Wednesday, 26 June 2019

अरे ओ आस्मां वालो ( ज़माने से अपनी बात ) डॉ लोक सेतिया

  अरे ओ आस्मां वालो ( ज़माने से अपनी बात ) डॉ लोक सेतिया 

  आपको पढ़ना है पढ़ लेना नहीं पढ़ना तो आपकी मर्ज़ी है। समझाना क्या है समझना क्या है बस थोड़ा सा
ज़माने वालों की दुविधा को मिटाना चाहता हूं। कोई उपदेशक नहीं खुद को कोई भला या बड़ा आदमी नहीं समझता सब जैसा इंसान ही हूं मगर शायद आपकी दुनिया से बहुत अलग सोच वाला बन गया या बनाया है बनाने वाले ने। जैसा लोग समझते हैं आलोचक नहीं हूं मैं लिखना मेरी आदत ही नहीं ज़रूरत भी है चाहत भी और लिखना सच को सच झूठ को झूठ मेरी विवशता है। ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर , कबीरा खड़ा बाज़ार में सबकी मांगे खैर। अदावत नफरत मेरे पास है नहीं किसी के लिए भी और जो है शायद इस दुनिया के काम का नहीं है। कोई ऊंचे ख्वाब कोई आकाश के ऊंचाई वाले सपने नहीं हैं धरती पर चैन से सादगी से और आराम से रहना चाहता हूं किसी को क्या उलझन है मुझसे नहीं जानता।

    आपकी दुनिया इक बाज़ार है जिस में लोग अपने दर्द बेच कर ख़ुशी खरीदना चाहते हैं और मुझ जैसे लोग हैं कुछ जो औरों के दर्द को अपना समझते हैं। दर्द से मुहब्बत है दर्द से घबराते नहीं हैं लेकिन दर्द की दुकान नहीं लगाते बेचते खरीदते नहीं हैं हो सके तो किसी का दर्द बांटने का काम करते हैं। आपकी दुनिया की दौलत मेरे पास नहीं है बस इक खज़ाना है दोस्ती इंसानियत भाईचारे का हर किसी के लिए। जिनको शोहरत की बुलंदी पर खड़ा होना है उनसे बचता हूं इसलिए कि मुझे ऊंचाई से घबराहट होती है पांव ज़मीन पर रखना चाहता हूं उड़ने को मेरे ख्याल बहुत हैं जो आज़ाद हैं। किसी पहाड़ पर चढ़कर अपनी ऊंचाई बढ़ाने का कायल नहीं हूं। मुझे दर्द मिले हैं मिलते हैं और दर्द से परेशानी नहीं होती है थोड़ी राहत मिलती है डर लगता है जब कोई ख़ुशी कुछ पल को आती है पास चली जाती है खुशियां ठहरती नहीं अधिक देर तक जानते हैं सभी। दर्द का रिश्ता बड़ा अच्छा होता है दर्द कहते है खुद दवा बन जाता है ग़लिब कहते थे मुश्किलें मुझ पर इतनी पड़ीं कि आसां हो गईं। अब तो घबरा के कहते हैं कि मर जाएंगे , मर के भी चैन न पाया तो किधर जाएंगे। मौत से घबराकर जीना नहीं छोड़ सकते है सच कहूं तो मुझे हमेशा से लगता है मौत तो दरअसल इक सौगात है , हर किसी ने इसे हादिसा कह दिया।

      आपको नहीं समझ आती मेरी बातें तो छोड़ दो समझना कोई मज़बूरी नहीं है। मेरा रास्ता अपना है मेरी मंज़िल और है आपको अपनी मर्ज़ी की राह चलने की आज़ादी है मुझे अपनी राह जाने दो कोई टकराव नहीं है। हो सकता है किसी मोड़ पर कोई चौराहा आये अपनी राहें मिल जाएं या मिल कर फिर किसी तरफ मुड़ रही हों तब दुआ सलाम करने की औपचारिकता निभा लेना। मुमकिन हो तो जैसे आप हैं उस तरह रहें मगर मुझे भी रहने दें जैसा भी अच्छा बुरा मैं हूं। ग़ालिब की तरह कोई परसाई का दावा मैं भी नहीं करता हूं। अब इक रचना लिख कर बात को विराम देता हूं भले बात पूरी नहीं हुई है आधी कही है आधी बाकी रह गई किसी और दिन कहने को।

मेरे दुश्मन मुझे जीने की दुआ न दे - लोक सेतिया "तनहा"

मेरे दुश्मन मुझे जीने की दुआ न दे ,
मौत दे मुझको मगर ऐसी सज़ा न दे।

उम्र भर चलता रहा हूं शोलों पे मैं ,
न बुझा इनको ,मगर अब तू हवा न दे।

जो सरे आम बिके नीलाम हो कभी ,
सोने चांदी से तुले ऐसी वफ़ा न दे।

आ न पाऊंगा यूं तो तिरे करीब मैं ,
मुझको तूं इतनी बुलंदी से सदा न दे।

दामन अपना तू कांटों से बचा के चल ,
और फूलों को कोई शिकवा गिला न दे।

किस तरह तुझ को सुनाऊं दास्ताने ग़म ,
डरता हूं मैं ये कहीं तुझको रुला न दे।

ज़िंदगी हमसे रहेगी तब तलक खफा ,
जब तलक मौत हमें आकर सुला न दे। 

No comments: