Wednesday, 1 August 2018

जीवन के दोराहे पे खड़े सोचते हैं हम ( टीवी शो की बात ) भाग - 8 डॉ लोक सेतिया

 जीवन के दोराहे पे खड़े सोचते हैं हम ( टीवी शो की बात ) भाग - 8 

                                            डॉ लोक सेतिया 

        आज पहली अगस्त की कहानी। शायद हर कोई जीवन की गुज़री वास्तविकता को फिर से दोहराने से बचता है। लिखने वाले भी अपनी आत्मकथा लिखते मुमकिन हैं कुछ बातें छुपा लेते हों अथवा उनको अपनी सुविधा से दिखा सकते हैं। आज जब कहानी की शुरुआत भी नहीं हुई थी केवल इतना एंकर ने बताया कि ये कहानी दोस्ती पर है तो मुझे जाने क्यों लगा शायद इस में किसी तरह से मेरी बात हो सकती है। और कुछ कुछ मेरे जीवन से मिलती जुलती कहानी ही थी आज की। हालांकि बिल्कुल अलग ढंग से और शायद दूसरे दृष्टिकोण से भी। आज शायद मुझमें साहस है अपनी बात सभी पढ़ने वालों को बताने का। मगर पहले आज की टीवी शो की कहानी की बात। 
               शुरुआत होती ही दो दोस्तों की दोस्ती से है। भरोसे प्यार विश्वास और इक अटूट बंधन। मुझे ओशो की दोस्ती की परिभाषा हमेशा पसंद रही है। 
     आपसी बात में इक दोस्त दूसरे को पूछने पर बताता है कि उसे कोई लड़की पसंद थी और दो साल तक उसका पीछा किया मगर उसने इनकार कर दिया था। और वो दोस्त राय देता है कि उस लड़की के घर के सदस्यों से मिलकर बात करनी चाहिए। इनकार तो पहले ही मिल चुका है इस से बुरा क्या हो सकता है। मगर तभी दोस्त किसी पुराने दोस्त की दोस्ती की बात बेहद नफरत से बताता है कि कभी ये मेरा सब से अच्छा दोस्त रहा है मगर उसने दोस्ती के साथ विश्वासघात किया है और मेरी बहन को लेकर भाग कर उससे शादी कर ली थी। ये जानने के बाद दोस्त के घर जाने पर उसी लड़की से सामना होता है जिसकी बात दोस्त को बता चुका होता है और समझता है फिर से उसी तरह मैं भी अपने दोस्त की बहन से प्यार की बात करूंगा तो वो शायद सह नहीं सकेगा और सोच लेता है दोस्ती को खोना नहीं है। कोई दूसरा सोच सकता है कि उसने तो पहले ही बता दिया था किसी लड़की से प्यार की बात तो अब ये क्यों नहीं बता देता कि वो लड़की तुम्हारी बहन ही है। लड़की खुद भी कहती है मैं भी आपको पसंद करती हूं मगर फिर इस तरह मिलने की उम्मीद नहीं थी। और दोस्त की बहन की सगाई हो जाती है खुद शामिल रहता है उस में। लेकिन शादी से दो दिन पहले लड़की उस के साथ भागने की बात करती है और इतना ही नहीं उसकी मां को भी पता चलता है तो वो भी उनके विवाह की बात से सहमत हो जाती है। मगर वो उनकी बात नहीं मानता है और दोस्ती की लाज रखता है। मुझे यही उम्मीद थी क्योंकि या तो जैसे ही लड़की को पता चला था कि जिसको चाहती है भाई का दोस्त है तो तभी भाई और मां को अपनी बात बता देती और उसके बाद जो होता मंज़ूर करती। मगर तब खामोश रहकर बाद में ऐसे समय बताना तो और बड़ा आघात होता भाई पर भी दोस्ती पर भी। मैं मानता हूं कि किसी से प्यार होना कोई शर्त नहीं है विवाह भी उसी से हो सके। बहुत कारण होते हैं और तब निर्णय सोच समझ कर लेने उचित होते हैं , कितने आधुनिक समाज में रहते हों कुछ सामाजिक बंधन निभाने अच्छी बात है। ज़रा इक फ़िल्मी उदाहरण से इक गीत से समझते हैं।

छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए , ये ज़रूरी नहीं आदमी के लिए। 

प्यार से भी ज़रूरी कई काम हैं , प्यार सब कुछ नहीं ज़िंदगी के लिए। 

तन से तन का मिलन हो न पाया तो क्या , मन से मन का मिलन कोई कम तो नहीं। 

खुशबू आती रहे दूर ही से सही , सामने हो चमन कोई कम तो नहीं। 

चांद मिलता नहीं सब को संसार में , है दिया ही बाहर रौशनी के लिए। 

अब अपने जीवन की वास्तविकता , दो बातें हुई। पहली बात मेरे पिता जी के इक दोस्त के घर आना जाना था और उनकी बेटी से मिला करता था। मन में भावना रहती थी बहन की तरह की है। मुझे नहीं खबर थी पिता जी ने अपने दोस्त से रिश्ते की बात कब की थी। मुझे जब बताया गया तो मैं इस रिश्ते को मंज़ूर नहीं कर सका और इस बात पर हम बाप बेटे में मतभेद सामने आये। मुझे मनाने की हर कोशिश नाकाम रही। अब इक और इत्तेफ़ाक़ होना था , मेरे बचपन के इक दोस्त ने अपनी बहन से मेरे रिश्ते की बात की तो पिता जी ने मुझे या किसी भी और सदस्य को बताना उचित नहीं समझा , शायद मेरे पहले संबंध से इनकार की बात से उनको लगा ये भी वही बात है। मगर वास्तव में मैं कभी अपने दोस्त की बहन से मिला ही नहीं था उनको देखा भी नहीं था। शायद इत्तेफाक की बात है कि उस दोस्त से मेरा पत्राचार होता रहता था और मुझे उसका पत्र मिला जिस में इशारे से रिश्ते की बात मेरे पिता से की और निर्णय मुझ पर है ऐसा उसे बताया गया लिखा हुआ था। गांव आने पर बात की तो मेरे पिता जी के बड़े भाई ताया जी मुझे साथ लेकर दोस्त के घर मिलने चले आये और बिना लड़की को देखे ही रिश्ता पक्का कर दिया। हम पति पत्नी हैं और सब ठीक है , मगर यहां हमारा कोई पहले जान पहचान और दोस्त की बहन का नाता नहीं था। इसलिए वो सवाल खड़ा ही नहीं हो सकता था , जबकि पिता जी के दोस्त की बेटी से मिलता रहा था परिवारिक संबंध समझ कर। आज की कहानी को अंत लेखक ने सभी दर्शकों की पसंद का भले नहीं किया हो , मुझे बेहद अच्छा लगा। दोस्ती मेरी नज़र में बाकी हर रिश्ते से बढ़कर अहमियत रखती है।

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