Friday, 8 November 2019

कौन हैं मेरे मम्मी-पापा ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

     कौन हैं मेरे मम्मी-पापा ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

   बड़ी प्यारी सी बच्ची है तुतली ज़ुबान में बोलती हुई सवाल पूछती है कोई मेरे मम्मी-पापा का नाम पता बताओ मुझे अनाथालय में छोड़ गया जो जन्म देते ही वो कौन था। स्कूल में पढ़ाई करने जाना चाहती है आधार कार्ड बनवाना ज़रूरी है समझो कितनी मज़बूरी है। सरकारी ऐलान है नोटबंदी हुई बदनाम है काली कलूटी उसका नाम है पर उसका रंग गुलाबी है छुपे खज़ाने की चाबी है काला धन कहां छिपा है तूं तूने की सब बर्बादी है। धन काला मिला नहीं इसका कोई गिला नहीं पर जो तीन साल की बच्ची है ये अक्ल की कच्ची है राजनीति से वाकिफ़ नहीं सरकार से पहचान नहीं ये जायज़ संतान नहीं। सच इसको समझाए कौन काला धन खोज लाये कौन। रोटी से जो खेलता है उसका पता बताये कौन संसद इस सवाल पर आखिर रहेगी कब तलक मौन। चलो हम मिलकर जन्म दिन मनाते हैं हैप्पी बर्थडे टू यू गाते हैं बच्ची का दिल बहलाते हैं। 

        मोदी जी आएंगे आकर तुझे खिलाएंगे जब रात आठ बज जाएंगे गले तुझको लगाएंगे। तुझे पढ़ाया जायेगा तुझको सबसे बचाया जायेगा बच्ची तू इतिहास नहीं वर्तमान है भविष्य बनाया जायेगा। हम गुब्बारे बहुत फुलाएंगे पार्टी राह पर मनाएंगे केक भी कटवाना है मोमबत्ती बुझवाना है ताली बजाकर हैप्पी बर्थडे टू यू गाना है। मोदी जो तोहफ़ा लाएंगे सबको ये सच बतलाएंगे खाते में कितना धन डलवाएंगे हम मालामाल हो जाएंगे। मोदी जो ने फ़रमाया है पांच साल व्यर्थ गंवाया है अब दूर की कौड़ी लानी है की अब तक मनमानी है। अध्यापक जी समझाएंगे नोटबंदी की बात बताएंगे पूरी कहानी सुनाएंगे हम झूमेंगे और गाएंगे तीन साल का जश्न मनाएंगे। जन्म दिन तुम्हारा मिलेंगे लड्डू हमको गीत बजवाएंगे , तुम जियो हज़ारों साल जिओ वाले मुस्कुराएंगे। थक कर खुद सो जाएगी ये बच्ची भूखी प्यासी सपनों में खो जाएगी। सरकार आपको बधाई हो प्यारी सी बिटिया आई है गूंगी नहीं है खामोश है लगता है देख आपको घबराई है। 

    मोदी जी कहते हैं नोटबंदी करने का फायदा तीन साल बाद नज़र आया है। दुश्मन मुल्क़ में महंगाई आसमान छूने लगी है। अब अपने देश का इस में क्या भला हुआ अपनी समझ से बाहर है ये कुछ उस तरह है कि मेरी पोशाक मैली है मगर देखो मैंने दुश्मन की गंदी कर दी है। अर्थात मोदी जी चले थे सफाई करने मगर मैल छुड़ाने नहीं आता था गंदगी करना आसान था औरों को अधिक मैला कर खुद की चमक बढ़ाने का दावा कर लिया। मैल कपड़े का धुल जाता है मन का मैल साफ करने को कोई साबुन नहीं बना है। संसद की चौखट पर माथा टेका था याद होगा अब मन से सोचना पांच साल में कितना मन का मैल छुड़ाया , बस कपड़े बदलते रहे दिल की सफाई नहीं की। अब मानो न मानो नोटबंदी आपकी दी सौगात है और अपने किसानों को फसल का दुगना दाम देने का वादा किया था मगर हरियाणा के सीएम साहब पानीपत की अनाज मंडी में आकर किसानों की बर्बादी की बात पर बोलते हैं तो हम क्या करें। भले भी हम बुरे भी हम समझिओ न किसी से कम , हमारा नाम बनारसी बाबू। बनारस के ठग मशहूर हुआ करते थे ये गुजरती तो बनारस वालों का भी बाप निकला। बनारस वालों को गंगा मईआ के नाम पर ठग गया और शरद जोशी के मामा जी की तरह हम घाट किनारे खड़े हैं तौलिया लपेटे पूछते हैं देखा है उसको जो हमारे कपड़े सामान ले गया उल्लू बनाकर।

     कहावत है इक बार सच और झूठ नदी में नहाने को गए। झूठ जल्दी से बाहर निकला और सच के कपड़े पहन चल दिया। सच बाहर निकला तो उसके कपड़े नहीं थे और झूठ के पहन नहीं सकता है तभी से सच नंगा है। नोटबंदी बिटिया की दर्द भरी कहानी ऐसी ही है , तीन साल से हर कोई उसको बुरा बता रहा है और धुत्कार खाती फिरती है अपने जन्मदाता को ढूंढती जो शायद उसको अपना समझना तो क्या पहचानना भी नहीं चाहता है। जन्मदिन पर भी उदास है रोते रोते सो गई है।

Friday, 1 November 2019

इक नज़र बीते ज़माने पर और इक नज़र कल के भविष्य पर ( बदलते हुए एहसास ) डॉ लोक सेतिया

   इक नज़र बीते ज़माने पर और इक नज़र कल के भविष्य पर 

                         ( बदलते हुए एहसास ) डॉ लोक सेतिया

 रिहाई की बात नहीं है रिहा होने की आरज़ू भी कभी की भूल गई। थोड़ा बदलते समय के दौर पर सोचा तो फुर्सत में किसी फिल्म की तरह फ्लैशबैक की तरह यादें चली आईं। ज़िंदगी अपनी हरदम किसी कैद में रहते गुज़री है कैदी यही रहा सय्याद बदलते रहे। आदमी को इतना भावुक और संवेदनशील भी नहीं होना चाहिए कि जीना दूभर होता जाये। हंसना चाहो तब भी आंखें नम हो जाएं और हर किसी से अश्क़ छिपाने की ज़रूरत हो या फिर ख़ुशी के आंसू हैं बताना पड़ जाये। मगर कुदरत भी कभी ठोस पत्थरीली ज़मीन पर कोई नाज़ुक सा फूल उगा देती है शायद मुझे यही मिला नसीब से। पत्थरों में रहकर भी फूल कोमलता बरकरार रखता है नहीं बन सकता पत्थर दुनिया की तरह। 

     कैद खुद अपनी भी बनाई हुई है और रिहा होने को कोशिश भी खुद ही करनी होगी इस बात को जानता हूं मगर होता है कभी जीवन भर पिंजरे में रहते रहते पिंजरा भाने लगता है। कोई पिजंरे का दरवाज़ा खोल देता है फिर भी मन बाहर नहीं निकलता और मुमकिन है कोई पकड़ कर खुली हवा में उड़ा दे तब भी पंछी खुद अपने पिंजरे में वापस लौट आये। बोध कथा की तरह। पर ये भी सच है पिंजरा चाहे सोने का हो या चांदी का बना पिंजरा पिंजरा ही होता है पंछी उड़ने को बेताब रहता है। मगर सय्याद ने जब पंख ही तोड़ डाले हों तब पंछी छटपटा भी नहीं सकता उड़ना तो दूर की बात है। 

   मुझे कैद रखने वाले समझते रहे मुझसे मुहब्बत करते हैं मेरा ख्याल रखते हैं मुझे सब दुनिया से बचाकर रखना ज़रूरी है। पिंजरे में बंद पंछी का चहकना अपने अंदर कितना दर्द छुपाये रहता है कोई नहीं समझता है। आज़ाद होने की ख्वाहिश रहती थी कभी अब नहीं बची शायद नियति को मंज़ूर कर लिया है। कितने साल जिस घर में रहा अपना था मगर लगता नहीं था अपना उस से बिछुड़ते समय पता नहीं उदासी का अर्थ क्या था मगर मन उदास उदास था अवश्य। 

    दुनिया की तेज़ रफ़्तार ने सुबह से शाम तक कितना लंबा सफर तय कर लिया और मैं खुद अपने पिंजरे को साथ लिए नई अजनबी दुनिया में चला आया नहीं सोचा समझा कुछ भी। अब उलझन पड़ी है सब बदला बदला है और मुझे समझाया जा रहा है नए माहौल में बदले तौर तरीके यहां की भाषा तहज़ीब सीखनी होगी। उनकी बात सुन सकता हूं अपनी कहनी नहीं आती है ऐसे में किस तरह बताऊं सीखने को जितना है जीने को उतना वक़्त भी शायद बचा नहीं है। आपके इशारे समझते समझते जाने कब कोई इशारा मिल जाये और भीतर का पंछी उड़ जाए अपनी आखिरी मंज़िल की तरह सुहाने सफर पर।

 


Wednesday, 30 October 2019

मेरा लिखना क्या क्यों कैसा ( आलेख-अपनी बात ) डॉ लोक सेतिया

 मेरा लिखना क्या क्यों कैसा ( आलेख-अपनी बात ) डॉ लोक सेतिया 

   कहानी हो ग़ज़ल हो बात रह जाती अधूरी है , करें क्या ज़िंदगी की बात करना भी ज़रूरी है। 

   मेरी ग़ज़ल का मतला है बहुत पहले लिखा था। कई बार पहले सोशल मीडिया पर और व्यक्तिगत तौर पर भी मिलने वालों को बताया है कि मैंने लिखने की शुरुआत 1974 में नियमित रूप से इक मकसद को लेकर की थी। इक मैगज़ीन में कॉलम पढ़कर जिस में संपादक ने सभी से कहा था की शिक्षित होने पर अपने खुद घर परिवार को छोड़कर कोई न कोई काम देश समाज की भलाई को लेकर करना भी इक कर्तव्य है समाज से जो भी मिला उसका क़र्ज़ उतारने के लिए। डॉक्टर होने से साहित्य को पढ़ने का अवसर कम मिला बस इधर उधर से थोड़ा बहुत ही पढ़ा है। समाज की जनहित की बात लिखते लिखते व्यंग्य कविता कहानी ग़ज़ल आलेख लिखता गया जब जिस विषय पर जो भी विधा उचित लगती रही। लिखने के स्तर को लेकर हमेशा से मुझे मालूम रहा है कि ग़लिब दुष्यंत परसाई शरद जोशी मुंशी प्रेमचंद अदि को सामने कुछ भी नहीं हूं न बन सकता हूं। साहित्यकार होने का भ्र्म नहीं पाला दिल में और नाम शोहरत ईनाम पुरुस्कार की चाहत रही नहीं। लिखना मेरे लिए जीना है सांस लेने की तरह ज़रूरी है। नहीं रह सकता लिखे बिना। मैंने जितना जो भी लिखा ज़िंदगी की बातों से अनुभव से और निष्पक्षता से समाज की वास्तविकता को उजागर करने को लिखा और बगैर इसकी चिंता किये लिखता रहा कि किसी और के तो क्या खुद मेरे भी ख़िलाफ़ तो नहीं। मेरा पहला व्यंग्य " उत्पति डॉक्टर की " अपने ही व्यवसाय पर तीखा कटाक्ष था। अभी तक कोई किताब नहीं छपवाई मगर अख़बार मैगज़ीन लोगों को समाजिक संस्थाओं से नेताओ अधिकारियों को लिख कर जहां जो भी समस्या थी विसंगति थी गलत हो रहा था लिखकर भेजता रहा। 

        जो लोग किताबें पढ़कर दुनिया समाज को समझते हैं किताबी साहित्य के मापदंड और नियम आदि की चिंता करते हैं उन्हें कभी मेरे लिखने पर उलझन होती है। सीखा है कई तरह से लिखने को सुधारने की कोशिश करता रहता हूं मगर उपदेशकों की ज़रूरत नहीं लगती है। खुद विचार चिंतन और अभ्यास से कोशिश करता रहता हूं और अच्छा लिखने की।  मगर सबसे महत्वपूर्ण बात लगती है सच और सही बात ईमानदारी से निडरता से लिखने की। भले मेरा लेखन जैसा भी जिस भी विधा में हो उसमे वास्तविक्ता है आडंबर नहीं बनावट झूठ या बात को उलझाने की कोशिश कभी नहीं की है। इतना काफी है। खुद को किसी तथाकथित साहित्यगुरूओं के तराज़ू पर उस इस पलड़े पर रखकर तोलना ज़रूरी नहीं लगा है उनसे कोई प्रमाणपत्र पाने को जिसकी मुझे कोई चाहत नहीं है।


Monday, 21 October 2019

शराफ़त की नकाब ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

       शराफ़त की नकाब ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

   कल चुनाव में चर्चा थी फलां व्यक्ति शरीफ है इसलिए लोग उसको वोट देंगे। मुझे ये वास्तविकता अनुभव से कई साल पहले समझ आ गई थी कि राजनीति में आने वाले नेताओं की शराफ़त नई नवेली बहु की तरह होती है लाज का घूंघट दो दिन में उतर जाये या कुछ महीने लग जाएं हालात पर निर्भर होता है। ससुराल में बहुरानी और राजनीति में आदमी आता है मन में छुपाकर सबको उनकी औकात दिखाने की भावना को। साफ शब्दों में शराफत की नकाब नेता लोग सत्ता मिलते ही उतार फैंकते हैं और असली रंग दिखाने लगते हैं। ये राजनीति का बाज़ार वैश्या का कोठा है जिस पर आकर अस्मत का सौदा होते ही शर्म का पर्दा उतारना ही पड़ता है। विधायक संसद बनते ही लोग किसी बड़े राजनेता के हाथ की कठपुतली बन जाते हैं। कठपुतली करे भी क्या नाचना तो पड़ेगा डोर किसी और के हाथ है उसकी मर्ज़ी है जिस तरह मर्ज़ी नचवा सकता है। आनंद का नायक नाम बदलता रहता है हंसी मज़ाक में दोस्त बनाने को समझाता है जॉनी वाकर जैसा कलाकार कि दुनिया के रंगमच पर हम सभी कठपुलियां हैं जिनकी डोर ऊपर वाले के हाथ में है कौन कब कैसे उठेगा कोई नहीं जानता। डॉयलॉग सुपर हिट है फ़िल्म का अंत भी टेप रिकॉर्डर की आवाज़ से होता है। नायक अंतिम सांस लेता है और टेप रिकार्डर चालू होता है , दोस्त आता है और आवाज़ सुनाई देती है। " बाबूमोशाय हम सब तो रंगमंच की कठपुलियां हैं जिनकी डोर ऊपर वाले के हाथ है , कब कौन कैसे उठेगा कोई नहीं जानता   .................... ( थोड़ी ख़मोशी )  हाहाहाहा। 

            अंतर है फ़िल्मी कहानी में सच्चाई विचलित करती है दिल दर्द से भर जाता है। राजनीति में सत्ता का रावण अट्हास करता है तो आपकी रूह कांप जाती है। कल की बहु आपको नाकों चने चबाबे का सुना हुआ मुहावरा समझा देती है। मुल्तानी भाषा की कहावत है उहो अच्छा जेड़ा कोयनी डिट्ठा। आज़ादी के बाद देश की राजनीति ने शराफ़त का चोला उतार दिया था बीस साल बाद तो बिलकुल नंगी हो गई थी। अपने फ़ैशन बदलते देखा महिलाओं को कपड़े तन ढकने को नहीं दिखाने को पहनते हैं की सोच बदलते देखा। आपको भीतर राजनीति कैसे बदलती रही पता ही नहीं चला आपको जो लगता है जश्न है पार्टी चल रही है वास्तव में कोई किसी को नंगा करने को आतुर है तो कोई खुद अपने को परोस रही होती है बेहूदगी का नाच दिखला कर। कला के नाम पर फ़ैशन की आड़ में वासनाओं का खेल जारी है अब फ़टे हुए कपड़े चीथड़े उधड़े हुए अमीर और आधुनिक होने की निशानी है। सत्ता की राजनीति इन सबसे बढ़कर है ज़मीर बेचने को तैयार हैं सब के सब कीमत लगवाने की होड़ लगी है। देश सेवा जनता की भलाई की अच्छी बातें चुनाव तक ठीक विवाह से पहले लड़की की ससुराल को ही अपना घर सास ससुर माता पिता अदि जैसी बातें मगर सत्ता मिलते नेता और शादी होते ही पड़की असली रंग दिखलाते हैं। दामाद भी तब पता चलता है जो कहता था कितना सच झूठ था , चांद तारे के सपने चुनावी वादे साबित होते हैं और खींचातानी होती है पति पत्नी में कौन भला कौन चालाक का खेल जारी रहता है अनंत काल तक।

       अच्छे दामाद अच्छी बहुरानी किस्मत वालों को नसीब से मिलती है और ख़ुशनसीन थोड़े लोग होते हैं। बदनसीबी अधिकांश के हिस्से में आती है। अच्छे सच्चे ईमानदार राजनेता विरले ही दिखाई देते हैं बेशक मां के पेट से कोई खराब नहीं पैदा होता की तरह राजनीति में आने से पहले कभी सभी शरीफ लोग हुआ करते थे मगर फिर शरीफों ने ही बदमाश लोगों को साथ मिलाने का काम शुरू किया और बदमाश लोगों ने शरीफ लोगों को अपने जैसा बना लिया। शराफत आजकल चेहरे को ढकने को नकाब की तरह है अपने अंदर सभी गुंडागर्दी करने का इरादा छिपाए रहते हैं। सोने में धतूरे से हज़ार गुणा नशा होता है सबने दोहा सुना है सत्ता धन दौलत का नशा उस से लाख करोड़ गुणा अधिक होता है। पैसा ताकत शोहरत और सत्ता का अहंकार वो ताकत हैं जो विवेक को रहने नहीं देते हैं। भले बुरे की परख रहती नहीं है राजनीति के दरबार की रौशनी की चकाचौंध अंधा कर देती है। भाषण ऐसी कला है जिस में मीठा झूठ जनता को बेचकर नेता लोग सत्ता की सीढ़ी चढ़ते हैं और अच्छे भाषण की विशेषता यही है कि नेता जो कहता है हम देखते हैं उसके विपरीत आचरण करता है फिर भी ऐतबार करते हैं झूठी बातों पर जब तक कोई बड़ा कारनामा सामने नहीं आता जिस में उसकी असलियत पता चलती है तो हैरान होते हैं कि जिस ने महिला सुरक्षा की बात से मोहित किया था उसी के हरम में महिलाओं से वासना का गंदा खेल खेला जाता रहा बंदी बनाकर। सच्चे आशिक़ और सच्चे देशभक्त नेता इतिहास की कथा कहानियों की बात रह गई है। अब हम्माम में सभी नंगे हैं।      

Thursday, 17 October 2019

महत्वहीनता की बात ( चिंतन-मनन ) डॉ लोक सेतिया

     महत्वहीनता की बात ( चिंतन-मनन ) डॉ लोक सेतिया 

  शुरुआत भले कहीं से करें अब मुझे महसूस होने लगा है तमाम चीज़ें अपनी उपयोगिकता खो चुकी हैं। कल शाम पढ़ा अख़बार में इक तथाकथित सन्यासी स्वामी जी अपने अनुयाईओं को किसी दल को समर्थन देने की बात समझाते हुए कह रहे थे जाति वर्ग से ऊपर उठकर विचार करो। जबकि वही हमेशा उसी जाति वर्ग की रहनुमाई की बात शान से किया करते थे और कुछ लोग आपसी विवाद सुलझाने को उन्हीं को बुलाया करते थे। विषय उनकी बात या किसी एक घटना को लेकर नहीं है बस मिसाल देने को अभी की बात ध्यान आई है। वास्तव में बहुत कुछ अपना महत्व खो चुका है और धर्म सामजिक संस्थाएं आदर्श नैतिक मूल्य से लेकर देश समाज की ज्ञान की बात इसी गति को पा चुके हैं। मुमकिन है ऐसा मुझे अपनी निराशा के कारण लगता हो। 

  आप फेसबुक पर पढ़ रहे हैं ये बात या व्हाट्सएप्प पर पढ़ते हैं कभी अख़बार मैगज़ीन में पढ़ते थे किताब में पढ़ते थे ध्यान से। अब गंभीर चिंतन नहीं करते लोग सरसरी नज़र डालते हैं जो पोस्ट चार लाइनों की होती हैं पढ़ते हैं विस्तार से लिखी पोस्ट को पढ़ना मुसीबत लगता है क्योंकि पढ़ना अब समझने का मकसद से नहीं बस समय बिताने मनोरंजन को करते हैं। मुझे लगता है पढ़ने का मकसद ही खो गया है। आडंबर बनकर रह गई हैं तमाम संस्थाएं भी चुनाव सरकार सरकारी विभाग संस्थाएं संविधान न्याय देशभक्ति समाजसेवा सभी लगता है मकसद कुछ था और बन कुछ और ही गए हैं। 

     धर्म कितने हैं कोई भी वास्तविक मानवता इंसानियत की बात वास्तव में नहीं सिखलाता है। इक होड़ सी लगी है खुद को अच्छा किसी को खराब साबित करने में , कितनी खेदजनक दशा है ये तो धर्म के खिलाफ है। अपने चोला पहन लिया है उपदेशक संत साधु सन्यासी या कोई धर्मगुरु होने का मगर सब को दुनिया छोड़ने की बात लोभ लालच मोह माया त्याग की बात बताने वाले संचय करने में लगे हैं। पढ़ लिख कर या फिर किसी भी तरह बड़े पद पर बैठकर कर्तव्य की बात भूलकर अधिकार और अहंकार की सोच से खुद को जाने क्या समझने लगे हैं जबकि वास्तव में सब की हैसियत समंदर में बूंद की भी नहीं है और ये बात नेताओं अधिकारियों से लेकर लिखने वाले साहित्यकारों से धनवान लोगों ही नहीं कलाजगत की बड़ी हस्तिओं खेल टीवी अख़बार सभी आदर्शवादी बातें करने वालों पर लागू होती है। हर ज़र्रा खुद को आफ़ताब समझता है।  आधुनिकता ने हमको जितना दिया है उस से अधिक मूलयवान था जो छीन लिया है। हमने जो जो भी जिस जिस मकसद को लेकर बनाया था वही अपने ही मकसद के विपरीत आचरण करता लगता है। जिनका उपयोग करना था हम उन्हीं के हाथ का खिलौना बन गए हैं। आदमी आदमी नहीं सामान बन गया है।

         
    बात कभी सीधी तरह समझ नहीं आती , जब कोई सीमा लांघ जाता है तब सोचते हैं ये कोई सही राह दिखाने वाला नहीं है अपने मकसद को सच को झूठ और झूठ को सच बताता है। आखिर कब तक कोई गुरुआई की आड़ लेकर कमाई की मलाई खा सकता है। देर से ही सही सन्यासी की बात कुछ लोगों को बेहद अनुचित लगी है। कभी कभी कायर लोग भी अपने अस्तित्व की खातिर ख़ामोशी तोड़ने लगते हैं और खलनायक को नायक मानने से इनकार कर देते हैं। ऐसा पहले किया होता तो अपने अस्तित्व पर सवाल खड़ा नहीं होता। मगर चालाक लोग अभी भी कुछ न कुछ तरीका अपनाकर उनको मनवा लेंगे ऐसा कुछ समय का गुबार थोड़ी देर में गुज़र जाता है। जब तक अपने अंदर की ताकत को जगाते नहीं और विवेक से काम लेकर अच्छे बुरे को समझ कर हिम्मत नहीं करते सच्चाई का साथ और झूठ का विरोध करने को तब तक बात बनेगी कैसे। अपने जिस के हज़ार ज़ुल्म ख़ामोशी से सहे आज दर्द से कराह उठे जब सूली पर चढ़ाने की नौबत सामने है। खुद हम बुराई को बढ़ने देते हैं जब पहाड़ बनकर खड़ा होता है कोई तब होश आता है। मगर जब चिड़िया खेत चुग गई तो हाथ मलने पछताने से फायदा क्या। सबसे महत्वपूर्ण बात है हम आदर्श को लेकर नहीं अवसर के कारण खड़े होते हैं जबकि सच और झूठ की लड़ाई हर रोज़ लड़नी होती है। इंसाफ की डगर पर चलना है तो मुश्किलें रोज़ आएंगी और सामना करना होगा। अन्यथा आपको विभाजित करने को उनके पास कई चालें हैं आपको हर चाल को समझना भी होगा और टकराना भी होगा समझदारी से। दीवार से सर टकराने से कुछ नहीं हासिल होता आपको ज़ुल्म की दीवार भले फौलाद की हो उस में छेद दरार कमज़ोर जगह देख उस पर वार करना होगा। ये महत्वपूर्ण बात ध्यान रहे।

              

Monday, 14 October 2019

दिल्ली का चोर बाज़ार ( आज की राजनीति ) कटाक्ष - डॉ लोक सेतिया

        दिल्ली का चोर बाज़ार ( आज की राजनीति ) 

                                 कटाक्ष - डॉ लोक सेतिया 

  अपने भी नाम तो सुन रखा होगा , खुलेआम लगता था पुरानी दिल्ली में चोर बाज़ार नाम से सब मिलता था सस्ते दाम पर। आज की राजनीति को समझना चाहा तो याद आई कभी जाकर देखा तो नहीं था। आपको अपना बेहद कीमती अधिकार पांच साल बाद उपयोग करना है मगर आपको खरा सोना तो क्या शुद्ध पीतल भी किसी भी दुकान पर नहीं दिखाई दे रहा। हर दल नकली मिलावटी या इधर उधर से सस्ते दाम खरीदे माल को अपना लेबल चिपका कर आपको बेचना नहीं ठगना चाहते हैं। संभल कर चोर बाज़ार में जेबतराश भी बहुत हैं और चेतावनी भी जगह जगह लिखी हुई है जेबकतरों से सावधान।  चोर बाज़ार अब देश भर में फ़ैल चुका है राजनीति का चोखा धंधा इतना बढ़ता गया है कि चोरी और सीनाज़ोरी यही होने लगा है। चलो आपको शुरू से चोर बाज़ार चोरों की टोली और चोरों के सरदार से अली बाबा चालीस चोर की वास्तविककता बताते हैं।

         तब एकाधिकार जैसा था उनकी धाक थी और गांव शहर उन्हीं का नाम बिकता था। विकल्प तलाश करने की हमारी आज भी आदत नहीं है बिना समझे इस नहीं तो उस को चुन लिया मगर हमारी कसौटी पर खरा कोई भी नहीं उतरा कभी। सब एक थैली के चट्टे बट्टे हैं हमने भी हार मान ली उसी गलती का सिला चुका रहे हैं कभी खुद ढूंढते सच्चे लोगों की कमी नहीं थी मगर हमने कोशिश की ही नहीं अच्छे बुरे की पहचान करने की। ऐसे में गंगा उल्टी बहती रही जनता के चुने लोग कहीं नहीं रहे और तथाकथित ऊपरी आलाकमान की मर्ज़ी के लोग मनोनीत होते रहे। नतीजा लोकतंत्र की जगह चाटुकारिता और मनमानी का बोलबाला होने से तानाशाही फलने फूलने लगी थी। भीड़ की आवाज़ में सच किसी को सुनाई नहीं देता था और धीरे धीरे ये रोग देश से राज्य तक फैलता गया और कुछ लोगों ने देश की आज़ादी और लोकतंत्र को अपनी मुट्ठी में बंद कर लिया था।

       स्थनीय स्तर पर लोगों ने कुछ विकल्प बनाने की कोशिश की तो सत्ता की चाहत ने उनको स्वार्थी बिना विचारधारा के गठबंधन की राजनीति ने भटका दिया और ऐसे दल किसी व्यक्ति की निजि जायदाद बन गए। जो लोग स्वार्थ से साथ जुड़े उनके स्वार्थ समय समय पर बदलते रहे और ऐसा लगने लगा जैसे ये राजनीति काजल की कोठरी है जिस में भीतर जाते ही कालिख लगना नियति है। मगर नहीं देश की चिंता करने वाले लोग अडिग होकर बदलाव की कोशिश करते रहे। एक समय आया जब जनमत ने ख़ामोशी से तानाशाही को हराकर अपना इरादा ज़ाहिर कर दिया था। मगर उसके बाद सत्ता की चाह ने गठबंधन के धर्म को छोड़कर लालच की राह चल कर जनता को देश को फिर अंधी गली में ला दिया। तब से केवल सत्ता की स्वार्थ की राजनीति ने लोकतंत्र के आसमान को ढक दिया है और उम्मीद की कोई किरण नहीं नज़र आती है।

    हम लोग बार बार रौशनी की खोज करते हैं और किसी को सूरज समझ लेते हैं मगर जैसे ही सत्ता के सिंहासन पर बिठाते हैं वो घना अंधकार साबित होता है। जो रौशनी लाने की बात करता है वही अंधेरे को बढ़ाता जाता है और जितने भी चोर लुटेरे जिस भी जगह होते हैं उनको साथी बनाकर देश के खज़ाने की लूट में शामिल कर लेता है। देशभक्ति ईमानदारी का तमगा लगाकर राजनेता खुद अपने लिए सुख साधन हासिल कर शान से रहते हैं और जनता को अधिकार नहीं खैरात बांटने का आडंबर करते हुए और भी बेबस कर देते हैं क्योंकि उनका शासन कायम तभी रह सकता है।

                                     ( अभी बात अधूरी है )
     
     

Sunday, 13 October 2019

झूठा है तेरा वादा ( नेताओं-आशिक़ों के वादे ) डॉ लोक सेतिया

   झूठा है तेरा वादा ( नेताओं-आशिक़ों के वादे ) डॉ लोक सेतिया 

जाने किस कवि शायर की रचना है जो पंजाबी में रचना है मैंने उसका वीडियो देखा और शेयर किया था। आज संक्षेप में बता देता हूं। कवि कहता है , रावी नदी से तीन नहरें निकलीं जिन से दो सूखी और तीसरी में कभी पानी नहीं आया सतलुज यमुना नहर की तरह। जो कभी भी नहीं बहती उस में तीन लोग नहाने को गए उन से दो डूब गए और तीसरा खो गया मिला ही नहीं। जो मिला ही नहीं उसको नहर से तीन गाय मिलीं जिनसे दो फंडड़ अर्थात जो बच्चा नहीं दे सके और तीसरी जिसका गर्भ नहीं बच्चे देने को। जिसका गर्भ नहीं उसने जन्म दिया तीन बछड़ों को जिन में दो लंगड़े और तीसरा उठ भी नहीं सकता। जो उठ भी नहीं सकता उसकी कीमत तीन रूपये दो खोटे और एक चलता ही नहीं। जो रुपया चलता नहीं उसको देखने को तीन सुनयारे आये जिन में दो अंधे और एक को कुछ भी दिखाई नहीं देता। जिसको कुछ भी दिखाई नहीं देता उसे तीन घूंसे मारे गए दो निशाना चूक गए और तीसरा लगा ही नहीं। बस चुनावी वादे ऐसे ही हुआ करते हैं जिनसे हासिल कुछ भी नहीं होता है। 

      अब आज की बात एक दल ने सौ वादे किये दूसरे ने दोगुणा वादे गिनवा दिए। पहले भी उन दोनों ने हज़ार वादे किये थे भूल गए उनकी बात अब नहीं करते। गरीबी भूख अन्याय और जाने क्या क्या स्वर्ग धरती पे ले आने की बातें की थीं। मछली को जाल में फंसाने को कांटे में कुछ देते हैं कोई मछली से प्यार नहीं करता है। आशिक़ चांद तारे तोड़ कर आंचल में भरने की बात कहता है शादी के बाद पता चलता है वादा तेरा वादा। औरत या वोटर हमेशा धोखा खाते हैं सपने कभी सच नहीं होते हैं। आज तक कभी किसी नेता ने सत्ता पाकर खुद सब कुछ नहीं हासिल करने की बात नहीं कर दिखाई और पति बनते ही पत्नी को कभी खुश करने को तुम से अच्छा कौन है नहीं समझा है। नेता और पति बेवफ़ा होते ही हैं आप इन पर भरोसा करते हैं तो धोखा खाते हैं। इस विषय को समझना है तो इक पुराना व्यंग्य नेता पति है पत्नी है जनता पढ़ सकते हैं। 

     वादों का इतिहास यही है वो वादा ही नहीं जो निभा दिया गया हो। जो मिल गया मुक्क्दर था वरना कोई आपको खोटी कोड़ी भी नहीं देना चाहता। गज़ब किया तेरे वादे पे ऐतबार किया तमाम रात कयामत का इंतज़ार किया। कसमें वादे प्यार वफ़ा सब बातें हैं बातों का क्या। कितने गीत कितनी कहानियां कितनी कविताएं ग़ज़ल मुहब्बत की बेवफ़ाई की बात समझाती हैं लोग फिर भी नासमझ बन सोचते हैं अपने को जो मिला वफ़ादार है। खूबसूरत है वफ़ादार नहीं हो सकता लोग समझाते हैं सुंदर सुनहरे ख्वाब सच नहीं होते कभी। हम लोग आदी हैं सपने देख कर यकीन करते हैं किसी दिन सच होगा भगवान छप्पर फाड़ कर देगा मगर कभी किसी गरीब के घर पैसों की बारिश नहीं हुई नेताओं अफ्सरों के घर दफ्तर धनलक्ष्मी बरसात करती है। आप तो शरद पूर्णिमा को खीर बनाकर भोग लगाते रहते हैं दीपावली पर लक्ष्मी अब भी किसी दल के घर जाकर रहेगी। पांच साल में उनका कायापल्ट हो जाता है। वादा नहीं था जो हो जाता है वादे बस वादे रहते हैं उनकी कहानी बदलती नहीं कभी भी।

Tuesday, 8 October 2019

घर की दास्तान ( हक़ीक़त ) डॉ लोक सेतिया

          घर की दास्तान ( हक़ीक़त ) डॉ लोक सेतिया 

   हुआ करते थे घर गलियां चौबारे और लोग रहते ही नहीं थे जीते भी थे। अधिक पुरानी बात नहीं है आज भी ढूंढने से कहीं उनके बाकी निशान मिल जाते हैं। ये भी उन्हीं से एक घर की कहानी है जो थोड़ी थोड़ी ज़हन में याद है भूली हुई याद जैसे किसी दिन किसी बहाने आती है याद तो लगता है काश फिर से वही ज़माना वही लोग घर मिल सकते। घर था उसमें खिड़की रौशनदान दरवाज़ा हुआ करता था भौर होते ही सूरज की पहली किरण से घर उजला और खुली हवा के झौंके से ताज़गी भरता लगता था। तब कोई पर्दा नहीं लगाया जाता था बाहर से छिपाने को रौशनी भली लगती थी ठंडी मीठी भी अब नकली चकाचौंध बिजली की आंखों को चुभती लगती है। किवाड़ की सांकल बजाने की ज़रूरत कम हुआ करती थी दिन भर गली गांव के अपने बिना कोई ज़रूरत भी चले आते थे , घर पर हो क्या आवाज़ देते तो घर से जवाब आता भीतर चले आओ अपना ही घर है। घर की चौखट लांघते ही आंगन हुआ करता था कोई पेड़ छांव देने को कोई चारपाई बिछी रहती थी। दिन भर छहल पहल रहती थी दोपहर को मिल बैठती थी सखी सहेलियां बड़ी बूढ़ी दादी नानी हंसी ठिठोली और हाल चाल सुख दुःख का सांझा करती हुई। किसकी बिटिया की शादी है कौन बेटी ससुराल से आई है किस की बहु की ख़ुशी की खबर आने वाली है। घर लगता था महका हुआ बाग़ जैसा है खुशबू और चिड़ियों की चहकती हुई आवाज़ें सुनाई देती थी। हर मौसम सुहाना लगता था गर्मी की लू से बारिश की बौछार से सर्दी की ठंडक भी और धूप की तपिश साथ मिलकर गर्माहट को और बढ़ा देती थी।

         ये भी घर हैं जैसे ख़ामोशी छाई रहती है आवाज़ सुनाई नहीं देती इंसान की और बंद खिड़की दरवाज़ा कोई आकर आहट करता है तो ख़ुशी नहीं चिंता होती है बेवक़्त कौन आया है बिना बताये कोई नहीं आता। झांकते हैं कोई अजनबी तो नहीं और सामने के घर में रहने वाला भी पराया अनजान लगता है। बिना मतलब मिलना तो क्या बात करने की फुर्सत नहीं किसी को। आपके पड़ोस में कौन है नहीं नाम भी मालूम उसके दुःख सुख से सरोकार की बात ही क्या की जाये। खुद को अपने घर में बंद कर जैसे कैद में रहते हैं और सभी अकेलेपन के शिकार हैं। जुर्म क्या है किस बात की सज़ा खुद ही झेलते हैं भरोसा किसी को किसी पर नहीं रहा ये कैसा समाज बन गया है। मगर कहने को शहर क्या दुनिया भर से जान पहचान है दिखावे की जब भी कोई अवसर तीज त्यौहार शुभ दिन आता है मिलते हैं फ़ासला भी रखते हैं गले मिलते हैं हाथ मिलाते हैं दिल नहीं मिलते दिल की बात कोई नहीं जानता समझता। घर अब घर नहीं रहे खाली शीशे पत्थर से बनी इमारत में मकान हो गए हैं। ये महानगर की सभ्यता गांव शहर तक पहुंच गई है कभी बड़े शहर जाकर लोग खो जाते थे अब इन मकानों के जंगल में घर खो गए हैं। मुझे चाहिए इक घर चाहे छोटा ही हो अब नहीं चाहत इक बंगला बने न्यारा।
       

लोकनायक जयप्रकाश नारायण ( वास्तविक नायक ) डॉ लोक सेतिया

लोकनायक जयप्रकाश नारायण ( वास्तविक नायक ) डॉ लोक सेतिया


       लेखक ललित गर्ग जी ने कल लिखा है। आजादी के आंदोलन से हमें ऐसे बहुत से नेता मिले जिनके प्रयासों के कारण ही यह देश आज तक टिका हुआ है और उसकी समस्त उपलब्धियां उन्हीं नेताओं की दूरदृष्टि और त्याग का नतीजा है। ऐसे ही नेताओं में जीवनभर संघर्ष करने वाले और इसी संघर्ष की आग में तपकर कुंदन की तरह दमकते हुए समाज के सामने आदर्श बन जाने वाले प्रेरणास्रोत थे लोकनायक जयप्रकाश नारायण, जो अपने त्यागमय जीवन के कारण मृत्यु से पहले ही प्रातः स्मरणीय बन गए थे। अपने जीवन में संतों जैसा प्रभामंडल केवल दो नेताओं ने प्राप्त किया। एक महात्मा गांधी थे तो दूसरे जयप्रकाश नारायण। इसलिए जब सक्रिय राजनीति से दूर रहने के बाद वे 1974 में ‘सिंहासन खाली करो जनता आती है’ के नारे के साथ वे मैदान में उतरे तो सारा देश उनके पीछे चल पड़ा, जैसे किसी संत महात्मा के पीछे चल रहा हो।


     11 अक्टूबर, 1902 को जन्मे जयप्रकाश नारायण भारतीय स्वतंत्रता सेनानी और राजनेता थे। वे समाज-सेवक थे, जिन्हें ‘लोकनायक’ के नाम से भी जाना जाता है। 1999 में उन्हें मरणोपरांत ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त उन्हें समाजसेवा के लिए 1965 में मैगससे पुरस्कार प्रदान किया गया था। पटना के हवाई अड्डे का नाम उनके नाम पर रखा गया है। दिल्ली सरकार का सबसे बड़ा अस्पताल ‘लोकनायक जयप्रकाश अस्पताल’ भी उनके नाम पर है।

       लोकनायक जयप्रकाशजी की समस्त जीवन यात्रा संघर्ष तथा साधना से भरपूर रही। उसमें अनेक पड़ाव आए, उन्होंने भारतीय राजनीति को ही नहीं बल्कि आम जनजीवन को एक नई दिशा दी, नए मानक गढ़े। जैसे - भौतिकवाद से अध्यात्म, राजनीति से सामाजिक कार्य तथा जबरन सामाजिक सुधार से व्यक्तिगत दिमागों में परिवर्तन। वे विदेशी सत्ता से देशी सत्ता, देशी सत्ता से व्यवस्था, व्यवस्था से व्यक्ति में परिवर्तन और व्यक्ति में परिवर्तन से नैतिकता के पक्षधर थे। वे समूचे भारत में ग्राम स्वराज्य का सपना देखते थे और उसे आकार देने के लिए अथक प्रयत्न भी किए। उनका संपूर्ण जीवन भारतीय समाज की समस्याओं के समाधानों के लिए प्रकट हुआ, एक अवतार की तरह, एक मसीहा की तरह। वे भारतीय राजनीति में सत्ता की कीचड़ में केवल सेवा के कमल कहलाने में विश्वास रखते थे। उन्होंने भारतीय समाज के लिए बहुत कुछ किया लेकिन सार्वजनिक जीवन में जिन मूल्यों की स्थापना वे करना चाहते थे, वे मूल्य बहुत हद तक देश की राजनीतिक पार्टियों को स्वीकार्य नहीं थे। क्योंकि ये मूल्य राजनीति के तत्कालीन ढांचे को चुनौती देने के साथ-साथ स्वार्थ एवं पदलोलुपता की स्थितियों को समाप्त करने के पक्षधर थे, राष्ट्रीयता की भावना एवं नैतिकता की स्थापना उनका लक्ष्य था, राजनीति को वे सेवा का माध्यम बनाना चाहते थे।

       लोकनायक जयप्रकाशजी की जीवन की विशेषताएं और उनके व्यक्तित्व के आदर्श कुछ विलक्षण और अद्भुत हैं जिनके कारण से वे भारतीय राजनीति के नायकों में अलग स्थान रखते हैं। उनका सबसे बड़ा आदर्श था जिसने भारतीय जनजीवन को गहराई से प्रेरित किया, वह था कि उनमें सत्ता की लिप्सा नहीं थी, मोह नहीं था, वे खुद को सत्ता से दूर रखकर देशहित में सहमति की तलाश करते रहे और यही एक देशभक्त की त्रासदी भी रही थी। वे कुशल राजनीतिज्ञ भले ही न हो किन्तु राजनीति की उन्नत दिशाओं के पक्षधर थे, प्रेरणास्रोत थे। वे देश की राजनीति की भावी दिशाओं को बड़ी गहराई से महसूस करते थे। यही कारण है कि राजनीति में शुचिता एवं पवित्रता की निरंतर वकालत करते रहे।

              महात्मा गांधी जयप्रकाश की साहस और देशभक्ति के प्रशंसक थे। उनका हजारीबाग जेल से भागना काफी चर्चित रहा और इसके कारण से वे असंख्य युवकों के सम्राट बन चुके थे। वे अत्यंत भावुक थे लेकिन महान क्रांतिकारी भी थे। वे संयम, अनुशासन और मर्यादा के पक्षधर थे। इसलिए कभी भी मर्यादा की सीमा का उल्लंघन नहीं किया। विषम परिस्थितियों में भी उन्होंने अपना अध्ययन नहीं छोड़ा और आर्थिक तंगी ने भी उनका मनोबल नहीं तोड़ा। यह उनके किसी भी कार्य की प्रतिबद्धता को ही निरूपित करता था, उनके दृढ़ विश्वास को परिलक्षित करता है।

             मैंने जेपी को नहीं देखा लेकिन उनकी प्रेरणाएं मेरे पारिवारिक परिवेश की आधारभित्ति रही है। मेरी माताजी स्व. सत्यभामा गर्ग उनकी अनन्य सेविका थी। राजस्थान में होने वाले जेपी के कार्यक्रमों को वे संचालित किया करती थी, उनके व्यक्तिगत व्यवस्था में जुड़े होने के कारण उनके आदर्श एवं प्रेरणाएं हमारे परिवार का हिस्सा थे। मेरे आध्यात्मिक गुरु आचार्य श्री तुलसी के जीवन से जुड़ेे एक बड़े विरोधपूर्ण वातावरण के समाधान में भी जयप्रकाश का अमूल्य योगदान है। उनकी चर्चित पुस्तक अग्निपरीक्षा को लेकर जब देश भर में दंगें भड़के, तो जेपी के आह्वान से ही शांत हुए। जेपी के कहने पर आचार्य तुलसी ने अपनी यह पुस्तक भी वापस ले ली।

          जयप्रकाश नारायण को 1970 में इंदिरा गांधी के विरुद्ध विपक्ष का नेतृत्व करने के लिए जाना जाता है। इंदि‍रा गांधी को पदच्युत करने के लिए उन्होंने ‘सम्पूर्ण क्रांति’ नामक आंदोलन चलाया। लोकनायक ने कहा कि संपूर्ण क्रांति में सात क्रांतियां शामिल हैं- राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, शैक्षणिक व आध्यात्मिक क्रांति। इन सातों क्रांतियों को मिलाकर सम्पूर्ण क्रांति होती है। संपूर्ण क्रांति की तपिश इतनी भयानक थी कि केन्द्र में कांग्रेस को सत्ता से हाथ धोना पड़ गया था। जयप्रकाश नारायण की हुंकार पर नौजवानों का जत्था सड़कों पर निकल पड़ता था। बिहार से उठी संपूर्ण क्रांति की चिंगारी देश के कोने-कोने में आग बनकर भड़क उठी थी। जेपी के नाम से मशहूर जयप्रकाश नारायण घर-घर में क्रांति का पर्याय बन चुके थे। लालमुनि चैबे, लालू प्रसाद, नीतीश कुमार, रामविलास पासवान या फिर सुशील मोदी, आज के सारे नेता उसी छात्र युवा संघर्ष वाहिनी का हिस्सा थे।

         देश में आजादी की लड़ाई से लेकर वर्ष 1977 तक तमाम आंदोलनों की मशाल थामने वाले जेपी यानी जयप्रकाश नारायण का नाम देश के ऐसे शख्स के रूप में उभरता है जिन्होंने अपने विचारों, दर्शन तथा व्यक्तित्व से देश की दिशा तय की थी। उनका नाम लेते ही एक साथ उनके बारे में लोगों के मन में कई छवियां उभरती हैं। लोकनायक के शब्द को असलियत में चरितार्थ करने वाले जयप्रकाश नारायण अत्यंत समर्पित जननायक और मानवतावादी चिंतक तो थे ही इसके साथ-साथ उनकी छवि अत्यंत शालीन और मर्यादित सार्वजनिक जीवन जीने वाले व्यक्ति की भी है। उनका समाजवाद का नारा आज भी हर तरफ गूंज रहा है। भले ही उनके नारे पर राजनीति करने वाले उनके सिद्धान्तों को भूल रहे हों, क्योंकि उन्होंने सम्पूर्ण क्रांति का नारा एवं आन्दोलन जिन उद्देश्यों एवं बुराइयों को समाप्त करने के लिये किया था, वे सारी बुराइयां इन राजनीतिक दलों एवं उनके नेताओं में व्याप्त है। संपूर्ण क्रान्ति के आह्वान में उन्होंने कहा था कि ‘भ्रष्टाचार मिटाना, बेरोजगारी दूर करना, शिक्षा में क्रांति लाना, आदि ऐसी चीजें हैं जो आज की व्यवस्था से पूरी नहीं हो सकतीं क्योंकि वे इस व्यवस्था की ही उपज हैं। वे तभी पूरी हो सकती हैं जब संपूर्ण व्यवस्था बदल दी जाए और सम्पूर्ण व्यवस्था के परिवर्तन के लिए क्रान्ति, ’सम्पूर्ण क्रान्ति’ आवश्यक है।’ इसलिए आज एक नयी सम्पूर्ण क्रांति की जरूरत है। यह क्रांति व्यक्ति सुधार से प्रारंभ होकर व्यवस्था सुधार पर केन्द्रित हो। कुर्सी पर कोई भी बैठे, लेकिन मूल्य प्रतिष्ठापित होने जरूरी है। ऐसा करके ही हम एक महान लोकनायक को सच्ची श्रद्धांजलि दे पाएंगे। 

                         ( हिंदी न्यूज़ वेद दुनिया से आभार सहित )

 

          मैं खुद को बेहद खुशनसीब समझता हूं कि मैंने ऐसे महान नायक को देखा सुना और इसिहास के उस पल का  गवाह बना जिस दिन दिल्ली के रामलीला मैदान में जेपी जी ने जनसमूह को संबोधित किया था और जिस के आधार बनाया गया था इंदिरा गांधी द्वारा आपात्काल घोषित करने को। मैंने 11 ऑक्टूबर 2013 को छह साल पहले जो लेख लिखा था आज फिर से दोहराना चाहता हूं।

     जन नायक श्री जय प्रकाश नारायण जी और आपात्काल                                       ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

        11 अक्टूबर जब भी आता है मुझे हैरानी होती है सभी टीवी चैनेल अमिताभ बच्चन जी का जन्म दिन मना रहे होते हैं उनको नायक नहीं महानायक सदी का घोषित किया जाता है। कल इक महान लेखक की बात पढ़ी थी , उनका कहना था नायक वो होते हैं जिनको सही राह मालूम होती है , वो खुद सही मार्ग पर चलते हैं और लोगों को भी साथ रखते हैं। जे पी जैसे वास्तविक नायक हमें याद नहीं रहते और फ़िल्मी अभिनेता को हम नायक बता उसका गुणगान करते हैं। इस से समझ सकते हैं कि हम मानसिक तौर पर कितने खोखले हो गए हैं। शायद हमें आज़ादी से पहले का तो क्या आज़ादी के बाद तक का इतिहास याद नहीं है। भूल गये हैं कि किसी भी नेता का इस कदर महिमामंडन नहीं किया जाना चाहिये कि वो खुद को संविधान से ऊपर समझने लगे। आज भी हम वही गुलामी की मानसिकता के शिकार हैं और किसी न किसी को खुदा बनाकर उसकी परस्तिश करने में लाज अनुभव नहीं करते। ऐसे कितने खुदा लोगों ने तराश लिये हैं जो उनकी इसी बात का उपयोग पैसा कमाने और अमीर बनने को कर रहे हैं। उनका धन दौलत का मोह बढ़ता ही जाता है , शास्त्र बताते हैं जिस के पास सभी कुछ हो फिर भी और पाने की हवस हो वही सब से दरिद्र होता है। लेकिन हम जे पी जैसे जननायक को भूल जाते हैं जिसने कभी किसी पद किसी ओहदे को नहीं स्वीकार किया और हमेशा जनता की बात की। और जिस ने देश समाज को कुछ नहीं दिया जो भी किया खुद अपने लिए ही किया उसको हम भगवान तक बताने में संकोच नहीं करते। विशेष कर मीडिया को तो समझना चाहिए लोकतंत्र में चाटुकारिता कितनी खतरनाक होती है।
                                    
             पच्चीस  जून 1 9 7 5 को जयप्रकाश नारायण जी के भाषण को आधार बना आपात्काल की घोषणा की गई थी। मैं उस दिन उनका भाषण सुनने वालों में शामिल था। आज वो लोग सत्ता पर आसीन हैं जो कभी आपात्काल में भूमिगत थे , आज देखते हैं वही खुद तानाशाही ढंग से आचरण करते हैं और मीडिया तब भी उनकी महिमा का गुणगान करता नज़र आता है। कोई उनको याद दिलाये कभी आपको किसी सत्ताधारी की तानाशाही लोकतंत्र विरोधी लगती थी , आज खुद दोहराते हैं वही सब। मुझे तो आज तक ये समझ नहीं आ सका कि इस अभिनेता ने देश व समाज को क्या दिया है। मगर हमारी मानसिकता बन गई है सफलता को , पैसे कमाने को महान समझने की। कोई के बी से से जीत लाये धन तो शहर वाले उसको सम्मानित करने लगते हैं। ये नहीं सोचते कि ऐसा करना कितना उचित या अनुचित है। सब जानते हैं कि ये धन जनता से आता है एस एम एस से और विज्ञापनों से। न चैनेल घर से देता है न ही अमिताभ जी , बल्कि दोनों की कमाई होती है ऐसा करके।

    जे पी जी जैसे लोग कभी कभी मिलते हैं। आज आप अन्ना हजारे जी को जानते हैं भ्रष्टाचार का विरोध करने के लिये चलाये आन्दोलन के कारण। 1975  में जो आन्दोलन देश भर में जे पी जी ने चलाया था वो अपने आप में एक मिसाल है। इंदिरा गाँधी जिनको बहुत ही साहस वाली महिला माना जाता है डर गई थी उनके आन्दोलन से और आपातकाल की घोषणा कर दी थी। 19  महीने तक देश का लोकतंत्र कैद था एक व्यक्ति की कुर्सी की चाहत के कारण। कांग्रेस लाख चाहे ये काला दाग मिट नहीं सकता उसके दामन पर लगा हुआ। ये अलग बात है कि  उस आन्दोलन में ऐसे भी लोग शामिल हो गये थे जिनको आगे जा कर खुद सत्ता प्राप्त कर वही सब ही करना था। लालू यादव और मुलायम सिंह जैसे लोग होते हैं जिनको अपने स्वार्थ सिद्ध करने होते हैं। वे तब भ्रष्टाचार और परिवारवाद का विरोध कर रहे थे लेकिन आज खुद वही करने लगे हैं।
    मगर जे पी जी का सम्पूर्ण क्रांति का ध्येय तब भी सही था और आज भी उसकी ही ज़रूरत है। शायद आज और अधिक ज़रूरत है क्योंकि तब केवल बिहार और दिल्ली की सरकार की बात थी जब कि आज हर शाख पे उल्लू बैठा है। मगर आज के नवयुवकों को ये बताना बेहद ज़रूरी है कि नायक वो होते हैं जो पद को कुर्सी को ठोकर मरते हैं उसूलों की खातिर। देश के सर्वोच्च पद के लिए इनकार कर दिया था जयप्रकाश नरायण जी ने।

         आज है कोई जो सत्ता को नहीं जनहित को महत्व दे। आज उनको याद किया जाना चाहिए , उनसे सबक सीख सकते हैं आम आदमी पार्टी के लोग कि वही सब फिर न दोहराया जा सके। भ्रष्टाचार के विरोध की बात कर सत्ता पा कर खुद और ज्यादा भ्रष्टाचार करने लगें। इधर लोग दो लोगों को भगवान कहने का काम करते हैं अक्सर। लेकिन उन दोनों तथाकथित भगवानों की  दौलत की चाहत थमने का ना म ही नहीं ले रही। क्या भगवान ऐसे होते हैं , भगवान देते हैं सब को , अपने लिए कुछ नहीं चाहिए उसको। मुझे किसी शायर के शेर याद आ रहे हैं।

इस कदर कोई बड़ा हो हमें मंज़ूर नहीं
कोई बन्दों में खुदा हो हमें मंज़ूर नहीं।

रौशनी छीन के घर घर से चिरागों की अगर
चाँद बस्ती में उगा हो हमें मंज़ूर नहीं।

मुस्कुराते हुए कलियों को मसलते जाना
आपकी एक अदा हो हमें मंज़ूर नहीं। 
                               

        अब आज की बात , आज हालात आपात्काल जैसे हैं शायद उस से भी खराब हैं मगर खेद की बात है आज के शासक उनका नाम भी नहीं लेना चाहते जबकि उनको पता है उन में से बहुत नेता आज राजनीति में हैं तो उन्हीं के साये में बढ़े कभी आंदोलन में थे। क्योंकि ये सब उन के आदर्शों की बात करने का साहस नहीं कर सकते उनका अनुसरण करना तो दूर की बात है। इनकी सुविधा पटेल के बूत बनाने की है जिन से वास्तव में इनका कोई मतलब कभी नहीं रहा है जैसे भगवान राम के आदर्श इन लोगों को नहीं मालूम मगर उनके नाम की राजनीति इनको सत्ता की सीढ़ी लगती है। राम को सत्ता का मोह नहीं था और हमेशा वंचित पीड़ित लोगों का साथ चुना था जबकि तथाकथित रामभक्त कोई आदर्श नहीं मानते और सत्ता का त्याग करने की मार्ग उनके बस की बात नहीं है जैसे ही इनसे सत्ता छुट्टी है ये बदलते देर नहीं लगाते हैं। ये बेहद खेद की बात है कि लोग ऐसे वास्तविक आदर्श पुरुषों के बारे कम जानते हैं जिनसे बहुत कुछ सीखा जा सकता है। जो लोग ईमानदारी की बात करते हैं उनको कभी सत्येंद्र दुबे जैसे अधिकारी याद नहीं आते जिनकी हत्या तीस साल की आयु में 27 नवंबर 2003 को उन्हीं लोगों ने कर दी जिनकी शिकायत नेशनल हाईवे के अधिकारी रहते उन्होंने पीएमओ को की थी भरषटाचार को लेकर। आज भी ये खनन माफिया और अवैध कब्ज़े करने वाले लोगों को दल में शामिल कर उम्मीदवार बनाते हैं और ईमानदार सरकार का खुद ही तमगा लगाए फिरते हैं।

     11 ऑक्टूबर दो दिन बाद जेपी का जन्म दिन है मगर शायद ही कोई सत्ताधारी उनकी बात करेगा। टीवी चैनल भी उस दिन वास्तविक जननायक की नहीं फ़िल्मी तथाकथित महानायक की बात करेंगे बिना विचारे कि उसने देश समाज को क्या दिया है। शायद मतलबी राजनेता नहीं चाहते हम लोग वास्तविक आदर्श के पालन की बात को समझें भी , उनको केवल आडंबर करना है ऐसे लोगों के अनुयाई होने की बात कह कर अपने मकसद सिद्ध करने को। जेपी उनके काम के नहीं रहे अब जब थी ज़रूरत तब साथ थे और उनके मकसद को छोड़ अपनी राजनीति करते समय नहीं लगा था शायद लोग जल्दी इतिहास को भूल जाते हैं। मगर जो बात सच है वो ये है कि कुछ लोगों की महत्वआकांक्षा ने जेपी के सपने को चूर नहीं किया होता तो देश आज किसे और ऊंचाई पर खड़ा होता जिस में वास्तविक सत्ता जनता के पास होती।



Sunday, 6 October 2019

दिल लगता नहीं नकली नज़ारों में ( हाल-ए-दिल ) डॉ लोक सेतिया

 दिल लगता नहीं नकली नज़ारों में ( हाल-ए-दिल ) डॉ लोक सेतिया

   आज लिखने से पहले जानता हूं किसी को फुर्सत ही नहीं इतनी जो किसी और की बात को पढ़े मेरी हो किसी की कोई नहीं पढ़ता बस इक नज़र देख कर लाइक कमेंट औपचारिकता सी है पढ़ भी लिया तो समझना ज़रूरी नहीं और कोई समझ कर भी मुझे क्या सोच लेता है। फिर लिखने का मकसद बस दिल की तसल्ली या फिर खाली समय बिताना खुद से खुद की बात कहना। मगर ऐसा क्यों है भरी दुनिया में आस पास ही नहीं अब सोशल मीडिया ने विश्व को मुट्ठी में भरने की बात कर दी है फिर भी शायद मेरी तरह कितने और लोग भीड़ में अकेले घबराते हैं अजनबी सी लगती है मुझे ये दुनिया। कोई भी एक दोस्त तक नहीं जिसको अपना कह भी सकते हों और अपनापन का एहसास भी होता हो। जान पहचान हर किसी से है बाहरी दिखावे की भीतर से हम खालीपन लिए भटकते हैं। ये मेरी दुनिया नहीं है मुझे नहीं चाहिए ये झूठ फरेब और नकली नज़रों की दुनिया , आज याद आ रही है छोटी सी इक प्यारी सी दुनिया हुआ करती थी कभी मेरे सपनों की और शायद यहीं कहीं हुआ करता था उसके होने का एहसास भी दिल को अक्सर। मिल जाते थे ये कभी मिले थे कुछ लोग जो जैसे भी थे बहुत अच्छे थे मगर खो गए वक़्त की आंधी उन्हें जाने कहां उड़ा ले गई। अब जो दुनिया है मुझे अजीब लगती है अपने देखा है कभी इसको कैसी बन गई है आपकी दुनिया। 

      लगते हैं अमीर लोग मगर वास्तव में भिखारी हैं मांगते हैं दिल भरता नहीं चाहे जितना भी पास हो। क्या लोग होते थे थोड़ा भी पास होता था तो उसी में खुश रहते थे इतना ही नहीं चाहते थे कुछ बांट देना औरों को भी जिनके पास नहीं होता था कुछ भी। अब सभी पागल हैं अधिक हासिल करने को किसी भी सीमा तक जाने को राज़ी हैं। ख़ास होने के बाद दौलत शोहरत ताकत की हवस बढ़ती जाती है और बाहर से ऊंचे लगने वाले खुद अपने भीतर से डरे सहमे लगते हैं खो जाने का डर उनको और पाने को उकसाता है। अमीरी से दिल नहीं भरता बल्कि गरीबी का एहसास बढ़ता जाता है करोड़ों भी कम लगते हैं। और दौलत ताकत शोहरत हासिल करने को अपने आप को खो देते हैं। जिसे भी देखते हैं राजनीति की तरफ आकर्षित है ताकि ऐशो आराम और तमाम सत्ता के साधन पाकर देश के खज़ाने जनता के धन से खिलवाड़ कर सके। राजनीति का पतन इस हद तक गिर गया है कि राजनेताओं और शासन करने वाले अधिकारियों को कर्तव्य की बात क्या ईमानदारी की बात क्या मानवता तक नहीं याद रहती है। जिसे देखो देश सेवा जनता की भलाई की बात कह कर अपनी हवस मिटाना चाहता है। हम जिनको चुनते हैं जानते हैं उनका मकसद कोई देशभक्ति नहीं है जनकल्याण की भावना होती ही नहीं स्वार्थ ही उनका सब कुछ है। देख कर समझ कर भी खुद ही केवल अपने नहीं समाज और देश के हित की अनदेखी करते हैं और ऐसे गलत लोगों को सांसद विधायक बनाने का अपराध करते हैं देश के खिलाफ बिना विचारे। 

       मुझे नहीं भाती है ये दुनिया जो नज़र आती है खूबसूरत है चमकीली है मगर वास्तव में बड़ी डरावनी भयानक तस्वीर है इसकी जो अपने पीछे घना अंधकार समेटे हुए है। लोग शानदार लिबास और आलीशान घरों में रहते हैं मगर उनका मन और सोच घटिया और निचले स्तर की मतलबपरस्त होती है। रिश्ते नाते झूठे दिखावे के और केवल स्वार्थ को देखने वाले बन गए हैं। हमने जिनको नायक कहना शुरू कर दिया है उनका सच बेहद अजीब है उनका नैतिकता से कोई वास्ता नहीं है और वो देश समाज को कुछ भी देते नहीं हैं। आपने देखा होगा ख़ास वीवीआईपी लोगों को गांव की गरीबी की पुरानी यादों पर नम आंखे पौंछते हुए मगर क्या उनको अपने देश राज्य को तो क्या गांव से लगाव होता तो अपने पास दौलत का अंबार होते अपने उन बचपन के साथी लोगों की बदहाली मिटाने को कुछ भी नहीं कर सकते थे। कैमरे पर झूठा प्यार अपनापन दिखावा ही नहीं ये भी शोहरत पाने का ढंग बन गया है। आपको कई लोगों के भलाई और गरीबों की सहायता को किसी एनजीओ या संस्था की पता होगी जो कुछ उसी तरह है जैसे कोई डाकू लूट का कुछ हिस्सा अपने अपराधबोध मिटाने को दान आदि पर खर्च करते थे। कोई नहीं पूछता उनके पास हज़ारों करोड़ कैसे आते हैं काश सोचो तो समझोगे कि ये पैसा छल कपट धोखा ही नहीं कभी तो आपको ज़हर बेच कर भी हासिल किया होता है। हैरानी हुई होगी तो समझ लो , उनको विज्ञापन से करोड़ों मिले आपको खराब सामान बेचने की लूट के मुनाफे से। उनको पता होता है जिस को खरीदने की सलाह देते हैं खुद कभी उपयोग नहीं करते हैं। 

 ऐसा ही सरकार का भी हाल है विज्ञापन पर जितना धन बर्बाद किया जाता है अपने स्वार्थ की खातिर और जनता को मूर्ख बनाने को उसी से कितना कुछ जनता का कल्याण किया जा सकता था। मगर जिनको खुद अपने रहन सहन विलासिता पूर्वक शान से रहने पर रोज़ लाखों करोड़ों खर्च करना उचित लगता है उन से देश की बदहाली मिटाने की उम्मीद नहीं की जा सकती है। देशभक्ति या देशसेवा अपने लिए सब हासिल करना नहीं जो भी पास है देश समाज को देने को कहते हैं। खुद को महान कहना या समझना वास्तव में सबसे अधिक छोटेपन का सबूत है। अपने जिनको बनाया आपके दिए कर से कुछ भी कर दावा करते हैं हमने ये किया है ये कितनी बेशर्मी की बात है। कोई और लोग हुआ करते थे जिनको नैतिकता का पास था और जो समझते थे उनको अपने नहीं देश समाज की चिंता पहले करनी है सत्ता मकसद नहीं था साधन था देश की समाज को आगे बढ़ाने का। अब देश समाज को पीछे धकेल कर दावा किया जाता है बड़े काम किया है। शायद फिर से विचार करना होगा कि भूल किस से हुई है कैसे हमने झूठे स्वार्थी और आडंबर करने वाले लोगों को नायक महानायक घोषित करने का कार्य कर अपने पांव पर कुल्हाड़ी मारने की बात की है। आपको लगता होगा मुझे ये समाज जीने के लायक लगता नहीं है। ये मेरी कल्पना का समाज नहीं है जिस में सभी को जीने का अधिकार होता समानता की न्याय की बात होती , यहां तो सब अपने स्वार्थ में पागल हैं।

Friday, 4 October 2019

जम्हूरियत की हक़ीक़त ( चुनाव की बात ) डॉ लोक सेतिया

   जम्हूरियत की हक़ीक़त ( चुनाव की बात ) डॉ लोक सेतिया 

      असली कहानी कुछ और ही है। आपको अपनी पसंद से कोई विधायक सांसद नहीं चुनना है। सच तो ये है कि आपको बस इक दिन की बादशाही का आनंद उठाना है मगर आपकी पसंद नहीं होने होने का कोई अर्थ नहीं है। मान लो आधे से अधिक लोग नोटा पर उंगली दबा आएं तब भी जो खड़े हैं उन्हीं से जिसे अधिक मत मिले विजयी घोषित किया जाएगा जबकि मतलब होगा जनता किसी को नहीं चुनना चाहती है। शायर को भी इस बात का पता नहीं था जब उसने कहा था " जम्हूरियत वो तर्ज़े हुकूमत है कि जिस में , बंदों को गिना करते हैं तोला नहीं करते "। जाँनिसार अख़्तर कहते हैं " वो लोग ही हर दौर में महबूब रहे हैं , जो इश्क़ में तालिब नहीं मतलूब रहे हैं "। अर्थात मनोनित लोग ही शासक हैं आजकल और हम समझते हैं हम चुनते हैं। 

    हम अभी खेल का इंतज़ार कर रहे हैं जबकि खेल तो कभी का शुरू हो चुका है। सत्ता के खिलाड़ी बहुत पहले अपनी तैयारी करने लगते हैं बिसात बिछने से पहले ही अपनी गोटियां अपने पासे फैंकने की शुरुआत होने लगती है। बंदर बिल्लियों को बराबर बांटने को पलड़े पर तोलता है बिल्लियां बंदर की जय जयकार करती रहती हैं। कोई केंकड़ा उस पलड़े से इस पलड़े की तरफ आने को बेताब है जिधर पलड़ा झुका हुआ है। नेता दल बदलते हैं देख कर पलड़ा किस का झुका लगता है जनता खामोश है मगर जनता की राय क्या होगी ये कोई और लोग हैं जो समझने का दावा करते हैं। फिर जनता को समझाते हैं उनकी बताई राय को मानना ही जनता की भलाई है। चुनाव घोषित होने से पहले नेता अपनी सुविधा से किसी दल के बड़े नेता की करीबी हासिल करने लगते हैं ये सोचकर कि उसी की मर्ज़ी से दल की टिकट की दावेदारी पक्की हो जाएगी। मगर पता नहीं चलता कब किधर से कोई और आकर निर्णय करने का अधिकार पा जाता है। चुनाव घोषित होते होते सब का गणित बदल जाता है और फिर से हिसाब समझना पड़ता है। 

     पर्दे के सामने कुछ भी नहीं नज़र आता पीछे हलचल होती रहती है। सौदेबाज़ी से लेकर चापलूसी तक सब आज़माने के बाद साक्षात्कार का ढकोसला होता है। सवाल आसान जवाब कठिन होते हैं उलझाने की कोशिश की जाती है। धनबल बाहुबल ही नहीं जातीय समीकरण से लेकर जीतने को कुछ भी करने नियम कानून संविधान की परवाह नहीं करने की बात अनुभव और झूठ को सच कहने की कला जैसे गुण परखे जाते हैं। चंदा अलग बात है और टिकट की बोली गोपनीय अपनी जगह ऐसे कितने काम साथ साथ साधने होते हैं। आपको आदत है अच्छा खराब नहीं देखते चोर डाकू जैसा भी हो अपने किसी दल को मत देना है किसी धर्म या जातीयता की बात ध्यान रखनी है अपने पांव पर खुद कुल्हाड़ी मारनी है फिर चिल्लाना है हाय मर गए हम लोग। जब सभी उम्मीदवार सामने खड़े हो गए तब हम उनकी वास्तविकता को भूलकर इस बात की चर्चा करते हैं कि जीतना तो उसी को है जिसका शोर है तो हम उसी को वोट डालते हैं मतलब ये कि हम कितने बड़े नासमझ हैं जो चुनाव से पहले निर्णय कर लेते हैं कि हमारे वोट की कोई कीमत नहीं है और हम वोट नहीं भी डालते या किसी को देते तब भी जिसे जीतना है वो जीत जाएगा। जब हम खुद जम्हूरियत की ताकत को नहीं समझते और आज़माते तो फिर देश की हालत का दोष किसी और को देने से कुछ भी कैसे हो सकता है। 

        कभी सोचा है ये दलीय व्यवस्था क्या है शायद हमने विचार ही नहीं किया कि जब अपना विधायक या सांसद हमने चुनना है जो हमारे लिए काम करे हमारी बात कहे सुने तब किस को चुनाव लड़वाना ये कोई और कैसे निर्णय कर सकता है। संविधान किसी दलीय व्यवस्था की बात नहीं करता है और चुनाव आयोग का राजनैतिक दलों को महत्व देना नागरिक के समानता के बुनियादी अधिकार में हस्ताक्षेप है। ये कुछ लोगों का संगठित होकर अधिकांश लोगों को निरीह बेबस बनाकर सत्ता उन्हीं के हाथों में रखने का उपाय है। यकीन करिये इस व्यवस्था से आम जनता का शासन कभी नहीं स्थापित किया जा सकेगा। चोर चोर मौसेरे भाई की तरह उनका गठबंधन मनमानी कर सकता है और करता रहता है। कब कौन किधर होता है आप जो चुनकर भेजते हैं नहीं समझ सकते न जानते हैं और रोक भी नहीं सकते। क्या हमने चुनते समय खुद को उनके पास गिरवी रख दिया था , उनका आचरण यही दर्शाता है। वास्तव में देश की जनता को सही मायने में आज़ादी नहीं मिली है बस विदेशी शासक चले गए और अपने देश के कुछ मुट्ठी भर लोग सेवक का चोला पहन कर शासन करने लग गए हैं। अन्यथा हमारे निर्वाचित विधायक सांसद शाही अंदाज़ से कैसे रहते जब देश के असली मालिक आम नागरिक बदहाली और गरीबी में घुट घुट कर जीने को विवश हैं। नहीं ऐसी आज़ादी की कल्पना किसी भी देश की आज़ादी की जंग लड़ने वाले शहीद ने नहीं की थी , उनके नाम लेकर सत्ता और स्वार्थ के भूखे लोगों ने अपने लिए सब छीनने का काम किया है। कभी कभी तो लगता है ये आज़ादी इक छल है धोखा है और आज भी हम गुलामी भरा जीवन जीने को विवश हैं। केवल पांच साल बाद चुनाव में सत्ता बदलने से हासिल कुछ भी नहीं होता है। बल्कि अब तो हालत और भी खराब है क्योंकि अपनी ही चुनी हुई सरकार की गलती या मनमानी करने पर हम विरोध तो क्या आलोचना भी करते हैं तो भयभीत हो कर क्योंकि सत्ताधारी दल और शासन करने वाले सच कहने को देशहित विरोधी घोषित करने में संकोच नहीं करते हैं।

   देश की जनता से निर्वाचित होने से मिले अधिकारों का जनता के खिलाफ ही इस्तेमाल किया जाता है और समझाया जाता है कि जनादेश मिलने से उनकी हर बात उचित है जबकि वास्तव में सही जनादेश का अर्थ अगर देश की जनता का बहुमत समझा जाये तो अधिकांश सत्ता पचास फीसदी से कम वोट पाने वालों को मिलती रही है और दलीय व्यवस्था में विभाजित बहुमत सत्ता से बाहर रहता है। ये पहले भी हुआ करता था लेकिन इक सोच हुआ करती थी कि विपक्ष की अपनी अहमियत है मगर इधर कुछ वर्षों से सत्ता पर आसीन लोग विपक्ष को खत्म करने की बात खुले आम कहते हैं जिस का मतलब ही तानाशाही व्यवस्था की ओर जाना है। हम खामोश रहकर ये सब कब तक देख सकते हैं। अभी इतना ही और आखिर में मेरी इक ग़ज़ल।

  खामोश रहना जब हमारी एक आदत बन गई -लोक सेतिया "तनहा"

खामोश रहना जब हमारी एक आदत बन गई
हर सांस पर पहरे लगाना सब की चाहत बन गई।

इंसान की कीमत नहीं सिक्कों के इस बाज़ार में
सामान दुनिया का सभी की अब ज़रूरत बन गई।

बेनाम खत लिक्खे हुए कितने छुपा कर रख दिये
वो शख्स जाने कब मिले जिसकी अमानत बन गई।

मतलूब सब हाकिम बने तालिब नहीं कोई यहां
कैसे बताएं अब तुम्हें ऐसी सियासत बन गई।

( मतलूब=मनोनित। तालिब=निर्वाचित )

अनमोल रख कर नाम खुद बिकने चले बाज़ार में
देखो हमारे दौर की कैसी कहावत बन गई।

सब दर्द बन जाते ग़ज़ल , खुशियां बनीं कविता नई
मैंने कहानी जब लिखी पैग़ामे-उल्फ़त बन गई।

लिखता रहा बेबाक सच " तनहा " ज़माना कह रहा
ऐसे  किसी की ज़िंदगी कैसी इबादत बन गई।  

नेता की विशेषताएं ( अधर्म-कथाएं ) डॉ लोक सेतिया

      नेता की विशेषताएं ( अधर्म-कथाएं ) डॉ लोक सेतिया 

   लिखने वाले को सच की कलम ईमान की स्याही को फेंक देना होता है। झूठ के देवता की वंदना से नेता की हर कहानी को कथा कहना होता है। नेता की असलियत आसानी से सामने नहीं आती है जो होता नहीं दिखाई देने देता और जो कदापि नहीं वो नज़र आने को कुछ भी करता है। जनता को आप अबला नारी समझ सकते हैं और नेता उस शख़्स को समझना होगा जो उस पर बुरी नज़र रखता है उस बेचारी अबला नारी को भरोसा दिलाता रहता है कि मुझे तुझसे प्यार है और बिना किसी स्वार्थ के है। मुझे चिंता है कोई तुम्हारी अस्मत को नहीं लूट जाये मुझे रत्ती भर भी इच्छा नहीं है तुम्हें खराब नियत से छूने की। मगर दिल में हसरत छुपी रहती है कब मौका मिलते ही जनता का सब कुछ लूट सकता है। नेता महिला भी बन सकती है मगर यही बात उस में थोड़ा बदले ढंग से रहती है। साफ सच्ची बात नेता होने को मक्कार झूठा आवारा और हद दर्जे का स्वर्थी जो मतलब को पांव पकड़ सकता है तलवे चाट सकता है और अवसर मिलते ही गले लगाकर पीठ में छुरा घौंप सकता है और किसी का कत्ल करते हुए उसको कोई अपराधबोध नहीं होता है। सफ़ेद रंग के अंदर काला रंग छुपा रहता है इसलिए हर किसी को इस तरह के लोगों से सावधान रहना चाहिए। 

         चुनाव के समय किसी नेता को अपनी ईमानदारी सब से खूबसूरत दिखाई दी और बाकी जितने भी नेता चुनाव लड़ना चाहते थे दाग़ी और अपराधी हैं इसका प्रमाण देते रहे। नेता आरोप लगाते हैं अपने पर सवाल का जवाब देना तौहीन समझते हैं मेरे नाम के साथ जी नहीं लिखा आपकी खैर नहीं की बदले की भावना हर नेता में होती है। राजस्थान में लोग कुत्ते को कुत्तो जी कहकर बुलाते हैं आदर देना उनसे सीख सकते हैं। नेता जी से उनकी पत्नी सवाल कर सकती है ये हर महिला का विशेषाधिकार हुआ करता है। नशे में नेता जी किसी का नाम ले रहे थे मेरी जान हो तुम बिन नहीं जी सकता , नशा उतारना आता है हर पत्नी को। नशा उतरने के बाद पूछा बताओ किस कलमुंहीं की बात है बेशर्मी से हंस दिए जानेमन सत्ता की कुर्सी को प्यार से नाम दिया हुआ है मुझे गलत नहीं समझना आपको छोड़ किसी को देखना भी पाप है। पत्नी भोली नहीं होती मगर भोलापन का दिखावा करना जानती है और रंगे हाथ पकड़ कर फिर जो कहना है करना चाहती है पता चलता है। मगर भारतीय नारी देश की जनता की तरह सब सहती है रोने धोने के बाद झूठी कसम अपनी ही खाने पर चुप हो जाती है और नेता मन ही मन उसके मरने की बात पर चिंतन करता है नहीं मरने वाली कभी। मुझे मारकर खुद सती हो सकती है उपवास रखती है मगर जीने नहीं देती मरने भी नहीं देती है। 

    पत्नी ने सवाल किया ये क्या बकवास ब्यानबाज़ी की है ईमानदारी वाली बढ़ चढ़ कर बात कहने की कोई ज़रूरत नहीं थी। विधायक बनने से पहले जितना पैसा खर्च किया अपने इश्तिहार छपवाने पर उतना तो चुनाव आयोग इजाज़त भी नहीं देता बताओ चुनाव क्या खाक लड़ोगे बिना पैसे के। नेता जी बोले पगली तुम नहीं समझी समझने वाले समझ गए हैं दल की निष्ठा की ईमानदारी की बात है। बाकी सब दलबदलू लोग हैं उनके पिछले पाप धुले नहीं हैं सत्ता की चादर से ढके गए हैं छुपाने की नाकाम कोशिश है छुपे नहीं हैं किसी की नज़र से भी। ये जो पब्लिक है सब जानती है। मुझे भी पहचानती है झूठ सच सब जानती है मगर अंधी है देखती नहीं है आवाज़ के शोर से पहचानती है किस ने उसको बख्शा है। पत्नी को याद आया शादी से पहले का ज़माना नेता जी का जाल बिछाना और मछली का फंस जाना और फिर दोनों का समझना और पछताना। ये पहेली अनसुलझी रहने दो किस ने किस को मुहब्बत के जाल में फंसाया कोई नहीं ये राज़ जान पाया। 

    नेता जी ने फिर समझाया आपको सही अर्थ नहीं समझ आया। इक थानेदार ने ईमानदारी का मतलब यूं समझाया। आधा खाया आधा ऊपर पहुंचाया कभी भी हिस्सा नहीं चुराया , थाने की बोली को निभाया जितना बोया उतना फल खाया। उम्मीदवार बनने को टिकट की कीमत सबने बंद लिफाफे में लगाई है बस मैंने कीमत की जगह खाली छोड़ रस्म निभाई है जितनी मर्ज़ी लिख सकते हैं अपने  पिता की बात दोहराई है।  मुझे छोड़ने की मत पूछना किस किस ने कीमत पाई है बस तुम नहीं मानी मुसीबत घर लाई है। बात सुनते सुनते दोनों को नींद आई है। अधूरी कहानी समझ आपको पूरी नहीं आई है सुबह बाकी बताएंगे। मीनाकुमारी की बात याद आई है। ज़माना बड़े शौक से सुन रहा था हमीं सो गये दास्तां कहते कहते। नेता जी की नींद खुली तो नज़ारा बदल चुका है उनकी ईमानदारी किसी काम नहीं आई और जिस को सबसे बड़ा खराब कह रहे थे उसी को दल के बड़े नेताओं का वरदान मिला है। नेता जी अपने दिल के टूटने का खुद तमाशा देख रहे हैं और लोग उनके दिल के टुकड़ों को गिनते फिर रहे हैं।

        समझदार राजनेता वक़्त की नज़ाकत को समझते हैं विलाप नहीं करते मुराद पूरी नहीं होने पर। कोई और चौखट तलाश लेते हैं झट से और रंग बदलते हैं भगवा छोड़ हरा अपना लेते हैं। पांच साल पहले का रंग का बदलना भी उचित था फिर तीसरी बार बदलना भी अच्छा है। रंग बदलती दुनिया है नेताओं ने गिरगिट से सीखा है मौसम के साथ जिस डाली जिस पेड़ की शाख पर हो उसी जैसा हो जाना। ये विशेषता बड़े काम आती है।

         


ज़िंदगी न शिकवा न चाहत ही है ( खुद से बात ) डॉ लोक सेतिया

 ज़िंदगी न शिकवा न चाहत ही है ( खुद से बात ) डॉ लोक सेतिया

        चैन है सुकून है कोई आरज़ू नहीं फिर भी आज भी इक प्यास है अनबुझी सी काश कोई अपना दोस्त अपना हमदम हमराज़ हमख्याल मिल जाता। मुझे दौलत राजनीति और दुनियादारी की फ़िज़ूल बातों से खीझ सी होती है और कोई नहीं जो बाकी सब बातों को छोड़ कर अपनी मेरी ज़िंदगी की बात करे। घंटों साथ बैठ कर भी समय का गुज़रने का एहसास नहीं हो , हो कोई जो दिल के पास भी हो और दूर होने का कोई एहसास भी न हो। जो सब लोग चाहते हैं मुझे उस सब की ख्वाहिश कभी नहीं रही जो मुझे ज़रूरत है बस वही कहीं कभी नहीं दिखाई दिया। निराशा नहीं है कोई उम्मीद भी नहीं है शायद दिल भरा भी नहीं जीने से और जीने की कोई आस भी नहीं है बची हुई। मौत से कोई डर नहीं है ज़िंदगी से कोई घबराहट नहीं है मांगना नहीं कुछ भी ज़िंदगी से भी न ही मौत से भी। थक गया हूं चलते चलते थोड़ा आराम करना चाहता हूं फिर सफर पर आगे बढ़ने से पहले। चलते चलते उस जगह पहुंच गया हूं जहां रास्ता बंद है किसी बंद गली की तरह मगर उस गली में मेरा कोई घर तो नहीं है वापस मुड़ने का साहस बचा नहीं और आगे कोई राह दिखती नहीं है। कोहरा छाया है घना अंधेरा सा है मुमकिन है भौर होने पर नज़र आये कि बंद गली वास्तव में कोई फैला हुआ मैदान है और जिधर जाना हो जा सकते हैं। सफर पर कोई साथी नहीं है किस से बात करूं अपने आप से दिल से दिल की बात करने लगा हूं। 

        मैंने यही किया जाने क्यों मुझे और कुछ भी समझ नहीं आया। सब ऊपर जा रहे थे शोहरत दौलत की बुलंदी को छूने को और मैंने नीचे जाने को उचित समझा। विपरीत दिशा को जाते लोग हैरान होते होंगे शायद मुझे पहाड़ से उतरते देख निचली तरफ जाते देख कर जिस तरफ कुछ भी नज़र नहीं आता था। हर तरफ पहाड़ियों के बीच थोड़ी से जगह खड़े होने को धरती पत्थरीली सी मुझे शायद आकर्षित कर रही थी। वहां कोई बसेरा नहीं बन सकता था जैसे हर तरफ कोई दीवार खड़ी थी लिपटने को आंख बंद कर खड़े खड़े कुछ नींद लेने को। मगर बहुत ख़ामोशी और सुकून मिल रहा है फिर भी लगता है थकान मिट जाएगी आराम करने से मगर उसके बाद किधर जाना है क्या कोई राह मिलेगी किसी जगह कोई दरार और गहराई को जाने को। ऊंचाई से डरता हूं चढ़ाई से घबराहट होती है सांस फूलती लगती है। थोड़ी झपकी लगी तो लगा जैसे कोई था जो हाथ में हाथ थाम मुझे साथ चलने को कह रहा था अभी अभी तो था बस वही जिसकी तलाश थी। लगता है पल भर में फिर वापस आएगा यहीं उसी का इंतज़ार करना है।

      सोचता हूं कोई सफर हो जिस में इक साथी हाथ में हाथ थामे चल रहा हो तो कठिन डगर भी आसानी से कट जाये। शायद ये सपनों की बातें हैं दुनिया में वास्तव में कब कोई हमेशा साथ चलता है। सैर पर मुझे अकेले चलने की आदत है फिर भी कभी लगता है कोई दोस्त होता कुछ पल दिल की दुनिया की बात करते खो जाते बचपन की यादों में। मुझ में कुछ कमी है जो जीवन भर कोशिश की फिर भी इक दोस्त नहीं बना सका जो समझता मुझे और चाहता मेरा साथ। फिर कभी लगता है शायद अच्छा है मैं अकेला हूं वर्ना खुद से भी अलग हो जाता मुमकिन है। कितने दोस्त बनाये भी और अपने सभी रिश्ते भी मिले हैं मगर न जाने क्यों इक खालीपन या सूनापन बाकी है किस बात की कमी है जो दिल को हंसने खुश रहने को ज़रूरी होती है। मुझे नहीं गिला शिकवा किसी से हर किसी को मुझी से शिकायत है कोई न कोई। कैसे कोई सबको खुश रख सकता है सब जानते हैं ये बात मगर इतना तो हो कि ऐसा नहीं लगे कि हर किसी को परेशानी है मेरे कारण। अजीब सी कश-म-कश है ज़िंदगी की। उलझन नहीं कोई और उलझ गया हूं अपने ही ख्यालों में। इंतज़ार है किस बात का नहीं जानता मगर है इंतज़ार बस वही कुछ वक़्त खुलकर जीने की आरज़ू है।


Tuesday, 1 October 2019

विचार को बेजान पत्थर बना देना ( गांधी लाल बहादुर जेपी की बात ) डॉ लोक सेतिया

विचार को बेजान पत्थर बना देना ( गांधी लाल बहादुर जेपी की बात )

                                             डॉ लोक सेतिया

  गांधी कोई वस्तु नहीं अपने इक विचार को बेजान पत्थर बना दिया। अब उस पत्थर को बेशकीमती कह कर राजनीति के कारोबार के शोरूम में ऊंचे दाम बेचना चाहते हो। अपने कभी गांधी को पढ़ा है कभी नहीं सुना अपने गांधी की विचारधारा को समझने को कोई कार्य किया हो उनकी लिखी हुई किताबों को लोगों तक पहुंचाने को कोई पहल की हो। गांधी जी की तीन बातें बंदर वाली बुरा मत देखो बुरा मत सुनो बुरा मत कहो ये तो जानते हैं सभी मगर अपने बुराई देखने बुराई की बात कहने का काम हर दिन किया है। मुझे उनसे अलग नहीं किया जा सकता जिनको अपने खराब नहीं बेहद बुरा साबित करने में हर मर्यादा हर सीमा को पार कर दिया है। मुझे किसी ने एक बार क़त्ल किया था अपने मेरी आत्मा को बार बार घायल किया है। मैंने आखिरी व्यक्ति के आंसू पौंछने की बात कही मगर आपको जनता के आंसू दुःख दर्द दिखाई ही नहीं देते हैं। मैंने गरीब को नंगे बदन देख कर एक धोती पहनने का संकल्प लिया और अपने हर दिन शानदार लिबास पहनने सजने संवरने का कीर्तिमान स्थापित करने पर देश का खज़ाना लुटाया है। गांधी और आप कभी साथ नहीं हो सकते हैं एक दूजे के विरोधी हैं।

        लालबाहुदर को जानते हैं उनका भी जन्म 2 ऑक्टूबर को ही हुआ था। कद छोटा था आदमी बड़ा था और देश को आत्मविश्वास से भरा था साहस से जवान और किसान की जय का केवल नारा नहीं संदेश जन जन तक पहुंचाया था। मैंने तो कभी कोई राजनैतिक सत्ता का पद नहीं हासिल किया लालबहादुर बैठे थे इस पद को सुशोभित किया था सादगी से देश की सेवा की थी। आपको उनकी दो चार बातें बताना ज़रूरी हैं , जब दल का कामकाज किया करते थे उनको पार्टी से 25 रूपये महीना मिलते थे घर खर्च चलाने को जो वे अपनी पत्नी को दे देते थे। इक दिन इक दोस्त उनसे सहायता मांगने आये सौ रूपये की ज़रूरत थी तो उन्होंने कहा कि माफ़ करना मेरे पास तो कुछ भी नहीं है , मगर तभी किवाड़ के पीछे से पत्नी ने इशारा कर बुलाया और कहा आपको उनकी सहायता करनी चाहिए। मगर मेरे पास पैसे कहां हैं जो घर खर्च को मिलता है आपको दे देता हूं अपने पास नहीं रखता कोई पैसा। पत्नी ने बताया मैंने बचा रखे हैं जो आप देते हैं 25 रूपये उस में से 20 से गुज़ारा हो जाता है 5 रूपये बच जाते हैं और सौ रूपये हैं उनको देकर सहायता कर सकते हैं। और लालबहादुर ने ऐसा करने के बाद इक खत लिखा था पार्टी अध्यक्ष को जिस में कहा गया था भविष्य में मुझे 25 रूपये नहीं 20 रूपये मासिक भेजे जाएं क्योंकि मेरा काम उतने से चल जाता है। ईमानदारी इसको कहते हैं। रेल विभाग के मंत्री बने तो अपने कक्ष में कूलर लगा देख सवाल किया क्या बाकी डिब्बों में यही व्यवस्था है और नहीं है सुन कर कूलर को हटवा दिया था। जब प्रधान मंत्री बने तो इक दिन पत्नी ने बच्चों को स्कूल भेजने को सरकारी कार उपयोग करने की बात कही , लालबाहदुर जी ने कहा फिर आपको उसका खर्चा मेरे वेतन से लौटना होगा क्योंकि सरकारी गाड़ी निजि उपयोग को नहीं है। आज आपके कितने आयोजन देश के खज़ाने से पैसा खर्च कर होते हैं अपने कितने धार्मिक अनुष्ठान किये करोड़ों का खर्च किया आपकी आय से मुमकिन ही नहीं है बल्कि अपने अपने खुद के विज्ञापन पर कितना धन बर्बाद किया है।

     चलो गांधी लालबाहुदर से आपका कोई मेल नहीं मुमकिन आपको उनकी सोच विचारधारा नहीं मालूम मगर जेपी को तो जानते हैं वही लोकनायक जयप्रकाशनारायण जी जिन्होंने इंदिरा शासन में सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन की बात की थी। कभी कोई पद नहीं लिया था और आपात्काल के बाद सभी दलों को संगठित कर तानाशाही का अंत किया था। 9 दिन बाद 11 ऑक्टूबर को उनका जन्म दिवस आपको याद नहीं रहेगा हर साल की तरह। जिनकी बदौलत आज आप लोग सत्ता में हैं उनकी ही पीठ में छुरा घौंपने वाले कौन थे जिन्होंने सत्ता और कुर्सी के मोह में देश की जनता के विश्वास से धोखा किया था। वास्तविक देश और जनता के नायक ऐसे होते हैं जो देश समाज की खातिर जीवन भर जतन करते हैं कर्तव्य समझ कर। उन्होंने कभी आपकी तरह कोई दावा नहीं किया महान देशभक्त होने का न ही अपने विरोधी को देशभक्त नहीं होने का आरोप लगाने का देश को विभाजित करने का काम किया कभी उन्होंने। हम सभी को आदर देने को हमारी विचारधारा हमारे तौर तरीके शैली को अपनाना चाहिए न कि हमारे बुत बनाने समाधि पर फूल चढ़ाने का आडंबर करते रहना चाहिए।

Wednesday, 25 September 2019

खड़े हुए हैं गुनहगार की तरह ( अपनी कहानी ) डॉ लोक सेतिया

  खड़े हुए हैं गुनहगार की तरह ( अपनी कहानी ) डॉ लोक सेतिया 

     अब लिखनी चाहिए अपनी ज़िंदगी की कहानी मुझे। नहीं लिखी पहले ये सोच कर कहीं कोई पढ़ नहीं ले कोई समझ नहीं जाये दिल की बात। अब जानता हूं कोई नहीं पढ़ता किसी और की लिखी बात सब की खुद अपनी अपनी कथा है खुद से खुद ही कहनी होती है। कोई अगर पढ़ भी लेगा तो समझेगा नहीं तो अब लिखना आसान है। ये शीर्षक मजरूह की ग़ज़ल से है दस्तक फिल्म की मुझे अपने दिल के करीब लगती है जैसे मेरी अपनी बात हो कोई पचास साल से इसको गुनगुनाता रहा हूं। चलो आपको सुनवाता हूं। 

हम हैं मताए कूचा ओ बाज़ार की तरह , उठती है हर निग़ाह ख़रीदार की तरह। 

वो तो कहीं है और मगर दिल के आस-पास , फिरती है कोई शय निगाहे यार की तरह। 

मजरूह लिख रहे हैं वो अहले वफ़ा का नाम , हम भी खड़े हुए हैं गुनहगार की तरह। 

  आपकी बात लिख कर या कोई गीत गुनगुना कर कहना मुझे आसान लगता है। कितने गीत मुझे अपनी कहानी से मिलते जुलते लगते हैं। बचपन से गुनगुनाता रहा हर दिन हर वक़्त मैं ऐसे गीत ग़ज़ल। कुछ लोग कहते भी थे कोई अच्छा गीत गाया कर यार , मैंने बहुत गाया किस तरह जीते हैं ये लोग बता दो यारो , मुझको भी जीने का अंदाज़ सिखा दो यारो। कॉलेज में कमरे में साथ रहने वाला इक सहपाठी मज़ाक किया करता था ये कहकर कि सुबह होते ही गाने लगता है हुई शाम उनका ख्याल आ गया। खैर इतनी बात काफी है समझने को अब जो लिखना है। 

     लोग कहते हैं खुश रहा करो मुझे खुश रहना रास नहीं आता है सीखा ही नहीं कैसे खुश रह सकते हैं जब सामने हर तरफ मातम पसरा नज़र आता है। शायद वो लोग भी सच में खुश नहीं रहते जो हंसने को कहते हैं कि हम सबको हंसना चाहिए इस से बहुत कुछ हासिल होता है असली नहीं तो नकली दिखावे की हंसी ही सही कल ही इक वीडियो देखा आमिर खान के सत्यमेव जयते शो का। चाहकर भी ऐसी हंसी हंस नहीं पाया तभी भीड़ से अलग अकेला उदास खड़ा होना मुझे सुकून देता है। किसी ने उपदेश दिया आपको खुद के दिल दिमाग़ को बेचैन नहीं करना चाहिए समाज की अनुचित बातों को देखकर। कबीरा तेरी झौपड़ी गलकटियन के पास करेंगे सो भरेंगे तू क्यों भयो उदास। आपको क्या लगता है कबीर जो कह रहे हैं उस में उदासी नहीं है खुश रह सके होंगे , नहीं ये विडंबना है उनको लगता होगा कबीर मुझ के दुःखी होने से बदलता नहीं ये सब मगर दुःख था दर्द था बेचैनी रही थी। उदासी थी नानक जी भी उदास रहे थे जिस जिस को समाज की बातें विचलित करती हैं खुश नहीं रह सकता है। 

   जाने कैसे लोग समझते हैं मेरे पास खाने को रोटी है रहने को घर है और जीने को गुज़ारा करने को पैसा भी है तो जिनके पास कुछ नहीं है जो भूखे हैं बदहाल हैं खुले आसमान तले रहते हैं तपती लू बारिश सर्दी आंधी तूफ़ान बिजली की गरज सब को झेलते हैं उनसे मुझे क्या।  बस उनका पता है इक खबर है जिस से मुझे कोई लेना देना नहीं है उनकी चिंता मुझे क्यों करनी है। मुझे अपने बारे स्वादिष्ट भोजन बड़े घर अधिक सुख सुविधा और जाने कितनी ख्वाहिशों की बात सोचनी है बहुत और चाहिए सबसे अधिक और धन दौलत ताकत शोहरत पाने को मौज मस्ती करने की बात सोचनी है। खुश रहने को क्या ज़रूरी है समझना होगा। मुझे बचपन से इक बात की चाहत रही है बस कोई इक दोस्त मिल जाये जिसको कोई स्वार्थ कोई ज़रूरत नहीं दोस्ती अपनेपन की आरज़ू हो। दुनिया के हिसाब-किताब से अनजान हो मेरी तरह थोड़ा भावुक संवेदनशील हो और दोस्ती का अर्थ समझता हो। मगर मिला नहीं तलाश करने को जतन करता रहता हूं अभी भी। लोग खुश होते हैं बड़ा घर कोई पद कोई रुतबा कोई शोहरत पाने से। कोई धन दौलत जमा कर रईस बनकर ख़ुशी हासिल करता है किसी को महल सा आलीशान घर बड़ी बड़ी गाड़ियां ख़ुशी देती हैं कोई भीड़ चाहता है अपने आस पास तो कोई दुनिया भर की सैर करना चाहता है। मुझे इन सब बातों की कोई अहमियत नहीं लगती बस चैन से रहना गुज़र बसर को ज़रूरत को थोड़ा सा सामान और आमदनी अपनी ज़रूरत भर पूरी करने की , इतना बहुत है। पास है कोई कमी नहीं खलती सिवा इक बात के कि काश कोई मुझे समझता मेरी बात को सुनता और जैसा भी मैं हूं अपनाता मुझे।

         शायद अब खुद को बदलने का समय है , खामोश रहकर जीने की अदा सीखनी है। कोई ज़रूरी नहीं सब को कोई दोस्त मिले जैसा कोई चाहता हो। जिन बातों से दोस्तों को खोना पड़ा है मुझे ही छोड़ना होगा वो सब भले कितना उचित और अच्छा हो। कुछ बातें नहीं समझ आती हैं लोग मिलते हैं तो उनको देश की राज्य की राजनीति की बेकार की बातों या फिर अमीरी के दिखावे को छोड़कर कोई बात चर्चा के लिए पसंद नहीं आती है। मुझे इन में कोई रुचि नहीं है। जब किसी को हर कोई हर पल यही एहसास करवाता रहे कि तुम नासमझ हो , तुन्हें कुछ भी नहीं आता है , पैसा बनाना नहीं आया शान से रहने का दिखावा करना नहीं आया हर कोई तुम्हें देख कर हंसता है कोई कायदे की बात नहीं करता कोई ढंग का धंधा नहीं करता बेकार उलझन में पड़ा रहता है। तारीफ भी करनी हो तो शब्द होते हैं बुद्धू हो जो नहीं समझ सकते आजकल की दुनिया कैसी है। सपनों की दुनिया में जीते हो जहां कोई भेदभाव कोई नफरत कोई झगड़ा किसी धर्म का ख़ास आम बड़े छोटे का नहीं हो। अधिकतर लोग इन्हीं की सोच वाले हैं मतलब की बात अर्थात अपने हित अपनी भलाई की बात बाकी सब बातें फ़ज़ूल लगती हैं। मैं नहीं होना चाहता अपने खुद तक सिमटा हुआ , सार्थक जीवन का अर्थ है अपने से निकलकर सभी की बात करना। जब भी किसी से दिल की बात की है लगता है हर कोई रिश्तों की दुनिया में कीमत लगाता है तोलता है मतलब के तराज़ू पर हर नाते बंधन को। खरीदार बनकर मिलते हैं मुझे लोग और मुझे बिकना मंज़ूर नहीं है। शायद मेरी कुछ भी कीमत नहीं लगती किसी को या फिर कोई समझता ही नहीं कुछ चीज़ें और इंसान भी अनमोल होते हैं जिनका कोई दाम नहीं होता मगर किसी कीमत पर मिलते नहीं हैं बाज़ार में ज़माने के। बस कुछ ऐसा है मेरे साथ सबको किसी काम का नहीं लगता और मुझे चाहिए वो जो मेरी कीमत समझता हो लगाना नहीं चाहता हो।


Tuesday, 24 September 2019

मन की उलझन सुलझती नहीं ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया

    मन की उलझन सुलझती नहीं ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया 

    कोई उधर जाने कोई इधर जाने की बात करता है। जाता कोई कहीं नहीं है ठहरे हुए पानी की तरह विचार भी कहीं अटके हुए हैं। बहता हुआ पानी कुछ भी हो थोड़ा पीने के काबिल रहता है रुका हुआ पानी बदलना चाहिए दुष्यंत कुमार कह गए हैं। अब तो इस तालाब का पानी बदल दो ये कंवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं। सुबह कोई कुछ कहने लगा तो मैंने कहा आपको संदेश भेजा था इस को लेकर कहने लगे फुर्सत नहीं है पढ़ने की। सोशल मीडिया पर लोग दिन रात लिखते हैं बिना पढ़े ही और फिर सबको कहते हैं मेरी पोस्ट पढ़ना। गांव में कहावत है आप बैल को तालाब तक ले जा सकते हैं पानी पीने को विवश नहीं कर सकते छी-छी कहने से पानी नहीं पीता है पशु भी। मुझे कहोगे आप क्यों लिखते हैं जब लोग पढ़ते नहीं तो कारण मन की उलझन है सुलझती नहीं है। विचलित होने की आदत है जब भी कुछ देखता सुनता हूं बिना लिखे बेचैनी नहीं जाती है। रात को कोई मिला कुछ बात कहना चाहता था , मुझे जानते हो कहने लगा , उधर घर है फलां परिवार है , मैंने कहा मालूम है। फिर कोई बात कहने लगे किसी को लेकर भाषा सभ्य नहीं थी तो मैंने कहा मुझे इस भाषा में चर्चा करना पसंद नहीं है सुनते ही नौ दो ग्यारह हो गए। जानता था पहचाना कल रात उनको। 

किसी ने कोई बात लिख कर सवाल किया हज़ारों साल पहले लिखा हुआ है ये सच लगता है आप साफ बताओ। मैंने कहा नहीं जानता सच क्या है खुद आपको कोई किताब धर्म की पड़नी चाहिए फिर समझना होगा। धर्म कोई भी हो जो आपको प्यार मुहब्बत नहीं नफरत का सबक सिखलाता है धर्म नहीं हो सकता है। भगवान अल्लाह जो भी हो ऊपर वाले को न किसी से बैर है न किसी से लगाव सब बराबर हैं विधाता की नज़र में इतनी बात समझने को कोई उपदेश कोई किताब पढ़ना ज़रूरी नहीं है। पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ पंडित भया न कोई , ढाई आखर प्रेम के पढ़े सो पंडित होय। बस ढाई अक्षर समझना ज़रूरी है। कोई  पढ़ता नहीं तो भी मुझे संदेश भेजना है कोई विवशता नहीं किसी का मन हो पढ़ सकता है। मुझे हर उस जगह दीपक जलाना हैं जिस जिस जगह अंधकार छाया हुआ है। जहां समझते हैं बड़ी चकाचौंध रौशनी हैं उसी के पीछे अंधेरा देखा है लाल कालीन के नीचे गंदगी छिपी हुई और जो नेता अधिकारी जनकल्याण की बात करते हैं उन्हीं में अहंकार और कर्तव्य नहीं निभाने की वास्तविकता नज़र आती है। उन पर असर हो नहीं हो कहना मेरा काम है नाराज़ हो जाते हैं तो उनकी समझ की बात है। 

   लोग जलसे करते हैं जाने किस कारण जब दुष्यंत कुमार के शब्दों में यहां तो सिर्फ गूंगे और बहरे लोग बसते हैं , खुदा जाने यहां पर किस तरह जलसा हुआ होगा। यहां तक आते आते सूख जाती हैं सभी नदियां , मुझे मालूम है पानी कहां ठहरा हुआ होगा। ठहरा हुआ पानी गंदला कीचड़ बनता जाता है ज़रूरत पानी को साफ करने की है तो पहले खराब पानी बाहर निकालना होगा। हम गांव के लोग किया करते थे यही मगर ये पढ़े लिखे गंदे पानी में साफ पानी मिला कर उसको भी खराब करते हैं। खुद को अच्छा साबित करना होता है किसी और को खराब साबित करने से आपकी अच्छाई नहीं सामने आती कभी भी , आपकी मानसिकता का पता चलता है। मंदिर मस्जिद गिरजाघर गुरुद्वारा जाने से नहीं अपने भीतर झांकने से विधाता को जान सकते हैं। हम धर्म को या कोई जानकारी हो उसे समझने की कोशिश नहीं करते सुन कर रटते हैं बिना अर्थ जाने , ये तो अज्ञानता की बात है। चिंतन करना ज़रूरी है अन्यथा समय बर्बाद करने से कुछ भी हासिल नहीं होने वाला। अभी इतना ही और पहले खुद समझ कर आपसे चर्चा करनी है उपदेश नहीं देता हूं मैं कोई उपदेशक नहीं हूं चिंतन करना चाहता हूं।  

Sunday, 22 September 2019

खिलौना नहीं इंसान हूं ( दास्तान ए ज़िंदगी ) डॉ लोक सेतिया

   खिलौना नहीं इंसान हूं ( दास्तान ए ज़िंदगी ) डॉ लोक सेतिया 

  हंसता रहा , मुस्कुराता रहा कभी आंसूं बहाता रहा ,
 जैसे कोई बेजान सामान सबकी दुनिया का मशीन सा। 
 
 चलता गया अजनबी अनजान राहों पर चाहे-अनचाहे ,
 कोई मंज़िल कोई मकसद कोई सपना नहीं था मेरा भी।

 फिर भी बहला नहीं पूरी तरह से किसी अपने बेगाने का ,
 मुझ से खेल कर भी दिल खिलौना टूटने बिखरने तक भी।

 अब तक गया हूं आखिर सदियों लंबे सफर पर चलते हुए ,
 नहीं चला जाता थोड़ा तक कर आराम करना चाहता हूं मैं।

 सभी अनचाहे खुद बना लिए बंधनों से मुक्त होकर अब ,
 बचे हुए कुछ पल जीना चाहता हूं अपनी मर्ज़ी से मैं भी।

 भगदौड़ से दुनिया की तक कर चूर हो कर परेशान होकर ,
 पल दो पल जीना चाहता हूं अपने साथ अपनी ख़ुशी से।

 किस किस को कैसे समझाऊं मैं नहीं बेजान खिलौना कोई ,
 दिल जज़्बात संवेदना और एहसास कुछ खालीपन का है।

 कुछ भी नहीं चाहत कोई गिला शिकवा आपस में नहीं है ,
 बस खुले आसमान में सांस लेना है घुट रहा है दम मेरा।

 नहीं आदत औरों की तरह हाथ जोड़ मांगना कुछ  कभी ,
 इतना चाहता हूं जैसा भी मैं हूं रहने दो मुझे अपनी तरह।

 और नहीं जिया जाता हर किसी को खुश रखने को मुझसे ,
 थोड़ी आरज़ू बची हुई है आखिरी पल चैन से रहना है अब।

 खामोश होकर शायद चिंतन करना चाहता हूं क्या है पास ,
 समझना नहीं सब को न ही किसी से कुछ कहना है अब।

Friday, 20 September 2019

मॉडलिंग के दीवाने लोग ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

        मॉडलिंग के दीवाने लोग ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

  आज़ादी को सौ साल हो चुके हैं और शोधार्थी देश के पिछले इतिहास पर शोध कर रहे हैं। कोई तीस चालीस साल पहले के दस्तावेज़ और फोटो फिल्म वीडियो का अवलोकन कर हैरान हैं कि देश की जनता को सांसद विधायक चुनते समय जो लोग पसंद थे वो कोई नायक या देश सेवक अथवा देश की समस्याओं को हल करने के जानकार या कुछ भी बदलाव लाने के अनुभव और मकसद समझने वाले नहीं हुआ करते थे। लोग ऐसे लोगों को चुनकर सांसद विधायक बना उनको सत्ता सौंप देती थी जिनको मॉडलिंग करने वाले अभिनेताओं नायिकाओं की तरह अपने वास्तविक जीवन से बिल्कुल अलग डायलॉग और अभिनय करना आता था। मॉडलिंग की शुरुआत किसी मसाले बनाने बेचने वाले से अपनी तरह से हुई थी और उसके बाद योग करने वाले से लेकर साधु संत बने लोग मिलकर उसे और ऊंचाई पर ले गए थे। मगर इन सब को पीछे छोड़ किसी राजनेता ने हर दिन शानदार लिबास और फ़ोटोशूट करने का इक कीर्तिमान स्थापित किया था और सरकार का मुखिया बन अपनी मॉडलिंग की अदाओं से लोगों को दीवाना बना दिया था। शोध किया गया तब समझ आया उसने दिन में अठाहरह घंटे यही काम किया सजने संवरने और अलग अलग तरह के परिधान ताज पगड़ी और तन ढकने से मन की बात कहने तक किसी और काम की फुर्सत नहीं थी क्योंकि इतना सजने संवरना किस काम का अगर उसको देखने वाले लोग ही नहीं हों इसलिए हर दिन टीवी पर विज्ञापन देकर शान दिखाई सभाओं में देश विदेश में नित नये नये सैर सपाटे करते हुए शान का दिखावा किया।

      कुछ लोगों ने स्वर्ग नर्क की कहानियां सुनकर अपनी आजीवका का साधन यही बनाकर हलवा पूरी खाने और सबको रूखी सूखी खाकर खुश रहने की बात समझाई। सत्ता वालों ने भी आसमान चांद सितारे वाले सपने बेच का धरती को अपने अधिकार में लेने का काम किया। सरकारी आंकड़े वही आकाश हैं जो दिखाई देते हैं और लुभाते हैं मगर उनका कोई अस्तित्व नहीं होता है। चांद को छू लेने की आरज़ू ख्वाहिश नासमझ लोगों को कभी वास्तविकता से सरोकार नहीं करने देती है। मॉडलिंग वाले अभिनय के माहिर होते हैं और जो कभी खुद नहीं देखा सबको दिखाने का करिश्मा करते हैं बदले में करोड़ों की कमाई करते हैं। जिन्होंने खुद कोई नियम कोई कानून कोई सामाजिक नैतिकता के मूल्य की परवाह नहीं की जिसे चाहा विवाह कर अपनी बनाया जिसे चाहा छोड़ दिया किसी और संग मुहब्बत का खेल रचाया कोई और पसंद आई तो धर्म बदल विवाह करने का मार्ग तलाश किया मगर सब मनमर्ज़ी और मनमानी करने के बाद भी शान से धन दौलत और राजनीति की सत्ता को हासिल करते तमाम मर्यादाओं को पांव तले कुचलते रहे। देश की जनता को अपने गांव शहर की बदहाली दिखाई नहीं दी मगर टीवी पर दिखाई देने वाले झूठ को देख कर तालियां बजाते रहे। शिक्षा हासिल करने के बाद भी समझ नहीं आया कि सपना और हक़ीक़त का अंतर बहुत है। सपने में अपने छप्पन भोग खाये मगर पेट खाली रहा और भूख से मरते रहे। हर राजनैतिक दल का चुनावी घोषणापत्र बस यही था।

     लंका सोने की थी और देश भी सोने की चिड़िया कहलाता था। पुष्पक विमान रावण के पास था और राम को बनवास मिला था कथा पढ़ते रहे समझ नहीं पाए ये कैसे था और लंका में सीता अशोक वाटिका में रही मगर राम शासक बने तो अग्नि परीक्षा के बाद भी किसी धोबी के आरोप लगाने के आधार पर त्याग दिया गया सीता को बिना किसी अपराध किये ही। राजनीति का अर्थ अपने को उजला साबित करना है और हर सफल राजनेता ने विरोधी की कमीज़ को मैली दाग़दार साबित किया ताकि उसके सामने खुद अपनी चादर को साफ़ दिखाने का काम कर सके। जनता बेचारी अपनी चुनरी का दाग़ देख कर शर्माती रही कि जाकर बाबुल से अखियां मिलाऊं कैसे घर जाऊं कैसे। राजनेताओं को जांच आयोग का साबुन और अदालत की वाशिंग मशीन मिली थी जो सबको बरी कर देती थी। घोटाले हुए मगर किया नहीं किसी ने भी कोई घोटाला भी ये तो इक भयानक ख्वाब था जो भूलना चाहा सबने मगर जिनको उनकी राजनीति आती थी उन्होंने राख में कोई चिंगारी दबी संभाल के रखी ताकि फिर से हवा देकर शोला बनाया जा सके। सत्ता और सरकार का कोई दीन धर्म नहीं होता है उनको बदलते वक़्त नहीं लगता है। कोई पापी निर्दोष साबित हो जाता है दल में शामिल होकर तो कोई बिना अपराध सूली चढ़ा दिया जाता है। अच्छी हुआ करती थी पुरानी कथाएं कहानियां जो आखिर सब कुछ ठीक होता था उन में आजकल हर कथा हर कहानी अंत तक आते आते और भी खराब भयानक हो जाती है और खलनायक जैसे लोग भगवान होने का किरदार निभाते निभाते खुद को भगवान समझने लगते हैं और उनकी दहशत ऐसी होती है कि लोग समझ कर भी नहीं समझते और अपनी जान की खैर मनाने को तालियां बजाते हैं अभिनंदन करते हैं जय जयकार के उद्घोष करते हैं। अब यही कारोबार सबसे अच्छा है मॉडलिंग करने का और कोई नायिका गेंहूं की कटाई करती है हेलीकॉप्टर पर खेत में आती है सजी धजी बन संवर कर। किसान ख़ुदकुशी क्यों करते हैं ये व्यर्थ की बात है। सत्ता का खेल चल रहा है स्वर्ग पाना है तो मुझे जितवाना होगा अन्यथा आपको नर्क से कोई नहीं बचा सकता है। डायलॉग सुपर हिट अभिनय शानदार है लोग जादूगर की जादूगरी पर निहाल हैं। जादू की परियां बुला रही हैं।

                

Thursday, 19 September 2019

बदनाम है शोहरत बहुत है ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

   बदनाम है शोहरत बहुत है ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

  हालत ऐसा है कोई कटाक्ष किसी और को लेकर करता है तब भी उनके चाहने वाले बवाल खड़ा कर देते हैं कि अपने हमारे आराध्य को लेकर कोई बात कही क्यों। मतलब उनको भगवान बताने या बनाने वाले भी स्वीकार करते हैं कि ये बात उनके लिए ही कही जा सकती है। बड़े बज़ुर्ग समझाया करते थे साथ कुछ भी नहीं जाना है नाम की कमाई बाकी रहती है। सच भी है दादा जी को गुज़रे पछास साल ताऊ जी को गुज़रे चालीस करीब और पिता जी को तीस साल होने को हैं गांव के लोग आज भी उनकी बात बड़े आदर से करते हैं। मुझे मालूम है मैंने कैसा नाम कमाया है सच बोलकर लिखकर दोस्तों को अपना दुश्मन बनाता रहा हूं। कभी कभी हैरान होता हूं साहित्य सृजन सच का आईना दिखाना तो होता है प्यार मुहब्बत का सबक पढ़ना पढ़ाना भी हुआ करता है। क्यों हमने मुहब्बत की ग़ज़ल कविता कहानी लिखना छोड़ खलनायक को नायक बना हिंसा को मनोरंजन का नाम दे दिया है। समाज का चेहरा इतना डरावना कब कैसे हो गया है कि हर साधु महात्मा नज़र आने वाला हमें नकली लगता है और हम दोगलेपन का शिकार हुए उनके पांव भी छूते हैं और मन ही मन उनको ढौंगी भी कहते हैं। यही विचार मन में आया था जो दो दिन पहले मैंने गुरु जी श्री आर पी महरिष जी का शेर सोशल मीडिया पर लिखा था आजकल के हाल पर , ये है वो शेर। 

ये अलग बात है कि बना फिरता है जोगी , आज के दौर में हर शख़्स है रावण की तरह। 

    एक शिक्षित और सभ्य महिला जिनको मैं उनके आदर्श राजनेता का आलोचक लगता हूं ने सभ्य शब्दों में संदेश भेजा सब गलत वही करते हैं आपकी नज़र में। उनकी गलतफ़हमी जाती नहीं फिर भी बताया ये उनकी बात नहीं है हर शख़्स शब्द उपयोग किया गया है जिसका मतलब सभी से है और ये जब लिखा गया था पचास साल पहले तब आपके नेता जी की कोई पहचान नहीं थी मगर बात तब भी सच थी और लिखने वाले शायर के दुनिया छोड़ जाने के कुछ साल बाद अभी भी सच ही है। उनका निधन कुछ साल पहले सौ बरस की आयु के करीब होने पर हुआ था। अच्छी दोस्त हैं जो खुलकर बात कहती हैं समझ सकती हैं समझाया जा सकता है मगर कितने जो उन नेता जी को भगवान मानते हैं खुद भी भक्त नाम से बदनाम हैं अपनी भक्ति का दिखावा करते हुए अपशब्द गाली हिंसा पर उतर आते हैं जाने ये कैसी भावना है जो विवेक संयम खो देती है। उन्हें इतना भी समझ नहीं आता कि कोई कुछ भी कहता लिखता है आपको क्यों हर खराब बात अपने तथाकथित भगवान को लेकर लगती है इस का अर्थ तो यही है कि आप को भी बात सच लगती है मगर सच सुनना पसंद नहीं है। अर्थात आपको कोई कलयुगी अवतार लगता है और खुद भी आप भक्त हैं कलयुगी ही और आपकी भक्ति भी कुछ उसी तरह की है जैसे कोई अभिनेता नाटक फिल्म या टीवी  सीरियल में नेगेटिव रोल करता दर्शकों को भा जाता है। 

     शायद उनको भी पता है वो जो भी दावा करते हैं सच नहीं है उनको भगवान कहलाना है बनकर दिखाना नहीं है। और इतिहास भरा पड़ा है ऐसे शासक हुए हैं जो खुद को भगवान घोषित करते थे और कर्म विपरीत किया करते थे जो उनको भगवान नहीं मानता था उसको जान से मारने अन्याय करने में कोई कमी नहीं छोड़ते थे। मगर आखिर उनका असली रूप सामने आया भी ज़रूर था पढ़ा होगा अपने या भूल गए होलिका दहन की कथा रावण जलाने की बात हर साल दोहराते हैं फिर भी। ज्ञानी बलशाली था मगर अभिमानी अहंकारी और विवेक की बात को नहीं समझने के कारण अंजाम क्या हुआ। मगर अब लोग राम का नाम भी लेते हैं और किसी भी मर्यादा का पालन नहीं करना चाहते तभी उनको ऐसे ही भगवान अच्छे लगते हैं मगर उनकी ये भक्ति उनका कल्याण नहीं कर सकती है न देश समाज का कल्याण संभव है। सच और झूठ अच्छाई और बुराई वास्तविक आचरण और आडंबर ऐसे शब्दों की परिभाषाओं को बदलना उचित नहीं है। कैसी भक्ति है जिसने भक्त शब्द को बदनाम कर दिया है वास्तविक भगवान भी घबराते होंगे ये देख कर कि भक्त ऐसे भी हो सकते हैं। इक बात तो है कि लोग अच्छी बातों को याद नहीं रखते बुरी बातों को कभी भूलते नहीं हैं। बदनाम हैं तो भी नाम तो है मानने वाले लोग हमेशा रहे हैं। गब्बर सिंह सबको याद है ठाकुर किसी को याद नहीं रहता है शोले फिल्म की मिसाल सामने है। मगर किरदार निभाने वाले दोनों अभिनेता किसी और दुनिया में साथ बैठे ठहाके लगा रहे होंगे।

Wednesday, 18 September 2019

धर्म की जनसेवा की गलत परिभाषा ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

  धर्म की जनसेवा की गलत परिभाषा ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

  हमने अपने विवेक से काम लेना छोड़ दिया है अन्यथा हम ऐसे कर्मों को धार्मिक नहीं मानते कभी। जब भी किसी देश का शासक भले जिस भी व्यवस्था द्वारा सत्ता पर बैठा हुआ हो जनकल्याण का पैसा खुद अपने किसी भी मकसद पर खर्च करता है उसको अच्छा शासक क्या भलामानुष भी नहीं समझा जाना चाहिए। जब किसी राज्य की जनता किसी कुदरती आपदा से कष्ट में हो तब उनकी सहायता करने की बात भूलकर जब कोई अपने किसी तथाकथित धार्मिक आयोजन करने पर सरकारी लोगों को व्यस्त रखने का कार्य करता है तब वह वास्तव में इक अपराध मानवता के खिलाफ कर रहा होता है। और हम देखते हैं हर जगह कोई यही अधर्म कर रहा नज़र आता है। सौ पंडित मिलकर कोई पूजा पाठ करने से किसी का अपने कर्तव्य को भुलाकर अपने खुद के लिए कुछ भी करना कैसे किसी भगवान को खुश कर सकता है। 

   हैरानी हुई जब कुछ लोग धार्मिक आयोजन भी अपनी ताकत शोहरत को साबित करने को आयोजित करने लगे हैं। यहां पर शर्तें लगाई जाने लगी हैं मेरी कमीज़ उजली है उसकी मैली है , लगता है कोई फ़िल्मी नायक किसी डिटर्जेंट का विज्ञापन कर रहा है। आपको अमिताभ बच्चन का डिटर्जेंट भाता है या अक्षय कुमार का मर्ज़ी आपकी है। समझदार दोनों जगह हाज़िरी लगवा आये नासमझ हम किसी भी जगह नहीं जाना उचित लगा धर्म कोई बाज़ार नहीं है ये उपदेश सुनने की ज़रूरत नहीं थी। हद तब हुई जब डंका पीटने का काम किया गया ये बताया गया उनकी लंगर की थाली हज़ार दो हज़ार वाली थी। इतने ही धर्म कर्म वाले हो तो लाखों रुपया शानो शौकत दिखाने पर नहीं कुछ गरीबों का पेट भरने किसी की सहायता करने पर लगाते तो पुण्य का काम होता। 

   हमने एक तरफ आधुनिक विज्ञान और चांद पर जाने की बात की है दूसरी तरफ अभी भी अंधविश्वास को बढ़ावा देते हैं। भला किसी रोगी को कोई दवा ख़ास दिन अपने हाथ से देने पर असर होने की बात कोई खुद को आधुनिक शिक्षा विस्तार  और अंधविश्वास का अंत करने वाली बात कहने वाला किस तरह कह सकता है। मगर आजकल शिक्षा स्वास्थ्य समाज सेवा धर्म सभी का कारोबार है और सफल होने को ये सब करना अनुचित नहीं समझते लोग। लेकिन आप किसी से भी किसी विषय पर चर्चा भी चिंतन की तरह नहीं कर सकते हैं क्योंकि तर्क की कोई बात नहीं समझता और आपके सवाल का जवाब देने की जगह आपको अनाप शनाप बातें और जाने क्या क्या नहीं कहा जा सकता है। 

   जिधर भी नज़र जाती है लोग समाज सेवा का आडंबर करने को कितने एनजीओ बना वास्तव में उनकी आड़ में क्या क्या नहीं करते हैं। समाज सेवा धार्मिक आयोजन दान करने को खुद की कमाई खर्च की जानी चाहिए ऐसा ही सभी धर्म बताते हैं। जब कोई सरकारी धन से अपने गुणगान ही नहीं राजनीतिक मकसद से दिखावा करने पर अनुदान लेकर बर्बाद करता है तो पुण्य नहीं मिल सकता ऐसा कर के। राजनेता अधिकारी ही नहीं बड़े बड़े धार्मिक स्थल दान चढ़ावे की राशि का उपयोग धर्म छोड़ तमाम बाकी कामों पर करते हैं तो खुद ही अपने धर्म और उपदेश को धोखा देते हैं। आपको उल्टी परिभाषा समझाई जा रही है धर्म पुण्य और जनसेवा की बात की जाती है करते जो हैं विपरीत आचरण है।

Friday, 13 September 2019

विद्या बेचारी हिंदी जैसी ( व्यंग्य-कथा ) डॉ लोक सेतिया

    विद्या बेचारी हिंदी जैसी ( व्यंग्य-कथा ) डॉ लोक सेतिया 

 लिखते हुए मन में इक खालीपन लग रहा है बात हिंदी दिवस पर हिंदी के गौरव की करनी चाहिए मगर जो सामने है हिंदी का उपहास लगता है। बस हिंदी से उसका दर्द मिलता जुलता लगता है तभी किताबी हिंदी की बात छोड़ टीवी सीरियल की बात करने लगा हूं। दो चार कड़ियां दिखाई गई हैं विद्या नाम से धारावाहिक शुरू हुआ है। नायिका विधवा है ससुराल में चुपचाप सहमी हुई रहती है सब काम घर का करती है मेधावी है पंडित जी का बताया मंत्र इक बार याद हो जाता है। बचपन में पिता के पास एक के लिए किताब खरीदने को पैसे थे इसलिए बेटे को किताब लाकर स्कूल भेजते हैं और बेटी की ख़ुशी मां के साथ रसोई में हाथ बंटाने में है। विद्या बेटी जो है कोई शिकायत नहीं करती चुपचाप मान जाती है और जिस से परिवार गठबंधन करवाता है विवाह कर ससुराल चली जाती है। हिंदी भाषा की तरह बदनसीबी साथ रहती है और विधवा हो जाती है इक शहीद की विधवा को सरकार पचास लाख देती है मगर पैसे ससुराल वाले खा जाते हैं हिंदी दिवस के बजट की तरह सरकारी लोग क्या यही नहीं करते हैं। मगर रिश्वत की मेहरबानी से ससुराल वाले विद्या को सरकारी स्कूल में अध्यापिका नियुक्त करवा देते हैं बिना उसकी मर्ज़ी के ही और उसको आदेश देते हैं सुबह उठकर साइकिल पर दूर गांव जाकर अंग्रेजी पढ़ाने को क्योंकि सरकार ने टीवी वालों के विज्ञापन के शब्दों में जिसका अंग्रेजी का ए बी सी डी का डब्बा गोल है उसे बच्चों को अंग्रेजी पढ़ानी है। अब कौन कौन उसका शोषण करता है और कौन कौन उसको मूर्ख बनाता है कहानी लंबी है और बाकी है देखने को। मगर विद्या नाम से ही बेचारगी का एहसास होता है हिंदी की तरह। टीवी वाले उसका नाम भी हिंदी अंग्रेजी को मिला कर लिखते हैं जो उनकी मानसिकता है। अर्थात विद्या या हिंदी दया की पात्र हैं। 

   चलो टीवी सीरियल को छोड़ हिंदी की बात करते हैं। हिंदी लिखने वाले हर साल ख़ुशी मनाते हैं और गर्व करते हैं घोषणा करते हुए कि हिंदी जगत की भाषा बन गई है। मगर शिक्षा की बात होती है तो निजि विद्यालय अंग्रेजी स्कूल और सरकारी स्कूल हिंदी वाले का अंतर साफ लगता है। किसी को रूखी सूखी किसी को हलवा पूरी मिलने की बात है। मगर हिंदी लेखक हैं जो भूखे रहकर लिखते हैं और अपनी पूंजी खर्च कर किताबें छपवाते हैं और बिकती नहीं हैं तो उपहार में बांटने का काम करते हैं जबकि जिनको मुफ्त उपहार मिला पुस्तक को पढ़ना क्या देखते भी शायद हैं। किताब पढ़ने को फुर्सत किसे है जब दिन भर खाली समय मनोरंजन करना मकसद है और सोशल मीडिया पर उल्टी सीधी पढ़ाई पढ़ते हैं सबको ज्ञान देने की बात करते हैं। व्हाट्सएप्प फेसबुक स्मार्ट फोन की अनुकंपा है जो पढ़े लिखे और अंगूठा छाप एक समान हैं बल्कि अनपढ़ लगता है चार कदम आगे हैं। चलो शुभकानाओं का आदान प्रदान करते हैं हिंदी दिवस मनाते हैं और बाकी सब भूल जाते हैं। 

   हिंदी दिवस पर हिंदी का गुणगान करने की रचना पढ़ते हैं गीत गाते हैं कविता कहानी सुनाते हैं। अपनी किताब का विमोचन करवाते हैं बधाईयां पाते हैं इतराते हैं। कितने ईनाम पुरुस्कार मिले बतलाते हैं खुशियां मनाते हैं। क्या लिखा था साहित्य का मकसद क्या है भूल जाते हैं जाने किस दुनिया से आये हैं और किस दुनिया की तरफ चले जाते हैं। साहित्य कहते हैं सच का दर्पण है तो आईने को आईना दिखाते हैं। हम कहते हैं इक ऐसा समाज बनाते हैं जिस में छोटे बड़े का भेदभाव सब भूल जाते हैं मगर हम खुद को बड़ा किसी को छोटा भी समझते हैं समझाते हैं। राह कौन सी जाना है हम किस रास्ते बढ़ते जाते हैं। क्या समाज में बदलाव हुआ है साहित्य कर्म सार्थक है या कोशिश है अन्याय नहीं न्याय की बराबरी की बात हो ये चर्चा करते हुए घबराते हैं शर्माते हैं। अपना असली चेहरा ढकते हैं छुप जाते हैं। सरस्वती वंदना गाते हैं देवी को मनाते हैं मगर उसकी तस्वीर पर जमी धूल को इक ख़ास दिन साफ़ करते हैं सामने दीप जलाते हैं। अंधेरों से हम साल भर दोस्ती निभाते हैं किस का नाम लिया जाये कैसे कैसे लोगों के दरवाज़े पर सर झुकाते हैं झोली फैलाते हैं खैरात ले आते हैं अधिकार पाने की बात नहीं करते हैं डर जाते हैं। अपने हिंदी दिवस मनाने का निमंत्रण भिजवाया है क्या पता भूल गए गलत पते पर आकर घबराया है किसी नेता ने रद्दी की टोकरी में फिंकवाया है। देख कर किसी को दर्द आया है चुपके से रद्दी की टोकरी से उठाया है और सर माथे लगाया है क्योंकि ऊपर सरस्वती देवी की तस्वीर लगी थी सह नहीं पाया है। कैसे उस सभा में शामिल हो सकता है ये लेखक जिस में अंगूठा छाप को मुख्य अतिथि बनाया है। हिंदी के नाम पर इस साल भी दिल भर आया है।

Thursday, 12 September 2019

हम सभी महात्मा हैं अब ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

   हम सभी महात्मा हैं अब ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

       हम जब तक नौकरी व्यवसाय में रहे वो सब किया जो करना चाहा जो करना पड़ता था जो करना नहीं चाहिए था मगर करते रहे विवशता की आड़ लेकर अपने फायदे अपने स्वार्थ लोभ लालच जैसे कितने ही कारण बहाने गिनवा सकते हैं। लेकिन जैसे ही हम ने अपना काम व्यवसाय नौकरी से निजात पाई हम सभी को ज्ञान की अनुभूति हुई कि जो भी जीवन भर किया सब झूठ था व्यर्थ था और वास्तविक आनंद लोभ मोह को छोड़ धर्म कर्म के अच्छे कर्म करने से मिल सकता है। इस सब बताने का अर्थ कदापि ये नहीं है कि हम लोगों को अपने अनुचित आचरण करने कर्तव्य ईमानदारी पूर्वक नहीं निभाने से कोई पछतावा कोई ग्लानि है। हम आज भी गर्व करते हैं कि हम कितने बड़े पद पर रहे और कैसे कैसे हमने अपनी इच्छाओं की पूर्ति की और जो भी मन किया करते रहे हैं। जब कोई इंसान घर बार छोड़ सन्यासी बन जाता है तो उसके पिछले सभी किये अपकर्म भूल जाते हैं और धर्म चिंतन करने से पिछले पापों से मुक्त समझा जाता है। हम ने कोई लिबास बदला नहीं है और घर परिवार से बिछुड़ किसी जंगल में नहीं रहने लगे हैं फिर भी हमारे पिछले सभी बुरे कर्म सेवानिवृत होते ही अपने आप खत्म हो गए मान लिए जाते हैं। तब जो जो भी अनुचित किया हम ने नहीं किसी अधिकारी कर्मचारी व्यवसायी ने किये जो अब हम नहीं हैं और हम इंसान हैं पुरानी पहचान कोई झूठा सपना था और सपने में कोई भी अपराध किया गया गुनाह नहीं होता है।  मंच संचालक अपनी बात कह रहे थे और बारी बरी सभी सदस्य अपनी सच्ची कथा बता रहे थे।

    मैं इक सरकारी अधिकारी था कभी समय पर दफ्तर जाना ज़रूरी नहीं था सेवानिवृत होने के बाद इक संस्था ने शामिल होने और मंच पर विशेष बनकर बैठने का अधिकार दिया तो रविवार को भी सुबह सबसे पहले आना याद रहता है। मेरा कायाकल्प हो गया बहुत कुछ था कुछ भी नहीं रह गया तब पता चला आम ख़ास का अंतर कितना है। लोगों को कितना भटकाया फोन पर बात नहीं की मिलने आने पर मिलने से इनकार किया और अपनी ताकत का जमकर उपयोग किया। जो ख़ास लोग थे उनके लिए हाज़िर किया सब कुछ शासन का मज़ा लूटा जी भर कर और करना क्या चाहिए कभी विचार नहीं किया। अब सबको सीख देता हूं सही राह पर चलने की खुद कभी सही राह गया ही नहीं। सच तो ये है मैंने कभी भगवान खुदा के होने की नहीं होने की चिंता की ही नहीं  धर्म के नाम पर आडंबर किया है केवल जीवन भर मैंने।

     मैं शामिल था पुलिस विभाग में खुद कोई नियम नहीं पालन किया और सीधे सादे इंसानों से ऐसी भाषा में और इस तरह व्यवहार किया करता था जैसे खुद मैं जुर्म और गुनाह से नफरत करता हूं। मगर अपराधी लोगों से खुद ही सम्पर्क भी करता रहा उनको सहयोग भी दिया उनसे डरता भी था। न्याय के साथ खिलवाड़ करना मेरी आदत थी और बड़े अधिकारी या सत्ताधारी नेताओं के गैर कानूनी अनुचित आदेश भी जी हज़ूर कह कर मानता रहा और बदले में सब सुख सुविधा पाता रहा। कभी गलत करता पकड़ा भी गया तो भी मुझे बचाने को अधिकारी नेता खुद आते थे अपनी ज़रूरत को अपनी चमड़ी बचाने को। पुलिस का कर्तव्य क्या है इस की फज़ूल की चिंता मुझे नहीं रही अब जिस संस्था से जुड़ा हूं मानवाधिकार की बात करती है। यू टर्न लिया नहीं है सड़क की गलत दिशा जाने की बात है आपको समझ नहीं आएगी शायद।

    मैंने  गरीबों का हक छीना , उनसे उचित काम करने की रिश्वत वसूल की , ईलाज करने को सरकारी अस्पताल की जगह अपने घर नर्सिंग होम बुलाता रहा। दवा कंपनियों से फायदा उठाकर लूट का भागीदार बना और दाखिल करने से ऑपरेशन करने के लिए अपनी फीस के नाम पर रिश्वत लेता रहा। आजकल समाज सेवा का काम करने का तमाशा करता हूं तो खुद पर हंसता हूं जब अवसर था नहीं किया सही ढंग से काम अब दिखावे को जाने कितना कुछ करता रहता हूं। नेता भी बना कारोबार भी किया और कोई अपराध नहीं जो मैंने किया नहीं। खूब नाम झूठी शान और दौलत जमा की है अब दानी बनकर सभाओं में शान से शोभा बढ़ाता हूं।

      और इस तरह सब ने सेवानिवृत होने के बाद अपनी बात सच सच बताई क्योंकि इक साधु महात्मा ने उनको कहा था ऐसा करने पर आपको फिर से अगले जन्म में जो चाहोगे अवश्य मिलेगा। अब आखिर में उनकी इच्छा की बात संक्षेप में सचिव पढ़कर सुना रहे हैं।  सभी ने अपनी आरज़ू लिख कर पेटी में डाली थी महात्मा जी के कहने पर। सार यही था ये सब कोई मोक्ष की चाहत नहीं करते हैं। स्वर्ग उनको लगता है वही था जो उनको मिला था ज़रूरत से बढ़कर बिना मांगे या छीनकर भी और ये मिला जिस जगह वही नर्क का शासन ही तो है। उनको इसी देश में सब अपकर्म करने की छूट और अधिकार स्वर्ग से भी ऊपर लगते हैं उन्हें यही फिर से दोबारा चाहिए। जी भरा नहीं मनमानी कर के भी और किसी स्वर्ग में भजन कीर्तन करने से अच्छा है यहां इस नर्क में शासक बनकर स्वर्ग से बढ़कर सुख सुविधा हासिल की जाये। सार की बात यही है महत्मा बन जाना वक़्त और हालात के कारण होता है कोई भी साधु संत महात्मा होना नहीं चाहता है। बन जाने के बाद भी मन चाहता है ये झूठ की नकाब छोड़ खुल कर मौज मस्ती करने को। हर महात्मा अपना चोला उतार कर फिर से ज़िंदगी के मज़े लेना चाहता है बुराई की राह लुभाती है अच्छाई सच्चाई की राह चलने से कोई ख़ुशी कोई चैन नहीं मिलता है क्योंकि हमने चुना नहीं है ये सब छोड़ना मज़बूरी थी छोड़ना पड़ा है। अब कोई महात्मा महात्मा बनकर रहना चाहता नहीं है। 

Wednesday, 11 September 2019

मदहोशी के आलम में ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

        मदहोशी के आलम में ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

 जिस समय इक महिअलों की समानता के अधिकारों की पैरवी करने वाली महिला नेता जी के शासन को राम राज्य घोषित कर रही थी ठीक उसी समय नेता जी का गला काट दूंगा की धमकी का महान आदर्शवादी वाक्य उच्चारण करने वाला वीडियो सामने आया। ये कोई बोतल का नशा नहीं है जो आसानी से उतर जाये धतूरे से सोने का नशा सौ गुणा अधिक होता सुनते थे मगर सत्ता और पद का नशा उससे लाख गुणा बढ़कर सर चढ़ कर नाचता नचवाता है , उतरता है जब सत्ता नहीं रहती तभी। क्योंकि जब तक सत्ता है इक हजूम साथ रहता है जो उनकी पसीने की बदबू को भी गुलाब की खुशबू कहता है। अब ये इंसान की कमज़ोरी कुदरती है कि झूठी तारीफ सुनकर चेहरे पर खिसियानी हंसी आ जाती है। कितनी खूबसूरत लग रही हो किसी महिला से कहो तो काला रंग गुलाबी हो जाता है। मन उछलने लगता है और खुद पर काबू नहीं रहता , हंसी तो फंसी इस को ही कहते हैं सयाने। 

    हे राम गांधी जी ने आखिरी सांस लेते कहा था आजकल लोग जाने किस किस को राम घोषित करने लगे हैं। ये सारे राम सत्ता पर विराजमान होने से राम लगते हैं उस से पहले कोई इनको कुछ नहीं समझता और सत्ता जाने पर राम को मानने वाले खुद राम बनने की ताक में रहते हैं। राम होने की बात इतनी अजीब हुई है कि राम नाम सत्य है लोग कहते हैं जब अर्थी उठती है। राम नाम याद आखरी वक़्त आते हैं मगर जिसका वक़्त अंतिम सांस ले चुका वो बोल नहीं सकता सुन नहीं सकता बाकी लोग समझते नहीं इस का मतलब क्या है। भावना नहीं होती है बस समय बिताने को रास्ता काटने को इक साधन बन गया है। लोग जाने क्यों मुर्दे से घबराते हैं जबकि मरने के बाद कोई किसी का कुछ नहीं बिगाड़ सकता है और जो मर गया उसको कोई मार नहीं सकता है। ये राजनीति काठ की तलवारों की जंग है सब सैनिक कठपुतलियां बनकर लड़ते हैं किसी के इशारे पर नाचते हुए। 

      जब कोई लगातार अनाप-शनाप बोलने लगता है समझते हैं मनसिक संतुलन बिगड़ गया है उसकी कही बात का बुरा नहीं मानने की बात की जाती है। सत्ता मदहोश कर देती है और मदहोशी में बहुत कुछ हो जाता है जो माफ़ करना नशे में था कहने से छोड़ने को कहते हैं। मगर कितनी बार कोई बार बार यही करता है जो उसकी जगह पागलखाना हो सकती है। आगरे का पागलखाना बरेली का मशहूर हुआ करता था आजकल पागलखाने को भला सा नाम दे देते हैं। कितने पागल खुद को शहंशाह बताते हैं ख़ामोशी फिल्म को देखा है पागल आशिक़ कभी ठीक नहीं होते हैं पागल बना सकते हैं जैसे ख़ामोशी की नायिका वहीदा रहमान अंत में खुद ही पागल हो जाती है पागल आशिकों का ईलाज करते करते। नेताओं की मुहब्बत सत्ता की कुर्सी होती है उनको बस उसी से इश्क़ होता है और ये सत्ता कब हमेशा किसी की हुई है। यही वफ़ा की कहानी है और इसकी बेवफ़ाई का दर्द हर किसी को झेलना पड़ता है। महबूबा का साथ छूटता लगता है तब खुद पर अपनी ज़ुबान पर काबू नहीं रहता है। ऐसे में ईलाज भी यही है सत्ता से बाहर होना और दर्द भी इसी का होता है। ये खुमार चढ़ा हो तो कोई किसी को संभाल नहीं सकता न संभलने को कहने का कोई असर होता है। जाने दो नशा उतरते ही बंदा अपनी औकात में चला आता है।

Monday, 9 September 2019

बेक़सी हद से जब गुज़र जाये ( देश के हालात ) डॉ लोक सेतिया

    बेक़सी हद से जब गुज़र जाये ( देश के हालात ) डॉ लोक सेतिया 

     किसी शायर ने कहा है। तू है सूरज तुझे मालूम कहां रात का दुःख , तू किसी रोज़ मेरे घर में उतर शाम के बाद। तूने देखा है कभी एक नज़र शाम के बाद , कितने चुपचाप से लगते हैं शजर शाम के बाद। इतने चुप-चाप कि  रस्ते भी रहेंगे ला-इल्म , छोड़ जाएंगे किसी रोज़ नगर शाम के बाद। लौट आती है मेरी शब की इबादत खाली , जाने किस अर्श पे रहता है खुदा शाम के बाद। ये जो कुछ लोग अपनी खातिर नहीं देश की समाज की खातिर बेचैन परेशान रहते हैं कहते हैं ऐसा क्यों है जबकि बहुत लोग उसी को देख कर भी अनदेखा करते हैं ये कहकर कि ये तो होता रहता है इन दोनों में अंतर संवेदना का है। कुछ अपने से हटकर सबकी बात करते हैं और बहुत लोग अपने मतलब से मतलब रखते हैं। भला किसी की ऐसी फितरत कैसे हो सकती है हम देखते हैं तो समझ नहीं आता है। कोई सरकारी अधिकारी सत्ताधारी नेता के तलवे चाटता नज़र आता है जबकि ऐसा करना उसकी मज़बूरी कदापि नहीं है होना तो ये चाहिए कि सरकारी कर्मचारी अधिकारी अपना कर्तव्य देश और जनता के लिए निष्ठा रखते हुए निभाते और राजनेताओं की मनमानी नहीं स्वीकार करते। संविधान कानून उनको सत्ता पर बैठे नेता की अनुचित बात नहीं मानने का अधिकार देता है इतना ही नहीं आईएएस आईपीएस अधिकारी नहीं चाहे तो बड़े पद पर बैठकर भी कोई नेता घोटाला नहीं कर सकता है। अर्थात आज तक हर घोटाला इन लोगों की मर्ज़ी और सहयोग से ही हुआ है। मगर इन पर कोई कठोर करवाई होती नहीं है क्योंकि अपने पर जांच से लेकर दंड तक देने का काम खुद इनको करने का चलन है। जैसे टीवी अख़बार सोशल मीडिया वाले सबको लताड़ते हैं खुद क्या करते हैं कोई उनसे नहीं पूछता। बिक चुके हैं और निष्पक्ष होकर जागरुकता की बात नहीं सत्ता का पैसे वालों का गुणगान करते हैं। 

      अख़बार में कभी पाठकनामा कॉलम छपता था लोग अपनी समस्या लिखते थे और सरकारी विभाग को जवाब देना लाज़मी लगता था। शायद ही कोई अख़बार अब वो करता है। इधर सोशल मीडिया पर कितनी तरह से उनकी असलियत सामने लाने का काम किया जाता है जो कनून के रखवाले बनकर कानून से खिलवाड़ करते हैं पुलिस की वर्दी पहन अपराधी की तरह आचरण करते हैं। मगर ऐसे अधिकारी नेताओं का नाम एक दिन चर्चा में होता है उसके बाद हुआ क्या किसे मतलब है। जब सभी चोर चोर मौसेरे भाई हैं तो कौन किसे दंडित कर सकता है। इक रिवायत या आदत हो गई है सत्ताधारी शासक नेता उनके दल के लोगों के आदेश पर सब उचित अनुचित करने की। सोचता हूं अब लिखना बेकार है कुछ भी कहने से कोई असर नहीं होता सरकार नेता अधिकारी सब चिकने घड़े बन गए हैं मगर क्या उनकी वास्तविकता को उजागर नहीं करना भी उनके कर्तव्य नहीं निभाने और जब जो जैसे जहां मनमानी करने को बढ़ावा देना नहीं होगा। ऐसा पहले तो नहीं होता था जब भी कोई शिकायत करता या ध्यान दिलाता कहीं कोई अनुचित बात को लेकर अथवा उचित काम नहीं करने की बात करता तो कुछ न कुछ असर किसी न किसी पर अवश्व होता था। लेकिन आजकल जैसे कर्तव्य की बात क्या समाज की चिंता की बात क्या सरकार उसके अधिकारी नेता सभी अपने मतलब को जैसे भी मनमानी पूर्वक समाज की अनदेखी कर अपने हित साधने को नियम कानून ताक पर रख अनुचित आचरण करते संकोच नहीं करते हैं।

        आजकल सत्ताधारी दल राज्य भर में रोज़ किसी शहर में सभाओं का आयोजन अलग अलग नाम से कर रहा है। नेताओं की खातिर खूब सजावट और शोर दिखावा किया जाता है और स्थानीय नेता भी अपने नाम इश्तिहार और अपनी राजनीति करने में कोई कमी नहीं छोड़ते हैं। शहर में एक नहीं कितनी जगह अपने मकसद को भीड़ जमा की जाती है और खूब पैसा खर्च किया जाता है शानो शौकत पर। अधिकारी और सरकारी विभाग भी उचित अनुचित की चिंता छोड़ ख़ास लोगों को सब उपलब्ध करवाने में आम नागरिक की आपराधिक अनदेखी करते हैं और रास्ते बंद कर देते हैं अवरोध खड़े कर देते हैं। कुछ घंटे के राजनीतिक आयोजन की खातिर सरकारी विभाग कितने दिन लगा रहता है और सत्ताधारी दल के नेता भी अपनी मर्ज़ी से जो चाहते करवाते हैं। लेकिन उनका काम हो जाने के बाद जिस जगह को शानदार ढंग से सजाया गया था उस को गंदगी सड़क पर रुकावट से लेकर तमाम समस्याएं पैदा कर छोड़ जाते हैं। जैसे कोई मेला लगता है और मेले के खत्म होने के बाद हर रतफ मंज़र हैरान करने वाला हो जाता है। रौशनियों की जगह घना अंधेरा छाया नज़र आता है। ये नेता ये अधिकारी सरकार दावे करती है जनता की भलाई के मगर वास्तव में आम नागरिक की परेशानी के लिए उदासीन रवैया होता है। जो भी सड़क पर रुकावट या अन्य गंदगी उनके आयोजन से हुई उसको खुद ठीक करने की बात छोड़ बार बार बताने पर भी कोई कर्तव्य निभाने को तैयार नहीं होता है। कोई किसी और पर करने का फ़र्ज़ बताकर पल्ला झाड़ता है तो कोई करने को कहने के बाद करता नहीं है। 

       जिस देश में इतनी गरीबी है कुछ लोग कैसे इतना पैसा सरकारी खज़ाने से या खुद सत्ता की आड़ में चंदे के नाम पर जमा कर ऐसे हर दिन शानो शौकत दिखाने को सभाओं की सजावट पर बर्बाद करते हैं। अपनी गंदी स्वार्थ की राजनीति की खातिर भीड़ जमा करने को हथकंडे अपनाते हैं फिर भी तमाम जगह पंडाल खाली नज़र आ ही जाते हैं। मगर उनको क्या उनकी कोई ईमानदारी की मेहनत की कमाई नहीं थी जो बेकार हुई। किसी न किसी तरह उन्हीं गरीब लोगों से ये वसूली होती है। जितने भी नियम हैं जनता पर कड़ाई से लागू करने वाले खुद उनको तोड़ने में हिचकिचाहट नहीं महसूस करते हैं उनको ये याद ही कहां रहते हैं। शासक अधिकारी खुद पर बेतहाशा धन बर्बाद करते हैं तभी देश की जनता बदहाल है गरीब है। जब हर दिन इनके आयोजन समारोह सरकारी विभाग के भी और राजनीतिक दलों के भी आयोजित किये जाते हैं जीना हासिल वास्तव में कुछ भी नहीं होता सिवा उनके शोर और खुद अपने गुणगान करने के ताकि उनकी वास्तविकता की बात कोई नहीं करे , तब आम नगरिक देख कर सोचता है काश इतना पैसा गरीब लोगों की हालत ठीक करने को खर्च किया जाता तो बहुत कुछ बदल सकता था। चांद की बात पर जश्न मनाने से देश की धरती की बदहाली की बात को अनदेखा करना क्या देशभक्ति है। देशभक्ति देशसेवा की बात करते जाने से आपका अपने खुद पर करोड़ों रूपये ऐश आराम सुख सुविधा और मनमाने ढंग से दुरूपयोग करना कोई हद नहीं बची है। सपने देखने से कि सब बढ़िया हो जाएगा कुछ होता नहीं है खुस परस्ती की आदत ने नेताओं और अधिकारीयों ही नहीं टीवी अख़बार वालों से धनवान लोगों तक को स्वार्थ में अंधा कर दिया है ये सब किसी बेरहम शासक की शानदार महल में गुलछर्रे उड़ाना चाहते हैं जब महल से बाहर मंज़र बदहाली का हो।