Tuesday, 14 August 2018

मैं लालकिला बोल रहा हूं ( व्यथा-कथा ) डॉ लोक सेतिया

    मैं लालकिला बोल रहा हूं ( व्यथा-कथा ) डॉ लोक सेतिया 

       मुझे जानते हो क्या , मुझे पहचानते हो क्या। मेरी कहानी सुनोगे क्या मेरा दर्द समझोगे क्या। तुम सब हर साल लालिकले से झंडा फहराते हो , भाषण देने वाले बदलते रहते हैं , भाषण भी बदल गये हैं। कोई वक़्त था मुझसे , मेरी मीनार से बोला हुआ हर शब्द जोश भरता था नई उम्मीद जगाता था। आज वो बात ही नहीं है जानते हो क्यों। तब लोग लालकिले पर खड़े होकर भाषण देने को अपनी शान नहीं समझते थे , तब मेरे पास आने से पहले सोचा करते थे समझा करते थे खुद की नहीं जन गण मन की बात कहनी है करनी है समझनी है। केवल समारोह नहीं था जश्न मनाना नहीं था संकल्प लिया करते थे संविधान की राह पर चलने और सभी को वास्तविक आज़ादी जीने के अधिकार देने का। ये 71 साल की बात है मगर मैं 71 साल का नहीं हूं , 470 साल हो गये हैं मुझे बने और 1638 से बनाना शुरू किया था और 1648 में बना लिया था दस साल में। शाहजहां को तो जानते हो उसी ने मुझे बनवाया था और दिल्ली को राजधानी बनाया था आगरा को छोड़कर। मैं इक गवाह हुन 400 साल के गुज़रे इतिहास का। दो दरवाज़े दिल्ली गेट और लाहौर और दो सभागार दीवाने ए ख़ास और दीवाने ए आम दोनों के नाम और मकसद थे जानते हैं। ये किला कोई केवल शासक के रहने और सुरक्षा करने को नहीं था। 11 मार्च 1783 को सिखों ने लालकिले में प्रवेश कर दीवाने ए आम पर कब्ज़ा कर लिया था और 1857 के बाद अंग्रेजी हुकूमत ने मुझे अपना बंदी बना लिया था। उनकी सेना के बाद भी 2003 तक मैं सेना के आधीन रहा हूं। मेरा आम लोगों से 200 साल का रिश्ता रहा है मेरी धड़कन आज भी जनता की धड़कन ही है , मैं शासकों का नहीं हूं न था न होना चाहता हूं। 
                किसे फुर्सत है मेरी लंबी दास्तान को सुने समझे , जो बीत गया सो बीत गया , मगर ये जो पिछले 71 साल हैं उनको कोई भुला नहीं सकता न भूल सकता है और भूलना भी नहीं। आज उसी की बात कहना चाहता हूं। शायद आज कोई उस भावना को नहीं समझेगा जब देश के दूर दराज से लोग दिल्ली आते थे 15 अगस्त 26 जनवरी को वास्तविक भावना लेकर। ये लिखने वाला तब घर से बिना बताये ही रात भर रेलगाड़ी का सफर कर आया था 26 जनवरी की झांकियां देखने और लालकिला भी देखने आया था। साथ दो किताबें खरीद कर ले गया था पांच पांच रूपये की , बड़ी कीमत हुआ करती थी पांच रूपये की तब। किसी का वेतन हुआ करता था पांच रूपये महीना उस समय। खिलौना भी खरीद सकता है और पहनने को आधुनिक परिधान भी जो नहीं थे उस के पास पायजामा पहनता था धारीदार , आज देखोगे तो कोई गंवार किसी का नौकर जैसा लगेगा मगर वो बड़े किसान परिवार का बेटा था। समझा था किसी गाइड ने समझाया था इक इक कोने में दर्ज इतिहास की बात को। याद नहीं कितना पैदल चल कर क्या क्या देखा था , कोई मकसद लेकर नहीं आया है मगर ऐसी ही दो चार ऐतिहासिक जगहों पर जाना या उसका गवाह बन जाना उस मन में दिमाग़ में इक विचार बनकर रह गया है जो आज भी है। मगर तब और आज कितना अंतर हो गया है याद करना चाहता है , मेरे साथ दिल की बात बांटना चाहता है। 
               मैं भी उदास हूं और लालकिला भी उदास है। आपको जो सजावट दिखाई दे रही है वो किसी दुल्हन के शादी के सुंदर महंगे लिबास जैसी है मगर ये दुल्हन की शादी नहीं है , जो है उसे कहने को अभी शब्द बना ही नहीं है। आह भर रही है दर्द झेल रही है अभी तक जंजीरों में जकड़ी हुई है। भूखी है प्यासी है और बेबस ही नहीं बेघर बार भी है , बिमार भी इतनी है कि कोई ईलाज असर नहीं कर रहा है। कैंसर का भी ईलाज हो रहा है आजकल मगर उसकी पीड़ा का अंत कोई नहीं करता। करना चाहता ही नहीं कोई , सत्ता को जनता की पीड़ा देखकर अफ़सोस तक नहीं होता दुःख दर्द समझने और मिटाने की बात क्या की जाये। ऐसा नहीं है कि 71 साल में देश की हालत बदली नहीं जा सकती थी सुधारी नहीं जा सकती थी। बहुत कुछ किया जा सकता था करना संभव था और आज भी है मगर शासन करने और सत्ता पर रहने को ही उद्देश्य बनाने वालों को ये सोचने की फुर्सत ही नहीं थी। जिस देश की आधी आबादी भूखी हो शिक्षा स्वस्थ्य और सुख सुविधा से वंचित हो उस देश में ऐसे समारोह और जश्न मनाने पर और रोज़ कितने ही बेकार आयोजनों पर लाखों हज़ार करोड़ रूपये खर्च करना गुनाह है देश और संविधान के साथ। समाधियां स्मारक बनाकर कोई उद्देश्य नहीं पूरा किया जा सकता है , उन लोगों का सपना अपने लिए मकबरे और समाधियां बनाना तो नहीं था , आज़ादी के अर्थ ऐसे छोटे हर्गिज़ नहीं थे। आज़ादी नहीं है आम नागरिक को कोई फर्क नहीं पड़ा है , काले अंग्रेज़ और सफ़ेद अंग्रेज़ इतना ही है। लालकिले से कहा कोई शब्द आज कोई एहसास दिलों में नहीं करवाता है क्योंकि भाषण देने वाले की आवाज़ बेशक जितनी बुलंद हो खुद उसी को अपने शब्दों का कोई महत्व समझ नहीं आता है। ऐसा संदेश जो दो पल बाद ही भुलाया जा सकता हो कितना अर्थहीन है। मुझे दूर से देखने वालो कभी मुझे , लालकिले को छू कर देखना। मेरी दीवार का हर पत्थर तुम्हें बहुत कुछ बता सकता है। मैं नहीं जनता कि कैसे और किसको आज़ादी की शुभकामाएं दूं मैं इस भारी मन से।

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