फ़रवरी 21, 2025

POST : 1949 लोकदेव नेहरू - रामधारी सिंह दिनकर ( पुस्तक समीक्षा ) डॉ लोक सेतिया

 लोकदेव नेहरू - रामधारी सिंह दिनकर ( पुस्तक समीक्षा ) डॉ लोक सेतिया 

मैंने हमेशा कितने लोगों की किताबों की समीक्षा करने से बचना चाहा है , और इतने महान कवि विचारक की किताब पर कुछ भी कहना मुझ जैसे साधरण लेखक के लिए आसान कदापि नहीं है । कुछ साल पहले बालमुकुंद अग्रवाल जी की किताब पढ़ कर स्वतंत्रता आंदोलन के 90 साल 1858 से 1946 की कहानी समझने में आसानी हुई थी अब इस किताब को पढ़कर सिर्फ जवाहरलाल नेहरू ही नहीं बल्कि अन्य तमाम महान नायकों की विचारधारा उनकी देशभक्ति और सामाजिक सरोकारों की चिंता को लेकर सटीक और विश्वसनीय जानकारी हासिल हुई है । राष्ट्रकवि दिनकर जी से बेहतर शायद कोई और इस विषय पर पूर्ण निष्पक्षता ईमानदारी से लिखने का साहस नहीं कर सकता क्योंकि दिनकर जी नेहरू के करीबी होकर भी महिमामंडन या चाटुकारिता कदापि नहीं कर सकते थे जो बेहद महत्वपूर्ण होता है । 

रामधारी सिंह दिनकर : - 

जन्म 23 सितंबर 1908 , निधन 24 अप्रैल 1974 , 

1959 में ' संस्कृति के चार अध्याय ' पर साहित्य अकादेमी पुरुस्कार और पद्मभूषण की उपाधि , 1973 में उर्वशी पर ज्ञानपीठ पुरुस्कार ।

महीयसी महादेवी वर्मा ने दिनकर जी को विश्वकवि कहा था क्योंकि उनकी कविताओं में राष्ट्रीयता की वाणी और उसकी स्वायत्तता का गैरवगान और संघर्ष नहीं वरन प्रेम का इक व्यापक क्षितिज है जो उनको विश्वकवि की श्रेणी में ले जाता है । 

दिनकर जी ने कहा था सच्चा कवि हमेशा जीवित रहता है , उस के प्रति राग और द्वेष के कारण उसके सामने उसका सही मूल्यांकन नहीं हो पाता । 

किसी कवि का सही मूल्यांकन उसके निधन के पचास वर्ष बाद होता है , और आज लगता है वही समय है दिनकर जी का निधन होने के पचास साल बाद का । 

पुस्तक से कुछ अंश लेकर समझने की कोशिश करते हैं : - 

( नेहरू जी को दिनकर जी ने हर जगह पंडित जी कहकर संबोधित किया है ये बताना ज़रूरी है आगे पढ़ते हुए ध्यान रहे। )

चीनी आक्रमण के बाद दिनकर जी ने नेहरू की मनोसिथ्ति को समझते हुए लिखा है , मैं जिस धर्म का प्रतिपादन कर रहा था , वह आपद्धर्म था । पंडित जी घोर संकट में भी परम धर्म पर आसीन थे । पंडित जी उस हारी हुई ज्योति के प्रतीक थे , जो पराजित हो कर भी अन्धकार को ललकार रही थी । 

{ परशुराम की प्रतीक्षा } 

अन्धकार को दबी रौशनी की धीमी ललकार ,
कठिन घड़ी में भी भारत के मन की धीर पुकार । 
सुनती हो नागिनी ! समझती हो इस स्वर को ?
देखा है क्या कहीं और भू पर उस नर को -
जिसे न चढ़ता ज़हर , न तो उन्माद कभी आता है ,
समर-भूमि में भी जो पशु होने से घबराता है । 
 
आगे दिनकर जी कहते हैं , हिंसा- अहिंसा के बारे में पंडित जी के लगभग वे ही विचार थे , जिनका प्रतिपादन मैंने ' कुरुक्षेत्र ' काव्य में किया है : 
 
व्यक्ति का है धर्म तप , करुणा , क्षमा ,
व्यक्ति की शोभा विनय भी , त्याग भी ;
प्रश्न जब उठता , मगर , समुदाय का ,
भूलना पड़ता हमें तप-त्याग को । 
कौन केवल आत्मबल से जूझ कर 
जीत सकता देह का संग्राम है ?
पाशविकता खड्ग जब लेती उठा ,
आत्मबल का एक बस चलता नहीं । 
 
संस्मरणों की चर्चा करते तो शायद पूरी किताब ही लिखनी पड़ती मगर यहां सिर्फ सार की बात कहनी है ताकि पुस्तक को लेकर पाठक राय बना सकें । 148 पेज से आखिर में दिनकर जी ने अध्याय ' पंडित जी का जीवन दर्शन ' लिखा है जिस में कुछ शीर्षक से नेहरू जी का सपष्ट व्यक्तित्व उजागर होता है । 
 

                  1        धर्म 

दिनकर जी कहते हैं पंडित जी की पूरी श्रद्धा भगवान बुद्ध  पर अटूट थी , भगवान बुद्ध अपने समय से बहुत पहले जनमे थे अथवा यह कहना चाहिए कि उनका समय अब आया है । बुद्ध अगर बीसवीं सदी में जनमे होते , तो उनके सबसे निकटवर्ती आत्मबन्धु गांधी जी और जवाहरलाल हुए होते । बुद्ध का ईश्वर के विषय में क्या मत था ? ऐसे सभी प्रश्नों को बुद्ध ने अव्याकृत कोटि में डाल रखा था । किन्तु वे आज अगर मौजूद होते और हम उनसे पूछते ईश्वर है या नहीं , तो उनका जवाब होता , तुम्हें प्रश्न करना नहीं आया । 
 
' मान लो कि ईश्वर है और तुम्हारे कर्म अच्छे हैं , तो परिणाम क्या होगा ?'
 
' अच्छा होगा । ' 
 
' और मान लो ईश्वर है और तुम्हारे कर्म अच्छे नहीं हैं , तो परिणाम क्या होगा ? '
' परिणाम बुरा होगा । '
 
' तो फिर पूछना यह चाहिए कि तुम हो या नहीं तुम्हारे कर्म कैसे हैं । 
वैसे जवाहरलाल जी गीता के प्रेमी थे और गांधी जी को देख कर उन्हें ये विश्वास हो गया था कि सिथ्तप्रज्ञता कल्पना हवाई नहीं है और साधना से सिथ्तप्रज्ञता प्राप्त की जा सकती है ।   
   

               2                     हिंसा-अहिंसा 

दिनकर बताते हैं कि पंडित जी मानते थे कि अहिंसा का सर्वत्र पालन वही व्यक्ति कर सकता है , जिस के भीतर की मानवता अत्यन्त विकसित और सजीव हो , जो भारी से भारी कष्ट सहकर भी उत्तेजना में न आए । 

             3                   प्रजातंत्र 

पंडित जी व्यक्ति के वयक्तित्व का आदर करते थे और यह मानते थे कि असली प्रजातंत्र वह है , जहां सारी जनता मतदान द्वारा अपनी राय ज़ाहिर करती है और शासन उसी राय के अनुसार चलता है । एक हद तक शिक्षा और समृद्धि लाये बिना प्रजातंत्र ठीक से काम नहीं करता है ।
 

             4                  समाजवाद 

सन् 1929 ई में पंडित जी ने लाहौर कांग्रेस के सभापति - पद से ऐलान किया था कि मैं समाजवादी हूं और राजाओं तथा उद्योगपतियों के साम्राज्य के ख़िलाफ़ हूं । प्रजातंत्र और समाजवाद को वे एक ही सिक्के के दो पहलू समझते थे । 

                5              राष्ट्रीयकरण 

सन् 1954 ई में उन्होंने कहा था , समाजवाद विषयक हमारी आम धारणा यह है कि उस से उद्योगों का राष्ट्रीयकरण होता है । इसलिए ऐसा सोचा जा सकता है कि हम तुरन्त उद्योगों का राष्ट्रीयकरण कर दें । जैसे जैसे समाजवाद की प्रगति होगी , अधिक से अधिक उद्योग राष्ट्रीय सेक्टर में होंगे । किन्तु अभी हमारा उद्देश्य धन के उत्पादन और रोज़गार में वृद्धि होनी चाहिए । 
 

              6           राज्य और व्यक्ति   

पंडित जी मानते थे कि आज तक राज्य का उद्देश्य वैदेशिक आक्रमण और आन्तरिक उत्पात से समाज की रक्षा करना रहा है । लेकिन अब कल्याणकारी राज्य का ध्येय जनता की शिक्षा , स्वास्थ्य , रोज़ी आदि समस्याओं का भी समाधान निकालना हो गया है ।
 

                7      पंडित जी और भारतीय एकता 

काल का कारण राजा होता है या राजा का कारण काल - इस प्रश्न का सबसे सही उत्तर यह है कि महापुरुष काल की प्रेरणा से जन्म लेते हैं और फिर वो काल को प्रभावित भी करते हैं । जवाहरलाल जिस युग में जनमे , वह बहुत पहले से एकता की खोज में बेचैन चला आ रहा था । गांधी जी और जवाहरलाल ने उस बेचैनी में वृद्धि कर दी और जनता के मन पर यह बात बिठा दी कि एकता और आज़ादी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं । कहते हैं , महापुरुषों के जीवन में अक्सर असफलता अन्त - अन्त तक उनका पीछा करती है । राम  , कृष्ण , सुकरात , ईसा , कबीर और गांधी - ये अपने जीवन में  क़ामयाब नहीं हुए ,  मगर दुनिया को रौशनी उन्हीं के आदर्शों से मिल रही है । अब वही लड़ाई काल के अखाड़े में चल रही है । इस लड़ाई में सबसे ज़्यादा रौशनी गांधी जी की कुर्बानी से आ रही है , जवाहरलाल की उन कोशिशों से आ रही है जो उन्होंने हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए की थीं और जिन कोशिशों में वे नाकामयाब रहे ।  ये सभी बातें विचार रामधारी सिंह दिनकर जी की किताब से शब्द - ब - शब्द लिए गए हैं मैं उनसे अच्छा क्या वैसा भी कभी भी नहीं लिख पाऊंगा अत: इसे समीक्षा नहीं प्रमुख अंश कहना उचित होगा । 

                            पंडित जी के संस्मरण 

इस से पुस्तक की शुरुआत की गई है मगर मैंने इसे आखिर में रखा है क्योंकि पेज नंबर 13 से पेज नंबर 147 तक 134 पेज पर तमाम घटनाओं स्मृतियों का विवरण है जिसे बड़े ही ध्यान से पढ़ना ज़रूरी है । लेकिन मैंने कुछ बातों का चयन किया है जो नेहरू जी की सोच को दर्शाती हैं । दिनकर जी बताते हैं पहली बार पंडित जी को करीब से देखने का अवसर तब मिला जब किसी राजनीतिक सम्मेलन में मुज़फ्फरपुर में मंच पर जिस मसनद के सहारे पंडित जी बैठे थे , मैं उस के पीछे बैठा था । उस से कुछ दिन पूर्व मुंगेर में श्रीबाबू को टंडन जी ने एक अभिनंदन ग्रंथ भेंट किया था , सुयोग देख कर नन्दकुमार बाबू ने ग्रंथ की एक प्रति जवाहरलाल जी के सामने बड़ा दी । पंडित जी ने उसे उलटा पलटा और देखते देखते उनके चेहरे पर क्रोध की लाली फ़ैल गई । फिर वे बुदबुदाने लगे ' ये गलत बातें हैं । लोग ऐसे कामों को बढ़ावा क्यों देते हैं । अजब संयोग कि उन्हीं दिनों अज्ञेय जी और श्रीलंकासुन्दरम नेहरू अभिनंदन ग्रंथ का सम्पादन कर रहे थे । दिनकर जी लिखते हैं जब ऐसा आयोजन होना था उस समय मैं भी तमाशा देखने दिल्ली गया हुआ था । जब राजेन्द्र बाबू ने राष्ट्रपति भवन में प्रवेश करना था उस से एक दिन पहले मैं उनसे मिलने गया था । बातों के सिलसिले में मैंने राजेन्दर बाबू से जानना चाहा कि पंडित जी को अभिनन्दन ग्रंथ कौन भेंट करेगा । राजेन्दर बाबू ने बताया  ' लोगों की इच्छा है कि ग्रंथ मेरे हाथों दिया जाना चाहिए , मगर पंडित जी इस विचार को पसंद नहीं करते । वे मेरे पास आये थे और कह रहे थे कि कल से आप राष्ट्रपति हो जाएंगे । मैं नहीं चाहता कि अभिनन्दन ग्रंथ जैसे फालतू काम के लिए राष्ट्रपति इम्पीरियल होटल में कदम रखें , न ही मैं यही चाहता हूं कि यह समारोह राष्ट्रपति भवन में मनाया जाये । जिन लोगों ने ये तमाशा खड़ा किया है उन्हें भुगतने दीजिये । और , सचमुच , समारोह का आयोजन होटल में ही हुआ और ग्रंथ टंडन जी ने ही भेंट किया । 
 
एक अन्य घटना को लेकर दिनकर जी लिखते हैं , संसदीय हिंदी परिषद की गोष्ठी पंडित जी के घर पर हो रही थी । पंडित जी के बोलने की बारी आई , उन्होंने कहा , ' अभी मैं उड़ीसा गया हुआ था । सुना , वहां के आदिवासी भाई आर्य रक्तवालों से नाराज़ हैं । वो कहते हैं कि एकलव्य अनार्य था और द्रोणाचार्य आर्य थे । इसी कारण द्रोणाचार्य ने उस अनार्य नैजवान का अंगूठा कटवा लिया । ' यह बात सुनकर सभी श्रोता हंसने लगे ; किन्तु पंडित जी को हंसी नहीं आई ; बल्कि विचलित हो कर उन्होंने कहा , ' और अपनी बात मैं आपको बताऊं ? यह सब सुनकर मुझे गुस्सा हो आया । ' 
 
दिनकर लिखते हैं , द्वापर से कलयुग बहुत दूर पड़ता है । लेकिन सच्ची मानवता इस दूरी को नहीं मानती । किन्तु कितनी सजीव थी उस पुरुष की मानवता , जो कलयुग में खड़ा हो कर द्वापर के अन्याय से तिलमिला उठता है !   
 
The Nehru Blog 🇮🇳 on X: "आज राष्ट्रकवि रामधारी सिंह #दिनकर की पुण्यतिथि  है। दिनकर जी ने जवाहरलाल #नेहरु की संक्षिप्त जीवनी लिखी जिसका नाम है "लोकदेव  ...

फ़रवरी 20, 2025

POST : 1948 कॉमेडी बन गई है राजनीति ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

      कॉमेडी बन गई है राजनीति ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया  

सियासत क्या है समझो कयामत है , वही चमकता है जिस की किस्मत है , रामगढ़ वाले नहीं जानते कौन ठाकुर है कौन बसंती है । कौन कहता है कि चाहत पर सभी का हक है उनकी मर्ज़ी है कुर्सी पर कौन बैठेगा मुख्यमंत्री वही जो उनके मन भाये । शतरंज उनकी है लेकिन कौन बादशाह कौन रानी कितने प्यादे सब उनके हाथ की कठपुतलियां हैं । नौटंकी का लुत्फ़ उठाओ खामोश रहो सिर्फ पर्दा उठाओ पर्दा गिराओ जब ज़रूरत हो ताली बजाओ नाटक को मत समझो दिल को बहलाओ रोटी नहीं मिलती है तो केक खरीद कर पेट की भूख मिटाओ । चार्वाक ऋषि कहते हैं क़र्ज़ लेकर घी पियो जैसे भी चाहे मौज मनाओ जियो मत किसी को चैन से जीने दो आखिरी जाम है मुझे पीने दो । कॉमेडी शो जब चलता है तब लोग उस बात पर भी कहकहे लगाते हैं जिसे समझने वाले की आंखों में अश्क़ भर आते हैं । ये हम्माम है सभी नहाने वाले नंगे होते हैं लेकिन बादशाह सलामत छाता लेकर बारिश में नहाते हैं गीत पुराना गुनगुनाते हैं बिना भीगे घर से दफ़्तर पहुंच जाते हैं ।  कपिल शर्मा कभी नहीं समझे लोग किस बात पर हंसते हैं उनको बस यही आता है जिस को जैसा चाहे बनाते हैं कलाकार अपना किरदार निभाते हैं कपिल सभी का मज़ाक उड़ाते हैं कहते हैं कभी न कभी हर किसी के दिन आते हैं । सोनी से बिछड़ कर नेट्फ़्लिक्स से रिश्ता बनाया था अब पछताते हैं , आजकल लोग कोई धुन बनाते हैं रैप सांग गाते हैं सुर ताल इस तरह मिलते हैं शब्दों के तुकांत मिलते मिलते बिना किसी मकसद अपनी मस्ती में झूमते गाते हनीसिंह कहलाते हैं । चार दिन की चांदनी में ज़िंदगी जीते हैं अचानक खो जाते हैं । आज आपको इक राजा की कहानी सुनाते हैं सिकंदर का मुक्कदर बदलता है तब अच्छे दिन आते हैं । 

असली बेशकीमती लाल चोरी नहीं हुए लेकिन खो गए हैं लगता है उन्होंने खुद अपनी कीमत नहीं समझी है और आधुनिक युग का जोहरी जिस भी कांच के टुकड़े को किसी पत्थर को हीरा घोषित करता है उसी को बादशाह अपने ताज पर जगह दे कर अनमोल बना देते हैं । मेरी इक ग़ज़ल का शेर है , अनमोल रख कर नाम खुद बिकने चले बाज़ार में , देखो हमारे दौर की कैसी कहावत बन गई । ये इसलिए बताना पड़ा है क्योंकि अनमोल उस को कहते हैं जिस की कोई कीमत नहीं लगा सकता हो , जब आप खुद बिकने चले आये इस दुनिया के चोरबाज़ार में तब अपनी कीमत खुद आपने गंवा दी है । रहिमन हीरा कब कहे लाख टका मेरो मोल । संसद विधायक दौलत के तराज़ू में टके सेर भाव से बिकने लगे हैं , जनता ने चुना था उसके अधिकार की बात करेंगे मगर उन्होंने खुद अपना अधिकार गिरवी रख छोड़ा सदन का नेता चुनने का । जो बिक गया वो ख़रीदार नहीं हो सकता , बाज़ार का दस्तूर है कैसे समझाऊं । कॉमेडी के नाम पर आपत्तिजनक बातें करने पर सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान लिया है जैसे ठीक उसी तरह जनहित की राजनीति को छोड़ बंदरबांट से लेकर मनोनयन की नीति की प्रणाली पर भी अदालत को ध्यान देना चाहिए अन्यथा चुनाव आयोग की कोई अहमियत नहीं बचेगी और न ही संसदीय विधायी प्रणाली का कोई महत्व रहेगा । सत्ता की राजनीति का कूड़ा कर्कट भी गंगा जमुना की तरह साफ़ करना अनिवार्य है संविधान का महत्व तभी समझ आएगा । कॉमेडी से समाज देश का भला नहीं हो सकता , भूखे भजन न होय गोपाला ।
 
अब मेरी लिखी ग़ज़ल पूरी पेश है । 

खामोश रहना जब हमारी एक आदत बन गई ( ग़ज़ल ) 

          डॉ लोक सेतिया "तनहा"

खामोश रहना जब हमारी एक आदत बन गई
हर सांस पर पहरे लगाना सब की चाहत बन गई ।

इंसान की कीमत नहीं सिक्कों के इस बाज़ार में
सामान दुनिया का सभी की अब ज़रूरत बन गई ।

बेनाम खत लिक्खे हुए कितने छुपा कर रख दिये
वो शख्स जाने कब मिले जिसकी अमानत बन गई ।

मतलूब सब हाकिम बने तालिब नहीं कोई यहां
कैसे बताएं अब तुम्हें ऐसी सियासत बन गई ।

( मतलूब=मनोनित। तालिब=निर्वाचित )

अनमोल रख कर नाम खुद बिकने चले बाज़ार में
देखो हमारे दौर की कैसी कहावत बन गई ।

सब दर्द बन जाते ग़ज़ल , खुशियां बनीं कविता नई
मैंने कहानी जब लिखी पैग़ामे-उल्फ़त बन गई ।

लिखता रहा बेबाक सच " तनहा " ज़माना कह रहा
ऐसे  किसी की ज़िंदगी कैसी इबादत बन गई ।  
 

 





फ़रवरी 18, 2025

POST : 1947 सल्तनत का सुल्तान ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

        सल्तनत का सुल्तान ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

सियासत की चाल सीधी नहीं होती तिरछी टेड़ी होती है , जनता विधायक कैसे कैसे लोगों को चुन देती है , विधायक सांसद मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री चुनने लगे तो अंजाम क्या हो , यही सोचकर सदन का नेता सदन के सदस्य चुनने का जोख़िम नहीं उठाया जाता , संविधान खामोश रहता है कुछ नहीं कह सकता । आधुनिक संदर्भ में इक नई कहानी लिखनी पड़ेगी । राजतिलक की पुरानी रस्म को शपथ ग्रहण नाम दिया गया है शपथ खाई जाती है निभाई कभी नहीं जाती है । राजमुकट सुरक्षित रखा गया था लेकिन जब आवश्यकता पड़ी तो राजमुकट अपनी जगह नहीं मिला , सुरक्षाकर्मी तलाश करने लगे और आखिर इक पेड़ पर इक बंदर उसे लिए मिल ही गया । किसी ने बचपन की कहानी याद दिलवाई कि किसी की टोपी बंदर पहने बैठा था पेड़ पर तब तरकीब लगाई अपनी टोपी उतार कर फैंक दी तो बंदर ने भी नकल करते हुए वही किया । शाहंशाह ने अपना ताज सर से उतार कर धरती पर रखा लेकिन बंदर ने तब भी राजमुकट पहने रखा , अचानक बंदर की बंदरिया आई और धरती से ताज उठाकर झट से पेड़ की टहनी पर झूलने लगी । 
 
जैसे ही इक बंदर ने जाकर जंगल में सभी को ये समाचार सुनाया सभी बंदर उसी राजधानी के बाग़ में जमा होकर नाचने झूमने लगे । कुछ ऐसा लग रहा था जैसे सल्तनत का सुल्तान इक बंदर को बना दिया गया है और उसकी बंदरिया को रानी घोषित किया गया है । अभी तलक थोड़ा संशय था अब निर्धारित हो गया है कि आधुनिक शासन बंदरबांट का है इसलिए बंदरों का तख़्तो - ताज पर पहला अधिकार है रामायण काल में बंदरों का शासन रहा था कि नहीं इस सदी में बंदरों की उपेक्षा कोई नहीं कर सकता है । बिल्लियां शेर को सबक पढ़ाती रहीं और बंदर बिना किसी से राजनीति सीखे शिखर पर पहुंच गए ऐसी इक छलांग दिल्ली में ही लगाना दुनिया को हैरान करता रहा । फिर से इक बार इक बंदर ने सूरज को निगल लिया था बड़ी मुश्किल से रिहाई संभव हुई है । 

अभी भी लोग यकीन नहीं कर पाये हैं जिनको मसीहा समझते रहे वही क़ातिल निकला , भला ऐसे भी किसी को कोई ठुकराता है जिस से बेपनाह मुहब्बत की बातें की हों । दिल्ली की गलियां छोड़ कर कोई जाये भी कहां जाकर सुकून ढूंढे नहीं कोई भी ठिकाना दिल से निकलने वालों का दिल की किताब पढ़ना छोड़ दिया कब से ज़माने ने । उम्र गुज़रती थी कभी दिल लगाने में कितना लुत्फ़ था रूठने और मनाने में , ज़िक्र तक नहीं अपना उनके अफ़साने में जिनका बसेरा था इस दिल के आशियाने में । बंदर जब सत्ता पर विराजमान होते हैं सच कहें बड़े महान होते हैं पहचान उनकी बड़े बलवान होते हैं हाथ में तलवार हो तो उसी का सर कटता है जिस पर बड़े मेहरबान होते हैं । दुनिया में ऐसे भी नादान होते हैं जिनकी आह में कितने तूफ़ान होते हैं । आखिर इक मदारी को बुलवाया गया , भीड़ भाड़ में उसका मजमा सजाया गया । बंदर बंदरिया का शादी करने का खेल रचाया गया तब जाकर उनसे राजमुकट और ताज उतरवाने को दूल्हा दुल्हन बना मनवाया गया । मदारी को मंत्रीमंडल में शामिल कर उसका आभार जताया गया । 




 

फ़रवरी 17, 2025

POST : 1946 ग़ाफ़िल कहता ग़ाफ़िल की बात ( हास्य व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

 ग़ाफ़िल कहता ग़ाफ़िल की बात ( हास्य व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

 
दिल ही समझा ना है दिल की बात 
लहरों से होती क्या साहिल की बात ।
 
दर्द अपना किसे बताएं लोग जब अब  
मुंसिफ़ ही कहता है क़ातिल की बात ।  

दिल्ली में कोहराम मचा हुआ है कोई
कीचड़ से सुन कर कमल की बात । 

जमुना का पानी रंग बदलता नहीं कभी  
मछलियां जब करती जलथल की बात ।
 
आई डी दफ़्तर में रखा है सर का ताज़
यही पुरानी आज बनी इस पल की बात ।
 
गूंगों बहरों की बस्ती में होता शोर बहुत 
यही है दिल्ली की हर महफ़िल की बात ।  
 
 
 Delhi New CM: Who Will Be the Next CM? Delhi Election Results & Latest  Updates in Hindi | कौन बनेगा दिल्ली का मुख्यमंत्री? | Jansatta
 


 

फ़रवरी 09, 2025

POST : 1945 दिल्ली की गलियां चौबारे ( दिल से दिल तलक ) डॉ लोक सेतिया

  दिल्ली की गलियां चौबारे ( दिल से दिल तलक ) डॉ लोक सेतिया 

दिल्ली छोड़ कर कौन जाता है ग़ालिब सच कहते हैं लेकिन मैंने खुद कितनी बड़ी नादानी की 1980 में बिना सोच विचार दिल्ली को अलविदा कह वापस अपने शहर गांव चला आया ।  कभी किसी से कोई शिकायत नहीं की पर आज सोचा ये बताना ज़रूरी है , दिल्ली में रहने वाले का ठप्पा चिपक जाए तो आदमी घर का रहता है न घाट का । शहर से बाहर पहले पांच साल पढ़ाई की खातिर रोहतक रहना पड़ा फिर दिल्ली जाकर ठिकाना बनाया सात साल तक खूब बड़े ही सलीके से ज़िंदगी का लुत्फ़ उठाया । नासमझी कहें चाहे नसीब की बात दिल्ली को छोड़ना ही नहीं बाद में कोशिश कर भी दिल्ली नहीं जा पाना हमेशा इक कसक दिल में रही है । आजकल क्या मिलता है मुझे नहीं मालूम लेकिन तब मुझे जो चाहिए था जीवन में प्यार वो सिर्फ दिल्ली से मिला कभी कहीं से नहीं मिला उम्र भर तलाश करता रहा । इसलिए मुझे दिल्ली कोई महानगर नहीं मुझे अपनी महबूबा लगती है बड़ी ही दिलकश और हसीन गलियां बाज़ार चौबारे और कितने प्यारे प्यारे दोस्त कई रिश्ते नाते इतना सब उस शहर के सिवा कहीं नहीं मिला आज तक । दिल्ली सिर्फ देश की राजधानी नहीं है देखा जाये तो दिल्ली में पूरा हिंदुस्तान समाया हुआ है दिल्ली ने सभी को अपनाया हुआ है । कभी शासक बाहर से आते थे दिल्ली को लूटते थे लौट जाते थे लेकिन धीरे धीरे दुनिया भर से मतलबी लोग इस नगरी में आकर दिल्ली से सब कुछ हासिल करने के बाद भी दिल्ली की बुराई करते हुए संकोच नहीं करते लेकिन रहते यहीं हैं । दिल्ली के साथ ये छल ऐसा व्यवहार करने वाले कभी दिल्ली के नहीं बन सकते हैं । वास्तव में अधिकांश लोग दिल्ली को समझ ही नहीं पाते हैं जैसे लख़नऊ कोलकाता मुंबई चंडीगढ़ जैसे शहरों को निवासी समझते ही नहीं बल्कि उनका वास्तविक स्वरूप कायम रखते हैं । ये कसूर किस का कहना कठिन है लेकिन आज जैसी दिल्ली बन गई है वैसी दिल्ली की कल्पना कभी किसी ने नहीं की थी । 
 
जितने साल मैं रहा दिल्ली में मैंने जितना दिल्ली को देखा समझा कभी किसी और जगह को शायद ही जाना है इसलिए 73 साल की ज़िंदगी में दिल्ली में बिताये सात साल मुझे सबसे महत्वपूर्ण खूबसूरत और शानदार लगते हैं । मेरी ज़िंदगी की कहानी बिना दिल्ली के लिखी ही नहीं जा सकती है , उस दिल्ली का हर कोना मैंने देखा है किसी गंदी बस्ती से लेकर लुटियन ज़ोन में राष्ट्र्पति भवन और मुगल गार्डन तक । कभी कभी ऐसा भी हुआ है कि किसी ने मुझसे कहा कि आपके पीछे पीछे हम दिल्ली चले आये और खुद आप ही छोड़ गए दिल्ली को । मैं लगता है जैसे कोई बंजारा कभी कहीं कभी कहीं जाता रहता है लेकिन बंजारा किसी शहर से दिल नहीं लगाता है जैसा मैंने दिल लगाया और दिल हमेशा उसी शहर में रहा । दिल अभी भी वहीं जाने को व्याकुल रहता है कैसे समझाऊं दिल को कि अब वहां कौन है जो मुझे अपनाएगा । कहते हैं जिसकी हसरत हो नहीं मिलने पर कशिश रहती है मिल जाए तो बात वैसी नहीं रहती लेकिन मुझे तो दिल्ली ने खुद बुलाया था हासिल था सभी फिर भी दिल्ली से बिछुड़ना पड़ा कौन इस को समझेगा बताएगा ये मुहब्बत क्या है । यूं मैंने कभी भी कोई ऐशो आराम कोई शान ओ शौकत कभी नहीं चाही न ही पाई भी लेकिन इक ऐसी ज़िंदगी जिस में कोई बंधन कोई शर्त नहीं हो मनमौजी की तरह खुश रहना मुझे बस सिर्फ वही पसंद थी जो दिल्ली में ही मिली मुझको । 
 
करोलबाग़ से चांदनी चौक तक की रौनक की यादें हैं तो हर दिन अलग अलग जगह लगने वाली मार्किट जिस में सभी कुछ मिल जाता है भी याद है । कभी कभी लगने वाले मेले में दोस्तों संग जाना कभी मंडी हाउस जाना नाटक देखने कितने ही यादगार पल हैं , लेकिन सबसे बढ़कर रामलीला मैदान में जाकर लोकनायक जयप्रकाश नारायण जी का भाषण सुनना 25 जून 1975 को जिस ने जीवन को इक नई दिशा दिखाई मेरी ज़िंदगी को इक मकसद से जोड़ने का कार्य किया । सच तो ये है कि मैं जैसा हूं मुझे बनाने में दिल्ली में गुज़ारे कुछ साल उसकी नींव हैं , मेरी जड़ें उसी धरती से जुड़ीं हुई हैं आज भी । प्यार क्या होता है और किस से कैसे होता है नहीं मालूम लेकिन मुझे दिल्ली से बेइंतहा प्यार है ।  दुनिया में दिल्ली जैसी कोई और जगह शायद ही कहीं हो मुझे तो लगता है कोई और शहर दिल्ली नहीं बन सकता , मेरी प्यारी दिल्ली को सलाम । 
 

 
 
 


 
  

फ़रवरी 08, 2025

POST : 1944 आम आदमी पार्टी की पराजय का अर्थ ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

 आम आदमी पार्टी की पराजय का अर्थ ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

दस साल पहले 12 फरवरी 2015 को उनकी जीत का राज़ समझने को पोस्ट लिखी थी , दस साल बाद उन्हीं की पराजय का अर्थ समझने की आवश्यकता है । आम कहलाना आसान था आम बनकर रहना बेहद कठिन था बस आप कभी अपने नाम पर खरे नहीं उतर पाए खुद को ख़ास नहीं बल्कि खास से भी थोड़ा ऊपर समझने लगे थे । सभी मापदंड सभी कायदे कानून दुनिया भर के लिए खुद पर कोई बंधन नहीं मान कर मनमानी करने की छूट की आदत ने आपकी राजनीति को बदलने की सोच की बात को कभी गहराई तक जाने नहीं दिया तभी आपका पौधा फ़लदार नहीं हुआ , ज़रा से हवा चलते ही ज़मीन पर गिर गया इरादों की परिपक्वता की कमी से । पहाड़ की ऊंचाई आपने बिना किसी परिश्रम हासिल कर ली जैसे कोई जादुई अलादीन का चिराग़ मिल जाये और हुक्म मेरे आका कहते ही असंभव कार्य संभव कर दे । लेकिन ये खेल तमाशा वास्तविक नहीं होता है इक धोखा होता है क्योंकि आपको कोई जादुई चिराग मिला नहीं था जिस से आप कुछ भी कहते होता जाता इसलिए कभी न कभी जनता को समझ आना ही था । कभी आप बंदर की तरह बिल्लियों में रोटी बांटने वाले बन कर सारी रोटी खुद खाते गए लेकिन समय बदलते ही कोई और उसी तरह बंदर बन कर आपका हिसाब बराबर कर गया है । कहते हैं कर्मों का परिणाम सामने आता है बस लोग समझते नहीं हैं कि बोया पेड़ बबूल का आम कहां से खाय । आम तो मौसम बदलते साल बाद वापस पेड़ पर लगने लगते हैं लेकिन राजनीति में जब कोई ख़ास हो जाता है फिर से साधारण बनना असंभव होता है ।
 
आप कैसे थे कैसे इतने बदले की लोग आपको पहचानते ही नहीं भला इतने रंग कोई बदलता है गिरगिट भी हैरान है आपकी ज़ुबान है या कोई बेसुरी तान है । जिधर देखो किसी की झूठी शान का यही हाल है जिस का हर चाहने वाला हुआ लहूलुहान है । जान है तो जहान है खोया आपका ऊंचा आसमान है धरती पर कोई आपका नाम है निशान है कोई खुदा आप पर क्या मेहरबान है इक बस्ती जिस में रहता आम इंसान है कोई झौपड़ी है कच्चा मकान है । अपने देश में आम जनता का यही बसेरा है आपको लगता अंधेरा भी कोई हुआ सवेरा है चार दिन का डेरा है क्या तेरा मेरा है , लूटने का कारोबार आजकल की राजनीति है कौन चोर कौन डाकू सबकी आती बारी है । दल कोई जीतता कोई हारता है जनता हमेशा ही हारी है हार कर भी जनता मानती हार नहीं लोकतंत्र से उसकी सच्ची प्रीती है । चुनाव की घड़ी में जनता की परीक्षा होती है , सामने कुंवां पीछे खाई दिखाई देती है कौन समझेगा हमने क्या क्या आज़माया है जिस पर यकीन किया उसी से धोखा खाया है ।  दूल्हा कौन नहीं जानती दुल्हन बेचारी , बिछुड़े संगी सहेलियां सारी बजने लगी है कोई शहनाई पहले होगी विदाई , गृहप्रवेश की रस्म निभाई , लेकिन ये बंधन है अस्थाई कैसे कहे बता मेरी माई सत्ता किसी की सगी नहीं होती है शासक होते हैं हरजाई । कविता जाने किसने समझी किसने समझाई पढ़ना आप भी लिखी लिखाई ।
 
 

चुनावी आंकड़ों का बाज़ार ( हास्य-कविता ) डॉ लोक सेतिया 

कितना अनुपम है , हर दल का इश्तिहार , 
जनता का वही ख़्वाब सुहाना , सच होगा 
देश की राजनीति का बना पचरंगा अचार
नैया खिवैया पतवार चलो भवसागर पार । 
 
देख सखी समझ आंख मिचौली की पहेली 
सत्ता होती है , सुंदर नार बड़ी ही अलबेली 
सभी बराबर अब राजा भोज क्या गंगू तेली 
मांगा गन्ना देते हैं गुड़ की पूरी की पूरी भेली ।
 
अपना धंधा करते हैं जम कर के भ्र्ष्टाचार
हम जैसा नहीं दूसरा कोई सच्चा ईमानदार 
दोस्त हैं दुश्मन , सभी हम उनके दिलदार 
दुनिया सुनती महिमा , अपनी है अपरंपार ।
 
छोड़ दो तुम सभी अपनी तरह से घरबार
इस ज़माने में ढूंढना मत कभी सच्चा प्यार 
अपने मन की करना , सोचना न कुछ तुम 
बड़ा मज़ा आता है कर सबका ही बंटाधार । 
 
हमने मैली कर दी गंगा यमुना सारी नदियां 
पापियों के पाप धुले कहां नहलाया सौ बार 
डाल डाल पर बैठे उल्लू , पात पात मेरे यार 
खाया हमने सब कुछ नहीं लिया पर डकार । 
 
अपने हाथ बिका हुआ है आंकड़ों का बाज़ार 
अपना खेल अलग है , जीतने वाले जाते हार 
काठ की हांडी हमने देखी चढ़ती बार-म-बार 
कौन समझा कभी जुमलों की अपनी बौछार ।     
 
अपना रोग लाईलाज है कौन करेगा क्या उपचार 
जितनी भी खिलाओ दवाई कर लो दुआएं भी पर 
कुछ असर नहीं होता हम को रहना पसंद बिमार 
बदनसीब जनता का ख़त्म नहीं होता इन्तिज़ार । 
 
 विदाई के बाद के रीति रिवाज जब बहू नए घर आती है: Griha Pravesh Tips -  Grehlakshmi

फ़रवरी 04, 2025

POST : 1943 विश्व आर्थिक मंच का विषकन्या प्रयोग ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

   विश्व आर्थिक मंच का विषकन्या प्रयोग ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया  

( ख़बर से सनसनी मची है कि डब्ल्यू ई एफ की वार्षिक बैठक में बेहद महत्वपूर्ण आयोजन में 2025 की सभा में 130 देशों के 3000 से अधिक दुनिया भर के नेताओं और अमीरों ने हिस्सा लिया जिस में जिस्मफ़रोशी की पार्टियों में 9 - 9 करोड़ में लड़कियां बुक करवाई गईं । भारत इस दौरान वैश्विक उद्यमियों से 20 लाख करोड़ से अधिक की निवेश प्रतिबद्धताएं हासिल करने में सफल रहा पांच केंद्रीय मंत्री और तीन राज्यों के मुख्यमंत्री भारत देश से अब तक के सबसे बड़े प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करने गए थे । ) 
 
पुराने ज़माने में राजा लोग दुश्मन से दुश्मनी निकालने को विषकन्याओं का उपयोग किया करते थे अपने दुश्मन को खूबसूरत महिलाओं का उपहार भेजते जो विष शरीर के अंगों पर लगा अपना काम किया करती थी । राजा रियासत नहीं जागीर नहीं आजकल सरकार मंत्री और धनवान कारोबारी उद्योगपति बड़ी बड़ी कंपनियों के मालिक धंधा बढ़ाने को क्या नहीं करते हैं । कोई ऐसा भी है जिसने खुद को छोड़ सभी को नकली घोषित किया हुआ है सिर्फ मीडिया को विज्ञापनों से खरीद कर अपना झूठ बेच रहा है सच का लेबल लगाकर । अब भारत सरकार जनता को अन्य वर्गों को अनुदान सहयोग अथवा करोड़ों को अनाज भी देती है तो पैसा देश की जनता से वसूले करों से खज़ाने से खर्च किया जाता है लेकिन तस्वीर किसी एक राजनेता की लगाई हुई जतलाती है जैसे वही दानवीर है । इधर पुरानी परंपराओं आदर्शों और धर्म दान कर्म का बड़ा शोर है , चलो इक बार फिर से इक शासक की वास्तविक मिसाल की घटना को समझते हैं ।
 

रहीम और गंगभाट संवाद : - 


इक दोहा इक कवि का सवाल करता है और इक दूसरा दोहा उस सवाल का जवाब देता है । पहला दोहा गंगभाट नाम के कवि का जो रहीम जी जो इक नवाब थे और हर आने वाले ज़रूरतमंद की मदद किया करते थे से उन्होंने पूछा था :-
 
' सीखियो कहां नवाब जू ऐसी देनी दैन
  ज्यों ज्यों कर ऊंचों करें त्यों त्यों नीचो नैन '।
 
अर्थात नवाब जी ऐसा क्यों है आपने ये तरीका कहां से सीखा है कि जब जब आप किसी को कुछ सहायता देने को हाथ ऊपर करते हैं आपकी आंखें झुकी हुई रहती हैं । 
 
रहीम जी ने जवाब दिया था अपने दोहे में :-
 
 ' देनहार कोउ और है देत रहत दिन रैन
  लोग भरम मो पे करें या ते नीचे नैन ' ।
 
आपने आजकल के ऐसे अमीरों के चर्चे सुने हैं लेकिन उनकी अमीरी की वास्तविकता सभी से छुपी रहती है । नहीं ये कोई तकदीर का खेल नहीं है , अभी किसी ने विवाह पर हज़ारों करोड़ खर्च किए जिसकी चर्चा हुई लेकिन उस आयोजन में कोई ऐसा भी विदेशी नाचने वाला बुलवाया गया था जो अश्लील भाव भंगिमाओं से महिलाओं का मनोरंजन करने को बदनाम है । आपको अचरज नहीं होता जब वही लोग धर्मं ईश्वर पूजा अर्चना भी ऐसे ही शानदार आडंबर पूर्वक करते हैं । कुछ कार्य आस्था प्रकट करने को निजि व्यक्तिगत होते हैं और कुछ विवाह समारोह में सभ्यता पूर्वक आयोजित करने को । लेकिन आजकल हर कोई प्रचार को पागल होकर उन का भी प्रचार करते हैं जो कोई गर्व की बात नहीं हो सकती है । 
 
आज़ादी के 77 साल बाद अधिकांश जनता को अधिकार बुनियादी सुविधाएं शिक्षा स्वास्थ्य नहीं देकर खैरात में पांच किलो अनाज बांटना किसी की तस्वीर नाम लगाकर लोकतंत्र कदापि नहीं है । कहते हैं दुनिया के सबसे पुराने दो कारोबार हैं राजनीति और वैश्यावृति । आधुनिक काल में ज़िस्म से ईमान तक बिकते हैं , टेलीविज़न अख़बार मीडिया बिकाऊ हैं सत्ता है ही घोड़ा मंडी कीमत मिलते सभी दलबदल लेते हैं । सवाल होना चाहिए था अर्थव्यवस्था का चर्चा हुई रंडीबाज़ार बनाकर समझ आया कि जिस को सभी कुछ चाहिए खुद को बेच दे अथवा हाथ फैलाये भीख मांगता रहे । जो चोर लुटेरे हैं साहूकार मालिक बनकर दानवीर कहलाते हैं खुद अपनी कमाई से धेला खर्च नहीं करते हैं । फिल्म वाले हिंसा नग्नता का धंधा कर मालामाल होकर गर्व करते हैं समाज को गंदगी परोस गलत दिशा दिखलाकर ।  अपना कर्तव्य अपना धर्म भूलकर सभी जनता को कर्तव्य और धर्म देशभक्ति का सबक पढ़ाते हैं जिस का कुछ भी खुद नहीं समझ पाते हैं । जो दवा केनाम पे ज़हर दे उसी चारागर की तलाश है , मिल गए कितने ऐसे नीम हकीम कैसे कैसे रूप बना बहरूपिये ।
 
 
आखिर में शायर अख़्तर नज़्मी जी का इक शेर ज्यादा आया है :-
 

वो ज़हर देता तो सब की निगाह में आ जाता ,

सो ये किया कि मुझे वक़्त पर दवायें न दीं ।