Saturday, 29 December 2018

कोई मसीहा नहीं है ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

         कोई मसीहा नहीं है ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

        बात शासन और शासक की है , व्यवस्था बदली है और राजा नहीं अब जनता का निर्वाचित नेता सत्ता पर काबिज़ होते हैं। पहले भी जो शासक हुआ करते थे भगवान या देवता नहीं होते थे , मगर तब इतिहास की बात या कहानी लिखने वाले लोग सत्ताधारी को खुश करने को या उसका गुणगान करने को उन्हें अच्छा और उनके सामने वाले को बुरा सिद्ध किया करते थे। शासक की मेहरबानी से उनका गुज़र बसर हुआ करता था और जिसकी खाते उसकी बजाते थे की कहावत थी। जिसे नायक बनाना उसकी कमी को ढकना और जिसे बुरा बनाना उसकी अच्छाई को सामने नहीं लाना ये किया करते थे। वास्तव में अगर आप चिंतन करें तो बात समझ आती भी है।  मगर आजकल देश संविधान की बात से अलग व्यक्तिपूजा की बात लिखना अपने धर्म से छल करना है मगर लोग कर रहे हैं। शासक चाहता है उसको मसीहा समझा जाये जबकि मसीहा बन नहीं सकते बनना चाहते भी नहीं। मगर हम उनकी वास्तविकता को ध्यानपूर्वक देखते ही नहीं हैं। मसीहा या देवता खुद अपने लिए कुछ नहीं चाहते जबकि राजनेता सबसे अधिक खुद के लिए करते हैं वो भी देश और जनता के धन से। फिर भी ऐसा दावा करते हैं जैसे उनकी अपनी आमदनी से कुछ देते हैं किसी को। जनता से लिया धन का थोड़ा भाग वापस जनता को देना उपकार नहीं हो सकता है। अपने नियुक्त किया है उनको ये उनका कर्तव्य है जो नहीं निभाना गलत है जबकि वो अगर करते हैं तो जतलाते हैं एहसान किया है। ये आपराधिक मानसिकता है। समझना नहीं चाहते कोई समझा नहीं सकता है उनको।
              कुछ लोग जो किसी नेता को चाहते हैं और समर्थन करते हैं जब कोई सत्ता या सरकार की आलोचना करता है तो बिना समझे आलोचना करने वाले पर लठ लेकर पिल जाते हैं। उनसे कहो इसने किया क्या है देश समाज के लिए अच्छा केवल खुद अपने और अपने करीबी लोगों के लिए किया जो भी किया अभी तक। मगर उनको आंखों पर अभी भी पट्टी बंधी हुई है उन्हें उसका झूठ भी सच लगता है। इतना पैसा अपनी झूठी शोहरत हासिल करने पर बर्बाद करना उचित कैसे है क्या नकली ढंग से जो नहीं है कैमरे से अभिनय से असली साबित कर सकते हैं। आप किसी फिल्म में अभिनय नहीं कर रहे वास्तव में पद पर हैं और फ़िल्मी अंदाज़ से नहीं वास्तव में काम किया जाना ज़रूरी है। चलो राजनेताओं को सत्ता के नशे में लगता है जनता नासमझ है उसको बातों से ऐसे तमाशों से मूर्ख बनाकर बहलाया जा सकता है मगर आप तो पढ़े लिखे लोग हैं सामने दिखाई देता है बातें ही बातें करते रहे हैं ज़मीन पर कोई बात वास्तव में हुई नहीं है। 
       लिखने वाले टीवी अख़बार वाले भी अगर सच कहने का साहस नहीं करेंगे तो उनका लेखन और अपना कर्म ही किसी काम का नहीं रहेगा। देश की आधी आबादी बदहाली में है और आप कहते हैं देश ऊंचाई को छू रहा है। कुछ लोगों की आमदनी बढ़ना सरकार और समाज का मकसद नहीं हो सकता है होना ये चाहिए कि जिन को कुछ भी नहीं मिलता उनको खैरात पर नहीं रहना पड़े खुद अपने पैरों पर खड़े हो सकें। मगर जब सरकार उनको जिनको वास्तव में ज़रूरत है छोड़कर खुद अपने या कुछ ख़ास लोगों पर सारा ध्यान देती है तब जो तथाकथित विकास होता है उसका उल्टा असर होता है। सबसे महत्वपूर्ण बात है कि सत्ता मिलते ही नेता मनमानी करने अपनी इच्छाएं पूरी करने अपने आप को महान घोषित करने पर देश के संसाधन बर्बाद करने लग जाते हैं। कल तक आप कहते थे किसी और दल ने जितना करना था नहीं किया आज वही सवाल आप पर लागू होता है अपने जो नहीं करना था बहुत किया मगर जो वास्तव में करना था उसी को करना भूल गये और अब सच से बचना चाहते हैं तभी अपने किये वादों की बात छोड़ बाकी बातें करने लगे हैं। देश से पहले आपको अपने खुद की सत्ता के विस्तार की चिंता रही है।
              जब किसी दल का पहला और आखिरी मकसद सत्ता हासिल करना बन जाता है और देश समाज की समस्याएं उनके लिए केवल वादे करने वोट पाने को साधन लगते हैं तब उनका होना नहीं होने की तरह ही है। आजकल बात विचार की नहीं बदलाव लाने की नहीं बस सरकार बनाने तक सिमित होती गई है जिसे देशभक्ति कहना तो और भी अनुचित होगा। संविधान की भावना ये तो कभी नहीं थी न ही कभी हो सकती है।

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