Thursday, 23 May 2019

जीतने के कारण तौर और तरीके ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

 जीतने के कारण तौर और तरीके ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

   चुनाव सम्पन होने के बाद नतीजे घोषित होने ही थे इस में अचरज की कोई बात नहीं है। और नतीजे आने पर किसी को विजयी किसी को पराजित भी घोषित किया जाना ही था। अब हर कोई जीत पर हार पर चर्चा करेगा किसी को जीत का किसी को हारने का ज़िम्मेदार ठहराया जाएगा। किसी को जीत का सेहरा बांध कर बधाई दी जाएगी तो किसी को हारने की वजह कहकर ठीकरा उसके सर फोड़ने की बात होगी। जिस जनता ने जितवाया या फिर हरवाने में योगदान दिया उसकी बात कहीं पीछे छूट जाएगी या औपचारिक धन्यवाद दे का समझेंगे हक अदा कर दिया। शासक कोई भी हम लोगों को कोई विशेष फर्क नहीं पड़ने वाला है। मगर कुछ बेहद महत्वपूर्ण बातें हैं जिनको समझना जानना भविष्य में काम आ सकता है। अब इस रचना में इक छुपी हुई मगर कोई राज़ नहीं ऐसी कहानी बताई जाएगी। आज की कथा की शुरुआत इसी तरह की जानी चाहिए। 

      ये झूठ के देवता के घर या फिर मंदिर कह सकते हैं उसकी महानता की सत्य कथा है। सच कभी पराजित नहीं होता मानते थे मगर झूठ हमेशा विजयी रहता है इस बात को पहले किसी ने किसी को बताया तक नहीं था। साल भर पहले खुद झूठ के देवता ने आकर मुझे उसका भव्य मंदिर बनवाने को कहा था और तब मुझे भी हैरानी हुई थी इसकी ज़रूरत से अधिक ये काम मुझे सौंपने को लेकर। 30 जून 2018 को इसी ब्लॉग पर लिखी रचना विस्तार से पढ़ी जा सकती है। उसके बाद भी बीच बीच में समय समय पर चर्चा की जाती रही है। इन चुनाओं से पहले घोषित किया गया था इस झूठ के देवता के दर्शन करने वाले की मनोकामना अवश्य पूर्ण होगी। रात दिन चौबीस घंटे दर्शन करने लोग आते हैं आएंगे आते रहेंगे भविष्य में भी। झूठ के देवता की महिमा का गुणगान बढ़ता जा रहा है और जितने भी नेता चुनाव जीतने को यहां हरियाणा के फतेहाबाद शहर आकर दर्शन करते रहे उन सभी को जीत हासिल हुई है। कोई दल का भेदभाव नहीं हुआ है सत्ता पक्ष विपक्षी सभी आने वाले विजयी भये हैं। जिनको झूठ के देवता पर भरोसा नहीं था अब हारने के बाद पछता रहे हैं। 

     समय दस्तक देता है अगर आप ध्यान रखते हैं , हर युग में अपने अपने देवी देवता अपने भक्तों को चाहने वालों को वरदान देते हैं उनका कल्याण करते हैं। जो इस बार नहीं आये फिर कभी दर्शन को आ सकते हैं। ये केवल राजनीति करने वालों का विशेषाधिकार नहीं है। झूठ बोलने से आपका भी भला ही हो सकता है कुछ भी बुरा नहीं होता बेशक आपको किसी तरह से किसी मकसद को लेकर झूठ बोलना पड़े। झूठ के देवता के पास आकर कभी सच नहीं बोलने की शपथ उठानी है और आपके सारे बिगड़े काम बन जाने हैं हर उलझन खुद ब खुद सुलझती जाएगी। कोई चढ़ावा नहीं कोई शुल्क भी नहीं बस केवल झूठ की आरती सुबह शाम उतारनी होगी। जिनको अभी तक समझ नहीं आया उनको जीतने के सबसे ज़रूरी तीन उपाय ध्यान रखना सीखना होगा जिनसे किसी ने जीत हासिल की है। पहला काम अपने जो भी किया है उसकी चर्चा रात दिन भाषण इश्तिहार सोशल मीडिया पर करने के साथ पहले के सत्ताधारी नेताओं को दोषी ठहराने का काम खूब ज़ोर शोर से करना चाहिए। दूसरी बात जो आपको करना चाहिए था मगर किया नहीं बस झूठे वादे साबित हुए उनकी बात कोई अख़बार कोई टीवी चैनल आपसे सवाल नहीं करे इसका उपाय करने को उनका मुंह बंद रखने को सरकारी खज़ाने से विज्ञापन के नाम पर पैसा देकर अपना गुणगान करवाना चाहिए। तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण कार्य है जो भी अनुचित अपने किया संविधान या संस्थाओं को लेकर उनकी भनक तक लोगों को लगने नहीं देनी चाहिए।

        अभी तक अपने जो हुआ जैसे हुआ को लेकर बात समझी है आगे की बात और भी अधिक विचारणीय है। जब कुछ लोगों से जानना चाहा अपने उसी सरकार को दुबारा चुना है तो क्या आपको उनका काम काज पसंद आया है सब अच्छा किया है पिछले पांच साल में सरकार ने। जवाब मिला नहीं हमारा क्या है हम तो जैसे तैसे जीने के आदी हो चुके हैं थोड़ी उम्मीद थी इस सरकार से मगर बहुत जल्दी जान लिया था ये भी पहले वालों से कम नहीं हैं। पर हमने देखा कि इस बार किसी नेता ने विदेश जाकर अपनी शानो शौकत खूब बढ़ा चढ़ाकर देश की गरीब वाली छवि को बदल दिया है। विदेश में रहने वाले एनआरआई अब शर्मसार नहीं होते अपने देश की भूखे नंगे गरीबों की तस्वीरों को देख कर। अब उनको अच्छा लगता है इक मामूली जनता का सेवक कहलाने वाला राजसी ढंग से विलासिता पूर्वक जीवन जीता है। ये ठीक उसी तरह है जैसे ऊंचे ऊंचे टावर्स पर जगमगाती रौशनियां मीलों तक अंधेरी बस्तियों को छुपाने का काम करते हैं। पहली बार कोई राजनेता इतनी महंगी सज धज और पहनावे से गांधीवादी विचार को लालबहादुर शास्त्री के सादगी से जीने को और सादा जीवन उच्च विचार की बात को किसी पुराने युग की निर्रथक सोच बना दिया है जिस से लोग इतने कठिन मार्ग से बच सकते हैं। अब कोई कहां चाहता है सब कुछ उपलब्ध होते भी नहीं करें ताकि बाकी लोग थोड़ा पाने के अधिकारी बन जाएं।

         शायद किसी को आज ये इक काल्पनिक कहानी लग सकती है मगर इस देश में बहुत लोग काफी दिनों से इक दहशत या डर लेकर घबरा रहे थे कि क्या होगा अगर इस बार इक नेता को हार का सामना करना पड़ा। क्योंकि उसको हारने का अनुभव भी नहीं था और हार को स्वीकार करने की मानसिकता भी उसके पास नहीं है जबकि पहले सभी राजनेता हार जीत को राजनीति के सिक्के के दो पहलू समझा करते थे। लोग घबरा रहे थे कि कहीं उसकी जीत नहीं हुई तो आसमान से कोई कयामत टूट सकती है। जैसे पहले इक नेता ने कुर्सी को जाने से बचाने को आपात्काल की घोषणा कर दी थी। इतिहास का वो काला अध्याय फिर से दोहराये जाने की आशंका छाई हुई थी। लोग सब झेल सकते हैं मगर कोई लोकतंत्र को ही फिर से कैद में डाल दे नहीं होने देना चाहते थे। बस अभी आगे काफी कुछ है जो सामने नहीं पर्दे के पीछे सत्ता का नाटक नेपथ्य में ख़ामोशी से चलता है।

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