Wednesday, 1 May 2019

हंगामा हो गया ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

          हंगामा हो गया ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

     ये होना संभव तो नहीं था मगर हो गया। शोर मचा हुआ है वो है तो सब मुमकिन है। लेखक को सत्ताधारी दल ने बिना आवेदन टिकट दे दिया और शहर वालों ने पर्चा भरने को विवश भी कर दिया। ज़रूर किसी दोस्त की साज़िश है समझ गए वो भी मगर जब ओखली में सर डाला है तो मूसलों से क्या डरना। पत्नी से विचार मिलने का कोई सवाल ही नहीं था फिर भी घर आते ही पत्नी ने बिना मांगे पानी भी नहीं देने वाली पत्नी ने जब खुद ही कहा कसम खाती हूं आपकी मेरा वोट आपका ही है। घबरा गया बेचारा पति वोट मिले नहीं मिले कोई बात नहीं जान है तो जहान है कहीं पत्नी का मन बदल गया वोट डालते समय तो झूठी कसम का असर सच हो जान जोखिम में डालना होगा। पति बोले भाई हम तो आज़ाद ख्याल रखते हैं आपको वोट जिसे देना है दे सकती हो कसम खाने की ज़रूरत नहीं है। पत्नी हंसकर बोली आपको क्या लगा आपको वोट देना चाहती हूं मुझे तो उसको वोट देना है जो उस दल के नेता हैं जिसने आपको खड़ा किया है। बात बढ़ाने से कोई फायदा नहीं था लेखक को जीतने हारने की नहीं ज़मानत बचाने की चिंता थी। 

         हंगामा हो गया हमारा भेजा सोशल मीडिया का संदेश किसी ने ग्रुप में भेज दिया जिस की सदस्य मेरी पत्नी जी भी हैं। ऊपर से एडमिन का सभी सदस्यों से निवेदन उस संदेश को जितना संभव हो फ़ॉरवड करने का आग में घी का काम कर गया। हम कभी सरकार विरोधी संदेश पत्नी क्या उसकी जान पहचान वालों को भी नहीं भेजते हैं। उनको हम पर शक ही नहीं है पूरा यकीन है हम सरकार के विरोधी हैं क्योंकि वो सरकार हैं और सत्ताधारी दल की समर्थक हैं। उनके अपने कारण हैं उनको लगता है जो नेताजी अपनी पत्नी को विवाह करने के बाद छोड़ देते हैं मगर पत्नी होने का अधिकार वापस नहीं लेते महिला जगत के हितेषी हैं। मतलब समझने समझाने की कोशिश मत करना। संदेश ही कुछ ऐसा था , सत्ताधारी दल के पांच साल से नहीं बीस तीस साल से समर्थक रहे लोग ठीक चुनाव के समय विपक्षी दल के नेता का साथ देने की बात कर रहे हैं। हमने हैरानी जताई और पूछा तो बात समझ आई है चर्चा है किसी ने अफवाह उड़ाई है झूठ सच का सगा बड़ा भाई है। हमको बताया गया पहले जितने दल थे मिलकर मलाई खाते थे खाते थे खिलाते थे , इस बार ऐसी सरकार है बात करना बेकार है। जो भी ऊपर बैठे हैं सब हज़्म करते जाते हैं चुपके से छुपके सब खा जाते हैं डकार भी नहीं लेते हैं। 

   खबर पक्की थी घटना सच्ची थी कोई राज़ की बात नहीं थी। घर के भेदी लंका ढाते हैं ये नेता भला कहीं टिकते हैं जिधर चुपड़ी मिलती भाग कर जाते हैं। जब अपने दल के लोग वोट नहीं देंगे और साथ चलते टंगड़ी लगाने का काम करेंगे तो मामला संगीन हो जाता है। पैसा सभी का बाप है कुर्सी माता है कुर्सी का क्या भरोसा है बदलती रहती है इसकी थी उसकी बनेगी किसकी रहती है। ये गंगा है जो ऊपर से नीचे कभी उल्टी भी बहती है। पत्नी को पढ़ते ही जोश आया है हमको आवाज़ देकर बुलाया है और सवाल उठाया है किस किस को ये संदेश भिजवाया है। बताओ ये क्या माजरा है किसलिए सबको फ़ॉरवड करने को कहा है , कोई और नहीं मिला है मूर्ख  बनाने को। बात इतनी सी है सबसे पूछा गया है आपको कौन से रंग का गुलाब भाता है या गुलाब की जगह गेंदे का आपसे नाता है। गेंदे के फूल गुलाब से कम अच्छे नहीं हैं मुरझाते नहीं इतनी जल्दी। बात गुलाब की है गेंदे की है कमल का कोई लेना देना नहीं है फिर कमल का फूल क्यों मुरझाने लगा है। कीचड़ से कमल उकताने लगा है। 

    मेरे घर में राजनीति का कोई काम नहीं है कोई और इस शहर में मेरा हमनाम नहीं है। और तो कोई इतना भी बदनाम नहीं किसी के कत्ल का झूठा लगता इल्ज़ाम नहीं। हम उधर के हैं न इधर के हैं हम तो उन्हीं के हैं और अपने क्या उनके ही घर के हैं। उनके दल के लोग क्यों दल से छल करते हैं हम क्या करें बात करते हैं तो डरते हैं लोग कहते हैं और मुकरते हैं। हंगामा करना मेरा मकसद नहीं है दुष्यंत कुमार की कसम मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए। आग दिल में नहीं रसोई घर के चुल्हे में जलनी चाहिए रोटी कोई दल वाला नहीं भेजता है न किसी सरकारी ऐप से डाउनलोड की जा सकती है। गलती कोई नहीं मगर माफ़ी मांगनी ज़रूरी है हाय कैसी मज़बूरी है। पास होने की बात नहीं है दिल्ली की बढ़ती दूरी है।



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