Tuesday, 30 April 2019

नाम रौशन भी नाम बदनाम भी है ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

  नाम रौशन भी नाम बदनाम भी है ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

नाम से क्या होता है सच है कि झूठी बात है। आदमी ये आम है अनाम है कोई और है नाम जिसका बेहद ख़ास है।  बस उसी का नाम है इक उसी की आस है। देखो ओ दिवानों तुम ये काम न करो , राम का नाम बदनाम न करो। नाम में क्या रखा है जिसने कहा उसका नाम जुड़ गया इसी बात से ये भी नाटककार की पहचान है। कल मुझसे भूल हुई किसी का नाम लब पर आ गया हंगामा हो गया आपको दुश्मनी क्या है बात बात पर उसी का नाम लेते हो। जनाब इसको मुहब्बत कहते हैं इश्क़ है हरदम उसी का नाम दिल में रहता है। नीरज जी का गीत है कि ग़ज़ल है , इतने बदनाम हुए हम तो इस ज़माने में , तुमको सदियां लग जाएंगी हमें भुलाने में। लोग बाप दादा के नाम की कमाई खाते हैं छाछ नहीं पीते हैं मलाई खाते हैं। 

   नाम को लेकर लोग बड़े संवेदनशील होते हैं , शहर भर में नाम है क्या हुआ जो बदनाम है। चोरी मेरा काम है। एक अधिकारी को बुलाने गये थे उनके सचिव ने फोन पर समझाया था नये अधिकारी आये हैं जो चले गये अब वो नहीं आने वाले इनको बुलाना ज़रूरी है अगर नहीं बुलाओगे तो पछताओगे। सब सभा के सदस्य घबरा गये और बुलाने दफ्तर चले गये , कार्ड पर नाम की स्पेलिंग गलत लिखी हुई थी उनका नाम ही कुछ ऐसा था कोई समझ नहीं पाता था। फ़तेह फतेहाबाद और फते की उलझन थी सुलझानी मुश्किल थी खैर हमने माफ़ी मांगी मगर हमारी सॉरी की शायद स्पेलिंग उनको फिर गलत लगी माफ़ नहीं कर सके जब तक रहे शहर में जतलाते रहे। अधिकारी हैं रौब जमाते रहे हम बुलाते रहे वो रस्म निभाते रहे , आते जाते रहे बीच में उठ कर चले जाते रहे। ज़रा सी बात का बतंगड़ बनता है इस को समझ लिया। हिंदी में ऐसी गड़बड़ नहीं होती है। 

पत्नी का नाम बदलने का चलन रहा है नाम बदलने से राशि के गुण मिलाया करते थे। बचपन में घर पर कॉलेज में दोस्त कई नाम से बुलाया करते थे। कभी पूरा कभी पहला अक्षर बीच का अक्षर अंत में किस वर्ग से हैं लिखने का चलन था। बीच वाला नाम मुझे भाता नहीं था इक दिन चुपचाप हटा दिया और लोक सेतिया छोटा सा नाम नेम प्लेट पर मोहर पर लगवा दिया। बीच में कोई क्यों रहे शुरू और आखिर इतना बहुत है। लोक अकेला ही काफी है खुद को जाने क्या समझता है ऐसा लगता है ज़रा पहचान बनी तो अकड़ता है। बना है शह का मुसाहिब फिरे है इतराता ,वगरना शहर में ग़ालिब की आबरू क्या है। हरेक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है , तुम्हीं खो कि ये अंदाज़े गुफ़्तगू क्या है। रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल , जब आंख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है। ग़ालिब से क्या मुकबला , बदल कर फकीरों का हम भेस ग़ालिब तमाशा ए अहले करम देखते हैं। 

   नाम की बात आज लिखनी पड़ी किसी नाम वाले की बड़ी चर्चा है। इक उसी के नाम पर लोग इधर हैं या उधर हैं क्योंकि उसका गणित है जो उसके साथ नहीं उसके खिलाफ है। मुझे किसी से इतना लगाव नहीं हुआ कि उसकी महिमा गाता फिरूं न कोई इतना खराब लगा कि बस मुखालफत के नाम पर मुखालफत करता रहूं। सच को सच झूठ को झूठ कहना किसी का दोस्त होना नहीं न किसी का दुश्मन होना है। अब उसका नाम रौशन भी बहुत है और बदनाम भी उस से बढ़कर है , इक फासला रखना चाहता हूं बड़े लोगों से दूरी रखने की बात भी इक शायर समझा गये हैं। बड़े लोगों से मिलने में ज़रा सा फासला रखना , जहां दरिया समंदर से मिला दरिया नहीं रहता। हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है , जिस तरफ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा। सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा , इतना मत चाहो उसे वो बेवफ़ा हो जाएगा। बात आज की है बात पुरानी याद आई फिर से , किसी नेता ने कहा था मुझको इतना मत सर चढ़ाओ कि मैं तानाशाह बन जाऊं। उनको तानाशाह होना खराब लगता था इनको होने की ख्वाहिश है। नाम रौशन होना और बदनाम होना ज़मीन आसमान का अंतर है , कोई चाहता है उसको दिल से प्यार करें लोग और कोई चाहता है उसके नाम का डर लोगों के दिल में रहे दहशत बनकर कर। यहां से पचास पचास कोस तक दूर जब कोई बच्चा रोता है तो मां कहती है चुप हो जा नहीं तो गब्बर सिंह आ जाएगा। गब्बर इस बैक।

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