Saturday, 1 September 2018

उसी ज़ालिम पे प्यार आता है ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

  उसी ज़ालिम पे प्यार आता है ( तरकश  ) डॉ लोक सेतिया 

     हसीनों पर दिल आ जाता है तो अक्ल काम नहीं करती है। उसको आता है प्यार पर गुस्सा हमें गुस्से पे प्यार आता है। सौ बार नहीं हर बार हज़ारों बार आता है। क्यों नहीं आये भला कब कहीं ऐसा चौकीदार आता है। चारागर ( इलाज करने वाला ) ज़हर ही पिलाता है , इश्क़े बीमार वहीं दिलदार आता है। 

      रहनुमाओं की अदाओं पे फ़िदा है दुनिया , इस बहकती हुई दनिया को संभालो यारो।

दुष्यंत कुमार नहीं जानते थे समझाने से लोग समझते नहीं हैं। जिस राह जाना मना है उसी पर चलते हैं। चलो आज तीखी नहीं सीधी बात करते हैं। जवाब देंगे नहीं फिर भी सवाल करते हैं। आपने कहा हमने मान लिया आप चौकीदारी खूब करते हैं , मगर माफ़ करें लोग अब चौकीदार शब्द से बहुत डरते हैं। चौकीदार आओ आज आपका हिसाब करते हैं। संसद के सदस्य बनते हैं तभी सत्ता सुख चखते हैं , संसद भवन उदास है आप कहां रहते हैं। चार साल में एक महीना भी नहीं आये जिस चौखट पर सर झुकाया था , अब लगता है सबको उल्लू बनाया था। पीएमओ नहीं जाते फिर भी 18 घंटे काम की बात करते हो। सच ये आपकी हर बात झूठी हर योजना नाकाम रही है , आगे दौड़ पीछे चौड़ की कहावत है। पिछले लोगों का बनाया बर्बाद किया खुद किया क्या।  गिलास तोड़ा बारहा आना।   आपकी बात आप पर लागू करते हैं , सत्तर साल की बात नहीं बाकी 67 साल की आपके 4 साल से तुलना करते हैं। अपने खुद पर अपने ऐशो आराम पर अपने शोहरत के झूठे गुणगान पर विदेशी सैरों जिन से देश को मिला कुछ नहीं ठगा जाता रहा उन पर अपने रहन सहन पर अनावश्यक सभाओं पर और मंदिरों आदि के दर्शनों पर जितना पैसा बर्बाद किया है कोई पहले का सत्ताधारी कर ही नहीं सकता था। इक कहावत है चोरी का माल हो तो बांसों के गज होते हैं अर्थात बिना किसी माप तोल लुटाते हैं। चौकीदार नहीं चोर किया करते हैं। लूट लूट होती है कानूनी भी और कानून में छेद कर के भी जो भी होती है जिसे घोटाले कहते हैं , मगर आपके घोटाले भी देश हित में राज़ की बात है कीमत ही नहीं बताते और आप कुछ भी नहीं छिपाते। 
           कल कोई साहित्यकार बता रहा था इश्क़ अंधा होता है और राजनेता भी कुर्सी से इश्क़ ही करते हैं। आपको भी अपनी महबूबा कुर्सी के किसी और की होना मंज़ूर नहीं है। इश्क़ वतन से भी लोग करते हैं और वतन की खातिर मरते हैं। आप तो मरने से कितना डरते हैं झूठ कहते हैं देश से इश्क़ करते हैं। अपने गुनाह 
स्वीकार नहीं करते हैं जनता की नहीं अपनी शोहरत की फ़िक्र करते हैं। अच्छे दिन लाने नहीं आते खुद अपने बुरे दिन आने से डरते हैं। बदहाल देश की जनता है और शोर आप करते हैं। चार साल में देश को मिला क्या है सोचोगे तो घबराओगे , जिनकी बुराई करते रहे उनसे नज़र मिलाओगे तो घबराओगे। ऊंठ की तरह जिस दिन पहाड़ के नीचे आओगे अपनी असलियत तभी जान पाओगे। हर दिन गरीब देश के खज़ाने से अपने पर करोड़ रूपये बर्बाद करने को उचित ठहराओगे तो किधर जाओगे। अभी भी चाहते हो दोबारा सत्ता पाना कितना अंधियारा बढ़ाओगे। सब अकेले अकेले खाओगे और किसी को रोटी क्या पानी भी नहीं पिलाओगे , बुलेट ट्रैन कोई खिलौना है जिससे देश की जनता को बहलाओगे। भूख गरीबी और किसान मज़दूर को क्या झूठे सपनों से भरमाओगे। अतिथि तुम कब जाओगे बताओगे इस देश में भला कैसे रह पाओगे , हर दिन विदेश में ही नज़र आओगे।  अबके बताओ क्या जुमला बनाओगे , चौकीदार से आगे कौन सा पद चाहोगे। 
        सब विकसित देश वाले हैरान हैं इस गरीब देश के चौकीदार की निराली शान देखकर। काश हम भी ऐसे चौकीदार बन सकते , रखवाली जिसकी करनी उसी को चर जाते। जो लोग अपनी सूरत पर फ़िदा होते हैं वो कभी किसी और से प्यार इश्क़ मुहब्बत नहीं कर सकते हैं। आपको यही रोग है अपने से बेहतर कोई नहीं लगता है , हर पल आईना देखते रहते होंगे और कपड़े बदलते रहे होंगे देश को बदलना आसान नहीं है। नीरज जी की कविता है :-

जितना कम सामान रहेगा , 

उतना सफर आसान रहेगा। 

उस से मिलना नामुमकिन है , 

जब तक खुद पर ध्यान रहेगा। 

हाथ मिले और दिल न मिले , 

ऐसे में नुकसान रहेगा। 

जब तक होंगे मंदिर मस्जिद , 

आदमी परेशान रहेगा। 

जितनी भारी गठड़ी होगी , 

उतना तू हैरान रहेगा। 

नीरज कल यहां नहीं होगा , 

उसका गीत विधान रहेगा। 

          काश कोई आपको इसका सही मतलब समझा सकता तो समझते आपने किसी और तथा देशवासियों को ही नहीं खुद अपने को भी छला है। जिस दिन सूरत नहीं सीरत को मन के आईने में झांककर देखोगे , समझ जाओगे मन की बात में मन कहीं था ही नहीं।  बात ही बात थी , बिना बात की बात। भगवान अगर है कहीं तो आपको विवेक और वास्तविक सोच दे।

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