Sunday, 5 January 2014

कब और कैसे बदलेगी तस्वीर देश की ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

हक़ नहीं खैरात देने लगे , इक नई सौगात देने लगे। मेरी ये ग़ज़ल तब भी सच थी जब खाद्य सुरक्षा कानून लागू किया गया था और आज भी सच है। बहुत खेद की बात है कि हर सत्ताधारी खुद को दाता और जनता को भिखारी समझता है। जनता को उसके अधिकार कब मिलेंगे और कैसे असली सवाल यही है। बहुत सारी बातें हैं चर्चा को , बारी बारी से कुछ खास पर आज चिंतन किया जाये। सब से पहले उसकी बात जो सब बातों का आधार है , लोकतंत्र के बारे में सोचा जाये। शायद ही कभी ऐसा हुआ हो कि कोई सरकार जनता के पचास प्रतिशत से अधिक वोटों को हासिल कर बनी हो , इसके बावजूद नेता दावे करते हैं कि उनको जनादेश मिला है। वास्तव में कभी किसी भी दल ने ये ज़रूरी ही नहीं समझा कि सच में देश की जनता का बहुमत उसको मिले। सभी का ध्येय निर्वाचित सदस्यों का बहुमत हासिल करना रहा है। और उसको जुटाने के लिये हर किसी से समझौता किया जाता है , विचारधारा का कोई सवाल ही नहीं। मतलब सब की विचारधारा एक समान है कि जैसे भी हो कुर्सी पर आसीन होना। जनता जब एक दल को हराती है और दूसरे को चुनती है तब उसको केवल नाम और चेहरे नहीं बदलने होते , व्यवस्था में परिवर्तन करना होता है। मगर बार बार धोखा मिलता है देश की जनता को , लोग , नाम , दल , चेहरे ही बदलते हैं बाकी कुछ भी नहीं बदलता है। एक बात हैरानी की है कि हम लोग धर्म और राजनीति दोनों के बारे सोचते हैं सब जानते हैं जबकि जानते बहुत ही कम हैं। हम जिन ग्रंथों को पूजते हैं उनमें जो लिखा है उस पर शायद ही विचार करते हैं। अगर करते होते तो इतने धर्मों , मंदिर , मस्जिद , गिरिजाघर और गुरुद्वारों के होने और इतने धार्मिक आयोजन होने के बाद इतना पाप इतना अधर्म हर तरफ दिखाई नहीं देता। कुछ ऐसा ही हम लोकतंत्र को और जिस पर हमारा लोकतंत्र टिका है उस संविधान को ही जानते हैं। क्या आप जानते हैं कि संविधान में किसी दलीय लोकतंत्र की कोई बात नहीं कही गई है। केवल जनता द्वारा अपने प्रतिनिधि चुनने की बात है , और ये भी कि जनता के निर्वाचित प्रतिनिधि चुनेंगे देश की सरकार चलाने को पधानमंत्री अथवा राज्यों का मुख्यमंत्री। आज क्या हो रहा है , कब से होता आया है कि कोई दल पहले से तय करता है कि कौन अगली सरकार का मुखिया होगा। क्या ये अधिकार उनका नहीं होना चाहिये जिनको जनता अपना प्रतिनिधि चुनेगी। एक और बेहद महत्वपूर्ण बात है कि हम सब बातें करते हैं आज़ादी की जबकि हमारे विधायक और सांसद तक आज़ाद नहीं हैं , उनको अपने दल की हर बात माननी होती है। क्या राजनीतिक दल बड़े हैं , हमारी निजि आज़ादी उनके हितों से छोटी है। दिल्ली में एक नई सरकार बनी है अभी अभी , बहुत बदलाव की बातें की इन लोगों ने।  मगर चार दिन भी नहीं टिक पाये अपनी बातों पर। ये भी नहीं सोचा कि उनको कोई पूर्ण बहुमत नहीं मिला जिसको सही मायने में जनादेश समझा जाता और अभी से इतराने लगे हैं। अब वे भी अन्य दलों की तरह सोचते हैं कि यहां सत्ता मिल गई अब देश की सत्ता को हासिल करना है। काश कोई सोचता कि केवल सत्ता ही हासिल नहीं करनी बल्कि व्यवस्था को बदलना है जिससे तंग आकर जनता ने पिछली सरकार को हराया है। सिर्फ बिजली पानी में छूट देने से कुछ नहीं बदल सकता , साफ कहें तो ये एक छल है क्योंकि जो सबसिडी सरकार किसी भी रूप में देती है वो भार जनता पर ही पड़ता है घूम फिर कर। इनसे महत्वपूर्ण काम हैं , अस्प्तालों में सही इलाज , स्कूलों में सही शिक्षा सभी को एक समान मिले , कानून व्यवस्था को सही किया जाये , अन्याय और शोषण बंद हो। सब से पहला काम होना चाहिये कि कुछ मुट्ठी भर लोग ही सब फैसले करने के हकदार नहीं हों। विधानसभा हो या संसद या फिर कोई संगठन हो चाहे मंत्री परिषद , हर जगह सभी की राय ली जानी चाहिये। लोकतंत्र के नाम पर अभी तक कुछ लोग , कुछ परिवार ही शासन करते रहे हैं , अब इसका अंत होना ही चाहिये।जिस देश की दो तिहाई आबादी गरीबी की रेखा से नीचे नर्क से बदतर जीवन जीती हो उसके नेता अगर विलासिता पूर्वक जीवन जनता के पैसे से जियें तो ये किसी जघन्य अपराध से कम नहीं। कहने को लोकतंत्र में जनता देश की मालिक है और प्रशासन व सांसद , विधायक उसके सेवक।  मगर क्या ये उचित है कि जो मालिक हो वो भूखा रहे और जो उसके सेवक हों वो ऐश से रहें। बहुत बातें की जाती हैं सब को बराबर सब कुछ मिलने की , मगर कैसे हो ऐसा ये कोई नहीं बताता। देश का धन , संपति , हर सुविधा का एक बहुत बड़ा हिस्सा कुछ एक लोगों के कब्ज़े में है , अगर गरीबों का कल्याण करना है तो अमीरों से लेना ही होगा जो उनके पास ज़रूरत से बहुत अधिक है। अभी तक सरकारें इसका उल्टा ही करती आई हैं। आम जनता को जब भी कुछ देने की बात होती है तो ढोल बजाकर प्रचार किया जाता है , लेकिन उससे कहीं अधिक बड़े बड़े उद्योग घरानों को चुपचाप दे दिया जाता है। आपने देखा होगा वित्तमंत्री प्रधानमंत्री को इन सभी से मिलते , इनकी बात सुनते। कभी देखा है गरीबों से मिलते उसकी बात सुनते , नहीं उसको केवल भाषण सुनाये जाते हैं या अपने दरबार में बुलाया जाता है हाथ जोड़ भीख मांगने को। संविधान की रक्षा की शपथ लेने वालों ने आज तक उसकी भावना का अनादर ही किया है। आज तक किसी अदालत ने ये सवाल नहीं किया कि संविधान में विधायिका को खुद कोई धन खर्च करने का अधिकार ही नहीं दिया गया है उसे योजना बनाने और कार्यपालिका से लागू करवाना चाहिये और उसकी निगरानी करनी चाहिये। ये जो सांसदों और विधायकों को कल्याण राशि मिलने का प्रावधान किया गया है और जिसमें भ्रष्टाचार बहुत आम है वो संविधान की अवधारणा के विपरीत है। जनता के धन को नेताओं ने चोरी का माल समझ कर हमेशा बेदर्दी से बर्बाद किया है। चुनाव जीतते ही इनको कोठी कार ही नहीं जाने कितना ताम झाम चाहिये। हर दिन करोड़ों रुपये इनकी रैलियों पर खर्च होते हैं , जो किसी इमानदार की जेब से नहीं आते , ये सारा पैसा आता है उन लोगों से चंदा या उगाही करके जिनको अनुचित लाभ मिलते हैं। कभी सोचा है कि जब कोई मुख्यमंत्री बनता है तब उसका परिवार , बेटा बेटी , पत्नी दामाद , सब के सब इस तरह आचरण करते हैं जैसे उनकी रियासत हो। ये मीडिया वाले भी ऐसे में उनके बच्चों तक का साक्षात्कार लेने लगते हैं। इस देश में कितने लोग बेघर हैं , मगर शायद ही कोई नेता हो जिसके पास अपना घर नहीं हो। फिर भी विधायक सांसद , मंत्री बनते ही इनको सरकारी आवास चाहिये। चलो माना इनको जहां इनका अपना घर है वहां रह कर काम करने में असुविधा हो तो दूसरी जगह घर मिल जाये , लेकिन तब क्या इनका पहले का घर तब तक सरकारी उपयोग में नहीं रहना चाहिये जब तक इनको मुफ्त आवास सरकार से मिला रहे। वास्तव में किसी भी अफ्सर को जब सरकारी घर मिले तब उसके खुद के घर को जो जिस किसी भी नगर में हो सरकार अथवा जनता के काम के लिये उपयोग किया जाये तो इनकी खुद की आवास समस्या हल हो सकती है। बाकी सब बातों से पहले प्रमुख बात ये है कि क्या कभी इन तथाकथित जनसेवकों को महसूस होगा कि इनसे पहले सभी कुछ उस जनता को मिले जिसकी सेवा करने का ये दम भरते हैं। चलो आज इतना ही , बाकी फिर कभी। 

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