Thursday, 16 May 2019

मैं गरीब राजा ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

         मैं गरीब राजा ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 


      ऐ मेरे प्यारे देशवासिओ अपनी आंखों में भर लो पानी।  इक गरीब राजा की सुनो मुझसे कहानी। मैं बहुत गरीब था मेरा देश बहुत अमीर था सोने की चिड़िया क्या लंका थी सोने की। मैंने कई साल तक भीख मांगी गुज़ारा करने को पेट भरने को। पढ़ाई काम धंधा ये ज़रा टेड़ा सवाल है जो पढ़ा याद नहीं जो किया भूल गया। बस जैसे भाग्य खुलता है लॉटरी लगती है सब अमीर लोगों ने रईस लोगों से भूखे नंगे लोगों तक सभी ने मुझे इतनी भिक्षा डाली इतनी खैरात मिली कि मैं देश का सबसे अमीर बन गया।  सब लोग मुझे राजाजी कहकर बुलाते हैं मगर मैं खुद को अभी भी गरीब बतलाता हूं क्योंकि मुझे अभी भी लगता है मुझे और अधिक चाहिए , समझता खुद को शहंशाह महाराजा हूं पर दुनिया पर राज करने की चाहत है। अपने ठीक समझा है सिकंदर की तरह की हालत है मगर मुझे उसकी तरह दुनिया से खाली हाथ जाना नहीं है मुझे अमर होना है अमृत कलश की तलाश है मिलेगा किसी और को इक बूंद नहीं दूंगा जी भर का अकेले पीना है।

      गरीबी क्या होती है मैं ही जानता हूं , अमीरों को देखता था तो क्या मन करता था बता नहीं सकता। मन की बात कभी कही नहीं रेडिओ पर भी मन की बात के नाम पर बेमन की बात करता रहा हूं। मेरी गरीबी मिट गई मगर अपनी कमाई से नहीं हर किसी से चंदा लेकर अमीर बनकर भी अमीरी का एहसास नहीं आया। लगता है जाने कब सब मुझसे दी हुई खैरात वापस मांग लेंगे। भला कोई भिक्षुक मिली भिक्षा वापस देता है कोई मांगता ही नहीं मगर मैंने भीक ली ही छल कपट झूठ से है तभी लगता है कोई मुझसे मेरी तरह सब छीन सकता है। देश में मूर्खों की कमी नहीं है गरीब को इतना देते हैं मांगने पर कि अमीर बना देते हैं फिर उसी से उम्मीद करते हैं गरीबों की भलाई करेगा। अमीर बनकर अमीरों जैसा बन गया हूं पहले अमीरों को देख का जो सोचता था आजकल गरीबों को देखते ही विचार आता है इनका होना क्या ज़रूरी है। मगर है ज़रूरत इनकी क्योंकि झौंपड़ी सामने नज़र आती है तभी महल की ऊंचाई और शानो शौकत समझ आती है।

    कल इक साधु मिला था सपने में वास्तव में असली संत मुझसे मिलने क्यों आएगा। कहने लगा तुम पहले राजा हो जो बाहर से महंगी पोशाक और सज धज से रईसों से भी बढ़कर दिखाई देते हो जबकि भीतर बदन वही गरीब वाला है दिल गरीब से भी छोटा है गरीब भी आधी रोटी किसी को दे देता है तुम इतना खाकर भी भूखे के भूखे ही रहते हो। ये जाने क्या रोग है मेरी भूख जितना मिलता है खाता जाता हूं मगर दिल भरता नहीं और खाने को करता है। रात रात भर जागता रहता हूं देश भर से भिक्षा मिलती है बार बार भर पेट खाकर भी रहता भूखा का भूखा ही हूं। ये कुर्सी मिली हुई है जो अनपूर्णा की तरह सबको देती है इसको रात दिन जकड़े रहता हूं कोई मुझसे इसे छीन नहीं ले जाये डर सताता है। मुझे गरीब से राजा होना आया है फिर से राजा से गरीब होना नहीं आता मुझे। भले मैं दुनिया का सबसे गरीब हूं ऊपर वाले की नज़र में मगर मुझे राजाजी कहलाना पसंद है गरीब कहता रहता हूं मानता नहीं कोई कह नहीं सकता। मैं गरीब राजा हूं। 

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