Tuesday, 8 August 2017

राम जी की पाती रामभक्तों के नाम ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

  राम जी की पाती रामभक्तों के नाम ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

  राम जी ने कितने खत लिखे मगर कोई जवाब नहीं आया तो मुझ को ये दायत्व सौंपा जाकर उन से पूछूं क्या हुआ सब ठीक ठाक तो है। मैंने कहा भगवान आप सब जानते ही हैं उनको फुर्सत ही नहीं अभी कितने चुनाव और जीतने बाकी हैं। कितने देशों में अभी जाना है , अभी तो दो साल बाकी हैं मगर चिंता अभी से है अगला चुनाव जीतना है। मुझे समझ नहीं आया भगवान को खत लिखने की क्या ज़रूरत थी। मेरे दिल की बात समझ कर बोले उन्होंने शपथ ली थी रामलला के मंदिर बनाने की , अब उनको पूरा बहुमत हासिल है और कोई बाधा नहीं रही फिर क्यों नहीं बात करते मंदिर बनाने की। मैंने कहा भगवान इक बात पूछना चाहता हूं अगर आप अनुमति दें आप। राम जी बिना बोले ही समझ गए , कहने लगे जनता हूं लेखक तुम जो कहना चाहते हो। वास्तव में मुझे किसी भी मंदिर की कोई ज़रूरत कभी थी ही नहीं। मेरा मंदिर तो घर घर में है और धरती के कण कण में बसता हूं मैं। मुझे उस मंदिर में रहना ही नहीं जो मर्यादा को तार तार कर बनाया जाये। मैंने कभी कहीं नहीं कही मंदिर बनाने की बात , मगर जब कोई आता है मेरे दरवाज़े पर और मन्नत मांगता है कि ऐसा हुआ तो मैं आऊंगा मन्नत पूरी करने को। तब जब उनकी इच्छा पूरी हो जाती है तब भी नहीं आते तो मुझे चिंता होती है उनकी कि अभी कोई और मांग रह गई है तो पता चले। मेरे दर से कोई निराश नहीं लौटे बस यही चाहता हूं। मैंने जाकर राम मंदिर वालों को बताया भगवान आपको याद कर रहे हैं , सुनते ही उनको पसीना आने लगा। मैंने समझाया घबराओ नहीं भगवान ने याद किया है बुलावा नहीं भेजा , अपने खत का जवाब मांगा है और जानना चाहते रामलला मंदिर बनवाना था उसका क्या हुआ। आजकल आप जो चाहते हासिल कर लेते हो तो अदालती बाधा को लांघना कोई कठिन नहीं है। अध्यादेश कानून सब आपके हथियार हैं , नोटबंदी की तरह साहस करो फैसला करने का और इसी सरकार के काल में बनवा दो। चिंता में पड़ गए वो , कहने लगे बात तो सही है। आज हम जो जो कहते थे सब कर सकते हैं कोई विरोध नहीं कर सकता , मगर क्या क्या करें। धरा तीन सौ सत्तर और समान नागरिक सहिंता लागू करने में तो कोई अदालत भी आड़े नहीं आने वाली , तब भी डरते हैं इससे कोई राजनीतिक हानि तो नहीं होगी। राम जी को तो कभी भी मना लेंगे मगर देश की जनता रूठी तब क्या होगा , भगवान भी नहीं बचा सकेंगे तब। राम मंदिर की हांड़ी जब चढ़ानी थी तब और बात थी अब उसका भरोसा नहीं है। मैंने कहा आपके नेता तो राम मंदिर पर सौ बार सरकार कुर्बान करने की बात कहते थे। मगर उनको अब राम जी कल्याण करेंगे ऐसा नहीं यकीन। राम जी को पता चला तो मुस्कुरा दिए। वाह मेरे भक्तो इसलिए नहीं वादा निभाते कि ऐसा किया तो अगला चुनाव नहीं जीत सकोगे। राम को मानते तो याद रहता मेरा आदर्श वाक्य। रघुपति रीत सदा चली आई , प्राण जाएं पर वचन ना जाई।

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