Monday, 18 March 2019

क्योंकि मैं सच नहीं बोलता ( होली है ) डॉ लोक सेतिया

     क्योंकि मैं सच नहीं बोलता ( होली है ) डॉ लोक सेतिया 

                                  कुछ चुटकियां होली पर 

    आप शोर बहुत करते हैं मुझे कहा किसी ने। लोग चैन से सो रहे हैं आपकी आवाज़ से नींद में खलल पड़ता है। कोई ज़माना था उठ जाग मुसाफिर भौर भई गाते थे। इधर खामोश रहकर स्मार्ट फोन पर बिना आवाज़ का शोर करते सुनते हैं। गोविंदा की इक फिल्म आई थी क्योंकि मैं झूठ नहीं बोलता जिस में उनका किरदार वकालत करने वाले अधिवक्ता का था। सच बोलकर नहीं झूठ को सच बनाकर मुकदमा जीतने का हुनर आता है उनका इक वकील दोस्त शराफत की ज़िंदगी जीता सेंटीमेंटल फूल कहलाता है। बहुत लोग अभी भी नेताजी के झूठ बोलने को झूठ नहीं मानते। किसी ने समझाया कि अगर बोलने वाला और सुनने वाला दोनों को मालूम हो तो ऐसा झूठ बोलना पाप नहीं होता है। आजकल किसी को झूठी कसम खाने से मौत तो क्या बुखार भी नहीं आता है। आशिक़ से महबूबा ने प्यार करते हो कसम खाओ की बात की तो जवाब मिला ये नहीं पता कितना कम या अधिक करता या नहीं करता मगर तेरे बिना समय नहीं गुज़रता। वास्तव में आजकल रिश्ते वक़्त बिताने और मतलब निकलने को साहूलियत से बनते निभाते हैं। सच का झंडा बरदार होने का दावा करने वाले झूठे नंबर दो हैं पहला नंबर आरक्षित है उनसे बड़ा झूठा इस देश में कोई हुआ नहीं आगे भी संभावना कम ही है। सत्यवादी इधर इक गाली की तरह लगता है कोई कड़वा सच लिखता है तो उपहास करने को उपयोग किया जाता है ये इस शब्द को। तभी मैंने बचाव को शीर्षक ही लिख दिया क्योंकि मैं सच नहीं बोलता। 

                         कल कई साल बाद इक पुराने दोस्त का फोन आया नये बदले नंबर से। अब ये इक समस्या भी है और समाधान भी लोग नंबर बदलते रहते हैं। किसी को बात करनी तो नंबर पता नहीं क्या बदला हुआ और कोई बात नहीं करना चाहता तो नंबर बदल लेता है। अच्छा लगा दोस्त से बात कर और फिर से मेल मुलाकात की राह खुल गई। बोले भाई ये मेरे शहर में अमुक दल के पदाधिकारी हैं होली पर कविता का पाठ करने को बुलाने को बात करना चाहते हैं। दुआ सलाम के बाद आने को कहा तो बताना ज़रूरी समझा कि मुझे सब आता है राग दरबारी नहीं आता और किसी भी दल के नेता की जय जयकार करना सीखा नहीं है। जी कोई बात नहीं मगर आपको बाद में बताते हैं कब आना है , ये शिष्ट ढंग है हम दोनों जानते हैं उन्होंने बुलाना नहीं और हमको भी जाना नहीं। दूध का जला छाछ को भी फूंककर पीता है। 

                      पढ़ने लिखने की बात समझनी ज़रूरी है। कभी लोग थोड़ा पढ़ लिख लेते थे तो अख़बार रिसाला मांगकर भी पढ़ते थे। कॉलेज की पढ़ाई करने के बाद पुस्तकालय से किताब लेकर या फिर बाज़ार से खरीदकर पढ़ते थे। आजकल फेसबुक पर किताबों को फुटपाथ पर वज़न के हिसाब से 150 रूपये किलो भाव का फोटो नज़र आता है। फेसबुक शुरू हुआ तो लेखक पोस्ट लिखते पाठक पढ़ते थे मगर आजकल कोई पढ़ता ही नहीं टाइमलाइन  पर और मेसेंजर या व्हाट्सएप्प पर संदेश तक देखते हैं और तस्वीर देखना या फिर शीर्षक पढ़कर समझना पढ़ लिया की आदत है। लंबा लेख पढ़ना बोरियत भरा काम है क्योंकि अब ज्ञान की जानकारी की ज़रूरत नहीं है मनोरंजन सबसे महत्वपूर्ण है। जानकारी को गूगल सर्च है ही। अनपढ़ लोग भी स्मार्ट फोन खरीद समझदार बन सकते हैं। हमने इतने साल व्यर्थ महनत की इक स्मार्ट फोन होता तो ढाई आखर पढ़ लिए होते लेकिन कितनी किताबें पढ़ीं मगर वही ढाई अक्षर नहीं समझ पाये हम लोग।


चोर-पुलिस खेल और चौकीदार ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

  चोर-पुलिस खेल और चौकीदार ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

  सब का काम बड़े आराम से चल रहा था हर कोई मस्त था। पुलिस-चोर भाईचारा कायम था चौकीदार से कोई मतलब नहीं था। चौकीदार जागते रहो की आवाज़ लगाता लोग चैन की नींद सोते रहते। चोर पुलिस सहयोग से सात घर छोड़ चोरी करने के नियम का पालन करते और आपसी मिल बांट ईमानदारी से होती रहती थी। जब पुलिस को ज़रूरत होती चोर खुद थाने आकर चोरी कबूल करते और बड़े लोगों की चोरी की भैंस गाय क्या तोता तक बरामद हो जाता था। चौकीदार को महीने महीने वेतन मिलता था और डंडा बजाने को मिल जाता था ताकि गली के कुत्ते चौकीदार को काटने की हिम्मत नहीं कर सकें। पुलिस चोर दोनों को चौकीदारी से कोई परेशानी नहीं थी। समस्या उस दिन खड़ी हुई जब चौकीदार चोर पुलिस दोनों को नाकारा बता कर खुद चोर पकड़ने और चोरी नहीं होने देने की बात का शोर मचाने लगा। सदियों से हर कोई अपना धंधा चलाता रहा है चोरी का धंधा बंद होने से पुलिस का काम भी बंद होने की नौबत आने का अंदेशा था। ऐसे में चौकीदार का महत्व बढ़ गया था और चोर पुलिस दोनों उसकी शर्त मानने को राज़ी हो गए थे।

    चौकीदार का संविधान लागू होते ही चोर और पुलिस बेबस होते गए। चौकीदार शान से गुलछर्रे उड़ाने लगा और झूठ को सच बनाने लगा। कौन साहूकार है कौन खज़ाने का चौकीदार कोई समझ नहीं पा रहा था। खज़ाना चौकीदार की सुरक्षा में है चौकीदार बताकर बहला रहा था। चौकीदारी के नाम पर अपनी चला रहा था मैं हूं चौकीदार बाकी सभी हैं चोर का शोर मचा रहा था। चौकीदार सोते रहना देश वालो क्या आलाप लगा रहा था। उधर खज़ाना खाली होता जा रहा था चौकीदार दोस्ती निभा रहा था मामला सुलझने की जगह उलझता जा रहा था। चोरी के थान बांसों के गज से नापने का जुमला दोहराया जा रहा था। घर दुकान की अलमारी नहीं बैंक का खज़ाना लुटता जा रहा था लूटने वाले को कोई रास्ता बता रहा था। बैंकों पर बोझ बढ़ता जा रहा था अर्थव्यवस्था का कचूमर निकला जा रहा था। चौकीदार विदेश की सैर पर आ जा रहा था किस को कौन कैसे कहां भगा रहा था। चौकीदार वापस पकड़ लाने का ऐलान फरमा रहा था भगोड़ा आराम से विदेश में परचम फहरा रहा था।

        चोरी होना जारी रहा बस चोरी की घटना सार्वजनिक करना रोक दिया गया। अख़बार टीवी वालों को खबर की जगह बेखबर रहने की कीमत मिलने लगी थी। चोरी की बात पर चर्चा करना अपराध बताया जाने लगा , पुलिस पर आरोप लगते थे कोई चिंता नहीं थी चोरों के नाम सामने आते तब भी कोई घबराहट नहीं थी मगर चौकीदार की चौकीदारी पर सवाल करना गंभीर बात समझी गई। चोर पकड़े जाते तो इलाका बदल दिया जाता पुलिस वालों को किसी और थाने तबादला करना भी आम बात थी लेकिन चौकीदार को बदलने की बात की तो हंगामा खड़ा हो गया। चौकीदार का रुतबा इतना बढ़ गया था कि उसके नाम के पर्चे छप कर हर दीवार पे चिपका दिये और आजकल किसी घर की दीवार में कोई दरार नहीं नज़र आती है सब छेद ढक दिये गये हैं इश्तिहारों से। अचानक चौकीदार रखवाने वाले के निर्देश पर चौकीदार के फोटो छपे पर्चे इश्तिहार हटवा दिए गए हैं तो लगता है बिना चौकीदार अमन चैन कायम हो रहा है। चौकीदार को अभी जागते रहो की पुकार बंद करने को निर्देश दिया हुआ है। पुलिस चोर भाईचारा फिर से पहले की तरह सामान्य होने लगा है। कोई कहने लगा है अब भी उसी चौकीदार को रख लिया तो फिर चौकीदार को कभी हटाया नहीं जा सकेगा और चोर पुलिस चौकीदार सबकी पहचान करना असंभव हो जाएगा। सब हैरान रह गये जब अदालत को जानकारी दी गई कि चौकीदार के पास से सुरक्षा से जुड़े दस्तावेज़ चोरी हो गये हैं और किसी ने चोरी हुए दस्तवेज़ के आधार पर आरोप लगाया है मगर अदालत को उस को अनदेखा करना चाहिए। चोर कौन है जिसने देश के सबसे कड़ी सुरक्षा वाली जगह से इतने महत्वपूर्ण कागज़ चुरा लिए और जाने किस किस तक पहुंच गये। अभी भी चोर की नहीं चौकीदार की पैरवी की जा रही है। चोर-सिपाही का खेल जारी है और चोर-पुलिस मिलकर होली का त्यौहार मनाने वाले हैं शायद चौकीदार भी आने वाले हैं। चुनाव आने वाले हैं। 

   बच्चे भी चोर पुलिस वाला खेल नहीं खेलना चाहते माता पिता को शिक्षक मना कर गये हैं। हर कोई मैं भी चौकीदार खेलना चाहता है इक अनार सौ बीमार की बात है। चौकीदार का मुखौटा लगा लोग धोखा खाने लगे हैं असली चोर खिलखिलाने लगे हैं। चौकीदार एसोसिएशन अब जागी है अपने नाम का दुरूपयोग नहीं होने देगी ये कहानी आधी है। जनता की अदालत निर्णय सुनाएगी चोर को चोर पुलिस को पुलिस बनाकर फिर चौकीदारी की बात पे गौर फ़रमाएगी। 

Saturday, 16 March 2019

फिर चली बात जूतों की ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

    फिर चली बात जूतों की ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

निकल पड़ी है बारात जूतों की , फिर होने लगी है बात जूतों की। कल सुनी हुई बरसात जूतों की , देखना चाहते हो करामात जूतों की। खेल कोई भी हो जूतों की अपनी बात होती है देखना शह मात जूतों की। जूतों का खेल कोई आजकल का नहीं है सदियों से जूता चलता रहा है। गली के शोहदे मनचले और छोटे चोर जूते की सज़ा से बरी हो जाते हैं खरबूजा या गन्ना खेत से चुराने वाले की जूतों की सज़ा देना नाइंसाफी समझा जाता है डांट डपट ही बहुत होती है। कुछ माता पिता बिगड़े बच्चों को जूतों से सुधारने की नाकाम कोशिश करते हैं मगर बच्चे और बिगड़ जाते हैं। जूता चलता रहा है और चलता रहेगा मगर उसकी सफलता का कोई मापदंड नहीं है। लोग किसी की पिटाई होते देख भीड़ में घुस जूते चलाने का लुत्फ़ लेते हैं बिना जाने कि जिसको जूते पड़े उसका दोष क्या था। सभाओं में सस्ते घटिया जूते विरोधी दल के लोग उपलब्ध करवाते हैं मगर चालाक लोग जूट लेकर भी फेंकते नहीं पहन कर निकल लेते हैं। जूते बनाने वाली किसी कंपनी ने राजनीति के काम आने वाले अच्छे सस्ते और टिकाऊ जूट बनाने पर गौर नहीं किया अन्यथा चुनाव में खूब बिकते। वास्तव में जूतों का खेल बेहद मनोरंजक खेल है , पुलिस थाने में जूता इक छड़ी से बांधा टंगा रहता है पहले उसकी मार मुंह खुलवाती थी आजकल उसको दिखला कर ही काम चल जाता है। नेताओं पर जूता फेंकना खुद मुसीबत को घर बुलाना है अब कोई ऐसा नहीं करता मगर खुद नेता नेता को जूतों से सम्मानित करते हैं कभी कभी। घोषणा कर के जूतों की बारिश करने वाले संसद की चर्चा है कि बात का पक्का है इरादे पर खरा होगा ही। 

                   माना जूता विरोध जतलाने को इक साधन हो सकता है लेकिन जिस देश में करोड़ों लोग नंगे पांव रहते हैं फैंकने को जूता खरीदना मुश्किल है। किसी सरकार ने इस के लिए सबसिडी पर जूते मिलने की योजना नहीं बनाई है। विरोध का ये बेहद महंगा तरीका सांसद और विधायक उपयोग करते हैं संसद में या विधानसभा में। भारत ही नहीं अमेरिका वाले भी अपने शासक को इतनी सुरक्षा के बाद भी जूता चलने से सुरक्षित रख नहीं सके। उनके इतिहास में इस घटना का महत्व 9 / 11 की घटना से कम नहीं है। उस जूते का नंबर तक जानते हैं दस नंबरी था और उसका निशान तक मिटा दिया गया फिर भी बुरा सपना बनकर दिखाई देता है। बहुत मुमकिन है किसी दिन चुनावी उम्मीदवार की जूतों की क्षमता पर भी ध्यान देने लगे पार्टी का आलाकमान। कितने खा सकता है कितने से बचाव करना जानता है और कितनी दूर तक जूता फैंकने की क़ुअत है। कोई कंपनी दावा कर सकती है कि उसके बनाये जूते भारी नहीं बेहद हल्के हैं लगने पर दर्द भी नहीं होता बस धीरे से लगते हैं मगर उनकी गूंज दिल्ली तक सुनाई देती है। हाथों हाथ बिक जायेगा सब माल। आप देखना इक दिन आपके हर शहर में इक जूता चौक नाम का स्थान होगा जहां कोई ख़ास दिन जूतों को फूलमाला चढ़ाकर जूतों का महत्व समझने की बात होगी। कभी जूतों की माला पहनाई जाती रही है आशिक़ों को या समाज विरोधी कार्य करने पर। 

   
         जूतों की कहानी इतनी भर नहीं है। विवाह के समय दूल्हे के चुराये हुए जूते मुंह मांगे दाम देकर वापस लेते हैं। शादी का अर्थ समझाने को ये बहुत काम की रस्म है। पांच सौ का जूता दो हज़ार का हो जाता है। मंदिर जाने पर मांगने वाले की मुराद पूरी नहीं हो बेशक लेकिन जो मंदिर जूते चुराने को जाते हैं नंगे पांव जाते हैं और मनपसंद जूता डालकर घर आते हैं। जूतों की महिमा इसी से पता चलती है कि पुराने लोग जूता देखकर इंसान की पहचान किया करते थे।

आदर्श आचार संहिता ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

      आदर्श आचार संहिता ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

     मैं जनता की भलाई को ध्यान रखते हुए निर्वाचन आयोग से इक निवेदन इक विनती करना चाहता हूं। बस बहुत लागू कर के देख चुके अब आदर्श आचार संहिता को तुरंत वापस ले ले। न तो मुझे कोई चुनाव लड़ना है न ही राजनीति से कोई मतलब है मुझे फिर भी तमाम कारण हैं जिन पर विचार करने के बाद समझ आया है कि इस से जिनको मुश्किल होनी चाहिए ऐसा समझते हैं उनको नहीं वास्तव में बाकि जनता को मुश्किल होती है। सबसे पहली बात अपने चुनाव आचार संहिता बनाते समय आम जनता की कोई सलाह ली ही नहीं। जबकि इसका असर पड़ता जनता जनार्दन पर ही है। राजनैतिक दलों से मशवरा करने का क्या औचित्य है ये उस तरह की बात है जैसे खेल के नियम खिलाडियों से राय से बनाये जाएं। राजनीति का मतलब राजनेताओं से नहीं बाकी सभी लोगों से अधिक होता है क्या जनता बस खेल की तमाशाई है तालियां बजाने भर को। सब को मालूम है ऐसी किसी संहिता का पालन होता नहीं है और इसको मानकर चुनाव जीतना क्या लड़ना भी संभव नहीं है। जब शुरुआत पर्चा दाखिल करते समय ही बात झूठा शपथ पत्र देने से की जाती है तो आगे भगवान ही मालिक है। जनता पर इसका कितना खराब असर होता है इसकी व्याख्या करना ज़रूरी है तभी आयोग को भूलसुधार करने की बात समझाई जा सकती है।

    इस देश में अधिकारी आदी हैं कोई काम बिना ऊपरी आदेश नहीं करने की आदत के। खुद ब खुद अगर उचित कार्य करने की रिवायत होती तो विनती करने को अर्ज़ी देने दफ्तर जाकर कतार में खड़े होने की नौबत नहीं आती। खुला दरबार लगाने की परंपरा का अर्थ भी शासक का दाता बनकर अनुकंपा करना है जबकि वास्तव में लोग जाते हैं उचित कार्य नहीं किये जाने की शिकायत लेकर। सत्ता को शिकायत सुनना पसंद नहीं है और अधिकारी अगर रिश्वत लेने का लालच नहीं हो तो कोई काम करने की ज़हमत उठाते ही तभी हैं जब कोई सत्ताधारी दल का नेता सिफारिश करता है। चुनाव से पहले इस सब को रोकने से क्या मतलब यही है कि आपको बाकी पांच साल तक उचित काम भी मनमानी पूर्वक करने की खुली छूट मिली हुई है। जैसे उपवास के दिन खाने पीने पर कोई रोक या ऐतिहात की बात हो। नेता अपने ख़ास लोगों और धनवान चंदा देने वालों के सभी काम हमेशा करने को तत्पर रहते हैं यही अकेला अवसर जनता के लिए था वोट मांगने आने वाले नेताओं से अपने काम करवाने की बात करने का उसे भी आयोग ने छीन लिया। नेताओं की मंशा कभी नागरिक के उचित काम बिना फायदा उठाये करने की होती नहीं है इस तरह उनको बहाना मिल गया है नहीं करने का।

     चुनाव होने के बाद नेताओं को सरकार बनाने गिराने से अधिक महत्व किसी बात का नहीं होता है। आम नागरिक से मिलने को फुर्सत नहीं होती न ही मिलना चाहते हैं। आम जनता से मुलाक़ात कभी संभव हो तब भी टरकाने को सौ ढंग हैं अर्ज़ी ले लेना विभाग को आगे भेजने की बात कहना या फिर दिखावे को भेज भी देते हैं लेकिन वास्तव में काम किस का करना है हिदायत देने पर ही होता है वर्ना अर्ज़ियां रद्दी की टोकरी में चली जाती हैं। आम जनता के लिए हिदायत चुनाव के वक़्त दी जाती थी उसी को बंद करवा दिया आपने। क्या संविधान उचित काम चुनाव के दिन नहीं करने को कहता है , नेताओं को सिफारिश से रोकना है तो हमेशा को बंद करना चाहिए। सब जानते हैं नेताओं की सिफारिश बिना काम जायज़ ढंग से होते ही नहीं ये कुछ दिन की पाबंदी नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज पर जाने की चुटकुले जैसी बात है।

   दूसरा नियम चुनवों में खर्च पर सीमा को लेकर है हर बार जो हमुमान जी की पूंछ की तरह बढ़ता जाता है। सीमा में खर्च का शपथ देना कोई चुनावी उपहास जैसा है। पांच साल नेता हज़ार तरह से कल्याण राशि के नाम पर कोई और तरीका अपना कर देश के खज़ाने और जनता से चंदा रिश्वत किसी रूप में वसूल कर लूट का व्यवसाय करते हैं और पता चलता है उनके कुछ हज़ार करोड़ों बन चुके हैं ऐसा जादू का करिश्मा अन्य कोई नहीं जनता देश में। देश की संपत्ति का बड़ा हिस्सा इन पास है अगर इनको सीमा से कम नहीं बल्कि ऐसा नियम होता कि आपको दो करोड़ से अधिक खर्च करना लाज़मी है अन्यथा आपका चुनाव रद्द हो जाएगा तब जितना काला सफ़ेद धन इनकी तिजोरी में सड़ता है उसको हवा लगती और देश की अर्थव्यवस्था में इतना पैसा आने से कितने लोगों को थोड़ा हिस्सा मिल जाता। वैसे भी कोई शरीफ और ईमानदार आदमी चुनाव लड़ने की बात सोच भी नहीं सकता है।  चुनाव  लड़ने जीतने को गुंडागर्दी बदमाशी अपराधी होना ज़रूरी शर्त जैसा है आधा सदन इनकी बदौलत है।
          आखिर में सार की बात समझने को कई ढंग हो सकते हैं मगर कई बातें सुनने को अच्छी लगती हैं वास्तव में अच्छी साबित नहीं होती हैं। कितने राज्य शरब बंदी लागू करते हैं मगर शराब बिकनी बंद नहीं होती। शराब के दाम कई गुणा बढ़ जाते हैं और शराब माफिया घर घर बोतल पहुंचाता है। अभी कितने लाख करोड़ हर दल चुनाव पर खर्च करने को लिए बैठा है सब जानते हैं। उनको खर्च करना है जाने किस किस ढंग से कोई रास्ता तलाश कर के या फिर खर्च करने का नाम और तरीका बदल कर। आयोग आचार सहिंता की भूल को सुधार सकता है या बेशक इसका स्वादिष्ट अचार डाल कर सबको खाने खिलाने की बात कर मालामाल हो सकता है। जैसे हर सरकारी विभाग आयकर विभाग अकेले नहीं कई तरह से कुछ फीसदी जुर्माना या कर वसूल कर अनुंचित उचित का अंतर खत्म कर देता है। हर उम्मीदवार से खर्च का बीस तीस फीसदी लेकर छूट दे सकता है। मिल बांट कर खाना अच्छी बात है , न खुद खाऊंगा न किसी को खाने दूंगा का सच कौन नहीं जानता है आपको भी अभी की सी ए जी की रिपोर्ट को देख जान लिया होगा। सत्ता की भूख से बढ़कर कोई हवस नहीं दुनिया में। गागर में सागर भरने जैसे बात कही है थोड़े लिखे को बहुत समझना।

Friday, 15 March 2019

ईमानदार उम्मीदवार की खोज ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

      ईमानदार उम्मीदवार की खोज ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

     चिंताराम जी को चिंता का नामुराद रोग लगा ही रहता है। हर दिन किसी चिंता में डूबे रहते हैं और चिंतन करते रहते हैं। उनका नाम चिंताराम शहर वालों का दिया हुआ है। कभी शहर की बदहाली की कभी सफाई व्यवस्था की कभी शिक्षा की कभी स्वास्थ्य सेवाओं की खराब दशा की कभी पुलिस और अधिकारियों की कथनी और आचरण की तमाम तरह की मुसीबत उनके सर है। सारे जहां का दर्द हमारे जिगर में है। पिछले चुनाव में राजनीति के अपराधीकरण की चिंता में दुबले हुए फिरते थे और कितने दिन इसी जानकारी जुटाने का काम करते रहे कि किस किस नेता पर कितने मुकदमें चल रहे हैं। कितने हैं जिनके गुनाह गंभीर हैं मगर गवाही नहीं मिली तो साबित नहीं हुए और उन्होंने अपनी बेगुनाही और रिहाई का जश्न भी धूमधाम से मनाया और आलाकमान भी उनको क्लीन चिट देकर बहुत खुस हुआ। सरदार खुश हुआ की तरह। जिस  दल को सत्ताधारी दाग़ी लगते रहे चुनाव के समय अपने दल में शामिल कर सारे दाग़ धो डाले तो समझ आया दाग़ अच्छे हैं। कुछ बेकार के बुद्धीजीवी टाइप लोग मिलकर इक संस्था बनाई और अपराधी घोषित नेताओं को जाकर मिल कर इक सभा में आने का बुलावा दे आये सवाल जवाब देने को। नेताओं ने समझाया कि अभी मामला अदालत में है इसलिए कुछ कहना उचित नहीं मगर आप इंतज़ार करें जल्दी ही पाक साफ़ होकर निकलने का भरोसा अदालत पर है। अदालत राजनेताओं को उनकी पसंद का न्याय देने में कभी संकोच नहीं करती जानते हैं चिंताराम जी भी। उसके बाद नेताओं के सहयोगी आये और चेतावनी दे गये इस पचड़े से दूर रहो अन्यथा नेताजी को क्या है इक मुकदमा और सही आपके ऊपर हमले का। पागल हैं फिर भी नहीं समझे और सभा की बात बीच में अटकी रही मगर अपनी धुन के पक्के हैं जो बात दिमाग में घुसी निकलती नहीं है। 

    अपनी समस्या को लेकर चले आये मेरे घर पर , चाय पीते पीते आह भर कर बोले चुपचाप बैठने से क्या होगा। आपको क्या समाज की चिंता नहीं होती है कलम घिसाने से ज़रूरी काम और भी हैं , थोड़ा परेशान लगे। हुआ क्या पूछा तो धमकी मिलने की बात बताई और अख़बार वाले दोस्त भी कन्नी काटने लगे हैं जिस से उनकी चिंता और बढ़ गई थी। हमने बिना कोई विचार किये कह दिया आप कोई और दूसरा तरीका क्यों नहीं अपनाते हैं। बदमाश नेताओं के साथ शराफत की बात करने जाने की जगह किसी शरीफ और ईमानदार नेता के पास जाते और उनको अपनी सभा में बुलाते तो पॉज़िटिव अप्रोच होती। यूं उनको किसी की बात जचती नहीं है मगर मेरी ये बात उनको उचित लगी और उन्होंने तलाश किये कुछ शरीफ और ईमानदार लोग राजनीति की गंदगी में रहते हुए भी बेदाग़ रहने वाले। जब उनको जाकर मिले तो पता चला उन में किसी को भी अपने दल ने टिकट देकर खड़ा किया ही नहीं था। इसके बवजूद भी कुछ उनकी सभा में इस विषय पर बात कहने से बचना चाहते थे इस डर से कि कहीं इसको आलाकमान बगावत नहीं समझ ले। असंतुष्ट भी बाग़ी कहलाने को राज़ी नहीं थे अनुशासनात्मक करवाई की जा सकती है। शरीफ आदमी नेता होकर भी डरपोक रहता है। 
     
  सवाल मुश्किल था क्योंकि चुनाव में खड़े हुए बिना लोग किसी को वोट दे ही नहीं सकते हैं। शरीफ लोग लड़ने से डरते हैं भले बात चुनाव लड़ने की ही हो। अब राजनीति का मतलब विचारों की मतभेद की बात नहीं रही सत्ता की जंग है जिस में जीतने को सब करना जायज़ है। शांति पूर्वक चुनाव लड़ना संभव ही नहीं है। लेकिन उनकी हिम्मत रंग लाई और उन्होंने इक ऐसा नेता खोज ही लिया जो बेदाग़ था ईमानदार और शरीफ होने के बाद भी एक दल ने जिसे टिकट देकर उम्मीदवार बनाया हुआ था। बहुत खुश होकर उनके पास गये चिंताराम जी और निवेदन किया कि बहुत अच्छी बात है जो आप जैसे लोग भी राजनीति में हैं। हमारी संस्था आपको सभा में लोगों से रूबरू करवा कर सम्मानित करना चाहती है। राजनीति के अपराधीकरण पर आपके साथ सवाल जवाब करना चाहती है। उनके सच्चे आश्वासन के बाद सभा की तैयारी में जुट गये। अचानक उनको ख्याल आया पहले उन्होंने जो जो सवाल बना रखे थे वो अपराधी नेताओं से पूछने थे , इस ईमानदार नेता  बुला लिया मगर उनसे सवाल क्या करेंगे ये सोचा ही नहीं। समस्या लेकर मेरे पास चले आये कि अपने सुझाव दिया था अब सवाल भी आप ही बनाओ। मैंने उनकी समस्या का समाधान किया और ये सवाल पूछने को लिखवा दिए। ईमानदार होकर राजनीति में कैसे बने हुए हैं बताओ। पार्टी से टिकट कैसे मिला इसका कोई राज़ है तो बताओ। ईमानदारी से नियम पर चलकर चुनाव जीत कैसे सकेंगे। चुनाव का खर्च कैसे संभव होगा। क्या जनता ने जितवा दिया तो कोई पद मिलने की उम्मीद है और बिना मंत्री बने जनता को किये आश्वासन पूरे कर सकेंगे। जब ये सब सवाल उनको पहले लिखकर देने गए तो उनका कहना था ईमानदारी की बात है मैं इन सवालों के जवाब नहीं दे सकूंगा अतः मुझे क्षमा करें। 
      
उनके घर से निराश होकर लौटते चिंताराम जी को इक उम्मीदवार खुद मिल गए। और कहा चिंताराम जी आपकी समस्या हम जानते हैं और हम जानते हैं आप कब से किसलिए भटकते फिरते हैं। वो ईमानदार नेता हमारी धमकी से डर गए हैं कि अगर आपकी सभा में गये तो उनके ऊपर ऐसा केस बनवा देंगे कि नानी याद आ जाएगी। आप बताओ ऐसे डरपोक क्या करेंगे ईमानदारी और शराफत का। आप हमें बुलाएं और अवसर दें , आपके सभी सवाल हम जानते हैं। कोई केस किसी थाने में दर्ज नहीं हमारे खिलाफ। किसी थानेदार की मज़ाल नहीं कोई रपट भी लिखने की हमारे विरुद्ध। चिन्तराम जी के तैयार सभी सवाल उनकी तेज़ आंधी में उड़ते चले गए और उन्होंने सभा बुलाने का इरादा छोड़ दिया है। आजकल की राजनीती का वाक्य है बेदाग़ ढूंढते रह जाओगे।

Thursday, 14 March 2019

मुझे कैसी सरकार कैसे सांसद विधायक चाहिएं - डॉ लोक सेतिया

 मुझे कैसी सरकार कैसे सांसद विधायक चाहिएं - डॉ लोक सेतिया 

    आज सुबह इक दोस्त का फोन आया मिलकर लोगों को समझाया जाये कैसे व्यक्ति को चुनना चाहिए। अभी शाम को इक और दोस्त ने व्हाट्सएप्प पर पूछा फिर किसको वोट देना चाहिए। जाने क्यों टीवी चैनल अख़बार फेसबुक सोशल मीडिया पर हर कोई सबको समझाना चाहता है किसी पक्ष को समर्थन देने को। पहली बात यही गलत है कि कोई किसी के कहने पर किसी को वोट डाले , सब को खुद विचार करना चाहिए देश और समाज की भलाई किस को वोट देने से मुमकिन है। इसलिए आपको जिसको वोट देना है अपनी मर्ज़ी से देना मेरे या किसी और के कहने से नहीं। आपका चुनाव सही गलत हो सकता है मगर आपकी अपनी सोच से तो हो किसी के कहने से कदापि नहीं। मुझे कैसी सरकार कैसे संसद विधायक पसंद हैं आज इसकी बात करना चाहता हूं। 
           जो संसद या विधायक सरकारी बंगला नहीं कार नहीं कोई विशेषाधिकार और मुफ्त की सुविधा नहीं चाहते हों और देश जनता की सेवा की आड़ में सुख सुविधा शान वीवीआईपी रुतबा नहीं मांगता और हम जैसे आम नागरिक की तरह अपनी खुद की आमदनी से अपने घर में रहकर काम करना चाहता हो। जिनको राजनीति अपना कारोबार या खानदानी धंधा लगता हो उनको वोट देना मुझे पसंद नहीं है किसी की मौत के बाद उसकी बेटी बहु दामाद बेटा पत्नी को उसकी जगह विधायक संसद बनाना सबसे गलत बात है। जब हम खुद उनको विरासत की तरह ये सब देते हैं तो देश के संविधान और लोकतंत्र की अवहेलना करते हैं। जिनका आपराधिक इतिहास है जो गुंडागर्दी और तमाम असामाजिक कार्य करते हैं सरकारी ज़मीन पर कब्ज़े करते हैं और असामजिक तत्वों को सहायता देते हैं उनको वोट देना अर्थात बदमाशी को बुलावा देना होगा। 
       आपको अच्छे सच्चे ईमानदार लोग खुद चुनकर खड़े करने चाहिएं न कि किसी दल के खड़े गलत उम्मीदवार को विवश होकर चुनना चाहिए। आपको वोट मांगने आये व्यक्ति से सवाल करना चाहिए किस तरह की सरकार बनवाने को वचन देते हैं। मुझे ऐसी सरकार पसंद है जिस के लिए देश की जनता को एक समान शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध करवाना सबसे महत्वपूर्ण कार्य और अपना कर्तव्य लगता हो। जीने की बुनियादी सुविधाएं हर नागरिक को एक समान मिलनी चाहिएं। बड़े छोटे अमीर गरीब का जीना मरना बराबर होना चाहिए। करोड़ों लोग बेघर हैं और किसी की समाधि बनाने को कई एकड़ भुमि देना इक अपराध जैसा है। कहने को हम देश की जनता की सेवा करते हैं मगर वास्तव में उनके एक एक मिंट की महंगी कीमत देशवासी चुकाते हैं और बदले में पाते क्या हैं झूठे वादे और घोषणाएं। नफरत की बांटने की जाति धर्म की राजनीति संविधान की भावना के विपरीत है ऐसी राजनीति ने ही देश को बदहाली से निकलने नहीं दिया है। आपको सामने दिखाई देता है हर उम्मीदवार कितना पैसा चुनाव आयोग के नियम को दरकिनार कर खर्च करता है फिर जिस को कानून नियम तोड़ने में संकोच नहीं उसी को वोट देकर कैसे आशा की जा सकती है देश के संविधान की पालना करने की। उनकी कथनी नहीं उनके वास्तविक आचरण को देखकर अपना वोट देना चाहिए। सबसे पहली बात जिसको चुनना है क्या वो खुद अपने विचार निडरता से रखने को शपथ देता है और किसी भी अन्य नेता या दल की उचित अनुचित हर बात को ख़ामोशी से मानने वाला इक कठपुतली बनकर अपने स्वार्थ सिद्ध करना चाहता है। अपनी विचारों की अभ्व्यक्ति की आज़ादी की चिंता नहीं करता हो जो भी उसको आपकी आज़ादी और अधिकार की चिंता कैसे होना मुमकिन है।

       किया क्या करना क्या चाहिए और देश की तस्वीर बदल सकती कैसे है 

       कहने को तमाम बातें हैं मगर अभी तक जो होता आया है पहले जो भी थे उनकी आलोचना करना और उसके बाद खुद वही सब करना भी ऐसा करने से हासिल क्या हुआ। देशभक्त होने का तमगा लगाना आसान है देशभक्त होना चाहता कोई नहीं है। सत्ता पाना ही अगर ध्येय बन गया है तो ऐसी राजनीति को किसी कूड़ेदान में फैंकना बेहतर है वास्तविक मकसद सत्ता मिलने पर देश की हालत सुधारना है। आपको तो देश भी सड़क भवन पुल जैसी बेजान चीज़ें लगती हैं जबकि देश वास्तव में सवा सौ करोड़ लोग हैं जिनकी आप उपेक्षा करते हैं। ये अहंकार से कहना मैंने मेरी सरकार ने अमुक अमुक कार्य किये हैं कितना उचित है , अपने आकर अपनी कमाई अपनी मेहनत से कोई तिनका भी नहीं तोड़ा है अपने जनता के धन को जनता की मेहनत से उसी के पसीने से सड़क भवन बनवा अपना नाम लिखवा कितना गलत किया है। कोई राजा महाराजा नहीं जिसने अपने खज़ाने से कोई विकास किया है। सत्ता का मतलब अधिकार मानने की बजाय अगर कर्तव्य समझते तो बात और होती वास्तव में। हर जनसेवक अधिकारी को अपने दफ्तर में बैठ जनता की समस्याओं को समझना और हल करना चाहिए मगर जिस देश के प्रधानमंत्री अपने फ़र्ज़ को समझ दफ्तर जाने की ज़हमत नहीं उठाते और पांच साल इधर उधर सत्ता का विस्तार और भाषण देना सैर सपाटे मनोरंजन करना अपनी इच्छाओं की पूर्ति करने में व्यस्त रहते हैं देश संविधान की उपेक्षा करने का काम करते हैं। ये कैसा आज़ाद देश है जिस में कोई मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री या कोई बड़ा राजनेता अधिकारी पुलिस न्यायालय का न्यायधीश आता जाता है तो इक काफिला साथ चलता है सड़क रोकते हुए आम नागरिक को बाधा देते हुए। अपने कारण बाकी लोगों को असुविधा होना कोई नियम कानून नहीं हो सकता और जो अधिकार आपको बाकी जनता के अधिकारों का हनन करने के बाद मिलता है वो खुद अन्याय है जबकि अपने कसम खाई थी संविधान की न्याय करने की। 
        देश की जनता का धन खून पसीने की गाढ़ी कमाई को अपने ऐशो आराम पर बर्बाद करना देशभक्ति नहीं गुनाह कहला सकता है। कितनी अजीब बात है हर दिन आपकी मीटिंगस सजे धजे हाल में मेज़ पर तमाम खाने पीने का सामान और दिखावे की औपचारिकता पर पैसा समय संसाधन बर्बाद किये जाते हैं मगर असल में ऐसी बैठकों का कोई औचित्य ही नहीं होता है। हर शहर के अधिकारी हर दिन बैठकों में करते क्या हैं कोई जाकर देखेगा तो सर पीट लेगा ये समझ कि कोई मतलब की बात नहीं थी। जितना समय चाय पकोड़े और बेमतलब की गप शप में लगाते हैं उस का उपयोग जनता की बात समझने में लगाते तो काम भी होता। काम करना नहीं मगर काम करते हैं इसका दावा और दिखावा करना कर्तव्य के साथ छल ही तो है। कोई भी अधिकारी अपने फ़र्ज़ को दरकिनार कर रोज़ किसी संस्था की सभा में अपनी शोभा बढ़ाने को और कुछ ख़ास लोगों की तरफदारी करने को जाता है तो अनुचित है। ये आपका कार्य नहीं है किसी जाति वर्ग धर्म का पक्ष नहीं सबको बराबर मानना आपका कर्तव्य होना चाहिए। अपने जो किया उसकी इश्तिहार की ज़रूरत नहीं है सबको सामने दिखाई देना चाहिए क्या हुआ है। साल होने के सरकारी इश्तिहार क्या मतलब रखते हैं राजनेताओं को अपने गुणगान की लत लग गई है जो कोई भली बात नहीं है। कोई भी राजनेता मसीहा कदापि नहीं होता है। अपने स्वार्थ को सत्ता का दुरुपयोग करना जैसे आदत बन गई है और ऐसा करते कोई शर्म या अपराधबोध नहीं होता है। इस से बढ़कर बेशर्मी क्या होगी जब कोई नेता अधिकारियों की सभा में अपने दल के लोगों की बात मानने को निर्देश देता है। देश की सेवा करते हैं सरकारी अफ़्सर कर्मचारी न कि किसी राजनेता की जीहज़ूरी और चाटुकारिता करने को उनको नियुक्त किया गया है। जनता पर कानून की तलवार मगर ख़ास लोगों को मनमानी की छूट देना खुद पुलिस और विभागीय अधिकारी का अपराधी बनना है। जो गलत चलता रहा है चलते रहना ठीक नहीं है उसको बदलना होगा। सरकार बदलने से कुछ नहीं होगा अब सरकारी तौर तरीके बदलने होंगे और ऐसा नेता अधिकारी खुद करेंगे नहीं लगता है। जनता को जागरुक होकर अपने अधिकार मांगने और छीनने होंगे उनकी खैरात नहीं मांगनी है। 
        संविधान किसी दलीय व्यवस्था की बात नहीं करता है और ऐसा नियम बनाना कि राजनैतिक दलों को मिलने वाले चंदे देश से या विदेश से का कोई हिसाब नहीं पूछ सकता बताता है वास्तविक समस्या चोर की दाढ़ी में तिनका नहीं शहतीर छुपा है। हर नेता चंदा लेकर देने वाले को कई गुणा फायदा देने का काम करता है वो भी अपनी जेब से नहीं देश की जनता की कमाई किसी कारोबारी को देकर। ये लूट की खुली कहानी है जिसका अंत होना ज़रूरी है। बातें बहुत हैं मगर आखिर में बात घोटालों की , देश का अभी तक का सबसे बड़ा घोटाला सरकारी इश्तिहार के विज्ञापन हैं जिनसे अख़बार टीवी चैनल मालामाल हैं तभी खामोश हैं। ऐसे विज्ञापन कोई देश की जनता की भलाई नहीं करते केवल लूट का हिस्सा पाकर झूठ को सच बनाते हैं। केवल जनता को उनके अधिकारों की जानकारी या किस तरह अपने साथ अनुचित होने को रोकना है जैसे विषय के इश्तिहार छपने चाहिएं और ऐसा कानून बनाया जा सकता है कि जनहित की ऐसी बात छापना और दिखाना अख़बार टीवी वालों को ज़रूरी हो बिना कोई शुल्क लिए  क्योंकि उनको जितने अधिकार मिलते हैं ये उसी का अंग है। सबसे अच्छी बात इस से मीडिया की निष्पक्षता फिर से बहाल हो सकती है जो आज कहीं बची नहीं है।

Wednesday, 13 March 2019

पत्थर के खुदा पत्थर के सनम पत्थर के ही इंसां पाये हैं - डॉ लोक सेतिया

  पत्थर के खुदा पत्थर के सनम पत्थर के ही इंसां पाये हैं -

                                  डॉ लोक सेतिया

पत्थर के खुदा पत्थर के सनम पत्थर के ही इंसां पाये हैं

तुम शहरे मुहब्बत कहते हो हम जान बचा कर आये हैं

होटों पे तब्बुसम हल्का सा आंखों में नमी सी ए काफिर

हम अहले मुहब्बत पर अक्सर  ऐसे भी ज़माने आये हैं। 

हम सोच रहे हैं मुद्दत से अब उम्र गुज़ारें भी तो कहां

सहरा में ख़ुशी के फूल नहीं शहरों में ग़मों के साये हैं। 

तुम शहरे मुहब्बत कहते हो हम जान बचा कर आये हैं 

पत्थर के खुदा पत्थर के सनम पत्थर के ही इंसां पाये हैं। 

   जगजीत सिंह की गाई ग़ज़ल है। आदमी में भावना होती हैं सुख दुःख का एहसास होता है मानवीय संवेदना रहती है। जब ये सब नहीं बचता तो आदमी पत्थर बन जाता है। पत्थर घायल करता है तो कसूर उसका नहीं किसी इंसान का होता है जो किसी पर पत्थर फैंकता है। जब लोग घायल होते देख कर दर्द नहीं महसूस करते और उसे देखने का आनंद लेने लगते हैं तब उनकी इंसानियत मर जाती है और उनके भीतर का शैतान जग उठता है। जिनको किसी को दर्द देना अच्छा लगता है वो इंसान हैवान बन जाते हैं और शैतान खुश होता है। सत्ता ताकत अधिकार दौलत मिलने से अगर आदमी इंसानियत खोकर हैवानियत करने को जायज़ समझने लगता है तब दुनिया का भला नहीं होता बर्बादी होती है। ये जो कायदे कानून लोगों ने अपनी सुविधा से बना लिए हैं अगर उनसे सदभावना और भाईचारा नहीं नफरत दहश्त का माहौल बनता है तो उनको बदलना होगा। ये किस युग की बात है कि कोई धर्म की किताब में ढोल पशु गंवार और नारी को एक समान बताकर ताड़न का अधिकारी बताता है ऐसी किताब को किसी समंदर में फैंक देना उचित होगा। 
     सत्ता पद पाकर मानव कल्याण करने की बात समझने की जगह जब लोग नेता अधिकारी बनकर तलवार की तरह ज़ख्म देने लगते हैं तो इसे उन्नति नहीं अवनति कहना होगा। वोट पाने को रिश्वत लेने को मनमानी करना व्यवस्था नहीं कायम करता है। किसी शायर का शेर है :-

           हमने ये बात बज़ुर्गों से सुनी है यारो , ज़ुल्म ढायेगी तो सरकार भी गिर जायेगी। 

  अपनी वहशत को अधिकार नहीं समझना चाहिए और आपके नहीं समाज के नियम बदलते रहते हैं। जो कानून जो नियम न्याय नहीं अत्याचार करते हैं उनको लागू करना अमानवीय अपराध है। शासक अपनी मर्ज़ी से नियम बनाते हैं और कुदरत का एक ही नियम है खुद भी इंसान बनकर जियो और सबको जीने दो। अगर कभी इतिहास को समझोगे तो ज़ालिम को नहीं रहमदिल शासक को लोग महान मानते हैं। सत्ता से मिले अधिकार अन्याय करने को कदापि नहीं हैं। बेशक कोई स्वर्ग नर्क है या नहीं कोई नहीं जानता कगर मेरा अनुभव है अपने कर्मों अपकर्मों का हिसाब इसी जीवन में चुक्ता करना पड़ता है। किसी बेबस की बद्दुआ या आंसू कभी व्यर्थ नहीं जाते हैं और बड़े बड़े ताकतवर और धनवान ही नहीं खुद को महान शासक समझने वालों का अंजाम और अंत विनाशकारी होता है। आदमी की सब से बड़ी भूल यही है कि सामने देखते हुए भी सोचता है मेरे साथ ऐसा नहीं हो सकता कभी। मगर आखिर ऊपर वाले का या कुदरत का नियम कायम रहता है और बबूल बोन वाले को कांटे मिलना लाज़मी है।



Tuesday, 12 March 2019

ताकि सनद रहे ( मेरे देश की पुलिस और उसके कानून ) डॉ लोक सेतिया

        ताकि सनद रहे ( मेरे देश की पुलिस और उसके कानून ) 

                                         डॉ लोक सेतिया 

  चलो इसी बहाने कई पुरानी बातें याद आईं। अपने देश में सरकार शासन करने को होती है देश की दशा बदलना उनका काम नहीं। अधिकारी शासक वर्ग की जीहज़ूरी करने और शान आन बान कायम रखने को होते हैं जनहित इनकी डायरी में नहीं लिखा होता है। पुलिस उसी ज़माने की सोच रखती है जब देश गुलाम था और राज करने को पुलिस डर दहशत का नाम था। मगर अपना जन्म आज़ाद भारत में हुआ और हमने जो स्कूल कॉलेज में शिक्षा में पढ़ा वो सच नहीं है आज तक भी। कोई किस्से कहानी सुनी सुनाई बात नहीं हर घटना खुद देखी झेली जानी है। बात 1980 से शुरू करता हूं। 
     दिल्ली में रहता था और तिलकनगर थाने का एरिया था हरिनगर जी आठ के फ्लैट्स। थोड़ा हैरान हो सकते हैं जानकर कि उन दिनों किरन बेदी पुलिस की ए सी पी थी और उनका ब्यान आया करता था जनता उन से दिन में 11 बजे से 1 बजे तक खुद आकर मिल सकती है। हम फ्लैट्स के वासी परेशान थे इक व्यक्ति अवैध रूप से शराब बेचता था इक फ्लैट में कोका कोला की बोतल में शराब मिलती थी और शाम को शराबी पीकर पड़े रहते थे उसके सामने चौक में। समझाने पर उसका कहना था पुलिस की मिलीभगत है यूं भी वह वास्तव में सरकारी विभाग में नौकरी करता था और शराब बेचने का धंधा उसकी पत्नी भी चलाती थी और एक नहीं दो जगह उसका काम था। एसोसिएशन के कहने पर मैंने किरन बेदी जी को समस्या लिखी डाक से चिट्ठी भेजकर। मुझे दिन और समय दिया आकर मिलने को। मगर जब गया मिलने तो बात करने को फुर्सत नहीं थी और जिस पुलिस वाले की शह पर शराब का धंधा चलता था मुझे उसी से बात करने को बोल दिया था। समय देकर बुलाना क्या था वास्तव में मेरे जाने से पहले शराब बेचने वाला और पुलिस वाला उनसे मिल चुके थे और मुझे देख कर मुस्कुरा रहे थे। बहुत समय लगता है समझने में कि थाने में कानून की हैसियत क्या होती है। 
          अगली घटना 1994 की है हम मॉडल टाउन के डॉक्टर यहां झौपड़ियों में चलते देह के कारोबार और शराब एवं अन्य गलत धंधे देख परेशान थे। बड़े बड़े डॉक्टर्स मिलकर अधिकारी से शिकायत करने गए थे मगर इक बच्चों के डॉक्टर के अस्पताल के कर्मचारी को इक झौपड़ी वाली ने कहा था उनको पुलिस खुद ले जाती है जब भी किसी को खुश करना हो और कोई हटवा नहीं सकता है। हुआ भी यही था। 
      ऐसी घटनाएं होती रहीं फिर भी कोई समस्या हो मज़बूरी में थाने जाना पड़ता है। अभी पिछले कुछ सालों की एक दो घटनाओं की बात करता हूं। स्वच्छ भारत अभियान की बात पर मेरे निवास के सामने पपीहा पार्क के भीतर जाने के मार्ग को रोककर चंडीगढ़ से आये अधिकारी भाषण दे रहे थे। बहुत बढ़िया सफाई की बात हो रही थी और जैसे भाषण खत्म हुआ मैंने हाथ उठाया बात कहने को। कहिये उनका कहना था और मैंने ये शब्द बोले थे अभी आपको जो बताया दिखाया गया सब झूठ है चलो सामने यहीं आपको गंदगी के ढेर दिखलाता हूं। 65 साल का आदमी कोई लाठी हाथ में नहीं थी मगर पुलिस वाले चार लोग मुझे पकड़ खींच कर सभा से दूर ले गये ज़बरदस्ती। अधिकारी और नगरपरिषद के लोग मुझे जानते थे खामोश देखते रहे। मैंने अगले दिन इक खत भेजा था पीएमओ को मोदी जी से सवाल करता हुआ। लिखा था 25 जून 1975 को जेपी जी का भाषण सुनने गया था मैं जिस में उन्होंने सुरक्षा बलों से निवेदन किया था शांति पूर्वक विरोध करने वाले लोगों पर बल उपयोग नहीं करने का। उसी बात को बहाना बनाकर आपात्काल घोषित किया गया था। मेरा सवाल था क्या आप जेपी जी की बात को गलत मानते हैं और आपात्काल लगाना उचित था और अगर उनकी बात सही और आपत्काल गलत था तो जो मेरे साथ हुआ उसको उचित नहीं ठहरा सकते। कुछ दिन बाद इक पुलिस के अधिकारी पीएमओ से भेजे खत को लेकर मेरे पास आये थे। क्या करना है इस का मुझसे पूछने लगे। मैंने घटना बताई तो कहने लगे हुआ तो गलत था मगर मालूम नहीं किस किस की डुयटी लगी हुई थी , मैंने कहा अपने रिकॉर्ड में देख सकते हैं। मगर उनको नहीं मालूम था न्याय किसे कैसे देना है और थोड़े दिन बाद मामला खत्म करने को इक ब्यान लिखवा लिया था ये कहकर कि उनकी तरफ से मैं माफ़ी चाहता हूं। 
      ऐसी घटनाएं होती रहती हैं खुद पुलिस जब जिस जगह मर्ज़ी कोई आयोजन करती रहती है उनको किसी से अनुमति नहीं लेनी। सड़क रोकनी है पार्क में शोर करना हो जैसे भी उनकी मर्ज़ी है। आपको सीएम की सभा में जाना है काले कपड़े क्या जुराब स्वेटर नहीं पहन कर जा सकते है। ये किस संविधान की किस कानून की किताब में लिखा है कोई नहीं जनता है। मुझे जाना भी नहीं पड़ा मगर जब भी सीएम आते हैं रास्ते सड़क सब बंद उनके लिए जाने ये सुरक्षा का मामला है या वीवीआईपी होने का ऐलान। दो साल पहले की बात है मुझे इक साहित्य के कार्यकर्म में भाग लेने सिरसा जाना था। बस स्टैंड पर पांच पुलिस वाले खड़े थे मुझे कहा कि उनको नई बनी अनाजमंडी तक लिफ्ट मिल सकती है और मैंने उनको लिफ्ट दी थी सभा स्थल पर छोड़ दिया था। दोपहर को वापस आते हुए बाईपास के पुल पर फतेहाबाद आने का सड़क का रास्ता रोक वही पुलिस वाले खड़े मिले मुझे बताया सीएम को जाना है इसलिए आम लोग नहीं जा सकते इधर से और मुझे करीब आठ दस किलोमीटर का लंबा रास्ता तय कर घर आना पड़ा था। शायद इस देश की यही विडंबना है कि नियम कानून सरकार पुलिस अधिकारी पर लागू नहीं होते बल्कि उनकी नियम कनून और समानता की बात में रत्ती भर आस्था नहीं होती है। जो नियम आपको समझाते हैं उनको शायद इसका पता नहीं कि नियम जनता की सुविधा और व्यवस्था कायम रखने को बनाये हुए है जनता को परेशान करने को या दहशत कायम रखने को नहीं और देश के किसी कानून की किसी किताब में कोई कानून नहीं लिखा हुआ कि नेताओं का कोई विशेषाधिकार होगा सड़कों रास्तों पार्कों और सरकारी इमारतों पर। आखिर में मेरी पहली कविता। 

पढ़ कर रोज़ खबर कोई ( बेचैनी )- लोक सेतिया "तनहा"

पढ़ कर रोज़ खबर कोई ,
मन फिर हो जाता है उदास।

कब अन्याय का होगा अंत ,
न्याय की होगी पूरी आस।

कब ये थमेंगी गर्म हवाएं ,
आएगा जाने कब मधुमास।

कब होंगे सब लोग समान ,
आम हैं कुछ तो कुछ हैं खास।

चुनकर ऊपर भेजा जिन्हें ,
फिर वो न आए हमारे पास।

सरकारों को बदल देखा ,
हमको न कोई आई रास।

जिसपर भी विश्वास किया ,
उसने ही तोड़ा है विश्वास।

बन गए चोरों और ठगों के ,
सत्ता के गलियारे दास।

कैसी आई ये आज़ादी ,
जनता काट रही बनवास। 

Monday, 11 March 2019

जीवन का अर्थ संक्षेप का विस्तार ( चिंतन बेला ) डॉ लोक सेतिया

  जीवन का अर्थ संक्षेप का विस्तार ( चिंतन बेला ) डॉ लोक सेतिया 

   हर कोई चाहता है जल्दी से समझना , लंबी बात पढ़ने को फुर्सत नहीं है। पढ़ने के बाद विचार नहीं करना बस पसंद करना तक की बात है। दो लफ़्ज़ों की कहानी भी इतनी छोटी नहीं होती है। जाने कैसी पढ़ाई की है कि पढ़ना अच्छा नहीं लगता , हर कोई बोलना चाहता है सुनता कोई भी नहीं। मुझे कहते हैं लिखा तो सबको भेजने की ज़रूरत क्या है नहीं पढ़ता कोई विस्तार से इतनी लंबी बात। शब्द क्या है मन की भावना को इक आवाज़ देने का उपाय भीतर कुछ है बाहर आना चाहता है लब पर आते हैं शब्द तभी अर्थ समझता है सुनने वाला और शब्द सार्थक हो जाते हैं। किसी से कहना नहीं कोई जानेगा नहीं समझेगा नहीं तो लिखना किस काम का। जीवन में सबसे पहले खुद को समझना है फिर पाना है अपने आप को अपने अस्तित्व को जानकर। भगवान खुदा की बात उसके बाद की बात है मगर दुनिया के बहकावे में हम विपरीत दिशा को जाने लगे हैं। आज थोड़ा विस्तार से फिर भी कम शब्दों में संक्षेप से तमाम बातों की चर्चा करते हैं। सिलसिलेवार इक इक को लेकर चिंतन करते हैं। 

राजनीति समाज और साहित्य :-

इनको अलग नहीं किया जा सकता है। राजनीति का पहला मकसद नीति की बात को समझना है मगर आजकल नीति की कोई बात ही नहीं करता। जिसको आप राजनीति समझते हैं वो वास्तव में किसी का या शायद सभी का इक सत्ता की सुंदरी पर आसक्त होना है। वासना में जब आकर्षण से बंधे किसी के पांव छूने चाटने लगते हैं तब मुहब्बत की प्यार की बात नहीं कुत्सिक मानसिकता की बात होती है। आजकल राजनीति सत्ता पाने का मार्ग बनकर रह गई है सत्ता पाकर देश समाज की दशा बदलने की बात छूट गई है। साहित्य अख़बार अथवा आधुनिक परिवेश में मीडिया टीवी चैनल वास्तव में किसी दर्पण की तरह होने चाहिएं। और आईने का अपना कोई अस्तित्व नहीं होता है उसको समाज की छवि को सामने लाना होता है। मगर यहां आईना खुद को तस्वीर समझने लगा है और वास्तविकता को नहीं देखता न दिखलाना चाहता है। फिर ये आईना किस काम का है , जब कोई दर्पण सच नहीं झूठी तस्वीर बनाकर दिखाने लगे तो उसको हटवा देना उचित है। ऐसे आईने को तोड़ना अच्छा है। जो चिंतक विचार बनकर राह दिखलाते थे समाज और राजनीति के आगे चलते थे मार्ग दिखलाते थे आज सत्ता और स्वार्थ की राजनीति के पीछे भागते हुए पागल होकर अपने मकसद से भटक गये हैं। हम यही कर सकते हैं कि इनको कोई महत्व नहीं देकर इनके पतन को ऊंचाई समझना छोड़ नकार दें। ये खुद ब खुद मिट जाएंगे अपनी नियति को पाकर। कोई इनकी दूषित सोच को सही नहीं कर सकता है इस तालाब का सारा पानी गंदा है इसको बदलना होगा तालाब को खाली कर नया साफ पानी डालना होगा। 

मुहब्बत रिश्ते नारी पुरुष संबंध :-

ये जो नदी है आपको लगता है बहती जाती है और अपने समंदर से मिलती है। मगर नदी क्या है नदी दो किनारों का नाम है जो कहीं नहीं चलते उसी जगह रहते हैं आमने सामने दो आशिक़ साथ भी और फासले को निभाते हुए भी। कोई पुल इन किनारों को जोड़ता है मगर मिलवाता नहीं है बस इस किनारे से उस किनारे कोई आता जाता है। जैसे कोई डाकिया किसी खत को आदान प्रदान करता है। बहता पानी है दोनों के बीच में और राह में कोई प्यास बुझाता है कोई मैल धोता है कोई मछली पकड़ता है कोई डुबकी लगाता है कोई तैरता है कोई डूब कर फिर उभरता नहीं है। पानी के साथ बहते बहते जाने क्या क्या अपनी मंज़िल की तलाश में बहता हुआ किसी जगह जा पहुंचता है। समंदर तक जाते जाते पानी जीवन का आखिरी पल समंदर से मिलने से नहीं उस में विलीन होने पर खो देता है। समंदर की गहराई आशिक़ के भीतर की घुटन को छुपाने को होती है और हम बाहर खड़े उसकी लहरों को देख समझते हैं थाह पा ली है। समंदर की ख़ामोशी को कोई हवा तोड़ने का काम करती है थोड़ी देर को तूफ़ान बनकर मगर तूफ़ान गुज़र जाता है हवाएं थम जाती हैं और समंदर खामोश ही रहता है। उसके भीतर की आवाज़ का कोई शोर नहीं होता है उसकी गहराई बहुत कुछ छुपाये रखती है। नदी का सफर पर्वत से समंदर तक धरती का सफर है पानी की धारा जीवन में मधुर संबंध प्यार रिश्ते नाते की तरह है जिसको समझे बिना हम कोई अनुभव नहीं हासिल कर सकते हैं। प्यार की मुहब्बत की भावना की धारा हमारे भीतर बहती नहीं है और स्वार्थ की अपने मतलब हासिल करने की भावना दुश्मनी और नफरत का ज़हर भरा रहता है जिस से हम जीते हैं मगर जीवन नहीं होता है। 

आज विराम देते हैं अभी कितने विषय बाकी हैं फिर कभी सही।


Sunday, 10 March 2019

रामायण महाभारत अच्छे दिन की ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

    रामायण महाभारत अच्छे दिन की ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

   शासक को फिर कोई गीता रामायण महाभारत की तरह अच्छे दिन की कथा पढ़कर सुना रहा है। पिछले चुनाव में इसी का पाठ करने से वरदान मिला था बहुमत का। अभी तक लोग संशय में हैं कि अच्छे दिन क्या बला हैं क्या वास्तव में होते हैं अच्छे दिन क्या सच में अच्छे दिन आने वाले थे आये थे और अगर आये थे तो किस को मिले थे कितनों को इक जुमला लगता है और कई इसको इक वहम मानते हैं जैसे भूत होते नहीं हैं मन का डर होता है उसी तरह अच्छे दिन नहीं होते दिल की ख़ुशी को इक ख़्वाब देखते हैं। मुझे पंडित जी हर साल कुंडली देख अच्छे भाग्य जल्द आने का भरोसा देते रहे और इसी में 67 साल उम्मीद पर बिता दिये। अभी भी अच्छे दिन की राह देखते रहते हैं हम। 

        संजय उवाच , राजन आपकी तिजोरी से अच्छे दिन मिले हैं इस किताब के नीचे रखे हुए थे। गिनती की है तो पाया है बहुत थोड़े बचे हैं लगता है किसी विपक्षी दल वाले की नज़र पड़ गई थी जिसने चुपके से चुरा लिए हैं। शासक हंस दिये बोले भला मेरी तिजोरी कोई सरकारी दफ्तर है जिस से कोई सुरक्षा के दस्तावेज़ चुरा ले जाये , कोई चोरी नहीं हुई है सब चौकीदारी का कमाल है। अधिकतर अच्छे दिन मैंने खुद अपने लिए उपयोग किये हैं और पांच साल अच्छे नहीं कमाल के दिन का लुत्फ़ उठाता रहा हूं कभी कभी कुछ अच्छे दिन मैंने अपने ख़ास लोगों को उपहार की तरह बांटे हैं। मेरे दल की सरकार कितने राज्यों में बनवाई है और उन की बागडोर बस ख़ास अपने और संघ के लोगों के हाथ देकर अच्छे दिन दिखलाने का काम किया है। कितने ऐसे हैं जो सपने में कुर्सी नहीं देख सकते थे खाट भी नहीं नसीब होती थी मेरी मेहरबानी से सत्तासीन हैं। जिनकी किस्मत में अच्छे दिन थे वो सब मेरे दल में शामिल होते रहे हैं। गंगा स्नान की तरह भाजपा में आकर चोर और दाग़ी भी देशगभक्त और पाक साफ़ बन गये हैं।

   संजय उवाच , राजन क्या इस बार भी अच्छे दिन आने वाले हैं का नारा उपयोग करना है या फिर अच्छे दिन आये भी गये भी की बात की जा सकती है। शासक बोले तुम अच्छे दिन आने वाले हैं वाला अध्याय किताब से निकाल ही दो ताकि किसी को याद नहीं आये। अच्छे दिन की परिभाषा बदल चुकी है और लोग इस शब्द को सुनते ही घबराने लगते हैं। सब चाहते हैं अच्छे दिन अब फिर से वापस नहीं आने पाएं , हमने भी अब अच्छे दिन की चर्चा छोड़ दी है काला धन की बात भूल गये हैं देश की बदहाली सत्ता की मनमानी और अपनों को अंधे का रेवड़ियां बांटना भी विषय नहीं है। नफरत उन्माद को बदले ढंग से कोई अच्छा सा नाम  देशभक्ति जैसा देकर भीड़ को जोश में होश खोकर पागल बनने का उपाय करना है। काठ की हांडी इक बार चढ़ती है अच्छे दिन की बात फिर कोई काम नहीं आने वाली है। अच्छे दिन टीवी चैनल वालों को मिलते रहे हैं आगे भी मिलते रहेंगे इसका उपाय किया हुआ है बेशक कोई भी सत्ता पर काबिज़ हो। धर्म वालों को कभी बुरे दिन नहीं दिखाई दिये और बड़े बड़े उद्योगपति खिलाड़ी अभिनेता वीवीआईपी लोग हमेशा से अच्छे दिन का मज़ा लेते हैं। राजनेता किसी भी दल के हों उनके दिन अच्छे नहीं भी हों तब भी जनता की तरह खराब नहीं होते हैं कभी भी। अच्छे दिन की बात उस गठबंधन की तरह है जो आजकल इक टीवी सीरियल में पुलिस और गुंडागर्दी करने वालों के बीच होता है। असली प्यार यही है तकरार भी मुहब्बत भी साथ साथ। अच्छे दिनों की बात इक राज़ की बात थी उसको राज़ ही रहने दो। वापस रख देना तिजोरी में कभी ज़रूरत होगी तो बची पूंजी की तरह बुरे वक़्त काम आएंगे। ठीक है राजन इनको ख़ास आपके लिए रखने का उपाय करते हैं। 
         बात करते करते दोनों को नींद आ गई और फिर सपने में जय जयकार सुनाई देने लगा है।

 

Friday, 8 March 2019

हम पुरुष नहीं महिला होते ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया - महिला दिवस पर विशेष चर्चा

  हम पुरुष नहीं महिला होते ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

                                  महिला दिवस पर विशेष चर्चा

       आज का विषय गंभीर है फिर भी इसकी बात हल्के फुल्के ढंग से ही करनी होगी। जैसे कोई अधिकारी तबादला होने पर विचार करता है अब तो मुझे शहर की तस्वीर बदलनी थी। अब पछताए क्या होत जब चिड़िया चुग गई खेत जैसी बात होती है। सरकार की हालत भी यही होती है तभी हाथ जोड़ती है पांव पकड़ने से धोने तक सब करती है ताकि जो करना था अभी तो करने को तैयारी की थी पांच साल और चाहिएं सत्ता के नशे में वक़्त बीत जाता है पता ही नहीं चलता । बस पांच साल का सवाल है बाबा झोली खाली होने को है। दाता एक राम है भिखारी सारी दुनिया। जीवन का चौथा पहर ढलती काया बुलावे की बेला वापस जाने की घड़ी कभी भी आने को है तब आज ये ख्याल आया कि सोच विचार किया जाये हम पुरुष बनकर नहीं नारी बनकर दुनिया में आये होते तो क्या क्या मिलता जो खोया है और क्या है जो पुरुष बनकर पाया और नहीं मिलता महिला होने पर। आपने ठीक समझा अपनी मर्ज़ी से कहां पुरुष बने या नारी रूप पा सकते थे। पागलपन है उल्टी-सीधी बात करना मगर पागलपन का अपना ही लुत्फ़ होता है। पागल खुद को जो मर्ज़ी समझ सकता है और पागलपन का ईलाज करने वाला डॉक्टर उसकी हां में हां मिलाकर ही उसको ठीक करता है। आप भी थोड़ी देर को मेरी चर्चा में उसी तरह शामिल हो जाओ और सोचो आप अगर पुरुष हो तो नारी और अगर महिला हैं तो पुरुष होकर क्या होता। कभी रामलीला में पुरुष ही नारी बनकर अभिनय किया करते थे और फिल्मों में भी शुरआत इसी तरह हुई थी। कॉमेडी शो में कितने ही पुरुष महिला बनकर मनोरंजन के नाम पर अश्लील हरकतें करते हैं कमाई करने को। कुछ अभिनय करने वाले महिला बनकर कमाल का अभिनय करते हैं महिला देख कर दांतों तले उंगली दबाने को विवश हो सकती हैं।

 आजकल बड़े नेता लोग भाषण देते हैं तो इक जादू सा छाने लगता है और भाषण सुनने वालों को दुनिया सपनों सी सुंदर लगने लगती है। जो हुआ नहीं दिखाई देता है जो किया नहीं सब भूल जाते हैं। जादूगर का खेल घंटे दो घंटे तक असर रखता है भाषण का असर सोच समझ को सालों तक भटकाये रहता है। आप पर मेरे जादू का असर छाने लगा है और आपकी कल्पना वही करने लगी है। महिला होता तो बन संवर कर घर से निकलता और इठलाता कि हर नज़र मुझी को देखने को बेताब है। सूरत जैसी भी हो हर लड़की किसी न किसी को बेहद सुंदर लगती है अपनी जवानी में। नखरे उठाने को लोग तैयार मिलते और चाल बाल चुनरी और आंखों से लेकर अंग अंग तक बिजली गिराते लगते। पढ़ने लिखने में अध्यापक से लेकर सहपाठी तक खुद सहायक बनने की बात करते। मन ही मन हंसती उनकी नीयत को डगमगाते देखती बचती चलती अपनी डगर पर। समझदार चालाक समझने वाले पुरुष बुद्धू ही नहीं काठ के उल्लू होते हैं। महिला होने पर इक डर को छोड़कर बाकी सब बढ़िया है। अपनी सुरक्षा कोई मुश्किल भी नहीं अगर संभल कर चलना आता हो तो और खतरे महिला को ही नहीं पुरुष को भी होते हैं पग पग पर। मगर महिला होने पर आपको नौकरी मिलने और तरक्की मिलने से लेकर ईनाम पुरूस्कार शोहरत सब आसानी से हासिल होते हैं। इक नज़र इक मीठी मुस्कान से लोग आपको आसमान पर पहुंचा सकते हैं। तीर तलवार की चाक़ू छुरी की ज़रूरत ही नहीं लोग इशारे पर ज़ख़्मी घायल मरने को उतावले हैं। महिला को पहनने को क्या क्या नहीं है पुरुष को धोती कुर्ता और पैंट कमीज़ को छोड़ बाकी सब उसकी नकल ही है। बिंदी चूड़ी हज़ार शृंगार के आभूषण महिला की सुंदरता को चार चांद लगाने को हैं। महिला को लाख बुरा और बेवफ़ा कहने के बाद भी हर कोई उसी की मुहब्बत के गीत गाता है या फिर विरह के दर्द भरे नग्में। नारी की अपनी कथा मिल सकती है इतिहास में धार्मिक किताबों में मगर बगैर महिला इंसान तो इंसान भगवान देवता तक की कोई कहानी नहीं मिलती। न जाने क्यों महिलाओं ने खुद को पुरुष से बराबरी की बात करनी शुरू की है जबकि वास्तव में नारी हर बात में नर से बढ़कर है। कोई है जिसको नारी ने जन्म नहीं दिया हो वो चाहे राजा हो या रंक हो जन्मदाती महिला ही है। सच कहा जाये तो इसका विवरण करना अपने बस की बात नहीं है। सरकार और समाज महिलाओं के लिए तमाम तरह से आरक्षण आदि की व्यवस्था करते हैं। महिला होना सहानुपति पाने का बिना मांगे हक देता है। शर्म नहीं आती बेचारी अबला नारी को परेशान करते , कैसे पुरुष हैं आप। आगे इस बात की चर्चा होगी कि अगर मैं सच महिला पैदा होता तो क्या जो मिला खो सकता था। 
    लड़की होने पर मुमकिन है पढ़ाई भी स्कूल तक होती और कुछ बनने का सपना तोड़ दिया जाता। समाज कमज़ोर समझ अपने बिना तर्क के नियम मनवाता और किसी घर में पिंजरे के पंछी की तरह कैद होना किस्मत होता। काबिल होने के बावजूद नासमझ पुरुषों की हर बात को स्वीकार कर पल पल खुद को मरते देखती रहती फिर भी अश्क़ बहाना भी गुनाह समझा जाता और जीवन भर खुद अपने अस्तित्व को मिटाकर अपनी महिला जगत की गलत छवि और परंपरा का बोझ ढोती रहती। ज़िंदगी भर प्यासी रहती खाली जाम की तरह बाकी सभी की प्यास बुझाती और साबित करती कि नारी होना त्याग करने का अनिवार्य अंग है। साल भर अपने स्वाभिमान की बली देने के बाद एक दिन 8 मार्च को महिला दिवस मनाती नाचती झूमती गुनगुनाती और कुछ फूल कुछ शुभकामना संदेश के कार्ड लेकर गर्व अनुभव करती। सिरहन सी होती है सोचकर कि हमारे समाज में आज भी नारी होना इक वरदान समझा जाना चाहिए मगर समझा जाता है जैसे अभिशाप है। महिला होना संभव नहीं है किसी पुरष के लिए मगर फिर भी इस महिला दिवस पर इसकी कल्पना करनी चाहिए हम सभी पुरुष वर्ग को , तब समझ आएगा शायद नारी को कमतर समझना कितना बड़ा अपराध है। मैंने देखा सोशल मीडिया फेसबुक पर महिला लेखिकाओं की रचनाएं उनकी सुंदर फोटो के साथ सैंकड़ों लाईक्स और तारीफ करते कमैंट्स दिन भर मिलते हैं जबकि अधिकतर पुरुष लेखक की फोटो देख कर ही लगता है खूसट जैसा कोई आदमी होगा। महिला की अधिकतर समस्याओं का कारण कोई महिला अधिक और पुरुष कम होते हैं। उसकी साड़ी उसकी सज धज गहने मुझसे अच्छे क्यों ये सबसे कठिन समस्या है। महिला बनकर जीना कठिन होता मगर फिर भी जीने का कुछ अर्थ अवश्य होता है जबकि हम पुरुष कभी समझते ही नहीं हमारा होना नहीं होना क्या अंतर रखता है।

बात को इक मंज़िल तक लाने को आखिर में निष्कर्ष निकलना ज़रूरी है। इस चिंतन के बाद सोचना होगा पुरष को भी और महिला को भी इस भेदभाव को छोड़ इंसान होना चाहिए। अगर हम पुरुष हैं तो बेशक जैसे भी अधिकार हमारे पास विरासत में मिले हों हमें महिला को बराबरी का आदर और अधिकार पाने की हकदार हैं ऐसी सोच बनानी चाहिए। ठीक इसी तरह महिलाओं को अपनी महनत काबलियत को पहचानना चाहिए और केवल औरत होने के कारण पुरुष पर निर्भर नहीं होना चाहिए। ये खेद और चिंता की बात है कि जितने भी आधुनिक समाज की बात करते हैं , पढ़ लिख शिक्षित होकर बड़े बड़े घर सुख सुविधा के मालिक बन जाते हैं अपनी सोच को नहीं बदलते या बदलना चाहते। आज भी अगर महिला सुरक्षा और शिक्षा अगर समस्या है तो इस जुर्म का अपराधी पुरुष वर्ग ही है। वास्तविक समानता उस दिन समझी जानी चाहिए जिस दिन महिला दिवस मनाने की ज़रूरत ही नहीं रहेगी। महिलाओं पुरुषों को मिलकर इस पर कार्य करना होगा।

Thursday, 7 March 2019

नारी महिमा महिला दिवस पर ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

   नारी महिमा महिला दिवस पर ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

     औरत की गाथा शुरू की कहां से जाये मुझ पुरुष को समझ कहां। उसकी महिमा का बखान करना आसान नहीं है। खुद को पहचानती है जो महिला वो कभी अपने आप को पुरुष से कमतर नहीं समझती है। औरत इक ऐसी पहेली है जिसका हल खुद विधाता को भी नहीं मालूम। आज आपको थोड़े शब्दों में संक्षेप में नारी महिमा बताते हैं , और इस में रत्ती भर भी खोट नहीं है कसम खाते हैं। विषय पर आते हैं।

महिला जीना जानती है और जीने का मज़ा हर रंग में लेती भी है।
अपनी सुंदरता पर हर महिला को यकीन होता है और हर नारी खुद अपने आप से बेहद प्यार करती है।
सजना संवरना नाचना झूमना गाना हंसना रोना सिमटना और खुलना सभी उसको आता है।
खुद को छिपाती लगती है मगर वास्तव में दिखलाती होती है , घूंघट की आड़ में चांद जैसे बदली में छुपा हो।
अपनी भावनाओं को व्यक्त करना जानती है , बिना बोले इज़हार इनकार करना जानती है।
हर महिला नज़रों की भाषा समझती है और बुरी नज़र से देखने वालों को पहचान लेती है।
उत्स्व मनाती है और खुशियां अपने घर आंगन में भरती है। ख़ुशी बांटती है ख़ुशी चाहती भी है।
सदियों से पुरुष जगत कुंठित होकर उसको अबला बेबस कहकर छोटा करने का व्यर्थ जतन करता है मगर तब भी नारी दिल से कभी खुद को छोटा नहीं मानती है। विशाल दिल की स्वामिनी है और हीनभावना का शिकार नहीं होती है।
नारी कदम से कदम मिलाकर चलना चाहती है मगर पुरुष उसको पीछे छोड़ने की कोशिश में भागता भागता हार जाता है थककर। महिला कभी हार नहीं मानती न ही विराम लेती है।
पुरष नारी को कैसे समझ सकता है जब उसे खुद अपनी ही पहचान नहीं होती है। नारी से ही पुरुष को असली पहचान मिलती है।
महिला पुरुष को गुलाम नहीं बनाना चाहती कभी भी , उसको अपना साथी हमजोली हमसफ़र हमराज़ बनाना चाहती है। पुरुष खुद महिला की गुलामी करते हैं उसकी उंगलियों के इशारे पर नाचते हैं।
महिला देना जानती है और जितना प्यार आदर मिलता है उस से बढ़कर वापस देती है जाने क्यों पुरुष को पाना आता है देना नहीं। देता है तो एहसान उपकार मानकर कर्तव्य समझ नहीं , महिला सब अर्पण करती है ख़ुशी से मर्ज़ी से कर्तव्य मानकर।
ममता प्यार वात्सल्य देवी की तरह वरदान देने का कार्य महिला कर सकती है। कोमलता मन की है वाणी की है अन्यथा महिला की शक्ति की कोई सीमा नहीं है।
नारी कहते हैं पुरुष बिना अधूरी है जबकि पुरुष का नारी बिन कोई अस्तित्व ही नहीं है। नारी पुरुष को जन्म देती है उसको जीना सिखलाती है उसका जीवन संवारती है।
आओ मिलकर महिला जगत को नमन करते हैं महिला दिवस को मिलकर मनाते हैं।

Wednesday, 6 March 2019

न्यायालय को न्याय करना चाहिए ( सही हल ) डॉ लोक सेतिया

  न्यायालय को न्याय करना चाहिए ( सही हल ) डॉ लोक सेतिया 

  अदालत ने ठीक कहा अदालत इतिहास की गलती को बदल नहीं सकती है मगर सोचने की बात और समझने की बात ये है कि खुद अदालत कोई गलती नहीं कर सकती है। न्याय करने वाले को न्याय करना है तो किसी भी पक्ष की भावना पर नहीं जाना चाहिए और केवल निष्पक्षता से न्याय करना चाहिए। जब अदालत खुद निर्णय नहीं करना चाहती और समझौता करवाने की बात करती है तब दोनों पक्ष भले सहमत हो जाते हैं न्याय की देवी घायल होती है। ये कोई तलाक का मुकदमा नहीं है है कि अपने किसी घर को बचाने को बच्चों की भलाई को देखते हुए पति पत्नी में समझौता करवाना है और उसके लिए जिस किसी ने जितने भी अत्याचार किये सब की माफ़ी मिलनी है। और अगर इतने महत्वपूर्ण मुकदमें पर यही किया जाना है तो इतना विलंब किस कारण किया गया। अगर भगवान और आस्था का सवाल है तो कौन सा भगवान अपने लिए पक्षपाती और भावना को देख कर किया फैसला मंज़ूर करेगा न कि वास्तविक निर्णय विवेकपूर्ण ढंग से। न्याय की देवी की आंखों पर पट्टी अंधा होने की निशानी नहीं है बल्कि इस की पहचान है कि अपने पराये दोस्त दुश्मन को बिना देखे न्याय देना है। चलो इन दिनों के ही कुछ निर्णय की बात करते हैं और विचार करते हैं क्या उनका निर्णय देते समय भी भावनाओं की बात को महत्व दिया जाता तो क्या होता। 

करोड़ों लोगों की भावना को देखते तो राम रहीम और आसाराम को जेल नहीं भेजना था। अगर करोड़ों लोगों की भीड़ को देखना है तो किसी भी राजनेता पर घोटाले का मुकदमा नहीं चलाना चाहिए। आपको न्याय करना नहीं अदालत जारी रखनी है आमजन को सज़ा देने को ही नहीं बेगुनाही को भी जुर्म साबित करने को। सब से पहला सवाल न्यायपालिका पर यही है क्या न्याय हासिल करने को भी कीमत देनी पड़ती है उचित है। जाने कितने गरीब अदालत की चौखट नहीं लांघ सकते क्योंकि वकील करने और मुकदमा करने को क्या पेट भरने को पैसा नहीं है। संविधान की व्याख्या करते हैं न्यायधीश किसी दिन न्याय किसको कहते हैं इसकी भी व्याख्या करने का हौंसला कर दिखाए कोई। करोड़ों मुकदमे लटके हुए हैं मगर कुछ ख़ास लोगों को न्याय पल भर में मिलता है ये कैसा विधान है। आपकी अदालतों ने कितने ही दंगे फसाद करवाने वालों को निर्दोष घोषित किया है यदा कदा किसी को सज़ा सुनाई तो वाह वाह होती है और जितनी गलतियां की सब भूल जाती हैं। 

आपको इतिहास नहीं बदलना और न कोई बदल सकता है। किस शासक ने क्या किया कोई गवाही नहीं आपके पास लेकिन खुद आपको इतिहास की भूल को सुधारने की आड़ में ऐसी बड़ी गलती नहीं करनी जो बाद में देश की न्याय व्यवस्था को ही कटघरे में खड़ा कर सवालिया निशान लगाती है। आपको डर लगता है सच को सच बताने में तो साफ कह दें आपके बस की बात नहीं न्याय करना। अपने किसी शायर का वो शेर सुना होगा। 

         इतिहास ने वो मंज़र भी देखा है , लम्हों ने खता की थी सदियों ने सज़ा पाई। 

राम अगर भगवान हैं तो इनको भी न्याय ही स्वीकार होगा कोई खैरात का समझौता करता फैसला नहीं। अब शायद सभी को अपने नायकों की शिक्षा को याद करना चाहिए। राजा हरीशचंद्र का न्याय भी इक मिसाल रहा है और खुद राम का न्याय भी जो पत्नी का निर्दोष होने पर भी त्याग करते हैं ताकि आम नागरिक का भरोसा कायम रहे न्याय की निष्पक्षता पर। आपकी अदालत क्या आज सीता को न्याय देने की बात करना चाहती है। इन उलझनों में राजनीति जनता को उलझाना जानती है मगर आपको न्याय की कुर्सी केवल न्याय करने की शपथ लेकर मिलती है उस शपथ को और देश की न्यायपालिका की साख को कायम रखना है। जिस न्यायधीश ने इंदिरा गांधी को पद पर रहते अदालत आने पर विवश किया और अभी जिस ने राम रहीम को सज़ा सुनाई उन्हीं से कुछ सीख लेनी अच्छी बात है।



Friday, 1 March 2019

मैं मेनका हूं पहचानो मुझे ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

     मैं मेनका हूं पहचानो  मुझे ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

    मेरा मुकाबला किसी से नहीं है कोई भी मेरी तरह इतनी जगह इतने भेस इतने रंग इतने चेहरे एक साथ नहीं रख सकता है। सबको ज्ञान देने वाले भी मेरी आगोश में आकर अपनी सुध-बुध अपना विवेक अपनी सोच समझ खोकर मदहोश हो जाते हैं। मेरा अस्तित्व कण कण में बसता है। राजनीति में सत्ता मेरा ही रूप है और घर बार दुनिया के रिश्ते मोह माया छोड़ने वाले साधु सन्यासी संत महात्मा तक मुझे देखते ही सब को छोड़ मेरे बन जाते हैं। सत्ता किसी की नहीं हुई न कभी हो सकती है ये जानते हुए भी सभी आखिरी सांस तक मेरे आगोश में रहना चाहते हैं। मुझ बिन जीना नहीं चाहते मेरे लिए मरने को मारने को तैयार हैं मगर मैं भला किसी के साथ मरती हूं कभी नहीं। पुराने युग में राजा पिता की मौत युवराज पिता के लिए राजा बन गद्दी पाकर मुकट धारण करने का जश्न का अवसर हुआ करता था। सत्ता कभी विधवा नहीं होती है सदा सुहागन दुनिया में मेरे सिवा कौन है अर्थी उठती नहीं शासक की और डोली पहले सजने लगती है। आजकल बदला रूप है शपथ उठाने की रिवायत निभाई जाती है और संविधान की शपथ खाई जाती है। पल भर बाद कसम भुलाई जाती है और मुझसे निभाई जाती है। माना भारत देश गांधी और जेपी जैसे महान लोगों का देश है जो कभी सत्ता पर आसीन हुए नहीं मगर जो लोग भी सन्यास लेकर भी सत्ता की गद्दी पर आये उनका ईमान पल भर में डगमगा जाता रहा है। भारत के इतिहास में ऐसा उद्दाहरण एक ही है हरियाणा के गुलज़ारी लाल नंदा जी का जो तीन तीन बार कार्यवाहक पीएम बन कर भी सत्ता से मोहित हो नहीं सके। जब उनको आखिर में सरकारी आवास खाली करवाया गया तो उनके पास इक चारपाई एक बिछाने को दरी और पहने हुए धोती कमीज़ के ईलावा थैले में दो जोड़ी कपड़े थे जिस सामान को खुद ही बिना किसी सरकारी वाहन के उठा कर चले आये थे अपने नगर कुरुक्षेत्र समाज की वास्तविक सेवा करने। दिल्ली या किसी और महानगर जाकर बसने का विचार भी नहीं आया था। अब बड़े से लेकर छोटे पद पर बैठे सभी मेरे दीवाने हैं मसताने हैं मुझ शमां के सब परवाने हैं जल जाने हैं।
             सरकारी अधिकारी कर्मचारी सरकारी अमले के लिए भी मैं अधिकार सुविधा का रूप बनकर उनकी तपस्या भंग करती हूं। मेरे हम्माम में सभी नंगे हैं और लाज शर्म की बात क्या शिक्षा और प्रशिक्षण की सभी बातें त्याग देते हैं। हमने ईमानदारी से नौकरी करनी है की भावना किस दिन किस जगह छूट जाती है कोई सोचता भी नहीं है। डॉक्टर शिक्षक भी बनते उपचार करने की कसम उठाकर हैं मगर मेरा लक्ष्मी रूप देखते ही मुझे पाने को सब करने को तैयार हो जाते हैं। धंधा कारोबार उद्योग करने वाले लोभ लालच का मेरा दुपट्टा पकड़ कर आगे बढ़ने लगते हैं तो खरीदार क्या अपने बेगाने किसी को नहीं छोड़ते हैं। मुझसे लगन लगती है तो भाई भाई का दुश्मन बन जाता है। दुनिया में मेरे प्यार के सामने बाकी सभी की मुहब्बत टिकती नहीं है। तुम मुझे कोई दोष नहीं दे सकते हो , विश्वामित्र की तपस्या भंग करने के समय विधाता ने मुझे वरदान दिया था कि मैं कोई भी रूप धारण कर किसी को अपने पर आसक्त करने को आज़ाद हूं और दोषी मेनका नहीं मेनका के संसर्ग में फंसने वाला माना जाएगा।
          बाकी छोटे मोटे लोगों की बात क्या आज का सबसे ताकतवर समझा जाता मीडिया टीवी अख़बार वाले सब मेरे ही जाल में फंसे हुए हैं। टीआरपी मैं ही हूं और विज्ञापन भी मेरा ही स्वरूप है। सब अपना ज़मीर बेचते हैं भाव कम अधिक मांगते हैं कोई भी अनमोल नहीं जिसको कोई खरीदार खरीद नहीं सकता हो। अपने दाम लगवाना बढ़वाना ऊंचे भाव बिकना हर अभिनेता नायिका खिलाड़ी तक चाहते हैं। मेनका ही मेनका सब कहीं मौजूद रहती हूं मैं।
                                         ( पहला अध्याय समाप्त )

Monday, 18 February 2019

बिक रहा है आतंकवाद ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

        बिक रहा है आतंकवाद ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

  आजकल आतंकवाद का मौसम है। अख़बार टीवी चैनल से सोशल मीडिया तक सब जगह आतंकवाद की धूम मची हुई है। कभी अमेरिका और लादेन को लेकर अफ़ग़ानिस्तान पर हमले की बात होती थी आजकल कितने नाम सामने आते जाते रहते हैं पलक झपकते ही कहीं गुम भी हो जाते हैं। विश्व में शांति की बात करने वाले तमाम देश हथियारों के सौदागर भी हैं उनकी अर्थव्यवस्था निर्भर है जंग पर। उन से हथियार कोई भी खरीदे उनको सामान बेचना है और मौत का सामान सस्ता महंगा नहीं देखा जाता जिनको मौत का खेल खेलना है हर मोल देने को तैयार हैं। टीवी अख़बार वाले नई स्टोरी नया शीर्षक ढूंढते रहते हैं हम हादसे की जगह से सीधा दिखा रहे हैं सबसे पहले और सच्ची तस्वीरें। पर्दे के पीछे इस सब की भी कीमत ली जाती है चुकाई जाती है। हम शोर मचाते रहते हैं आतंकवाद पीड़ित हैं सभी देश हमारे साथ खड़े हो जाओ मगर हर देश को हर घटना अपनी सुविधा से आतंकवादी लगती है अथवा कुछ और लगती है। राजनेताओं को आतंकवादी घटना खुद को देशभक्त बताने का अवसर लगती है।
         कोई घर पर पत्नी के आतंकवाद की बात करता है तो कोई लिखने वाला इस विषय पर दो अलग अलग लेख लिखता है और दो जगह भेजता है दोनों जगह छपती है रचना और मानदेय मिलता है। लिखने वालों को हर बात विषय नज़र आती है और टीवी चैनल पर कई लोग विशेषज्ञ बनकर चर्चा करते हैं तभी उनका गुज़र बसर होता है। स्कूल का संचालक बच्चों की उदंडता से परेशान है अध्यापक से अनुशासन की बात कहता है , अध्यापक बच्चों की मां से शिकायत करते हैं आपका बच्चा पढ़ाई पर नहीं लड़ाई पर ध्यान देता है। पत्नी अपने पति से गिला करती है अपने बिगाड़ा हुआ है बच्चों को , तंग आ चुकी हूं इनकी शरारतों से। कब किस ने क्या तोड़ फोड़ दिया पता नहीं चलता है , पिता बच्चों को धमकाते हैं सुधर जाओ वर्ना अध्यापक से शिकायत कर देंगे। सुनकर बच्चे मन ही मन मुस्कुराते हैं आतंक की बात हास्य की सिथ्ति बन गई है। देश में भी सरकार विपक्ष बाकी लोग गेंद दूसरे के पाले में डालते हैं सरकार पड़ोसी देश पर आरोप लगाती है। खुद अपनी गलती किसी को समझ नहीं आती है। मामला समझ से परे है दो गायक एक सुर में गा रहे हैं , बात रोने की लगे फिर भी हंसा जाता है , यूं भी हालात से समझौता किया जाता है। 
                 अब उनकी याद बाकी है कभी व्यंग्य में सबसे बड़ा नाम था उनका। पत्नी पर व्यंग्य लिख लिख कर खूब पैसा कमाया था उन्होंने। ओसामा बिन लादेन पर लिखते हुए अपने घर पर बंब डालने का न्यौता तक देने की बात की थी अपनी पत्नी को सबसे खतरनाक आंतकवादी कह डाला था। पत्नी पर हास परिहास चुटकुले पहले भी कम नहीं थे मगर ये तो हद पार करना हो गया था। मामला हत्या का और धारा 307 का बनता था कत्ल की योजना खुद बनाते हैं और कविता में किसी महबूबा की कातिल अदा की बात कर तालियां बटोरते हैं। व्यंग्यकार की पत्नी होना कितना दुश्वार है कोई मेरी पत्नी से पूछे कभी , मगर हाय री नारी अपने पति की इस खराबी की बात नहीं करती जबकि थाने में रपट लिखवाना बनता है महिला को मानसिक परेशानी देना अपराध है। कब तक अबला की सहनशीलता का इम्तिहान लिया जाता रहेगा , वास्तव में पत्नी का आतंक होता तो क्या भरी सभा में ये बार बार कहने का साहस करते। ऐसे लिखने वाले उन पतियों के दर्द से वाक़िफ़ नहीं हैं जो पत्नी की तानशाही की बात ज़ुबान पर लाने का सपना भी नहीं देख सकते। ऐसे व्यंग्य पढ़कर उनके ज़ख्म फिर से हरे हो जाते हैं। ज़ख्मों पर नमक छिड़कना व्यंग्य वालों को खूब आता है। दर्द में हास्य ऐसे ही नहीं पैदा होता है। अमेरिका बाकी देशों में आतंकी खेल खेलता रहा था , इसकी शुरुआत उसी की की हुई है जब खुद उसी के सीने में दर्द उठा तब कराह उठा और आजकल सभी देश उसी से मसीहाई की गुहार लगाते हैं। तुम्हीं ने दर्द दिया है तुम्हीं दवा देना। 
                 आंतकवाद के सामने घुटने टेकने का काम किस ने नहीं किया और कौन है जिसने मानवता के कातिलों से बात करने और समझौता करने की वकालत नहीं की। बीच का कोई रास्ता सही नहीं होता है आतंकवाद को नामंज़ूर करना है तो उसके रंग की बात नहीं की जानी चाहिए। जिनकी राजनीति ही उन्माद फैला कर विध्वंस कर वोट पाने की रही हो उनको आतंकवाद भी देशभक्त होने का सबूत देकर सत्ता पाने की सीढ़ी लगता हो तो अचरज नहीं है। कोई संगठन भीड़ बनकर दंगे करता है तो क्या उस आतंक को अच्छा वाला आतंकवाद मान सकते हैं अपने अपने गिरेबान में झांकना होगा। नेताओं का भी आतंक है जो लोग सच बोलने से डरते हैं सत्ता और सरकारी विभाग खुद जो मर्ज़ी करते हैं मगर आम नागरिक पर नियम कानून का डंडा चलाते हैं आतंक पैदा कर रिश्वत या जुर्माना वसूल करने को उचित मानते हैं। ध्यान से देखना कोई बॉस अपने कर्मचारी के साथ मनचाहा काम लेने और उसकी महनत से कमाई करने के बाद भी नौकरी से निकालने का भय देकर मानसिक डर किसी आतंकी से बढ़कर देता है। आतंकवाद के चेहरे कई हैं जिन पर विस्तार से बात फिर कभी की जाएगी।

Saturday, 16 February 2019

कहां से कहां पहुंचे खोया क्या पाया क्या ( आत्मनिरीक्षण का समय ) आलेख - डॉ लोक सेतिया

कहां से कहां पहुंचे खोया क्या पाया क्या ( आत्मनिरीक्षण का समय )

                                          आलेख - डॉ लोक सेतिया 

    बस अब आतंकवाद को खत्म करने का वक़त आ गया है , ये ब्यान उस समय का है जब संसद पर आतंकी हमला हुआ था। तब समझ आया था तब तक आतंकवाद को खत्म करने का समय ही नहीं आया था। अपने घर को आग लगी तब समझ आया वर्ना देश जलता रहा शासक बंसी बजाते रहे। अमेरिका भी 11 सितंबर से पहले आतंकवाद को हथियार बेचने का कारोबार समझता रहा था। हमारे नेता हर समस्या पर उचित समय पर कदम उठाने की बात करते हैं। गरीबी भूख बदहाली खराब शिक्षा और स्वास्थ्य दवाओं को ठीक करने का वक़्त कभी नहीं आने वाला है क्योंकि राजनीति करने को इनकी बहुत ज़रूरत है। आतंकवाद पर कहते हैं पड़ोसी देश बढ़ावा देता है और सीमा पार से आतंकी आते हैं मगर क्या हमने आतंकवाद को अपने घर महमान बनाने की बात नहीं की है। अज़हर मसूद जैसे आतंकवादी को खुद कंधार ले जाकर रिहा करने का फल था संसद पर हमला। आज बात का विषय केवल आतंकवाद नहीं है और न ही किसी भी दल की सरकार की ही बात है बात देश के हर वर्ग की है केवल राजनेताओं की ही नहीं है आम नागरिक से कारोबार करने वाले नौकरशाही और उद्योग जगत के साथ टीवी अख़बार और समाज को दर्पण दिखाने वाले बुद्धीजीवी वर्ग की भी है। ये बेहद ज़रूरी है कि आज चिंतन और मनन ही नहीं किया जाये कि हमने आज़ादी के बाद क्या खोया क्या पाया है बल्कि अपनी गलतियों को स्वीकार कर उनको सुधारना भी होगा। अपनी महानता का डंका पीटना छोड़ खुद को सक्षम बनाना होगा और ऐसा आंखें बंद कर नहीं किया जा सकता है। 
       जिस देश की महिमा का गुणगान किया जाता है वो ऐसा तो नहीं था। झूठ मक्कारी बेईमानी ख़ुदपरस्ती और कर्तव्य पालन की नहीं अधिकारों और ताकत सत्ता धनबल के दुरूपयोग की खराब आदतों ने देश की जड़ों में दीमक की तरह खोखला करने का काम किया है सारी व्यवस्था को ही। देशभक्ति और साहस केवल भाषण देने बोलने और लिखने का नाम नहीं है। हम अन्याय अत्याचार के सामने घुटने टेकने के आदी होकर किसी भी तरह से मतलब पूरा करने में विश्वास रखते हैं। आतंकवाद हिंसा कोई भी किसी भी कारण करता है उचित नहीं ठहराया जाना चाहिए। पूर्वोतर की बात हो या पंजाब में हुए आतंकवादी हमले उनका कोई धर्म नहीं होता है मगर खेद की बात है आज भी कोई भिंडरावाले को संत बताता है तो किसी ने गोडसे का मंदिर बना रखा है। ये दोगलापन आतंकवाद को बढ़ावा देता है। हर सरकार दोषी है जनता की समस्याओं पर ध्यान नहीं देकर केवल सत्ता की राजनीति करते रहे हैं। बेशर्मी है कि देश की आधी आबादी को दो वक़्त रोटी नसीब नहीं और राजनेता और अधिकारी राजाओं की तरह विसालिता पूर्वक जीवन जीते हैं और अपने खुद के ऐशो आराम पर ही नहीं अपने झूठे गुणगान करने पर बेतहाशा धन खर्च करते हैं। जिस आज़ादी की बात भगतसिंह गांधी सुभाष ने सोची थी वो कहां है। हमने अपने पूर्वजों से अंगेरजी शासन की निर्दयता की बात सुनी है तो उनकी देश के धन को ईमानदारी से खर्च करने की भी मिसाल देखी है क्योंकि उनकी बनाई हुई इमारत पुल अवधि बीत जाने के बाद भी कायम रहे हैं जबकि हमारे नेताओं के अपने खास लोगों को ठेके देने की बात आम है जिस में घटिया सामान और अन्य कारणों से हादसे हुए हैं। जिस भी दल की सरकार जिस भी राज्य में रहती है उसके लोग लूट को अपना अधिकार मानते हैं। इतना ही नहीं बड़े बड़े नेता अधिकारी वर्ग को अपने दल के लोगों की बात नहीं मानने पर अंजाम भुगतने की बात तक कहते हैं। 
         हमारी पुलिस हमारे सभी विभाग के अधिकारी कर्मचारी अगर अपना कर्तव्य निष्ठा से और देश के लिए ईमानदार होकर निभाते तो शायद हालत बहुत हद तक अच्छी हो चुकी होती। मगर उनके लालच और स्वार्थ के साथ नेताओं की चाटुकारिता ने देश की दशा को बदहाली तक ला खड़ा किया है। हम आम लोग भी नियम कानून को तोड़ने में संकोच नहीं करते हैं मगर अपने देश के संविधान की उपेक्षा करने के बाद भी नेता अधिकारी और आम नागरिक खुद को देशभक्त कहते हैं। उद्योग जगत ने केवल अपने मुनाफे कमाने को उद्देश्य बना लिया है और तमाम करोड़पति लोग देश की खातिर कोई योगदान नहीं देते हैं अन्यथा हमारे देश की परंपरा रही है समाज कल्याण पर अपनी आमदनी खर्च करने की खुद अपने पर केवल ज़रूरत भर को खर्च करने की। धर्म के नाम पर भी संचय करने का कार्य किया है हर किसी ने और ये कहना अनुचित नहीं होगा कि सभी धर्म साधु संत वास्तविक उद्देश्य से धर्म के मार्ग से भटक गये हैं। कलाकार टीवी फिल्म वाले देश को जनता को जगाने और संदेश देने की जगह पैसा बनाने को टीआरपी और विज्ञापन जाल में उलझे रसातल को जाते जा रहे हैं। नारे लगाना जुलूस निकलना गीत गाना झंडा फहराना देशभक्ति क्या यही है या हम सभी को अपना सर्वस्व देश को अर्पित करने की वास्तविक देशभक्ति की ज़रूरत है। जिस दिन हम देश को बाकी सबसे अधिक महत्व देंगे और अपने पास और अधिक की लालसा को छोड़ सभी को समानता की बात का विचार करने लगेंगे शायद देश को सारे जहां से अच्छा बनाने की ओर उस दिन चलने लगेंगे।
             हम जिनको आदर देते हैं और जिनकी कही बात को आंखें बंद कर यकीन करते हैं उनकी बात सच साबित नहीं होने पर भी हम नहीं समझते कि उनकी कथनी और करनी अलग अलग है। किसी को याद है कभी किसी ने देश के सबसे बड़े पद पर होते इक सपना दिखलाया था कलाम जी ने 2020 में भारत से गरीबी भूख जैसी समस्याओं का अंत होने और हर नागरिक खुशहाल होगा ऐसी योजना पर काम करने का दावा किया गया था। अगले साल 2020 आने को है मगर देश की समस्याएं कम नहीं हुई बढ़ती गई हैं। देश के बड़े पद के नेताओं का काम झूठी तसल्ली देना और झूठे ख़्वाब दिखलाना नहीं होना चाहिए। और जब कोई ऐसा कहता है तो हम को उनसे सवाल करना चाहिए कि कैसे होगा और अगर नहीं हुआ तो किसकी ज़िम्मेदारी होगी। ये कहना कि गरीबी हटाओ अच्छे दिन आने वाले हैं जैसे नारे केवल जुमले थे और वोट पाने को ऐसा              हम जिनको आदर देते हैं और जिनकी कही बात को आंखें बंद कर यकीन करते हैं उनकी बात सच साबित नहीं होने पर भी हम नहीं समझते कि उनकी कथनी और करनी अलग अलग है। किसी को याद है कभी किसी ने देश के सबसे बड़े पद पर होते इक सपना दिखलाया था कलाम जी ने 2020 में भारत से गरीबी भूख जैसी समस्याओं का अंत होने और हर नागरिक खुशहाल होगा ऐसी योजना पर काम करने का दावा किया गया था। अगले साल 2020 आने को है मगर देश की समस्याएं कम नहीं हुई बढ़ती गई हैं। देश के बड़े पद के नेताओं का काम झूठी तसल्ली देना और झूठे ख़्वाब दिखलाना नहीं होना चाहिए। और जब कोई ऐसा कहता है तो हम को उनसे सवाल करना चाहिए कि कैसे होगा और अगर नहीं हुआ तो किसकी ज़िम्मेदारी होगी। ये कहना कि गरीबी हटाओ अच्छे दिन आने वाले हैं जैसे नारे केवल जुमले थे और वोट पाने को ऐसा करना पड़ता है तो देश की जनता से छल करना है। जिस देश के राजनेताओं को चुनाव जीतना ही सबसे बड़ा मकसद लगता हो उस देश का भगवान भी कुछ नहीं कर सकते हैं। विचारधारा नैतिक मूल्यों को तिलांजलि देकर भौतिकता की अंधी दौड़ में शामिल होकर हमने खोया जो सब है वो बेहद कीमती था और जिसको पाने की बात करते हैं उसकी अहमियत कुछ भी नहीं मगर वास्तव में उसको भी पाया कुछ मुट्ठी भर लोगों ने है। चंद घरानों पर धन की बारिश और अधिकतर के हिस्से कुछ भी नहीं ऐसी व्यवस्था नहीं चाहिए थी। जिस समाजवाद की बात थी उसको कभी का छोड़ पूंजीवादी व्यवस्था अपनाने का अंजाम यही होना ही था। करना पड़ता है तो देश की जनता से छल करना है। जिस देश के राजनेताओं को चुनाव जीतना ही सबसे बड़ा मकसद लगता हो उस देश का भगवान भी कुछ नहीं कर सकते हैं। विचारधारा नैतिक मूल्यों को तिलांजलि देकर भौतिकता की अंधी दौड़ में शामिल होकर हमने खोया जो सब है वो बेहद कीमती था और जिसको पाने की बात करते हैं उसकी अहमियत कुछ भी नहीं मगर वास्तव में उसको भी पाया कुछ मुट्ठी भर लोगों ने है। चंद घरानों पर धन की बारिश और अधिकतर के हिस्से कुछ भी नहीं ऐसी व्यवस्था नहीं चाहिए थी। जिस समाजवाद की बात थी उसको कभी का छोड़ पूंजीवादी व्यवस्था अपनाने का अंजाम यही होना ही था।

Sunday, 10 February 2019

फ़साना-ए-मुहब्बत ताराना-ए-मुहब्बत ( विमर्श ) डॉ लोक सेतिया

  फ़साना-ए-मुहब्बत ताराना-ए-मुहब्बत ( विमर्श ) डॉ लोक सेतिया 

       हम जिसे प्यार समझते हैं वो कोई सपनों की दुनिया है। कोई हसीना खूबसूरत अदा दिलकश सितारों की रंगीनियां कोई लड़का जो बस प्यार की बातें करता हो चांद तारे लाने के ख्वाब बुनता हो और जिसका साथ आप किसी और दुनिया में चले जाना चाहते हो जहां बस दो प्यार करने वाले हों और कोई रोकने टोकने वाला नहीं हो। मुहब्बत की इस दुनिया में भूख गरीबी और जीवन की वास्तविक उलझनों कठिनाईओं समस्याओं की कोई जगह नहीं है। महबूबा तेरी तस्वीर किस तरह मैं बनाऊं ऐसी ही एक फिल्म का गीत है , फ़िल्मी कहानी में लेखक कोई न कोई रास्ता नकाल लेता है अपने नायक को उसके सपनों की रानी से मुलाकात का। हम सब के साथ ऐसा होना संभव नहीं है और हम अपने महबूब महबूबा की छवि किसी फ़िल्मी अदाकार अदाकारा या कहानी के किरदार में ढूंढते हैं। ये इश्क़ असली ज़िंदगी में कायम रहता नहीं है क्योंकि कोई भी आपसे पल दो पल को मिलता है तब सब से सुंदर पहनावा खूबसूरत बातें और किसी मनपसंद जगह मुलाकात में सब लुभावना होता है लेकिन जिस के साथ जीवन भर साथ निभाना होता है उस के साथ तकरार भी इनकार भी और वो सब जो सपना नहीं हक़ीक़त होता है देख लगता है ख्वाब टूटता हुआ। जो लोग जिस्म की खूबसूरती को देख कर नहीं इक दूजे की शख्सियत को समझ और स्वीकार करने के बाद रिश्ता बनाते हैं उनके संबंध में कोई दरार कोई दिवार कोई उलझन कोई अड़चन नहीं होती है। मगर अधिकतर लोग आकर्षण को प्यार मान उसके मिलने नहीं मिलने पर भाव बदलते हैं जो सच्चा प्यार होता नहीं है।
               ये प्यार इश्क़ मुहब्बत के फ़साने नये पुराने दिल लुभाते हैं मगर इस नामुराद रोग का ईजाल क्या अभी तक रोग है कि बला है कोई नहीं समझ पाया है। अपने अपने अनुभव से लोग बातें करते हैं कभी कहते हुए डरते हैं कभी बात से मुकरते हैं। झूठे आशिक़ साथ जीने मरने का दम भरते हैं जब बात बिगड़ती है तो बच कर गुज़रते हैं। कहानी से पहले कुछ गीत कुछ ग़ज़ल कुछ नग्मों पर गौर करते हैं। शुरुआत धूल का फूल से करते हैं। वफ़ा की राह में कितने गुनाह होते हैं , ये उनसे पूछो जो तबाह होते हैं। ए मुहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया , जाने क्यों आज तेरे नाम पे रोना आया। जो मैं ऐसा जानती प्रीत किये दुःख होय , नगर ढिंढोरा पीटती प्रीत ना कारिओ कोय। ज़माने में अजी ऐसे कई नादान होते हैं , वहां ले जाते हैं कश्ती जहां तूफ़ान होते हैं। बहुत हैं पर आखिर में मुगल-ए -आज़म की ग़ज़ल। मुहब्बत की झूठी कहानी पे रोये , बड़ी चोट खाई जवानी पे रोये। ये सब को पता होता है मगर जानकर अन्जान बन जाते हैं मुझे अपनी इक ग़ज़ल का मतला याद आया है यहां सही लगता है उस को सुनाता हूं फिर कहानी पर आता हूं। 

           हर मोड़ पर लिखा था आगे नहीं है जाना , कोई कभी हिदायत ये आज तक न माना। 

    मुझे सख्त ऐतराज़ है कोई किसी को बेवफ़ा कहकर बदनाम करता है और खुद को उसी का चाहने वाला बताता है। जिसको प्यार करते हो उसकी रुसवाई कैसे कर सकते हो और किसी को बदनाम करते हो तो फिर आपका प्यार कितना मतलबी है। मुझे इक गीत सुनकर लगता है कोई किसी को उस से बढ़कर बद्द्दुआ नहीं दे सकता है मगर दिलजले आशिक़ यही किया करते हैं ज़रा सुनो क्या क्या नहीं कहा आशिक़ ने। 

मेरे दुश्मन तू मेरी दोस्ती को तरसे , मुझे ग़म देने वाले तू ख़ुशी को तरसे। 

तू फूल बने पतझड़ का तुझपे बहार न आये कभी , मेरी ही तरह तू तड़पे तुझको करार न आये कभी। 

जिए तू इस तरह कि ज़िंदगी को तरसे। 

तेरे गुलशन से ज़्यादा वीरान कोई वीराना न हो , इस दुनिया में कोई तेरा अपना तो क्या बेगाना न हो। 

किसी का प्यार क्या तू बेरुखी को तरसे। 

इतना तो असर कर जाएं मेरी वफ़ाएं ओ बेवफ़ा , इक दिन तुझे याद आएं तेरी ज़फाएं ओ बेवफ़ा। 

पशेमां हो के रोये तू हंसी को तरसे। 

              जिस प्यार में ये हाल हो उस प्यार से तौबा। आजकल प्यार का बाज़ार सुनते हैं करोड़ों का है आप भी उनके जाल में अपना सब कुछ लुटवा दें उस से पहले कुछ वास्तविक कहानियों को एक बार ध्यान से समझ लोगे तो बच सकते हैं। गुलाब दे दिया चॉकलेट भी मगर अभी समय है और बात बढ़ाने से पहले जाने माने आशिक़ों की असलियत जान सकते हैं। साहिर लुधियानवी जी की नज़्म ताजमहल बहुत काम की है। कोई किसी को अच्छा लगता है मिलते हैं इक दूजे को समझते हैं मगर अगर किसी मोड़ पर किसी को लगता है साथ निभाना मुश्किल है तो हाथ छोड़ कर जा सकते हैं , साहिर कहते हैं तुम्हारे हाथ में मेरा हाथ है जंज़ीर नहीं। आपको साहिर से मुहब्बत की अमृता की कहानी के साथ इमरोज़ की भी कहानी मालूम होगी , मगर कोई भी किसी को बेवफा नहीं कहता है। समझ आये तो कोई किसी को पसंद करता है मगर जिसको पसंद करता है जब उसी को साथ चलना नहीं पसंद तो उसको मज़बूर नहीं किया जाना चाहिए , प्यार कोई कैद नहीं है और अपने आशिक़ को महबूबा को आज़ादी नहीं देना तो हर्गिज़ प्यार नहीं है। चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों। अभिनेता राजकपूर की कितनी कहानियां हैं नरगिस की ही नहीं मगर नरगिस ने अपनी जान बचाने वाले सुनील दत्त से विवाह किया तो आपको सच्चा इश्क़ समझ नहीं आया। जो बिना किसी संबंध अनुबंध आपकी जान बचाने को आग में कूद कर आपको बचाता है उस से अच्छा कोई और नहीं हो सकता है। धर्मेंदर हेमा की काहनी में किरदार और भी हैं धर्मेंदर की काहनी में उनकी पत्नी के इलावा मीना कुमारी भी रही जिसको सीढ़ी की तरह इस्तेमाल किया और हेमा मालिनी की बात किसी और से सगाई होते होते रह गई। प्यार एक से होता है की परिभाषा बदलनी होगी , खुशवंत सिंह को आशिक़ मिजाज़ कहते हैं जिसने वास्तव में मुहब्बत को कभी समझा भी नहीं। जिन महिलाओं से रिश्ता बनाया उनकी निजि बातों को गॉसिप का विषय बना दिया। कोई नहीं जनता अमिताभ बच्चन के दिल की बात रेखा के मन की बात मगर उनके फ़िल्मी किरदार को किस्सा बना दिया है सोशल मीडिया वालों ने और फ़िल्मी जगत ऐसी बातों को भुनाता है बेचता है पैसा बनाता है। सिलसिला फिल्म बन जाती है यहां कोई सामाजिक बंधन की बात नहीं है कोई विवाहित है या कुंवारा है और कितने लोगों से नाता रखता है कोई सवाल नहीं उठाता है। आजकल टीवी चैनल पर किसी रियल्टी शो में जाने पर हर कोई मंच पर किसी से इश्क़ मुहब्बत की बात करता है तब हम देखते हैं हंसते हैं मगर कोई खराबी नहीं लगती है। टीवी शो पर महिला लड़की नारी को लेकर एक ही नज़रिया दिखाई देता है बाकी कोई रिश्ता महत्व नहीं रखता है , लेकिन हम वही लोग अपने समाज में किसी लड़की लड़के को महिला पुरुष को बात करते देखते हैं तो हंगामा खड़ा कर देते हैं। रंग बदलती हमारी दुनिया का असली चेहरा बेहद भयानक है और शायद महिलाओं के असुरक्षित भी। अवसर मिलते मुहब्बत की पावनता हवस में बदल जाती है तभी हम उसी पक्ष को देखते हैं जो डरावना है। 
                             इश्क़ करना है तो खुदा से वतन से करो और टूटकर करो जो सबसे ऊपर है। कितने लोग हुए हैं देश की आज़ादी की खातिर जीते रहे हंसते हंसते सूली चढ़ गये। दुनिया की बात की सच्चाई है कोई किसी के साथ नहीं मरता है , मन रे तू काहे न धीर धरे। कोई न संग मरे। जिस के साथ जितना साथ निभ जाए उसी को अच्छा जान लेना उचित है। कल तक जिसकी मुहब्बत की कसम खाई आज बात बिगड़ी तो उसी में बुराई नज़र आने लगी। मेरे दोस्त जवाहर ज़मीर का शेर है। वो जब पहलू में थे तो था मुहब्बत का यकीन , गैर से की गुफ्तगू तो बदगुमानी बन गई। जिस पर आपको भरोसा नहीं जिसको आप उसकी मर्ज़ी से जीने नहीं देना चाहते उस से आपका प्यार झूठा है सच्चा नहीं। किसी और शायर का कहना है " प्यार में बहुत ज़रूरी है बेवफ़ाई कभी कभी कर ली "।  इक बात हर कोई कहता है मगर वास्तव में उस में सच्चाई बिल्कुल भी नहीं है वो है दिल से प्यार का रिश्ता। किसी मनोचिकित्स्क से पूछना इश्क़ प्यार मुहब्बत जैसा खलल दिमाग़ की शरारत है दिल बेचारा बेवजह बदनाम है। दिल किसी पर आना दिल लेना देना सभी बनी बनाई बातें हैं किसी का दिल किसी के पास नहीं होता है। ये इक ज़िद है कोई किसी को पसंद हो तो चाहना भी और चाहते हैं तो उसको अपना बनाना भी। जिसको जो पसंद किया उसका  मिल जाना ज़रूरी तो नहीं है। और जब कोई ये सोचता है कि मेरी नहीं तो किसी की नहीं हो ये तो प्यार भी तानाशाही हो गया। जिसको कोई पसंद उसकी मर्ज़ी भी होनी चाहिए। लोग मिलते हैं शुरुआत में जितनी कशिश होती है कुछ दिन बाद नहीं रहती बाकी। इधर तो सोशल मीडिया ने मामला आसान भी किया है और उलझाया भी है बहुत। सोशल मीडिया पर जैसे नज़र आते हैं और जैसी बातें करते हैं जिस दिन आमने सामने मिलते हैं तो लगता है आकाश से ज़मीन पर पहुंच गये हैं। इधर तो संबंध टूटने पर भी पार्टी करने लगे हैं इक फिल्म बना डाली इसी पर। कितनी बार प्यार हुआ कितनी बार किस ने किस को छोड़ा समझना आसान नहीं। कैसे कह दूं कि मुझे छोड़ दिया है उसने , बात तो सच है मगर बात है रुसवाई की। मुहब्बत की बात की जाती है तो मानते हैं सुंदरता से ही प्यार किया जा सकता है मगर बात ये भी मशहूर है कि खूबसूरत है वफ़ादार नहीं हो सकता। मेरी इक ग़ज़ल का मतला कुछ इस तरह है।

               सभी को हुस्न से होती मुहब्बत है , हसीं कितनी हसीनों की शिकायत है। 

             निराश मत होना सच्चा प्यार अभी भी करते हैं जो उनकी बात बताना बाकी है। राजनेताओं का कुर्सी से सत्ता से प्यार वास्तव में कभी नहीं खत्म होता। जान रहती है बिना सत्ता मगर उसी तरह जैसे बिन जल मछली। इनसे अधिक कोई किसी को नहीं चाहता सत्ता पाने को भाई दोस्त सब को छोड़ सकते है , जो भी करना पड़े कर सकते हैं। राजनेताओं का आपसी रिश्ता बनता बिगड़ता है सत्ता की चाहत और ज़रूरत के अनुसार। सत्ता पाने को गधे को बाप बाप को गधा कहना कोई मुश्किल काम नहीं है। इस का खुमार जब चढ़ता है सत्ता पाकर तो इंसान खुद को भगवान से बड़ा समझने लगता है। जब कोई राजनेता आपको वेलेनटाइन डे पर रोके तो उस से पूछना सत्तारानी से अलग होकर कैसा लगेगा।  इक और बात कही जाती है जीने का मतलब है मरने से पहले किसी से इश्क़ कर लेना। मेरा आपको सुझाव है कि अपने दिमाग़ से काम लेना और दुनिया की बातों में आकर कोई मुसीबत नहीं खरीदना। फिर भी वैलेंटाइन डे पर इक शेर कहना लाज़मी है। 

                              अभी तो प्यार का मौसम है और रुत सुहानी है ,

                              कभी किसी हसीना को गुलाब क्यों नहीं देते।

                                

 


Friday, 8 February 2019

महानायक के किरदार का अभिनय ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

   महानायक के किरदार का अभिनय ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

    पता नहीं हम लोग ही आंखे खुली होते हुए भी देखते रहे फिर भी नहीं समझे। शुरुआत से ही वह अभिनय ही करते रहे हैं। साल पहले ही नकली लालकिला बनवा भाषण देने का कार्य उसी आने वाली फिल्म का हिस्सा था , जैसे कैमरे के सामने आने से पहले रिहसल करते हैं अदाकार लोग। नेता जी का सपना सच हुआ मगर समस्या बनी रही कि उनको चार साल तक सपना ही लगता रहा और किसी महानायक के किरदार का अभिनय करने से उनको फुर्सत नहीं मिली। जब पता चला फिल्म बनकर पूरी होने के बाद असली इम्तिहान दर्शक पसंद करते हैं या नहीं बाद में मालूम होता है की ही तरह आपका अभिनय सज धज जनता को कितना मोह पाई और क्या कोई करिश्मा आपके अभिनय आपके तौर तरीके ढंग और बोले गये डॉयलॉग दिखा पाए सामने आता है ठीक उसी तरह आपने देश जनता को क्या दिया भविष्य के चुनाव में दिखाई देता है। नेताजी को भरोसा है सब कुछ उनकी लिखवाई पटकथा के अनुसार हुआ है और उनका किरदार हिट होना ही चाहिए। मगर यहां अमिताभ बच्चन सलमान शारुख आमिर सब के दिल की धड़कन बढ़ जाती है कितने अनुभव के बाद भी फिर आपकी तो पहली असली फिल्म है बेशक आपने किसी पुरानी शोले जैसी सुपरहिट फिल्म का रीमेक चोरी से बना लिया है थोड़ा इधर थोड़ा उधर से मसाला जोड़कर चटनी बनाई है मगर अभी बाज़ार में स्वाद का इम्तिहान होना बाकी है और आजकल बच्चे भी जाने किस को पसंद करते हैं किसको नहीं पता नहीं चलता है। 
                 रामायण महाभारत में शानदार अभिनय करने वाले लोगों को उस समय वास्तविक राम सीता कृष्ण अर्जुन मानकर आरती उतारते थे मगर आजकल उनकी हालत मत पूछो पछताते हैं अपनी हैसियत से बड़ा किरदार निभा कर। तीन घंटे की फिल्म और घंटे आधे घंटे रोज़ाना का सीरियल के हज़ार एपिसोड देखना अलग अनुभव है मगर चार साल तक लगातार किसी को सामने देखना बिल्कुल अलग बात है। अभिनय करने वाला भूल जाता है पिछले बोले डॉयलॉग मगर सुनने देखने वाले उनको दोहराते रहते हैं और जिस पल बात उल्टी तरफ की नज़र आती है मोहभंग होते देर नहीं लगती। अपने हर दिन इतने रंग बदले हैं कि तस्वीर सतरंगी नहीं बनी बदरंगी बनती लगती है। आपने परिधान और छवि पर इतना ध्यान दिया कि आपको ये भी समझना ज़रूरी नहीं लगा कि जिस तरह का किरदार निभाना था उस को ये सब जंचता नहीं है। तैनू सूट सूट करदा सुना है वो पंजाबन की बात है जो साड़ी पहनती हैं उनकी अपनी बात होती है और मुंबई में चोली का चलन बदलता है तो दिल्ली में फैशन पल पल बदलता है। गंगा जमुना में नायक बोली भी खड़ी बोलता है और पहनावा भी धोती कमीज़ और लहज़ा भी देसी तब जानदार अभिनय से शानदार शाहकार बनता है। 
         अब जब तीन चैथाई फिल्म बन चुकी है और चार साल तक किरदार निभाया जा चुका है आखिरी सीन की शूटिंग बची है तब कहानी को बदलना कठिन है। अंत आपकी मर्ज़ी का बना सकते हैं मगर कोई नहीं जनता कि नतीजा क्या होगा। दर्शक चैंक सकते हैं या आपको हैरान कर सकते हैं , शायद आपको फिल्मों का अधिक पता नहीं हो यहां बेहतरीन कहानी और निर्देशन से बनी फिल्म नहीं चलती तो कभी लचर किस्म की बनाई फिल्म भी चल जाती है। जनता का मिजाज़ और दर्शकों का कोई भरोसा नहीं है। इक बात तय है कि फिल्म के कुछ समय बाद लोग फ़िल्मी किरदार को याद रखते हैं मगर अभिनय करने वाले का कोई पता नहीं होता उसका क्या हुआ। समझदार को इशारा काफी है बाकी बची कहानी को सही अंजाम तक पहुंचाना होगा। जाते जाते मेरा इक ग़ज़ल का मतला हाज़िर है। 

                                सब लिख चुके आगाज़ हम अंजाम लिखेंगे 

                                 हम ज़िंदगी को ज़िंदगी के नाम लिखेंगे।


Thursday, 7 February 2019

गुनहगार की तरह ( व्यंग्य-कथा ) डॉ लोक सेतिया

          गुनहगार की तरह ( व्यंग्य-कथा ) डॉ लोक सेतिया 

      ये हमारी व्यथा कथा है कि मुजरिम होने का कबूलनामा नहीं मालूम , पर झूठी कसम नहीं खाते सच सच बताते हैं कि हम देश के तीस फीसदी गरीब लोग वास्तव में रहते हैं भूखे नंगे बेबस होकर भी गुनहगार की तरह ही और मरने की राह देखते रहते हैं। जो दस बीस फीसदी बड़े लोग राज चलाते हैं और जो बीस तीस फीसदी उनके नीचे खुशहाल हैं और जो हमसे थोड़ा ऊपर बीस फीसदी जो जी लेते हैं किसी हाल में आप सब लगता है हमारी तरफ ऐसी नफरत भरी नज़र से देखते हैं जैसे हमने देश में जन्म लेकर इक अपराध किया है। बदसूरत लोग आपकी चमकती जगमग दुनिया पर मखमल में टाट का पैबंद की तरह हैं। आप सब लोग देश को बहुत कुछ देते हैं अपनी आमदनी से हर तरह से मगर हम पास होता ही नहीं कुछ भी देने को। इक फिल्म की कहानी में हम में ही कोई गरीब किसी होटल के बाहर भिखारी की तरह खड़ा देखता है बड़ी सी कार से उतरते हुए किसी अमीर की जेब से उसका बटुआ गिरते हुए और फिर उस नीचे पड़े बटुए को उठाकर लेकर होटल के भीतर जाकर उस अमीर को देता है। अमीर कहता है या पूछता है तुम्हारे पास खाली जेब कुछ भी नहीं है तुम चाहते तो रख सकते थे मिला बटुआ जिस में बहुत पैसा था तो गरीब कहता है जी मैं कोई चोर नहीं हूं किसी का बटुआ लेकर धनवान नहीं बनना है। तब वो अमीर होटल में पार्टी में नाचते झूमते हुए लोगों की तरफ इशारा कर बोलता है कि ये सभी कभी तुम्हारी तरह गरीब थे मगर इन्होने किसी का गिर गया पैसों से भरा बटुआ वापस नहीं किया और आज अमीर बन गये हैं। तब बात फ़िल्मी कहानी की थी मगर आज यही देश की वास्तविकता है बस ज़रा अंतर इस बात का है कि कोई बटुआ जेब से नहीं गिरा मिलता कोई रास्ता कोई छेद सरकारी गोदाम से या देशवासियों के घर की दिवार से बना हासिल करना सीख लोग ऊपर बढ़ते जाते हैं। महनत से ईमानदारी से किसी का गुज़र बसर होता ही नहीं है चोरी और सीनाज़ोरी यही देश की व्यवस्था बन गई या बना डाली है। 
                                 नसीब की बात नहीं मालूम मगर बदनसीबी की पता है , गरीब जिस पिता के घर जन्म लेता है गाली सुनकर बड़ा होता है और जब जीवन भर कोशिश कर अपने घर जन्म लेने वाली संतान को बड़े होकर गरीबी की दलदल से बाहर निकालता है तब भी खुद ही अपने को गाली देता महसूस करता है कि बाप भी अच्छा था बच्चे भी बड़े बन अच्छे हैं इक मैं ही बुरा और कमनसीब हूं। देश का हर गरीब जागते हुए सपना देखता है अमीर होने के नहीं केवल ख्वाब देखता है दो वक़्त रोटी के और किसी भी तरह थोड़ा हंसी ख़ुशी के चार पल मिलने के। सरकार भी कुछ लोग भी हम गरीबों को कोई खैरात देते हैं दया करने का दिखावा करते हुए मगर वास्तव में बदले को पुण्य पाना या हमारे पार जो अधिकार रहता है वोट देने का , उसको मांगना भी खरीदना भी और झूठे सपने दिखला छीन लेना भी मकसद रहता है। जब भी देश में चुनाव होता है तब लगता है हम भी देश के बराबर के मालिक हैं हमारा भी वोट बाकी लोगों के बराबर है। समझते हैं शायद इस बार सरकार बराबर बराबर सबको सब बांटेगी और हम भी अपना हिस्सा पाकर जीने के काबिल बन जाएंगे। अपना वोट कीमती वोट लगता है देश की हर संपत्ति पर समानता का हिस्सा पाने का साधन है। मगर हम सभी इक पल को राजा होने का वहम पाले जिस पल वोट डालते हैं अपना सब कुछ लुटवा आते हैं। बाद में फिर पांच साल इंतज़ार उस इक पल का और हमेशा अपने इक पल के अवसर को खोते रहते हैं। देश की राजनीति जाने क्या क्या शोर रहता है हर दिन गली गली नगर गांव हम भी सामने देखते रहते हैं पर नहीं समझ पाते उनका क्या मतलब है। 
                                          जीना मरना एक जैसा है ज़िंदगी मिलती नहीं मौत आती नहीं आसानी से। कोई हादिसा होता है तभी हमारी मौत को सरकार भी समाज भी सिक्कों से तोलते हैं और कुछ हज़ार का कभी अधिक मुआवज़ा मिलता है मरने के बाद उसके वारिस को जीते जी नहीं मिला जो लगता है मर कर पा लिया है। ऐसी मौत की चाहत रखते हैं कुछ लोग ये सोच कर जिस पिता को पत्नी को बच्चों को खुद जीते हुए नहीं दे पाए मरने से ही कुछ दे कर जाएंगे तो चैन से मर तो पाएंगे। सरकार चाहती है हमारी संख्या का अनुपात आंकड़ों में घटाना मगर कम नहीं होता संख्या बढ़ती जाती है। गरीबी का फीसदी आंकड़ा और गरीबों की जनसंख्या का आंकड़ा मिलता नहीं इक कम होता है दूजा बढ़ता जाता है। सालों पहले जब देश के बड़े नेता को गुज़रना होता था तब हम गरीबों की बस्ती को परदे कनातें लगाकर ढक देते थे जनाब को देख कर दुःख नहीं महसूस हो इसलिए। आजकल सड़कों की सजावट और आंखों को चुंधियाती रौशनी में हमारा अस्तित्व विलीन हो जाता है उनको पता होता है हम हैं मगर नज़र नहीं आते हैं। हम भी उसी तरह हैं जैसे देश में अपराध बढ़ रहे हैं मगर अपराधी किस बिल में छुपे हैं पता नहीं चलता मगर अपराधी हमारी तरह गरीब नहीं होते हैं मालदार होते हैं देश विदेश जाते हैं राजनीती में शामिल होकर शासक भी बन जाते हैं। उनके अपराध की जांच सरकार अपनी सुविधा के अनुसार करती है और निर्णय होते होते अपराधी का निशान बाकी रहता नहीं है। हम बेक़सूर हैं फिर भी गरीबी के गुनाह परे शर्मसार रहते हैं। हर किसी के सामने हाथ जोड़ कोई गुनाह किया नहीं मगर गुनाह की माफ़ी मांगते हैं। पुलिस से सरकारी अधिकारी से नेता से पूछना हम खुद गुनहगार होने का सबूत देते हैं। हर कोई इसी नज़र से देखता है हमको हर दिन।  गिला है इल्ज़ाम मान लेते हैं फिर भी सज़ा का फरमान जारी नहीं होता अक्सर सदियों तक सज़ा पाकर भी फरियादी कहलाये जाते हैं।
        इक शानदार भवन के बीच लंबे चौड़े फैले हॉल में मंच पर बहुत लोग हमीं गरीबों की बात सुना रहे हैं और सामने बैठे रईस लोग लुत्फ़ उठाते हुए तालियां बजा रहे हैं। नहीं मालूम उन्हीं में किस किस ने किस किस बेबस गरीब को कितना सताया होगा। गरीबी की बात कहने सुनने को कोई गरीब नहीं फिर भी भूले से भटकता हुआ मैं उधर चला आया। रहमदिल लोग हैं समझ गलती से पायदान चढ़ उनसे मुखातिब हुआ तो संचालक को हैरानी हुई बिना बुलाये किस तरह चला आया तुम्हारा काम बाहर दरवाज़े पर सलामी देना है कविता ग़ज़ल और बड़ी बड़ी गंभीर बातों की समझ कहां तुझ को। जो काम बताया गया करो चुपचाप ख़ामोशी से पानी चाय देने के बाद नज़र नहीं आना कैमरे की तरफ। गरीबी की बात मगर गरीब को धुत्कार करना जाने कितना अच्छा कितना खराब है। कोई ग़ज़ल आधी कोई शेर अकेला कोई चर्चा किसी विषय से शुरुआत करते और पहुंचती बात किसी और विषय पर। जाने क्यों लगा शायर की खुद अपनी ग़ज़ल घायल कराहती होगी उसे टुकड़ों टुकड़ों में सुनाते हुए। ये कोई अदब की पहली सी रिवायत नहीं लगती आधी आधी कितनी कविता ग़ज़ल और हर बार बीच में तालियों की भीख की बात आयोजकों की तारीफ की और बार बार उन्हीं के नाम कोई शेर कहने का ढंग लगा जैसे किसी राजदरबार के कवि शायर अपने आका का दिल बहलाने को खुश कर ईनामात पाने को बेताब हैं। गरीबी का दर्द नहीं समझते उसको उपयोग करते हैं और गरीब को मंच से ठोकर लगाकर नीचे उतार देते हैं। कोई साहित्यकार कहलाता है कोई राजनेता आयोजन का महत्वपूर्ण अंग है कोई और आयोजन के भागीदार हैं और सब के इश्तिहार लगे हैं कारोबार भी समाज की बात करने का दम भरने का दावा भी और कवियों शायरों कलाकारों के शुभचिंतक भी। किसी गरीब की कोई भलाई इस से नहीं होने वाली है। इंसानियत इंसानियत की बात मगर इंसानियत को भूलकर अपने अपने मकसद याद हैं। अपनी कहानी में अपना कोई किरदार नज़र नहीं आया मुझे।

Tuesday, 5 February 2019

झूठ को सच बनाता आईना टीवी सिनेमा - डॉ लोक सेतिया

    झूठ को सच बनाता आईना टीवी सिनेमा - डॉ लोक सेतिया 

    आजकल हर दिन एक रुपया रोज़ देकर टीवी चैनल का कोई न कोई पैक लेने का विज्ञापन दिखाई देता है। हम हवा पानी के प्रदूषण पर चिंता जताते हैं मिलावट की वस्तु और फल सब्ज़ी पर कीटनाशक की चर्चा करते हैं। सोशल मीडिया स्मार्ट फोन के समाज पर हो रहे बुरे असर की बात करते हैं फेसबुक व्हाट्सएप्प से बढ़ते अपराधों का भी विचार कभी कभी आता है मगर इन पर हम कोशिश कर अंकुश लगा सकते हैं। लेकिन टीवी चैनल के सीरियल की कहानी विज्ञापन की नग्नता और छल कपट और फिल्मों की कहानी संगीत किस तरह से किस पर क्या असर छोड़ते हैं शायद कोई सोचता ही नहीं है। फिल्म टीवी का बहुत शौक रहता था मुझे और उनसे बहुत जानकारी और समझ मिला करती थी लेकिन अब टीवी सीरियल फिल्म देख समझ नहीं आता कि उनके बनाने वालों का मकसद है क्या , क्या केवल पैसा कमाना समाज को गुमराह कर या बच्चों और युवा वर्ग को भटका कर इक अपराध नहीं है। कलाकार कला सृजन का मकसद समाज को भटकाना नहीं हो सकता है जो ऐसा कर रहे हैं सच्चे कलाकार नहीं पैसे के लालची लोग लिखने वालों फिल्म टीवी सीरियल बनाने वालों समाज के दुश्मन हैं। हर टीवी सीरियल की हर फिल्म की कहानी की बात करना संभव नहीं है मगर यहां अधिकांश जो परोसते हैं उसकी बात से समझ सकते हैं। 
          शायद टीवी सीरियल वालों को लगता है दर्शक के पास कोई दिमाग नाम की चीज़ नहीं है इसलिए अपनी कहानी में कितनी बार कोई मरता है ज़िंदा होता है , चेहरा बदल लेता है और अपराध कर बच जाता है। बार बार अजब इत्तेफाक होते रहते हैं और सबसे बुरी बात कोई भी किरदार सही दिशा नहीं दिखलाता है। छल कपट षड्यंत्र पुरुष महिला सभी निडरता से करते हैं कोई कानून का डर नहीं है और अधिकारी डॉक्टर जब जिस को जो करना हो रिश्वत देकर झूठी रपट बनवा लेते हैं। हर कोई असंभव लगने वाले कार्य किसी को बेहोश करना कोई फ़िल्मी खलनायक जैसे पहले फिल्म में अपने अड्डे पर किया करते थे टीवी सीरियल का हर किरदार करने को सक्षम है। नागिन बन औरत बन जाने किस युग में जीना चाहते हैं , अंधविश्वास जादू टोना तंत्र के नाम पर बलि की बात और बंधक बनाकर रखने और ऐसे समाज जिस में आज भी बच्चियों के लिए शिक्षा उपलब्ध नहीं है और एक साथ आधुनिक होते हुए सदियों पिछड़े लोग वास्तविक समाज में जो कहीं नहीं मिलते टीवी सीरियल फिल्म में उनकी कहानी दिखाई देती है। फिल्म टीवी कला अगर वास्तविकता से परे कोरी कल्पना जो शायद उस पुराने युग में भी नहीं संभव था को आज की सच्चाई बताना चाहते हैं और विचारशीलता को नकारते हैं। 
                        कॉमेडी के नाम पर बेहूदा डॉयलॉग और घटिया निम्न स्तर के चुटकुले सुनकर लगता है इनको स्वस्थ्य हास्य की समझ नहीं है। हर शो में रियल्टी के नाम पर बनावट और लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ किया जाता है। सरकार का विभाग इसकी चिंता करता है कि लोग जिस चैनल को देखें उसकी ही कीमत चुकाएं मगर क्या इस पर पहले ध्यान नहीं दिया जाना चाहिए कि मनोरंजन के नाम पर जो परोसा जा रहा है उस से समाज की मानसिकता खराब ही नहीं हो रही बल्कि नैतिकता और आदर्श का पतन हो रहा है। जो धर्म की समाज के मूल्यों की दुहाई देते हैं उनको ये सब क्यों नज़र नहीं आता है। कभी कभी किसी टीवी सीरियल को देखकर सोचता हूं कि कई साल बाद जब लोग इसको फिर से देख सकेंगे तो क्या उनको ऐसा नहीं लगेगा कि हम कितने ज़ाहिल नासमझ और दिमाग से काम नहीं लेने वाले लोग थे। एक साथ रहते हैं एक घर में मगर हर एपीसोड में कोई दोस्त दुश्मन कोई दुश्मन दोस्त हो जाता है। बार बार धोखा छल कपट फिर भी बार बार प्यार मुहब्बत करना लगता है पिछले दिन की कहानी आपको भूल जानी चाहिए अन्यथा आपको समझ नहीं आएगा कोई भी किरदार क्या है। हर कोई गुनहगार भी है और खुद को सही भी साबित करता है। सब चालाक भी हैं मगर नासमझ और मूर्ख भी हैं जो सामने होते हुए किसी बात को नहीं समझ पाते हैं।
      टीवी और फिल्म वालों ने भगवान को अपनी कठपुतली समझा हुआ है जैसे मन चाहा उपयोग कर लेते हैं। दुनिया भर के गलत कार्य करने वाला भगवान के सामने हाथ जोड़ अपने अनुचित कर्मों में भी साथ मांगता ही नहीं कथाकार दिखलाता है उसकी दुआ सुन ली भगवान ने। इक अजीब सी दुविधा दर्शक को रहती है कि किस बात को कब सही और कब गलत समझना होगा। समय के साथ तमाम चीज़ों में बदलाव आता है और हर चीज़ पहले से बेहतर बनते बनते और अच्छी बनती जाती है मगर हमारे देश का सोशल मीडिया टीवी चैनल सिनेमा हर दिन और बदतर हालत होती जाती रहती है। खराब होने को सफलता की निशानी जैसे मान लिया गया है , बेतुकी कहानी निरर्थक गीत के बोल और संगीत के नाम पर शोर के साथ अपशब्दों को भद्दे लगने वाले शब्दों को स्वीकार करना बताता है कि हम सभ्यता को त्याग असभ्य बनने को तरक्की कहने लगे हैं। जो बच्चे इस सब को देख कर बड़े होंगे उनको पहले युग के आदर सूचक शब्द बकवास लगेंगे और गाली देना गंदी भाषा का उच्चारण करना आधुनिकता लगेगा। कभी ये समझते थे कि अपनी कुरीतियों को गलत परंपराओं को छोड़ समय के साथ अच्छी बातों को अपनाना चाहिए मगर यहां तो जो हमारी अच्छी और कायम रखने के काबिल बातें थीं उनको छोड़ व्यर्थ की फालतू की गंदी और खराब बातों को अपना रहे हैं। ये सब टीवी सोशल मीडिया और फिल्मों तथा जाने माने नायक नायिकाओं से सीखा है हमने और सीख रहे हैं। पढ़ाते हैं हमको ये उल्टी पढ़ाई जो उल्टी पढ़ाई तो मैं क्या करूं।