Saturday, 29 September 2018

जब मिले ज़ख्म तो क़ातिल को सदा दी जाये ( कड़वी गोली ) डॉ लोक सेतिया

    जब मिले ज़ख्म तो क़ातिल को सदा दी जाये ( कड़वी गोली )

                                        डॉ लोक सेतिया 

आज शायद पहली बार कड़वी गोली को मीठी चासनी चढ़ा का अपनी बात कहने की कोशिश करने जा रहा हूं। नया कुछ शायद लिखना ही नहीं अपनी पहले की रचनाओं से ही ग़ज़ल कविता नज़्म से शेर छंद बंद दोहा लेकर बात कहने करनी है। शीर्षक जाँनिसार अख्तर जी की ग़ज़ल के मतला को थोड़ा बदल कर लिखा है। दुआ दी जाये को सदा दी जाये कर लिखा है क्षमा याचना करते हुए। 

जब मिले ज़ख्म तो क़ातिल को सदा दी जाये , है यही रस्म तो ये रस्म उठा दी जाये। 

शायद यही भूल करते हैं हम आये दिन , जिसके इशारे पर कत्ल हुआ उसी से फरियाद करते हैं इंसाफ की। जब तक सरकार खुद नहीं आते हम शव को जलाएंगे नहीं। आएंगे आते हैं झूठे आंसू बहाने मगर इंसाफ की उम्मीद मत रखना। 
                                 ( आब :पानी। )

किसी ने घर जलाया था उसी से जा के ये पूछा , जला के घर हमारा आब क्यों नहीं देते। 

यहां रौशनी में छिपे हैं अंधेरे , कहीं खो गए हैं यहां के सवेरे। 

कह रहे कुछ लोग उनको भले सरकार हैं , तुम परखना मत कभी खोखले किरदार हैं। 

अब सभी को खबर हो गई है , बेहयाई हुनर हो गई है। 

जुर्म हम लोग बस एक करते रहे , अश्क पीते गये आह भरते रहे। 

इन बेज़मीर लोगों के किरदार मत लिखो , बेदर्द शासकों को अवतार मत लिखो। 

धुआं धुआं बस धुआं धुंआ , न रौशनी का कहीं निशां। 

हैं लोग अब पूछते यही , कहां रहें जाएं तो कहां। 

बहार की आरज़ू हमें , खिज़ा की उसकी है दास्तां। 

है जुर्म सच बोलना यहां , सिली हुई सच की है ज़ुबां। 

जला रहे बस्तियां सभी , नहीं बचेगा कोई मकां। 

न धर्म कोई न जात हो , हमें बनाना वही जहां। 

उसी ने मसली कली कली , नहीं वो "तनहा" है बागबां।

बड़े लोग ( नज़्म )

बड़े लोग बड़े छोटे होते हैं ,
कहते हैं कुछ ,
समझ आता है और ,
आ मत जाना ,
इनकी बातों में ,
मतलब इनके बड़े खोटे होते हैं।

इन्हें पहचान लो ,
ठीक से आज ,
कल तुम्हें ये ,
नहीं पहचानेंगे,
किधर जाएं ये ,
खबर क्या है ,
बिन पैंदे के ये लोटे होते हैं।

दुश्मनी से ,
बुरी दोस्ती इनकी ,
आ गए हैं ,
तो खुदा खैर करे,
ये वो हैं जो ,
क़त्ल करने के बाद ,
कब्र पे आ के रोते होते हैं।

ग़ज़ल 

बहती इंसाफ की हर ओर यहां गंगा है ,
जो नहाये न कभी इसमें वही चंगा है।

वह अगर लाठियां बरसायें तो कानून है ये ,
हाथ अगर उसका छुएं आप तो वो दंगा है।

महकमा आप कोई जा के  कभी तो देखें ,
जो भी है शख्स उस हम्माम में वो नंगा है।

ये स्याही के हैं धब्बे जो लगे उस पर ,
दामन इंसाफ का या खून से यूँ रंगा है।

आईना उनको दिखाना तो है उनकी तौहीन ,
और सच बोलें तो हो जाता वहां पंगा है।

उसमें आईन नहीं फिर भी सुरक्षित शायद ,
उस इमारत पे हमारा है वो जो झंडा है।

उसको सच बोलने की कोई सज़ा हो तजवीज़ ,
"लोक" राजा को वो कहता है निपट नंगा है। 

ऊपर मेरी रचनाएं शायद काफी नहीं हैं।  दुष्यंत कुमार की ग़ज़लों से बात पूरी करते हैं। 

कहाँ तो तय था चिराग़ाँ हरेक घर के लिए ,
कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए।
यहाँ दरख्तों के साये में धूप लगती है ,
चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए।
न हो कमीज़ तो पाँवों से पेट ढँक लेंगे ,
ये लोग कितने मुनासिब हैं , इस सफ़र के लिए।
खुदा नहीं न सही आदमी का ख्वाब सही ,
कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिए।
वे मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता ,
मैँ बेकरार हूं आवाज़ में असर के लिए।
तेरा निज़ाम है सिल दे ज़ुबान शायर को ,
ये अहतियात ज़रूरी है इस बहर के लिए।
जिएँ तो अपने बगीचे में गुलमोहर के तले ,
मरें तो गैर की गलियों में गुलमोहर के लिए।


( काश हम सब इसी एक ग़ज़ल को समझ लें , और हर दिन याद रखें अपने पूर्वजों के सपनों को )
अब कुछ और शेर दुष्यंत की ग़ज़लों से :::::::
अब तो इस तालाब का पानी बदल दो ,
ये कँवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं।
कई फाके बिताकर मर गया जो उसके बारे में ,
वो सब कहते हैं अब , ऐसा नहीं ऐसा हुआ होगा।
कैसी मशालें लेके चले तीरगी में आप ,
जो रौशनी थी वो भी सलामत नहीं रही।


( क्या ये उनके लिए भी नहीं जो उजाला करने की बातें करने को आये थे और जो उम्मीद थी वो भी खत्म की )
ये रौशनी है हक़ीकत में एक छल लोगो ,
कि जैसे जल में झलकता हुआ महल लोगो।
किसी भी कौम की तारीख के उजाले में ,
तुम्हारे दिन हैं किसी रात की नकल लोगो।
वे कह रहे हैं गज़लगो नहीं रहे शायर ,
मैं सुन रहा हूँ हरेक सिम्त से ग़ज़ल लोगो।


( दुष्यंत के ये शेर जो अब सुनाने लगा बेहद ज़रूरी हैं याद रखना ::::: : )
हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए ,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
आज यह दीवार परदों की तरह हिलने लगी।
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।
हर सड़क पर , हर गली में , हर नगर हर गाँव में ,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं ,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही ,
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए।


( मित्रो इस आग को अब अपने अपने सीनों में जलाना ज़रूरी है )
खामोश रह के तुमने हमारे सवाल पर ,
कर दी है शहर भर में मनादी तो लीजिए।
फिरता है कैसे कैसे सवालों के साथ वो ,
उस आदमी की जामातलाशी तो लीजिए।
हाथ में अंगारों को लिये सोच रहा था ,
कोई मुझे अंगारों की तासीर बताए।
रहनुमाओं की अदाओं पे फ़िदा है दुनिया ,
इस बहकती हुई दुनिया को सँभालो यारो।
कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता ,
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो।
कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए ,
मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिंदुस्तान है।
मुझमें रहते करोड़ों लोग चुप कैसे रहूँ ,
हर ग़ज़ल अब सल्तनत के नाम एक बयान है।
वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है ,
माथे पे उसके चोट का गहरा निशान है।
सामान कुछ नहीं है फटेहाल है मगर ,
झोले में उसके पास कोई संविधान है।
उस सिरफिरे को यों नहीं बहला सकेंगे आप ,
वो आदमी नया है मगर सावधान है।
वो आदमी मिला था मुझे उसकी बात से ,
ऐसा लगा कि वो भी बहुत बेज़ुबान है।


( चलो अब और आगे चलते हैं इस ग़ज़ल को पढ़ते हैं )
होने लगी है जिस्म में जुंबिश तो देखिए ,
इस परकटे परिन्द की कोशिश तो देखिए।
गूँगे निकल पड़े हैं ज़ुबाँ की तलाश में ,
सरकार के खिलाफ ये साज़िश तो देखिए।
उनकी अपील है कि उन्हें हम मदद करें ,
चाकू की पसलियों से गुज़ारिश तो देखिए।


( साये में धूप की आखिरी दो ग़ज़लें पूरी पढ़नी ज़रूरी हैं )
अब किसी को भी नज़र आती नहीं कोई दरार ,
घर की हर दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तहार।
आप बचकर चल सकें ऐसी कोई सूरत नहीं ,
रहगुज़र घेरे हुए मुरदे खड़े हैं बेशुमार।
रोज़ अख़बारों में पढ़कर ये ख्याल आया हमें ,
इस तरफ आती तो हम भी देखते फ़स्ले-बहार।
मैं बहुत कुछ सोचता रहता हूं पर कहता नहीं ,
बोलना भी है मना , सच बोलना तो दरकिनार।
इस सिरे से उस सिरे तक सब शरीके जुर्म हैं ,
आदमी या तो ज़मानत पर रिहा है या फरार।
हालते इनसान पर बरहम न हों अहले वतन ,
वो कहीं से ज़िंदगी भी माँग लाएँगे उधार।
रौनके जन्नत ज़रा भी मुझको रास आई नहीं ,
मैं जहन्नुम में बहुत खुश था मेरे परवरदिगार।
दस्तकों का अब किवाड़ों पर असर होगा ज़रूर ,
हर हथेली खून से तर और ज़्यादा बेकरार।


( चलिये इस अंतिम ग़ज़ल को भी पढ़ लें )
तुम्हारे पाँव के नीचे कोई ज़मीन नहीं ,
कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यक़ीन नहीं।
मैं बेपनाह अँधेरों को सुबह कैसे कहूँ ,
मैं इन नज़ारों का अंधा तमाशबीन नहीं।
तेरी ज़ुबान हैं झूठी जम्हूरियत की तरह ,
तू एक ज़लील सी गाली से बेहतरीन नहीं।
तुम्हीं से प्यार जताएं तुम्हीं को खा जायें ,
अदीब यों तो सियासी हैं पर कमीन नहीं।
तुझे कसम है खुदी को बहुत हलाक न कर ,
तू इस मशीन का पुर्ज़ा है , तू मशीन नहीं।
बहुत मशहूर है आयें ज़रूर आप यहाँ ,
ये मुल्क देखने के लायक तो है हसीन नहीं।
ज़रा-सा तौर-तरीकों में हेर फेर करो।
तुम्हारे हाथ में कालर हो आस्तीन नहीं।
( साये में धूप से साभार )

 


Friday, 28 September 2018

वो करम उंगलियों पे गिनते हैं ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

    वो करम उंगलियों पे गिनते हैं ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

हक़ नहीं खैरात देने लगे ,
इक नई सौगात देने लगे।

इश्क़ करना आपको आ गया ,
अब वही जज़्बात देने लगे।

रौशनी का नाम देकर हमें ,
फिर अंधेरी रात देने लगे।

और भी ज़ालिम यहां पर हुए ,
आप सबको मात देने लगे।

बादलों को तरसती रेत को ,
धूप की बरसात देने लगे।

तोड़कर कसमें सभी प्यार की ,
एक झूठी बात देने लगे।

जानते सब लोग "तनहा" यहां ,
किलिये ये दात देने लगे। 

वो करम उंगलियों पे गिनते हैं ज़ुल्म का जिनके कुछ हिसाब नहीं। उनकी सौगात के इश्तिहार चिपके हैं दीवारों पर , अब किसी को भी नज़र आती नहीं कोई दरार। किस किस से कैसे कैसे छीनकर सरकारी खज़ाना भरा और जब लोग हाहाकार मचाने लगे तो राहत की भीख भी सौगात कहकर देने लगे। देश की सरकार राज्य की सरकार अपना खज़ाना लुटवा रही है ताकि फिर से आपको लूटने का अवसर हासिल हो। हम लोग ऐसे ही हैं कोई मारता है पीटता है मगर फिर खिलौना दिलवा देता है तो उसको चूमने लगते हैं , क्या 71 साल बाद भी देश की जनता बच्चा है जो बहल जाता है। इक कहानी है हिटलर की वो सभा में लेकर इक मुर्गे को आता है और एक एक करके उसके परों को नौच डालता है और सभी पर नौच कर उसे ज़मीन पर फेंक देता है। फिर अपनी जेब से दाने निकाल उसके सामने डालने लगता है। मुर्गा दाने की चाह में हिटलर की तरफ आता जाता है और आखिर उसके कदमों के पास पांव तले पहुंच जाता है। यही डेमोक्रेसी है बतलाता है , पहले जनता से सब लेकर उसको बेबस करना उसके बाद नाम को कुछ देकर एहसान जतलाना। आज तक किसी भी नेता ने अपनी कमाई से किसी को धेला भी नहीं दिया है , ये सेवक और चौकीदार मालिक होने और दानवीर कहलाने को हमारे ही धन से इश्तिहार छपवा कर जले पर नमक छिड़कते हैं। मगर उनको ये करना नहीं पड़ता अगर इन्होंने जो करने का वादा किया था उसे किया होता। कुछ दोहे भी पढ़ कर समझते हैं।

नतमस्तक हो मांगता मालिक उस से भीख
शासक बन कर दे रहा सेवक देखो सीख।

मचा हुआ है हर तरफ लोकतंत्र का शोर
कोतवाल करबद्ध है डांट रहा अब चोर।

तड़प रहे हैं देश के जिस से सारे लोग
लगा प्रशासन को यहाँ भ्रष्टाचारी रोग।

दुहराते इतिहास की वही पुरानी भूल
खाना चाहें आम और बोते रहे बबूल।

झूठ यहाँ अनमोल है सच का ना  व्योपार
सोना बन बिकता यहाँ पीतल बीच बाज़ार।

नेता आज़माते अब गठबंधन का योग
देखो मंत्री बन गए कैसे कैसे लोग।

चमत्कार का आजकल अदभुत  है आधार
देखी हांडी काठ की चढ़ती बारम्बार।

आगे कितना बढ़ गया अब देखो इन्सान
दो पैसे में बेचता  यह अपना ईमान।  



अधिकार मिलने के बाद ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

    अधिकार मिलने के बाद ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

       बच्चे को स्कूल में दाखिल करवाने जाने पर आधार कार्ड की ज़रूरत नहीं रही मगर इक सवाल जोड़ दिया गया है कि माता को लिख कर देना होगा कि बच्चा उसकी अपने पिता की ही संतान है। उनकी मज़बूरी है कि किसी की नाजायज़ औलाद को दाखिल नहीं कर सकते और कभी बाद में किसी पत्नी के पति को खबर हुई कि उसकी पत्नी के किसी और पुरुष का साथ संबंध रहे हैं और तलाक की नौबत आने पर बच्चा किस का समझा जाना चाहिए और क्या बाद में कोई बच्चे के पिता का नाम बदलवा सकता है। अदालत को जो करना था कर चुकी मगर बाकी लोग नहीं जानते भविष्य में कुछ भी हो सकता है। मामला डी एन ए टेस्ट का बना तो मुमकिन है और कठिनाई सामने खड़ी हो कि दो लोग पिता होने का दावा कर रहे हों और डी एन ए दोनों से मेल नहीं खाये और माता बताने को जीवित ही नहीं हो। तब समझ आएगा कि बेटा सही था कि बाप जिसने कानून को नहीं बदला था कि महिला को भी बराबरी का अधिकार है किसी से संबंध बनाने का। उलझन और उलझती जाएगी सुलझाने में किसने सोचा था। अब अदालत को स्कूलों को इक नया निर्देश जारी करना होगा कि बच्चे को स्कूल में दाखिला देते समय केवल माता का नाम लिखा जाये ताकि पिता के नाम पर विवाद नहीं हो कभी भी। इतिहास में यही चलन रहा है पहले भी अगर आपको याद हो तो। ऐसा होता है कभी कभी आगे बढ़ रहे हैं समझने वाले वास्तव में बहुत पीछे चले जाते हैं। समझदार लोग अभी से बिना विवाह किसी सेरोगेट माता से संतान पैदा करवा रहे हैं। और क्या क्या होना है अभी नहीं लिखना उचित अभी ऊंठ देखते हैं और ऊंठ की चाल देखते हैं बाद में समझेंगे ऊंठ किस करवट बैठता है। अभी महिला पुरुष दोनों को समझना चाहिए कि जश्न मनाना है या मातम इस बात का। फिर इक विदेश में रहने वाले ने बवाल खड़ा कर दिया है। तभी कहते हैं परदेसियों से न अखियां मिलाना , आज यहां कल वहां उनका होता है ठिकाना। आता है उनको सौ बहाने बनाना। कभी कभी कुछ चीज़ें परदे के पीछे ढकी रहें यही अच्छा होता है। अपने भी किसी को कहा होगा या किसी ने आपको कहा होगा मेरा मुंह मत खुलवाओ इसी में भलाई है। ये औरतों को बराबरी का अधिकार कहीं उनकी मुसीबत नहीं बन जाये। अग्नि परीक्षा का चलन शुरू हो सकता है। मेरे इक दोस्त मुझे बताया करते थे कि वो हर किसी को बुरा समझते हैं जब तक उसकी अच्छाई का सबूत नहीं मिल जाये और मैं उनको पता था हर किसी को भला समझता हूं जब तक उसकी बुराई सामने नहीं आ जाती।
           ज़माना बदल रहा है अब पति पत्नी दोनों औरों से संबंध बनाने को आज़ाद हैं। अपराध नहीं है तो डरने की कोई बात नहीं है ,पति तो बेशर्मी से कह सकते हैं अदालत ने उचित बताया है। तुम में हौँसला है तो जाओ आशिक़ी कर लो , हम तो दिल फैंक आशिक हैं। पति पत्नी और वो फिल्म काडायलॉग है , आदमी का प्यार ऐसा है कि वो सभी को बांटता रहता है औरत बस किसी एक को ही प्यार देना चाहती है। इक चुटकुला है कोई अपने निकाहनामे को बार बार पढ़ता हुआ परेशान लग रहा था बीवी ने शौहर से सवाल किया क्या कुछ ख़ास है इस में जो लिखा हुआ आपको परेशान कर रहा है। शौहर कहने लगा नहीं बेगम मैं इस की एक्सपाइरी की तारीख ढूंढ रहा हूं मिलती ही नहीं। शायद वक़्त आ गया है विवाह का पंजीकरण भी हो और हर पांच दस साल बाद नवीनीकरण भी लाज़मी हो। समस्या है तो समाधान भी होता है , लोग थोड़ी तसल्ली से जिएंगे चलो इतने साल बाद तो छुटकारा मिल सकेगा। अन्यथा तलाक कोई आसानी से नहीं मिलता , कौन पिंजरे के पंछी को आज़ाद करना चाहता है। जो बातें लतीफों में थीं शायद हक़ीक़त में सामने आने लगें। इक लतीफा है , ज़मीन के मालिकों और मुज़ेहरों के बच्चों में मालिकों के बच्चे मार खा कर आये तो इक पिता ने अपने पिता से पूछा ये तो बुरा हुआ , पहले तो हम ज़मीदारों के बच्चे मुज़ेहरों के बच्चों की पिटाई किया करते थे। बूढ़े दादा जी ने कहा तुम बेकार चिंता कर रहे हो असलियत अभी भी वही है। आगे समझदार हैं आप , असंविधानक शब्द नहीं उपयोग करने चाहिएं। अदालत ने अधिकार महिलाओं को दिलवाये हैं मगर खुश पुरुष लगते हैं। उनके सीने से अपराधी होने का बोझ हट गया है। महिलाओं को समझ नहीं आ रहा खोया क्या था और पाया क्या है। कुछ खोकर पाना है कुछ पाकर खोना है। हिसाब की बात कोई नहीं जनता घाटा हुआ या मुनाफा हुआ है। मामला सरकारी बजट की तरह बन गया है , सबको उम्मीद थी मगर सबको गिला भी है और मिला भी है। मामला गड़बड़ है।

                                     

Thursday, 27 September 2018

कितने चेहरे हमारे नकाब कितने हैं ( बात की बात ) डॉ लोक सेतिया

  कितने चेहरे हमारे नकाब कितने हैं ( बात की बात ) डॉ लोक सेतिया

   सत्यमेव जयते वाक्य है सत्य की जीत नहीं हार होती है तय है। हम कहते हैं धर्म अच्छाई सच्चाई की राह दिखाता है मगर धर्म को लेकर फसाद करते हैं। खुदा को भगवान को कोई तलाश नहीं करता सब बदनाम ही करते हैं धर्म को ईश्वर को। कल अदालत ने फैसला सुनाया कि औरत पति की सम्पति नहीं है और विवाह का अर्थ ये नहीं कि किसी और से संबंध नहीं रख सकती है। अपनी मर्ज़ी से जिससे चाहे शारीरिक संबंध रख सकती है इसको कोई अपराध नहीं माना जायेगा। हंगामा होने लगा जो होना ही था क्योंकि हम कुछ बातों की चर्चा होना स्वीकार नहीं करते भले वो बात होती हो देख कर अनदेखा करते हैं। हमारा असली चेहरा क्या है आज उसी की बात करते हैं। कल किसी की फेसबुक पर पोस्ट थी कि जिनको लगता है कविता लिखना या साहित्य लिखना आसान है ज़रा दो लाइनें लिख कर देखें। माना बहुत लोग फेसबुक पर कमैंट्स भी लिखते हैं तो उनकी समझ सामने आ जाती है , "अच्छी लैणे हैं " पढ़ते लगता है अज्ञानता का भंडार है। मगर वास्तव में लिखना कठिन नहीं इक स्वाभाविक कार्य है हवा चलना नदी के जल का बहना सांस लेना सब अपने आप होता है नहीं होना कठिन है। कठिनाई तब होती है जब आपके भीतर विचार , खलबली नहीं करते इक शून्य हैं मगर चाहते हैं लेखक कहलाना। अब आप शून्य को कितनी बार लिखते जाओ शून्य शून्य ही रहता है। ऐसे शून्य किसी एक या दो या तीन चार की तलाश करते हैं जो उनके आगे लग सके और उनकी कीमत सौ हज़ार दस हज़ार लाख करोड़ बन सके। ये उधार की हुई या चुराई हुई किसी और की बातों को रचनाओं को अदल बदल कर लिखने वाले बन जाते हैं , ऐसे लोगों को लिखना कभी नहीं आता क्योंकि उनका ध्यान रहता ही हेरा फेरी पर है। लिखने से इश्क़ हो तो हेराफेरी नहीं चलती है। बात अदालत के निर्णय पर चर्चा की। 
        अदालत ने सवाल समानता के अधिकार पर उठाया है , महिला पर अनुचित संबंधों का मुकदमा मगर अपराधी पुरुष। पुरुष पर दूसरी औरत से संबंध पर ख़ामोशी ही नहीं उसके चर्चे भी खुलेआम , ये बदनामी महिलाओं के माथे क्यों मढ़ते हैं भागीदार दोनों हैं एक हाथ से ताली नहीं बजती। खुद को सारे जहां से सच्चा कहने वाले टीवी समाचार चैनल की मनसिक दिवालियापन की कोई सीमा नहीं है , खबर को फ़िल्मी कहानियों से जोड़ कर निशाना किसी अभिनेता और अभिनेत्री पर लगाते हैं। अपने देखा है उनको शारीरिक संबंध बनाते और सबसे पहले खुद सती सावित्री हैं , राम हैं मर्यादा का पालन करते हैं। मगर ये मसाला तैयार रहता है जब भी अवसर मिलता सिलसिला फिल्म की बात करते हैं , साधना फिल्म की नहीं करते कभी। धूल का फूल की नहीं करते पति पत्नी और वो की नहीं करते है , आप की कसम की बात करते तो समझते कि अफवाह और झूठ कितने घर बर्बाद करते हैं। टीवी वालो खुद आग लगाते हो खुद तमाशाई भी बनते हो। ये गीत सुनो ही नहीं समझो इक इक शब्द के अर्थ को। 


   सिलसिला की कहानी हिट है , बरसात की कहानी पुरानी हो चुकी है। फ़िल्मी जगत में नायक नायिका के प्यार की अफवाह से फिल्म चलती रही है। अंदर की बात है। मगर मीना कुमारी से लेकर राजकपूर तक की कितनी कहानियां चर्चित हुई हैं। फिल्म बनी सिलसिला पर जब सिलसिला बाकी नहीं रहा। दुष्यंत फिर हर बात में याद आते हैं। सिलसिले खत्म हो गये यार अब भी रकीब हैं। चलो पुरानी फिल्मों में ही सही मुहब्बत की बात प्यार के किस्से इश्क़ के फ़साने तो थे , आजकल की फिल्मों में या टीवी सीरियल में सब कुछ है प्यार मुहब्बत को छोड़कर। हीर रांझा की कहानी पसंद है मगर लैला मजनू को बदनाम किया जाता है। सरकार मजनुओं को पकड़ जेल में डालती है पुलिस वाले पिटाई करते हैं और पंचायत कत्ल करने की सज़ा सुनाती है।  हम अजीब समाज में रहते हैं बड़े कहलाने वाले करें तो मुहब्बत की कहानी और गरीब करे तो जुर्म। दोहरे मापदंड हैं , जो अभिनेता धर्म बदलकर दूसरी शादी करता है उसको कोई कुछ नहीं कहता और कोई आम किसी महिला के साथ पार्क होटल में दिखाई देता है तो कहानियां बना लेते हैं। आपके पास हौसला है तो हंगामा करने वालों को उनके धर्म की कथाओं की बात याद दिलवा सकते हैं। याद नहीं आया किस किस रानी ने किस किस को बुलवा कर संतान पैदा की थी। किस की विवाह से पहले कौन सी संतान थी और क्या क्या। ये नियम किसने बनाये थे। मैंने इक कथा पढ़ी थी कि इक मुनिवर की पत्नी वन को किसी गैर मर्द के साथ जा रही थी कि उसके बेटे ने देखा और अपने पिता से शिकायत की थी। पिता ने समझाया कि कुछ नियम कुदरत के बने हुए हैं और इंसान पशु पक्षी सभी जिससे चाहे संबंध बना सकते है अपनी आवश्यकता की खातिर। बाद में बेटा जब पिता की गद्दी पर बैठा तब उसी ने ये नियम बनाये। सवाल उचित अनुचित का नहीं है सवाल समानता का है और जो महिला के लिए अपराध है पुरुष के लिए भी गुनाह होना चाहिए। और अपराधी महिला सज़ा पुरुष को मिले इसे भी सही नहीं ठहराया जा सकता है। विश्वमित्र और मेनका की कथा भी जानते हैं क्यों कोई अप्सरा किसी की तपस्या भंग करती है। इस बात को यहीं रहने दो अन्यथा बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी। दुनिया बदलती गई है मगर हम अभी भी उसी मोड़ पर अटके हैं। ये मुहब्बत इश्क़ प्यार कब किसी अदालत की इजाज़त लेते हैं , आप बेकार उलझते हैं। लोग इतनी जल्दी राय बदलते हैं कि सोचने वाले हाथ मलते हैं। बिगबॉस के घर चलते हैं अनूप जलौटा और जसलीन से मिलते हैं , खुलमखुल्ला चुंबन करते हैं। जो पहले खराब बता रहे थे अब बदल गई राय उनकी अच्छे लगते हैं कहते हैं। हम भी इसी युग में रहते हैं। जो करते हैं कभी नहीं कहते हैं , खूबसूरत अदाओं पर सभी मरते है। इसी बहाने दो ग़ज़ल पढ़ाते हैं और चलते हैं।
             

सभी को हुस्न से होती मुहब्बत है - लोक सेतिया "तनहा"

सभी को , हुस्न से होती मुहब्बत है ,
हसीं कितनी हसीनों की शिकायत है।

भला दुनिया उन्हें कब याद रखती है ,
कहानी बन चुकी जिनकी हक़ीकत है।

है गुज़री इस तरह कुछ ज़िंदगी अपनी ,
हमें जीना भी लगता इक मुसीबत है।

उन्हें आया नहीं बस दोस्ती करना ,
किसी से भी नहीं बेशक अदावत है।

वो आकर खुद तुम्हारा हाल पूछें जब ,
सुनाना तुम तुम्हारी क्या हिकायत है।

हमें लगती है बेमतलब हमेशा से ,
नहीं सीखी कभी हमने सियासत है।

वहीं दावत ,जहां मातम यहां तनहा ,
हमारे शहर की अपनी रिवायत है।         

यहां तो आफ़ताब रहते हैं - लोक सेतिया "तनहा"

यहां तो आफताब रहते हैं ,
कहां, कहिये ,जनाब रहते हैं।

शहर का तो है बस नसीब यही ,
सभी खानाखराब रहते हैं।

क्या किसी से करे सवाल कोई ,
सब यहां लाजवाब रहते हैं।

सूरतें कोई कैसे पहचाने ,
चेहरे सारे खिज़ाब रहते हैं।

पत्थरों के मकान हैं लेकिन ,
गमलों ही में गुलाब रहते हैं।

रूह का तो कोई वजूद नहीं ,
जिस्म ही बेहिसाब रहते हैं। 

आप अपनी आज़ादी कितने में बेचोगे ( बिगबॉस ) डॉ लोक सेतिया

  आप अपनी आज़ादी कितने में बेचोगे ( बिगबॉस ) डॉ लोक सेतिया 

     मुझे आज तक ये समझ नहीं आया कि कोई भी कितने भी लालच से ऐसे समझौते कर किसी के घर में गुलामों की तरह रहना क्यों मंज़ूर करता है। मगर लोग हैं कि ऐसी गुलामी को भी खुशनसीबी समझते हैं। डॉ बशीर बद्र जी की ग़ज़ल का इक शेर है कुछ ऐसा मगर आपको पूरी ग़ज़ल ही सुना देते हैं। 

खुदा हमको ऐसी खुदाई न दे , कि अपने सिवा कुछ दिखाई न दे। 

गुलामी की बरकत समझने लगे , असीरों को ऐसी रिहाई न दे।       ( असीरों : बन्दियों )

हंसो आज इतना कि इस शोर में , सदा सिसकियों की सुनाई न दे। 

खतावार समझेगी दुनिया तुझे , अब इतनी ज़ियादा सफ़ाई न दे। 

खुदा ऐसे एहसास का नाम है , रहे सामने और दिखाई न दे। 

सोचता हूं इस टीवी फ़िल्मी दुनिया पर देश का संविधान लागू है या नहीं। कोई किसी को ऐसे बंधक बना कर रख सकता है अपनी शर्तों पर अपने नियम बनाकर। आपकी निगरानी है चौबीस घंटे कोई निजता नहीं बचती। तथाकथित बिगबॉस आपको लताड़ता है उसकी बात नहीं मानने पर मगर खुद जो मनमर्ज़ी करता है आपसे करवाता है। आपको लड़वाता है और गंदगी फैलाता है उसको इसी में मज़ा आता है मुनाफा कौन कौन कमाता है ये सब पाप का बही खाता है , देखने वालों को जाने क्या भाता है। किसका घर है जिसका कहलाता है खुद वही आग लगाता है। अच्छी बातें कहने को एंकर कहता है समझाता है मगर क्या सच उसे अच्छी बातों से लुत्फ़ आता है , हर किसी को डर उसी से लगता है। घर से बेघर करने की धमकी जो सुनाता है। आदमी क्या इस तरह कठपुतली बन जाता है। बदनाम होने वाला शोहरत पाता है , पॉपुलर होने की कीमत बड़ी चुकाता है। सच्चाई से इस घर का कोई भी नहीं नाता है। 
                             आपको कोई और इस तरह से बंद दीवारों में रहने को कहे जिस में आपको किसी से बाहर वाले से सम्पर्क करने की इजाज़त नहीं होगी , उसकी हर बात स्वीकार करनी होगी। कोई सीमा नहीं होगी आपको किसी भी तरह दंडित किया जाये या खिलाया पिलाया जाये अथवा भूखा रहना पड़े। आपकी हर बात ही नहीं आपके शरीर और रहने तक को जैसे मर्ज़ी बदलने को कहे , आपकी दाढ़ी मूंछ से सर के बाल तक उसको जो पसंद करवा सकता हो। ये शो है क्या और इसका मकसद क्या घर में साथ साथ रहना नहीं लड़वाना भिड़वाना है। बिगबॉस की आंख किसी सत्ताधारी नेता की आंख तो नहीं जिसे भाईचारा अमन चैन बिल्कुल नहीं भाता है , तभी वोट का डर सबको सताता है। वोट शरीफ लोगों के हिस्से कब आता है। ये कोई स्कूल है जो नफरत का सबक पढ़ाता है। कोई इसके खिलाफ अदालत भी नहीं जाता है , आज़ादी बेचने खरीदने का बाजार कोई लगाता है। सुना करते थे गुलामों की कोई मंडी लगती थी और बोली लगाई जाती थी , आजकल गुलाम खुद चलकर आते हैं। आज़ादी की कीमत नहीं जानते तभी बिगबॉस की गुलामी को बरकत समझते हैं। मुंबई की रौशनियों में अंधेरे घने हैं।

Tuesday, 25 September 2018

नेताओं को मुहब्बत है अपराधियों से ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

  नेताओं को मुहब्बत है अपराधियों से ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

  और कोई शब्द अपनी तरफ से बोलने की ज़रूरत नहीं है। देश की सबसे बड़ी अदालत देश की हालत की सच्चाई बताती है उसी के शब्द हैं। " जो लोग कुछ नहीं ... ..... अब हमारे देश पर बोझ बन चुके हैं , वही हमारे नागरिकों को कष्ट भोगने के लिए मज़बूर कर रहे हैं ....... संविधानिक पदों पर बैठे लोग संविधान के मूल्यों को बनाए रखने की शपथ लेते हैं , भ्र्ष्टाचार रोकने की ज़िम्मेदारी भी उन्हें मिलती है। लेकिन संविधान और लोकतंत्र के होते हुए भी उनके सामने भारतीय राजनीति में अपराधीकरण बढ़ने लगता है। जैसा अपराधीकरण देश देख रहा है , वह लोकतान्त्रिक सरकार की जड़ें काट रहा है। 

  आपका खून नहीं खौलता अगर ये सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी पढ़कर तो फिर आपकी देशभक्ति की भावना वास्तविक नहीं है। आपको जो भी दल या नेता पसंद हो देश से अधिक कोई भी नहीं हो सकता है। 

      एडीआर की ओर से वर्ष 2017 में रिकॉर्ड के अनुसार देश के कुल 4896 जन प्रतिनिधियों में 4853 के दिए रिकॉर्ड के मुताबिक। 770 सांसदों ( लोकसभा व राज्यसभा ) में 364 ( 47 % )

4083 विधायकों ( सभी राज्यों ) में 2246 ( 55 % ) दाग़ी हैं। 

रौंगटे खड़े करने वाली वास्तविकता है मगर हम मुझे क्या कहते हैं , हम क्या कर सकते हैं। जी आप केवल सोशल मीडिया पर मनोरंजन करिये और जो होता है होने दीजिये। पर एक बार ध्यान से पढ़ तो लो कौन कौन कितने गहराई तक अपराध में डूबा हुआ है। 

                         134 सांसदों पर गंभीर अपराध के मामले 

         गंभीर अपराध मामलों में भाजपा सांसद सबसे ऊपर , कांग्रेस दूसरे नंबर पर 

लोकसभा के 542 सांसदों में से 179 के खिलाफ आपराधिक मुकदमें हैं। इनमें 114 सांसद गंभीर अपराध की श्रेणी में हैं। इसी तरह राज्यसभा के 228 सांसदों में 51 के खिलाफ आपराधिक मुकदमें चल रहे हैं जिनमें 20 गंभीर अपराध की सूचि में हैं। भाजपा के 339 सांसदों में सबसे अधिक 107 ने आपराधिक मामलों की घोषणा की है। भाजपा के 64 सांसदों पर गंभीर मामले चल रहे हैं। कांग्रेस के 97 सांसदों में 15 पर मुकदमें चल रहे हैं। 8 गंभीर अपराध की श्रेणी में हैं। हत्या और अपहरण भाजपा शीर्ष पर है। भाजपा के 16 माननीयों पर अपहरण और 19 पर हत्या के मामले चल रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने विधि आयोग की रिपोर्ट के ज़रिये राजनीति के अपराधीकरण की तस्वीर सामने रखी है। 5253 उम्मीदवारों पर 13984 अपराधों के मुकदमें दर्ज थे ......  1187 जीते और संसद विधानमडलों में पहुंचे। उत्तर प्रदेश अव्वल है , 2004 में 24 % थी निर्वाचित लोकसभा में इनकी संख्या जो 2009 में 30 % हो गई। उत्तर प्रदेश के 47 % विधायकों पर आपराधिक मुकदमें हैं। 

   ( अमर उजाला 26 सितंबर 2018 की खबर से आभार सहित उपरोक्त जानकारी और आंकड़े )

अब मेरी बात। सियासत की बदहाली पर रोना आया। जिस देश की सरकारें अपराधी चलाते हों उस में आज़ादी संविधान लोकतंत्र की दशा यही हो सकती है। सवाल ये है कि माजरा क्या है खुद को मसीहा घोषित करने वाले क्यों गुनहगार को अपने दल में शामिल करते हैं मंच पर उनकी तारीफ करते हैं और उनको महान देशभक्त बताते संकोच नहीं करते हैं। सत्ता की हवस ने सभी को पागल कर दिया है , सत्ता क्यों चाहिए देश को ऊपर उठाने को नहीं और भी रसातल में गिराने को और जनता को कुछ देने को नहीं खुद शान से महलों में गरीबों की कमाई से राजसी ढंग से जीने को। वास्तव में राजनीति वैश्यावृति से अधिक गंदी हो गई है वैश्या अपना जिस्म बेचती है ये अपना ज़मीर क्या देश को बेचते हैं। दुष्यंत कुमार की बात याद आती है। 

अब तो इस तलाब का पानी बदल दो ,

ये कँवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं। 

कैसे कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं ,

गाते गाते लोग चिल्लाने लगे हैं।


पथ पर सच के चला हूं मैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

   पथ पर सच के चला हूं मैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा" 

पथ पर सच के चला हूं मैं ,
जैसा अच्छा - बुरा हूं मैं। 

ज़ंजीरें , पांव में चाहे ,
फिर भी चलता रहा हूं मैं।

कोई मीठी सुना लोरी ,
रातों रातों जगा हूं मैं। 

दरवाज़ा बंद था जब जब ,
जिसके घर भी गया हूं मैं। 

मैंने ताबीर देखी है ,
इन ख्वाबों से डरा हूं मैं। 

आना वापस नहीं अब तो ,
कह कर सबसे चला हूं मैं। 

खुद मैं हैरान हूं "तनहा"
मर कर कैसे जिया हूं मैं।

Monday, 24 September 2018

औरत ऐसी पहेली है ( हास - परिहास ) डॉ लोक सेतिया

     औरत ऐसी पहेली है ( हास - परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

       हर सवाल का जवाब है वो , फिर भी लगती है लाजवाब है वो। जितना छुपाता है उतना नज़र आता है , ये कोई ऐसा पहना नकाब है वो। अपनी ही भाषा में लिखी गई किताब है वो , हिसाब सबका लेती मगर बेहिसाब है वो। उसका नशा है सब पर तारी रहता , खुद खुदाया की पिलाई कोई शराब है वो। आग ही आग है जलाती है , उसको छूलो अगर तो जैसे आब ( पानी ) है वो। सबको लगती अपनी बचपन की सहेली है , सच कहा खुदा भी न समझा ये क्या पहेली है। आप अपने को जो बताती है , नहीं होती वही कभी भरमाती है। महफिलों की शमां बन जाती है , जलती नहीं है बस जलाती है। ये भी उलझन समझ नहीं आती है , दिया है कौन कौन बाती है। सारे लोग दुनिया के डरते हैं खुदा से , खुदाई उससे खौफ खाती है। घर पे बारात उसके आती है , झूमता हर इक बाराती है। लेकर आया जो बारात था , शामत इक उसी की आती है। नासमझ हैं सभी के सभी , समझदार इक वही कहलाती है। सखी किसी की न वो सहेली है , हर इक औरत अबूझ पहेली है। हल तुम कभी न तलाश करना जी , थोड़ा हटकर ही बात करना जी। किसी आफत को बुलाते हो , पर सोच संभल कर बात करना जी। चूहे बिल्ली की इक कहानी है , बिल्ली शेर की भी नानी है। जो भी शेर कहलाता है , बिल्ली भीगी बन ही जाता है। औरत का अजब बही खाता है , सब पर उधार चढ़ता जाता है। जिस किसी ने भी आज़माया है , आज़मा कर वही पछताया है। मोम जैसी नज़र भी आती है , पत्थरों से बनाई जाती है। उसी की दिल में उसके चाहत रखती है , जिसकी चाहत ही नहीं बतलाती है। बस इसी बात का भरोसा है , उसे ललचाता पानी पूरी समोसा है। बाकी हर बात उसकी झूठी है , मनाने की खातिर ही रूठी है। हर औरत है एक जैसी ही मगर , हर कोई अपने में अनूठी है। खुद समस्या है समाधान भी है , मानते हो सब कि  बड़ी महान भी है। वही धरती है चांद भी और सितारों का आसमान भी है।  आधी दुनिया उसे समझते हो , मान जाओगे इक दिन सारा जहान है वो। चलो उससे मिलाते हैं तुम्हें , ये कहानी सुनाते हैं तुम्हें। 
       आपको जब पास होगा बुलाना , कहती है थोड़ा फासला तो बढ़ाना। जब कहती है नहीं कुछ भी चाहिए , समझना कि उसे सभी कुछ चाहिए। उसकी हर बात ही अजीब है , बस उसी का ही नसीब है। कोई भी उसको बराबर नहीं लगता है , पर अकेले में भी डर लगता है। दुनिया से उसको मिला कुछ भी नहीं , दुनिया मगर उसके सिवा कुछ भी नहीं। नाम उसी का वफ़ा है मगर , सच है कि वफ़ा कुछ भी नहीं। किसी हरजाई की बात करती है , बेवफ़ाई की बात करती है। आदमी है मगर अच्छा है अपने भाई की बात करती है। उसको शादी से लगता है बहुत डर , कब बजेगी शहनाई की बात करती है। सासु की बात नहीं कहती अब चाची ताई की बात करती है। रोज़ कोई परेशान करता है , काम वाली बाई की बात करती है। मौसम की बदलती है लेकिन , राम दुहाई की बात करती है। इक उसी का उजाला भी है , जो अपनी परछाई की बात करती है। जिसने ऐसी पहेली बनाई थी , याद खो गई उसी खुदा की नहीं आई थी। खोजने इसका हल जो लोग गये , खुद कहीं गुम हुए वापस नहीं लौटे लोग गये। ये कोई चाल है या फिर कमाल है , समझ पाये खुदा की मज़ाल है।

इक गुलाबी रुमाल आया है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

  इक गुलाबी रुमाल आया है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

इक गुलाबी रुमाल आया है ,
बन के लेकिन सवाल आया है। 

दरो-दीवार सहमे सहमे हैं ,
जैसे घर में बवाल आया है। 

खेल सत्ता कई दिखाती है ,
ये तमाशा कमाल आया है। 

अब परिन्दे लगे समझने हैं ,
ले के सय्याद जाल आया है। 

गर्दिशे वक़्त और तुम देखो ,
इक नई चल के चाल आया है। 

खत ये लिक्खा हुआ गुलाबी है ,
जैसे होली-गुलाल आया है। 

आज "तनहा" निखार कलियों पे ,
देख फिर बेमिसाल आया है।  



Friday, 21 September 2018

सब से सुंदर तस्वीर ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

         सब से सुंदर तस्वीर ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

         दुनिया की मूर्खताओं में अवल नंबर की मूर्खता होती है खुद अपने आप की बढ़ाई करना। ये जांच ही नहीं गहन जांच का विषय है कि कितने लोग ऐसा करते हैं। कुछ लोग जानते हैं वो वास्तव में किसी काबिल हैं नहीं मगर सोचते हैं कोई नहीं समझता उनकी वास्तविकता को। कुछ जीते ही इसी खुशफहमी में हैं कि हम से अच्छा कोई नहीं है पर लोग समझते नहीं हमारी अच्छाई को नासमझ जो ठहरे। मैंने ऐसे लोगों को देखा है जिनको लिखना आता नहीं फिर भी ज़ुल्म ढाते हैं लिखने को लिखते जाते हैं , कभी किसी से लिखवाते हैं तो कभी कहीं से चुराते हैं। कुछ खुद को ग़ालिब दुष्यंत बताते हैं जब उनका कलाम महफ़िल में सुनाते हैं। कोई नहीं जनता किस चक्की का पिसा आटा खाते हैं कोई बाबा हैं जो सितम ढाते हैं। अपना माल छोड़ सबका माल नकली बताते हैं , कहते हैं मुनाफा नहीं कमाते हैं फिर भी मालामाल होते जाते हैं। चलो आज ऐसे सबसे सच्चे सबसे अच्छे लोगों से मिलवाते हैं। मगर पहले किसी शायर का शेर है दोहराते हैं।

         नर्म आवाज़ भली बातें मुहज़्ज़ब लहज़े , पहली बारिश में ही ये रंग उतर जाते हैं। 

    इश्क़ करते हुए मुलायम रेशमी लोग शादी के बाद फौलाद से हो जाते हैं। दुनिया वाले मतलब रहने तक भलाई दिखलाते हैं मतलब नहीं पूरा होते ही अपनी औकात पर लौट आते हैं। जो कल देवता था उसी को दानव बताते हैं। दोस्ती नहीं आती न ठीक से दुश्मनी ही निभाते हैं , फिर से दोस्त बनने की बात समझ नहीं पाते हैं और हद से बढ़ जाते हैं। जो टीवी चैनल सच को झूठ साबित कर दिखाते हैं वही सारे जहां से सच्चे कहलवाते हैं। सच को ज़िंदा रखेंगे की दुकान जो चलाते हैं कत्ल सच को हर दिन करते जाते हैं। आपको फिर वही किस्सा सुनाते हैं , फ्लैशबैक में लेकर जाते हैं। खेल में कुछ बच्चे इक शर्त लगाते हैं , मास्टरजी पूछते हैं तो बतलाते हैं। हम झूठ बोलने को प्रतियोगिता चलाते हैं , जो सबसे बड़ा झूठ बोले उसे ईनाम दिए जाते हैं। आज इस कुत्ते के पिल्ले पर शर्त लगी हुई है जो सबसे झूठा उसी को मिलेगा ये। मास्टरजी बोले भला क्या ज़माना है बच्चे झूठ पर इतराते हैं , हम जब बच्चे थे जानते तक नहीं थे झूठ किसे कहते हैं। सुनकर मास्टरजी की बात सभी बच्चे चिल्लाते हैं आप जीते आज की शर्त पिल्ला आपका ले जाओ हम भी घर जाते हैं। सारे जहां से सच्चा होने का दम भरने वाले और सच को ज़िंदा रखने की दुकान चलाने वाले उस्ताद लोग हैं जो पहला स्थान पाते हैं। हर खबर सबसे पहले वही लिखते हैं दिखलाते हैं। सब को उल्लू बनाते हैं। 
        खालिस सोने के गहने तिजोरी की शोभा बढ़ाते हैं , पालिश चढ़ाई हुई वाले शान को बढ़ाते हैं। कौन हैं जो सोने के ज़ेवर बिकवाते हैं आपको क़र्ज़ लेने की सलाह देने की भी कीमत पाते हैं। नायक ही नहीं महानायक बताये जाते हैं , बिना तेल मालिश करते हैं , मसालों के स्वाद को मां से बढ़कर बतलाते हैं , जाने कैसे करोड़पति का मंच सजाते हैं। सम्मोहन में सभी लोग फंस जाते हैं , हर एपीसोड में सबसे अधिक वही कमाते हैं , आवाज़ की बात मत पूछो क्या फरमाते हैं। कभी बीच बीच में दरबारी राग गाते हैं , सच तो ये है कि खुदा पैसे को समझते हैं जितनी दौलत बढ़ती जाती है उतने गरीब होते जाते हैं , ऐसा हर धर्म वाले समझाते हैं। ऐसी झूठ बोलने की कमाई से दो चार फीसदी समाजसेवा को देकर दानवीर बन जाते हैं। अंत में असली विषय पर लाते हैं। आपको इक पेंटिंग दिखलाते हैं , सबसे सुंदर तस्वीर का इनाम मिला है जिसे उस में तमाम भूखे अधनंगे और मैले कुचैले लोग विरोध की आवाज़ उठाते हुए बाजुओं को लहराते हैं। अगर ये बगावत है तो समझिये बगावत हो चुकी सलीम मुगलेआज़म का डायलॉग दोहराते हैं। किसी पेंटर को अनारकली बादशाह अता फरमाते हैं मगर कलाकार अपनी बनाई पेंटिंग के पास जाते हैं जिस में लोग हाथी के पांव के नीचे कुचले जाते हैं। बादशाहों की अनुकंपा में और ज़ुल्म में कुछ भी अंतर नहीं होता है इस सच से परदा उठाते हैं। बस वही कलाकार कलमकार साहित्यकार होते हैं जो सत्ता से खुद जाकर टकराते हैं। आजकल तमाम लोग जो कलमकार और सच के पहरेदार होने का दावा करते हैं पालतू कुत्ते की तरह तलवे चाटते नज़र आते हैं। जो खुद बिक चुके हैं अपना बाज़ार लगाते हैं खुद को महंगा बेचकर कीमत पर गर्व से इठलाते हैं। सारे के सारे सच्चे झूठ की कमाई खाते हैं जो नहीं है उसकी खबर बनाते हैं। झूठे विज्ञापनों से दर्शकों को मूर्ख बनाकर धन दौलत कमाते हैं। खबर की परिभाषा क्या है उनको शायद मालूम नहीं है हमीं फिर फिर याद दिलाते हैं। खबर वो सूचना है जो कोई छुपा रहा है खबरनवीस का कर्तव्य है उसका पता लगाना और सब को बताना। मगर आप की खबरों में कोई राज़ की बात नहीं है जो नेता सरकार अधिकारी बाकी लोग शोर मचा मचा बताना चाहते हैं उसको खबर नहीं कहा जा सकता है जिस पर आप दिन भर नूरा कुश्ती करवाते हैं और खुद अपराधी होकर भी सज़ा सुनाते हुए न्यायधीश बने नज़र आते हैं। क्या उसी की चक्की का आता खाते हैं जिसकी तस्वीर हर खबर के नीचे दिखाते हैं। अख़बार के पहले पन्ने आजकल इश्तिहार बनकर आते हैं तो लोग समझ जाते हैं कि आप खबरें नहीं छापते विज्ञापनों की खातिर अख़बार का धंधा अपनाते हैं। रोज़ अपने ही गुण गाकर अपनी खिल्ली उड़ाते हैं। आप का दावा है औरों को आईना दिखाते हैं फिर खुद अपने चेहरे के दाग़ क्यों नज़र नहीं आते हैं। कोई नकाब है या फिर कोई मुखौटा लगाते हैं , किस से मेकअप करवाते हैं जो सज धज कर आते जाते हैं। आपके कपड़े राजा नंगा है की कहानी को और ही ढंग से पढ़वाते हैं। राज़ क्या है झूठ की किस ब्रांड की क्रीम लगाते हैं। 

आग़ पानी को लगानी चाहिए ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

  आग़ पानी को लगानी चाहिए ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा" 

आग़ पानी को लगानी चाहिए ,
इश्क़ की ऐसी कहानी चाहिए। 

बेवफ़ाई का सिला देना हो गर ,
बात उनकी भूल जानी चाहिए। 

पत्थरों के लोग घर शीशे के हैं ,
और क्या क्या मेहरबानी चाहिए। 

आज तनहाई बहुत अच्छी लगी ,
रुत सुहानी अब बुलानी चाहिए। 

ज़िंदगी भी मौत को है ढूंढती ,
मौत को भी ज़िन्दगानी चाहिए। 

फ़ाश उनके राज़ होंगे एक दिन ,
बात दुनिया को बतानी चाहिए। 

झूठ की तक़रीर , सारे कर गये ,
सच भी "तनहा" की ज़ुबानी चाहिए।

धुआं धुआं बस धुआं धुआं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा'

    धुआं धुआं बस धुआं धुआं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा' 

धुआं धुआं बस धुआं धुंआ ,
न रौशनी का कहीं निशां। 

हैं लोग अब पूछते यही ,
कहां रहें जाएं तो कहां। 

बहार की आरज़ू हमें ,
खिज़ा की उसकी है दास्तां। 

है जुर्म सच बोलना यहां ,
सिली हुई सच की है ज़ुबां। 

जला रहे बस्तियां सभी ,
नहीं बचेगा कोई मकां। 

न धर्म कोई न जात हो ,
हमें बनाना वही जहां। 

उसी ने मसली कली कली ,
नहीं वो "तनहा" है बागबां।

Thursday, 20 September 2018

इन लबों पर हसी नहीं तो क्या ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

इन लबों पर हसी नहीं तो क्या ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

इन लबों पर हसी नहीं तो क्या ,
मिल सकी हर ख़ुशी नहीं तो क्या।

बात दुनिया समझ गई सारी ,
खुद जुबां से कही नहीं तो क्या।

हम खुदा इक तराश लेते हैं ,
मिल रहा आदमी नहीं तो क्या।

दोस्त कोई तलाश करते हैं ,
मिल रही दोस्ती नहीं तो क्या।

ज़ख्म कितने दिए मुझे सबने ,
आंख में बस नमी नहीं तो क्या।

और आये सभी जनाज़े पर ,
चल के आया वही नहीं तो क्या।

यूं ही मशहूर हो गए "तनहा"
दास्तानें कही नहीं तो क्या।

Wednesday, 19 September 2018

गरीब जनता की खातिर भी अध्यादेश जारी करिये ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

    गरीब जनता की खातिर भी अध्यादेश जारी करिये ( आलेख ) 

                                          डॉ लोक सेतिया 

    आपने कह दिया और सबने मान लिया कि आप सब करना चाहते हैं और पहले किसी ने कुछ भी नहीं किया है। मगर उस कुछ नहीं करने वालों का किया दिखाई देता है आपका कहा सच हुआ कहीं नज़र नहीं आता। जो जो अपने वादा किया सब झूठ निकला और जो जो आप हमेशा से कहते आये उसे भी भूल गये। ये विकास होता है करोड़ों की मूर्तियां बनवाना हर दिन सैर सपाटे पर जाना अपने नाम की धूम मचाने को मीडिया का घर भरते जाना। अपराधियों को गले लगाना अपनों को सौदेबाज़ी में मुनाफा दिलवाना। और कोई भी काम करते हुए बिल्कुल नहीं शरमाना। जैसे भी हो अपने दल की सरकार बनवाना , किसी का हाथ पकड़ लेना किसी का छोड़ जाना। मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक पर अध्यादेश ले आये हो , अपनी पत्नी को बिना तलाक जो छोड़ आये हो उस पर भी कुछ बताना। अपनी नाकामी को सफलता समझना हर झूठ को अपने सच कहलवाना। सबसे अच्छे आप हैं यही मनवाना है मान लेंगे हम बस इक काम कर दिखाना। इस देश की जनता को भीख नहीं चाहिए केवल अधिकार मांगती है। जिन्होंने अभी तक लूटा देश को उनका हिसाब है चुकाना। वोटों की खातिर ही सही एक अध्यादेश और लाना , सबको बराबर बराबर सब मिले ज़रूरी है। करना मुश्किल भी नहीं है चाहोगे कर दिखाना। आज़ादी की बात पर इक कविता सुनते जाना फिर सोचना किया क्या और क्या था कर दिखाना। सत्ता की भूख नेताओं की जाने कितने सितम ढायेगी सबको सत्ता पाना और जनता को धोखा खाना , बस बहुत हो गया विराम है लगाना। बेकार है हर दिन अपने ही गीत गाना सुनकर गरीबों की चीखें और बेटियों पर ज़ुल्म होते टीवी पर सभाओं में सभी तथाकतित झंडाबरदारों का मुस्कुराना बस बहस में जीत हार की बाज़ी लगवाना। आपकी थाली भरी है और जश्न होते आपके घरों में मातम है जनता के हिस्से नहीं पेट में इक भी दाना। ऐसा महान भारत किसी और को दिखलाना , सत्ता की चाहत में लोगों को बांटते जाना फिर भी देशभक्त कहाना। बंद करो आग को हवाओं से बुझाना , मिल सके तो राहत का पानी लाना। 
 

जश्न ए आज़ादी हर साल मनाते रहे ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

जश्ने आज़ादी हर साल मनाते रहे ,
पर शहीदों की हर कसम भुलाते रहे।

भगत सिंह और गाँधी सब भूले हमें ,
फूल उनकी समाधी पे चढ़ाते रहे।

दम भी घुटने लगा हम न ये समझे मगर ,
काट कर पेड़ क्यों शहर बसाते रहे।

जो लिखा फाइलों में न दिखाई दिया ,
लोग भूखे हैं नेता झुठलाते रहे।

दाग़  ही दाग़ कुछ इधर भी कुछ उधर भी ,
आइनों पर सभी दोष लगाते रहे।

आज सोचें ज़रा क्योंकर ऐसे हुआ ,
बाड़ बनकर रहे खेत भी खाते रहे।

यह न सोचा कभी आज़ादी किसलिए ,
ले के अधिकार सब फ़र्ज़ भुलाते रहे।

मांगते सब रहे रोटी ,रहने को घर ,
पांचतारा वो होटल बनाते रहे।

खूबसूरत जहाँ से है हमारा वतन ,
वो सुनाते रहे लोग भी गाते रहे।

   हम मान लेंगे आप जो भी कर रहे हैं वोटों की खातिर नहीं कर रहे हैं। हम ये भी मान लेंगे कि आपको सत्ता जाने का कोई भय नहीं है। इतना भी मान लेंगे कि आप को अपने लिए कुछ भी नहीं चाहिए आप तो देश की सेवा और चौकीदारी करना चाहते हैं। आपके स्वच्छ भारत अभियान गंगा सफाई से भ्र्ष्टाचार समाप्त करने और अच्छे दिन लाने की बात इक फरेब साबित हुआ हम फिर भी उनपर आपकी हर बात मान लेंगे। हम मान लेंगे अभी तक देश में कोई भी विकास नहीं हुआ था और आज जो भी है सब आपका किया विकास ही है। स्कूल अस्पताल देश भर में सड़कें बिजली सिंचाई को बांध से लेकर मनरेगा तक सब आपका करिश्मा है। देश का उद्योग तीनों सेनाओं की ताकत से परमाणु बंब तक सभी आपकी देन है। रात को दिन कहोगे हम मान लेंगे और भी जो चाहो मान लेंगे इतना भी कि आपको जीवन भर को सत्ता बिना चुनावी जंग के मिलने की भी बात मानी जा सकती है। मगर बदले में आपको इक अध्यादेश गरीब जनता की खातिर भी जारी करना होगा , उस में क्या क्या होगा बता देते हैं। 
        आपको शायद इतिहास अपनी तरह से याद हो मैं अपने ढंग से बताना चाहता हूं। कई साल पहले ज़मीदार के पास अधिकतम कितनी ज़मीन हो इसका कानून लागू किया गया है। सीमा से अधिक ज़मीन उस पर खेती करने वालों को मिली थी। आजकल राजनेताओं ही के पास हज़ारों एकड़ ज़मीन है सब जानते हैं , मगर मुझे उसकी बात नहीं करनी है। देश की संपदा का तीन चौथाई से अधिक हिस्सा केवल सौ परिवारों के पास है , उसका बटवारा हो गरीबों की खून पसीने की कमाई है जो। जितने भी राजनितिक दल हैं उनको देश की सेवा करनी है तो उनके पास धन दौलत और ज़मीन जायदाद किसलिए , कोई व्यौपार है ये। किसी भी संसद सदस्य विधानसभा सदस्य के पास सादगी से जीने भर की जगह और साधन रहें और बाकी गरीबों को बांटा जाना चाहिए , मतलब इतना है कि जैसा आपने बताया है सत्तर साल की लूट जिस में आपके शासन के चार साल भी शामिल हैं लुटेरों से छीन कर हकदार लोगों को हिस्सा दिया जाये। किसी भी उद्योगपति के पास महल और धन का अंबार नहीं रहना चाहिए , जी ये सच्चे राम राज्य की अवधारणा है। किसी सरकारी अधिकारी को लाखों की सुविधाएं और वेतन भी नहीं दिए जाने चाहिएं और उनके कर्तव्य नहीं निभाने या अनुचित कार्य करने की सज़ा भी कड़ी होनी चाहिए। सब से पहले देश के हर नागरिक को जीवन की मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराई जानी चाहिएं वीवीआईपी लोगों को किसलिए देश की जनता से बढ़कर सभी कुछ हासिल हो जब मालिक जनता है और अधिकारी और मंत्री उसके सेवक। जो भी दल अपने सदस्यों को आज़ादी नहीं देता अपने विचार व्यक्त करने की अपना मत जिसे मर्ज़ी देने की उसको लोकतंत्र में चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए। दलों की आड़ में गिरोह की तरह किसी डाकू का शासन नहीं होना चाहिए। भाषण बहुत हो चुके अब वास्तव में अपनी देशभक्ति दिखलाने का समय है अपना सर्वस्व देश को अर्पित करने वाला ही जनता का सांसद विधायक बन सके , त्याग की बात नहीं त्याग किया जाना चाहिए। धन दौलत के अंबार जिस किसी के पास भी हैं चाहे कोई धर्मं हो या और संस्थाएं सब का सब गरीबों को ऊंचा उठाने पर खर्च किया जाये। किसी भी के नाम पर स्मारक बनवाने की अनुमति नहीं हो और जितनी ज़मीन ऐसे काम को उपयोग की जाती रही है उसको गरीबों को घर स्कूल अस्पताल बनवाने को इस्तेमाल किया जाना चाहिए। इक कानून इक अध्यादेश से हर बाकी समस्याओं का निदान हो सकता है तो जिस से देश की दो तिहाई जनता की भलाई हो और कुछ लाख लोगों से ज़रूरत से ज़्यादा धन दौलत ले ली जाये उसे क्यों नहीं लाया जाना चाहिए। झूठे वादों और सत्ता पाकर शान से रहने को बंद करना तो होगा। टुकड़ों में जनता को बांटकर राहत नहीं दो कोई उपाय ऐसा करो कि सब को बराबर सब हासिल हो। इक अध्यादेश की दरकार है। और  भी कहने को कितना बाकी है किसान की मौत पर किसी दिन शोक तो मनाना , छोड़ो अब अपराधी बाबाओं और धनवालों को बचाना , जाते जाते इक ग़ज़ल सुनते जाना। आपकी आरज़ू है इतिहास में नाम है लिखवाना , मुमकिन है चाहो अगर कर दिखाओ अमीर गरीब का अंतर तो है मिटाना। जानती है जनता सारे ताज उछालना और हर तख्त को गिराना , धैर्य को हमारे अब मत आज़माना।


सरकार है बेकार है लाचार है - लोक सेतिया "तनहा"

सरकार है  , बेकार है , लाचार है ,
सुनती नहीं जनता की हाहाकार है।

फुर्सत नहीं समझें हमारी बात को ,
कहने को पर उनका खुला दरबार है।

रहजन बना बैठा है रहबर आजकल ,
सब की दवा करता जो खुद बीमार है।

जो कुछ नहीं देते कभी हैं देश को ,
अपने लिए सब कुछ उन्हें दरकार है।

इंसानियत की बात करना छोड़ दो ,
महंगा बड़ा सत्ता से करना प्यार है।

हैवानियत को ख़त्म करना आज है ,
इस बात से क्या आपको इनकार है।

ईमान बेचा जा रहा कैसे यहां ,
देखो लगा कैसा यहां बाज़ार है।

है पास फिर भी दूर रहता है सदा ,
मुझको मिला ऐसा मेरा दिलदार है।

अपना नहीं था ,कौन था देखा जिसे ,
"तनहा" यहां अब कौन किसका यार है। 

Tuesday, 18 September 2018

भगवान भी भारत भुमि छोड़ गये ( व्यंग्य कथा ) डॉ लोक सेतिया

  भगवान भी भारत भुमि छोड़ गये ( व्यंग्य कथा ) डॉ लोक सेतिया 

    आज बताता हूं अभी तक नहीं बताया क्योंकि मुझे खुद उसकी बातों का ऐतबार नहीं आता था। कोई है जो हर पल मेरे साथ रहता है और मुझसे अपनी व्यथा कहता रहता है। भगवान है यही बताता है मैं उसपर हंसता हूं और मेरे हंसने पर वही खिलखिलाता है , मुझे खुश देख खुश वो हो जाता है। बाकी दुनिया का हर कोई मुझे रुलाता है। कभी सामने कभी सपने में चला आता है , मेरे किसी भी काम नहीं आता है। मैंने कई बार मौत मांगी है नहीं देता और कोई भी मुझे कत्ल करने जब जब आता है वही मुझे बचाता है। मुझे मरने क्यों नहीं देता मैं शिकायत भी करता हूं। साफ बात है भगवान से मैं कभी नहीं डरता हूं। मुझे पागल कहता है खुद को भी पागल कहलवाता है। पागलपन का सबसे मधुर नाता है , भगवान हमेशा समझाता है। पागलपन हम दोनों को बेहद भाता है , मगर औरों को पागल बनाना हमें नहीं आता है। मैंने उस पर भी लिखे हैं व्यंग्य कई पढ़कर उसको बहुत लुत्फ़ आता है बार बार पढ़ता है याद दिलाता है। जाने खुद पर हंसने में उसे कैसा मज़ा आता है। कोई जब भी मुझे महफ़िल में बुलाता है बनकर तमाशाई संग संग जाता है। मुझे नज़र आता है औरों को क्यों नहीं दिखाई देता , मेरे सवाल को सवाल उठाकर उलझाता है। जिनको देखना ही नहीं मुझे नहीं उनसे कोई भी नाता है। अच्छा भी लगता है मगर बातें बहुत बनाता है , लो पहुंच गए हम इक महफ़िल में और अचानक कहीं वो छुप जाता है।
            ये इक मेला है जिसमें बच्चा खो जाता है। बिना सोचे समझे हर कोई ताली बजाता है। झूठ के पुल हर वक्ता बनाता जाता है मगर उस जगह रेत ही रेत है पानी नहीं नज़र आता है। वो पुरानी कहानी फिर से दिखाई देती है किताब का हर वर्क पुराना है नया शासक अपने नाम की जिल्द से सजाता है। फिर कहता है मेरा संविधान देश को चलाता है संविधान बोलता नहीं क्या हालत उसकी सत्ताधारी बनाता है। सभा में हर कोई खुद अपने ही गुण गाता है किसी और की झूठी तारीफ करता है दिल में जिसे खराब समझता है मगर इसी तरह उल्लू सीधा किया जाता है। भगवान बाद में सभी का सच मुझे समझाता है। ये जो आज किसी को महान घोषित कर रहा था उसकी पीठ में घाव लगाता है। किसी का नहीं हुआ न कभी होगा सबको अपना बताता है , जिस भी जगह जाता है उसी रंग का हो जाता है। गिरगिट भी इसको देख अपने को कम पाता है। किसी को किसी की बात पर रत्ती पर भरोसा नहीं है सबको सभी का झूठ नज़र भी आता है। कोई भी झूठ से दुश्मनी नहीं करता दोस्ती निभाता है। ये सब कब बदलेगा मरे ज़ुबान से सवाल निकल आता है , मरे बात पर कथा कोई सुनाता है। सरकार ने नया पुल नफरतों से बनवाया है , सबको उसी पुल से गुज़रने का फरमान सुनाया है। कतार में सभी को उसने लगाया है , कोई नदी नहीं है जहां उसने पुल बनाया है टोलटैक्स की तरह अपनों को बिठाया है। लूटा सभी को कुछ को भगाया है , कोई उसकी बात समझ नहीं पाया है , हर गुनाह का दोष किसी और पर लगाया है। सब हाथ जोड़ कर खड़े हैं सामने उस जैसा कोई नहीं समझा रहे हैं , सब एक जैसे हैं दल भी नेता भी इस राज़ को छुपा कर भी घबरा रहे हैं। आज़ादी की बात पर मुझसे कहते हैं तकदीर कोई किसी की बदलता नहीं है , कायरता है जो ज़ुल्म खा कर मुस्कुरा रहे हैं। मैंने उनको इक ग़ज़ल सुनाई है 65 साल होने पर किसी शायर ने कही जगजीत सिंह ने गाई है।


                 टीवी पर चैनल खुद को सारे जहां से सच्चा बता रहे हैं भगवान मुस्कुरा रहे हैं। सच किसे कहते हैं हम भी नहीं समझ पा रहे हैं। मीडिया वाले विज्ञापन के पलड़े में तुले जा रहे हैं , जो खिला रहे हैं उसी की गाये जा रहे हैं। भगवान कहां हैं सुनते हैं कि आ रहे हैं , भगवान जानते हैं क्या खिचड़ी पका रहे हैं। उधर टीवी पर सीरियल में भगवान को फ़िल्मी धुन पर नाच नाच कर मना रहे हैं , नाचने को नचनियां बुला रहे हैं। झटके लटके ठुमके लगा रहे हैं , भगवान को खुश करना है या खुद अपना दिल बहला रहे हैं। आप को हम सीधा प्रसारण दिखा रहे हैं , भगवान हमारे साथ हैं आकाश मार्ग से देखने आये हैं अपनी आंखों से दुनिया का हाल बिना विमान चालक आसमान पर खुद भी उड़ रहे हैं मुझको भी उड़ा रहे हैं। आपकी दुनिया क्या यही है जब पूछा तो सच में बहुत शरमा रहे हैं। कहना पड़ा भगवान क्या बनाकर इंसान को पछता रहे हैं , बोले बताओ कहीं इंसान नज़र भी आ रहे हैं। हैरान कर दिया भगवान को सभी लोग क्या नज़र आ रहे हैं। कुछ सोच बीच आकाश रुककर हवा में इक कथा सुनाने की बात से मुझे शायद बहला रहे हैं। चुप मुझे कहा है आगे जो सुनाई देगा लिखूंगा भगवान के वचन हैं पढ़ना , आसन लगा रहे हैं। 
      ये लोग खुद को इंसान समझते ही नहीं तो इंसानियत की बात कैसे होती भला। कोई हिंदु मुस्लिम सिख ईसाई बताता है तो कोई जाति क्षेत्र से समझता उसका नाता है। कोई नेता कोई अधिकारी कोई ख़ास कोई आम कोई अगड़ा कोई पिछड़ा कोई दलित कोई स्वर्ण कोई कारोबार कोई अभिनेता कोई खिलाड़ी कोई किसान कोई मज़दूर हर कोई कुछ और अपनी पहचान बताते हैं। पुरुष हैं कि महिला हैं इसका भी बना लिया है भेदभाव और कितनी दीवारें उठा रहे हैं , अपने को भला और सभी को बुरा बतला रहे हैं। अच्छाई क्या है उसको भुला रहे हैं , दुनिया को जन्नत नहीं दोजख बना रहे हैं स्वर्ग जैसी धरती को नर्क बना लिया है मगर अपनी करनी पर नहीं पछता रहे हैं। कोई नहीं समझता है मैंने सबको हाथ पांव ही नहीं सोचने को दिमाग भी और समझने समझाने को अन्तरात्मा भी दी हुई है और किसी को बुराई की राह जाने या अच्छाई की राह चलने को कभी मैं आदेश नहीं देता। जो खुद करते हैं उसको मैंने किया कहते हैं मेरे साथ कितना अनुचित है करते जो अपने कर्मों के आरोप दुनिया वालों पर भी और मुझी पर लगा रहे हैं। सब  सामने देखा है तुमको भी दिखलाया है , अब इस दुनिया से मेरा नहीं मतलब कोई मैंने कोई जहां बसाया था तुम लोगों ने खुद  उसे बर्बाद किया और इसको बनाया है। चलो किसी अदालत में बेदखली का स्टाम्प पेपर लिखवाते हैं , उसके बाद अलविदा कहते हैं भगवान ने निर्णय किया है दुनिया को दुनिया वालों के भरोसे छोड़ जाते हैं। उठो भी मुझे पत्नी ने नींद से जगाया है , फिर वही ख़्वाब मुझे रात भर आया है। सपनों ने सभी को कितना तड़पाया है , हर बार कोई नया सपना बेचने को लाया है। सपनों से जनता को बहलाकर राज चलाया है , हमने खोया है सभी कुछ सत्ता वालों ने सब पाया है। भगवान कब का चले गये छोड़ कर बाकी जो बची है झूठी मोह माया है। उसका नाम लेकर किस किस ने चूना लगाया है। बाहर किसी ने घंटी बजाई है कोई आया है , जाकर देखा कोई नहीं है जाने किस का साया है। 

Sunday, 16 September 2018

तुम बताओ है कहीं ऐसा जहां ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

  तुम बताओ है कहीं ऐसा जहां ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा" 

                                ( ये ग़ज़ल अटल जी के नाम )

तुम बताओ है कहीं ऐसा जहां ,
राजनेता दर्द को समझें कहां। 

जब सितारा टूट कर गिरने  लगा ,
चुप रहे दोनों ज़मीं औ आस्मां। 

लोग मानेंगे नहीं कोई कभी  ,
एक नेता आदमी सा था यहां। 

अब किसी से पूछता कोई नहीं ,
बस्तियों से उठ रहा कैसा धुआं। 

सबको अपनी बात कहनी आ गई ,
बेज़ुबांनों  की , नहीं कोई   ज़ुबां। 

कर गया कितना अंधेरा मुल्क में ,
वो जला करता था खुद बन कर शमां। 

कौन था "तनहा" सभी को कर गया ,
पूछता है धूल से खुद कारवां।

Saturday, 15 September 2018

अंधेरी कोठरी में कोई रौशनदान नहीं है ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

 अंधेरी कोठरी में कोई रौशनदान नहीं है ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

एक गुड़िया की कई कठपुतलियों में जान है , आज शायर ,ये तमाशा देखकर हैरान है। 

ख़ास सड़कें बंद हैं तब से मरम्मत के लिए , ये हमारे वक़्त की सबसे सही पहचान है। 

मस्लहत आमेज़ होते हैं सियासत के कदम , तू न समझेगा सियासत तू अभी इनसान है। 

इस कदर पाबंदी-ए-मज़हब कि सदके आपके , जब से आज़ादी मिली है मुल्क़ में रमज़ान है। 

कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए , मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिंदुस्तान है। 

मुझमें रहते हैं करोड़ों लोग चुप कैसे रहूं , हर ग़ज़ल अब सल्तनत के नाम एक बयान है। 

एक बूढ़ा आदमी है मुल्क़ में या यों कहो - इस अंधेरी कोठरी में एक रौशनदान है। 

 


 

          यकीनन आज फिर से उसी मोड़ पर है देश , आज इतिहास अपने को दोहरा रहा लगता है , शायद दुष्यंत कुमार की इस ग़ज़ल से बेहतर आजकल के दौर को कोई नहीं समझा सकता है। मगर एक बड़ा अंतर है , आज कोई बूढ़ा आदमी नहीं है अंधेरी कोठरी में उजाला लाने के लिए। शायद आज बहुत कम लोग जानते हों कि वो बूढ़ा आदमी कौन था। उस से बढ़कर हैरानी की बात ये भी है कि इस ग़ज़ल की गूंज विदेश तक जा पहुंची थी और किसी ने सवाल पूछा था ये किस की बात है जो शायर कहना चाहता है। आपकी जानकारी के लिए वो बूढ़ा आदमी जयप्रकाश नारायण जी थे और आपात्काल की अंधेरी कोठरी से बाहर लाने का काम उन्होंने ही किया था , भले ये बात कहना वाला शायर तब दुनिया में नहीं रहा था। मुझे नहीं लगता आज कोई भी कवि शायर या लिखने वाला देश के दर्द को उतना गहराई से समझता है और महसूस करता है। इसीलिए आज भी देश की दशा को बयान करने को दुष्यंत कुमार की ग़ज़लें ही याद आती हैं और मुझे अपनी बात उसी से शुरू करनी ज़रूरी लगी है। अल्लामा इक़बाल की भी कुछ बातें शामिल की जाएं तो और भी आसानी होगी। आपको अगर उनका नाम याद नहीं तो तराना -ए -हिन्दी , सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा याद कर लो। देखते हैं उनकी शायरी क्या समझाती है।

जमहूरियत :-

इस राज़ को इक मर्दे-फिरंगी ने किया फ़ाश , हरचंद कि दाना इसे खोला नहीं करते 

जमहूरियत इक तर्ज़े-हुकूमत है कि जिसमें , बन्दों को गिना करते हैं तोला नहीं करते। 

अर्थात इक यूरोपवासी ने ये राज़ बताया कि बुद्धीमान इसे खोला नहीं करते कि जमहूरियत शासन करने का वो तरीका है जिस में गिनती की जाती है बंदों की उनकी काबलियत को नहीं परखा जाता है। 

नई तहज़ीब :-

उठाकर फेंक दो बाहर गली में , नई तहज़ीब के अण्डे हैं गंदे 

इलेक्शन मिम्मबरी कैंसिल सदारत , बनाए खूब आज़ादी के फंदे 

मियां नज़्ज़ार भी छीले गए साथ , निहायत तेज़ हैं यूरुप के रन्दे। 

अर्थात ये नई तहज़ीब किसी काम की नहीं है। चुनाव असेंबली के मेंमबर बनाना आज़ादी देने नहीं छीनने को फंदे की तरह हैं और विदेशी रन्दे की हैं जो बढ़ई के हाथ ही छील देते हैं। बात साफ है हमारा लोकतंत्र जनता को ही घायल करता है। मगर आज दुष्यंत इक़बाल जयप्रकाश नहीं है तो कौन समझाए हमें जाना किधर चाहिए ऐसे हालात में। इस सब को ध्यान में रखकर चर्चा करते हैं। 

           संविधान क्या कहता है और होता क्या है 

  संविधान में जनता विधायक और सांसद चुनती है ऐसा प्रावधान है और उसके बाद विधायक या सांसद चुनते हैं अपना नेता जो मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री होता है। मगर क्या ऐसा होता है शायद नहीं। आपको पता है संविधान में दलों की कोई बात नहीं है , ये सब कुछ लोगों ने सत्ता हासिल करने को बनाया है। सब दल एक जैसे हैं कोई भी देश और समाज की सेवा की खातिर नहीं है सबको सत्ता चाहिए शासन का अधिकार चाहिए। और सब एकमत हो जाते हैं अपने लिए सुविधा वेतन और विशेषाधिकार हासिल करने की बात पर। ये कैसी व्यवस्था है मालिक भूखा और उसके नुमायंदे हलवा पूरी खाएं मौज उड़ाएं। जो वास्तविक हिंदोस्तान है वो चीथड़े पहने है और सत्ता पर बैठा शानदार पहनावा और शाही ठाठ बाठ से देश की जनता का धन उड़ाता है जिस बेदर्दी से पहले किसी ने नहीं उड़ाया था। लाज की बात बेमानी है इनकी असलियत क्या है सब जानते हैं। उपाय है कि हम किसी दल या किसी तथाकथित बड़े नेता या किसी घराने के वारिस को नहीं महत्व दें और किसी और द्वारा खड़े व्यक्ति को नहीं बल्कि खुद अपने बीच में से अच्छे सच्चे ईमानदार आदमी को खड़ा करें और धनबल से नहीं अपने विवेक से अधिकार का उपयोग कर वास्तविक देशसेवक लोगों को चुनकर भेजने का अपना कर्तव्य निभाएं। देश को 543 ईमानदार सांसद और कुछ हज़ार विधायक देने हैं हमने जो सादगी से जीवन यापन करें और देश की पाई पाई देश पर खर्च करें। संभव है मगर कठिन तो होगा क्योंकि ऐसे लोग आपके पास वोट मांगने नहीं आएंगे न ही आपको झूठे वादों से बहलायेंगे। खुद आपको जाना होगा अच्छे लोगों के पास उन्हें देश और समाज की सेवा करने को कहने को। हमने नियम कायदे कानून बना तो लिए हैं मगर उनको लागू भी करना है पालन भी करना है ये विचार ही नहीं किया। धीरे धीरे हमारा समाज नैतिकता को अपने जीवन से बाहर करता रहा है और इक ऐसा समाज बना लिया है जो अपने स्वार्थ में अंधा होकर जिस शाख पर बैठा हुआ है उसी को काट रहा है। विडंबना की बात ये है कि इस सब का ज़िम्मेदार वही समाज का अंग है जिस पर देश की व्यवस्था और कानून को लागू करने का दायित्व रहा है। नेता अधिकारी लोग देश के खलिहान को बाड़ बनकर बचाने की जगह खुद ही खाते रहे हैं। इक्का दुक्का कोई नेता कोई अधिकारी अगर ईमानदारी की राह चलना भी चाहता है तो बाकी देश को लूटने वालों ने उन्हें बेबस किया है और उनकी राह में रोड़े अटकाए हैं। देश को अपना समझा ही नहीं बल्कि विदेशी शासकों से कहीं बढ़कर लूटा है। कोई ग्लानि कोई अपराधबोध नहीं किसी को भी अपना कर्तव्य नहीं निभा पाने का।
       सवाल किसी भी सरकार का नहीं है , जैसे सभी पहले से और अधिक बढ़ावा देते आये हैं। केवल बातें ही करते हैं काम नहीं और देशभक्ति को आडंबर बना लिया है। हर सरकारी विभाग ने समाज को छलने का काम किया है। अस्पताल हैं कि खुद ही बीमार हैं , शिक्षा विभाग है कि देश को दिशा देने की जगह और भटकाता रहा है। ये कैसी शिक्षा है जो जीवन में उपयोगी ही नहीं है केवल किताब रटने और इम्तिहान में सफल होना आधार और मापदंड बना तो लिए मगर समझना भी नहीं चाहा उस से हासिल क्या है। हम कहने को गीता कुरान की बात करते हैं मगर कोई पढ़ता नहीं पढ़कर समझता नहीं। रोटी रोटी बोलने से पेट नहीं भरता है ,झरने की तस्वीर आपकी प्यास नहीं बुझा सकती है। मगर हमने शिक्षा और धर्म को केवल इक दिखावा बना डाला है। ये हम किस तरफ बढ़ रहे हैं , हर कोई अवसर मिलते ही मनमानी करने लगता है। बड़े उद्योगपतियों और कारोबार करने वालों ने शासकों से गठबंधन कर गरीब जनता को और गरीब ही बनाया है खुद और अधिक की चाहत में। हमने धनवान होने को सफलता का सूचक समझ लिया है बिना विचारे कि दौलत आई कैसे है। हर सरकारी योजना की नाकामी इसी कारण है करोड़ों किसी की तिजोरी में चले जाते है मगर होता कुछ भी नहीं। कारोबार और निर्माण में हद दर्जे की बेईमानी से सड़क बनती है टूट जाती है पुल बनने के साथ गिर जाते हैं। गंगा और गंदी होती जाती है , लोग हर दिन और बदहाल हो रहे हैं ये कैसी व्यवस्था का बोझ ढो रहे हैं।
         राजनीती इतनी गंदी हो चुकी है कि सवाल तालाब के पूरे पानी को बदलने का है। मगर ऐसा हो कैसे ये रास्ता बतलाये कौन। कोई रास्ता दिखलाने वाला नहीं है जो भी सामने आता है देश को किसी अबला की तरह नोचता है उसकी बोटी बोटी खाता है। अपने स्वार्थ की खातिर दंगे फसाद करवाता है लोगों को आपस में लड़वाता भिड़वाता है , कोई भी भारतवासी नहीं कहलाता है। जाति धर्म ऊंच नीच की दीवार उठाता है , इन सभी ऊंचाइयों में सूरज नज़र नहीं आता है। जितनी रौशनी लगती है उतना अंधियारा बढ़ता जाता है। कौन समझता है भगवान भी है जिसका अपना बही खाता है और अनुचित करने से भय खाता है। इंसान इंसानियत को भूलता जाता है मंदिर मस्जिद गुरूद्वारे गिरिजाघर आडंबर करने जाता है धर्म की राह नहीं अपनाता है।
खुदा पत्थर के आदमी पत्थर दिल और हर हाथ पत्थर उठाये है डर भी है और डराता भी है। हर कोई नज़रें चुराता है। बोलना सबको आता है बात नहीं कोई समझता न समझ पाता है। आप डॉक्टर बने इंजीनियर बने शिक्षक बने मगर उद्देश्य अपना कर्म नहीं केवल पैसे का नाता है। हर कोई आपसी भाईचारा निभाता है , अपने संगठन के लोगों को अनुचित करने से रोकना नहीं उसका गलत आचरण करने पर साथ निभाता है , देश भाड़ में जाये उनका क्या जाता है।
                              जिनका फ़र्ज़ था सच की रक्षा करना सच को ज़िंदा रखना , उनका सच से कोई नहीं नाता है। अख़बार टीवी चैनल या बुद्धिजीवी कहलाने वाला सत्ता संग रंगरलियां मनाता है। झूठ को सच बनाकर सरकार से सहूलियत पाता है। ये समझता है देश का भाग्यविधाता है मगर यही गलत तस्वीर बनाकर देश को भटकाता है , सरकारी बैसाखियों के दमपर आगे बढ़ता इतराता है। मुफ्त का माल समझ जनता के पैसे से मौज उड़ाता है। साधु संतों का नहीं सही मार्ग से कोई नाता है सबको जितना मिले लालच बढ़ता जाता है और इनका सत्ता से सरकारी विभागों से सबसे गंदा नाता है कोई नियम कानून इनके सामने नहीं आता है। सब को अंधेरा हर तरफ बढ़ता नज़र भी आता है मगर हर कोई आरोप और पर लगाकर चैन की नींद सो जाता है। रौशनी करने को दिया कोई कब जलाता है। हम जिधर जा रहे हैं उधर अंजाम क्या होगा नहीं कोई सोचता न कोई समझता है न ही कोई समझाता है। सिंघासन पर बैठा हुआ घना अंधेरा है जो सूरज कहलाता है। कहीं नहीं कोई जननायक नज़र आता है , कोई सत्येंदर दुबे जब सरकारी योजनाओं का सच बताता है तो देश का पीएमओ भी नज़रें चुराता है और सच बोलने पर सत्येंदर दुबे कत्ल कर दिया जाता है। 27 नवंबर हर साल आता है मगर देश सरकार मीडिया ऐसे लोगों को भूल जाता है। उजाला करना है जिसे वही चिरागों को बुझाता है। आप को कभी अपने देश का ख्याल आता है , क्या देश से समाज से कोई आपका नाता है। देश से प्यार दिखावा नहीं जो किसी दिन जाग जाता है और देश प्यार के गीत गुनगुनाना देशभक्ति नहीं बन जाता है। देश आपको हर दिन बुलाता है क्यों यहां  हर कोई अधिकार ही मंगता है फ़र्ज़ नहीं निभाता है। आपको कभी पुराना गीत याद आता है।

       हम लाये हैं तूफान से किश्ती निकाल के , इस देश को रखना मेरे बच्चो संभाल के।

कौमी तराने नहीं हम लोग बेमतलब के गीत लिखते हैं गाते हैं सुनते सुनाते हैं। हवाओं से फैसला चिरागों का करवाते हैं। अंधेरे हैं जो और और बढ़ते जाते हैं।
            
                                        

Friday, 14 September 2018

चलो काम आ गई दीवानगी अपनी ( कथा कहानी ) डॉ लोक सेतिया

 चलो काम आ गई दीवानगी अपनी ( कथा कहानी ) डॉ लोक सेतिया

      हर कहानी कहानी होती है मगर हर कहानी की भी कोई कहानी होती है। कोई कोई ग़ज़ल महफ़िल को सुनानी होती है , कोई होती है जो उनको समझानी होती है। कहानी की सफलता इसी में छुपी हुई है कि जो हक़ीक़त है सबको फ़साना लगती है। बात जाएगी बहुत पीछे भी और आगे भी मगर शुरुआत आज की बात से। थोड़ी हैरानी हुई जब उनका फोन आया मुझे कहने लगे ऐसी बेबाकी आपकी जान की दुश्मन नहीं बन जाये किसी दिन। आजकल सब डरते हैं आपको डर नहीं लगता , किस किस पर व्यंग्य बाण चलाते हो। शुभचिंतक हैं तभी आगाह कर रहे हैं सच कहें बहुत भाते हो। जी ये वही हैं जो दोस्त हैं मगर रकीब जैसे हैं , नहीं कोई इश्क़ विश्क की बात नहीं है लिखते हैं मगर खुद को जाने क्या समझते हैं , किसी को अपने बराबर नहीं मानते। किसी ने किसी और शहर से मेरे बारे पूछा था तो जवाब था कौन है ऐसे किसी लेखक को हम नहीं जानते। जी जानते हैं पहचानते हैं मेरे पास आते हैं बतियाते हैं , बस मानते नहीं हैं। मनवाना हमने भी ज़रूरी नहीं समझा।
     दो घंटे बाद खुद आ गए और राज़ बता गए , फोन किया नहीं करवाया गया था। वीआईपी जैसी शख्सियत है उनकी , उनका कहा मना कौन करता। इसको आप चेतावनी समझ सकते हैं मगर मेरा कोई लेना देना नहीं है। मैंने कहा जनाब उनको बता देना खुद हमारी यही चाहत है , कत्ल होने की आदत है। नहीं समझ आई उनको मेरी बात , लगा शायद मज़ाक कर रहा हूं। मैंने कहा देखो आप अकेले ही नहीं तमाम शहर वाले अपने पराये सब सोचते हैं मैं जो लिखता हूं किसी पर असर नहीं होता और मैं बेकार कलम घिसाता रहता हूं। अगर इतना बड़ा कोई शख्स मेरी सच्चाई से घबराता है और मुझे डराता है धमकाता है और सज़ा देने को आतुर है तो मेरा लिखना वास्तव में सार्थक है। देखो मरना तो एक बार सभी को है साहस से जीकर मरना बेहतर है कायरता से ज़िंदा रहने से कहीं।
            न जाने क्या सोचकर उन्होंने बात बदल दी। और शायरी की बात करने लगे। अचानक बोले आप निडर हैं तो फिर कभी न कभी किसी न किसी से इश्क़ किया होगा। मुझे उनसे ऐसा सबूत मांगने की उम्मीद कदापि नहीं थी। मैंने कहा जनाब इस उम्र में खुदा खुदा करते हैं आप क्या बेलज्ज़त गुनाह करते हैं। पर वो नहीं माने और कहने लगे प्रेम विवाह किया होगा आपने। जी नहीं मैंने उनको देखा ही नहीं था बताया। कोई तो कभी मिली होगी आपको जिसको देख कर दिल धड़कता होगा , इतनी अच्छी कविता ग़ज़ल यूं ही तो नहीं लिखते हैं आप। मैंने उनको सच बताना ही उचित समझा , मैंने बताया कि आपकी तरह कॉलेज का एक सहपाठी मुझे डरपोक बताया करता था और शर्त लगाता था मैं किसी से प्यार नहीं कर सकता क्योंकि मुझमें किसी लड़की से बात करने की हिम्मत ही नहीं है। मगर उसको भी बताया था मैं जैसी लड़की चाहता हूं अपने प्यार के लिए कोई नज़र नहीं आती मुझे। आपको कैसी महबूबा की तलाश थी यही बता दो भाई , उनकी ज़िद फिर उसी विषय पर अड़ी हुई थी , दिल की बात बतानी नहीं चाहिए अपने रकीब जैसे दोस्त को। मगर अब बताने में जाता कुछ भी नहीं। कोई सिलसिला ही नहीं , याद आई अपनी ग़ज़ल।

                 फिर नये सिलसिले क्या हुए , सब पुराने गिले क्या हुए।

    मैंने कहा , कोई होती कविता सी कोमल ग़ज़ल जैसे नाज़ुक। जिसे सोने चांदी के गहने नहीं मुहब्बत की चाहत हो। प्यार ही जिसको लगती सबसे बड़ी दौलत हो। मुझे जो ख्वाब में दिखाई देती है वही बिल्कुल वही हक़ीक़त हो। अब उनको लगा वास्तव में ऐसे दीवाने से कौन दिल लगाता और सपनों की असलियत कौन किसे समझाता। तो मिली कोई , आखिरी सवाल उठते उठते किया बेदिली से। मैंने कहा जी मिल गई है , मेरी शायरी मेरी कविता मेरी ग़ज़ल मेरी कहानी ये सब मेरा इश्क़ ही तो है मेरा जूनून है। हर पल यही साथ है और किसी के लिए दिल में जगह बची ही नहीं। ये आपकी दीवानगी आपको जाने कब ले डूबेगी कहकर बाहर निकल गए वो मुझे अकेला छोड़ कर। चलो काम आ गई दीवानगी अपनी।

मैं हिंदी आपकी हिंदी , मेरा कोई नहीं ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया

 मैं हिंदी आपकी हिंदी , मेरा कोई नहीं ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया 

       आज मेरा दिन है , मगर ये दिन कैसा है , मेरी सुबह लगती है जैसे रात है अंधेरी रात। सूरज की बात ही क्या चांद की हसरत भी क्यों , कोई सितारा तक नहीं चमकता। कितनी बेबस हूं खुद अपना तमाशा देखती हूं हर साल , वो जो कहते हैं हम हिंदी वाले हैं , उनको हिंदी भाषा की नहीं अपनी चिंता होती है। आज फुर्सत नहीं तो दो दिन बाद मना लेंगे या दो दिन पहले मना भी चुके हैं। 14 सितंबर को इक दिन भी मुझे नहीं देते और दावा करते हैं जीवन हिंदी के नाम किया है। सब कुछ विदेशी है आपका कम से कम हिंदी का दिवस तो हिंदी जैसा होता , अपने तो उसे भी उपहास या औपचारिकता बना दिया है। अपनों का दिया दर्द अधिक तड़पाता है गैरों का सहना कठिन नहीं है। एक दिन महिला दिवस की बात करने से महिलाओं की कोई भलाई नहीं हुई ठीक उसी तरह से इक दिन हिंदी हिंदी का आलाप करने से होगा क्या बताओ। हिंदी को ऐसे मत सताओ , हिंदी है माथे की बिंदी गाकर हिंदी का दिल नहीं दुखाओ। हिंदी की हालत समाज की गरीब औरत की जैसी है जो हाथ जोड़ती है विनती करती है रो रो कहती है मुझे बचाओ , मुझे बचाओ। हिंदी दिवस मनाने से बेहतर है हिंदी को वास्तव में अपनाओ , हिंदी को अधिक की चाहत नहीं है समानता का अधिकार दिलवाओ। हिंदी को लूट का साधन मत समझो , इनाम सम्मान , तमगे इन सब में मुझे नहीं उलझाओ। आज इक सवाल का जवाब सच सच बताओ। हिंदी से पाया है मिला है कितना हिंदी को अर्पित किया है क्या सोचो और समझाओ। किसी और भाषा से मुझे खतरा नहीं है खुद हिंदी वालों से डरती है हिंदी अपनों से बचाओ। हिंदी खूबसूरत है कभी प्यार की नज़र से देखो दिल लगाओ , झूठी चमक दमक के झांसे में नहीं आओ। मैं सभी की हूं सभी को समझती समझाती हूं , सबको कहो अब तो मेरे हो जाओ। मेरा हाथ थामो मेरे साथ नाचो मेरे संग झूमो गाओ। हिंदी दिवस पर मुझे और मत रुलाओ। हिंदी हिंदी बोलने से हिंदी को मिलता नहीं चैन , चलो आज कोई और तरीका सोचो हिंदी को मंच पर नहीं घर गली विद्यालय , सरकार , बोलचाल और व्यवहार में जगह दिलवाओ। हिंदी की शान निराली है लोग नहीं जानते अगर तो दिखला कर मनवाओ। हिंदी को कोई सहारा नहीं चाहिए , हिंदी सक्षम है मगर जकड़ी हुई है बेड़ियों में , आज मेरे हाथ की हथकड़ियां खुलवाओ मेरे पैरों की बेड़ियां कटवा कर कोई पायल पहनाओ। हिंदी को हिंदी लिखने वालों को उनकी महनत की उचित कीमत मिले कुछ ऐसा कर दिखाओ। भूखे पेट भजन नहीं होता , हिंदी वालों की नहीं हिंदी की जीवन भर सेवा करने वालों की भूख का अंत कैसे हो उपाय बताओ। 
                            टेलीविज़न अखबार फ़िल्में कारोबार , हिंदी बिना किसी का नहीं उद्धार , सब को हिंदी केवल अपने कारोबार की खातिर ज़रूरी लगती है। पत्रिका छापने वाले भी किताबों को छापने वाले भी खूब कमाई करते हैं मगर कोई भी हिंदी लिखने वाले साहित्य की साधना करने वाले को इतना भी नहीं देता है कि दो वक़्त निवाला भी उसे मिल सके। ये हिंदी दिवस की शुभकामनाएं देते हैं , कोई विशेषांक निकालते हैं , कोई अख़बार कविता पाठ करवाता है कोई साहित्य अकादमी के नाम पर मौज मनाता है। अपनों को रेवड़ियां बांटकर इतराता है। हिंदी को स्वालंबी नहीं विवश बनाता है , सब कहने को बही खाता है , किधर से आता किधर जाता है , आडंबर कितने रचाता है। हर सरकार चाटुकारों को अकादमी के पद पर बिठाती है , लिखने की आज़ादी उसी जगह खत्म हो जाती है। छापते हैं जो ठाकुर सुहाती है। असली नकली दांत वाला हाथी है , खाने को अलग दिखाने को अलग , और मद में है उत्पाती है। दूल्हा नहीं है दुल्हन नहीं है , हर कोई बाराती है। हिंदी भाषा बिनब्याही बिटिया रह जाती है और हिंदी लिखने वाला न किसी का बेटा है न किसी का दामाद है न ही किसी का नाती है।  लोग भूख से मर जाते हैं , कई कर्ज़दार ख़ुदकुशी कर जाते हैं , मगर ये हिंदी के लेखक जाने किस मिट्टी के बने हैं जो जीते नहीं रोज़ ज़िंदा रहकर भी मर जाते हैं। अधिकार मिलता नहीं बिना मांगे यहां और ये नहीं मांगते बिखर जाते हैं। ज़ुल्म सहने की हर इक हद से गुज़र जाते हैं। खाली हाथ जाते हैं दुनिया के बाज़ार में कुछ नहीं खरीदते वापस घर जाते हैं। 

Tuesday, 11 September 2018

बिगबॉस चाहते हैं ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

        बिगबॉस चाहते हैं ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

     आप क्या चाहते हैं बाकी लोग क्या चाहते हैं आपकी समस्या है। आपके चाहने से हर बात नहीं हो जाती। हर कोई आपकी बात मानने को विवश नहीं है। घर में आपकी अपनी बिगबॉस पत्नी भी कितनी भी तानाशाही सोच रखती हो वो भी आपको उस सीमा से से अधिक विवश नहीं कर सकती जो आपको इस हद तक अपमानित करती हो कि आप अपनी आज़ादी की खातिर बगावत करने पर आमादा हो जाएं। हर कोई संविधान कानून और मानवाधिकरों की बात करता है आये दिन। मगर साल दर साल पता भी नहीं कौन है जो अपने शानदार महलों जैसे घर में कुछ लोगों को जेल की तरह कैदी बनाकर मनमानी करता है। मोगैम्बो खुश हुआ की आवाज़ वाले खलनायक को खुश करना उसके इशारे पर बिना सोचे समझे कुछ भी करना। देश में कुछ लोग हैं जिन पर कोई नियम कानून लागू होता ही नहीं , हर कानून हर नैतिक मूल्य को ठेंगा दिखाते हैं मगर वीवीआईपी जैसा रुतबा पाते हैं। सब जिनके किससे सुनते सुनाते हैं आज उनकी कहानी आपको सुनाते ही नहीं दिखाते हैं। चलो फलैशबैक में जाते हैं।
                          राधा कौन है और राजू कौन सब जानते हैं। बोल राधा बोल , बोलना ही होगा। सत्ता चाहती है जनता भी राधा की तरह बोले चुप नहीं रहे मगर क्या बोले ये शासक की मर्ज़ी है। संगम फिल्म में राधा के कपड़े उठाकर फ़िल्मी नायक पेड़ पर बैठा खुश है गाता है , बोल राधा बोल संगम होगा कि नहीं। नहीं कभी नहीं। बोलती है राधा मगर सत्ता के पास  कपड़े हैं , राजा नंगा है की बात नहीं है जनता नंगी है। गांधी जी ने देखा था लोग नंगे बदन हैं तो इक धोती में रहने का संकल्प लिया था। यहां गांधी जी भी शर्मसार हैं कोई खुद इतनी बार कपड़े बदलता है और इतनी सजधज से रहता है कि भूखी नंगी जनता को चिढ़ाता लगता है। मुझ से सीखो बिना काम धाम किये कैसे मौज मनाते हैं , राजनेता वोट नहीं लेते देश की जनता के कपड़े चुराते हैं। फिर होगा कि नहीं गाते हैं , भाषणों में यही कहते हैं और सबसे हामी भरवाते हैं। इसी को समझते हैं दिन अच्छे आते हैं , आपको झूठे सपने दिखलाते हैं अपनी हक़ीक़त सब से छुपाते हैं। मैंने ब्लॉग पर पहले टीवी शो पर बहुत लिखा है , कौन बनेगा करोड़पति या ज़िंदगी के क्रोस्स्रोड्स से टीवी सीरियल तक सभी को देखकर लगता है इनको बनाने वाले समझते हैं दर्शक नासमझ और बेवकूफ ही नहीं बल्कि दिमाग का इस्तेमाल नहीं करने वाले लोग हैं और उनकी मज़बूरी है जो परोसा जाये उसे ही पसंद करना। पैसा पैसा पैसा सबको किसी भी तरह किसी भी कीमत पर जितना अधिक मुमकिन हो कमाई करनी है। बेशक इन सब से देश समाज को कितना भी नुकसान होता हो। आज बिगबॉस की बात बताते हैं। 
              बिगबॉस के घर में कितने छुपे कैमरे हैं घर वालों को सामने नज़र आते हैं। मगर ये बंसी बजाने वाले सोशल मीडिया से आप सभी का सभी कुछ चुराते हैं। गुनहगार फेसबुक वाले क्यों कहलाते हैं आप शरीफ हैं जो गुनाह खुद करवाते हैं। सवाल पूछते हैं भाग जाते हैं जवाब देने से इतना खौफ खाते हैं , तभी तो संसद भी बेहद कम जाते हैं विदेश में रासलीला मनाते हैं। देश की जनता को केवल टीवी रेडिओ पर नज़र आते हैं , जो देश वाले देश से बाहर हैं उनको डिन्नर खिलाते हैं और खूब तालियां बजवाते हैं। जब से आये पूरा देश बिगबॉस के घर जैसा जेल है और आप अपना हुक्म चलाते हैं। चलो वापस टीवी शो बिगबॉस पर आते हैं। आज आपको नेपथ्य की बात समझाते हैं पर्दे के पीछे छुपे राज़ सामने लाते हैं।
          ये खेल है या खेल के नाम पर इक नाटक है जो वास्तविकता को नंगा करता है दिल बहलाता है। चंद सिक्कों में हर कोई बिक जाता है , पैसे और शोहरत की हवस की खातिर अपनी आज़ादी को बाहर छोड़ बिगबॉस के घर में आता है। मौलिक अधिकार देश का कानून समाज के मूल्य सब बाहर रह जाते हैं। कुछ लोग किसी की शर्तों में बंधकर इस में रहने आते हैं , बंधुवा लोग क्या कहलाते हैं। जनहित याचिका वाले इस पर नहीं बोलते घबराते हैं। क्या आपके घर भी कुछ दिन रहने महमान आते हैं , क्या उनको इतना भी सताते हैं , वो जितने दिन आपके घर में हैं क्या कठपुतलियां बन जाते हैं। आपके इशारों पर रोते हैं आपके चाहने पर गाते हैं , क्या ऐसे ही किसी को जगाते हैं। गाना बजाते हैं उनको नचवाते हैं , क्या क्या ज़ुल्म ढाते हैं। घर में यातना शिविर चलाते हैं और घर आये महमानों को जी भर रुलाते हैं , दर्शक क्या सैडिस्टिक प्लेजर पाते हैं। क्यों किसी को परेशान होता देख मज़ा उठाते हैं। ये लोग क्या दुनिया ऐसी चाहते हैं। ये कैसे नियम हैं खुद किसी को अपने केबिन में बुलाते हैं और घर में गलत काम करने का हुक्म सुनाते हैं। बिगबॉस कैसे घर के मालिक हैं जो आग बुझाते नहीं खुद ही आग लगवाते हैं और उसके बाद बुझाने की आड़ में जमकर भड़काते हैं। ऐसा लगता है अभी भी मनोरंजन के नाम पर देश की न्याय व्यवस्था का उपहास होता है , कोई हद किसी बात की नहीं ये एहसास होता है। ये घर क्या देश के संविधान नियम कानून से ऊपर है जो इसमें कुछ भी करने देने की इजाज़त है। खेल नहीं है ये कोई शो भी नहीं है ये हमारी मानसिकता पर लानत है।
            ये एंकर क्या है जो हर घर वाले को बहुत भाता है , यही है जो उनसे अधिक पैसा हर एपिसोड से कमाता है। जब जिसे चाहे प्यार जताता है , जब मर्ज़ी खुलेआम मज़ाक उड़ाता है। हर घर में रहने वाले को समझाता है जो मुझसे बगावत करता नहीं बच पाता है। कभी किसी को डराता है धमकाता है कभी अच्छे दिन की बात कहकर दिल बहलाता है। राजनीति भी बिगबॉस के घर जैसी है , आगे समझ जाना है क्या लगती कैसी है। आपकी ऐसी की तैसी है। पैसा पैसा पैसा सबको किसी भी तरह किसी भी कीमत पर जितना अधिक मुमकिन हो कमाई करनी है। बेशक इन सब से देश समाज को कितना भी नुकसान होता हो। जिस तरह लोकतंत्र बनी हुई राजनितिक दलों की रखैल है उसी तरह मनोरंजन कुछ लोगों की मनमानी करने और दौलतमंद बनने का गंदा खेल है।  हर नेता सत्ता को वरमाला समझ जनता को राधा मान उसके साथ रंगरलियां मनाना चाहता है।  ज़ोर-ज़बरदस्ती का प्यार संगम नहीं कुछ और कहलाता है। कर्तव्य किसी को याद नहीं अधिकार ही अधिकार है देश का संविधान खामोश है कानून लाचार है। कोई भी नहीं है जो अपने किये पर शर्मसार है। टीवी शो की आड़ में किसी को कितने भी पैसे देकर आप विवश नहीं कर सकते कुछ भी करने करवाने को।  देश का कनून आपकी जागीर नहीं है। कोई आवाज़ नहीं उठाता क्योंकि हर कोई इनका यार है।  सोशल मीडिया आपको कोई सरोकार है। ये भी गुनाह है चौकीदार को कोई करता खबरदार है। आज देखते हैं ये कैसी सरकार है।

सरकार है बेकार है लाचार है - लोक सेतिया "तनहा"

सरकार है  , बेकार है , लाचार है ,
सुनती नहीं जनता की हाहाकार है।

फुर्सत नहीं समझें हमारी बात को ,
कहने को पर उनका खुला दरबार है।

रहजन बना बैठा है रहबर आजकल ,
सब की दवा करता जो खुद बीमार है।

जो कुछ नहीं देते कभी हैं देश को ,
अपने लिए सब कुछ उन्हें दरकार है।

इंसानियत की बात करना छोड़ दो ,
महंगा बड़ा सत्ता से करना प्यार है।

हैवानियत को ख़त्म करना आज है ,
इस बात से क्या आपको इनकार है।

ईमान बेचा जा रहा कैसे यहां ,
देखो लगा कैसा यहां बाज़ार है।

है पास फिर भी दूर रहता है सदा ,
मुझको मिला ऐसा मेरा दिलदार है।

अपना नहीं था ,कौन था देखा जिसे ,
"तनहा" यहां अब कौन किसका यार है।

       सरकार क्या होती है बिगबॉस कौन है , सब जानते हैं देख कोई नहीं सकता दोनों ही हैं मगर दिखाई नहीं देती हैं। किरदार निभा रहे तमाम लोग अपना अपना मगर खुद निर्णय करने की आज़ादी किसी को भी नहीं है। इक वही है जो बिगबॉस बनकर सबको बस में रखकर अपना दिल बहला रहा है।  जनता हर तरफ रोती चिल्लाती है मगर वही अकेला नाच रहा है गा रहा है। सामने उसी का चेहरा नज़र आ रहा है , हर जगह उसी का फोटो इश्तिहार पर है आपकी बदहाली सामने है वो मुस्कुरा रहा है। इंसान कागज़ बन गया है संवेदना मर गई है आप को भूख लगी है वो हलवा पूरी खा रहा है। आपको तरसा रहा है अच्छे दिन का मतलब अब तो समझ आ रहा है। टीवी पर विज्ञापन बार बार आ रहा है बिगबॉस पुलिस और कानून को जोड़ीदार बना रहा है। मुझे फिर इक शेर दुष्यंत कुमार का याद आ रहा है। अंत में वही बंदा सुना रहा है।

                    अब किसी को भी नज़र आती नहीं कोई कोई दरार ,

                     घर की हर दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तिहार। 

                      इस सिरे से उस सिरे तक सब शरीक ए जुर्म हैं ,

                     आदमी या तो ज़मानत पर रिहा है या फरार।


Saturday, 8 September 2018

बदल चुके हैं मकसद देश की राजनीति के ( मेरा आंकलन ) डॉ लोक सेतिया

       बदल चुके हैं मकसद देश की राजनीति के ( मेरा आंकलन ) 

             ( छह साल का सफर मेरा ब्लॉगिंग का ) 900 वीं पोस्ट -  डॉ लोक सेतिया 

     आज भी इक पोस्ट और कल भी देखी इक दूसरी पोस्ट को किसी लेखक दोस्त की टाइमलाइन पर फेसबुक की पढ़ने के बाद मुझे लगा जो भी मैंने खुद अपने वास्तविक जीवन में देखा समझा हमारे देश और राज्य की राजनीति के लोगों को लेकर उसका मंथन किया जाये। मंथन में क्या निकलता है अभी मैं भी नहीं जनता हूं क्योंकि जब भी लिखने बैठता हूं इक विषय या विचार मन में होता है। कागज़ कलम से कोई खाका पहले नहीं बनाता मैं , जो मन में आता है सीधे ब्लॉग पर लिखता जाता हूं। अब अगली पंक्ति क्या होगी मुझे नहीं मालूम। 6 साल तीन महीने पहले शुरुआत की थी ब्लॉग लिखने की तब इक ख्याल रहा था कि मेरी सभी विधाओं की रचनाओं को समेटना हो तो 500 पोस्ट लिखनी होंगी। तब लगता था ऐसा इक ख्वाब है जो पूरा होना कठिन है। मेरे सपने ज़्यादातर सपने रहते हैं मैं उन्हें हक़ीक़त बनाने में असफल रहता रहा हूं। ये शायद पहली बार है कि सोचा नहीं था जो वो वास्तव में हुआ है और आज 900 वीं पोस्ट लिखने बैठा हूं। 

                    देश सेवा नहीं शुद्ध धंधा बन गया है राजनीति अब 

     जाने क्यों मेरे साथ अक्सर होता रहा है जो लोग राजनीति में थे या आना चाहते थे , और मुझसे जान पहचान रही  तब , उनकी असलियत और दिखावा अलग अलग ही नहीं विरोधाभासी भी था। जिन महान नेताओं की आदर्शवादी और विचारधारा की राजनीति हमें आकर्षित करती थी उनकी सोच जाने कब की गुम हो चुकी है। सत्ता पाकर शान से जीना और अपनी ईमानदारी की कमाई से नहीं देश के खज़ाने की लूट से ऐशोआराम हासिल करना मकसद बन गया है। अलग अलग समय पर अलग अलग दलों के लोगों से जान पहचान हुई और जो शुरू में बड़ी बड़ी बातें करते थोड़े दिन बाद उन्हीं को वास्तविक जीवन में विपरीत आचरण करते देखा। डंकल प्रस्ताव के विरोध की बात करने वाले उस सरकार में शामिल थे या बाहर से समर्थन कर रहे थे जिसने हस्ताक्षर किये प्रस्ताव पर। वामपंथियों से अधिक दोगलापन शायद किसी और में नहीं होता है।  मैंने वास्तविक जीवन में ईमानदारी की राह पर चलने वाला नैतिकता का पास रखने वाला कोई भी राजनेता नहीं देखा है। किताबों में पढ़ा है , बेशक लालबहादुर जेपी जैसे तमाम लोग हुए हैं देश में वास्तविक नायक कहला सकते हैं। मगर अपने करीब जिनको भी पाया बड़े ज़ालिम और मतलबपरस्त लोग ही रहे हैं। 
बेहद शरीफ समझे जाने वाले नेता को सत्ता मिलते ही बदमाशों की तरह व्यवहार करते देखा है , जिस थाली में खाया उसी में छेद करते देखा। इक कविता लिखी थी जो यहां दोहराता हूं :-

बड़े लोग ( नज़्म ) लोक सेतिया

बड़े लोग बड़े छोटे होते हैं ,
कहते हैं कुछ ,
समझ आता है और ,
आ मत जाना ,
इनकी बातों में ,
मतलब इनके बड़े खोटे होते हैं।

इन्हें पहचान लो ,
ठीक से आज ,
कल तुम्हें ये ,
नहीं पहचानेंगे,
किधर जाएं ये ,
खबर क्या है ,
बिन पैंदे के ये लोटे होते हैं।

दुश्मनी से ,
बुरी दोस्ती इनकी ,
आ गए हैं ,
तो खुदा खैर करे,
ये वो हैं जो ,
क़त्ल करने के बाद ,
कब्र पे आ के रोते होते हैं। 
     नेताओं में इंसानियत गधे के सर पर सींग की तरह मिली नहीं।   ऊपर जो   7 सितंबर 2012 को लिखी हुई रचना है शत प्रतिशत सच है ।  कुछ दर्द कुछ ज़ख्म कभी नहीं खत्म होते। सत्ता का अहंकार इंसान को वहशी बना देता है और शरीफ समझे जाने वाले लोग किसी को बर्बाद कर देते हैं अपनी ज़रूरत पूरी करने की खातिर। ये अकेला अध्याय नहीं है , जिस जिस से वास्ता पड़ा सभी स्वार्थी और मतलब के लिए कुछ भी करने वाले निकले। दोस्त बन बन के मिले हमको मिटाने वाले। आज बहुत लोग हैं जो सत्ता में हैं मगर जिनकी वास्तविकता को मैंने करीब से देखा है। जो तब विचारधारा की बातें करते थे आज तानशाही तौर तरीके बन गए हैं और चाहते हैं उनके दल को छोड़ बाकी दल खत्म करने हैं। कई लोग ऐसे हैं जो कल किसी और दल में थे उससे पहले किसी और में और जिस भी दल में हों उसके बड़े नेताओं के तलुवे चाटते रहे हैं। इक बार इक सभा में दो दोस्त एसोसिएशन से सहयोग की मांग करने लगे तो उनसे सवाल किया आपका मकसद क्या है। 
एमएलए  बनना क्या लाज़मी है समाज सेवा करनी है तो। जवाब था यार पहले इक दल में घर से लगाया भी वसूल नहीं हुआ अब तो सारी कमी पूरी करनी है। एक साथी को देखा कि कोई काम नहीं था न कुछ पास था , किसी दल को सुरक्षित क्षेत्र से उम्मीदवार चाहिए था खड़ा किया सांसद बन गया और तकदीर से गठबंधन हुआ सत्ता मिल गई और ज़मीन से आसमान पर पहुंच गया। उसे देख कर कितने लोग उसी राह चल पड़े जबकि खुद उस की हालत धोबी के गधे की तरह है न घर का न घाट का। ये जो दूसरे की थाली में अधिक देखने की लाईलाज बीमारी है डॉक्टर भी उस रोग का उपचार तलाश करना छोड़ रोगी बन जाते हैं। कोई बात है जो बुराई भी लुभाती है। शरीफों का ज़माने में अजी बस हाल वो देखा कि तौबा कर ली हमने। तीसरी कसम की तरह सोच लिया आगे से किसी नेता को अच्छा समझने की मूर्खता नहीं करनी है। 
          शायद 15 -20  साल पहले कोई जाना माना नाम वाला आया मेरे शहर में। अख़बार वालों से मिला और जयप्रकाश नारायण जी के संपूर्ण क्रांति आंदोलन को दोबारा शुरू करने की बात की। इक दोस्त जो अख़बार को खबरें भेजता था जानता था मैं 1975 में दिल्ली में 25 जून को जेपी जी को सुनने गया था रामलीला मैदान में और उनका प्रशंसक हूं। उन को बताया और फोन पर बात की मेरे घर आकर मिलने की चाहत है। मैं दूध का जला छाछ भी फूंक फूंक कर पीता था इसलिए कुछ सवाल कर दिए जो उनको अनावश्यक लगे थे। मैंने कहा था आप अपना काम छोड़ इस काम में आओगे या किसी दूसरे के नाम से दल बनाकर जगह बनाने की कोशिश ही है। क्या जेपी के आंदोलन में शामिल उन लोगों की राह तो नहीं अपनाओगे जो अवसर मिलते ही शासक बनकर घोटाले करते आये हैं। खुद जेपी अपने जीवन में निराश हुए थे जब जनता पार्टी की सरकार कुछ लोगों ने अपनी सत्ता की चाहत में तोड़ी गिराई थी और देश की आशाओं को धूल में मिला दिया था।  वो मुजरिम हैं देश का भरोसा तोड़ने के।
         शायद साल बाद उनका फिर बिना बताये आना हुआ , घर की डोर बैल बजी तो पांच लोग बाहर खड़े थे , आदर सहित लाये घर में। चाय आदि चल रही थी और एक शख्स मुझे थोड़ा अजीब नज़र से देखता हुआ शायद कुछ सोच रहा था। अचानक अपने झोले से इक पुराना अख़बार निकाल कर दिखा कर कहने लगे ये लेख अपने लिखा है। जनसत्ता अख़बार में छपा हुआ मेरा लेख था मगर मुझे तब तक पता नहीं था छपने का। पढ़ा दोबारा तो हंसी आई और मैंने उन जाने माने व्यक्ति से शब्द शब्द पर ज़ोर देकर सवाल किया क्या यही सच नहीं है , बताओ इतने दिन किया क्या है। केवल जगह जगह कुछ लोग अपनी मर्ज़ी के ही नहीं अपनी मर्ज़ी के वर्ग से चुनकर उनको पदों पर होने की घोषणा कर दी। जनता से कोई सम्पर्क नहीं किया , यही सब तो लिखा था। तब मैंने उनको आईना दिखलाया था कि जो लोग खुद अपनी नौकरी ठीक से नहीं करते वेतन लेते हैं घर बैठे और वास्तव में राजनीति या टीवी चैनल का कोई काम करते हैं। खुद पहले अपने को देख लें।
                                        कितने लोग कितनी बातें हैं , मगर संक्षेप में यही है कि किसी को किसी विचारधारा से कोई मतलब नहीं है। हवा के रुख को देख कर इधर उधर जिधर किधर आते जाते हैं। ऐसे लोग देश और समाज को देना कुछ भी नहीं चाहते हैं। हद तो ये है कि बहुत बार जिस दल में हैं उसी के नेताओं को आपसी बातचीत में गलियां भी देते हैं मगर सामने जाकर दुम हिलाते हैं। भाई क्या करें गलत है सब मगर अपने दल के बड़े नेता का विरोध नहीं कर सकते , मुझे समझाते हैं। गलती उनकी नहीं है , खुद हमारी है जो उनके बहकावे में आते हैं। कुछ खास घरों के लोग बिना आधार नेता कहलाते हैं , बाप दादा जाने किस किस के नाम की कमाई खाते हैं। इक खास बात है ये नेता आपसे वोट मांगने आते हैं तब भी आपकी बात नहीं सुनते , मैंने अक्सर ऐसे में सीधे सवाल पूछने का हौसला किया है और इनको बचकर भागते देखा है। अभी चुनाव है फिर बात करेंगे कहते हैं , मगर फिर कभी बात होती नहीं। जीते तो वक़्त नहीं हारे तो कहना बेकार है।
        अन्ना के आंदोलन की बड़ी चर्चा है , उसकी वास्तविकता शायद अभी भी बहुत कम लोग समझे हैं। मेरे पास एसएमएस आया इक पार्क में आने को निवेदन किया गया था। कुछ सोचकर इक बार जाकर देखना उचित लगा , मगर जाकर देखते ही समझ आया कि ये तो जेपी के आंदोलन की नकल भी हास्यसपद रूप से है। कोई माइक पर गलियां देता खड़ा था और तालियां बज रही थीं। मंच पर जो लोग फूलमाला डाले बैठे थे वास्तव में तहसील और बिजलीघर या अन्य सरकारी दफ्तरों में रिश्वतखोर लोगों की दलाली करने वाले लोग थे जो दो नंबर की कमाई से धनवान बन गये थे मगर समाज में उनकी हैसियत दो टके की भी नहीं थी। ये उनको अवसर लगा था आगे बढ़कर राजनीति में घुसने और अधिक मालदार बनने का। सम्पूर्ण क्रांति को भी इसी तरह के लोगों ने असफल किया था। लोग शोर और भीड़ को देख सोचते नहीं ये कौन लोग है और इनका अतीत क्या है। केजरीवाल वो शख्स है जो नौकरी में रहते वेतन की सुविधा हासिल कर विदेश में पढ़ाई करने जाता है मगर वापस आकर नियम का पालन कर विभाग में काम नहीं करता दो साल बल्कि घर पर बैठ छुट्टी लेकर नियमों की खिल्ली उड़ाता है। जब नौकरी छोड़नी पड़ी राजनीति में आने को तो विभाग को लिया क़र्ज़ नहीं चुकाना चाहता है मगर ईमानदारी की कसमें खाता है , मज़बूरी में वापस देना पड़े क़र्ज़ तो विभाग को नहीं देश के पी एम को चेक भिजवाता है। मज़ाक करता है या मज़ाक उड़ाता है अपनी असलियत दिखलाता है मगर आपकी समझ में नहीं आता है।
              चार साल पहले कोई नेता सामने आता है , कोई नहीं समझ पाया कैसा जाल बिछाता है। आपको अच्छे दिन का सपना दिखलाता है जो बाद में चुनावी जुमला कहलाता है। देश फिर से धोखा खाता है उसकी मंशा को कहां समझ पाता है। आपको बार बार यही बताता है , अभी तक किसी भी सरकार ने कुछ भी नहीं किया है। खुद कुछ भी नहीं करता चार साल मस्ती में झूमता गाता है , कभी उस कभी इस देश को जाता है , खाली हाथ वापस लौट आता है , ये भारत देश है इस के पास साधन और संपदा का भंडार है किसी भी से भीख की नहीं दरकार है। समझने की बात इतनी सी है कुछ लोग नहीं देश के सब कुछ के मालिक हर कोई बराबरी का हकदार है। आखिर निकला क्या चोर थानेदार दोनों के साथ देश का चौकीदार है। ये अच्छे दिन हैं या देश का किया बंटाधार है। मची हुई क्यों हाहाकार है , कोई नहीं अपने झूठे वादे से रत्ती भर शर्मसार है। मेरा आपसे इक छोटा सा सवाल है , क्या हमारा देश सवा सौ करोड़ का अपने बीच से किसी भी दल की बात छोड़कर 542 ऐसे संसद नहीं खोजकर चुन सकता जिनको करोड़ों की शानो शौकत और सुख सुविधा की चाहत नहीं और जो सादगी से विलासिता पूर्ण जीवन को छोड़ देश की सेवा कर सकते हों। अगर ऐसे देशभक्त नहीं हैं तो देश और समाज कंगाल है।
                           आखिर में संविधान की बात। संविधान किसी को प्रधानमंत्री सीधे नहीं घोषित करता है , संविधान में जनता सांसद विधायक चुनती है जो बाद में अपने में किसी को नेता चुनते हैं। आप इस उस नाम की चर्चा करते हैं क्या समझते हैं , खुद ही संविधान को दरकिनार करते हैं। जो लोग संसद विधायक बनकर भी दलगत अनुशासन की तलवार से डरकर चुप रहते हैं वो किस लोकतंत्र की बात कहते हैं। जनतंत्र को राजनीतिक दलों ने बंधक बना लिया है जनता का शासन नहीं दल का है और शायद दल भी कहने को है केवल गिने चुने लोग हर जगह अपनी मर्ज़ी से मनोनीत करते हैं अपने ख़ास चाटुकार लोगों को। डेमोक्रेसी को कत्ल किया जा चुका है इक बेजान लाश को मोम के पुतले में ढकने की तरह।

Friday, 7 September 2018

सच का आना बंद किया है ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

    सच का आना बंद किया है ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

      झूठ का धंधा खूब चल रहा है , सच तो कोई बेचता भी नहीं बिकता भी नहीं खरीदने की औकात ही नहीं। फिर भी सच को घर में घुसने क्या अपनी गली तक नहीं आने देते। सीसी टीवी कैमरे से देख लेते हैं और द्वार बंद कर लेते हैं फोन पर उपलब्ध नहीं है सुनाई देता है। घर दफ्तर की कॉलबेल बजती नहीं सुनाई देती। सोशल मीडिया पर ब्लॉक किया इतना काफी नहीं था जो अब ईमेल भी ब्लॉक करने लगे हैं। दावा फिर भी है हम आपकी आवाज़ सुनना चाहते हैं और आपकी बात समझना चाहते हैं। मुझे ये जानकर बिल्कुल भी हैरानी नहीं हुई न बुरा लगने की बात है। यही वास्तव में सच की जीत है और झूठ के हारने की बात है , उजाले की किरण भी है और अंधियारी भी रात है। खेल नहीं जंग है शह -मात है। आप बताओ क्या हालात है। सच की अर्थी है कि झूठ की बरात है। सूखा मचा रही है अजब ये बरसात है , जी हां दुष्यंत की बात है। 
      झूठ काहे डरता है जब सभी कुछ उसी के हाथ है। तलवार बंदूक चाकू छुरी सब अपने साथ है। जिसे चाहें कत्ल करें कानून का जब साथ है। फिर घबराहट क्यों है किस बात का पसीना माथे पर चमक रहा है धड़कन रुकी है कि और बढ़ी हुई दिल का कैसा उत्पात है। सांस को सांस आती नहीं दम घुटने की हालात है। सच का दर इतना है कि सोना भी दुश्वार है , ख्वाब में दिखती लटकती सच की तलवार है। झूठ मुझे कहता है आकर सच तू तो मेरा पुराना यार है। मैं क्या बताऊं तुझे मेरा अपने पर नहीं इख़्तियार है , झूठ की आदत है झूठ से व्यौपार है। सच तुम बताओ तुम्हारा तो बंटाधार है। झूठ की जब हर तरफ हो रही जय जयकार है , न जाने किस बात से फिर भी शर्मसार है। सच को माना नहीं सच है क्या जाना नहीं सच को अपनाना नहीं , कोई भी नया बहाना नहीं। सच की हर राह रोक कर भी चैन नहीं करार नहीं , बेगुनाह करार होकर भी मिला दिल को करार नहीं। सच का कसूर नहीं है जनाब आपको खुद अपने पर ऐतबार नहीं। झूठ होता कभी सच का तो पैरोकार नहीं। आपकी किसी बात पर मैं कर सकता तकरार नहीं। और कोई झगड़ा हमारा तो मेरे यार नहीं। हर बार माना जो चाहा तुमने मगर नहीं इस बार नहीं।

मंदिर मेरे दिल का ( मेरी चाहत , मेरी कल्पना ) - आलेख - डॉ लोक सेतिया

         मंदिर मेरे दिल का ( मेरी चाहत , मेरी कल्पना ) 

                                  आलेख -डॉ लोक सेतिया 

             हम लोग कितना बदल चुके हैं। कभी बैलगाड़ी और साईकिल होती थी आज मोटर कार बस और जहाज़ नहीं चांद और मंगल पर जाने की बात होती है। समय के साथ सब कुछ बदलते है और जो लगता है अब काम नहीं आता उसको छोड़ देते हैं। हम तर्क की कसौटी पर कसते हैं तब यकीन करते हैं। भला नये युग में पुराने ढंग से जीना संभव है , आज इंटनेट मोबाइल फ़ोन ईमेल के ज़माने में चिट्ठी लिखना कैसा लगता है। मैं अभी भी ईमेल से भी किसी को कोई बात लिखता हूं तो खुला खत शीर्षक देने की नासमझी करता हूं। सरकार अधिकारी अख़बार वाले सत्ताधारी नेता पहले रद्दी की टोकरी में डालते थे बिना कोई जवाब दिये या समस्या का निदान किये , अब ईमेल ही ब्लॉक कर देते हैं। उनकी पसंद की बात नहीं आईना दिखाओ तो बहुत आसान है ये करना। आप उनके महलों के सामने जाकर शोर मचाते रहो आपकी आवाज़ उनके शीशे की दीवारों के पार जाती ही नहीं है। साउंडप्रूफ हैं उनके घर दफ्तर और सरकारी शिकायत की ऐप्स भी। तरीके बदल गये हैं शासकों के तौर नहीं बदले हैं। हमको उनसे वफ़ा की है उम्मीद जो नहीं जानते वफ़ा क्या है। 
    जब कोई नहीं सुनता तो लोग भगवान खुदा अल्लाह वाहेगुरु जीसस की चौखट पर इबादत करते रहे हैं , परस्तिश करते हैं आरती प्रार्थना करते रहे हैं अरदास करते रहे हैं।  कभी इस कभी दर पर जाते रहे हैं। हर देवी देवता को मनाते रहे हैं , चढ़ावा चढ़ाते महिमा गाते रहे हैं। मिला कहां कुछ मन ही मन पछताते रहे हैं। दुनिया वाले अपने अपने खुदा भी बनाते रहे हैं। धर्म की किताबें पढ़ते पढ़ाते रहे हैं , झूठी आशा को जगाते रहे हैं। आवाज़ देकर बुलाते रहे हैं। दर्द से मेरा दामन भर दे या अल्ला। 


     मैं भी जाता रहा तमाम ज़िंदगी मंदिर मस्जिद गुरूद्वारे। इक दिन बेहद निराश था और इबादतगाह मंदिर मस्जिद या गुरुद्वारा जो भी था , सहा नहीं गया और आंसू बहने लगे। कितने लोग थे आस पास कोई नहीं पास आया आंसू पौंछने तो क्या हाल पूछने को भी। जानते थे सभी मिलते रहते थे मगर सब अनदेखा कर चले गए तो समझा यहां आकर सबक किसी ने सीखा नहीं शायद। मगर दुनिया से नहीं गिला ऊपर वाले से भी किया नहीं मैंने और वापस आकर इक नज़्म लिखी थी। 

    शोर ( कविता )

वो सुनता है ,

हमेशा सभी की फ़रियाद ,

नहीं लौटा कभी कोई ,

दर से उसके खाली हाथ।


शोर बड़ा था ,

उसकी बंदगी करने वालों का ,

शायद तभी ,

नहीं सुन पाया ,

मेरी सिसकियों की ,

आवाज़ को आज खुदा। 

         क्या ये हमारी गलती नहीं है , हम वहीं बार बार जाते हैं और हर बार खाली दामन लौट आते हैं। कभी गीता कभी बाइबल कभी और सब चौपाई चालीसा गाते हैं। ईश्वर को धरती पर आने को बुलाते हैं। भला स्वर्ग जन्नत छोड़ देवी देवता इधर आते हैं। हम मूर्खता करते हैं जो बंदों को भी खुदा बनाते हैं और वही जो मसीहा कहलाते हैं हम पर सितम ढाते हैं। चलो देख लिया ये सभी खुदा ऊपर नीचे वाले नहीं किसी काम आते हैं। कोई और नुस्खा आज़माते हैं। इंसानियत का कोई ऐसा मंदिर बनाते हैं और उसमें सबक नये युग का समझते हैं समझाते हैं। सब ताज उछाले जाएंगे सब तख़्त गिराये जाएंगे मिलकर गाते हैं अपने हौंसलों से अपनी दुनिया को बनाकर दिखाते हैं। कुछ समझते हैं समझाते हैं कर दिखाते हैं।
           ये ज़रूरी है आज पहले से कहीं ज़्यादा ज़रूरत है देश और आज़ादी से मुहब्बत की शिक्षा देने वाले इक मंदिर की। शायद पहले इसकी ज़रूरत ही नहीं थी , ये जज़्बा अपने आप दिल में पैदा हो जाता था। भगतसिंह राजगुरु गांधी सुभाष नाम लिखने लगे तो लाखों नहीं करोड़ों नाम भी और बेनाम भी शामिल करने होंगे। धर्म जाति दीन मज़हब जमात आदमी औरत कोई अंतर नहीं सब साथ एक दूजे से बढ़कर। मगर अब आजकल शोर ही शोर है , दावे सभी करते हैं मगर क्या इसे दसगभक्ति मानना उचित होगा। सवालिया निशान है कि देशभक्त होने का दम भरते हैं मगर देश की खातिर न जीते हैं न मरते हैं। देखा है इक भारतमाता का मंदिर बना हुआ है हरिद्वार में , शायद और भी बने होंगे। मगर उन को देखकर इक भावना जगती है पल भर को जब तक उस जगह हैं , थोड़ा दूर जाते ही इधर उधर नज़ारे देखने लगते हैं और वो भावना स्थाई दिल में बसती हो लगता नहीं है। मेरी कल्पना का मंदिर कैसा होगा आज बताता हूं , पहले ये बता देना चाहता हूं कि मेरे दिल में ये ख्याल आया कैसे। मेरी पत्नी ने सवाल किया आप को शिवजी के मंत्र आता है आपको पढ़ना चाहिए। मैं उस वक़्त इक देश प्यार की नज़्म की बात सोच रहा था , मैंने कहा मुझे लगता है कि मुझे ऐसे गीत ऐसी नज़्में ग़ज़लें सुननी पढ़नी और दोहरानी चाहिएं। मेरे लिए यही सबसे बड़ी इबादत है। 
       और इसी से इक कल्पना उभर रही है कि ऐसा मंदिर बनाया जाये , अब ये भी बताना है कि उस में कोई भगवान कोई देवी देवता कोई मूरत कोई तस्वीर नहीं लगी हो। भले कोई ऊंची इमारत भी नहीं हो बस इक बड़ा सा हॉल हो जिसमें किताबें ही किताबें हर तरफ हों। मगर उनको पढ़ना लाज़मी हो पढ़ाना भी सुकून देता हो , सर झुकाने की नहीं ज़रूरत माथा टेकने की नहीं माथे पर लगाने की आदत पहली की जैसी हो तो अच्छा है। किताबें हों मगर ऐसी नहीं जिन पर कोई राजनैतिक दल अपनी विचारधारा का लेबल लगा सके। केवल सच्ची देश समाज की भलाई की जनता की परेशानियों को समझाने वाली किताबें। मैंने बहुत थोड़ी पढ़ी हैं फिर भी जिनको उस मंदिर में रखना चाहिए ये कुछ नाम हैं शामिल किये जा सकते हैं। 
       टैगोर , मुंशी प्रेमचंद , दुष्यंत कुमार , नीरज , शरद जोशी , श्रीलाल शुक्ल , हरिशंकर परसाई , इक़बाल , फैज़ , साहित्य की हर विधा में ऐसी रचनाएं हैं जो हमारी निराशा को दूर करती हैं और नई आशा का संचार करती हैं। वो सुबह कभी तो आएगी।  नया ज़माना आएगा। जिन्हें नाज़ है हिन्द पर कहां हैं , प्यासा जैसी फिल्मों के नग्में। हक़ीक़त जैसी फ़िल्में। नया दौर। और भी साधना जैसी फिल्मों के गीत जो झकझोरते हैं। औरत ने जन्म दिया मर्दों को। शहीद जैसी फिल्मों की कहानियां और गीत। ऐसा बहुत बड़ा भंडार है हमारी विरासत का जिसे शायद हमने खो दिया है या बिसरा दिया है। कहीं ऐसा करना कोई अपराध तो नहीं है , मुझे लगता है।  जाने क्या क्या पढ़ते हैं सीखते सिखाते हैं जिनको समझते हैं काम आएंगे किसी मकसद को ज़रूरी हैं। तो क्या देश और समाज की बात सोचना लाज़मी नहीं है। केवल खुद अपने आप तक सोच को सिमित रखना कितना उचित है। शायद हमारे समय की वो पढ़ाई जिस में देश प्यार और समाज से सरोकार की भावना शामिल रहती थी अनिवार्य रूप से आजकल नहीं होगी , ऐसा इसलिए लगता है कि आजकल के बच्चों और युवकों की बातों में इनका ज़िक्र दिखाई देता नहीं है। बच्चे देश का भविष्य होते हैं और बचपन में ही नीव रखी जाती है देश से मुहब्बत की भावना की। आधुनिकता की दौड़ में हमने शायद सबसे महत्वपूर्ण शिक्षा के कार्य को भुला दिया है।