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फ़रवरी 19, 2026

POST : 2058 असली की हार नकली की जीत ( व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

     असली की हार नकली की जीत ( व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया  

 
कौन समझा बनावट क्या, हक़ीक़त है क्या  
वास्तविक नहीं कुछ भी , कैसी शर्म ओ हया
नकली होशियारी सबको , लुभाने लगी अब 
वास्तविकता को , कहना ही होगा अलविदा । 
 
प्यार नकली है कारोबार भी नकली है यहां 
कितना खूबसरत लगता है नकली आस्मां  
चलो दिलदार चलो छोड़ कर असली जमीं 
बनाने लगी है दुनिया काल्पनिक इक जहां । 
 
कागज़ी फूल हैं , गुलशन है संग-ए-मरमर के   
जिस्म और जान दोनों ही अलग हो गए जब 
चांदनी चांद की , न रौशनी ही आफ़ताब की  
अब नहीं चाहिए कोई खुशबू किसी गुलाब की । 
 
सिर्फ़ छूने से सब कुछ बिखर ही गया लेकिन 
शोर कितना था नकली पर सम्मेलन का सुना 
सामना असलियत से करना पड़ेगा कभी जब 
साबित होगा बेकार बहुत बजता था झुनझुना । 
 
नकली ईमानदारी देशभक्ति भी नकली मिली 
अर्थव्यवस्था की खिलती नहीं इक भी कली 
आपकी सड़कें बंद  जनता के लिए आजकल
सरकार जी सुरक्षित रहने दो बस हमारी गली ।
 
असली कुछ भी नहीं आपने रहने दिया देश में 
मिलते रावण अब कितने ही राम जी के भेस में
सच को ज़िंदा ही दफ़्न कर दिया सभी ने जैसे 
कोई जगह देश में रही रहने को न ही परदेस में । 
 
जिधर देखते नकली का लो परचम लहरा रहा 
असली कौन है दुनिया में सभी को समझा रहा 
झूठी दुनिया की प्रीत है सुन अरे बांवरे आदमी   
कोई कबीरा आधुनिक भजन गाकर  सुना रहा ।  
 
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POST : 2057 मेरा दर्द न समझा कोई ( व्यंग्य - कविता ) डॉ लोक सेतिया

        मेरा दर्द न समझा कोई ( व्यंग्य - कविता ) डॉ लोक सेतिया  

 
सभी मेरे ही अपने लोग कहलाते हैं 
मिलकर मेरी वंदना को गीत गाते हैं , 
मेरी अस्मत को लूटती है दुनिया जब  
तब वो मस्ती में झूमते हैं  मुस्कुराते हैं  
खराब कितना अच्छा जिसको बताते हैं ।
 
मेरा बदन ही नहीं रूह तलक भी मेरी 
छलनी छलनी किया हर किसी ने मुझे   
मैं किस को जा कर बताऊं आप सब  
कितने ज़ालिम हैं और बेरहम हैं कितने  
मुझ पर कितने सितम बार बार ढाते हैं ।
 
दुनिया हैरान देख कर दुर्दशा को मेरी 
कौन समझता है यहां पर व्यथा को मेरी  
मुझ में रहने ही वाले ख़ुद किस तरह से  
मेरी हस्ती मिटाने की कोशिश में लगे हैं     
जाने क्या क्या तौर तरीके आज़माते हैं । 
 
चील कौवे कभी गिद्ध लगते हैं जैसे जो 
मुझे नौंचते रहते और खाते ही जाते हैं 
कितनी बदनसीब इक अबला नारी जैसी 
जिनसे रिश्ता मेरा वजूद का है वही लोग  
लाकर बाज़ार में मुझसे यूं नाच नचाते हैं ।
  
 
आप इसको मुझसे मुहब्बत बताने लगे हैं 
बांट के टुकड़ों में मेरा वजूद निशदिन ही 
नुमाईश करने को मुझे ऐसे सजाते हैं और 
खुद बिचौलिया बन बोली लगवा कर मेरी 
बेशर्म बनकर बेच कर फिर जश्न मनाते हैं । 
 
कुछ भी बोली नहीं मैं चुप चाप सदा ही रोई 
दर्द को मेरे कभी समझा नहीं यहां पर कोई 
जैसे किसी मुर्दा लाश की अर्थी है डोली भी 
कभी मेरी समाधि बना कुछ नाम रख कोई  
सर को झुकाते हैं दिया जलाते पुष्प चढ़ाते हैं ।    
 
 भारत माता – एक महाकाव्य फिल्म

 

सितंबर 19, 2025

POST : 2023 सच छुपाने लगा है ( कविता / नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

       सच छुपाने लगा है ( कविता / नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 

 
आईना ही हक़ीक़तको छुपाने लगा है 
दिन को भी अंधियारा छाने लगा है ।
 
दामन अपना वो अब छुड़ाने लगा है 
कहानी पुरानी फिर सुनाने लगा है ।   
 
चोर भी कितना शोर मचाने लगा है  
पहाड़ तले कोई  ऊंठ आने लगा है । 
 
तिलिस्म समझ सबको आने लगा है 
रहनुमा ही आजकल  घबराने लगा है ।
 
कोई तिनका छुपा सच बताने लगा है 
हर इक शख़्स ही दाढ़ी खुजाने लगा है ।
 
दोस्त खंज़र छुपा मिलने आने लगा है 
क्या खूब दोस्ती मुझसे निभाने लगा है ।  
 
उस गली गुज़रते सर को झुकाने लगा है
चुपचाप मिलने किसे आने जाने लगा है ।   
 

( 28 फरवरी 2003 पुरानी डायरी से ) 

 

 

दिसंबर 13, 2023

POST : 1761 देश समाज जीवन की क्षणिकाएं ( कविता ) डॉ लोक सेतिया { 12 जनवरी 2005 }

    देश समाज जीवन की क्षणिकाएं ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

                                12 जनवरी 2005 

             1      कड़वी सच्चाई । 

धर्म का कारोबार करने वालों ने   
मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा गिरिजाघर को 
अपनी संपत्ति बना कर ईशवर को 
बेघर कर दिया है भिखारी बन कर 
भटकता फिरता शहरों की गलियों में ।  

          2  विडंबना ।

कुछ लोग सत्य की खोज में 
निकले हैं झूठ का सहारा ले 
सच के झंडाबरदार बन कर  ,
वहीं शानदार दफ्तरों सामने
कराहता खड़ा है घायल सच । 
 

   3  चीख पुकार । 

संसद भवन विधानसभाओं में
भीतर भी और बाहर आंगन में 
चीखता पुकारता है लोकतंत्र 
बचाओ बचाओ की कर रहा 
फरियाद गूंगी बहरी जनता से ,
और उसकी अंतिम चंद सांसे 
गिन रहे हैं संग सभी राजनेता । 
 

       4  ज़िंदगी की जंग ।

ज़िंदगी लड़ रही है हारी जंग 
पल पल करीब आती मौत से 
सोचते सभी संभव नहीं बचना 
अनजाने डर से घबराया हर कोई 
उजड़ रहा बसने की चाहत में ही ,
यही आलम है जिधर देखते हम 
महानगर शहर से गांव बस्ती तक । 

      5   बाड़ खेत चर रही । 

 
कोई बन माली उजाड़ता चमन 
बन के मांझी कश्ती डुबोता कोई
कुछ लोग उनकी तस्वीरें बनाकर  
बेचते ऊंचे दाम प्रदर्शनी लगा कर
खुश हैं बदहाली से पैसा कमाकर  ,
इंसानियत शर्मसार है बेबस लाचार
संवेदनहीनता शर्त कैसा कारोबार है ।
 

         6  नाउम्मीद निराश लोग । 

हम जीवन भर बैठे रहते हैं बेकार 
करते रुख हवाओं के बदलने का 
तूफानों के थम जाने का इंतज़ार 
डूबने का भय हौंसलों की है कमी , 
नहीं मंज़िल मिलती उम्र भर कहीं ।
 
काश लड़ते हवाओं तूफ़ानों से और 
गुज़रते भंवर से साहस की पतवार ले 
नहीं घबराते सफ़र की कठिनाइयों से  
किसी बात की चिंता न कोई ही वहम ,
मंज़िल पर जाकर रुकते हमारे कदम । 
 

          7  सपनों में खोये लोग ।

कभी ज़िंदगी से कभी बाक़ी दुनिया से   
शिकवे गिले तमाम करते रहे बेकार हम   
अपनी नाकामियों से सबक सीखते गर 
दिल को झूठे दिलासों से बहलाते नहीं 
अपनी कल्पनाओं को हक़ीक़त बनाते 
झूठी उम्मीदों की आस में बैठते नहीं । 
 

        8    फ़रिश्ता ज़मीं पर । 

 
मसीहा का इंतज़ार किया सदियों तक 
हर किसी में देखी हमेशा वही झलक
नींद से जागते खुलते ही अपनी पलक 
धरती थी वही कहीं दूर था वो फ़लक  
ख्याली बातों पे भरोसा निराशा मिली 
लौटता वापस फिर पुराना ज़माना नहीं 
इस युग में उसका कोई ठिकाना नहीं , 
जिसको जाना समझा पहचाना नहीं । 
 

      9  संघर्ष । 

जीवन इक वास्तविकता है इक जंग है 
कोई सुनहरा ख़्वाब नहीं होती ज़िंदगी 
उसको पूरी तरह पाने के लिए खुद ही 
बदलना होता है सभी हालात प्रयास से 
यथार्थ में जीना होता है अपने पांव रख ,
ठोस धरातल की ज़मीन पर मज़बूती से । 
 

     10   रास्ता मंज़िल का । 

अपनी इस रंग बिरंगी दुनिया में सब है 
फूल ही नहीं हैं कांटे भी हैं पत्थर भी 
छांव धूप रौशनी अंधियारा दोनों हैं यहीं 
किनारे हैं लहरें हैं हिचकोले भी होते हैं 
अपने लोग और बेगाने भी मिलते हैं मगर ,
अपने रास्तों पर चल ढूंढते हैं मंज़िल भी । 
 

       11  वीराने को सजाना है ।

 
सभी तूफानों से गुज़र कर अंधेरे मिटा 
कांटों को हटाना है चलते चले जाना है  
सभी भंवर से गुज़र कर उस पार जाना है 
तब अपने प्यार के ख्वाबों को सजाना है 
खुद ही कोई अपनी नई दुनिया बसाना है 
फूलों को उगाना है शमां को जलाना है ,
प्यार की खुशबू का गुलशन बसाना है । 
 

      12  पत्थर से संगीत की धुन । 


ज़माने के दिल पत्थर के हो गए हैं अब 
उन में फिर कोमल एहसास जगाना है 
ज़िंदगी इक ऐसा इक खूबसूरत तराना है 
प्यार भरे बोलों को होंठों पे सजाना है 
दर्द और ख़ुशी से बनता हर फ़साना है  , 
संग संग मिलकर जिस को गुनगुनाना है ।   





दिसंबर 07, 2023

POST : 1757 भटकन ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

               भटकन ( कविता ) डॉ लोक सेतिया  

चाहिए बस दो ग़ज़ ज़मीन 
नहीं मांगते ऊंचा आसमान ,
 
पेट भरता दाल-रोटी से ही 
क्यों चाहें हम मधुर मिष्ठान । 
 
सुकून से छोटे घर में रहना 
महलों की झूठी लगती शान ,
 
झौंका खुली हवाओं को मिले 
थोड़ा सा जीने का है सामान । 
 
कतरे भर की है प्यास हमारी 
मांगते हम कब छलकते जाम ,
 
आख़िर सूरज ढल ही जाता है 
जलता दिया है हर इक शाम ।
 
मन उपवन खिलाने फूल कई
कंटीला वन दुनिया मत छान ,
 
खोने और पाने की धुन में ही 
बीत जाएगा है जीवन नाकाम । 
 
खुशियों को कैद न करना कभी 
हंसना हमेशा आज़ादी का नाम ,
 
पल पल मौत खरीद रहे हैं सब 
चुका कर जीने का महंगा दाम ।      
 
 

            ( बहुत साल पुरानी डायरी से इक रचना प्रस्तुत की है। )




दिसंबर 06, 2023

POST : 1756 मेरी तलाश ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

              मेरी तलाश ( कविता ) डॉ लोक सेतिया  

जाने कैसा जहां है ये कहीं , 
आकर जिस में खो गया हूं मैं 
करते करते इक प्यार भरे , 
जीवन की तलाश युग युग से । 
 
भूल गए हैं यहां सभी लोग ,
जीने का वास्तविक अंदाज़  
हर शख़्स अकेला खड़ा है 
भीड़ में अजनबी लोगों की ।
 
ढूंढती फिरती है सबकी नैया ,
भंवर में डोलती कोई किनारा
मांझी गए पार छोड़ के पतवार
तूफानों के हवाले है सब संसार । 
 
नहीं है चाह धन दौलत की थी  ,
कभी नहीं मांगे हीरे और मोती  
ज़माने भर से रही है अभिलाषा 
हो विश्वास दो थोड़ा सा प्यार । 
 
सब कुछ मिल सकता था मुझे , 
शोहरत नाम अपनी इक पहचान 
मिलता काश स्नेह किसी का तो
मेरा बस इक वही तो था अरमान ।
 

         ( बहुत साल पुरानी डायरी से इक रचना प्रस्तुत की है। )  


 

   

नवंबर 12, 2023

POST : 1744 अजब नज़ारा ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

              अजब नज़ारा ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

चाहता था कुछ कहना 
लग रहा जैसे बेज़ुबान था ,
सड़क किनारे खड़ा हुआ 
दुनिया का वो भगवान था । 
 
भूल गया था जैसे कोई 
अपना ही पता ठिकाना ,
खुद बनाया था सबको 
सब से मगर अनजान था । 
 
मंदिर के दर पर गया फिर 
मस्जिद की सीढ़ियां चढ़ा ,
पंडित को देख परेशान था 
मौलवी से मिल हैरान था । 
 
ढूंढ ढूंढ थक गया मिला न
उसको घर अपना कहीं भी ,
जहां पर थी कल इक बस्ती 
वहां पे बना हुआ श्मशान था ।
 
बे-शक़्ल आदमी थे या कि 
हर तरफ दिख रहे शैतान थे ,
थर- थर्राता - सा खड़ा वहां 
इक किनारे पे छुपा ईमान था ।  
 
लिखा था लाशों पर सभी 
ये हिंदू था वो मुसलमान था ,
वो बनाता रहा हमेशा से ही 
सिर्फ और सिर्फ इंसान था । 
 
मैंने क्या बनाया था इनको 
और ये कैसे ऐसे बन गये हैं ,
देख कर हाल दुनिया का वो 
हुआ बहुत अधिक पशेमान था ।  

(    बहुत  पुरानी डायरी से पुरानी लिखी रचना है । व्यंग्य-यात्रा पत्रिका के अंक में भी शामिल है    ) 
 

 
 
 



     

जुलाई 08, 2023

POST : 1690 मेरी पुरानी डायरियों से ( कुछ यादें कुछ एहसास ) डॉ लोक सेतिया [ भाग - दो ]

     मेरी पुरानी डायरियों से ( कुछ यादें कुछ एहसास ) डॉ लोक सेतिया 

                                              [ भाग - दो ]

अधिकांश लिखने वाले अपनी शुरूआती अधकचरी रचनाओं को संभाल कर नहीं रखते बल्कि छुपाए रहते हैं और कभी उनका नामो निशान मिटा देते हैं । कहा जाता है कि उनको पढ़कर किसी को महसूस हो सकता है कि कैसी कैसी अधकचरी रचनाएं लिखते थे । मैं कच्ची मिट्टी की तरह था ज़माने की आग ने मुझे पकाया तब जाकर कुछ पढ़ने के लिए लिखना आया मुझे 45 सालों में लेकिन उस गीली मिट्टी की सौंधी सौंधी खुशबू मुझे अभी भी आती हुई लगती है तभी अपनी पुरानी डायरियों को विरासत की तरह संभाले रखा है ।   
 
     
15 दिसंबर 1976 

ख़्वाबों में ख्यालों में जिए हैं हम 
आरज़ू करते करते मुरझाए फूल 
दिन ख़िज़ाओं के न हो सके कम । 

हर किसी पर ऐतबार किया है 
हम सबके सभी हैं अपने ही तो 
सोचते हैं कौन था कोई भी नहीं 
हमने क्योंकर इंतज़ार किया है । 

सब को चांदनी नहीं कभी भी मिलती 
नादानी वो चांद को छूने की कोशिश 
यूं ही हमने कई बार किया नासमझी 
ज़िंदगी ठहरी नहीं कहीं रही चलती ।  

16 नवंबर 1979 

नज़र आता है हर तरफ अंधेरा 
मेरी नज़रों का नज़ारों से नहीं 
नाता ।

मेरे अधरों का मुस्कानों से जैसे 
टूट गया कोई भूला बिसरा था 
नाता । 

27 मार्च 1984 

जाने क्या हो 
अंजाम ज़िंदगी का अपनी 
जिएं कैसे मरें भी किस तरह 
कुछ भी तो समझ नहीं आता । 

कश्ती तूफानों से उलझती है 
है किनारा किधर खबर नहीं 
भंवर भी कहीं नज़र नहीं आता । 

17 मार्च 1985 

तन्हाईयों में जीना ज़िंदगी तो नहीं 
दुनिया की भीड़ में अकेले हम हैं 
उजालों की रौनक है ज़माने भर की 
अपनी खातिर कोई रौशनी नहीं । 

फुर्सत में कभी कभी ख़्याल आता है 
पल दो पल कोई होता साथ साथ 
बुझती ज़रा हमारी प्यार की प्यास 
बस तमन्ना है ये , कोई बंदगी नहीं । 

22 जून 1985 

ग़म रोज़ मिलते रहे नए नए 
वर्ना तूफ़ान गुज़र ही जाते 
ज़ख्म हर किसी से मिले हमें 
वर्ना नासूर भर भी जाते 

जिनकी वफाओं पे नाज़ था 
काश इतना तो करही जाते 
दोस्ती नहीं निभा सकते मगर 
दुश्मनी की हद से नहीं बढ़ जाते 

तंग आए कश म कश से जब भी 
गीत कुछ लब पर चले आये मेरे 
उन्हीं गीतों के सहारे है ज़िंदा अभी
' लोक 'वर्ना  कब के मर ही जाते ।  

23 जून 1985 

बहुत गिला था तुम्हारी बेवफ़ाई का 
हम ने समझे नहीं थे दुनिया के चलन 
 
ज़माने में बनाते हैं ज़रूरतों की खातिर 
नये नये रिश्ते लोग हमेशा कितने ही 
 
छोड़ दिए जाते हैं सहूलियतों के लिए 
अब जाना वफ़ा कुछ नहीं सिवा इसके 

इक शब्द किताब पर लिखा हुआ सिर्फ 
बेबात था शिकवा गिला तुमसे जाता रहा ।  

17 अक्टूबर 1985 

कभी कभी ( कविता ) 

होता है एहसास कभी कभी 
कि अभी तलक ज़िंदा हैं हम 

यूं भी लगता है कभी कभी 
लौट कर आ गए वही दिन 

मन कहता है ये कभी कभी
आने वाले तो मिलने तुम 
 
मैं भूल जाता हूं कभी कभी 
कि बिछुड़ गए कभी के हम । 




 

सितंबर 12, 2022

POST : 1598 एहसासों के फूल ( पुस्तक समीक्षा ) समीक्षक : अमृत लाल मदान

   एहसासों के फूल  ( पुस्तक समीक्षा ) समीक्षक : अमृत लाल मदान 

                           रचनाकार कवि : डॉ लोक सेतिया  

गत वर्ष मुझे डॉ सेतिया ने फ़लसफ़ा - ए - ज़िंदगी शीर्षक से अपनी पहली किताब भेजी थी , जिसकी भूमिकासमझाने इक हस्ती आई से मुझे एक पंक्ति अभी तक नहीं भूली है । वह कहते हैं :- लिखना मेरा जूनून है , मेरी ज़रूरत भी है और मैंने इसको इबादत की तरह समझा है । इसी वर्ष उनकी तीन किताबों का सुंदर ढंग से छपकर आना वाकई उनके जूनून को दर्शाता है , उन्हें बधाई । और उनकी जुनूनी इबादत को सलाम । 
 
उनके ताज़ा कविता संग्रह ' एहसासों के फूल ' में लगभग 75 छंदबद्ध कविताएं एवं मुक्तछंद रचनाएं संग्रहीत  हैं जो सहज सीधी ज़बान में बदलती अनुभूतियों और एहसासों को ईमानदारी से अभिव्यक्त करने में सक्षम हैं । उनमें कोई शब्दाडंबर नहीं , कोई गूढ़ दर्शन की बोझिल बातें नहीं लेकिन सब में ठोस ज़िंदगी की तरल बातें हैं , जो उनके 71 वर्ष के जीवन अनुभव से निचुड़ी हुई आई हैं । 
 
 
प्रेम अनुभूतियाँ ज़िंदगी की सबसे तरलतम और सघनतम , उदास किंतु सुखद , और सृजन की अपार संभावनाओं से परिपूर्ण अनमोल अनुभूतियाँ होती हैं । ऐसी कविताएं सिरहाने के नीचे रखी जाती हैं , युवावस्था में  , और प्रौढ़ावस्था में हृदय की तहों के नीचे या स्मृतियों में । ऐसी कुछ कविताएं और ग़ज़लें हैं : वो दर्द कहानी बन गया , जाने कब मिलोगी तुम , मन की बात , उमंग यौवन की , मेरे ख़त , मेरी खबर आदि ।    
 
 
कवि केवल प्रेमिका की याद से उपजी उदासी को ही नहीं उकेरता बल्कि वृद्धावस्था में हर उस मां की उदासी को भी शिद्दत से महसूस करता है जो युवा संतान की उपेक्षा सहती है । यह ऐसा है जैसे कोई किसान युवा हुई फसलें काट लेता है और पीछे कटी हुई जड़ों का दर्द ही टीसता रह जाता है  , माँ के आंसू ऐसी ही कविता है । 
 
 
कवि का जीवन संघर्षों में और संघर्षशील मनुष्य के जीवट और आत्मविश्वास में पूरा विश्वास है । वह एक कविता में लिखता है : जीवन इक संग्राम तो क्या \ नहीं पल भर आराम तो क्या । ' थकान ' में कहता है : जीवन भर चलता रहा \ कठिन पत्थरीली राहों पर \ पर मुझे रोक नहीं सके \ बदलते मौसम भी । 
 
 
कवि नये ज़माने की नयी नारी का उद्यघोष सीता के पश्चाताप की आवाज़ में करता है , मुझे नहीं करनी थी चाहत \ सोने का हिरण पाने की ,  और एक अन्य कविता 'औरत ' में जो संग्रह की पहली कविता है वह उसकी आवाज़ यूं बनता है : " तुमने देखा है \ केवल बदन मेरा \ प्यास बुझाने को अपनी हवस की \ बांट दिया है तुमने टुकड़ों में मुझे \ और उसे दे रहे हो चाहत का नाम । एक और खूबसूरत कविता है ' हमारा अपना ताज ' पति-पत्नी का अपना प्यार का छोटा सा बसेरा । 
 
 
सामाजिक सरोकारों की कविताओं में ' काश ' शीर्षक से कविता मुझे बहुत अच्छी लगी जिसमें कवि सच्ची धर्मनिरपेक्षता सर्व धर्म समभाव का पक्षधर तो बनता है लेकिन उससे बढ़कर वह समूची मानवता के दर्द के एहसास को प्रमुखता देता है न कि मंदिर मस्जिद जाने को । कवि प्राकृतिक परिवेश का प्रेमी है और पर्यावरण संरक्षण में विश्वास रखता है । ' ठंडी ठंडी छाँव ' वृक्ष कहता है : काटना मत मुझे कभी भी \ जड़ों से मेरी \ जी नहीं सकूंगा \ अपनी ज़मीन को छोड़कर  , मैं कोई मनी प्लांट नहीं हूं । मानि वह प्राकृतिक उत्पाद के बाज़ारवाद का भी आलोचक है । 
 
 
साहित्य में कागज़ के फूल सजाने वाले कई लोग पत्थर के फूल भी बन कर नफरती बोल बोलकर बाल श्रमिकों का कैसे दिल दुखाते हैं , ये पीड़ा एहसासों के फूल खिलाने वाले डॉ सेतिया जी बखूबी समझते हैं । उनकी दृष्टि में वो साहित्य कहीं गुम हो गया है जो सद्भावना और संवेदना से खुशियों की महफ़िलें सजाता था ।  अब तो घुटन में उन्हें इस तालाब का जल प्रदूषित लगता है और सब फूल कुम्हलाए हुए । 
 
 
समाज में फैली इन दुष्प्रवृतियों से दुःखी हो कर वह कृष्ण को उनका वायदा याद दिलाते हैं जो उन्होंने अधर्म  जाने पर नया अवतार ले कर आने को कहा था । यहां उनका संस्कृति प्रेम झलकता है ।  इस प्रकार कविता दर कविता सेतिया जी जीवन यात्रा की अच्छी बुरी अनुभूतियों की सशक्त अभिव्यक्ति करते चलते हैं । हां कहीं कहीं उनकी घिसी-पिटी उपमाएं अखरती भी हैं , यथा , फूल ही फूल खिले हों \ हों हर तरफ बहारें ही बहारें ।  फिर भी बहुत ताज़गी है उनकी कविताओं में शिल्प तथा सादी ज़बान में।  उनके लिए साधुवाद की कामना करता हूं ।  
 
  अमृत लाल मदान 
अध्यक्ष , साहित्य सभा 
कैथल ( हरियाणा ) 136027 
मोबाइल नंबर - 94662-39164 

उपरोक्त पुस्तक समीक्षा आदरणीय मदान जी ने 11सितंबर 2022 आर के एस डी ( पी जी ) कॉलेज में विमोचन करते समय पढ़ कर सुनाई । मुझे याद नहीं उनसे कभी पहले आमने सामने मुलाक़ात हुई या कोई वार्तालाप हुई हो । शायद कोई बेहद संवेदशील साहित्य सृजक ही ऐसा कर सकता है केवल पुस्तक को पढ़ कर रचनाकार की मन की भावनाओं को समझ कर इतनी सही सार्थक समीक्षा करना । मुझे अपनी रचनाओं की इस से बढ़कर कोई कीमत नहीं मिल सकती है । अमृत लाल मदान जी का धन्यवाद शब्दों में नहीं किया जा सकता है । 

(   पाठक वर्ग की सुविधा के लिए ' एहसासों के फूल ' कविता संग्रह की पुस्तक व्हाट्सएप्प नंबर 
8447540078 पर संदेश भेज मंगवा सकते हैं । जल्दी ही अमेज़न पर भी उपलब्ध करवा दी जाएगी। )
 

 

अगस्त 23, 2022

POST : 1592 ज़िंदगी भर ख़ुशी ढूंढते हैं लोग ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

       ज़िंदगी भर ख़ुशी ढूंढते हैं लोग ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

मिलती नहीं जीवन भर क्यों 
मिलती है ख़्वाबों में शायद वो 
और हम ने ख़्वाब सजाना ही 
हक़ीक़त से घबरा छोड़ दिया । 

वही मांगते हैं खुशियां उन्हीं से 
देते हैं जिनको दर्द की सौगातें 
इंसान इंसान हैं कोई पेड़ नहीं 
पत्थर खा देते हैं फल सबको ।
 
बना दिया है कारोबार उसे और 
कीमत लगाते हैं सब ख़ुशी की 
दर्द के बदले कौन बांटता है अब 
अपनों बेगानों को वास्तविक ख़ुशी । 
 
इक बार इक ख़ुशी मिली हमको 
करीब जा कर देखा उसकी आंखें 
अश्क़ों से भरी हुई थी दर्द सहते 
मुस्कराहट मगर लबों पे रहती थी ।
 
वो नन्हीं सी बिटिया चाहती थी 
उठा कर कोई चूमे माथा उसका 
फुर्सत थी किसे खेले संग कौन 
खिलौनों से बहलाना था आता । 
 
देख कर ग़म सभी भूल भूल जाएं 
मासूम ख़ुशी बड़ी हो गई धीरे धीरे 
घबराती अब सबसे करीब आने से
खुश होने लगे सभी उसे रुलाने से । 
 

 

 
 
 

दिसंबर 17, 2021

POST : 1562 किस को सुनाएं से सुन ज़माने तक ( कागज़ - कलम का सफर ) डॉ लोक सेतिया

          किस को सुनाएं से सुन ज़माने तक 

             ( कागज़ -  कलम का सफर ) डॉ लोक सेतिया 

शीर्षक संक्षेप में नहीं संभव इस पोस्ट का क्योंकि 1973 में पहली ग़ज़ल कही थी ' हम अपनी दास्तां किस को सुनाएं , कि अपना मेहरबां किस को बनाएं '। करीब आधी सदी का लंबा सफर साहित्य से चाहत का मुहब्बत से जूनून होने तक का जिया है हर दिन परस्तिश की है। किताबें छपवाने की शुरुआत देर से सही मगर सोच विचार कर करने चला हूं ताकि सिर्फ मेरी ही नहीं सभी लिखने वालों की मुश्किलों दुश्वारियों और हौंसलों की बुलंदी से थकान तक का एहसास पाठक वर्ग को हो सके। जाने कितने सोच विचार अंतर्द्वंद से गुज़रते हुए कलम हाथ में उठाते हैं विचार भावना को शब्दों में पिरोना रचना का आंखों से मस्तिष्क और रूह तलक पहुंचना सिर्फ रचनाकार जानता है तपस्या क्या होती है। आपको ग़ज़ल की 151 रचनाएं पढ़ने में कुछ घंटे लगेंगे लिखने में सालों हर हर्फ़ के मायने समझने में बीते हैं। लिखना ऐसे समय में जब हर कोई सोशल मीडिया टीवी चैनल अनगिनत ऐप्प्स और गूगल पर दुनिया देखना समझना चाहता है साहस का कार्य है। इसलिए पुस्तक से साहित्य से समाज को जोड़ना अधिक महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि ज़िंदगी की वास्तविकता और सामाजिक समस्याओं की वास्तविक भावनाओं को महसूस करने को यही एक विकल्प बचा लगता है। किताब से अच्छा दोस्त कोई नहीं दुनिया में और अच्छे साहित्य से बढ़कर मार्गदर्शन कोई अन्य नहीं कर सकता है। पुस्तक के पन्ने निर्जीव वस्तु नहीं होते हैं पाठक से संवाद करते हैं कभी हमदर्द लगते हैं कभी निराशा के अंधकार से बाहर निकाल रौशनी से मिलवाते हैं। किताबें बंद अलमारी की शान बढ़ाने को नहीं हो सकती हैं बेशक इधर बहुत मशहूर जाने माने लोग सिर्फ खुद के गुणगान जीवनी और अधिकांश अनावश्यक घटनाओं की व्यर्थ चर्चा कर ख्याति हासिल करने को इसका अनुचित उपयोग करते हैं। और सरकारी संस्थान संघठन ऊंचे दाम खरीद लायब्रेरी की शोभा बढ़ाते हैं। सच्चा कलम का सिपाही अपनी नहीं समाज की बात कहता है।  

ग़ज़ल संग्रह के बाद कविताओं की उसके बाद व्यंग्य रचनाओं पर आधारित पुस्तक और चौथी किताब ज़िंदगी की कहनियों की हाज़िर करनी है। मकसद दौलत शोहरत पाना कदापि नहीं है बल्कि आपको खुद अपने आप से मिलवाने का उद्देश्य है। ये आपको निर्णय करना है खुद से नज़रें मिलाना चाहते हैं अथवा नज़र बचाना चाहेंगे। बुद्धिजीवी लोगों से समीक्षा लिखवाना अनावश्यक होगा पाठक को रचनाएं खुद से जुड़ती हुईं लगती हैं और सामाजिक सरोकार की चिंता जागृत करने को सफल होती हैं तभी सार्थकता होगी रचनाओं की। इंतज़ार नहीं स्वागत नहीं करें लेकिन निवेदन है पुस्तक जिस भी किसी लेखक की हो आपको मिलती है तो उसको रद्दी की टोकरी में फैंक कर सरस्वती का निरादर कदापि नहीं करें। पढ़ना नहीं पसंद तो जैसे अख़बार पत्रिका के संपादक खेद सहित लौटाते हैं ताकि अन्य किसी के लिए उपयोगी हो सके जैसा कदम उठाना बुरा नहीं है। लिखने वालों को इसकी आदत होती है दस जगह भेजी रचना एक जगह छप जाती है तब भी ख़ुशी मिलती है बेशक रॉयल्टी तो क्या उचित मानदेय भी हमेशा नहीं मिलता। 
 

 

अप्रैल 03, 2021

POST : 1482 दिखाने को पर्दा करते हैं ( कव्वाली ) डॉ लोक सेतिया

      दिखाने को पर्दा करते हैं ( कव्वाली ) डॉ लोक सेतिया 

हुस्न वाले जलवा अपना , 
दिखाने को पर्दा करते हैं 
 
समझना मत वो चेहरा 
छुपाने को पर्दा करते हैं । 
 
बस देख इक झलक कोई 
हो जाये आशिक़ दीवाना 
 
नज़रों से नज़र चुपके से 
मिलाने को पर्दा करते हैं । 
 
बनते हैं बेखबर तोड़कर 
दिल आशिकों का कितने 
 
बेवफ़ा अपनी बेवफ़ाई 
छिपाने को पर्दा करते हैं । 
 
दिल ही दिल खुश होते 
हुस्न की तारीफ सुनकर 
 
बुरा मानते शर्म हया को 
दिखाने को पर्दा करते है । 
 
जब बेपर्दा बाहर आये तो 
देखा न किसी ने उस दिन  
 
पर्दानशीं क्या बात उनकी 
समझाने को पर्दा करते हैं ।  
 
शोलों को और भड़काने 
आता है मज़ा सताने में  
 
दिलजलों की दिल्लगी 
बढ़ाने को पर्दा करते हैं । 
 
कौन कहता है हुस्न को 
छुपाने को पर्दा करते हैं 
 
चिलमन खुद उठाकर के 
गिराने को पर्दा करते हैं । 



 

अगस्त 26, 2020

POST : 1370 ज़िंदगी मिली अजनबी सी ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

      ज़िंदगी मिली अजनबी सी ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

मिली ज़िंदगी फिर भी मिलती नहीं 
दूर रहती कभी पास आती ही नहीं

कुछ ख़राबी नहीं अच्छी लगती नहीं 
जैसी हम सोचते हैं वैसी होती नहीं । 

जिन्हें महफ़िल की चाहत अकेले हैं 
एक हम हैं जो तन्हाई अपनी नहीं 

कोई अपना सा कहीं मिलता कभी 
वरना तन्हाइयां हमको खलती नहीं । 

फ़ासले भी नहीं करीबी अजीब है ये 
कुछ कहते नहीं कुछ भी सुनते नहीं

दो किनारे हैं बहती इक नदी बीच में 
चलती रहती कहीं भी ठहरती नहीं । 

जानते नहीं कोई भी अजनबी नहीं
मिला हमको वो कम भी तो है नहीं 

जीने को जीते हैं जीते मगर हम नहीं 
ख़ुशी ज़िंदगी नहीं कोई ग़म भी नहीं । 

ग़ज़ल कविता नहीं और कहानी नहीं
प्यास बाक़ी नहीं मिलता पानी नहीं 

कौन समझे ख़ामोशी की दास्तां को 
जो नहीं समझे उसको सुनानी नहीं ।




   







अप्रैल 29, 2020

POST : 1275 क्यों हंसे सोचा रोने के बाद ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

      क्यों हंसे सोचा रोने के बाद ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 

कभी रोने लगे किसी बात पर , 
मुस्कुराने लगे फिर ये सोचकर 
 
आती है मिलन की मधुर बेला , 
विदाई  दुल्हन की होने के बाद । 
 
चार दिन के मुसाफिर रहे साथ , 
चल दिए भविष्य की मंज़िल को 
 
राह अपनी अपनी को जाना है ,  
मोड़ से अलविदा कहने के बाद । 
 
मिलना और बिछुड़ना है ज़िंदगी , 
बहती नदी निरंतर बहे जाती है 
 
कितना लंबा  सफर भूल जाती , 
सागर में अपने समाने के बाद । 
 
हम लोग दोहराते हैं इसको भी , 
ख़ुशी की बात पर अश्क बहाते हैं 
 
और हंसते भी हैं कितनी बार फिर  , 
दर्द ए दिल की दवा पाने के बाद ।
 
दोस्त कितने बनाते हर रोज़ ही ,
जाने समझे बिना खुश होकर भी
 
टूट जाता नाता छोड़ देते हैं फिर 
वक़्त बुरा जब आज़माने के बाद । 
 

 

सितंबर 23, 2019

POST : 1203 खिलौना नहीं इंसान हूं ( दास्तान ए ज़िंदगी ) डॉ लोक सेतिया

   खिलौना नहीं इंसान हूं ( दास्तान ए ज़िंदगी ) डॉ लोक सेतिया 

 हंसता रहा , मुस्कुराता रहा कभी आंसूं बहाता रहा ,
 जैसे कोई बेजान सामान सबकी दुनिया का मशीन सा। 
 
 चलता गया अजनबी अनजान राहों पर चाहे-अनचाहे ,
 कोई मंज़िल कोई मकसद कोई सपना नहीं था मेरा भी।

 फिर भी बहला नहीं पूरी तरह से किसी अपने बेगाने का ,
 मुझ से खेल कर भी दिल खिलौना टूटने बिखरने तक भी।

 अब तक गया हूं आखिर सदियों लंबे सफर पर चलते हुए ,
 नहीं चला जाता थोड़ा तक कर आराम करना चाहता हूं मैं।

 सभी अनचाहे खुद बना लिए बंधनों से मुक्त होकर अब ,
 बचे हुए कुछ पल जीना चाहता हूं अपनी मर्ज़ी से मैं भी।

 भगदौड़ से दुनिया की तक कर चूर हो कर परेशान होकर ,
 पल दो पल जीना चाहता हूं अपने साथ अपनी ख़ुशी से।

 किस किस को कैसे समझाऊं मैं नहीं बेजान खिलौना कोई ,
 दिल जज़्बात संवेदना और एहसास कुछ खालीपन का है।

 कुछ भी नहीं चाहत कोई गिला शिकवा आपस में नहीं है ,
 बस खुले आसमान में सांस लेना है घुट रहा है दम मेरा।

 नहीं आदत औरों की तरह हाथ जोड़ मांगना कुछ  कभी ,
 इतना चाहता हूं जैसा भी मैं हूं रहने दो मुझे अपनी तरह।

 और नहीं जिया जाता हर किसी को खुश रखने को मुझसे ,
 थोड़ी आरज़ू बची हुई है आखिरी पल चैन से रहना है अब।

 खामोश होकर शायद चिंतन करना चाहता हूं क्या है पास ,
 समझना नहीं सब को न ही किसी से कुछ कहना है अब। 
 

 

अप्रैल 26, 2019

POST : 1062 बस नहीं मिला वही ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

         बस नहीं मिला वही ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

लोग मिले 
मिलते रहे हर इक मोड़ पर । 
 
कुछ अपने कुछ अजनबी 
कुछ नातों के नाम से 
कुछ जान पहचान से भी । 
 
दोस्त भी मिले 
और मिले वो भी जो शायद 
नहीं मिलते तो अच्छा था । 
 
पर जो भी मिले 
सोचने वाले थे 
सब खुद को मुझसे अच्छा । 

या फिर मुझसे बेहतर 
या मुझसे अधिक समझदार 
या मुझसे बड़े होने का गरूर लिए । 
 
नहीं मिला 
कोई भी ऐसा 
दोस्त अपना या कोई पराया ही । 

जिसको लगता बराबर हूं मैं 
अच्छे-बुरे दोनों एक जैसे हैं 
तलाश बहुत किया 
मिला नहीं वही । 
 

 

मार्च 24, 2019

POST : 1032 नहीं का नहीं ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

             नहीं का नहीं ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

चुप रहने की आज़ादी है 
लब खोलने की भी मिली है 
 
हर बात पर हर बार मगर 
हां कहने की है नहीं की नहीं । 

रिश्तों के बंधन जाने कैसे हैं 
दुःख दर्द सहने की आज़ादी है 
 
चुपके चुपके छुपके रोने की भी 
खुश रहने की कभी मिली नहीं । 

घुट घुट कर जीने की आज़ादी 
मर मर ज़िंदा रहने की भी है 
 
हर सांस पर पहरा लगा हुआ 
मौत की मरने की मर्ज़ी पर नहीं । 

जिस राह पर जाना ज़रूरी है 
उसी डगर चलने की मनाही है 
 
काटों की राह चलना पड़ता है 
रुकने ठहरने की अनुमति नहीं । 

उलझन कोई भी नहीं सुलझती 
सुलझाने से बढ़ती जाती है और 
 
समझाते हैं सभी हर किसी को 
समझता उलझन नहीं कोई नहीं । 

हां वही है जो नहीं है नहीं है 
वही नहीं जो होकर भी है नहीं 
 
इकरार इनकार दोनों इक जैसे 
हां कहा नहीं , नहीं सुना नहीं ।