Friday, 24 August 2018

हम तो मर के भी ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

            हम तो मर के भी ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

        ज़िंदगी में तो सभी प्यार किया करते हैं , मैं तो मर के भी मेरी जान तुम्हें चाहूंगा। 

   कहते तो यही हैं ज्ञानीजन कि बाकी सभी जीव जंतु पशु पक्षी मरने के बाद भी काम आते हैं केवल आदमी ही है जो किसी काम नहीं आता मरने के बाद। मगर ऐसा नहीं है आदमी का बदन किसी काम नहीं आता हो बेशक मगर आदमी का नाम बहुत लोगों के काम आता है। कई राजनीतिक दल ऐसे ही बाप दादा के नाम को भुनाने में लगे हुए हैं बात केवल गांधी की ही नहीं है। ये और बात है गांधी के नाम की ज़रूरत आज की सरकार को भी पड़ गई जो किसी ने सोचा भी नहीं था। ये राजनीति है और यहां हर वो चीज़ काम आती है जो फायदेमंद लगती है। नेताओं के लिए इंसान और सामान में कोई अंतर नहीं है सब बेचते हैं नाम भी बदनामी भी। आज फिर इतिहास को दोहराने की बात हो रही है। राजनीतिक दल में गंभीर चिंतन जारी है क्या यही अवसर है उस नेता की मौत से चुनावी नैया पार लग सकती है। पहले जिन दल वालों ने ऐसा हासिल किया अपने नेता की मौत से जनता की भावनाओं को उभार कर चुनाव में जीते उनकी बात अलग थी उनकी मौत स्वाभाविक नहीं थी और उनकी हत्या को शहीद बताकर उपयोग किया जा सकता था। अब तो जिनकी मौत हुई है कुछ दिन पहले तक उनको और उनके साथियों को राजनीति के हाशिये पर रखा गया था। लोग भावुक हैं मगर नासमझ नहीं हैं। काश पहले पता होता अभी उनकी शोहरत इतनी है तो दो चार योजनायें ही उनके भी नाम कर देते। मगर जो लोग भूल गये थे किसके लगाये पेड़ की छांव में बैठे उस पर लगे फल खा रहे हैं उनको फिर किसी मुद्दे की ज़रूरत है इतना अकाल है। 
                                       शायद लोग हैरान होंगे कि जब उनकी मौत के बाद श्र्द्धासुमन अर्पित करने को उनकी फोटो की ज़रूरत थी तो किसी भी तस्वीर बेचने वाले के पास उनकी तस्वीर नहीं मिली और गूगल से डाउनलोड कर फ्लेक्स वाले से बनवानी पड़ी विनती कर के। बाज़ार में ऐसे ऐसों और कैसे केसों की तस्वीरें थी क्या बताऊं आपको हैरानी होगी। मगर कोई फर्क नहीं पड़ता है जिन की तस्वीर लोगों के दिलों में बसी हुई हो उनकी फोटो इश्तिहारों पर छपवाने की ज़रूरत नहीं होती।  याद है कभी उनकी भी फोटो हर जगह दिखाई देती थी मगर जब सत्ता नहीं रही तो दल कोई भी हो उनकी तस्वीर कहीं नहीं दिखाई दी। यही ऐसे नेता थे जो जब सत्ता में आये तो जिस जगह पिछले राजनेता की तस्वीर लगी हुई थी दिखाई नहीं दी तो दोबारा लगवाई थी। यही अंतर होता है असली नायक और बनावटी नायक का। आज फिर से उनकी फोटो को बनवाने की बात सोची जाने लगी है मगर मगर दुविधा है उनकी राह अलग थी आपका रास्ता और है। कहीं दांव उल्टा नहीं पड़ जाये और लोग तुलना करने लगें तो आप उनके सामने इक पासंग भर भी नहीं साबित होंगे। 
           सब से बड़ी समस्या आपकी यही है कि कोई भी नेता किसी भी दल में आपके बराबर का हो आपको मंज़ूर नहीं है तो अपने ही दल में जिस नेता को आप ने भुलाना चाहा बुरी याद की तरह उसी को अपने से ऊंचा स्थान देना कैसे सहन होगा। ज़रूरत में बाप बनाने की बात है मगर बाप है कहने से लोग आपको उनका बेटा मान भी लेंगें आपको पता नहीं। 14 साल बाद राम बनवास से वापस आये थे तो लोग दीपावली मना रहे थे , सत्ता से बाहर होने के ठीक 14 साल बाद भी उनकी शोहरत कायम है देख कर विचार तो आया होगा।  तेरा क्या होगा कालिया , लोग याद रखेंगे इतने प्यार से क्या ? जो लोग वास्तव में देश जनता की भलाई को दलगत स्वार्थ से ऊपर रखते हैं उन्हें लोग सदियों तक याद रखते हैं प्यार से।  उनके लिए किसी शायर का इक शेर याद आता है :-

      माना कि चमन को न गुलज़ार कर सके , कुछ खार कम तो कर गए गुज़रे जिधर से हम।


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