Tuesday, 28 May 2019

हम छोड़ चले हैं दल को ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

     हम छोड़ चले हैं दल को ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

  खबर ने तहलका मचा दिया जंगल की आग की तरह फ़ैल गई ये खबर। मोदी जी ने इस्तीफ़ा दे दिया है। जिसका डर था बेदर्दी वही बात हो गई दिन में रात हो गई। सभी नेता दंग रह गए इसकी कल्पना नहीं की थी मगर ऐसा क्यों हुआ। सारे दल के सांसद और सभी नेता जमा हुए उनको विनती की बिना आपके दल का क्या होगा जल बिन मछली जैसी हालत होगी। जो राहुल गांधी के इस्तीफे को नाटक कह रहे थे मोदी जी को हल्के में नहीं ले सकते थे। दिल ही दिल में हर कोई सपना भी देख रहा था उनकी जगह मुझे या मेरी पसंद के नेता को पद मिल जाये तो क्या बात हो मगर खुलकर सामने कोई उनकी जगह लेने की बात ज़ुबान पर नहीं ला सकता था। अब मोदी जी की मर्ज़ी है जब जो दिल किया कर सकते हैं लेकिन ये कदम नोटबंदी से बहुत बड़ा फैसला था। आखिर किसी ने साहस कर सवाल कर ही दिया जनाब ऐसी कोई महान भूल हुई है हम सभी से जो आप इतने खफा हैं और नहीं मानने की ज़िद पर अड़े हैं। राहुल गांधी के इस्तीफे से हमारा क्या लेना देना है आपकी जीत तो करिश्मा है फिर आपको पद छोड़ने की बात कहने की ज़रूरत क्या है। 

     जब सभी दल के लोग और गठबंधन वाले कारण जानने पर अड़े रहे तो उनको बताना ही पड़ा क्या है जो इतना बड़ा कदम उठा रहे हैं। मोदी जी बता रहे है ध्यान से सुनिए। अपने दल को मैंने जिस ऊंचाई पर पहुंचा दिया है वो इक चरमसीमा है इस से बढ़कर कुछ संभव नहीं है। मगर मुझे गांधीजी सपने में आते हैं और कहते हैं उन्होंने उस दल को भंग करने की बात की थी उसका नामोनिशान मिटाने की नहीं सोची थी। मुझे राहुल गांधी से हमदर्दी है उनको इतनी बुरी हार मिले ये मैंने नहीं चाहा था। अब उनकी दल की कश्ती मझधार में हिचकोले खा रही है और उनके दल के लोग डूबते जहाज़ को छोड़ हमारे दल में आते जा रहे हैं। मुझे गुजराती हिसाब खूब आता है जो बड़ी कंपनी डूबने के कगार पर खड़ी हो उसको अपनाकर फिर से खड़ा करना ऐसा शानदार अवसर की तरह होता है। जैसा आपको लगता है मैं कोई सत्ता की राजनीति को छोड़ नहीं रहा हूं बल्कि मुझे इस चुनौती को स्वीकार करना है और उसका अध्यक्ष बनकर इतिहास बदलने का इतिहास बनाना भी है बनाकर फिर दोहराना भी है। ये बात हज़्म करना और मुश्किल लगने लगा जिस दल का हाल खराब किया फिर उसी को वापस खड़ा करना ऐसी नासमझी कौन करेगा। हाहाकार मच गई लोग हाथ जोड़ने पांव पकड़ने से आगे अपनी जान देने तक की बात करने लगे। तुम बिन जीवन कैसा जीवन। तेरे बिन जी न सकेंगे हम। इक बात अचरज की थी अमित शाह चुप बैठे मुसकराते रहे कुछ भी नहीं बोले , हर कोई शक करने लगा ये कोई उनका किया धरा तो नहीं। आखिर खुद मोदी जी ने उनसे इस्तीफ़ा स्वीकार कर पदमुक्त करने को दोबारा कहा तो उनको खड़े होकर जवाब देना पड़ा। 

       अमित शाह कहने लगे मुझे मोदी जी के इस्तीफे देने की बात से कोई हैरानी नहीं हुई है। वास्तव में उनकी बातों को मैंने कभी संजीदगी से नहीं लिया क्योंकि उनकी आदत है कभी सेवक कभी चौकीदार और अब फ़कीर होने का ऐलान करना। उनको लोगों की ही नहीं दल के नेताओं की भी भावनाओं से खेलने की आदत इक नशे की तरह है जो उनको मज़ा देती है। मगर मुझे मोदी जी की रग रग का पता है वो कुछ भी कर सकते हैं पद को कभी छोड़ नहीं सकते हैं इसलिए जैसे इस्तीफ़ा देने की बात कही मुझे समझ आ गया था ये कोई और है मोदी जी कभी नहीं हो सकते हैं। ये राज़ की बात है मगर अब राज़ खोलना ज़रूरी है , इस पद पर जो भी होता है उसका इक डुप्लीकेट ढूंढ लिया जाता है और बहुत जगह उस नेता की जगह कोई सभा कोई आयोजन उनका नकली किरदार निभाने वाला जाकर हाज़िर होने की रस्म अदायगी कर सकता है। मैं दावे से कहता हूं कि ये वास्तविक असली मोदीजी नहीं उनका डुप्लीकेट है। ठीक उसी समय मुख्य दरवाज़े से कोई ताली बजाता हुआ आता है और फिल्म की तरह से बैकग्राउंड से मोदी मोदी की आवाज़ भी सुनाई देती है। अमित शाह बताते हैं यही उनकी असली होने की पहचान है जो मुझे पता था और अभी तक सुनाई नहीं पड़ रही थी तभी मुझे रत्ती भर भी चिंता नहीं थी। मगर ये नाटक नहीं है अभी नाटक बाद में खेला जाना है ये तो इक अभ्यास था नाटकीयता की परख करनी थी जो सफल रही है। असली नाटक खेला जायेगा मगर अपने दफ्तर में नहीं किसी और जगह पर असली नकली की पहचान तब सामने आएगी।

     

No comments: