Friday, 24 May 2019

साईल नहीं समझा ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

      साईल नहीं समझा ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

आज की बात की शुरुआत इक अपनी पुरानी ग़ज़ल से , तीसरी नंबर की लिखी ग़ज़ल है। हम अपनी दास्तान किसको सुनाएं। पहली। नया दोस्त कोई बनाने चले हो। दूसरी। अब तीसरी पूरी पेश है। 

  हमको तो कभी आपने काबिल नहीं समझा - लोक सेतिया  "तनहा"

हमको तो कभी आपने काबिल नहीं समझा ,

दुःख दर्द भरी लहरों में साहिल नहीं समझा। 

दुनिया ने दिये  ज़ख्म हज़ार आपने लेकिन ,

घायल नहीं समझा हमें बिसमिल नहीं समझा।

हम उसके मुकाबिल थे मगर जान के उसने ,

महफ़िल में हमें अपने मुकाबिल नहीं समझा।

खेला तो खिलोनों की तरह उसको सभी ने ,

अफ़सोस किसी ने भी उसे दिल नहीं समझा।

हमको है शिकायत कि हमें आँख में तुमने ,

काजल सा बसाने के भी काबिल नहीं समझा।

घायल किया पायल ने तो झूमर ने किया क़त्ल ,

वो कौन है जिसने तुझे कातिल नहीं समझा।

उठवा के रहे "लोक" को तुम दर से जो अपने ,

पागल उसे समझा किये साईल नहीं समझा।   

                             (  अब आज की रचना  ) 

      शीर्षक यही चुना है शायद कुछ लोगों को साईल शब्द का अर्थ नहीं मालूम हो तो पहले वही बता देता हूं। साईल कहा जाता है भिक्षुक को और ज्ञान चाहने वाले को भी , भीख मांगने वाला भिक्षुक कहलाता है। फ़कीर की बात अलग होती है झोली खाली हो या भरी हुई उसको मतलब नहीं होता। फ़कीर अगले पल की चिंता नहीं किया करते हैं। आई मौज फकीर की दिया झौंपड़ा फूक। फकीरी करना आसान नहीं है कौन सच्चा फकीर है इसकी इक छोटी सी कहानी सुनते हैं उसके बाद आधुनिक फकीरी पर चर्चा की जानी है। 

      इक धनवान अपने बेटे को इक सन्यासी गुरु के पास लेकर गया और बताया वो फ़कीर बनना चाहता है। गुरु ने उसके बेटे को कहा पहले देख लो ये फकीराना अंदाज़ होता क्या है। उसको अगली सुबह रात के आखिरी पल ठंड के मौसम में दूर इक सुनसान जंगल जाकर इक फ़कीर को दूर से ही देखते रहने को कहा। जब उस जगह पहुंचा तो देखा इक फ़कीर आंखें बंद किये चिंतन में व्यस्त है। इक चादर से ढका हुआ शरीर ठंड से बेखबर ध्यान में मग्न। तभी देखा कोई रथ पर उधर से गुज़र रहा था अमीर आदमी होगा जब देखा सर्दी में फ़कीर को तो अपना कीमती दोशाला उतार कर चुपके से जाकर उसको ओड़ा दिया बिना आवाज़ किये और अपनी राह बढ़ गया। कुछ ही क्षण में इक चोर उधर से गुज़रा तो उसको लगा इतना कीमती दोशाला इसके पास और चुपके से दबे पांव जाकर उसके बदन से दोशाला उठाया और लेकर चल दिया। वो सोचने लगा क्या इसको खबर ही नहीं कोई दान दे गया कोई चोरी कर गया। तभी इक राहगीर जाते जाते अपने झोले से कुछ लड्डू निकाल कर फ़कीर के सामने रख कर अपने सफर पर चला गया। इतने में इक कुत्ता आया और फ़कीर के सामने से रखे लड्डू खाने लगा फिर भी फ़कीर को कोई हलचल नहीं करते देख वो अपने को रोक नहीं पाया और फ़कीर के पास जाकर कहा आपको खबर भी है कोई आपका दोशाला चुरा गया कोई आपके लड्डू खा रहा है। फ़कीर हंस दिया। जब जो जो हुआ उसका विवरण सुना तो बोला भाई मैं तो अपने आप में मस्त था मुझे इस सब से कोई मतलब ही नहीं था। कोई दोशाला डाल गया कोई दूसरा उठाकर ले गया तो मुझे क्या लेना देना , कोई मैंने मोल तो नहीं लिया था न ही मांगा ही था। जो दे गया उसको ज़रूरत नहीं रही होगी और जिसको ज़रूरत थी लेकर चला गया। जब मेरा था ही नहीं मुझे किस बात की चिंता और कोई लड्डू रख गया जिसको भूख लगी थी खा गया तो वो भी मेरे नहीं थे। इस तरह उस धनवान के बेटे को समझ आई बात दुनिया से विरक्त होना किस को कहते हैं। 

       बचपन से देखता था कुछ लोग सन्यास लेने के बाद भी रिश्तों से मोह रखते थे। दादाजी को कथा सुनाया करता था इसलिए सोचने लगा और सवाल करता आप साधु हैं तो नाते की बात क्यों कहते हैं। इक बात और पता चली कोई सन्यास लेना चाहता है तो उसको विवाह से पहले माता पिता से और विवाहित होने पर धर्मपत्नी से अनुमति लेनी होती है पहला भगवा कपड़ा घर से लेकर शुरुआत की जाती है। शायद अब आपको माजरा समझ आने लगा है। कुछ लोग घर से भागते हैं जीवन से हार के और भगवा भैस धारण कर मांग कर खाने के आदी बन जाते हैं। उनको कोई मतलब नहीं होता असली नकली संत होने से। असली फ़कीर कैसे होते हैं उनकी बात ही और होती है। ग़ालिब कहते थे बदल के फकीरों का हम भेस ग़ालिब तमाशा ए अहले करम देखते हैं।

      इक देश के शासक को अपनी शान बाकी राजाओं से बढ़कर दिखानी की चाहत थी। उसने आस पास के सभी देशों के साधु संतों और भिक्षुक फ़कीर लोगों को बुलवाया दान देने को। जितने भी आये सभी को सोने चांदी हीरे मोती जवाहरात देकर उनकी झोलियां भर कर भेजते हुए कहा अपने अपने देश जाकर बताना कोई राजा इतना बड़ा दानवीर है। इक फ़कीर दरबार से बाहर निकला और मिली खैरात को वहीं खड़े भिखारियों को बांट कर उनसे कहा जाओ अपने राजा को बताओ हमारे इक देश में ऐसे फ़कीर भी रहते हैं जो जितना भी मिले सब औरों को बांट देते हैं मगर कोई भी  अहंकार दिखाते । ऐसा ही इक फ़कीर जब इक राजा के पास आया तो देखा राजा ऊपर वाले से कुछ और देने की विनती कर रहा है। वापस जाने लगा तो राजा ने रोककर पूछा मांगो क्या चाहिए और फ़कीर ने कहा मैं तो राजा समझ कर आया था मगर आकर देखा आप तो खुद ऊपर वाले से मांग रहे हैं तो लगा इक भिक्षुक से क्या लेनी भीख , मांगनी होगी तो उसी से मांगेंगे जो राजा को भी देता है।

        नाम बदलने की इतनी जल्दी नहीं उपनाम जो रख लिया बदलने की जल्दी नज़र आई। सेवक चौकीदार नहीं अब फ़कीर हैं कहकर दिल जीत लिया सबका। संतन को क्या सीकरी से काम। मगर कभी नहीं सुना था कोई ऐसा फ़कीर होता है क्या राजसी शान क्या शासक होने का एहसास क्या खुद को महान होते देखने की चाहत जो किसी से छिपती नहीं छिपाने से। इतनी सुरक्षा की ज़रूरत किसी फ़कीर को नहीं होती है फकीरी का अर्थ ही बदल कर रख दिया है। ये लोग भी खूब हैं किसी का जादू सर चढ़कर बोलता है तो हर बात पर वाह वाह क्या बात है। इक नानक जी थे घर परिवार सब था सन्यास लेने की घर बार त्याग करने की कोई बात ही नहीं की कभी। ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर , कबीरा खड़ा बाज़ार में सबकी मांगे खैर। ये कैसा आधुनिक फ़कीर है कि  लोग डरते हैं किसी दिन किसी को सूली चढ़ाने की बात भी कह दे तो हैरान नहीं होना , जान की खैर मनानी है तो चुप रहना सीखो या उसकी जय कहना जो भी मुमकिन है। कई साईस लोग अपने बच्चों के नाम गरीबदास रखते थे जानकर उनकी अमीरी को नज़र नहीं लग जाये ये सोचते थे। और कोई फुटपाथ पर रहने वाला बच्चे का नाम अमीर चंद रख कर सोचता नाम से तकदीर बदल जाये शायद। शेक्सपीयर कहते थे नाम में क्या रखा है।  दुनिया आपका सिक्का मानती है कौन आपको फ़कीर समझेगा ये फकीरी आपको कहीं परेशान नहीं कर दे। फ़कीर फकीरी और फकीराना अंदाज़ आप नहीं समझोगे बाबू चुटकी भर सिंदूर की कीमत क्या होती है। कोई है जो आपको अपने सर का ताज मानती है फ़कीर नहीं भले आप कभी अपना धर्म नहीं निभाओ मगर इतना ज़ुल्म भी मत ढाओ खुद को फ़कीर मत बताओ। बड़े झूठे हो चलो जाओ। 

No comments: