Saturday, 8 September 2018

बदल चुके हैं मकसद देश की राजनीति के ( मेरा आंकलन ) डॉ लोक सेतिया

       बदल चुके हैं मकसद देश की राजनीति के ( मेरा आंकलन ) 

             ( छह साल का सफर मेरा ब्लॉगिंग का ) 900 वीं पोस्ट -  डॉ लोक सेतिया 

     आज भी इक पोस्ट और कल भी देखी इक दूसरी पोस्ट को किसी लेखक दोस्त की टाइमलाइन पर फेसबुक की पढ़ने के बाद मुझे लगा जो भी मैंने खुद अपने वास्तविक जीवन में देखा समझा हमारे देश और राज्य की राजनीति के लोगों को लेकर उसका मंथन किया जाये। मंथन में क्या निकलता है अभी मैं भी नहीं जनता हूं क्योंकि जब भी लिखने बैठता हूं इक विषय या विचार मन में होता है। कागज़ कलम से कोई खाका पहले नहीं बनाता मैं , जो मन में आता है सीधे ब्लॉग पर लिखता जाता हूं। अब अगली पंक्ति क्या होगी मुझे नहीं मालूम। 6 साल तीन महीने पहले शुरुआत की थी ब्लॉग लिखने की तब इक ख्याल रहा था कि मेरी सभी विधाओं की रचनाओं को समेटना हो तो 500 पोस्ट लिखनी होंगी। तब लगता था ऐसा इक ख्वाब है जो पूरा होना कठिन है। मेरे सपने ज़्यादातर सपने रहते हैं मैं उन्हें हक़ीक़त बनाने में असफल रहता रहा हूं। ये शायद पहली बार है कि सोचा नहीं था जो वो वास्तव में हुआ है और आज 900 वीं पोस्ट लिखने बैठा हूं। 

                    देश सेवा नहीं शुद्ध धंधा बन गया है राजनीति अब 

     जाने क्यों मेरे साथ अक्सर होता रहा है जो लोग राजनीति में थे या आना चाहते थे , और मुझसे जान पहचान रही  तब , उनकी असलियत और दिखावा अलग अलग ही नहीं विरोधाभासी भी था। जिन महान नेताओं की आदर्शवादी और विचारधारा की राजनीति हमें आकर्षित करती थी उनकी सोच जाने कब की गुम हो चुकी है। सत्ता पाकर शान से जीना और अपनी ईमानदारी की कमाई से नहीं देश के खज़ाने की लूट से ऐशोआराम हासिल करना मकसद बन गया है। अलग अलग समय पर अलग अलग दलों के लोगों से जान पहचान हुई और जो शुरू में बड़ी बड़ी बातें करते थोड़े दिन बाद उन्हीं को वास्तविक जीवन में विपरीत आचरण करते देखा। डंकल प्रस्ताव के विरोध की बात करने वाले उस सरकार में शामिल थे या बाहर से समर्थन कर रहे थे जिसने हस्ताक्षर किये प्रस्ताव पर। वामपंथियों से अधिक दोगलापन शायद किसी और में नहीं होता है।  मैंने वास्तविक जीवन में ईमानदारी की राह पर चलने वाला नैतिकता का पास रखने वाला कोई भी राजनेता नहीं देखा है। किताबों में पढ़ा है , बेशक लालबहादुर जेपी जैसे तमाम लोग हुए हैं देश में वास्तविक नायक कहला सकते हैं। मगर अपने करीब जिनको भी पाया बड़े ज़ालिम और मतलबपरस्त लोग ही रहे हैं। 
बेहद शरीफ समझे जाने वाले नेता को सत्ता मिलते ही बदमाशों की तरह व्यवहार करते देखा है , जिस थाली में खाया उसी में छेद करते देखा। इक कविता लिखी थी जो यहां दोहराता हूं :-

बड़े लोग ( नज़्म ) लोक सेतिया

बड़े लोग बड़े छोटे होते हैं ,
कहते हैं कुछ ,
समझ आता है और ,
आ मत जाना ,
इनकी बातों में ,
मतलब इनके बड़े खोटे होते हैं।

इन्हें पहचान लो ,
ठीक से आज ,
कल तुम्हें ये ,
नहीं पहचानेंगे,
किधर जाएं ये ,
खबर क्या है ,
बिन पैंदे के ये लोटे होते हैं।

दुश्मनी से ,
बुरी दोस्ती इनकी ,
आ गए हैं ,
तो खुदा खैर करे,
ये वो हैं जो ,
क़त्ल करने के बाद ,
कब्र पे आ के रोते होते हैं। 
     नेताओं में इंसानियत गधे के सर पर सींग की तरह मिली नहीं।   ऊपर जो   7 सितंबर 2012 को लिखी हुई रचना है शत प्रतिशत सच है ।  कुछ दर्द कुछ ज़ख्म कभी नहीं खत्म होते। सत्ता का अहंकार इंसान को वहशी बना देता है और शरीफ समझे जाने वाले लोग किसी को बर्बाद कर देते हैं अपनी ज़रूरत पूरी करने की खातिर। ये अकेला अध्याय नहीं है , जिस जिस से वास्ता पड़ा सभी स्वार्थी और मतलब के लिए कुछ भी करने वाले निकले। दोस्त बन बन के मिले हमको मिटाने वाले। आज बहुत लोग हैं जो सत्ता में हैं मगर जिनकी वास्तविकता को मैंने करीब से देखा है। जो तब विचारधारा की बातें करते थे आज तानशाही तौर तरीके बन गए हैं और चाहते हैं उनके दल को छोड़ बाकी दल खत्म करने हैं। कई लोग ऐसे हैं जो कल किसी और दल में थे उससे पहले किसी और में और जिस भी दल में हों उसके बड़े नेताओं के तलुवे चाटते रहे हैं। इक बार इक सभा में दो दोस्त एसोसिएशन से सहयोग की मांग करने लगे तो उनसे सवाल किया आपका मकसद क्या है। 
एमएलए  बनना क्या लाज़मी है समाज सेवा करनी है तो। जवाब था यार पहले इक दल में घर से लगाया भी वसूल नहीं हुआ अब तो सारी कमी पूरी करनी है। एक साथी को देखा कि कोई काम नहीं था न कुछ पास था , किसी दल को सुरक्षित क्षेत्र से उम्मीदवार चाहिए था खड़ा किया सांसद बन गया और तकदीर से गठबंधन हुआ सत्ता मिल गई और ज़मीन से आसमान पर पहुंच गया। उसे देख कर कितने लोग उसी राह चल पड़े जबकि खुद उस की हालत धोबी के गधे की तरह है न घर का न घाट का। ये जो दूसरे की थाली में अधिक देखने की लाईलाज बीमारी है डॉक्टर भी उस रोग का उपचार तलाश करना छोड़ रोगी बन जाते हैं। कोई बात है जो बुराई भी लुभाती है। शरीफों का ज़माने में अजी बस हाल वो देखा कि तौबा कर ली हमने। तीसरी कसम की तरह सोच लिया आगे से किसी नेता को अच्छा समझने की मूर्खता नहीं करनी है। 
          शायद 15 -20  साल पहले कोई जाना माना नाम वाला आया मेरे शहर में। अख़बार वालों से मिला और जयप्रकाश नारायण जी के संपूर्ण क्रांति आंदोलन को दोबारा शुरू करने की बात की। इक दोस्त जो अख़बार को खबरें भेजता था जानता था मैं 1975 में दिल्ली में 25 जून को जेपी जी को सुनने गया था रामलीला मैदान में और उनका प्रशंसक हूं। उन को बताया और फोन पर बात की मेरे घर आकर मिलने की चाहत है। मैं दूध का जला छाछ भी फूंक फूंक कर पीता था इसलिए कुछ सवाल कर दिए जो उनको अनावश्यक लगे थे। मैंने कहा था आप अपना काम छोड़ इस काम में आओगे या किसी दूसरे के नाम से दल बनाकर जगह बनाने की कोशिश ही है। क्या जेपी के आंदोलन में शामिल उन लोगों की राह तो नहीं अपनाओगे जो अवसर मिलते ही शासक बनकर घोटाले करते आये हैं। खुद जेपी अपने जीवन में निराश हुए थे जब जनता पार्टी की सरकार कुछ लोगों ने अपनी सत्ता की चाहत में तोड़ी गिराई थी और देश की आशाओं को धूल में मिला दिया था।  वो मुजरिम हैं देश का भरोसा तोड़ने के।
         शायद साल बाद उनका फिर बिना बताये आना हुआ , घर की डोर बैल बजी तो पांच लोग बाहर खड़े थे , आदर सहित लाये घर में। चाय आदि चल रही थी और एक शख्स मुझे थोड़ा अजीब नज़र से देखता हुआ शायद कुछ सोच रहा था। अचानक अपने झोले से इक पुराना अख़बार निकाल कर दिखा कर कहने लगे ये लेख अपने लिखा है। जनसत्ता अख़बार में छपा हुआ मेरा लेख था मगर मुझे तब तक पता नहीं था छपने का। पढ़ा दोबारा तो हंसी आई और मैंने उन जाने माने व्यक्ति से शब्द शब्द पर ज़ोर देकर सवाल किया क्या यही सच नहीं है , बताओ इतने दिन किया क्या है। केवल जगह जगह कुछ लोग अपनी मर्ज़ी के ही नहीं अपनी मर्ज़ी के वर्ग से चुनकर उनको पदों पर होने की घोषणा कर दी। जनता से कोई सम्पर्क नहीं किया , यही सब तो लिखा था। तब मैंने उनको आईना दिखलाया था कि जो लोग खुद अपनी नौकरी ठीक से नहीं करते वेतन लेते हैं घर बैठे और वास्तव में राजनीति या टीवी चैनल का कोई काम करते हैं। खुद पहले अपने को देख लें।
                                        कितने लोग कितनी बातें हैं , मगर संक्षेप में यही है कि किसी को किसी विचारधारा से कोई मतलब नहीं है। हवा के रुख को देख कर इधर उधर जिधर किधर आते जाते हैं। ऐसे लोग देश और समाज को देना कुछ भी नहीं चाहते हैं। हद तो ये है कि बहुत बार जिस दल में हैं उसी के नेताओं को आपसी बातचीत में गलियां भी देते हैं मगर सामने जाकर दुम हिलाते हैं। भाई क्या करें गलत है सब मगर अपने दल के बड़े नेता का विरोध नहीं कर सकते , मुझे समझाते हैं। गलती उनकी नहीं है , खुद हमारी है जो उनके बहकावे में आते हैं। कुछ खास घरों के लोग बिना आधार नेता कहलाते हैं , बाप दादा जाने किस किस के नाम की कमाई खाते हैं। इक खास बात है ये नेता आपसे वोट मांगने आते हैं तब भी आपकी बात नहीं सुनते , मैंने अक्सर ऐसे में सीधे सवाल पूछने का हौसला किया है और इनको बचकर भागते देखा है। अभी चुनाव है फिर बात करेंगे कहते हैं , मगर फिर कभी बात होती नहीं। जीते तो वक़्त नहीं हारे तो कहना बेकार है।
        अन्ना के आंदोलन की बड़ी चर्चा है , उसकी वास्तविकता शायद अभी भी बहुत कम लोग समझे हैं। मेरे पास एसएमएस आया इक पार्क में आने को निवेदन किया गया था। कुछ सोचकर इक बार जाकर देखना उचित लगा , मगर जाकर देखते ही समझ आया कि ये तो जेपी के आंदोलन की नकल भी हास्यसपद रूप से है। कोई माइक पर गलियां देता खड़ा था और तालियां बज रही थीं। मंच पर जो लोग फूलमाला डाले बैठे थे वास्तव में तहसील और बिजलीघर या अन्य सरकारी दफ्तरों में रिश्वतखोर लोगों की दलाली करने वाले लोग थे जो दो नंबर की कमाई से धनवान बन गये थे मगर समाज में उनकी हैसियत दो टके की भी नहीं थी। ये उनको अवसर लगा था आगे बढ़कर राजनीति में घुसने और अधिक मालदार बनने का। सम्पूर्ण क्रांति को भी इसी तरह के लोगों ने असफल किया था। लोग शोर और भीड़ को देख सोचते नहीं ये कौन लोग है और इनका अतीत क्या है। केजरीवाल वो शख्स है जो नौकरी में रहते वेतन की सुविधा हासिल कर विदेश में पढ़ाई करने जाता है मगर वापस आकर नियम का पालन कर विभाग में काम नहीं करता दो साल बल्कि घर पर बैठ छुट्टी लेकर नियमों की खिल्ली उड़ाता है। जब नौकरी छोड़नी पड़ी राजनीति में आने को तो विभाग को लिया क़र्ज़ नहीं चुकाना चाहता है मगर ईमानदारी की कसमें खाता है , मज़बूरी में वापस देना पड़े क़र्ज़ तो विभाग को नहीं देश के पी एम को चेक भिजवाता है। मज़ाक करता है या मज़ाक उड़ाता है अपनी असलियत दिखलाता है मगर आपकी समझ में नहीं आता है।
              चार साल पहले कोई नेता सामने आता है , कोई नहीं समझ पाया कैसा जाल बिछाता है। आपको अच्छे दिन का सपना दिखलाता है जो बाद में चुनावी जुमला कहलाता है। देश फिर से धोखा खाता है उसकी मंशा को कहां समझ पाता है। आपको बार बार यही बताता है , अभी तक किसी भी सरकार ने कुछ भी नहीं किया है। खुद कुछ भी नहीं करता चार साल मस्ती में झूमता गाता है , कभी उस कभी इस देश को जाता है , खाली हाथ वापस लौट आता है , ये भारत देश है इस के पास साधन और संपदा का भंडार है किसी भी से भीख की नहीं दरकार है। समझने की बात इतनी सी है कुछ लोग नहीं देश के सब कुछ के मालिक हर कोई बराबरी का हकदार है। आखिर निकला क्या चोर थानेदार दोनों के साथ देश का चौकीदार है। ये अच्छे दिन हैं या देश का किया बंटाधार है। मची हुई क्यों हाहाकार है , कोई नहीं अपने झूठे वादे से रत्ती भर शर्मसार है। मेरा आपसे इक छोटा सा सवाल है , क्या हमारा देश सवा सौ करोड़ का अपने बीच से किसी भी दल की बात छोड़कर 542 ऐसे संसद नहीं खोजकर चुन सकता जिनको करोड़ों की शानो शौकत और सुख सुविधा की चाहत नहीं और जो सादगी से विलासिता पूर्ण जीवन को छोड़ देश की सेवा कर सकते हों। अगर ऐसे देशभक्त नहीं हैं तो देश और समाज कंगाल है।
                           आखिर में संविधान की बात। संविधान किसी को प्रधानमंत्री सीधे नहीं घोषित करता है , संविधान में जनता सांसद विधायक चुनती है जो बाद में अपने में किसी को नेता चुनते हैं। आप इस उस नाम की चर्चा करते हैं क्या समझते हैं , खुद ही संविधान को दरकिनार करते हैं। जो लोग संसद विधायक बनकर भी दलगत अनुशासन की तलवार से डरकर चुप रहते हैं वो किस लोकतंत्र की बात कहते हैं। जनतंत्र को राजनीतिक दलों ने बंधक बना लिया है जनता का शासन नहीं दल का है और शायद दल भी कहने को है केवल गिने चुने लोग हर जगह अपनी मर्ज़ी से मनोनीत करते हैं अपने ख़ास चाटुकार लोगों को। डेमोक्रेसी को कत्ल किया जा चुका है इक बेजान लाश को मोम के पुतले में ढकने की तरह।

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