Thursday, 3 August 2017

निट्ठला चिंतन ( राग दरबारी से बेसुरे राग तक ) डॉ लोक सेतिया

निट्ठला चिंतन ( राग दरबारी से बेसुरे राग तक ) डॉ लोक सेतिया 

फेसबुक पर बहुत गंभीर चिंतन जारी है। इक महिला लिखती है लोग रिक्वेस्ट भेजते हैं मगर उनकी वाल पर दस तस्वीरों को छोड़ होता कुछ भी नहीं भला कैसे दोस्त बनाएं। इस देश की इतनी गंभीर समस्या पर सैकड़ों लोग बहस में भाग लिए अपनी अपनी बात लिखते हैं। महिला ने  बताया है हज़ार रिक्वेस्ट्स बाकी लंबित हैं , कोई अपने पास सात आठ सौ होने का फोटो देता है। इन लोगों को अगर देश की बागडोर सौंप दी जाये तो ये समझा सकते हैं बाढ़ और ख़ुदकुशी समस्या नहीं हैं समस्या कुछ और है। महिला भी जानती है महिला होना फेसबुक पर विशेषाधिकार देता है , सब आपको चाहते हैं आपकी बात करते हैं। ये मानसिकता समस्या नहीं है क्योंकि इसका आनंद महिला ही नहीं पुरुष भी महिला बनकर ले रहे हैं। आपको कपिल के कॉमेडी शो में आदमी औरत बने साफ़ दिखते हैं तो फेसबुक पर लड़की की फोटो जब शेयर करने को निवेदन करती है तब भी पता चल जाता है। इक सुंदर नारी चित्र पर शेर लिखा है और लोग कमैंट्स शेर पर कम फोटो पर करते हैं अधिक लगता है। फिर चिंता जताते हैं औरत को लोग किस नज़र से देखते हैं। कोई पोस्ट लिख कर सवाल उछालता है अमुक नेता से अच्छा कोई हुआ है पहले , उसी को पता होगा ऐसा क्या बदल दिया है उस ने। कल ही शिक्षा को लेकर हर जगह बदहाली की खबर दिखला रहे थे टीवी वाले साथ में बुलेट ट्रैन भी आने वाली है। इक कहानी थी किसी भिखारिन पर राजा आशिक हो गया और उसे रानी बना लिया मगर उसकी भीख मांगने की आदत तब भी नहीं गई। इक दिन राजा ने देखा वो महल में अपने कक्ष में दीवार से भीख मांग रही है। इंसान की खोपड़ी को इक साधु ने भिक्षा पात्र बना लिया था और किसी राजा ने अपना खज़ाना डाला तब भी वो भरी नहीं थी। सत्ता की भूख बढ़ती जाती है जितनी भी मिलती जाये , और कहते हैं सत्ता भ्र्ष्ट करती है और पूर्ण सत्ता पूरी तरह भ्र्ष्ट करती है। नेहरू ने इक बार खुद कहा था मुझे इतना प्यार नहीं दो कि मैं तानाशाह बन जाऊं। उनको तानशाही पसंद नहीं थी , आज कोई चाहता है मुझ से अच्छा कोई नहीं हो सकता यही सच है। मुझे तो वो दोहा याद है बुरा  जो खोजन मैं चला बुरा न मिलया कोय , जो मन खोजा आपना मुझ से बुरा न कोय। और की आंख का तिनका नज़र आता है अपनी का शहतीर नहीं। नेहरू ने अपने परिवार को सत्ता नहीं सौंपी थी , आप तो हर जगह अपनों को बिठाना चाहते हैं। क्या यही संविधान में आपकी आस्था है। 
                   छोड़ो भी कोऊ नृप हो जनता को क्या उसे तो कोड़े खाने हैं चाबुक वही होगा बदलेगा केवल हाथ ही। भगवान की बात करते हैं क्योंकि देश चल रहा ही भगवान भरोसे ही है। भगवान है कहां सोचा ही था कि भगवान आ गए मेरे पास , बोले मैं यहीं तो हूं तेरे पास। मैंने कहा काहे लंबी लंबी छोड़ते हो भगवान तो आलिशान मंदिरों में है सुंदर परिधान पहने और तरह तरह के पकवान का आनंद लेते हुए। मगर वो हंस दिए , बोले देखा जाकर कभी मिला मैं उनमें किसी को। मुझे बाज़ार बना दिया है। तुमको कोई इस तरह बंद करे इतने अंदर तक कि ताज़ी हवा तक नहीं मिले तो पता चलेगा। और मुझे कब भोग लगवाते हैं , सामने रखते हैं और ललचाते हैं हाथ बढ़ाने से पहले उठा ले जाते हैं खुद खाते हैं। जब से ओह माय गॉड फिल्म आई है हम तो अपने भगवान होने पर शरमाते हैं। आजकल हमसे क्या क्या होने लगा बतलाते हैं। अपने इस नए स्मार्ट फोन को दो हमें अपनी हालत समझाते हैं। सब की गैलरी में बंद हुए सकुचाते हैं , इतनी इतनी फोटो इक साथ पास अपने पाते हैं कि  किसी देवी को पांव नहीं छू जाये घबरा कर न जाग सकते न सो भी पाते हैं। कभी कभी अजीब हादसे हो जाते हैं सामने क्या क्या दृश्य नज़र आते हैं। कोई वैद हकीम है इस रोग का तो बता दो उसी पास जाते हैं सोशल मीडिया नाम की बिमारी की दवा बनवा सब को प्रसाद बंटवाते हैं। मुझे हैरान कर बोले लिखो तुम भी निट्ठला चिंतन अपना हम तो जाते हैं।

No comments: