थे।

खुद ही बन बैठे वो अपने जांचकर्ता ,
रिश्वतें लेकर जो जेबें भर रहे थे।

वो सभाएं शोक की करते हैं ,जो कल ,
कातिलों से मिल के साज़िश कर रहे थे।

भाईचारे का मिला इनाम उनको ,
बीज नफरत के जो रोपित कर रहे थे।  
 
अब इधर उधर की बात छोड़ साफ बात कहते हैं। कलंदर हैं हम अपनी मस्ती में रहते हैं। कल ही की बात है हर कोई योगी बना हुआ था हम ने साफ बोल दिया हमारे मतलब की बात नहीं है। किसी के इशारों पे चलना नहीं आता है मनमौजी हैं आई मौज फकीर की दिया झोपड़ा फूंक , नहीं भाई उनकी फ़कीरी नहीं है जिस में शाही ढंग से राजा की तरह रहकर फ़क़ीराना लिबास की दिलचस्प कहानी सुनाते हैं खुद हंसते हैं और मुस्कुराते हैं बाकी लोग रो रो आंसू बहाते हैं गाते गाते चिल्लाते हैं। दुष्यंत कुमार बजा फरमाते हैं फिर से अजब मंज़र नज़र आते हैं। ये सत्ता की मर्ज़ी है मार दिया जाये कि छोड़ दिया जाये बोल तेरे साथ क्या सलूक किया जाये। जब रुलाकर उनको लुत्फ़ नहीं आता तो ज़बरन हंसाने लगते हैं हमको शोले वाले गब्बर सिंह याद आने लगते हैं। सारे बच गए कहते कहते तीनों को ठिकाने लगा दिया उनका खेल था किसी की जान गई तो गई। 
 
    भोगी भी योगी बन जाते हैं योगगुरु योग सिखलाते हैं। ऐसे करो ऐसे और ऐसे नहीं अपने बस का हम जाते हैं। क्या करना है जीकर इतना भी जाने की बेला है जाते हैं। कोई थे जो कहते थे संगीत सिखाते हैं ऊंचा नीचे स्वर रखने का पाठ समझते थे नहीं हुआ किसी और की तरह जब बोलना हो खामोश रहना और जब चुप सी लगी हो शोर की तरह आलाप लगाना। कभी मध्यम सुर कभी बस होंटों को जुंबिश देना फुसफुसाना। रोना भी इस तरह से इसी तरह से गाना , भाई हमको तो आता है मस्ती में गुनगुनाना। सैर करते हैं खुली हवा में रहते हैं बंधी बंधाई योग की अदाओं के हम कायल नहीं हैं सांस भी उनकी मर्ज़ी से हिलना जुलना भी उन्हीं के इशारों पर और तो और कब खुलकर हंसना है कब ताली बजानी है। ये आज़ाद देश की अजीब कहानी है सुननी नहीं है औरों को सुनानी है। अली बाबा चालीस चोर थे अब शामिल हुई चोरों की भी नानी है। 
 

समझने को दस्तक फिल्म की ये ग़ज़ल बहुत है ज़रा सुनकर समझना सभी लोगो। 

 

 



1 comment:

ब्लॉग बुलेटिन said...

आज सलिल वर्मा जी ले कर आयें हैं ब्लॉग बुलेटिन की २४५० वीं बुलेटिन ... तो पढ़ना न भूलें ...

रहा गर्दिशों में हरदम: २४५० वीं ब्लॉग बुलेटिन " , में आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !