Friday, 30 June 2017

आधी रात की बात ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

         आधी रात की बात ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

      आधी रात की बात अलग होती है। आधी रात में आधा चंद्र्मा भी हो और महबूबा कहती हो रह न जाये तेरी मेरी बात आधी तब इश्क़ का लुत्फ़ होता है। आधी रात को अंधेरे में कभी कहते थे फ़रिश्ते आते हैं ज़मीं पर। आजकल आधी रात को लूट बलात्कार होते हैं , चोरी दिन दिहाड़े भी होती हैं और डाका आजकल जंगली डाकू नहीं डालते , कारोबारी धर्म वाले सच्चाई की दुकान वालों से लेकर भगवा धारी और सरकार तक डालते हैं। पहले डाकू अमीरों को लूटते थे आजकल सब गरीबों को लूटते हैं , कोई नहीं सोचता उसकी कमाई ईमानदारी की दूध सी है या फिर नानक उनकी रोटी को निचोड़ दिखाएं तो खून की नदी बहती होगी। खैर आज बात और है आधी रात को देश की सरकार इक शो आयोजित करने जा रही है जी एस टी को लागू करने पर। और उस में ख़ास बड़े बड़े लोगों को विशेष तौर पर बुलाया गया है। आम जनता की किसी भी समारोह में ज़रूरत होती नहीं मगर आपने ये सब लागू करना उसी पर है। अब अमिताभ बच्चन जैसे लोगों को जिनको कुछ मिंट का विज्ञापन करने पर करोड़ रूपये मिलते हों क्या फर्क पड़ता है महंगी सस्ती होने पर किसी वस्तु के। अभी विदेश यात्रा पर मोदी मोदी का शोर सुन कर लगता था जैसे वहां रहने वालों को पता चल गया हो कि तीन साल पहले जिन अच्छे दिनों की बात की थी वो लाये जा चुके हैं। हज़ारों रूपये टिकट के देकर मनचाहा भाषण सुनने वालों को क्या पता देश में अभी भी तीन चौथाई जनता को दो समय रोटी और पीने का साफ पानी नहीं मिलता। अभी तलक आम जनता को हासिल कुछ नहीं हुआ है , सरकार रोज़ नई नई बातें करती है मगर उस से हुआ क्या किसी को मतलब ही नहीं। 
                 ऐसा दिखाया जा रहा है मानों वास्तविक आज़ादी अब मिलने वाली है। जब कि खुद सरकार नहीं जानती कल इसका फल क्या निकलेगा। नोटबंदी से हासिल क्या हुआ कोई नहीं जनता। मगर असली बुनियादी सवाल ही और है। क्या हम आज़ादी के चाहने वाले हैं अथवा अभी भी हमारी मानसिकता वही गुलामी वाली ही है। हर किसी की जयजयकार करते हैं , उगते सूरज को सलामी देते हैं। नहीं सोचते उस ने देश समाज को दिया है कुछ या लिया है। इन पर हर पल लाखों करोड़ों खर्च करती है वो जनता जिस की खुद की आमदनी मासिक हज़ार रूपये भी कठिनता से होती है। अब अगर तब भी राजनेता शाही शान से रहते हैं और अपने पर बेतहाशा धन बर्बाद करने के बावजूद खुद को देश का सेवक घोषित करते हैं तो इसको क्रूर मज़ाक कहना होगा। आडंबर के समारोह अपनी शान दिखलाने को हर दिन आयोजित करने मानवता के खिलाफ अपराध जैसा ही है। आपने पल बनाया सड़क बनाई या भवन बनाया या आपको सत्ता मिले साल दो साल तीन साल हुए उस को जश्न या कोई और आडंबर करने की उपयोगिता क्या है। जब आपने भी वही करना है जो पहली सरकारें करती आईं तब बदलाव कैसे होगा। असंवेदनशीलता की पराकष्ठा है सरकारी धन को अपने महिमामंडन पर अथवा झूठे विज्ञापनों पर खर्च करना। अगर हम आज़ादी का अर्थ समझते है तो किसी को भी खुदा या मसीहा नहीं बनाएं ये खतरनाक है। आपने चुना है उनको जिस काम के लिए वो करना उनका कर्तव्य है उपकार नहीं है। कुछ लोग वास्तविकता दिखलाने को आलोचना मानते हैं जब कि हर सत्ताधारी अंधा होता है , उसको वही दिखाई देता है जो वो चाहता , तभी जब जिस जगह जाना होता मंत्री को बड़े अधिकारी को तब दो दिन पहले सब सही दिखलाने का प्रबंध किया जाता कार्यपालिका द्वारा। कभी किसी ने सोचा ये कितना अनुचित है , जो काम जनता की ज़रूरत को नहीं नेता अधिकारी को खुश करने को किये जाते उनको वास्तव में पहले ही होना चाहिए था। हम सब देख समझ कर भी सोचते क्यों नहीं ये क्या है। 
                               14-15 अगस्त की आधी रात को मिली आज़ादी अभी भी देश के बहुमत को कोई उजाला देने में सफल नहीं हुई है। ऐसे में फिर वही आधी रात की इतिहासिक भूल दोहराने जैसा काम सरकार करने वाली है जिस में वही लोग शामिल होंगे जो पहले से चमकीली रौशनी में सितारों की तरह रहते हैं। अंत में अपनी इक ग़ज़ल याद आती है। पेश करता हूं :-

चंद धाराओं के इशारों पर ,

डूबी हैं कश्तियां किनारों पर। 

अपनी मंज़िल पे हम पहुंच जाते ,

जो न करते यकीं सहारों पर। 

वो अंधेरों ही में रहे हरदम ,

जिनको उम्मीद थी सितारों पर। 

खा के ठोकर वो गिर गए हैं लोग ,

जिनकी नज़रें रहीं नज़ारों पर। 

डोलियां राह में लूटीं अक्सर ,

क्या भरोसा करें कहारों पर। 

ये भी अंदाज़ हैं इबादत के ,

फूल रख आये हम मज़ारों पर। 

डॉ लोक सेतिया " तनहा "

 


Tuesday, 27 June 2017

मैं बदल गया ( डॉ लोक सेतिया )

                     मैं बदल गया  ( डॉ लोक सेतिया  )  

सभी ने समझाया , फिर भी समझ नहीं आया ,
ठोकरों से कभी भी , मैं नहीं आज तक घबराया। 
इक घाटे का काम है , सच को सच ही कहना ,
फिर क्यों मैं सोचता , खोया है क्या क्या पाया। 
गुज़ारी है उम्र मैंने , बस झूठ से लड़ते लड़ते ,
ये बात और है कि मैं , ये जंग हारता ही आया।
पर इस निज़ाम के हैं , दस्तूर सभी निराले बने ,
गहरी काली घटा बन , सूरज भी है कहलाया। 
अब रौशनी नाम है , अंधकार का नया बदला ,
सब को डराता है अब , खुद ही खुद का साया। 
सब कुछ वही है लेकिन , बदले हैं नाम सबके ,
बदहाली शब्द जो था , है खुशहाली कहलाया। 
बस शोर हर तरफ है , मेरा देश बदल रहा है ,
बंधी आंखों पर पट्टी , इक कोल्हू चल रहा है। 
अब बोलना मना है , सच बोलना गुनाह है ,
दम मेरा घुट रहा है , क्या मैं बदल गया हूं। 
ये कौन आया जिसने , जलता दिया बुझा दिया ,
इक रौशनी को  आकर , बस धुआं बना दिया। 
किसी की हर अदा पर , दुनिया है सारी फ़िदा ,
नहीं आदमी जी सकता , यहां आया जब खुदा।  

आप अपने डॉक्टर नहीं बनें ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

        आप अपने डॉक्टर नहीं बनें ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

       शायद सब कुछ उतना आसान होना मुमकिन नहीं जितना हम चाहते हैं। मेरे पास कई बार लोग आएं हैं इंटरनेट से किसी रोग बारे जानकारी हासिल कर अधकचरी जानकारी से कोई गलत नतीजा निकाल कर। मैंने हर बार उनको भी और कई बार कहीं भी या फोन पर ही अपने रोग का उपचार पूछने वालों की आगाह किया है कि अपनी जान की कीमत को समझें और इस तरह उपचार नहीं कराएं। पिछले साल मुझे जब लगा लोग आयुर्वेद के लेकर ठगी का शिकार हो रहे हैं तब मैंने सभी को निस्वार्थ सलाह लेने को अपना नंबर भी दिया और इक पेज पर आयुर्वेद की जानकारी और बहुत ऐसी समस्याओं का निदान भी बताना शुरू किया। मगर तब भी अधिकतर लोग चाहते थे उनको बिना किसी डॉक्टर से मिले घर बैठे दवाएं मिल सकें। अर्थात जो उचित नहीं मैं समझाना चाहता था लोग मुझ से भी वही चाहते थे। शायद कोई ऐसे में अपनी दुकानदारी कर कमाई भी कर सकता था , मगर मुझे लोगों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ कर पैसे बनाना कभी मंज़ूर नहीं रहा। आजकल देखता हूं हर कोई हर समस्या का समाधान गूगल से खोजने लगे हैं। मगर रोग और चिकिस्या बेहद संवेदनशील विषय हैं। सवाल ये नहीं कि इस से डॉक्टर्स हॉस्पिटल या नर्सिंग होम को कोई नुकसान हो सकता है , सवाल ये है कि खुद जो इस तरह उपचार करेंगे उनका भला इस में है भी या नहीं। आप अगर कभी किसी भी दवा को लेकर सर्च करें तब आपको कठिन ढंग से इतना कुछ मिलेगा कि आप घबरा जाओगे और कोई भी अलोपथी की दवा नहीं लेना चाहोगे। मगर असल में कितने लोग इस सब को पढ़ कर समझ सकते हैं , मेरा विचार है अधिकतर बस रोग और दवा का नाम और किस मात्रा में खानी पढ़कर उसे अपने पर इस्तेमाल करते होंगे। जब कोई आस पास क्या राह चलता भी बताता है किसी रोग की दवा तब भी लोग बिना विचारे अपने पर आज़मा लेते हैं तब गूगल का नाम ही उनको प्रभावित करने को काफी है। कल ही मैंने इसी तरह इक नई दवा की जानकारी ढूंढी जो दिल्ली के इक बड़े संस्थान के डॉक्टर मेरे परिवार के इक सदस्य को लिख रहे थे , तब मैं हैरान हो गया ये पढ़कर कि तमाम रोगों पर काम करती है की बातों के आखिर में लिखा मिला अभी तक ये किसी ने विधिवत रूप से प्रमाणित किया नहीं है। ये शब्द आने तक मुझे लग रहा था जैसे ये कोई संजीवनी बूटी है राम बाण दवा है। लेकिन आखिरी शब्द मुझे डराते हैं क्योंकि वहीं उस दवा के तमाम ऐसे दुष प्रभाव भी थे कि इस से अमुक अमुक गंभीर रोग हो सकते हैं। इसलिए मुझे लगा लोगों को इस बारे सावधान किया जाना चाहिए। बेशक लोग विवश हैं क्योंकि देश में न केवल स्वास्थ्य सेवाओं की खराब दशा है बल्कि जब मिलती भी है तो अनावश्यक रूप से महंगी और केवल पैसे बनाने के मकसद से न कि ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाने को लोगों को रोगमुक्त स्वास्थ्य जीवन जीने के लिए। फिर भी ये तरीका कदापि सही नहीं है।

Saturday, 24 June 2017

आलेख डा. लोक सेतिया

                     मुझ में ज़िंदा हैं जे पी जी

                                 डॉ लोक सेतिया

कोई किसी की मूर्ति कोई किसी की तस्वीर कोई किसी की कोई निशानी दीवार पर सजा कर रखता है। कोई किसी के नाम पर कुछ बनवाता है , कोई किसी की याद में ताज बनवाता है। मैं शायद पहली बार गया था उनको सुनने को 42 साल पहले रामलीला मैदान दिल्ली में और बस उसी दिन मैंने इक मकसद बना लिया था , मेरा जन्म उसी जगह उसी दिन हुआ था। आज वो जननायक जयप्रकाश नारायण किसी को याद तक नहीं है मगर मैंने उसे अपने दिल में ज़िंदा रखा हुआ है। आज उन्हीं के नाम पर मैंने इक फेसबुक बनाई है जो किसी को नकली लग सकती है , मगर मुझे नहीं। क्योंकि मुझ में मेरा अपना कुछ शायद नहीं ज़िंदा मगर जे पी अभी भी मुझ में जीवित हैं। अधिकतर लोगों को सोशल मीडिया मनोरंजन करने से अपने स्वार्थ सिद्ध करने तक की जगह लगता है , मुझे वहीं अपने विचार सांझा करने हैं। ये जानते हुए भी कि अब किसी को फुर्सत ही नहीं और की बात सुनने की। फेसबुक व्हाट्सएप्प पर सब अपना अपना ज्ञान बांट रहे हैं , मैं ज्ञानीपुरुष नहीं कोई। केवल चिंतन करता हूं हर दिन और देखता रहता देश की समाज की हालत को।  पता नहीं क्यों उस को देख कर मुझे अचरज होता है कैसे लोग आस पास ये सब देख कर अपने मनोरंजन और कई तरह के काम करते हैं अपनी ख़ुशी की खातिर। आप ऐसे समाज में रहते हैं जहां हर तरफ हाहाकार चीख पुकार सुनाई दिखाई देता है लेकिन आप आँखे बंद कर कान पर हथेली रख होंठ सी लेते हैं। मुझ से नहीं हुआ ऐसा कभी भी , मैंने हर दिन इक लड़ाई लड़ी है नफरत स्वार्थ और कायरता की नीतियोँ के साथ। आपको ये मेरा पागपन लगता है तो मुझे अपना पागलपन पसंद है , पागल होना किसी सार्थक मकसद के लिए बुरा नहीं है। मुझे भी निराशा हुई है जब देखा जो कभी सत्ता की मनमानी और तानाशाही के विरुद्ध जे पी जी की जंग में साथी बने वही खुद और भी भृष्ट और अलोकतांत्रिक बन गए। उन लिए संपूर्ण क्रांति कोई मकसद नहीं केवल इक सीढ़ी थी सत्ता हासिल करने की। कितनी विडंबना है इक नेता जिस ने कभी कोई बड़ा पद नहीं स्वीकार किया उसके अनुयायी कहलाने वाले सब कुछ किसी भी तरह हासिल करने को तत्पर हैं। सत्ता ही उनका सब कुछ है। मैं अकेला चलता रहा और चलना भी आखिरी सांस तक उस काम को पूरा करने को। आप भी मेरे साथ चलना चाहोगे , बिना कोई स्वार्थ लिए मन में , देश और समाज की खातिर।

Thursday, 22 June 2017

विकास की नहीं , जाति धर्म की राजनीति डॉ लोक सेतिया

                विकास की नहीं , जाति धर्म की राजनीति

                                           डॉ लोक सेतिया

  जब आप इधर आ गए , देश के सब से बड़े पद को भी दलित राजनीति का ज़रिया बनाकर , अपनी ही बातों को भुलाकर कि सब ने अपने अपने घर भर लिए इसी राह पर चलकर अब इसकी नहीं विकास की , वो भी सब के विकास की बात होनी चाहिए तब जो इधर खड़े थे वो भी क्या करते। और इस तरह आपने तीन सौ साठ डिग्री का रास्ता कब तय कर लिया कोई नहीं समझ पाया। दोनों पक्ष ने दलित अपना अपना चुना और उम्मीदवार बना दिया। वास्तव में इन में दलित कोई भी नहीं माना जा सकता , एक राज्यपाल जैसे पद और एक लोकसभा अध्यक्ष जैसे पद पर रह चुके हैं। दलित लोग अलग होते हैं और दलित राजनीति करने वाले अलग। दलित लेखन दलित चिंतन भी कुछ ऐसे ही होते हैं। समझ नहीं आता देश की राजनीति किस कदर दिशाहीन कैसे होती गई है कि देश का राष्ट्र्पति भी उसी दलगत राजनीति के तराज़ू पर तोला जा सकता है। अब जो कल एक दलित का समर्थन करते कह रहे थे जो उनके उम्मीदवार होने का समर्थन नहीं करेगा वो दलित विरोधी समझा जायेगा। लो अब दोनों ही दलित हैं और आप चाहे किसी का भी साथ देते हैं आप दलित विरोधी ही बन जाओगे। क्योंकि आपने दूसरी तरफ के दलित का विरोध तो किया ही है , कितनी अजीब स्थिति है अब दलित का समर्थन करेंगे मगर होंगे दलित विरोधी ही। यही वास्तविकता है , ये सभी दल दलित शोषित ही नहीं गरीब मज़दूर किसान सभी के विरोधी ही हैं , इनकी सत्ता की राजनीती की केवल एक सीढ़ी भर। देशहित की संविधान की वास्तव में अनुपालना की राजनीति क्या कोई कभी नहीं करेगा। काश कोई होता जो ऐसी ओछी राजनीति का माध्यम बनने से इनकार करता। साहस करता इस गलत विचारधारा का विरोध करने का और कहता नहीं मुझे केवल किसी जाति में जन्म लेने के कारण नहीं पाना कोई पद।  मुझे आप अगर दलित वर्ग से नहीं होने पर भी इस पद के काबिल समझते तब ही इसे मंज़ूर करता या करती। देश के सब से बड़े पद पर आसीन होने वाले को इतना बड़ा तो होना ही चाहिए कि वो असूल की खातिर सब कुछ त्याग कर सके। मगर जब आप जानते हैं कि आपको इतने बड़े देश के सर्वोच्च पद पर दो कारण से उम्मीदवार बना रहे हैं , आपकी किसी के लिए निष्ठा और उनके लिए दलित होने से वोट पाने का इक माध्यम होने से। सवाल इस से अधिक महत्व का है , क्या उस पद की गरिमा प्रतिष्ठा बढ़ती है या कम होती है।

Tuesday, 20 June 2017

योग पर प्रतिबंध लगाओ ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

             योग पर प्रतिबंध लगाओ ( तरकश )

                                डॉ लोक सेतिया

हर कोई परेशान है , सरकारी अधिकारी रिश्वत भी चैन से नहीं ले सकते ताकि सरकार की बदनामी नहीं हो। इस सरकार की चिंता ही यही है कि किसी को ये नहीं पता चले कि आम आदमी को आज भी घूस देनी पड़ती है हर काम कराने को। अब तो इतना तक भी है कि गरीब होने की सूचना अपने घर की दीवार पर लिखवानी होगी ताकि सरकारी आंकड़े बढ़ सकें। सरकार की शान है कि वो आपको सहायता देती है आपसे ही लिए कर द्वारा जमा किये धन से। आप अपने अधिकार लेते हैं भीख की तरह , सरकार अपना फ़र्ज़ भी निभाती है उपकार एहसान की तरह ताकि बाद में उसी की बात कहकर वोट मांग सके। गरीबों की परेशानी तो उनका मुक़द्द्र है , अमीरों को परेशानी हो तो सरकार मुश्किल में पड़ जाती है। 
         आज योग दिवस है , विश्व स्वास्थ्य संघठन के नए आंकड़े आये हैं जो साबित करते हैं कि योग की शुरुआत करने से भारत में रोगी कम होते जा रहे हैं। आपको यकीन नहीं होगा मगर मैं खुद डॉक्टर हूं और मुझे हमेशा यही लगता रहा है मेरे पास मरीज़ बहुत कम आते हैं। ये दूसरी बात है कि मैंने इसका कभी प्रबंध नहीं किया कि मेरा धंधा चमके। कोई कमीशन नहीं दी किसी गांव वाले डॉक्टर को कि वो मरीज़ भेजता , उल्टा कोई आया ऐसा बात करने तो भगा दिया डांट कर , केमिस्ट और लैब से हिस्सा लिया नहीं , उनकी खातिर जांच को भेजा नहीं रोगियों को , ऐसे में मेरा धंधा मंदा रहना ही था। और मैंने कभी भगवान से भी ऐसी दुआ नहीं मांगी कि लोग स्वास्थ्य नहीं हों ताकि मेरी कमाई हो। सब की भलाई चाहोगे तो अपनी भलाई कैसे होगी। घोड़े और घास की बात है , खरबूजे और छुरी की बात की तरह। चलो कोई बात नहीं बिना दौलत भी मैं खुश हूं चैन से रहता भले आयकर का दफ्तर मेरे से दो प्लाट छोड़ पास ही है। दो तीन बार आये थे कभी हिसाब देखने मगर निराश हुए , एक बार तीस रूपये भरने पड़े उनकी लाज रखने को वो भी सी ए ने कहा मान भी लो इतना बनता है। 
                       अभी डॉक्टर्स का संगठन सरकार के नए बनते कानून को नहीं बनने की आस लगाए था , कि ये डब्लू एच ओ के आंकड़े भी डराने लगे। उनको यकीन है पिछले सालों में उनकी आमदनी घटी है तो उसका कारण बाबा जी का योग बेच कर मालामाल होना है। सालों साल खटते रहकर भी उनकी संम्पति कुछ सौ करोड़ की हुई और बाबा जी इतनी जल्दी हज़ारों करोड़ के मालिक बन गए। अब समझ आया समझदारी क्या होती है पढ़ लिख कर लोग चाकरी करते हैं और अनपढ़ नेता या उद्योगपति बनकर पढ़े लिखों को चाकरी को रखते हैं। पहले समझ आता तो अपने बच्चों को लाखों की कैपिटेशन फीस भर मेडिकल कॉलेज भेजने की जगह भगवा वस्त्रधारी बाबा बनाते। आप बेकार झूठी खबरें पढ़ते रहते हो सरकारी और निजि हॉस्पिटल की कि वहां डॉक्टर कम हैं रोगी अधिक हैं , डब्लू एच ओ की रपट बताती है कि रोगी हैं ही नहीं।  भारत को कब का केवल पोलियो रोग मुक्त नहीं सब रोगों से निजात मिल गई है योग द्वारा। कलाम जी किताब लिख गए थे दो हज़ार बीस का भारत कैसा होगा , वो भी सच होने ही वाला है। इधर कोई दो हज़ार उन्नीस तक किसी समस्या का अंत करने और दो दो हज़ार बाईस तक भारत को इण्डिया बनाने की घोषणा कर रहा है। बड़े लोगों की कही बात सच साबित नहीं भी हो तब भी कोई उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। हम जैसे लिखने वालों की किताब कोई बिना पैसे लिए नहीं छापता और अटल बिहारी जी की किताब को विश्वविद्यालय का कुलपति सब कॉलेजेस को खरीदने की सलाह देता है , कीमत भी केवल हज़ार रूपये थी। कलाम जी की किताब की भी रॉयल्टी किसी को मिलती रहेगी उनके पचास साल बाद तक , ऐसा नियम जो है।
                         मगर आज सब से बड़ी समस्या खड़ी हो गई है , रोग नहीं रहे तो केवल हॉस्पिटल और डॉक्टर्स ही नहीं कितने लोग इसी से जुड़े हैं सब के भूखे मरने की नौबत आ जाएगी। दवा बेचने वाले ही नहीं बनाने वाले भी बर्बाद हो जायेंगे। इतनी महंगी महंगी मशीनें किस काम आएंगी जब एम आर आई , सी टी स्कैन , अल्ट्रासाउंड की ज़रूरत नहीं होगी। करोड़ों की कमाई खत्म होगी सो होगी , खुद बाबा जी की भी दवाएं बिकनी बंद हो जाएंगी। आपको दवाएं बेचनी हैं तो रोगी चाहियें , स्वस्थ लोग क्यों दवा  लिया करेंगे। एक तो पहले ही स्वच्छता अभियान और खुले में शौच बंद होने से लोग बीमार नहीं होते और सब डॉक्टर भूखे मर रहे हैं ऊपर से योग से सब को निरोग किया तो क्या हाल होगा। आम नागरिक की चिंता छोड़ भी दो तब भी नेताओं को हमेशा हॉस्पिटल में दाखिल होने की ज़रूरत रहती है जेल से बचने को। जब डॉक्टर नहीं , हॉस्पिटल नहीं तब आप में आधे से अधिक जेल में होंगे। और जब लोग स्वस्थ होंगे तब उनमें आत्मविश्वास भी भरपूर होगा और वो आप नेताओं को हर  इक गलत बात पर मज़ा चखाया करेंगे। योग करने के खतरे , ऐसी इक किताब भी बाज़ार में आने वाली है जिस सेल योग सिखाने वाली सब किताबों से बढ़कर  होगी।
योग विद्या हो सकती है , मगर जब किसी दवा के दुष्परिणाम देख उन पर परिबंध लगा सकते हैं तो योग को भी प्रतिबंधित किया जा सकता है।

Monday, 19 June 2017

राजनीति की भटकी दिशा ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

               राजनीति की भटकी दिशा ( आलेख )

                                 डॉ लोक सेतिया

दूर की कौड़ी लाएं हैं देश का पहला सेवक होने का दावा करने वाले। इक दलित को देश के सब से बड़े पद पर बिठाकर एक तीर से दो नहीं कई निशाने साध रहे हैं। बिहार चुनाव पहला निशाना है और दलितों के नाम पर राजनीति करने वालों की बोलती बंद करना दूसरी। साथ में तमाम वर्ग भी किसी न किसी रूप में आते भी हैं। सब से विशेष बात ये भी होगी जो कभी सांसद का चुनाव नहीं जीत पाया , अर्थात एक संसदीय क्षेत्र की जनता ने नहीं चुना उसको पूरे देश के सांसद और विधायक चुनेंगे। अन्यथा नहीं लें तो यहां इक और बात भी स्पष्ट करना ज़रूरी है कि किसी का किसी कार्य में निपुण होना ये साबित नहीं करता कि वह वास्तव में देश की सही समझ रखता भी है। अक्सर किताबी ज्ञान वालों से मिला कुछ भी नहीं। मनमोहन सिंह जैसा अर्थशास्त्री भी वित्तमंत्री बन अपनी नीतियां लागू करने के बाद भी गरीबी को मिटा नहीं पाया अपितु और और बदहाल हो गए लोग। और कलाम जी को पूरा आदर देने के बावजूद कहना चाहता उनकी कल्पना का 2020 का भारत कभी बन नहीं सकता तीन साल बाद तक। किताबी ज्ञान की समस्या यही है , वास्तव में तो कभी आपको ये विचार भी करना ही होगा कि जिस देश में लोग भूखे और बदहाल हों उस देश को शांतिप्रिय कहलाने के साथ परमाणु हथियार बनाने पर इतना धन बर्बाद करना चाहिए था या नहीं। आप वही परमाणु हथियार होना अपने और पड़ोसी देश के पास इक बड़ी चुनौती बन गया है। 
         लेकिन मुख्य सवाल और है , किसी दलित को इक आलीशान महल में पहुंचाना सरल है राजनीति में , मगर कठिन है किसी का ये समझना कि क्या डेढ़ सौ एकड़ के राष्ट्रपति भवन में किसी को रहना चाहिए या उतनी जगह लाखों लोगों को रहने को मिलनी उचित होगी। कभी किसी नेता ने नहीं किया साहस इक सही कदम उठाने का कि जनता के सेवक होने की बात करने वालों पर देश का कितना धन बर्बाद क्यों हो। क्या ये अपराध नहीं है। बदलाव लाने की बातें सभी करते हैं लाता कोई भी नहीं। दिल्ली की सरकार से भारत की सरकार तक बदलाव की बातें करने वाले लोग खुद ही बदल गए , और वही पुरानी नीति अपनाने लगे। जो अच्छा वो नहीं जो ज़रूरी वो भी नहीं जो लोगों को खुश कर सके बहला सके आपकी लोकप्रियता बढ़ा सके वो करते हैं। कितना बड़ा धोखा है , योग्यता की बात बचती कहां है। ख़ास बात ये भी है कि आप कहते कुछ हैं करते कुछ और हैं। आम सहमति की बात दिखावा और करनी मनमानी है।  इस से अधिक डरने की बात किसी का एक मात्र निर्णय करने का अधिकार होना है।  किसी दूसरे दल क्या अपने दल में भी किसी को आप की बात से अलग कुछ कहने की इजाज़त नहीं है। चलो कुछ दिन नहीं पांच दिन बाद वही दिन आने वाला है जिस दिन आपत्काल की घोषणा की गई थी। 25 जून 1975 को। 

वास्तविक भावना भी जगाओ , देश से प्यार को खेल की जीत हार से नहीं आंको आलेख :- डॉ लोक सेतिया

                  वास्तविक भावना भी जगाओ 

                देश से प्यार को खेल की जीत हार से नहीं आंको

                              आलेख :- डॉ लोक सेतिया 

  मुझे भी इसकी उम्मीद नहीं थी , भारत की ऐसी हार वास्तव में स्तंभित करती है। मगर खेल की जीत का जश्न या हार का मातम मनाना कितना उचित है वह भी उसको दुश्मनी से जोड़कर किसी देश की। आपको दुश्मनी निभानी भी नहीं आती न ही दोस्ती करना। कभी उसी देश से कोई आता है और आप पलकें बिछाते हो , कभी खुद उसी देश जाते हो खुश होकर। कोई उसी देश से व्यापार करता है , कोई कलाकार रिश्ते निभाता है। और आपको देशभक्ति का दिखावा भी करना होता है तो टीवी चैनल वालों के सामने अपने पुराने खराब टीवी लेकर तोड़ कर। कितनी बार देखा यही होता है , आप जाओ इन के घरों में एलईडी एलसीडी टीवी बड़ी स्क्रीन वाले ही मिलेंगे। जिन के पास वही पुराना टीवी है वो चाहें भी तो उसको भी तोड़ नहीं सकते , क्योंकि उनकी हालत ही नहीं होती आजकल का नया टीवी खरीदने की। हमारी आदत ही अजीब है हम किसी को कभी खुदा बना देते हैं सफल होता देख कर फिर उसी को असफल देखते उसको रौंदते हैं पांवों तले। 
            रोज़ खुद भी कितने काम करते हैं जिनको देश हित नहीं समझा जाना चाहिए , जब जो मर्ज़ी अपनी सुविधा की खातिर। आपके दल की सरकार है तो आपको आंखे बंद कर अपने नेताओं अधिकारीयों का अनुचित आचरण अनदेखा कर उसकी जयजयकार करनी है। इसे देशभक्ति कहते हैं , अभी भी वही जुमले बोलते हैं सत्तर साल में केवल विनाश हुआ है। उन सत्तर साल में आपकी बनी सरकार के तीन साल भी खुद शामिल करते हैं , इतना ही नहीं बाकी की खुद अपने दल की ही या अन्य दलों की पहली सभी सरकारों को ख़िताब दे देते हैं लूट करने में लगे होने का। वही लूट अभी भी जारी है , आपने भी कहां तौर तरीका बदला है। क्या झूठा प्रचार ज़रूरी है या जनता की बदहाली को मिटाना जो आपने भी विज्ञापनों की बाढ़ ला दी है। गरीबी की बात करते खुद रहना अमीरों की तरह , इसको कोई अच्छा बताता है तो फिर बुराई क्या है। 
       देश का प्रशासन पुलिस कार्यपलिका न्यायपालिका सब को अमीरों की चिंता सताती है। आप जो कहने को भीड़ में शामिल होकर सब करते हैं खुद हर अनुचित बात सामने होते भी देखना नहीं चाहते। आपके देश को समाज को ये सब भीतर से खोखला कर रहा है मगर आप चैन की नींद सोते हैं। आपको सच नहीं बोलना क्योंकि नेता अधिकारी या फिर वो लोग जो आपराधिक प्रवृति के हैं नियम कानून को नहीं मानते उनसे डरते हैं कि कहीं आपको कोई नुक्सान नहीं दे सके। देशभक्ति तब खुद के स्वार्थ से छोटी लगती है। आप को अच्छा लगता है देशभक्त समझे जाना ये ठीक बात है लेकिन आपकी देशभक्ति किसी खास अवसर पर नहीं हर दिन दिखाई दे तभी सच्ची है। चलो इक बार दोबारा याद करते हैं देशभक्ति का असली अर्थ देश पर खुद को न्यौछावर करना है और हर उसका विरोध करना जो देश के लिए अपना कर्तव्य निभाता नहीं चाहे उस में आपके दल क्या घर का कोई सदस्य ही नहीं खुद आप भी हों तब अपने आप का भी विरोध करें ताकि देशभक्ति केवल दिखावा बनकर नहीं रह जाये।

Sunday, 18 June 2017

फिर आया है मसीहा ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

                   फिर आया है मसीहा ( तरकश )

                           डॉ लोक सेतिया

  उनको सदी का महानायक नाम दिया गया है , टीवी पर आकर कहते हैं मैं फिर आ रहा आपको करोड़पति बनाने। आज पहला सवाल है भाग लेने को उसका जवाब दें। आप को लगेगा भाई करोड़ रूपये की बात है सवाल कठिन होगा ही। और सवाल पूछते हैं बाहुबली फिल्म को लेकर , अगले दिन तक सही जवाब देना है। अगली दोपहर को बाहुबली फिल्म उसी टीवी चैनल के फ़िल्मी चैनल पर देख आप सही जवाब दे सकते हैं।
लगता है आपको कितनी आसानी से राह मिल रही है। स्वच्छ भारत भी उन्हीं की मेहरबानी है गांव गांव खेत खेत जाकर सुबह शौच को जाने वालों को लताड़ते हैं समझाते हैं भारत सरकार शौचालय बनाने को पैसा देती है। उनको कौन सवाल कर सकता है कितने गांवों में पानी ही नहीं पीने को मीलों दूर जाना पड़ता है और आप शौचलय की बात करते हैं। इन फ़िल्मी लोगों को सब फ़िल्मी नज़र आता है , इनकी ताकत भी फ़िल्मी , इनकी गरीबी भी फ़िल्मी , और इनका नायकत्व भी फ़िल्मी। नकली किरदार हैं ये सब। सब से अजीब बात है कि आप क्या दिखला रहे हैं , आपको सवाल भी यही पूछने हैं फ़िल्मी काल्पनिक दुनिया के। समाज को क्या अंधकार में रखना चाहते हैं और झूठे सपनों में खो जाओ यही आपका उद्देश्य है। लोग भूखे नंगे हैं बदहाल हैं मगर आपको उनको खाली पेट मनोरंजन के नशे में अपनी हालत को भूल जाने का उपाय करना है। बचपन में परीकथाओं में खोना अच्छा लगता था लोगों को , मुझे शायद तब भी मां ने उस तरह की झूठी कहानियां या लोरियां नहीं कुछ सच्ची कथाएं सुनाईं।
                आप को सब को टीवी वालों तक को बाहुबली को किसने मारा और भारत पाक मैच में जीत हार देश की सब से बड़ी समस्या लगती हैं। जब आपके सामने खड़ा होता है कोई नेता जो रिश्वत खाता हर काम करने को या अपना फ़र्ज़ नहीं निभाता अथवा कोई अफ़्सर जो जनता की सेवा नहीं नागरिक पर सत्ता का चाबुक चलाता हो। तब देश के प्रति अपराध करने वालों के सामने आप हाथ जोड़ खड़े होते हैं या अपने किसी मकसद को हासिल करने को उनको मुख्य अथिति बनाकर सम्मानित करते हैं। मगर आपकी देशभक्ति नहीं जगती और आप कुछ नहीं बोलते कायर बन जाते हैं। आपका जोश खेल को टीवी पर देखते जगता है बंद कमरे में या किसी मैदान में जाकर तरह तरह से दिखावा कर के। आप कोई भी काम करते हों , राजनीति , नौकरी या अपना कारोबार , आपको कभी नहीं लगता अपने काम में देश और समाज के लिए आप कितने सही हैं ईमानदार हैं। कम से कम देश का बीस तीस प्रतिशत हिस्सा जो सुविधा संपन्न है शायद नहीं जनता सत्तर प्रतिशत जनता की दशा क्या है। उन से सरोकार रखना देशभक्ति नहीं हो सकता। अगर हम सब को अपने ही देश के लोगों से प्यार नहीं है तो फिर किस से है। देश आप सब से है , हम सभी देश हैं मिलकर।
       बेहद हैरानी की बात है ये टीवी शो समाज को न केवल दिशाहीन करते हैं बल्कि साथ साथ उसको छलते भी हैं कुछ देते नहीं लूटते ही हैं। धन दौलत के अंबार हैं इन के पास फिर भी इनकी पैसे की हवस खत्म नहीं होती और कुछ भी करते कभी नहीं सोचते कि उस में देश या देशवासियों की भलाई है या उनके लिए बिछाया जाल है। आप हम इनकी मछलियां हैं , इनको ज़रूरत है हमारी , अपनी आमदनी और और बढ़ाने को। आपको ये कोई मसीहा लगते हैं। एक बार फिर याद दिलाता हर धर्म ग्रंथ कहता है वो सब से दरिद्र है जिस के पास सब कुछ है फिर भी और अधिक पाने की हवस है। हाउ मच लैंड ए मैन नीड्स , कहानी भी किसे याद है। यूं भी बड़े लोगों को मरने के बाद भी कई कई एकड़ ज़मीन चाहिए समाधि स्थल बनाने को उस देश में जिस में लोगों को ज़िंदा रहते घर नहीं नसीब होता।  अर्थशास्त्र का नियम समझाता है अधिकतर के पास कुछ इसी लिए नहीं है क्योंकि कुछ थोड़े से लोगों पास ज़रूरत से कहीं अधिक है। इस पर जो खुद और चाहते उनका कहना कि आपको अमीर बनाना चाहता हूं , झूठ है धोखा है और कपट है। मगर जानते हुए भी ऐसा करने वाले को जो महान समझते हैं सवाल उनकी सोच का है।

Saturday, 17 June 2017

मेरे वास्तविक आदर्श कुछ लोग ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

               मेरे वास्तविक आदर्श कुछ लोग ( आलेख )

                                             डॉ लोक सेतिया 

कुछ लोग हमारे जीवन में मिलते हैं जिन को अपना आदर्श बना लेते हैं हम। हम उनके बताये मार्ग पर चलते हैं या फिर चलना चाहते हैं , चल पाते हैं या कभी चलते रहने का प्रयास करते हैं। इधर देखते हैं लोग हर महान आत्मा का अनुसरण करने की बात करते हैं जबकि आचरण उसी के विपरीत ही किया करते हैं। महात्मा गांधी , लोकनायक जयप्रकाश नारायण , अंबेडकर ही नहीं लोहिया से लेकर तमाम ऐसे लोगों की हमने केवल पत्थर की मूर्तियां ही फूल अर्पित करने को बना ली हैं जो देश की आज़ादी की खातिर अपनी जान भी कुर्बान कर गए , तन मन धन सब देश पर न्यौछावर करने वाले असली नायक। और अब ऐसे ऐसे तथाकथित नायक बन गए हैं जिनको अपने स्वार्थ से बड़ा कुछ नहीं लगता। सत्ता और धन दौलत जिनका भगवान है उनको कोई आदर्श भला बना कैसे सकता है। मगर इधर यही होता है , टीवी वाले अख़बार मैगज़ीन वाले ही नहीं शिक्षा के मंदिर भी सफल हुए कुछ लोगों की राह चलने का पाठ छात्रों को पढ़ाते हैं। अर्थात हमारा विकास हमें उस जगह ले आया है कि जहां सफलता का एक ही मापदंड है धन अर्जित करना। हम जानकर अनजान बन जाते हैं कि सफल होने को किसी उद्योगपति ने कितने अनुचित ढंग अपनाये। किसी नेता ने क्या क्या गलत तरीके नहीं अपनाये सत्ता की खातिर , जो चाहते उसको पाने को अपनी आत्मा अपने विवेक अपने ज़मीर तक को दफ़्न कर दिया। और लोग हैं उन्हीं का गुणगान करने लगे हैं। कहां सादगीपूर्ण जीने वाले महान लोग और कहां उनके अनुयायी कहलाने वाले देश पर सफेद हाथी जैसा बोझ बने सत्ताधारी नेता। 
          मेरे दादा झंडाराम जी मेरे लिए सच्चा आदर्श थे और हैं , आप को अचरज होगा वो कभी स्कूल नहीं गए शिक्षा पाने को। दस साल की आयु में पिता का निधन होने के बाद अपनी ज़मीन पर किसी के कब्ज़ा करने पर उनको माता जी ने कोई और काम अपनी मेहनत से करने की शिक्षा दी। ताकि उनका इकलौता पुत्र दबगों से लड़ाई में जान नहीं गंवा बैठे। ये बातें आज की नहीं अंग्रेज़ों के काल की हैं क्योंकि आज से करीब 4 5 साल पहले मेरे दादा जी का निधन नब्बे साल की उम्र में हो चुका है। वो इक बालक था जो वीरान खेत में काम किया करता था और तब नहर किनारे बने घर में रहता था। सरकारी अफ़्सर रास्ते पर आते जाते रुकता और वो बिना किसी मकसद के उनको पानी पिलाता चाय बना देता या जो भी पास वो अतिथि को खिलाता जब कि पास कुछ नहीं होता था। इक अधिकारी ने देखा ये अनपढ़ बच्चा अपनी इक भाषा लंडे में लिखता है और नहर बनाने में कितनी मिट्टी निकली ढेर का गणित बिना कलम चलाये एकदम सही निकाल देता है। उस अधिकारी ने कहा आप बहुत तीव्र बुद्धि रखते हो आप कोई काम करो , और उनको बनाई जा रही नहर का इक हिस्सा बनाने का ठेका दिया था। अपनी समझ से आगे बढ़ता वही लड़का इक दिन बड़ा ठेकेदार बन गया और आपको बताना चाहता हूं भाखड़ा डैम से जो नहर हरियाणा के टोहाना तक आती है उसको मेरे दादा जी ने ही बनवाया था। अब आप सोचोगे मैं भी वही बात कहने लगा हूं किसी की सफलता से प्रभावित होकर , मगर नहीं। मेरा तो तब जन्म ही हुआ था 1951 में , और दादा जी की मौत होने तक मैं इक युवक था बीस साल का कॉलेज की पढ़ाई करता। मगर संयुक्त परिवार में अपने खेती करते ज़मीन पर गांव में रहते हुए ही उनहोंने इक घर फतेहाबाद शहर में लिया था बच्चों की शिक्षा की खातिर। बचपन में उनकी कई बातें हम सब को बुरी लगती थी जिन में उनका सादगी से रहने का उपदेश और चरित्र की महानता की बातें शामिल थीं। वो कहते थे आप बेशक महंगे कपड़े नहीं भी पहनोगे तब भी लोग आपको आदर देंगे जब उनको पता चलेगा आप लाला झंडाराम जी के पोते हैं। भले हमें समझ नहीं आती थी उनकी बात मगर यही सच था , जब कभी ज़िक्र होता था हम सुनते थे अच्छा आप उन के पोते हैं। हमारे परिवार में इक परंपरा उनकी कायम की हुई है कि घर आये हर किसी को प्रेम सहित भोजन खिलाना। अब खाने का समय है आप बिना भोजन किये भला कैसे जा सकते हैं , सालों बाद लोग उनकी ऐसी बातें हमें बताया करते थे। 
                   ठेकेदारी छोड़ चुके थे , मगर अपने बाद अपने वारिसों को सबक दे गए थे कि सरकारी काम को घर से अधिक ईमानदारी से करना है और कभी भी निर्माण में कोई कमी नहीं आनी चाहिए। जो सामान मिलता है सीमेंट या तारकोल उसको बेचने का काम नहीं करना कभी कमाई करने को हराम की। अब कोई भी हमारे परिवार का ठेकेदारी का काम नहीं करता है। शायद अब ईमानदारी से करना संभव भी नहीं है जब कोई अधिकारी ठेकेदार को भुगतान बिना रिश्वत लिए करता ही नहीं। आपने अंग्रेज़ों से बांटो और राज करो का सबक तो सीखा ईमानदारी नहीं सीखी , आज उनके काल की बनी इमारतें खड़ी हैं पुल अपनी अवधि पूरी होने के बाद भी कायम हैं जबकि आजकल की बनी सड़क या पार्क या फुट पाथ अथवा भवन साल बाद जर्जर लगने लगते हैं क्योंकि सीमेंट टाईलें सब घटिया होती हैं और ठेकेदार होते हैं नेताओं अफ्सरों के परिचित लोग। आजकल ईमानदारी से काम करने की बात कहने वाले को लोग नासमझ नहीं पागल मानते हैं। ये तभी है कि लोकनायक जयप्रकाश नारायण जिन को मैं सच्चा आदर्श मानता हूं के साथ सम्पूर्ण क्रांति में जुड़े लोग बड़े बड़े पदों पर आसीन हुए तो घोटालों के नए इतिहास रच डाले। 
                    मुझे आज कोई नेता नहीं दिखाई देता जो वास्तव में जिन को आदर्श बताता है उनकी राह पर चलता भी हो। किसी को भी अनावश्यक आडंबरों पर देश का धन व्यर्थ बर्बाद करना गुनाह तो क्या अनुचित तक नहीं लगता। तथाकथित यात्रायें निकाली जाती दिखावे को , कभी साहित्यिक यात्रा कभी सद्भावना यात्रा कभी स्वच्छता यात्रा। बस भाषण देकर सब हो गया घोषित किया जाता है और हर योजना में अपने लोगों को शामिल कर संस्था या एन जी ओ बना बंदरबांट होती है। अनाचार लूट हमारा राष्ट्रीय चरित्र बन गया है , कौन है जो ईमानदारी से जनता के धन के उपयोग की बात करे। शाही ढंग से हर दिन अपने पर लाखों करोड़ों खर्च कराने वाले जब त्याग और देश की सेवा की बात करें तब लगता है सच्चाई और ईमानदारी की अपनी ही परिभाषाएं गढ़ ली गई हैं। सब डाका डालते हैं और दानवीर कहलाते हैं। यही सत्तर साल की विकास की कहानी है। अंत में इक अपनी ग़ज़ल से कुछ शेर अर्ज़ करता हूं।


           लिखी फिर किसी ने कहानी वही है ,
           मुहब्बत की हर इक निशानी वही है। 

           सियासत में देखा अजब ये तमाशा ,
           नया राज है और रानी वही है। 

           हमारे जहां में नहीं कुछ भी बदला ,
           वही चोर , चोरों की नानी वही है। 

          जुदा हम न होंगे , जुदा तुम न होना ,
          दिलों ने हमारे भी ठानी वही है। 
         
          कहां छोड़ आये हो तुम ज़िंदगी को ,
          बुला लो उसे ज़िंदगानी वही है। 

          खुदा से ही मांगों अगर मांगना है ,
          भरे सब की झोली जो दानी वही है। 

          घटा जम के बरसी , मगर प्यास बाकी ,
          बुझाता नहीं प्यास पानी वही है।

Friday, 16 June 2017

वाह रे भगवान तेरी लीला ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

            वाह रे भगवान तेरी लीला ( व्यंग्य ) 

                           डॉ लोक सेतिया

                   आप नहीं मानोगे जनता हूं , मैं सच बोलता हूं ऐसा कोई सरकारी या गैर सरकारी संस्था से मिला कोई दस्तावेज़ भी नहीं पास मेरे। और ज़माना ऐसा बनता जा रहा है कि जल्दी ही बेटा कहेगा पिता जी आपने अभी तक मुझे अपने आधार कार्ड से जोड़ा नहीं है , मुझे भी आपका बेटा कहलाना बिल्कुल भी ज़रूरी नहीं लगता , मैं इक बड़े ओहदे वाला अधिकारी खुद को बड़ा बाबू की नौकरी करने वाले पिता की संतान कहला भला गर्व अनुभव कर सकता हूं। आपको गर्व है मेरा बेटा अफ़्सर बन गया है , आपको गलतफहमी भी है कि मुझे आपने बनाया है पढ़ा लिखा कर। मगर आपको पता नहीं है पिता जी सरकार ने अब हर काम को इक आधार कार्ड से जोड़ना शुरू कर दिया है , कल आप जब नहीं रहोगे तब आपका वारिस आपकी वसीयत लिखी होने के बावजूद वही बनेगा जो आपके आधार कार्ड पर दर्ज किया होगा आपका बेटा बेटी है। मेरी परेशानी है कि मैं अपने बेटे को तो अपने आधार कार्ड से जोड़ सकता हूं मगर आपको पिता के स्थान पर मैं नहीं जोड़ सकता , वो आप ही कर सकते हो। मुझे केवल आपके जोड़ने के बाद ही पूछे जाने पर स्वीकार करना होगा कि आप ही मेरे जन्मदाता हैं। लेकिन फिर भी मैं आपको सच सच बता रहा हूं कि मैं रोज़ मिलता हूं किसी जगह जाकर भगवान से , अभी अभी मिलकर आया हूं और आज बहुत राज़ की बातें आपको बताता हूं। आपको हैरानी हो सकती है मगर आपको बहुत कुछ सीख भी मिल सकती है मेरी कहानी से।
              आज भगवान कुछ अच्छे मूड़ में थे , लगा उनकी फेसबुक पर बहुत अच्छे कमैंट्स लिखे मिले हैं उनको , लाइक्स भी अनगिनत। मैंने कहा भगवान जी कब से आप मुझे अपनी राज़ की बात बाद में पता चलने का ज़िक्र करते आये हो अब आज तो बता भी दो। आज यही मांगता हूं , बेचारे भगवान फंस गए , हर दिन सीस झुकाता और पूछते क्या चाहिए और मैं रोज़ वही मांगता मुझे हमेशा सही राह पर चलने की समझ देना , मैं बहुत पापी हूं जाने किस किस को बुरा भला कहता हूं। मुझे झूठ से बचाना और सच बोलने का साहस देते रहना ताकि निडरता पूर्वक निस्वर्थ सच बोल कर इक अच्छा काम करता रहूं।  आज मैंने अपनी मांग भगवान को पता चलने से पहले ही बदल दी तो भगवान को विवश होकर मुझे अपना राज़दार बनाना पढ़ा। मगर इक वादा भी लिया कि उसका ये राज़ अपनी जुबां पर नहीं लाना , और मैं अपना वादा तोड़ भी नहीं रहा हूं क्योंकि मैं मुंह से कुछ बोलकर किसी को नहीं बता रहा , लिख रहा हूं और आप भी पढ़ बेशक लेना इस राज़ को अपने भीतर राज़ की तरह रखना बोलना मत। बोलोगे तब भी लोग सच पर यकीन नहीं करते आजकल झूठ पर विश्वास करते हैं सभी। नेता अधिकारी सरकार तभी झूठ पर झूठ बोलते हैं , सच नहीं बताते कभी किसी को कि जनता की सेवा नहीं जनता को अपना गुलाम समझते हैं। 
           भगवान कहने लगे , वत्स मेरे पास जो भी आता है मैं उसको दे देता जिस की वो कामना करता है। लोग आकर मांगते हैं स्वर्ग जैसे सुख सुख सुविधाएं यहीं जीते जी धरती पर और मेरे मुंह से तथास्तु शब्द निकल जाता है। मगर जब उनको धन दौलत सुख सुविधा नाम शोहरत या कोई पद या सत्तासुख मिलता है तब वो पाप अधर्म करने लगते हैं लोभ लालच करने लगते हैं अपने कर्तव्य को भुला अनाचार करने लगते हैं। जब उनको कोई अड़चन पेश आती है तब फिर मेरे पास आकर क्षमा की भीख मांग मुझ से दया करने की विनती करते हैं और फिर से वही स्वर्ग का सुख सुविधा पाकर फिर उसी गलती को दोहराने लगते हैं। अब इस को ठीक करना मेरे बस की बात नहीं है , उनको झूठ की लत है मगर मुझे भगवान होने का कर्म निभाना है। अब तुम जैसे कुछ लोग जो मेरे दर पर आकर सुख सुविधा और स्वर्ग की कामना नहीं करते और मांगते है सद्मार्ग पर चलते रहने की दुआ उनको वही मिलता है तभी उनको सच की कठिन राह पर मुश्किलें ही मिलती हैं उनको जीते जी स्वर्ग मिल ही नहीं सकता। ये राज़ की बात आप भी समझ लो और सोच लो भगवान से जाकर क्या मांगना है। मगर चुपके से बिना किसी को अपना राज़ खोले।
         

Thursday, 15 June 2017

आप जो मिल गए ज़िंदगी मिल गई ( डॉ लोक सेतिया "तनहा" ) 221

  आप जो मिल गए ज़िंदगी मिल गई ( डॉ लोक सेतिया "तनहा" )

पी लिया जाम इक बेखुदी मिल गई ,
मिल गए आप तो ज़िंदगी मिल गई। 

इश्क़ ऐसे हुआ जिस तरह से से कहीं ,
खुद समंदर से आकर नदी मिल गई।

जल रहा धूप में था हमारा बदन ,
पर तभी प्यार की चांदनी मिल गई।

उम्र भर हम अकेले ही चलते रहे ,
ढूंढते थे उसे शायरी मिल गई।

ख्वाब हर रात "तनहा" वही देखता ,
मोड़ पर ज़िंदगी थी खड़ी मिल गई।

Wednesday, 14 June 2017

शुद्धिकरण की ज़रूरत ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

               शुद्धिकरण की ज़रूरत ( तरकश ) 

                                    डॉ लोक सेतिया

मुझे इक कवि की वो कविता आई याद , जो उन्होंने लिखी थी जयप्रकाश नारायण जी के आंदोलन को लेकर सत्ता पर कटाक्ष करते हुए। सब दरवाज़े बंद कर लो खिड़कियों के पर्दे गिरा दो क्योंकि एक सत्तर साल का बूढ़ा आदमी निकल पड़ा है बिना कोई हथियार लिए सच बोलता हुआ। कल वही देखा बहुत लोगों की बड़े बड़े पदों पर बैठे तथाकथित पढ़े लिखे सभ्य भाषा में अच्छी अच्छी बातें बोलने वालों की सारी सभ्यता सब शराफत तमाम शिष्टापूर्ण आचरण नग्न हो गया जान 6 6 साल का इक आदमी मैं जा पहुंचा उनसे सवाल करने। ऐसा क्या तूफ़ान खड़ा हो जाता अगर मैं उनको दिखला देता आपकी सजावट झूठी है , गंदगी वहीं है जिस जगह आपने कार्पेट बिछाया हुआ है। इस तरह मैंने अपने सामने खूबसूरत लिबास पहनी सभ्यता को नंगा देखा , ऐसा कोई पहली बार तो नहीं हुआ मगर जिस तरह हुआ वो पहली बार था। आप इतने लोग इतनी व्यवस्था ताम झाम साथ लेकर साबित करने आये थे हम स्वच्छता की बात करने आये हैं और आपके आचरण की गंदगी सामने आ गई। अभी उत्तरप्रदेश में मुख्यमंत्री बनते किसी भगवा वेषधारी ने पहले वाले शासक के खाली किये घर को गौ मूत्र से धुलवा पूजा पाठ से शुद्ध कर ग्रहप्रवेश किया। काश कोई उपाय इस सड़े गले लोकतंत्र की शुद्धि का भी होता और पहले विधायक संविधानानुसार अपना दायित्व निभाते नेता चुनते न कि आलाकमान किसी का मनोनयन कर देश की राजधानी से तय करता किसको आपने अपना नेता चुनना है जो मुख्यमंत्री कहलायेगा। चार दिन तक फिर नए मंत्री मीडिया को साथ लेकर दफ्तरों से पान की पीक साफ कराते मिले , किसी को व्यवस्था और कार्यप्रणाली पर लगे निरंकुशता के अन्याय और मनमानी से सत्ता शासन के दुरूपयोग के दाग़ धब्बे नज़र नहीं आये। पिछले सप्ताह मैं अपने शहर के सचिवालय गया किसी सरकारी काम से तो देखा अगले दिन मुख्यमंत्री को आना इसलिए बहुत स्वच्छता का प्रबंध किया गया है मगर जहां सब अधिकारी बैठे काम कर रहे थे उनके पीछे रखी मेज़ों जिन पर तमाम फाइलें रखी थी जाने कितनी धूल जमी हुई थी जो भीतर जाकर देखी मैंने बाहर से किसको नज़र आती। सफाई करना नहीं की हुई दिखाना था। 
                                     ये कैसी विडंबना है सत्ता मिलते हर नया शासक खुद को पाक साफ दूध का धुला बतलाता है और जो जो पहले थे सब अपराधी पापी थे कहने लगता है। जबकि तमाम लोग जो तब उधर थे आज आपकी सरकार में शामिल हैं। आपका दल क्या गंगाजल है जिसमें आकर नहाये अपराधी भी पुण्यात्मा बन जाते हैं जब उनसे आपकी सरकार बहुमत साबित करती है। बड़े बड़े वादे किये हुआ कुछ नहीं , उल्टा जो जो कहते थे पहली सरकार गलत करती है उसको ही करते रहे और अधिक मगर अब अच्छा बताकर। व्यवस्था तो बदली नहीं आपकी सोच बदल गई हर बात पर , अपनी कही बाद के उल्ट करना सत्ता पाकर बिना लाज शर्म क्या बात है। जनता को बदलाव नज़र नहीं आता , केवल बदले विज्ञापन दिखाई देते हैं , महानता के खुशहाली के। मगर ख़ुदकुशी करते किसान और बेरोज़गार होती युवा पीढ़ी को विज्ञापन नहीं अधिकार चाहिएं। देश विदेश की यात्रा और हर जगह जाकर धार्मिक होने का दिखावा नहीं आपको अपना राजधर्म निभाना था। आपको गरीबों की सुध लेनी थी मगर आप केवल अपने दल को सत्ता दिलवाने तक की सोच लिए रहे और अभी भी आपको वादे निभाने की चिंता नहीं है , चिंता अगला चुनाव जीतना है की है। इस पर भाषण देते देश की खातिर सब त्याग दिया है। अगर सत्ता पाकर सादगी से रहते और जो अभी तक होता आया जनसेवक बन शाही जीवन जीना तो कोई बात भी थी।  मगर आपने तो सब पहले से और अधिक हासिल किया और अपने गुणगान पर देश का खज़ाना लुटवाया मीडिया वालों के मुंह बंद रखने को। महलों में राजा महाराजा की तरह रहते गरीबों के मसीहा होने का दम भरना कितना भद्दा मज़ाक है। हर शासक अपना खज़ाना भरता है गरीबों की कमाई छीन कर , सत्ता से बड़ा कोई भिखारी नहीं है। सरकारों की तिजोरी भरती ही नहीं कभी भी किसी भूखे राक्षस के पेट की तरह। 
                           आज़ादी का ऐसा ढंग ऐसा रूप होगा शायद उन्होंने इसकी कल्पना भी नहीं की थी जो देश की आज़ादी की खातिर कुर्बान हुए। कलयुग इसी को कहते हैं , चोर डाकू लुटेरे सब गरीब जनता से छीनी कमाई से आलिशान महलों में रहते हैं और देवताओं का भेस धारण किया हुआ है। सबने पहले साधु संतों के आत्मिक शुद्धि के लिए सन्यास लेने की कथाएं पढ़ी सुनी हैं। कभी किसी ने किसी कुटिया की मकान की शुद्धिकरण की बात कही हो नहीं पढ़ा सुना। ये कोई नए तरह का धर्म है। आप किस शुद्धिकरण और स्वच्छता की बात करते हैं जब तमाम अपराधी आपके दल में शामिल हैं , तमाम बाहुबलियों से आपका भाईचारा है। सब से ज़्यादा गंदगी उसी राजनीति में है जिस कीचड़ में आप खुद भी हैं। आप किसी और नेता पर कटाक्ष करते हैं नहाते समय रैनकोट पहनते हैं तभी कोई दाग़ उन पर नहीं लगा। अपने सुंदर वस्त्र के नीचे कभी तो देखा होगा भीतर कितनी मैल है। मन का मैल गंगा स्नान से भी नहीं मिटता आप जानते हैं। अदालत बेगुनाह बताती है का मतलब कभी ये नहीं होता कि कत्ल हुआ नहीं , कातिल पर इल्ज़ाम साबित नहीं होना निर्दोष होना नहीं है। काश कोई डिटरजेंट बना होता ऐसा जो राजनीति के मैल को साफ कर सकता। अगर कोई संत महात्मा पंडित मुल्ला पादरी ज्ञानी उपाय जानता हो इंसान के मन की सोच को साफ करने का तो देश की जनता अपना सब कुछ देकर भी सब दल के नेताओं को मन आत्मा से शुद्ध करवा लेती और सब समस्याओं से निजात मिल जाती। सब से अधिक गंदगी वहीं हैं जहां पर सत्ता के लुभावने शानदार कारपेट बिछे हैं

स्वच्छता अभियान या कुछ और ( आज की बात ) फतेहाबाद का पपीहा पार्क अभी अभी का सच डॉ लोक सेतिया

      स्वच्छता अभियान या कुछ और ( आज की बात )

                   फतेहाबाद का पपीहा पार्क अभी अभी का सच 

                          डॉ लोक सेतिया 






अभी अभी मेरे घर के सामने भाषण दिया जा रहा था , सुन कर मैं जब पहुंचा तब सब से प्रमुख अधिकारी धन्यवाद कर रहे थे अपनी बात को खत्म करते हुए। मैं दो साल से यहां की गंदगी को लेकर लिखता रहा हूँ हर अधिकारी को हर तरह से। सुबह जब जाता हूँ सड़क पर पांव रखने को जगह नहीं होती इतनी गंदगी फैली होती है। आज क्योंकि सरकारी आयोजन करना था इसलिए कुछ हद तक सफाई की गई दिखावे को और जो गंदगी डालते उनको आज रोक दिया गया। क्या इस तरह भारत स्वच्छ होगा झूठ दिखला कर। मैंने मंच पर जाकर उन अधिकारी से कहा कि जो आप बोल रहे वो झूठ है मैं आपको बताता सच क्या है। और मुझे वहां से बलपूर्वक बाहर धकेला गया , प्रशासनिक लोगों और पुलिस अधिकारीयों द्वारा। आप कहते हैं आपको बताया जाये क्या कहाँ गलत होता है मगर आप सच को खामोश करना चाहते हैं। किसी ने कहा आप बाद में मिल कर बताना जो वास्तविकता है , मगर अपमानित किये जाने के बावजूद भी मैंने फिर वापस अपनी गाड़ी की तरफ जाते उन अफसर से कहा क्या दो मिंट बात सुनोगे। मगर उनके इशारे से पहले ही पुलिस वाले मुझे ज़बरदस्ती पकड़ दूर ले गए। शायद उनको परवाह ही नहीं कि उनको ऐसा करने का अधिकार है भी या नहीं। जो उन सब की नज़रों में दिखाई दिया वो साफ था कि उनका बस चले तो वो मुझे कुछ भी कर सकते हैं।  कम से कम ऐसी पुलिस से सुरक्षा की उम्मीद तो नहीं की जा सकती। क्या यही सुशासन है , आप एक तरफ इमरजेंसी के कैदियों को पैसे देते हैं साथ ही बिना आपत्काल घोषित किये उसी तरह का अलोकतांत्रिक आचरण करते हैं। शायद इनको याद नहीं ये शासक नहीं हैं और कोई राजा नहीं है। जनता या किसी नागरिक पर इस तरह पब्लिक प्लेस में आपको रोक लगाने की अनुमति नहीं है।  सब से विचित्र बात ये होती है कि हम जो लोग भी भीड़ बन जमा होते हैं वो कभी साहस ही नहीं करते उनसे निडर होकर बात करने का। आज जब मुझ अकेले से बात करने से बच रहे थे वो वास्तव में खुद डर रहे थे क्योंकि उनमें सच का सामना करने का साहस ही नहीं था। तंत्र की ये सारी ताकत भी उनको अपने झूठ की पोल खुलने से बचा नहीं सकती थी , और इस तरह मुझे अथवा किसी भी आम नागरिक के सवाल  का जवाब नहीं देकर पुलिस द्वारा हटाने को देखना उनकी देश की सेवा और जनता के अधिकारों की रक्षा करने की शपथ का उपहास कर साबित कर रही थी कि आप में संविधान और नागरिक  के मौलिक अधिकार जिन में विरोध की बात कहना भी शामिल है का पालन नहीं कर रहे हैं।  आप अँधेरा फैला कर उसको रौशनी का नाम देना चाहते हैं। आज की यहाँ की असली तस्वीर भी आपको देखनी ज़रूरी हैं।
लेकिन कल सुबह आपको अख़बार में खबर मिलेगी हरियाणा के फतेहाबाद शहर की स्वच्छता अभियान की सफलता और खुले में शौच मुक्त और आवारा पशु से मुक्त होने पर मिले सम्मान के बाद स्वच्छता के इस आडंबर की भी। किसी टीवी या अख़बार वाले को कुछ भी नज़र नहीं आएगा।  मुझे  ये सब करते बयालीस साल हो गए हैं।  आपातकाल से ही लिखता आया हूँ और 2 5 जून 1 9 7 5 को लोकनायक जयप्रकाश नारायण जी के भाषण सुनने वाले में रहा हूँ। जिनको पता नहीं उनको बताना चाहता हूँ जिन शब्दों के उपयोग की बात की आड़ लेकर एमरजेंसी लगाई थी वो क्या थे।

        जे पी जी ने कहा था सुरक्षा कर्मियों से कि अगर कभी कोई शासक आपको शांतिपूर्वक विरोध करती जनता पर लाठी या गोली चलाने को कहे तो आपको उनका आदेश नहीं मानना है। क्या भाजपा आज मानती है ऐसा बोलना गुनाह था। अगर नहीं तो जो आज मेरे साथ हुआ या किसी और जगह किसी और के साथ होता है तब पुलिस का ऐसा आचरण उचित है। आपकी कथनी और करनी में अंतर होगा तो इतिहास आपको मुजरिम ठहराएगा ही। इतिहास ने वो मंज़र भी देखे हैं , लम्हों ने खता की थी सदियों ने सज़ा पाई। आज की ये बात भी लिखी जायेगी किसी न  किसी रूप में।



Sunday, 11 June 2017

हम सब देशभक्त हैं ( बुरी लगे या लगे भली ) आठवां सुर ( डॉ लोक सेतिया )

               हम सब देशभक्त हैं ( बुरी लगे या लगे भली )

                           आठवां सुर  ( डॉ लोक सेतिया )

कल ही की बात है , टीवी देख रहा था , जबकि अब टीवी देखना मुझे अपराध जैसा लगता है।  किस दुनिया की बातें हैं समझ नहीं आता , असली दुनिया में तो नहीं ऐसा। विडंबना ही है टीवी अख़बार फिल्म क्या संगीत तक कहानी भी फिल्मों टीवी सीरियल की केवल मनोरंजन को हैं सब। क्या मनोरंजन जी जीवन है या जीवन से भटकाव है। इक तथाकथित रियल्टी शो में इक भगवा वस्त्र डाले बाबा जी कहलाने वाले अतिथि थे , चंद्रशेखर आज़ाद का अभिनय किया बच्चे ने और बाबा जी भावुकता जतलाते कहने लगे वो शहीदों की गाथाएं पढ़ते पढ़ते बड़े हुए हैं। आदत के अनुसार खूब नारे भी लगाए भारत माता की जय के , और महान देशप्रेमी बन गए। ये आसान तरीका है देशभक्ति प्रदर्शन का। विदेशी भी देश को इसी तरह लूटते रहे सस्ता लेते और कई गुणा महंगे दाम अपना सामान बेचते। दावा जो भी करो आप हज़ारों करोड़ के मालिक बन गए और जिन का सामान बेचा वो गरीब किसान भूखे है तो इसको शोषण नहीं तो और क्या समझा जाये। देश को तन मन धन अर्पित करना किसी को आता है , लोग बदहाल और कुछ कारोबारी मालामाल ये न तो देशभक्ति है न कोई धर्म है मानवता तो कदापि नहीं। आधी जनता को रोटी नहीं मिलती और उस की बात का भाषण भी जिस सभा में हर दिन देते नेता लोग उसके मंच की सजावट पर ही लाखों बर्बाद किये जाते। किसी मंत्री को सांसद विधायक को एहसास हुआ कभी , क्या उनका लाखों रूपये हर दिन खर्च करना अपने आप पर देश के प्रति अपराध नहीं है। जो भी उद्योगपति या कारोबारी सैंकड़ों प्रतिशत मुनाफा लेकर मालामाल होते हैं जबकि खेती किसानी करने वाले उनके सामान के खरीददार को लागत मूल्य को जूझना पड़ता है क्या देशभक्त हैं। आपने टीवी पर या मैदान में कोई खेल देखा और अपनी देशभक्ति साबित कर ली। वही खिलाड़ी इतना धन पाकर भी अपने नाम और शोहरत को बाज़ार में बेचते हैं और अमीर बनने को। मेरा मानना है देश की गरीबी का एक मात्र कारण ही थोड़े से मुट्ठी भर लोगों की अधिक पाने की हवस है। क्योंकि उनके पास ज़रूरत से बहुत अधिक है इसीलिए बाकी भूखे हैं गरीब हैं। और इस में नेता अधिकारी कारोबारी क्या अभिनेता तक शामिल हैं , इन को जो मिलता है वो आता उन्हीं गरीबों की जेब से है जो भूखे हैं बदहाल हैं। 
         साहित्य की बात और कला की बात सार्थक तभी होती है जब वास्तविक समाज की दशा दिखाई दे। बाहुबली की बात कितनी सार्थक है , आज की फ़िल्में क्या संदेश देती हैं। जो खुद भटक गए अपनी राह से उनसे आशा रखना मार्ग दिखाने की क्या मुमकिन है। जिसे देखो इक अंधी दौड़ में भाग रहा है धनवान बनने की। इक बात शयद भूल गए जो बचपन में पढ़ी थी हाउ मच लैंड ए मैन नीड्स , कितनी ज़मीन चाहिए आदमी को , बस दो गज़ मिलती है आखिर। इक बादशाह को वो भी नहीं मिली इसी का मलाल था उन्हें , ज़फ़र जी की ग़ज़ल याद है , ऐसा है बदनसीब ज़फ़र दफ़्न के लिए , दो गज़ ज़मीन भी न मिली कुए यार में। 
आज बड़े बड़े खबरनवीस कहलाने वाले मीडिया पर काबिज़ लोग क्या जानते भी हैं खबर क्या होती है , खबर की परिभाषा उनको याद भी है। जिस बात का शोर हर तरफ हो रहा उसको खबर नहीं कहते। खबर तो वो सूचना है जो कोई जनता तक पहुंचने नहीं देता जिसको तलाश कर सब को बताना आपका कर्तव्य था। 
        अभी दो टीवी के रियल्टी शो फिर शुरू होने वाले हैं , बिग बॉस और कौन बनेगा करोड़पति। मैंने पहले भी लिखा है करोड़पति बनाने का ये ख्वाब इक धोखा है , साहस है तो किसी एपिसोड में अपना सच बताएं इसके आयोजक संचालक प्रस्तुत करने वाले। इस से कितने लोग अमीर बने और कितना धन आपको मिला , ये लूट का आधुनिक तरीका है। आप लोगों को जुआरी बना रहे हैं और खुद मालामाल हो रहे हैं। उसके बाद भले किसी मंदिर में करोड़ों का चढ़ावा देना पहले सोचना ये कमाई मेहनत की तो नहीं है। आप ध्यान से देखो आपको जो महान लोग लगते हैं वो वास्तव में कितने छोटे हैं , उनका कद उनकी ऊंचाई दूसरों पर चढ़कर मिली हुई है। जब तक देश के सब से बड़े पद पर आसीन राष्ट्रपति एक सौ पचास एकड़ के महल में शाही शान बान से अपने आप पर रोज़ लाखों खर्च कर गरीबी का मज़ाक उड़ाएगा तब तक आज़ादी और लोकतंत्र बेमतलब के जुमले ही रहेंगे असलियत कभी नहीं। 
              इक नशे के आदी हो गए हैं लोग , फेसबुक व्हाट्सएप्प पर दिन भर बड़ी बड़ी ज्ञान की बातें। आस पास कभी नज़र डाली क्या होता है। आपको अच्छा वेतन मिलता है सुख सुविधा है मगर आपका कर्तव्य भी कोई है अपने देश के लिए। अपना फ़र्ज़ निभाए बिना देशभक्त बन गए केवल भाषण देकर बातें कर के झूठे नारे लगा कर। बिग बॉस जैसे आयोजन से समाज को क्या मिलता है , गंदगी। आप उसका हिस्सा हैं पैसे के लिए और बीइंग ह्यूमन की बात भी साथ साथ। डाकू भी लूट कर दान भी दिया करते थे। दान धर्म कभी पाप की कमाई से नहीं किया जाता।  देश का नेता अगर जनकल्याण को भुला मंदिरों में पूजा पाठ करता है तो उसे धर्म ग्रंथों को फिर से पढ़ना होगा। सारी उम्र प्रचारक बने समझाते फिरे देश पहले बाकी बाद में , अब सत्ता पहला ध्येय और देश से पहले अपना राजनितिक दल। अंत कोई नहीं विषय का , मगर कहीं तो बात को विराम लगाना होगा , तो आखिर में दुष्यंत जी की ग़ज़ल के शेर हाज़िर हैं। 

               अब किसी को भी नज़र आती नहीं कोई दरार ,

               घर की हर दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तिहार। 

               मैं बहुत कुछ सोचता रहता हूं पर कहता नहीं ,

               बोलना भी है मना सच बोलना तो दरकिनार।

                                            

मेरी कालजयी रचना ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया


              मेरी कालजयी रचना ( व्यंग्य )

                               डॉ  लोक  सेतिया

  बड़ा ही सुंदर नज़ारा है , मंच सजा हुआ रंग बिरंगे फूलों से , उत्सव सा माहौल , खचाखच भरा हाल। साहित्यकार बुद्धीजीवी वर्ग और मेरे सभी सब दोस्त रिश्ते नाते वाले , मुझ से जलने वाले भी बैठे हुए हैं। मुझे मंच पर बैठा देख रहे सब लोग , इंतज़ार कर रहे हैं कि कब देश के सर्वोच्च पद पर आसीन महानुभव मंच संचालक के बुलावे पर उठ कर आएं और मुझे साहित्य लेखन और उम्र भर जनहित की बात करने पर पुरुस्कृत एवं सम्मानित करें। आखिर वह पल आ ही गया और मुझे मुख्यातिथि द्वारा फूलों का गुलदस्ता भेंट कर प्रशस्ति पत्र और सम्मान राशि का चेक दिया गया और सभा के सभी उपस्थित लोग तालियां बजा कर मेरा अभिवादन कर रहे थे। इस मुख्य काम की औपचारिकता पूरी होने के बाद मंच संचालक ने मुझे डायस पर आने और आज जिस रचना और कार्य की खातिर ईनाम मिला उन सब की बात बताने का आग्रह किया। मैंने तुरंत माइक को अपने अनुसार सही किया और अपनी बात विस्तार से बतानी शुरू की। ऐसा अवसर मुझे पहली बार मिला था और शायद अंतिम बार भी यही हो मुमकिन था। ये ईनाम जिस रचना पर मिला उसकी बात आखिर में करना उचित होगा , मैंने कहना शुरू किया इन शब्दों से। कहानी का अंत शुरू में पता चल जाये तो कहानी का लुत्फ़ नहीं रहता है। शुरू से बताता जो जो भी हुआ। 
           कुछ भी हो सकता है आज यकीन हुआ मुझे भी , अभी कुछ महीने पहले मेरे पासक्या था , अनाम इक लेखक। सभी कहते थे आप ने क्या हासिल किया है , साहित्य अकादमी क्या किसी स्थानीय संस्था तक से कोई पुरुस्कार सम्मान नहीं , किसी प्रकाशक से कोई किताब छपवाई नहीं। कितने साल से लिखते हर विधा में लिखा और देश भर में रचनाएं छपती रहीं फिर भी आपकी गिनती किसी में नहीं। सैंकड़ों व्यंग्य सैकड़ों ग़ज़ल कविताएं और जीवन की वास्तविकता पर मन को छूती कहानियां और झकझोर देने वाली रचनाएं आपके लिखे जनहित पर निडरता पूर्वक बेबाक लेख , इंसानियत के दर्द को कितना अच्छी तरह बयान किया है आपने। आपका अपना तरीका है सीधे साफ आसान शब्दों में बगैर कठिन गूढ़ शब्दों का उपयोग किये , अपनी खुद की शैली में लिखना बगैर किसी और से प्रभावित हुए आपकी रचना पढ़ना इक अनुभव कराती है। आपने क्यों अन्य मित्र लेखकों की तरह तमाम किताबें नहीं छपवाई , आपको ईनाम पुरुस्कार मिलते कैसे। आप किसी सरकारी संस्था , साहित्य अकादमी के सदस्य भी रहे नहीं कभी , किसी नेता अधिकारी से दोस्ती करके। जबकि अधिकतर लेखक खुद ये सब करते हैं अपनी ही जेब से पैसा खर्च कर किताबें छपवाना क्योंकि उनका मानना है इसी तरह उनका नाम सदा कायम रहेगा , दो सौ प्रतियां किताब की छपवा मुफ्त में पहचान वालों में बांट कर।
                          मैं भी सभी लिखने वालों की तरह चाहता था , मेरी भी किताबें कोई प्रकाशक छापता , मगर किसी ने संपर्क किया ही नहीं कभी। खुद अपने पैसे खर्च कर कुछ प्रतियां मुफ्त में बांटना वो भी उन को जिनको शायद पढ़ने में रूचि भी नहीं हो , मुझे उचित लगा नहीं। और अख़बार पत्रिका वाले भी बहुत कम हैं जो उचित मानदेय भी देना चाहते हों। करोड़ों की आदमनी करने वाले तक हिंदी के लेखक को इतना भी नहीं देना चाहते जिस से उस का जीवन यापन हो सके। शोषण की बात लिखने वाले लेखक खुद शोषण का शिकार हैं। मगर अख़बार और पत्रिका वाले नहीं मानते वो कोई गलत काम करते हैं , उनका विचार है वो रचना छाप कर लिखने वाले पर एहसान उपकार कर साहित्य की सेवा करते हैं। उनको रोटी की ज़रूरत है पेट भरने को मगर लेखक को भूख कहां लगती है , उसकी भूख तो छपने की ही है। कानून बदल गया हो तो क्या , आज भी जाने माने लेखकों को रायल्टी कौन देता है , भीख की तरह नाम को राशि देकर सभी अधिकार खरीद लेते हैं , गैर कानूनी ढंग से भी। मुझे इस सब से तालमेल बिठाना नहीं आया।
                     मगर अचानक कुछ महीने पहले मुझे इस बात का ख्याल आया कि , कोई नेता अपने भाषणों के जादू से ऐसा रुतबा हासिल कर चुका है जो भगवान से कम हर्गिज़ नहीं है। सब लोग समझते हैं जैसे कोई फरिश्ता या मसीहा ज़मीं पर उत्तर आया है हमारे सब दुःख दर्द मिटाने को। अब गरीबी भूख , अव्यवस्था , भरष्टाचार और महिलाओं बच्चों के शोषण , देश में फैली गंदगी जैसी समस्याओं का अंत कर अच्छे दिन सब को दिखाई देने लगेंगे। देश विदेश में भारत का नाम रौशन होगा और कोई किसान मज़दूर क़र्ज़ से तंग आकर आत्महत्या नहीं करेगा। सब को रोज़गार मिलेगा और सब अधिकार समानता के भी बराबर सबको। तीन साल तक कुछ भी ऐसा किये बिना ही टीवी अख़बार और सोशल मीडिया के उस चतुर खिलाड़ी ने विज्ञापनों द्वारा हर तरफ अपने नाम की गूंज खड़ी कर दी है। कोई जब उसको झूठा बताता है तब लोग मानते हैं जैसे कोई अधर्मी पापी भगवान का अपमान कर रहा है। जैसे कोई जादूगर तमाशा दिखलाता है और जो असंभव उसको देख हम सच समझने लगते हैं ,उसी तरह , मगर अंतर है हाल से बाहर निकलते हम समझ लेते जो देखा नज़रों का धोखा था असलियत नहीं। लेकिन इस जादूगर नेता का सम्मोहन खत्म नहीं होता बढ़ता जा रहा है। तब मुझे लगा बहुत लोग कोई आरती कोई चालीसा लिखते हैं चढ़ते सूरज को प्रणाम कर। मैंने ढूंढा तो पता चला अभी तलक नहीं सूझा किसी को ये। शायद मुझे ही करना होगा ये महान काम , इक भजन लिखना जो जन गण मन और सारे जहां से अच्छा गीत की तरह लोकप्रिय हो। जिस के बारे सरकार घोषणा कर दे कि इस भजन को गाने से सब समस्याएं हल हो जाएंगी और अच्छे दिन आ जाएंगे। जब मैंने ये अपना विचार सरकार को भेजा तो उसे पसंद आया ताकि हर विज्ञापन के साथ जोड़ इसको सोशल मीडिया पर उपयोग किया जा सके। और मैंने ये भजन लिखा।

           अब दिन अच्छे आये हैं , गूंगे भी सब गाये हैं। 

  भजन की धूम से हर तरफ मेरा नाम छा गया , और प्रकाशकों ने मेरा छपा अनछपा सब मुंह मांगे दाम देकर किताबों के रूप में छापा ही नहीं अन्य भाषाओं में अनुवादित भी किया। मुझे इक भजन ने मालामाल कर दिया है , मैं सुबह शाम उसी को गाता हूं और रोज़ बहुत कुछ मनचाहा पाता हूं। आप भी इस को जपना शुरू करो ताकि आपका भी कल्याण हो। मेरा संबोधन सुनकर सब तालियां बजा अभिवादन कर रहे थे खड़े हो कर। अचानक श्रीमती जी ने मुझे झकझोर कर जगा दिया , उठो अब दिन निकल आया है कब तक सोते रहोगे। काश मेरी नींद खुलती नहीं और मेरा सपना सच हो जाता , मेरा लिखा भजन राष्ट्रीय भजन घोषित किया जाता। कालजयी रचना इसी तरह रची जाती है।

एक दिन को सब कुछ ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

                 एक दिन को सब कुछ ( हास-परिहास )

                                       डॉ लोक सेतिया

एक दिन दीपावली मनाते हैं ,
एक दिन दशहरा भी मनाते हैं ,
एक दिन उजाला करते हैं मन में ,
एक दिन बुराई को जलाते हैं। 
एक दिन को आज़ादी  है मिलती ,
एक दिन वोट दे सरकार बनाते हैं ,
एक दिन को मालिक बन कर फिर ,
पांच बरस सभी बस पछताते हैं।
एक दिन के खेल बहुत हैं यहां पर ,
हर दिन इक तमाशा बनाते हैं ,
एक दिन हर किसी को देकर हम ,
साल भर उसको भूल जाते हैं। 
एक दिन महिला दिवस  होता है ,
एक दिन बाल दिवस मनाया जाता ,
एक दिन पृथ्वी दिवस भी है यहां ,
एक दिन पर्यावरण को बचाते हैं। 
एक दिन मज़दूर की बात करते हैं ,
एक दिन गणतंत्र दिवस सजाते हैं। 
एक दिन स्वच्छता की बात होती है ,
बाद में गंदगी सभी फैलाते हैं ,
एक दिन होली और ईद का मिलन ,
बाकी दिन भाईचारा क्या भूल जाते हैं। 
हर दिन तथाकथित पढ़े लिखे लोग ,
कोई न कोई सभा मिलकर कराते हैं ,
झूठ आडंबर की बड़ी बड़ी बातें कर ,
सभ्य और बड़े महान बन जाते हैं। 
एक दिन को सब धर्मात्मा हैं यहां ,
गरीबों को भी जब खाना खिलाते हैं ,
मगर उन्हीं को करते नफरत भी हैं ,
लूट कर भी हम उनको ही खाते हैं। 
एक दिन को खाई कसम ईमानदारी की ,
अगले ही पल जिसे भूल भी जाते हैं ,
हर दिन सोचते इक दिन जीना भी है ,
एक दिन यूं ही पर मर ही जाते हैं। 
अब एक दिन ऐसा भी करें काश ,
एक दिन की रस्म को तोड़ आते हैं ,
जो भी करना हर दिन करें या फिर ,
अच्छाई को छोड़ बुरे कहलाते हैं।

Friday, 9 June 2017

भगवान हुए परेशान ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

              भगवान हुए परेशान ( हास-परिहास )

                                डॉ लोक सेतिया

भगवान सदियों से सोये हुए थे , आखिर उनको जगाना ही पड़ा ,
हर पत्नी का यही तो फ़र्ज़ है , पत्नी को भी उसे निभाना ही पड़ा। 
उठे नहाये धोये खाया पिया , तब उसको कर्तव्य बताना ही पड़ा ,
जाओ दुनिया का हाल भी देखो , परमेश्वर को समझाना ही पड़ा।

पता चला कहीं भीड़ लगी है , चले गए भगवान उसी जगह पर ,
लेकिन इतना शोर था सभा में , सुनते हर कोई जाएगा ही डर। 
चढ़ गए भगवान मंच पर जब , किसी की नहीं उनपे पड़ी नज़र ,
कोई नेता जिस दिशा से आ रहा , सभी देखने लग गए थे उधर। 

आखिर उनको समझ नहीं आया , ये कोई क्या है हुआ अवतार ,
सब सर उसी को झुकाए खड़े हैं , करते उसी की जय-जयकार। 
संचालक को परिचय देकर तब , कहने लगे दुनिया के पालनहार ,
खुद मैं आया हूं धरती पर आज , करने सब दुखियों का उद्धार। 

मंच संचालक ने मांगा तब , परिचय पत्र वोटर कार्ड आधार ,
भगवान के पास नहीं था लेकिन , कुछ भी सरकारी  पत्राचार। 
समझाया भगवान को तब यही , नहीं मिलेगा कुछ भी इधर ,
जाकर कहीं और ढूंढो अपने लिए , जगह कोई कोई घरबार। 

बहुत सभाएं देखी जा जाकर , नहीं दे पाए अपनी पहचान ,
कैसे किसको प्रमाणित करते , वही है दुनिया के भगवान। 
हालत खराब देख आया इक लेखक , पूछा क्या हुआ नादान ,
अब तुझे कोई कैसे जानेगा यहां पर , बना लिए कितने भगवान।

कोई नेता बना खुदा है , कोई खिलाड़ी बन गया है भगवान ,
अभिनेता कोई ईश्वर है सबका , देवी देवता उसकी हर संतान। 
तुम तो पत्थर की मूरत बनकर , बैठे मग्न देखते अपनी शान ,
कोई तुमको प्रवेश नहीं देगा , तुम ऐसे हो गए अब मेहमान। 

असली असली सब असली  पर , नकली नकली इक भगवान ,
नकली असली और मैं नकली हूं , भगवान भी देख हैं हैरान। 
वापस जाना भी बहुत कठिन है , आया था ले कितने अरमान ,
सच बताया जाकर पत्नी को गर , घर से बाहर होगा सामान। 

घूम रहा इधर उधर समझाता , इस दुनिया का हूं मैं भगवान ,
सब को कोई पागल लगता है , अपना नाम हुआ ऐसा बदनाम।
लेखक से ही जाकर पूछा उपाय , क्या मेरा लिखोगे अंजाम ,
रिटायर हो जाओ यही उचित है , नहीं करने को कोई अब काम। 

सब जाते जाने किधर किधर , सोच वहीं मिलता है भगवान ,
सामने आये जब खुदा भी तब , कहते जाओ छोड़ो भी जान। 
धर्म कर्म किसको चाहिए अब , झूठे रटते रहते कोई नाम ,
ये सारे भगवान खुद ही बने हैं , तुम किस के हो अब भगवान। 

देख दशा भगवान की आई समझ मुझको इतनी सी बात है ,
सूरज आसमान पर चमक रहा है अंधियारी फिर भी रात है।

Wednesday, 7 June 2017

भगवान धर्मराज की अदालत में ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

               भगवान धर्मराज की अदालत में ( व्यंग्य )

                                  डॉ लोक सेतिया

सोचा ही नहीं था उसने , उसको तो लोग भगवान का दूसरा रूप ही मानते हैं , इक दिन उसे भी धर्मराज की अदालत में कटघरे में खड़ा किया जायेगा। और हिसाब लिया जायेगा अपने सारे कर्मों का , अपने हर कर्म को उम्र भर उचित ही माना है उसने। भला भगवान से कोई पूछता है उसने कुछ सही किया गलत किया , धरती पर तो उसको हर जगह विशेषाधिकार मिलते थे। न्याय करने की हर सरकारी जगह उसको न्याय देने वाला अपने बराबर कुर्सी पर बिठाया करता था , आखिर उसको भी मालूम ही होता था डॉक्टर की ज़रूरत कभी भी पड़ सकती है। हर कोई उसको हाथ जोड़ नमस्कार किया करता था सब जगह। धर्मराज ने पहला सवाल यही किया हे मनुष्य तुमने क्या क्या उचित कर्म किये क्या क्या अनुचित क्या याद हैं। डॉक्टर की आत्मा ने जवाब दिया मुझे अच्छी तरह याद है मैंने हमेशा बहुत अच्छे काम ही किये हैं , मैंने कितने लोगों की सेवा की है उनको रोगमुक्त किया है। धर्मराज बोले वह करना तो आपका कर्तव्य था आपने उस सब के लिए वेतन लिया सरकार से या फिर अपने हॉस्पिटल में अपनी फीस ली। मगर क्या आपने बदले में वही किया जो ईमानदारी पूर्वक आपको करना चाहिए था। आपने इक शपथ भी ली हुई थी , और आपने जाने क्या क्या तख्ती लगा रखी थी अपने बारे में अपने यहां उपलब्ध सेवा को लेकर ही नहीं ईश्वर की मूर्ति तस्वीर और बड़ी ऊंची आदर्शवादी बातें लिख कर। आप जो होने का दावा कर रहे थे क्या आप वही थे वास्तव में , आप कोई अनपढ़ नहीं थे अनजान नहीं थे पढ़े लिखे जानकर थे और खूब समझते थे अच्छा क्या है और बुरा किसको कहते हैं। आप की कहानी आपको फिर से याद दिलानी है ताकि आपको पता चले कि आज यहां आपको वास्तव में इंसाफ दिया जाना है आपके अच्छे और बुरे सारे कर्मों का हिसाब देखकर। और इक बात और समझ लो इस अदालत में ऐसा नहीं किया जाता कि अच्छे कर्मों का ईनाम जमा किया और बुरे का क़र्ज़ नाम लिखा और उसके बाद गणित लगाया क्या बचता है खाते में बनिये वाली बही की तरह। यहां अच्छा किया उसके अलग हिसाब और जो बुरा किया उसका अलग हिसाब किया जाता है। आपने जो किया संक्षेप में बताता हूं क्योंकि बाकी आप भी समझ सकते हो। 
                        आप डॉक्टर बन गए और सरकारी हॉस्पिटल में नौकरी मिली आपको , आप कभी समय पर हॉस्पिटल नहीं पहुंचे , आपने हॉस्पिटल जाने से पहले घर पर न केवल अनुचित ढंग से रोगी से पैसे लिए इलाज करने को बल्कि आपने तमाम लोगों से ऑप्रेशन की फीस भी वसूली जब कि आप सरकारी डॉक्टर थे। हैरानी की बात है कि तब भी आप मंदिर जाकर धार्मिक होने का दावा किया करते थे। आपने अपनी ड्यूटी अपने बड़े अधिकारी से मिलकर उस विभाग में लगवाई जिस में पुलिस केस वाले लोग आते और आप रिश्वत लेकर उनकी मर्ज़ी की रिपोर्ट लिखा करते थे। आपको वो सब करना कभी गलत नहीं लगा , रात को आपकी ड्यूटी होती तो आप अपनी जगह नहीं मिलते बल्कि कहीं जाकर सोया करते और आपकी जगह कोई चतुर्थ श्रेणी का कर्मचारी रोगी देख उनके स्वास्थ्य से खिलवाड़ किया करता था। आपने इस तरह काली कमाई कर बहुत धन जमा कर लिया और फिर अपना निजि हॉस्पिटल बना लिया। आपने कभी किसी देश के कानून का आदर नहीं किया , अपना हॉस्पिटल भी आपने हर कायदे कानून की अवेहलना कर बनाया। आपने सड़क और फुटपाथ पर अनधिकृत कब्ज़ा किया अपने सामान को अपनी जगह में नहीं रख कर बाहर रखा। आपने बिना पूरी व्यवस्था किये गंभीर रोगियों के इलाज का दावा किया जबकि आपके पास उपचार का पूरा प्रबंध नहीं था। आपने अप्रशिक्षित लोग रख स्वास्थ्य सेवा के नाम पर रोगियों की जान को खिलौना समझ केवल पैसा बनाने को जो भी किया आप जानते हैं वो कितना गंभीर अपराध था। आपने कितनी बार रोगी को ध्यानपूर्वक देखना तक ज़रूरी नहीं समझा , बिना ज़रूरत उनके टेस्ट कराये बिना ज़रूरत एडमिट किया दवाएं लिखीं अपनी कमाई को , यहां तक कि आपने जानबूझकर घटिया दवाएं बिकवाईं अपने हॉस्पिटल में। आपने क्या क्या नहीं किया , आपके पास को ज़हर खाकर आया तो उसकी जान बचाने की बात से पहले आपने उसके घर वालों से अनुचित रूप से बहुत पैसा लिया ताकि उनकी सूचना पुलिस को नहीं देनी। आप इक अपराधी की तरह आचरण करते रहे और खुद को सभ्य नागरिक मानते रहे। याद करो जब कोई दुर्घटना का शिकार घायल आपके पास लाया गया तब आपने क्या किया। आपने किसी दलाल की तरह उन को बताया कि आपका ऑप्रेशन का खर्च तीस हज़ार आएगा जो आपको नहीं देना आपका जिस वाहन से टकराव हुआ उस से मांग कर मुझे दिलवाना है। मगर जब दूसरा पक्ष सामने आया और उसने बताया कि सब ने देखा गलती खुद इनकी ही थी हम तो मानवता की खातिर इसको हॉस्पिटल लेकर आये  हैं। ये बेशक एफ आई आर लिखवा दे हम साबित कर सकते दुर्घटना खुद इसी की गलती से हुई। और हमारे पर ड्राइविंग लाइसैंस और बीमा दोनों हैं , तब आपने बताया ऑप्रेशन ज़रूरी नहीं था पर जब रोगी को सलाह दे चुके तब करना तो होगा मगर उसकी फीस तीस हज़ार नहीं दस हज़ार ही होगी। आप डॉक्टर होकर ब्लैकमेलर की तरह काम करते रहे हैं। आपने कभी सोचा आपकी गलती से कितने रोगी जान से हाथ धो बैठे , आपने कभी मुफ्त कैंप की आड़ में कभी किसी और ढंग से रोगियों को छला है , कभी किसी को बाहर बड़े हॉस्पिटल में भेज कमीशन खाई तो कभी किसी अपने से छोटे डॉक्टर को या झोला छाप को कमीशन दी। 
             जब विश्व स्वास्थ्य संगठन के बार बार अनुरोध पर देश की सरकार ने कोई नियम कोई कानून बनाना चाहा ताकि रोगियों को स्वास्थ्य सेवा उचित तरीके से मिल सके तब आपको जनहित की बात अपनी मनमानी के खिलाफ लगी क्योंकि आपने असूल और मानवता के नियम को कभी समझा नहीं माना नहीं। हमारे पास कोई सॉफ्टवेयर नहीं जो आपके पल पल का हिसाब लगा झट से बताता। मगर इतना स्पष्ट है आपने जो भी किया खुद अपने पेशे को कलंकित ही किया। भगवान कहलाने की आड़ में आपने हैवानियत तक को शर्मसार किया है। अब आपको बहुत जन्म तक गंभीर रोगों का रोगी बन अपने कर्मों का हिसाब चुकाना होगा। बेशक आपने बहुत रोगियों को स्वास्थ्य सेवा देकर उनकी भलाई भी की मगर उसकी कीमत आपने ज़रूरत से कहीं ज़्यादा वसूली जो खुद धर्म करना ही अधर्म बन गया। आपने लूट की आमदनी से बहुत मज़े किये हैं , अब आपको बीमार भी बनना है और बेहद गरीब भी जिसको ईलाज करवाने को रोज़ मौत की तरह जीना हो। आप को फिर भेजा उसी देश में जायेगा जिस में सरकार अभी भी जनता को स्वास्थ्य सेवा या शिक्षा देना अपना कर्तव्य नहीं समझती। विकास के नाम पर विनाश जारी है आज भी , उसी देश में आपको जीने होगा शोषण का शिकार बनकर और हर सुविधा से वंचित होकर। और ये निर्णय केवल आपके लिए नहीं , न सिर्फ डॉक्टर्स की बात है , और भी तमाम पेशे वालों की गति यही होने वाली है। आपको पहले से मालूम तो था अच्छे बुरे कर्मों का फल इक दिन मिलना ही है।

     

Monday, 5 June 2017

आपके बिना साजन ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

           आपके बिना साजन ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

सोचती थी या समझती थी कह नहीं सकती , मगर मानती ज़रूर थी साजन तुम बिन नहीं जी सकूंगी। जब भी कोई बात होती और मुझे या साजन को अलग होना होता तब यही कहते दोनों क्या करें मज़बूरी है दूर जाना है। दिल नहीं चाहता तब भी जाना ही होगा। अपने अपने मतलब की खातिर समझते थे यही प्यार है इक दूजे का साथ होना। उम्र बिता दी और सच कहूं इक बेगुनाह मुजरिम की तरह रही किसी ज़ालिम की कैद में। हर दिन एहसास करवाया जाता मुझ पर रोज़ उपकार किया जाता है , जबकि वास्तव में किसी की गुलामी खुद कबूल की थी जाने किस डर से। चार दिन पहले इक महिला ने लिखा अपनी फेसबुक पर कि महिला और परिंदे पिंजरे में रहते खुद को सुरक्षित समझते। मुझे हैरानी हुई पढ़कर भला कोई पंछी पिंजरे में खुश रह सकता है। कोई महिला दिल से किसी की गुलाम बन खुश हो जी सकती है। शायद उस को अपने पति के नहीं रहने का दुःख होगा , मगर मैंने कई महिलाओं को देखा उनको जीना आया ही तब जब किसी कारण उनके जीवन साथी नहीं रहे या अलग हो गए। घुट घुट कर जीने से अच्छा है आज़ाद हो खुद ज़िंदगी से लड़ना। अभी तक आप इसे किसी दुखियारी की व्यथा समझे तो आप नहीं समझे , ये किसी अबला नारी की बात नहीं है। आज देश भर में डॉक्टर्स हड़ताल पर हैं , आज मुझे समझना मैं रोगी होती तो मुझे इस से क्या होता , क्या मैं इलाज नहीं मिलने से मरती या इलाज ही से मौत आती। क्योंकि मौत आनी है आएगी इक दिन जान जानी है जाएगी इक दिन , ऐसी बातों से क्या घबराना। 
         टीवी पर देखना आपको हाहाकार होने की खबरें देखने को मिलेंगी दिन भर। शाम तक अख़बार वाले बता देंगे कितने लोग मर गए आज बिना इलाज मिले। क्या इलाज होता तो नहीं मरते किसे खबर , अभी तक तो कोई ज़िंदा बचा नहीं दुनिया भर में। धनवान लोग कभी नहीं मरते अगर पैसे और इलाज की सुविधा से मौत से बचा जा सकता। आपको बता देना ज़रूरी है ये बात मैंने गांव के इक बनिये से सुनी थी जो किसी क़र्ज़ मांगने वाले को समझा रहा था अगर तुम सोचते हो पैसे मिल गए तो किसी अपने को बचा लोगे तो बताओ ये जो चौधरी हैं गांव के अपने दादा जी को मरने देते। लाख टके की बात थी मैंने गांठ बांध ली , जीना मरना किसी के बस में नहीं है। अब अगर किस्मत में लिखा है डॉक्टर के हाथ से मरना तो इलाज को पैसे भी मिल ही जायेंगे अन्यथा मौत तो कीमत मांगती नहीं। लेकिन आज इक बात का अध्यन किया जा सकता है , वो इसका कि आंकड़े देख तय किया जाये आज कितने लोग मौत की गोद में समाए और कितने पिछले दिन जब डॉक्टर्स काम पर थे। सोचो कहीं ये सच सामने आया कि आज पहले से कम की मौत हुई तब क्या होगा , डॉक्टर तक हैरान हो सकते हैं। जिनको बचना है ऊपर वाला बचा ही लेता है और जिनकी मौत का इलज़ाम किसी रोग को देना उनको भेज देता हॉस्पिटल। साजन आपने बिना किसी का कुछ नहीं होगा मगर अगर आपके पास रोगी नहीं आएं उनकी भी हड़ताल हो जाये तब आपका जीना कठिन नहीं असंभव हो जायेगा। ये भला क्या बात हुई , इक कहावत है गिरी थी गधे के ऊपर से और लड़ पड़ी थी कुम्हार के साथ। आपको शिकायत सरकार से कि आपको किसी नियम कानून में अपना कारोबार करने को कानून बनाना चाहती है और आप सरकार का कुछ नहीं कर सकते तो रोगियों की जान आफत को लाना चाहते। आगे कुछ कहना  नहीं उचित आप खुद समझ लो , अपने पांव को काहे कुल्हाड़ी पे मारते हैं। रोगी नहीं अपने जीने की सोचो ज़रा। 
        अंत में सभी को इक काम की बात कहनी है। मौत से डरने की ज़रूरत नहीं है , मौत बड़ी खूबसूरत होती है , ज़िंदगी कभी खूबसूरत नहीं होती। जीना है तो मौत का डर दिल से निकाल फिर देखो क्या है जीना। 
                मौत तो दरअसल एक सौगात है ,
                हर किसी ने उसे हादिसा कह दिया।

Sunday, 4 June 2017

जीवन की कविताएं डॉ लोक सेतिया

                      जीवन की कविताएं 

                              डॉ लोक सेतिया

    1 जन्म 

मिट्टी के ढेर तले 
दफ़्न होती सांसें 
पल-पल  इक मां
कड़ी मेहनत से मिट्टी को 
हटाती रहती है निरंतर 
जन्म देती है इस तरह
मासूम नन्हीं सी जान को। 

2 संघर्ष 

ये कौन है जो समझता है कि 
मैंने दिया है जीवन इसे 
पिता हूं पालक हूं मैं
इसको जीना है मेरे लिए
उस तरह जैसे मैं चाहूं
कब खत्म होगा यह
रिश्तों का कड़ा संघर्ष । 

3  ज़िंदगी 

अग्रिम भुगतान देने वाली
बाद में कीमत चुकाने वाली
दो तरह की है ज़िंदगी।
सांसों को चलाने के लिए
चुन लें जो भी सस्ती लगे
बार बार खरीदें वैधता
चाहे हर मास भुगतान करें
प्रीपेड पोस्टपेड फोन की तरह।

4   अंजाम 

सौ बरस जीने का अरमान 
हर दिन मरने का सामान 
चाहते जाना उस दिशा 
इस तरफ आओ का फरमान 
खो रहे सब कुछ मगर 
पाया है बस यही अभिमान 
भरा खज़ाना खाली दोनों हाथ  
फैला हुआ है इक रेगिस्तान । 

5  दुनिया 

बेरहम सी बला , नहीं करती कभी भला
बेचैन करती रहती , थमता नहीं सिलसिला
स्वर्ग का जगा अरमान , बेचती मौत का सामान
नर्क की दे दे सज़ा ,खूब लेती है मज़ा
मिले उन्हीं से दर्द हैं , कहते जो हमदर्द हैं
कोई ठौर रहने को नहीं , जीना यहीं मरना यहीं।

6 क्षणिका 

कहानी नहीं ग़ज़ल नहीं 
इक घटना की है लघुकथा 
निर्धारित हैं दो पन्ने डायरी के 
पहला भी  अंतिम भी  लिखा हुआ
बीच में लिखनी सब  बात अपनी
उपन्यास आपको लगती है 
ज़िंदगी है वास्तव में क्षणिका ।

7  शराब कर लेते 

नीयत थोड़ी खराब कर लेते 
सरकती रुख से नकाब कर लेते 
खत में गुलाब भेज देते 
कुछ बराबर हिसाब कर लेते
देख कर होश खो जाते 
नज़रों को वो शराब कर लेते।
 

 

Saturday, 3 June 2017

हमारी मांगे पूरी करो ( हास - परिहास ) डॉ लोक सेतिया ( कविता )

            हमारी मांगे पूरी करो ( हास - परिहास )

                        डॉ लोक सेतिया ( कविता ) 

सब एक साथ नारे लगाते ,
हाथों में बैनर उठाये ,
सरकार के विरोध में ,
चल रहे थे आला अधिकारी ,
को मिल कर अपना विरोध ,
जताने को देने को इक विरोध पत्र। 
अधिकारी से पहले से ही समय लेकर ,
आपस में खुल कर चर्चा की थी ,
नहीं बनाने देना ऐसा नया कोई कानून ,
जो अंकुश लगाए हमारे काम ,
जब जैसे मर्ज़ी हमेशा की तरह ,
निर्बाध रूप से करने पर रोक लगाए। 
देख कर उनको लगता था जैसे ,
आंदोलन करने नहीं कोई जंग लड़ने को ,
सीना ताने चल रहे हैं सब के सब ,
आर-पार की लड़ाई लड़ने को। 
लगता था आज उस अधिकारी की ,
खैर नहीं जिसको मिलने जा रहे ,
संगठन बनाकर सभी एक साथ ,
मगर जब सचिवालय पहुंचे तब ,
आला अधिकारी के सचिव ने ,
दफ्तर से बाहर आकर बताया था ,
साहब कब से आप का इंतज़ार कर रहे ,
आपको हमेशा की तरह समर्थन देने को ,
आप में पांच सात लोग भीतर जाकर ,
विरोध पत्र दे सकते हैं। 
संगठन के ओहदेदार चले गए भीतर ,
और बाकी सब बाहर बैठ जलपान करने लगे ,
बाहर जो नारे लगा रहे थे अंदर जाकर ,
दोनों हाथ जोड़ कर आदर सहित ,
प्रणाम की मुद्रा में खड़े थे अधिकारी के सामने ,
स्वागत है आप सभी बंधुओं का आज यहां ,
बताएं अब क्या परेशानी है आपको ,
आपकी सहायता करना हमारे लिए ,
सरकार के लिए भी ख़ुशी की बात होगी। 
विरोध पत्र दिया गया पढ़ लिया साहब ने ,
पूछा कहें आपको किस बात की चिंता है ,
संगठन के प्रमुख ने समझाया सरकार ,
ठीक से पढ़ समझ लो तब करो विचार ,
हम सभ्य नागरिकों पर इतना अत्याचार ,
आपके नियम कानून तो बंद कर देंगे ,
हमारा निर्भय होकर करते रहना कारोबार। 
हंस दिए अधिकारी सुन उनकी बात को ,
बोलो आप लोग किस दुनिया में रहते यार ,
अभी तलक आपने किस किस नियम का नहीं तोडा ,
सब देख कर भी आंखें बंद रखती रही है सरकार ,
कब किया किसी नियम का सच में पालन आपने ,
अनधिकृत ढंग से घर दुकान भवन निर्माण क्या ,
नहीं किया हमेशा सभी आपने जब मर्ज़ी जैसे ,
हद से हद कभी कभी कहने को नोटिस मिला ,
शायद मज़बूरी में आपने कोई कर दिया जुर्माना भरा। 
आप को सब पता है धनवान हर कानून को रखता है ,
अपनी पतलून की जेब में खरीद कर निडर होकर ,
आपको पहले कभी अनधिकृत काम करते नहीं लगा डर ,
अब क्यों बेकार शोर मचा खुद को करते बेनकाब ,
जो नहीं जानते थे आपके किये कर्म कितने गलत ,
आपने खुद मचाया शोर हो गई सभी को खबर। 
अब अगर नहीं बनाया गया जनता की भलाई को ,
ज़रूरी ऐसा कानून तब होगी हाहाकार , बिक गई सरकार। 
आप बताओ कितने कानून बनाये हैं हर तरह के ,
दहेज बंद हुआ क्या , क्या रुकी बाल मज़दूरी ,
स्वच्छ भारत दिखा कहीं , हुई बंद रिश्वतखोरी ,
अपने देश में कानून बनते ही नहीं पालन करने को ,
हमने प्रदूषण वाहन के सभी नियम बनाये हैं ,
तोड़ने को जुर्माना भरने को छूट जाने को। 
बन जाने दो ये नया कानून भी सरकार का ,
सब बाकी नियमों की तरह साबित होगा बेकार सा। 
सब संतुष्ट होकर धन्यवाद देते निकले बाहर ,
आकर बाहरी जमा सदस्यों को सब समझाया ,
चले एक दिन मौज मस्ती की साथ बंद कर धंधे को ,
अब मत सोचो हमने क्या खोया और क्या पाया ,
आप जिस को समझ रहे कोई भूत है नज़र आता ,
असल में वो नहीं था कोई , था हमारा साया , 
गलती हमारी सूरत की नहीं कोई भी चाहे शक्ल जो ,
अपराध उस का जिस ने आईना लाकर हमें दिखाया।

मैं चाहे जो करूं ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

          मैं चाहे जो करूं ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

अभी तक किसी ने नहीं पूछा आप क्या क्या करते हैं , क्या वो सब जो किया अभी तक सही था। बस किसी भी तरह पैसा बनाया आपने बिना विचारे कि ये किसी अन्य के साथ कितना अनुचित है। आप ने कभी समझना ही नहीं चाहा कि आपके कई काम आपराधिक तरह के हैं। किसी नैतिक मूल्य का आपने पास नहीं रखा कभी , आपने इक पवित्र माने जाने वाले पेशे को इस कदर बदनाम कर दिया कि लोगों को हर मसीहा जैसे इक कातिल हो प्रतीत होने लगा। अपने व्यवसाय में आपने स्वार्थ में अंधे होकर हर सामाजिक कर्तव्य को अनदेखा किया , नियम कानून का पालन करना तो दूर की बात आपने उनको भी अपने हित साधने को दुरूपयोग किया। आपने डर दिखा कर , षड्यंत्र तक कर आपराधिक तत्वों का पक्ष लेकर बिचौलिया बन धन अर्जित किया। जब कभी आपके किसी हमपेशे व्यक्ति पर अनुचित काम करते हुए कोई परेशानी पेश आई आप सब संगठित हो गए ताकि जब आप भी अनुचित करते पाए जाएं तब बाकी सदस्य आपका भी बचाव करें। आपने किसी नियम किसी कानून का पालन नहीं किया अपना व्यवसाय करते हुए। अनधिकृत रूप से सब करना आपको अपना अधिकार लगने लगा और आप सब नियम जानबूझकर तोड़ते रहे। आपने जो करना था उस के विपरीत कार्य किये हैं सालों साल तक और हर गलत ढंग से काली कमाई जमा कर आपने मान लिया कि धनवान होने से कोई आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। आप अच्छी तरह जानते हैं आप सभी जो जो दावे करते हैं अपने पास आने वालों को उचित सेवा देने के वो रत्ती भर भी सच हैं नहीं। आपने मान लिया था आपके कृत्यों पर कभी कोई रोक नहीं लग सकती , हर बार आपके संगठन ने सरकार को अपने महत्व और अनिवार्यता का दबाव बनाकर अथवा मिलकर बहुत बड़ी राशि चंदे की आड़ में घूस दे कर भी आपके पर कोई नियम लागू करने नहीं दिया। काठ की हांडी जितनी आपने लगातार चढ़ाई उसकी दूसरी कोई मिसाल नहीं मिलती।
            अचानक सरकार को विवश होकर सब बाकी व्यवसाय उद्योगों और कारोबारों की तरह आपके पेशे के लिए भी जनता की भलाई और लूट के व्यापार पर प्रतिबंध की खातिर कठोर नियम बनाने की ज़रूरत लगी तो आपको लगा ऐसा करना आप पर अन्याय होगा। आपको अपने स्वार्थ जनहित ही नहीं मानवीय मूल्यों से भी अधिक महत्वपूर्ण लगने लगे। और आपको लगता है सही ढंग से ईमानदारी से व्यवसाय करना आपके लिए संभव ही नहीं है। अगर आपकी तरह सभी को अपनी मर्ज़ी और सहूलियत से जो मर्ज़ी करने दिया जाये तब क्या होगा ये कभी विचार किया है। खेद की बात है हम सब से सभ्य और उच्च शिक्षित लोग किसी कानून का पालन नहीं करना चाहते और तब भी खुद को देश के अच्छे नागरिक कहते हैं। देश की खातिर हम करते क्या हैं , अपनी आय पर आयकर भी सही कभी नहीं देते। नेताओं के कारनामों पर आग बबूला होते हैं और अपने नियम कानून तोड़ने को अपनी विवशता कहते हैं।
                     हम कितने ईमानदार हैं और देश के प्रति कैसी निष्ठा रखते हैं इस पर हमारा विवेक कभी झकझोरता नहीं है हमको। हम जब टीवी पर देखते हैं कोई दृश्य तब हमारी संवेदना पल भर को जगती लगती है मगर दो मिंट बाद खुद उसी तरह का अनुचित कर्म हम बहुत आराम से कर रहे होते हैं। देशभक्ति हमारे लिए कोई भावना नहीं रही केवल इक दिखावा मात्र है। पाप पुण्य की हमने अपनी परिभाषाएं बना ली हैं अपनी सुविधा से। अपने सभी अपकर्मों को हमने सद्कर्म घोषित कर दिया है , अब कोई आकर साबित कर दे कि अभी तक आपने जो जो किया वो कितना अनुचित था ये नहीं स्वीकार करना चाहते। अर्थात हम चाहते हैं जो जो कोई अनुचित करता आया उसका अधिकार बन जाता है , और अपने गलत करने के अधिकार को हासिल करने को आप एकमत हैं। बेईमानी को खतरा है क्योंकि ईमानदार होना किसी को भाता नहीं इसलिए बेईमानी पर अंकुश नहीं लगाया जाना चाहिए। देश में कानून सख्ती से लागू होने ज़रूरी हैं बस हम पर कोई नियम कानून लागू नहीं होने देना है। हम सब के जैसे नहीं हैं , बहुत ऊपर हैं।

Thursday, 1 June 2017

भिक्षा सरचार्ज का प्रावधान ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

भिक्षा सरचार्ज का प्रावधान ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

                       इतना तो सभी पहले से ही जानते हैं कि देश को भ्रष्टाचार से निजात दिलाना ज़रूरी है। सामने भाषण में खुद को सेवक बताने वाले सब नेता और अधिकारी ऑफ द रिकॉर्ड ही सही मान लेते हैं कि हम सब जो कर रहे वह और जो भी हो देशभक्ति कदापि नहीं है। मगर उनकी मज़बूरी है देश की जनता के धन को लूटना और अपने घर भरना साथ अपने ख़ास लोगों को कोई ओहदा कोई साधन उपलब्ध कराना ताकि सरकारी गोदाम में कोई छेद उनको भी मिले पेट भरने को। आज तक हर सत्ताधारी नेता और हर अधिकारी यही कहता है वही इस कोड़ को मिटा सकता है , मगर वक़्त आने पर बेबस हो जाता है। आदत है कि जाती ही नहीं , हर शराबी की समस्या है छूटती ही नहीं मुंह को लगी हुई। जानवर तक जब आदमी का लहू चख लेते हैं तो उसका स्वाद उनको आदमखोर बना देता है। राजनीति आदमखोर बन चुकी है , सत्ता को गरीबों का लहू मुंह को लगा हुआ है , अब रहा नहीं जाता। आप चिंता नहीं करें कभी न कभी हर मर्ज़ की दवा मिल जाती है। मेरे पास इक नुस्खा है जो लिख कर देश की सरकार को भेजा है , सुना है ये नया प्रधानमंत्री जो अब उतना नया भी नहीं है , नई नई योजना रोज़ लागू करता है। देश को घोटालों और दलाली रिश्वतखोरी के मुक्त करवाने की फूलप्रूफ योजना बना भेज दी है , मुझे उस के लागू होने की पूरी उम्मीद है। संभावना को तलाश किया जाना ही नया कुछ करना होता है। ख़ास बात ये भी है इस में जनता तो खुश हो ही जाएगी साथ में उनका भी कल्याण होगा जो अपनी उचित आमदनी से गुज़र बसर कर पाने में कठिनाई महसूस करते हैं। 
            बस इक भिक्षा सरचार्ज का प्रावधान किया जाना होगा , रिश्वत की पुरानी परंपरा है। सैंकड़ों साल का इतिहास है , कभी इसे ईनाम नाम दिया जाता था और जनता अपना काम करा सरकारी कर्मचारी को आना दो आना बक्शीश दिया करते थे। कहते थे ये लो इस से मिठाई खा लेना , मिठाई शब्द सुनते ही मुंह में पानी आ जाता है और इसका ध्यान कहां रहता है कि आपका कोई स्वाभिमान है , वेतन मिलता है अच्छा फिर भिखारी क्यों बनें। शुरू में एक प्याली चाय और बीड़ी से ईमान खरीद लेते थे लोग , और पाने वाला देने वाले को सलाम किया करता था , बदलते बदलते रिश्वत का सवरूप बदला और मंत्री अधिकारी और सरकारी बाबू भीख मांग कर नहीं अपना अधिकार समझ छीन के लेने लगे। अपने धर्म ग्रंथों में बताया गया है कि जिन के पास सब कुछ हो तब भी और अधिक हासिल करने की लालसा या हवस रहती है वही सब से दरिद्र होते हैं। आप इनको भिखारी ही समझना जिनकी आमदनी है तब भी बिना रिश्वत गुज़र बसर नहीं होती। देश के बड़े बड़े अदाकार खिलाड़ी नामी लोग साधु संत भगवा वेशधारी भी दरिद्र ही हैं , सेठ साहूकार उद्योगपति तो भूखे होते ही हैं दौलत के। ऐसे सभी भिखारियों की भूख कभी खत्म नहीं होती। जब मुफ्त की हराम की आसान ढंग से कमाई की आदत पड़ गई तो उनका खुद पर इख़्तियार बाकी नहीं रहता। 
              देश में कानून बदलते रहते हैं , इक और सही। भिक्षा सरचार्ज का प्रावधान किया जाना चाहिए। नेताओं और अधिकारीयों को अधिकृत सरकारी भिखारी घोषित कर बड़ी आसानी से देश को भर्ष्टाचार मुक्त किया जा सकता है। हर मंत्रालय के बाहर हर अधिकारी के दफ्तर के दरवाज़े के पास भीख के कटोरे की तरह इक दान पेटी रखी जानी चाहिए। जनता को अपनी स्वेच्छा से देश हित में भीख देनी चाहिए , अगर ऐसा नहीं किया तो आपको देश विरोधी समझा जायेगा। लोग भीख यूं भी बढ़ चढ़ कर देते हैं। घूसखोरी किसी आपदा से कम नहीं है और आपदाग्रस्त लोगों की सहायता सभी करना चाहते हैं। सत्ता में अकाल रहता है हमेशा ज़मीर नाम की मौत होने से। नेता अफ्सर घबराएं नहीं उनको कमी नहीं होगी , अपने देश में रिवायत है खेत से इक गन्ना तोड़ने नहीं देते मगर गुड़ की भेली खुद ही दे देते हैं। दान देने ईनाम देने में अपनी बराबरी कोई नहीं कर सकता। यहां तक कि सरकारें भी जनता की समस्यायों में धन की कमी की बात कहने के बावजूद , दानवीर कहलाने को कितने आडंबर करती हैं। मगर अगर फिर भी आपको लगता है लोग दानपेटी में भिक्षा नहीं डालेंगे तब आप पेट्रोल अदि पर जैसे कई कर लगे हैं उसी तरह हर जगह भिक्षा सरचार्ज लगा सकती है। और इस से आया धन सभी अमला बांट सकता है , माना ये रिश्वत को कानूनी रूप देना होगा फिर भी विश्व में भ्रष्ट देशों में अपने स्थान की बदनामी तो नहीं होगी। भिक्षा देना तो पुण्य का काम है , सब मानते हैं।