Wednesday, 8 May 2019

फ़िदा हैं दर्शक खलनायक पर ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

     फ़िदा हैं दर्शक खलनायक पर ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 


             बंदूक तलवार किसी के हाथ होती है लोग सुरक्षित महसूस करते हैं। क्योंकि जिस के पास हथियार है औरों को भरोसा दिलवाता है सुरक्षित हैं आप मैं आपकी सुरक्षा करता हूं। हथियार जिस के पास है आपको डर दिखलाता है दहशत पैदा करता है और खुश है लोग उसके सामने झुकते हैं सत्ता से धन की ताकत से या जिस्मानी ताकत की गुंडई से घबराकर।  कोई औज़ार से निर्माण करता है कोई औज़ार से विधवंस करता है। जिसने बनाया उसको बहुत कुछ सोचना पड़ा समय लगा और कठिनाईयां पेश आईं मगर जिसने अवसर मिलते ही बनाने की नहीं मिटाने की बात की उसको कुछ भी नहीं समझना पड़ा कुछ भी नहीं सोचा बस हाथ में सत्ता पैसा अधिकार आया तो मनमानी करने लगे। विचार हमने करना है किसको पसंद करते हैं नफरत को या मुहब्बत को। इतिहास गवाह है नफरत करने वाले धन दौलत सत्ता का अंबार जमा करने के बाद भी नायक नहीं खलनायक ही बन पाए हैं। मुहब्बत और प्यार करने वाले ज़िंदा नहीं रहे तब भी दिलों में बसे रहते हैं नायक कहलाये हैं। 
             जब लोग खलनायक को नायक समझने की भूल करते हैं तो रावण कंस हिरण्यकश्यप जैसे लोग होते हैं जो आखिर में अधर्म और झूठ की पर्याय बन जाते हैं।  ये कैसा निज़ाम है जिस में जब भी बात होती है निराशाजनक हालात की बात होती है। आशा जगाना नहीं आता बस हर किसी को बदनाम करना आदत है और सबको अंधा साबित कर खुद काना होने को अच्छा होना बतलाता है और सब पर हुक्म चलाता है। देश की रोटी पानी रोज़गार शिक्षा स्वस्थ्य की हालत नहीं बदलता केवल बड़ी बड़ी चांद सितारों की कहानियां सुना कर बहलाता है। इतिहास को झूठा खुद को सच्चा बताता है और जितने भी महान नायक हुए सबको खलनायक बताता है। अच्छाई से उसका इतना नाता है उसके दल में शामिल होकर पापी भी धर्मात्मा कहलाता है। इक नई रीत चलाई है परदे पीछे दुश्मन है सामने भाई भाई है। 


रंक भी राजा भी तेरे शहर में ,
मैं कहूं यह  बात तो किस बहर में।

नाव तूफां से जो टकराती रही ,
वो किनारे जा के डूबी लहर में।

ज़ालिमों के हाथ में इंसाफ है ,
रोक रोने पर भी है अब कहर में।

मर के भी देते हैं सब उसको दुआ ,
जाने कैसा है मज़ा उस ज़हर में।

क्या भरोसा आप पर "तनहा" करें ,
आप जाते हो बदल इक  पहर में। 

  अगर आप शराफ़त पसंद हैं तो किसी मुगालते में मत रहिये। कल रात टीवी पर रियलिटी शो में ये भी सामने आया कि आधुनिक नारी को विवाह करने को वही पुरुष बेहतर लगते हैं जो आवारा किस्म के होते हैं। शराफत अली को शराफत ने मारा , किसी को किसी की मुहब्बत ने मारा , किसी को किसी की अदावत ने मारा। शरीफ लड़के किसी लड़की से मुहब्बत का इज़हार करते डरते हैं कि कहीं लड़की बुरा नहीं मान जाये अब अगर शादी करने को भी शरीफ उनकी पसंद नहीं हैं तो बेचारे शरीफ लोग किधर जाएंगे। लेकिन इसको हम कोई देश की समस्या नहीं मान सकते हैं। समस्या है जब लोग देश की राजनीति से लेकर तमाम अपने समाज के विशेष कहलाने वाले वर्ग को लेकर यही सोच रखने लगते हैं। खलनायक इस युग के नायक बन गये हैं और नायक हास्य कलाकार भी नहीं क्योंकि खलनायक अपना किरदार निभाते हैं तो लोग उनकी हर बात पर हंसते हैं तालियां बजाते हैं। बात रोने की लगे फिर भी हंसा जाता है यूं भी हालात से समझौता किया जाता है। क्या कमाल है नेताजी खलनायकी भी करते हैं और लोग उनकी भाषा बदज़ुबानी झूठ पर झूठ को देख कर भी अनदेखा करते हैं। खलनायक की गाली भी ताली बजवाती है। अजब आशिक़ी है जो दवा के नाम पे ज़हर से उसी चारागर ( डॉक्टर ) की तलाश है। ज़हर इतना मीठा लगता है कभी सोचा नहीं था।

          किसी फ़िल्मी नायक की असली ज़िंदगी और फ़िल्मी किरदार की बात विपरीत होना और बात है। फिल्म की कहानी डयलॉग कोई लिखता है अभिनेता अभिनय करता है , अभिनय को सच समझने की भूल हो जाती है भोली जनता उसकी बेबसी पर आंसू बहाती है। वास्तविक जीवन में उसका किरदार उल्टा है सती सावित्री बनी थी कुल्टा है। घर किसी का बर्बाद कर खुद घर बसाया है शादीशुदा उसके मन भाया है , लो उसने भी दूजा ब्याह रचाया है पहली को नहीं छोड़ा इक और को लाया है। ये कोई इश्क़ की कहानी नहीं है किस किस से रिश्ता बनाया उसका कोई सानी नहीं है। हम जानते हैं अनजान बन जाते हैं ऐसे लोगों को सांसद भी बनाते हैं। बबूल बोने वाले क्या आम खाते हैं। धन दौलत के जितने पुजारी हैं हमने उनको भगवान समझा है। ऊपर को बहती है ये ऐसी गंगा है।

           सब के घर आरओ लगाने की बात करते हैं बिना नल पानी की बात करते हैं। बताओ कोई बड़ा बदलाव शिक्षा स्वास्थ्य गरीबी लोगों की ज़िंदगी में लाया है। हरदम वही राग बेसुरा सुनाया है किसी ने पहले कुछ भी नहीं बनाया है वही है जो सबको जो नहीं किया दिखाया है। ये कैसा मसीहा बनकर कोई आया है अपनी बातों से हमको उल्लू बनाया है वादा किया कोई सच कर दिखाया है। खलनायक सबको बहाने लगे हैं खुद अपने कातिल को घर बुलाने लगे हैं। लोग गाते गाते रोने लगे हैं रुलाने वाले मुस्कराने लगे हैं। खज़ाना किसी को चुराने न देगा अब किसी को भी खाने न देगा कहा था मगर आधा सच बताया था , ये नहीं कहा था खुद मज़े उड़ाएगा अपने आप पर सब कुछ उड़ाएगा , जिस में बाकी सब को कुछ नहीं मिलेगा वही नाचेगा झूमेगा गाएगा , गरीबी की बात करता रहेगा रईसी की ज़िंदगी जिएगा नया दौर लाएगा हर कोई इक दिन पछताएगा। तेरे वादे पे ऐतबार किया ये गुनाह हमने बार बार किया। कोई फ़िल्मी गाना सुना रहा है। मुझे मार कर बेशर्म खा गया , मगर आप तो ज़िंदा हैं। ये जीना भी कोई जीना है लल्लू। डबल रोल देखे हैं कितने फ़िल्मी कहानियों में ये किरदार पहला है जिसके रंग जितने हैं सब नकली हैं पहली बारिश में ये रंग उतर जाते हैं। सत्ता के शिखर की यही कहानी है उस पर चढ़ते ही आदमी की अच्छाई सच्चाई और शराफत किसी पुराने लिबास की तरह उतार कर फेंक दी जाती है और भीतर की हर ख्वाहिश बाहर निकल आती है। रहम राजनीति किसी पर नहीं खाती है। कोई नशा सा है छा गया है परदे पर खलनायक समझा गया है कलयुग को सतयुग नाम देना पड़ेगा , राम नाम छोड़ जपना मेरा नाम लेना पड़ेगा। आपकी यही मज़बूरी है ये नियम नया है सब पर लागू है विकल्पहीनता है ज़रूरी है।

       अपने देखा है भूल गए हैं खलनायक जिस जिस युग हुए हैं कहनी खत्म होती तभी है आखिरी भाग में आग ही आग जंग ही जंग दौड़ भाग और सब विनाश दिखाई देता है। मुहब्बत की कहानी का ये अंजाम क्यों है शराफत हुई इतनी बदनाम क्यों है। किसी को भी सच की नहीं होती पहचान क्यों है , इस मुल्क में हर कोई परेशान क्यों है। आगाज़ अच्छा था जो भी था ये अंजाम क्यों है।

No comments: