Tuesday, 6 August 2013

बोलने जब लगे पामाल लोग ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

बोलने जब लगे पामाल लोग ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

बोलने जब लगे पामाल लोग
कुछ नहीं कह सके वाचाल लोग।

हम भला किस तरह करते यकीन
खा रहे मुफ़्त रोटी दाल लोग।

खा रहे ठोकरें हम बार बार
खेलते आप सब फुटबाल लोग।

देख नेता हुए हैरान आज
क्यों समझने लगे हर चाल लोग।

ज़ुल्म सह भर रहे चुप चाप आह
और करते भी क्या बदहाल लोग।

मछलियों को लुभाने लग गया है
बुन रहे इस तरह कुछ जाल लोग।

कुछ हैं बाहर मगर भीतर हैं और
रूह "तनहा" नहीं बस खाल लोग।