Thursday, 23 August 2018

ये कैसी आज़ादी है ( विडंबना की बात ) डॉ लोक सेतिया

        ये कैसी आज़ादी है ( विडंबना की बात ) डॉ लोक सेतिया

                              जनता को लताड़ने वालो 

      आपने देखा इन सब को कैसे रुआब से डांटते हैं लताड़ लगाते हैं गरीबों को। आज से नहीं सदियों से ये चला आ रहा है बेबसी जुर्म है हादिसा जुर्म है ज़िंदगी तेरी इक इक अदा जुर्म है। कोई अभिनेता है जो विज्ञापन करता है खूब पैसा कमाता है मगर यमराज बनकर समझाता कम धमकाता अधिक है कि एक करोड़ का टर्म इंशोरेंस इतने में करवाते। भाई आपको उनके घर के लोगों से इतनी ही सहनुभूति है तो मत आते। कोई और था जो स्वच्छता की बात पर अपमानित करता था गांव वालों को सड़क पर चलने वालों को।  इतनी चिंता है तो सरकार नहीं बनवाती तो आप तो दौलमंद देश भक्त और सत्य की बात करते हैं बनवाते हर जगह शौचालय अदि। अभी तक कितनों को करोड़पति बना चुके हैं तथाकथित महानायक जो इस बार दूसरे ढंग से बुलाते हैं , लोग आकर ले गये लूट कर आप कब तक सोचते रहोगे। आपको पैसे कमाने हैं कमाओ कौन रोकता है मगर ऐसी भाषा बोलने का अधिकार आपको नहीं है। इस देश में सब आपकी सोच वाले नहीं हैं कि पैसे कमाने को कुछ भी करो। झूठ बोलने से लेकर सत्ता की भाषा बोलने तक और बाज़ार की भाषा बोलने तक। ऐसी महानता आपको मुबारिक हो। इन सावन के अंधों को कुछ भी दिखाई नहीं देता सिवा सरकारी झूठ के। इसी सरकार ने पहले इक रूपये महीना में जनता का बीमा किया था , कोई बताये किसको बीमा राशि का भुगतान हुआ। जब खुद बीमा करवाने पर तमाम कागज़ पास होने पर भी बीमा कंपनियां भुगतान नहीं करतीं तो सरकारी बीमा का भुगतान कैसे करेंगे। कोई नाम पता नहीं बस लाखों लोगों की राशि सरकारी खज़ाने से मिल गई। किसान की फसल का भी बीमा करने की बात कही थी , किसान आत्महत्या करते हैं बदहाली में अगर बीमा राशि मिलती तो क्या ऐसा होता। अभी इक नई योजना स्वास्थ्य बीमा की शुरू की है पचास रूपये सालाना एक परिवार को अर्थात 10 से 15 रूपये में कौन सी कंपनी देगी भुगतान। तरीका बदल गया है लूट का। वास्तव में करना है तो सभी की शिक्षा और स्वास्थ्य सरकार अपने कर्तव्य समझ उपलब्ध करवाती तो जनता की आधी परेशानियां हल हो जाती। लोगों को उनके अधिकार मिलने चाहिएं खैरात नहीं। 

        चलके तो गैर के कदमों से कहीं के न रहे , अपने पैरों पे अगर चलते तो चलते रहते। 

        नईम अख्तर बुरहानपुरी जी का शेर ऐसे तमाम लोगों के लिए है जो सत्ता के तलवे चाटकर राज्य सभा पहुंच कर खामोश हो जाते हैं या जो टीवी चैनल वाले सरकारी विज्ञापनों की बैसाखियां लेकर दौड़ने की बात करते हैं। हम महनतकश लोग थोड़े में गुज़ारा करते हैं मगर मुफ्त में कुछ नहीं लेते हैं। ये जो खुद को धनवान कहते हैं उन्हीं की भूख बढ़ती जाती है जितनी दौलत जमा होती जाये। जिन से आपकी आमदनी की पाई पाई आती है उन्हीं को आप इस तरह अपमानित करते हैं , बिना सोचे समझे। दाता कौन है और भिखारी कौन। भीख केवल गरीब लोग नहीं मांगते मज़बूरी में , भिखारी तो बड़े बड़े अमीर लोग भी हैं और उन्हें भीख नहीं मिले तो उनका गुज़ारा ही नहीं होता ये जाँनिसार अख्तर जी ने कहा था इन्हीं लोगों के लिए।  जनता को लताड़ने की आदत बहुत बुरी है धनवानों की नेताओं की सरकारों की और इन कलाकारों की तो और भी अनुचित है क्योंकि इनकी शानोशौकत इन्हीं आम लोगों के दम पर है। जिस दिन इन सबको जो खुद को आम नहीं ख़ास मानते हैं समझ आएगा उनकी औकात देश के करोड़ों आम नागरिकों के बिना कुछ भी नहीं है उस दिन अपने कहे हर शब्द पर शर्मिंदा होकर माफ़ी मांगेगे जनता से। जनता का दिल इनसे बड़ा है माफ़ कर देगी इनकी सभी खताओं को। 
                  टीवी शो पर देश भक्ति की बात करना और फिल्मों में किरदार निभाना आसान है , असली देश से प्यार देश की जनता से मुहब्बत करना है उसे डांटना फटकार लगाना तो गुनाह है। इक सच हर अर्थ शास्त्री जानता है कि कुछ लोगों के पास बहुत अधिक है इसी कारण अधिकतर के पास ज़रूरत लायक भी नहीं है। मगर जो नेता खुद अपने आप पर ही बेतहाशा खर्च कर देश पर बोझ बने हुए हैं वो कभी देश की जनता को समानता के हक नहीं देना चाहेंगे। उनको जिनसे चंदा या घूस मिलती है उन्हीं को लाभ पहुंचाने की योजनाएं बनानी होती हैं। वास्तविक आज़ादी अभी बहुत दूर है , अंधियारा घना है और सूरज के सिंहासन पर अंधेरों का डेरा है।

     


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