Thursday, 30 January 2014

नाखुदा खुद को बताने वाले ( तरकश ) डा लोक सेतिया

एक जाने माने शायर का शेर याद आ रहा है। कौम के ग़म में डिनर खाते हैं हुक्काम के साथ , रंज लीडर को बहुत है मगर आराम के साथ। नेता चाहे किसी भी दल का हो होता नेता ही है , सब का मकसद वही है हर मुद्दे को उपयोग करना अपने सत्ता पाने के लिये। हर बात में वोटों का गणित ही इनकी प्राथमिकता होता है , किसी की भावना से इनमें से किसी को भी कोई सरोकार नहीं होता है। किसी ने एक बयान क्या दिया बाक़ी लोगों को भी अवसर मिल गया अपनी अपनी राजनीति करने का। सब फिर से चले आये दंगों के ज़ख्मों को फिर से कुरेदने , ये क्या दवा लगायेंगे , इनको मालूम ही नहीं किसी का दर्द क्या होता है। इनकी संवेदना झूठी है , दिखावे की है , चार दिन की है। बस वोट पाने तक , उसके बाद सब भूल जायेंगे। कितनी बार कितने लोगों ने यही किया है इंसाफ दिलाने का वादा , मगर कभी नहीं मिला इंसाफ किसी को। किस किस की बात की जाये , क्यों सब के ज़ख्मों को फिर से हरा करने का काम करें। और शिकायत भी जाकर करें तो किस से , पता नहीं इनमें ही कौन कौन कब कब ऐसा ही करता रहा है। मुझे अपनी ही इक ग़ज़ल का एक शेर याद आता है। "तूं कहीं मेरा ही क़ातिल तो नहीं , मेरी अर्थी को उठाने वाले"। ग़ज़ल का मतला भी ऐसा ही है। "हमको ले डूबे ज़माने वाले , नाखुदा खुद को बताने वाले"।
                                            जब बात हो रही थी दिल्ली और गुजरात और उत्तरप्रदेश महाराष्ट्र के दंगों की , तब याद आया हर शहर में चली थी तब वही गर्म हवा। हमारे शहर में भी थे कुछ सभ्य कहलाये जाने वाले लोग जो बहती गंगा में हाथ धो रहे थे। तब उस दल में शामिल थे जो दंगे करवा रहा था और आज इस दल में शामिल हैं जो तब के अपराधियों को सज़ा दिलाने की बात कर रहा है। यहां फिर किसी शायर का शेर याद आ रहा है। "मेरा कातिल ही मेरा मुनसिब है , क्या मेरे हक में फैसला देगा"। ये जो लोग आज आंसू बहा रहे हैं क्या कल तक नहीं जानते थे कि जिनके साथ उनका हर दिन का मेल जोल है , मधुर संबंध हैं वो वही हैं जो दंगइयों की भीड़ को लेकर चले थे किसी को सबक सिखाने। दो दिन बाद जब यही भरी सभा में भाईचारे की बात करेंगे तब मुझे फिर अपना इक शेर याद आयेगा। "भाईचारे का मिला ईनाम उनको , बीज नफरत के जो रोपित कर रहे थे। बहस भ्रष्टाचार पर वो कर रहे थे , जो दयानतदार थे वो डर रहे थे"।
                                                         यादों की खिड़की फिर खुल गई है। कुछ साल पहले की बात है इश्तिहार पढ़ा कि कुछ लोग जय प्रकाश नारायण जी की संपूर्ण क्रांति पर चर्चा करेंगे। सब को बुलाया गया था , मैं भी कभी रहा था शामिल उस अंदोलन में इसलिये वहां जाना ज़रूरी लगा था। मगर वहां जो देखा उसकी कल्पना नहीं की थी , जश्न का सा माहौल था , अच्छा खाने पीने का प्रबंध , सब हाथ मिला रहे थे , गप शप कर रहे थे। सभा शुरू हुई , दो लोग मंच पर बैठे थे , एक महिला गीत सुना रही थी पुरानी फिल्मों के मनोरंजन के लिये। फिर बात होने लगी थी कई प्रकार की समितियां बनाने की , चंदा जमा करने की। जिस बात का शोर था इश्तिहार में उस विषय पर किसी ने एक भी शब्द नहीं बोला था। मुझसे नहीं रहा गया , मैं खड़ा हुआ इक पर्ची पर लिखा मुझे सवाल करना है और जाकर पकड़ा आया उनको जो मंच पर विराजमान थे। वो तब मुझे नहीं जानते थे और उन्होंने वो पर्ची दे दी उनको जो संचालन कर रहे थे सभा का। मुझे कहा गया सभा के बाद रुक कर मिल सकता हूं अगर उन नेता जी से मिलना चाहता हूं। मैंने तब अपनी जगह खड़े होकर यही पूछा था कि आपने जिस विषय पर चर्चा का इश्तिहार बांटा था , उस पर तो कोई बात ही नहीं हुई। तब इस आयोजन का क्या मतलब रह जाता है। ये सुन कर वो मुख्य अतिथि भी हैरान हो कर बोले कि उनको भी इस बात का पता नहीं था , वो तो यहां आये हैं अपने दल की शाखायें बनाने , सदस्य बनाने और समितियों का गठन करने।
                        बार बार यही होता है , लोग किसी विषय को उपयोग कर अपना राजनीतिक मकसद हल करते हैं और मतलब पूरा होने के उसपर फिर कोई बात ही नहीं करते। अपने साथ भीड़ जमा करने के लिये , वोट बटोरने के लिये , नेता बन जनता की भावनाओं को उपयोग किया जाता है।