फ़रवरी 27, 2026

POST : 2060 भगवान की मर्ज़ी ( व्यंग्य - कथा ) डॉ लोक सेतिया

        भगवान की मर्ज़ी ( व्यंग्य - कथा ) डॉ लोक सेतिया  

ख़लबली मची है धरती लोक में नहीं उस परलोक में जिस में रहते हैं भगवान और सभी देवता देवियां जिनको विधाता ने बनाया हुआ है दुनिया का कामकाज उसकी देखभाल और विधि का विधान चलाने की खातिर । विकट समस्या उतपन्न हो गई है जब भगवान ने घोषणा कर दी है कि वह अपने पदभार से निवृत हो रहे हैं । आपको अगर लगेगा कि तब उनकी जगह किसी और को ये अवसर मिलने वाला है तो आप कुछ भी नहीं जानते हैं जब देवी देवताओं को बनाने वाला भगवान खुद भगवान नहीं रहेगा तब अन्य सभी कुछ और बनना तो दूर जो बनाए गए हैं उस से भी वंचित होकर अपना अपना अस्तित्व खो बैठेंगे । नारद मुनि अकेले ऐसे हैं जो भगवान से बिना संकोच वार्तालाप कर सकते हैं , नारद जी बोले लगता है अपनी पत्नी संतान से कोई कहासुनी हुई है जिसकी सज़ा हम सभी देवी देवताओं से लेकर अपने प्रिय भक्तजनों को देने की बात कर रहे हैं । भगवान हमेशा हंसते थे नारद जी की बात से उनकी चिंता मिट जाया करती थी लेकिन आज भगवान के मुखमंडल पर हंसी नहीं गहरी उदासी दिखाई दे रही है । नारद जी समझ गए माजरा कुछ और है जो हमेशा की तरह किसी न किसी ढंग से उपाय करने से बात बन जाती रहती थी से गंभीर है । नारद जी बोले प्रभु अपने निर्णय पर पुनर्विचार करें अन्यथा अनर्थ हो जाएगा आपके बगैर कोई भी कैसे रह पाएगा । भगवान कहने लगे मेरा निर्णय अंतिम है और बदल नहीं सकता है , आपको भी मेरे भरोसे नहीं रहना चाहिए खुद अपने आप पर भरोसा रखना चाहिए । नारद जी ने कहा भगवन आप भी समझते हैं जानते हैं कि आप हम सभी को देवी देवता इंसान को आदमी औरत से लेकर कण कण को क्या से क्या बना सकते हैं । पेड़ पौधे पशु पक्षी जानवर कीड़े मकोड़े से पत्थर तक को कुछ भी बनाते हैं जल थल हवा सभी आपके आदेश से बनते हैं बिगड़ते हैं । कोई भी आपको कैसे बना सकता है ये कल्पना करना भी संभव नहीं है , अचानक प्रभु ने आखिरी इक करामात दिखलाई ताकि सभी को वास्तविक कारण समझाया जा सके । 
 
भारतभूमि पर कुछ लोग टीवी चैनल सोशल मीडिया से सभाओं में शहर शहर गांव गांव बस्ती बस्ती जगह जगह लगाए इश्तिहारों प्रचार प्रसार में साबित कर रहे नज़र आने लगे कि कोई आदमी भगवान से भी बढ़कर लोकप्रिय है । उसको बनाने वाली जनता उसको हटाने की बात सोच भी नहीं सकती है बोलना तो जैसे अक्षम्य अपराध है , जिस दल की सरकार है उस में सभी जानते हैं मानते हैं समझते हैं कि वही असली सरकार हैं उनके बगैर सभी सांसद सभी विधायक सभी मंत्री दल के सभी पदाधिकारी सदस्य कुछ भी नहीं हैं उनके खेल खिलौने हैं । कब किस का अस्तित्व ख़त्म हो जाये सिर्फ उनकी मर्ज़ी है , न्यायालय के न्यायधीश से चुनाव आयोग के आयुक्त तक हर ख़ास बड़े बड़े पद पर उनकी पसंद से लोग नियुक्त होते हैं कभी कोई पसंद का नहीं बन भी जाता है तो कुछ भी कर नहीं सकता अथवा त्यागपत्र देने की नौबत आ सकती है । जिनको शोर मचाना आता है उन्होंने अपना ईमान उनको बेच दिया है और अपना मालिक उनको समझ कर उनकी वंदना गुणगान कर बदले में मनवांछित वरदान पाते हैं । आजकल भारत देश में करोड़ों लोग उन्हीं के भक्त कहलाते हैं उनको हर बात पर सर झुकाते हैं उन जैसा कोई नहीं हुआ कोई दुनिया भर में नहीं है यही समझते हैं समझाते हैं । ऐसे भगवान ने अपने खास लोगों को क्या से क्या नहीं बना दिया है , लोग कभी नहीं देखते समझते उसने अपनी हसरत पूरी करने की चाहत में सब बना बनाया मिटा दिया है । अपना नाम हर जगह अंकित करवा खुद को अजर अमर बनवाने को हरा भरा गुलशन उजड़वा दिया है । उनके बनाये हुए भगवान रोज़ अपने रंग ढंग दिखलाते हैं सावन के अंधे भक्त हैं रात को दिन अंधेरे को उजाला बताते हैं । भगवान क्या कहना चाहते हैं सभी देवी देवताओं को समझ आ गया है असली भगवान से बढ़कर नकली भगवान दुनिया में छा गया है , भगवान भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते हैं संख्याबल में किस के अनुआई साथ नहीं छोड़ते किस को छोड़ देते हैं आर्टिफीसियल इंटेलिजेन्स से इसका नतीजा सामने आ गया है । जब लोगों ने असली भगवान से बढ़कर इंसान को नकली भगवान बनाकर उसी पर भरोसा करना शुरू कर दिया है तब पहले के वास्तविक भगवान से रिश्ता बचा ही कहां है ।     
 
 ग्राम प्रधान ने दिया त्यागपत्र, व्यक्तिगत कारणों का हवाला - Youth India News

फ़रवरी 20, 2026

POST : 2059 आता नहीं झूठ बोलना जानते चोरी करना ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

       आता नहीं झूठ बोलना जानते चोरी करना  ( हास-परिहास ) 

                                     डॉ लोक सेतिया  

सत्यवादी हरीशचंद्र जी के वशंज कहलाते हैं , सत्य ही ईश्वर है की रट हम लगाते हैं , लेकिन अभी तक भी झूठ बोलने का सलीका नहीं आया है , जब भी बोलते हैं पकड़े जाते हैं । झूठ बोलने से कोई पाप नहीं लगता है कहते हैं जिस झूठ से किसी की चाहे खुद की ही भलाई हो उस से पाप नहीं लगता पुण्य समझते हैं । हम धर्मात्मा बनकर झूठ की कथा बांचते हैं सुनने वालों को मोह माया से बचने की बात करते हैं खुद मायाजाल में फंसते जाते हैं । झूठ का सागर बहुत गहरा है जो लोग डूबते हैं गहराई में पार उतर जाते हैं हीरे मोती उनकी झोली में भरते जाते हैं । हम चोर नहीं साहूकार कहलाते हैं चोरी करना अपना हुनर है दुनिया को दिखाते हैं असली चोर कभी नहीं पकड़े जाते हैं थानेदार बनकर कायदा कानून सबको समझाते हैं । कौन अपनी खामियां बताता है हर शख्स खुद को काबिल समझदार ईमानदार बतलाता है बस किसी की बात पर ऐतबार कभी किसी को नहीं आता है कोई ये बोलता नहीं समझता है झूठ बोलना सभी को खूब आता है । झूठ ही अपना सच कहलाता है सच से हमारा कभी नहीं रहता रिश्ता नाता है सच से हर शख़्स बचता है झूठ से ही दिल को चैन आता है सच कहने सुनने से दिल घबराता है । झूठ आपको मुसीबत से बचाता है सच का कोई भी ऐतबार ही नहीं करता कभी पति पत्नी से कहता है तो जाओ झूठे कहीं के सब मुझको समझ आता है । कहने का तातपर्य ये है कि झूठ हमको स्वीकार है झूठों की महफ़िल में होती जयजयकार है । झूठ दौड़ता है भागता है सभी मानते हैं कि दुनियादारी में झूठ ही चलता है सच हमेशा दिखाई देता हाथ मलता है । अदालत से लेकर संसद विधानसभाओं में सभी जगह झूठ का ही बोलबाला है सच कोई हरजाई है मतवाला है उसके लिए सभी के हाथ में कांटों की कोई माला है । झूठ का रिश्ता मधुर है बीवी का भाई साला है अपनी बहन का वही रखवाला है । सच सामने खड़ा भी दिखाई नहीं देता मुंह पर लगाया झूठ का इक ताला है आपको समझना है क्या गड़बड़झाला है । 
 
चोरी करते हैं हम सभी शान से कोई भी जगह हो घर दफ़्तर या किसी दुकान से ,  सीसीटीवी तक नहीं पकड़ पाते हैं चोरी चोरी लोग आंख मिलाते है दिल लूटते हैं आप पछताते हैं । दुनिया में हम जैसा कोई और नहीं है चोरों की नगरी में शराफ़त का चलता ज़ोर नहीं । शरीफ़ लोग शराफ़त में मारे जाते हैं असली चोर मौज करते हैं बड़े भलेमानस कहलाते हैं । भगवान जिसको हमने बनाकर कहीं बिठाया है उस ईमारत को भी चोरी के धन से बनवाया है चोरी करने बच भी जाएं तब भी हेरा फेरी से नहीं बचते हैं । हम अपने पांव ख़ामोशी से छुप कर रखते हैं खुद को छोड़ सभी पर नज़र रखते हैं । दुनिया जानती नहीं कितना बड़ा कमाल है चोरी का जितना भी माल है भरी उसी से अपनी टकसाल है । चालीस चोर इक अलीबाबा की कहानी पुरानी है आजकी दास्तान आधुनिक है सुहानी है देश का सभी कुछ कब कौन कैसे चुराता है जनता को खबर नहीं उसका अपना हमदर्द बनकर कौन उसका हक का सब खाकर दानवीर कहलाता है । चोरी की शिक्षा कलाकारी भी कहलाती है कोई विश्वविद्यालय ये हुनर सिखाता है चोरी के माल को अपना बताकर  फंस जाता है ख़बर से हैरान सभी लोग होते हैं चोरी करने में ऐसी गलती हमसे कैसे हुई है हमने दुनिया को हमेशा ठेंगा दिखाया है चोरी भी सीनाज़ोरी भी सबक सीखा है पढ़ाया है । सभी का सर चकराया है जब ऊंठ पहाड़ के नीचे आया है । 
 लोहे के मशीने कुत्ते पर आँसू बहाने से क्या होगा। यह सिर्फ़ एक यूनिवर्सिटी  की बात नहीं है, सारे शिक्षा जगत में गलघोंटिया प्रयोग चल रहा है ...

फ़रवरी 19, 2026

POST : 2058 असली की हार नकली की जीत ( व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

     असली की हार नकली की जीत ( व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया  

 
कौन समझा बनावट क्या, हक़ीक़त है क्या  
वास्तविक नहीं कुछ भी , कैसी शर्म ओ हया
नकली होशियारी सबको , लुभाने लगी अब 
वास्तविकता को , कहना ही होगा अलविदा । 
 
प्यार नकली है कारोबार भी नकली है यहां 
कितना खूबसरत लगता है नकली आस्मां  
चलो दिलदार चलो छोड़ कर असली जमीं 
बनाने लगी है दुनिया काल्पनिक इक जहां । 
 
कागज़ी फूल हैं , गुलशन है संग-ए-मरमर के   
जिस्म और जान दोनों ही अलग हो गए जब 
चांदनी चांद की , न रौशनी ही आफ़ताब की  
अब नहीं चाहिए कोई खुशबू किसी गुलाब की । 
 
सिर्फ़ छूने से सब कुछ बिखर ही गया लेकिन 
शोर कितना था नकली पर सम्मेलन का सुना 
सामना असलियत से करना पड़ेगा कभी जब 
साबित होगा बेकार बहुत बजता था झुनझुना । 
 
नकली ईमानदारी देशभक्ति भी नकली मिली 
अर्थव्यवस्था की खिलती नहीं इक भी कली 
आपकी सड़कें बंद  जनता के लिए आजकल
सरकार जी सुरक्षित रहने दो बस हमारी गली ।
 
असली कुछ भी नहीं आपने रहने दिया देश में 
मिलते रावण अब कितने ही राम जी के भेस में
सच को ज़िंदा ही दफ़्न कर दिया सभी ने जैसे 
कोई जगह देश में रही रहने को न ही परदेस में । 
 
जिधर देखते नकली का लो परचम लहरा रहा 
असली कौन है दुनिया में सभी को समझा रहा 
झूठी दुनिया की प्रीत है सुन अरे बांवरे आदमी   
कोई कबीरा आधुनिक भजन गाकर  सुना रहा ।  
 
 NDTV ai impact summit 2026 live updates day 3 itc maurya new ...
     
 

POST : 2057 मेरा दर्द न समझा कोई ( व्यंग्य - कविता ) डॉ लोक सेतिया

        मेरा दर्द न समझा कोई ( व्यंग्य - कविता ) डॉ लोक सेतिया  

 
सभी मेरे ही अपने लोग कहलाते हैं 
मिलकर मेरी वंदना को गीत गाते हैं , 
मेरी अस्मत को लूटती है दुनिया जब  
तब वो मस्ती में झूमते हैं  मुस्कुराते हैं  
खराब कितना अच्छा जिसको बताते हैं ।
 
मेरा बदन ही नहीं रूह तलक भी मेरी 
छलनी छलनी किया हर किसी ने मुझे   
मैं किस को जा कर बताऊं आप सब  
कितने ज़ालिम हैं और बेरहम हैं कितने  
मुझ पर कितने सितम बार बार ढाते हैं ।
 
दुनिया हैरान देख कर दुर्दशा को मेरी 
कौन समझता है यहां पर व्यथा को मेरी  
मुझ में रहने ही वाले ख़ुद किस तरह से  
मेरी हस्ती मिटाने की कोशिश में लगे हैं     
जाने क्या क्या तौर तरीके आज़माते हैं । 
 
चील कौवे कभी गिद्ध लगते हैं जैसे जो 
मुझे नौंचते रहते और खाते ही जाते हैं 
कितनी बदनसीब इक अबला नारी जैसी 
जिनसे रिश्ता मेरा वजूद का है वही लोग  
लाकर बाज़ार में मुझसे यूं नाच नचाते हैं ।
  
 
आप इसको मुझसे मुहब्बत बताने लगे हैं 
बांट के टुकड़ों में मेरा वजूद निशदिन ही 
नुमाईश करने को मुझे ऐसे सजाते हैं और 
खुद बिचौलिया बन बोली लगवा कर मेरी 
बेशर्म बनकर बेच कर फिर जश्न मनाते हैं । 
 
कुछ भी बोली नहीं मैं चुप चाप सदा ही रोई 
दर्द को मेरे कभी समझा नहीं यहां पर कोई 
जैसे किसी मुर्दा लाश की अर्थी है डोली भी 
कभी मेरी समाधि बना कुछ नाम रख कोई  
सर को झुकाते हैं दिया जलाते पुष्प चढ़ाते हैं ।    
 
 भारत माता – एक महाकाव्य फिल्म

 

फ़रवरी 17, 2026

POST : 2056 उन पे अश्क़ों का कुछ भी असर न हुआ ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

   उन पे अश्क़ों का कुछ भी असर न हुआ ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

उन पे अश्क़ों का कुछ भी असर न हुआ  
हमने सोचा था उन पे मगर न हुआ । 
 
जोड़ कर अपने हाथ सभी थे खड़े 
तब भी सिजदे में अपना सर न हुआ ।
 
उम्र भर घर की लोग तलाश किए 
पर मय्यसर हर एक को घर न हुआ ।
 
फ़ासला अपने बीच बहुत तो न था 
ख़त्म हम दोनों से ही सफ़र न हुआ । 
 
लोग चलने को साथ चले तो सही 
हमसफ़र कोई एक भी पर न हुआ । 
 
दी सदाएं हमने , सब को हरदम 
जो ख़ुला मिलता एक भी दर न हुआ ।
 
धूप में जलते उम्र कटी ' तनहा '
छांव देने को एक शजर न हुआ ।  
 

 
 
 
 
  
  

फ़रवरी 16, 2026

POST : 2055 खिलाड़ी ख़ास वर्ग , गेंद साधरण लोग ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

 खिलाड़ी ख़ास वर्ग , गेंद साधरण लोग  ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

कहने को सब कुछ बदला है कुछ लोगों की तकदीर बदली है , लेकिन सही मायने में समाज देश साधारण जनता के लिए हालात बदले हैं लेकिन पहले से ख़राब हुए हैं । सच तो ये है कि तमाम सामान्य वर्ग को धकेल कर हाशिये से बाहर कर दिया गया है । राजनेताओं प्रशासन अधिकारियों कर्मचारियों धनवान उद्योगपतियों अन्य बड़े सफलता हासिल कर ख़ास बड़े वर्ग में शामिल लोगों की नज़र में जनता या उसकी परेशानियों से कोई सरोकार नहीं है । ऐसे तमाम लोग खेलते हैं अपनी अपनी पसंद ज़रूरत सुविधा से कोई भी खेल जिस में उनके निशाने पर गेंद की जगह साधरण लोग होते हैं । खेल कितने हैं फुटबॉल क्रिकेट वालीबॉल टेनिस बास्केटबॉल बिलियर्ड्स इत्यादि , गेंग को ठोकर लगाना पीटना तरह तरह से खिलाड़ी करते हैं कभी गेंद की हालत बिगड़ जाती है तो बदल जाती है । राजनेताओं की राजनीति सत्ता को लेकर होती हैं देश समाज को लेकर कभी हुआ करती थी आजकल नहीं की जाती है । जब से दुनिया इक व्यौपार का बाज़ार बन गई है तब से आदर्श नैतिक मूल्य सांस्कृतिक पहचान किसी तयखाने में दबाकर रखी नहीं बल्कि दफ़ना दी गई है । हर भौतिकतावादी देश की तरह से भारतीय सभ्यता झूठी बनावटी चमक दमक से प्रभावित होकर अपनी वास्तविक पहचान अपनी विरासत को खोटे सिक्कों में तोलने को तैयार है । भारत देश का संविधान और लोकतंत्र सिर्फ किसी किताब का बाहरी आवरण बन गई है जिस के भीतर जाने कब से क्या क्या अजीब दर्ज किया जाता रहा है । मगर 140 करोड़ लोग कभी नहीं जान सकते कि हमारी वास्तविकता क्या थी और कैसे क्या से क्या बना दी गई है । सत्ता को कोई भी ऐसी किताब जनता के सामने खुलना कदापि स्वीकार नहीं है ।शासक शब्दों से डरते भी हैं जबकि उनकी तमाम जंग भी शब्दजाल ही हैं जिसे वो सभी कभी सभाओं में कभी व्यक्तव्यों में कभी सोशल मीडिया में उपयोग करते हैं ।  विदेश नीति से आर्थिक रणनीति तक जैसे कोई खेल तमाशा लगती है जिस में कौन देश कैसे किस किस देश को अपनी शतरंजी चालों में जकड़ कर मात दे सकता है और सभी बेबस परेशान हो कर भी कुछ कर नहीं सकते बेहद विवश लगते हैं । 
 
विदेश नीति पुराने संबंधों को दरकिनार कर ऐसे नये ढंग तौर तरीके पर चल पड़ी है जिस में अंदेशा है कि शायद दोबारा से अंग्रेजी शासन जैसी क्या उस से भी भयानक गुलामी का शिकंजा कसा जा सकता है । आज की विवशता और बनावटी उज्ज्वल भविष्य की धुंधली तस्वीर कोई छल साबित हो सकती है मगर शासक वर्ग की चिंता सिर्फ और सिर्फ खुद की खातिर है । देश समाज जनता की खातिर उनके पास कोई सार्थक संवाद नहीं है केवल अविश्वसनीय वादे झूठे विज्ञापन और काल्पनिक शानदार व्यवस्था 2047 तक देने की बात है ।कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक , आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक । आज़ादी के दिन पैदा हुए लोग 78 साल के हो चुके हैं सौ साल की गारंटी सरकार नहीं दे सकती है उसकी हर गारंटी झूठी है जनता को बहलाने को दी जाती है । खिलाड़ी सभी खेल में सफ़ल हो रहे हैं लेकिन चुनवी गणतंत्र के जिस खेल में जनता का जीवन दांव पर लगाया जाता है उसकी हर बार हार होती है , गरीबी भूख शिक्षा स्वास्थ्य से रोज़गार की बात छोड़ न्याय तक उसको जीते जी नहीं मिलता है । सामन्य आदमी की सुरक्षा की कोई चिंता किसी शासक प्रशासक को रत्ती भर भी नहीं है उनको अपनी ज़िंदगी से बढ़कर किसी की जान नहीं लगती है । राजनेताओं को सबसे अधिक चिंता उनकी कुर्सी की रहती है अपनी जान से भी अधिक प्यारी लगती है ।  कुर्सी का खेल ख़तरनाक साबित हुआ है हमारे लिए , क्योंकि इस खेल में खिलाड़ी किसी नियम कानून किसी आदर्श को कभी नहीं मानते बल्कि सब कुछ तोड़ने को उचित समझते हैं ।  
 
 Raag Darbari (Hard) - Hindi book by - Srilal Shukla - राग दरबारी (सजिल्द) -  श्रीलाल शुक्ल

फ़रवरी 13, 2026

POST : 2054 ईमान अपना बेच कर कुछ करोड़ में ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

    ईमान अपना बेच कर कुछ करोड़ में ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

ईमान अपना बेच कर , कुछ करोड़ में 
शामिल हुए सब लोग इस भाग - दौड़ में ।  
 
अच्छा - बुरा कोई नहीं सोचता यहां  
सारा ज़माना लग गया है जोड़ - तोड़ में ।  
 
देखो तुम्हें ये वक़्त क्या क्या दिखा रहा 
फंसते ही जाते लोग इसकी , मरोड़ में । 
 
हैरान सारा देश उनको ख़बर नहीं 
नुक़सान को कहने लगे लाभ , जोड़ में ।  
 
क्यों कर सभी को साथ लेकर चले नहीं 
अटके खड़े हैं लोग कितने ही , मोड़ में । 
 
नेता यूं करने लग गए प्यार देश को 
उठने लगी हो ख़ाज जैसे कि कोड़ में । 
 
' तनहा ' ज़माना दौड़ता हांफता यहां 
होते नहीं शामिल , कभी आप दौड़ में ।   
 

 

फ़रवरी 12, 2026

POST : 2053 सभी को स्वर्ग चाहिए ( आधुनिक व्यंग्य कथा ) डॉ लोक सेतिया

    सभी को स्वर्ग चाहिए  ( आधुनिक व्यंग्य कथा ) डॉ लोक सेतिया 

अपनी यही धरती पहले स्वर्ग से सुंदर हुआ करती थी अधिकांश लोग अच्छाई सच्चाई ईमानदारी ऊंचे आदर्शों पर चलते थे । सादगी भरा जीवन वास्तविक आचरण में नैतिकता का पालन करते थे देश समाज स्वर्ग लगता था दुनिया को शानदार बनाने की कोशिश करते थे हमारे पूर्वज । तब सभी मरने के बाद कामना करते थे मोक्ष की प्राप्ति की स्वर्ग यही है जानते थे नर्क की चिंता नहीं थी क्योंकि भले कर्म सही मार्ग पर चलना जानते थे । लेकिन हमारी बदनसीबी है कि हमने खुद अपने समाज को स्वर्ग से नर्क बनने दिया और बनाने में खुद भी योगदान देते रहते हैं । आज भौतिकता स्वार्थी स्वभाव अहंकार लोभ लालच और किसी भी तरह से सभी कुछ हासिल करने की चाहत का पागलपन जिस में अवसर मिले तो छीन लेना लूटना सामन्य बात हो गई है । यही नर्क है और हमारा देश समाज किसी भी नर्क से कम नहीं है बल्कि ऐसे नर्क की कल्पना भी हमारे पुरखों ने नहीं की होगी । हम सभी समझते हैं कि आधुनिक समय में हम समझदार बन गए हैं शायद सभी कुछ जानते हैं समझते हैं जो हमारी अज्ञानता का प्रमाण है । हम सोचते तक नहीं हैं कि हमने कैसे अपने देश को इस हद तक बर्बाद किया है कि शानदार स्वर्ग को नर्क बना दिया है , लेकिन हम इस अपनी दुनिया को फिर से अच्छा नहीं बनाना जानते न ही बनाने की कोशिश करते हैं हमने इसको स्वीकार कर लिया है कि ये खराब है और इतनी अधिक खराब है कि सुधारना संभव ही नहीं है । विडंबना ये है कि हम इस वास्तविकता को अपने झूठ और दिखावे के आडंबरों से ढकना छिपाना चाहते हैं , सोशल मीडिया से तमाम अन्य प्रकार से प्रचार प्रसार आयोजन से इक पर्दा डालने का कार्य निरंतर करते रहते हैं । हम समझते हैं विधाता से कुछ भी छिपाया जा नहीं सकता फिर भी उस ईश्वर से भी छल चतुराई करने की नासमझी करते हैं । 
 
मरना सभी को इक दिन है भले मरने की तैयारी कोई नहीं करता सभी जीना चाहते हैं मगर मौत आनी है आएगी भी सभी कामना करते हैं मर कर स्वर्ग में जगह मिलने की । स्वर्ग कोई अगर जगह होगी तब उस में प्रवेश से रहने की अनुमति तक क्या इतनी आसानी से हासिल हो जाएगी लगता तो नहीं है । जैसी भी पूंजी चाहिए होगी हमने वो कभी अर्जित की भी है जीवन में , नफरत भेदभाव सभी से हेरा फेरी ज़िंदगी भर हमने कुछ और कभी अर्जित किया ही नहीं । पाप छल कपट की झूठी नाम की शोहरत उस दुनिया में प्रवेश पाने से वर्जित ही कर सकती है । बबूल बोकर आम खाने की आकांक्षा है अपनी दुनिया को नर्कीय बनाकर किसी स्वर्ग की कामना रखना । मान लो किसी कारण हमको स्वर्ग में प्रवेश मिल भी जाए तब क्या हमको स्वर्ग की आबोहवा वहां का वातावरण पसंद आएगा , कभी नहीं हमको स्वर्ग में पल भर ठहरना कठिन लगेगा । नर्क को हमने बनाया ही नहीं उसको अपनी आदत दिनचर्या में शामिल कर लिया है । यकीन मानिए हमको उस स्वर्ग में भी अपने इस धरती के नर्क की याद आती रहेगी और इतना ही नहीं हमने विश्वास कर लिया है यही हमको सबसे शानदार लगता है इस नर्क से बिछुड़ना कोई नहीं चाहेगा । स्वर्ग मांगते हैं स्वर्ग को पसंद कदापि नहीं करते और मुमकिन है फिर किसी स्वर्ग को नर्क बनाकर पुरानी भूल दोहराना चाहते हों । स्वर्ग नर्क मोक्ष पर इक कविता पेश है श्रद्धांजलि सभा ।  स्वर्ग और नर्क की हक़ीक़त मालूम हो जाए तो मुमकिन है लोग अपना इरादा बदल कर मरने के बाद भी नर्क ही जाना चाहते हों , कविता पढ़ कर पुनर्विचार कर सकते हैं । 
 
 

श्रद्धांजलि सभा ( हास्य-व्यंग्य कविता )

 डॉ लोक सेतिया

टेड़ा है बहुत 
स्वर्ग और नर्क का सवाल 
सुलझाएं जितना इसे 
उजझता जाता है जाल ।

आपको दिखलाता हूं 
मैं आंखों देखा हाल 
देखोगे इक दिन आप भी 
मैंने जो देखा कमाल ।

बहुत भीड़ थी स्वर्ग में 
बड़ा बुरा वहां का हाल 
छीना झपटी मारा मारी
और बेढंगी थी चाल ।

नर्क को जाकर देखा 
कुछ और ही थी उसकी बात 
दिन सुहाना था वहां 
और शांत लग रही रात ।

पूछा था भगवान से 
स्वर्ग और नर्क हैं क्या 
और उसने मुझे 
ये सब कुछ दिया था दिखा ।

घबराने लगा जब मैं 
थाम कर तब मेरा हाथ 
बतलाई थी भगवान ने 
तब मुझे सारी बात ।

श्रधांजली सभा होती है 
सब के मरने के बाद 
सब मिल कर जहां 
करते हैं मुझसे फ़रियाद
स्वर्ग लोक में दे दूं 
सबको मैं कुछ स्थान 
बेबस हो गया हूं मैं 
अपने भगतों की बात मान ।

शोक सभाओं में 
ऐसा भी कहते हैं लोग 
स्वर्ग लोक को जाएगा 
आये  हैं जो इतने लोग ।

देखकर शोकसभाओं की भीड़ 
घबरा जाता हूँ मैं 
मुझको भी होने लगा है 
लोकतंत्र सा कोई रोग ।

कहां जाना चाहते हो 
सब से पूछते हैं हम 
नर्क नहीं मांगता कोई 
जगह स्वर्ग में है कम ।

नर्क वालों के पास 
है बहुत ही स्थान 
वहां रहने वालों की 
है अलग ही शान 
रहते हैं वहां 
सब अफसर डॉक्टर वकील 
बात बात पर देते हैं 
वे कोई नई दलील ।

करवा ली हैं बंद मुझसे 
नर्क की सब सजाएं 
देकर रोज़ मानवाधिकारों की दुआएं ।

बना ली है नर्क वालों ने 
अपनी दुनिया रंगीन 
मांगने पर स्वर्ग वालों को 
मिलती नहीं ज़मीन ।

नर्क ने बनवा ली हैं
ऊंची ऊंची दीवारें 
स्वर्ग में लगी हुई हैं 
बस कांटेदार तारें
नर्क में ही रहते हैं 
सब के सब बिल्डर 
स्वर्ग में बन नहीं सकता कोई भी घर ।

स्वर्ग नर्क से दूर भी 
बैठे थे कुछ नादान  
स्वर्ग नर्क मोक्ष पर इक कविता पेश है श्रद्धांजलि सभा ।
फुटपाथ पे पड़ा हुआ था 
जिनका सामान
उन्हें नहीं मिल सका था 
दोनों जगह प्रवेश 
जो रहते थे पृथ्वी पर 
बन कर खुद भगवान ।

किया था भगवान ने 
मुझसे वही सवाल 
स्वर्ग नर्क या है बस
मुक्ति का ही ख्याल ।

कहा मैंने तब सुन लो 
ए दुनिया के तात 
दोहराता हूँ मैं आज 
एक कवि की बात ।

मुक्ति दे देना तुम 
गरीब को भूख से 
दिला सको तो दिला दो 
मानव को घृणा से मुक्ति
और नारी को 
दे देना मुक्ति अत्याचार से 
मुझे जन्म देते रहना 
बार बार इनके निमित ।

मित्रो
मेरे लिये  स्वर्ग की 
प्रार्थना मत करना 
न ही कभी मेरी 
मुक्ति की तुम दुआ करना
मेरी इस बात को 
तब भूल मत जाना 
मेरी श्रधांजली सभा में 
जब भी आना ।  
 
 आज की कहानी: स्वर्ग और नरक - National Thoughts
 
 

फ़रवरी 06, 2026

POST : 2052 देश की संसद में सांसदों से खतरा ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया

     देश की संसद में सांसदों से खतरा ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया  

 शायर बशीर बद्र जी कहते हैं , बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना । मुझे हमेशा बड़े लोगों से बचकर रहना ज़रूरी लगता है , नेताओं की सभाओं में जाना सामान्य नागरिक के लिए परेशानी का सबब बन जाता है । कितनी बार वीवीआईपी लोगों का सड़क पर ख़तरनाक़ रफ़तार से निकलता वाहनों का काफ़िला हमको भयभीत करता है क्योंकि उनकी गाड़ियां अपनी साइड को छोड़ गलत साइड भी दौड़ती हैं जब सड़क पर कोई डिवाईडर नहीं होता है । अधिकारी राजनेता ही नहीं अन्य कुछ लोग भी सार्वजनिक सड़क पार्क पर कोई भी आयोजन कर किसी एम्बुलेंस की रह में बाधा पैदा कर रोगी की ज़िंदगी पर संकट पैदा करते हैं । आजकल शासक रोज़ाना सभाएं आयोजित कर अपना रुतबा ऊंचा करने को व्याकुल रहते हैं , उनको जनता की बात सुननी पसंद नहीं होती केवल जय जयकार सुनना चाहते हैं । सुरक्षा कर्मी उनकी सुरक्षा से बढ़कर इस बात को लेकर सजग होते हैं कि गलती से कोई विरोध की आवाज़ नहीं सुनाई दे । अधिकांश सभाओं में काले रंग की पोशाक से लेकर कोई कपड़ा तक लोग लेकर नहीं आएं ये देखना होता है । जनता को ये सभी कोई सुरक्षा का एहसास नहीं करवाते बल्कि भय का वातावरण पैदा करते हैं । शासकों को जनता से कोई खतरा नहीं है मगर अब उनको अपने ही साथ रहने वाले सहकर्मियों से डर लगता है ऐसा कुछ घटनाओं से मालूम हुआ है बात ख़ुदकुशी करने तक पहुंच गई है लेकिन विषय को अधिक तूल नहीं दिया गया क्योंकि ऐसा करने से जाने क्या क्या सामने आने का अंदेशा था ।  अब मामला संसद में सांसदों से सरकार तक की सुरक्षा पर पहुंच गया है जो अप्रत्याशित है ।  
 
ये साधारण बात कदापि नहीं है ये बेहद गंभीर चिंता की बात है किसी टीवी चैनल या सोशल मीडिया पर किसी की कही बात नहीं बल्कि लोकसभा के अध्यक्ष की कही बात है । लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला जी ने बताया है कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र  मोदी जी को सदन में नहीं आने का अनुरोध किया था क्योंकि उनको किसी अप्रिय घटना के घटने का अंदेशा था । संसद भवन पर आतंकवादी हमले से सांसदों को बचाने को सुरक्षा कर्मी अपनी जान पर खेलकर सफल रहे थे 13 दिसंबर 2001 को , लेकिन आज समझाया जा रहा है कि देश के प्रधानमंत्री और सदन के नेता को संसद में सांसदों से ही खतरा महसूस होने लगा है लोकसभा अध्यक्ष को ही । सबसे पहला प्रश्न तो यही है कि क्यों कैसे ऐसे सांसद निर्वाचित होकर लोकतंत्र का मंदिर कहलाने वाले संसद भवन में पहुंच गए हैं जिन से असभ्य अशिष्ट और अशोभनीय व्यवहार की आशंका हो सकती है । लेकिन उस से भी बढ़कर संसदीय मर्यादा को लेकर चिंतन की आवश्यकता है , संसद में सत्ता पक्ष और प्रतिपक्ष क्या शालीनता पूर्वक विचार विमर्श नहीं कर सकते हैं । दोष किसी एक पक्ष का नहीं है लगता है सभी ने मर्यादा की सीमाओं को लांघने में कोई संकोच नहीं किया है । खुद देश के प्रधानमंत्री ही राज्य सभा में उनसे पहले के सभी प्रधानमंत्रियों को लेकर आपत्तिजनक बातें कहते हैं और सत्तापक्ष के सभी सांसद समर्थन करते हैं । ऐसा अहंकार कभी पहले नहीं दिखाई दिया है बल्कि जिनको लेकर प्रधानमंत्री जी हमेशा आलोचना करते हुए मर्यादा की सीमा भूल जाते हैं उन्होंने अपने समय में विपक्ष को महत्व देने और आदरपूर्वक उनकी बात को सुनने का प्रयास किया था संसद में  । 
 
आज प्रधानमंत्री कहते हैं कि पहले के सभी प्रधानमंत्री देश को लेकर संजीदा नहीं थे उनकी कोई सोच नहीं थी समाज को लेकर कोई दृष्टि नहीं थी ।  जबकि उनको मालूम होना चाहिए कि लोकतंत्र की आधारशिला मज़बूत बनाने में उनकी भूमिका कितनी महत्वपूर्ण रही है । उनकी समझ उनकी मनोकामनाओं को कम आंकना किसी अपराध जैसा है तमाम नेताओं ने देश को शानदार भविष्य देने की कोशिशें की हैं । केवल सत्ता पाने की भूख तब नहीं दिखाई देती थी और न किसी को छोटा बनाकर अपना कद बढ़ाना किसी ने ऐसा किया था । नई शिक्षा आधुनिक समय के साथ कदम मिलाकर चलना जानते थे तभी गरीबी के समय भी परमाणु विज्ञान और शिक्षा स्वास्थ्य से लेकर देश में आपसी भाईचारा कायम रखने में उन सभी ने पूरी निष्ठा और देश समाज के प्रति ईमानदारी से कर्तव्य निभाया है । यहां तक की देश की आज़ादी की लड़ाई में अपना जीवन और सर्वस्व अर्पित किया है । संविधान बनाने से संवैधानिक संस्थाओं का निर्माण करने तक उनकी भूमिका और योगदान भुलाया नहीं जा सकता है । इतना ही नहीं जो लोग स्वतंत्रता संग्राम में शामिल नहीं थे बल्कि अंग्रेजी हुकूमत की सहायता करते थे उनको भी आज़ाद देश में बराबर अवसर प्रदान कर किसी भी तरह से कोई भेदभाव नहीं करना लोकतांत्रिक परंपरा स्थापित करना मकसद रहा है । आज लगता है कि जैसे कोई व्यक्ति देश समाज संविधान कानून से ऊपर दिखाई देने लगा है जिस पर कोई सवाल कोई विरोध करना सत्ता को स्वीकार नहीं है । ये तो लोकतांत्रिक संवैधानिक और मौलिक अधिकारों का हनन कहला सकता है , कोई भी राजनेता आलोचना से परे नहीं हो सकता है । शायद सभी दलों में अपराधी प्रवृति के लोग सांसद या विधायक बनकर माननीय कहलाते हैं तभी संसद में आचरण का स्तर गिरता ही जा रहा है ।  देश की राजनीति में अब आपसी विश्वास सदभावना का नितांत आभाव दिखाई दे रहा है , मगर वास्तव में डर किसी और से कम शायद खुद अपने आप से भीतर से अधिक महसूस होता है ।  शायद ही कभी किसी को सामन्य जनता के ख़ास वर्ग द्वारा कुचले जाने की घटनाओं पर कभी चिंता हुई हो उन पर अंकुश लगाने की चर्चा हुई हो , ख़ास लोगों की जान की कीमत होती है साधारण जनता तो कीड़े मकोड़े कभी अनचाहे अवरोध की तरह मसले कुचले जाते हैं । 
 
 
 May be an image of text that says "The TheStatesman tatesman Om Birla says he asked M Modi not to to attend Lok Sabha session over safety concerns"
 
 

फ़रवरी 03, 2026

POST : 2051 भगवान बना कर पछताये ( व्यंग्य - कथा ) डॉ लोक सेतिया

     भगवान बना कर पछताये ( व्यंग्य - कथा ) डॉ लोक सेतिया 

 
भगवन बनकर तू अभिमान ना कर 
तुझे भगवान बनाया हम भक्तों ने ।

पत्थर से तराशी खुद मूरत , उसे 
मंदिर में है सजाया हम भक्तों ने ।

तूने चाहे भूखा रखा हमको तब भी 
तुझे पकवान चढ़ाया हम भक्तों ने 
 

फूलों से सजाया आसन भी हमने ही 
तुझको भी है सजाया हम भक्तों ने ।

सुबह और शाम आरती उतारी है  
इक तुझी को मनाया हम भक्तों ने ।

सुख हो दुःख हो , हर इक क्षण में 
घर तुझको है बुलाया हम भक्तों ने ।

जिस हाल में भी रखा है हमको 
सर को है झुकाया हम भक्तों ने ।

दुनिया को बनाया होगा तुमने कभी  
खुद तुझी को है बनाया हम भक्तों ने । 
 
   ऊपर लिखा भजन मेरी मां माया देवी जी प्रतिदिन गाया करती थी , हम सभी को याद रहती है उनकी ये बात । लेकिन आज इसका ज़िक्र अलग  कारण से करना पड़ा है , आस्था से अलग विषय है आधुनिक युग में कोई भगवान कोई मसीहा होता नहीं है , और राजनीति में तो शराफ़त का कोई स्थान ही नहीं है । नासमझ लोग या ख़ुदगर्ज़ चाटुकार लोग जिस किसी को ऊंचाई के ऐसे शिखर पर बिठाते हैं कि भगवान ही समझने लगते हैं । बाद में उनकी वास्तविक बात सामने आने पर बगलें झांकते हैं , लेकिन तब भी अपनी भूल को स्वीकार करना कठिन होता है । सोशल मीडिया पर पुरानी कथनी अब की करनी से मेल खाती ही नहीं है और बनाये न बने बात छुपाए न बने की हालत बन जाती है ।  लेकिन शायद उस भजन में छुपी इक वास्तविकता भी उजागर हुई है , जनता जिनको ऊंचे सिंहासन पर बिठाती है शासक बनकर उसी पर मनमाने आदेश जारी कर उसको अपने आधीन रखने और स्वयं राजा महाराजा जैसा जीवन बिताते हैं । तर्कसंगत ढंग से समझें तो कोई भी किसी को भी खुद को समर्पित करता है  या आत्मसमर्पण करता है तो गुलामी करनी ज़रूरी होती है । खुद जिसको बनाया उसी की मूर्ति बनाकर वंदना करना विवशता हो जाती है , खुद भूखे नंगे रहते हैं और मूर्तियों को शानदार परिधान और तरह तरह से पकवान का भोग लगाते हैं । मंदिर में चढ़ाये फल मधुर मिष्ठान इत्यादि को पुजारी थोड़ा हिस्सा चढ़ाने वाले को प्रसाद बताकर देते हैं अधिकांश अपने लिए रखते हैं । शासक भी जनता से कर वसूली करते हैं और अधिकांश भाग खुद और प्रशासन मिलकर मौज से उपयोग करते हैं ।  भगवान को लेकर लिखी गई कथाओं ने यही परंपरा हमेशा से चलाई है । कितना अजीब लगता है कि अभी भी कुछ लोग किसी की वंदना करते हैं आंखें बंद कर जयजयकार करते हैं अपनी सोच अपनी आज़ादी को छोड़ कर भक्त कहलाते हैं किसी व्यक्ति के प्रशंसक बन कर ।  
 
आपने भगवान को लेकर जितनी कथाएं पढ़ी सुनी हैं सभी में लिखने वाले ने अपने आराध्य की हर बात को उचित ठहराने को आवश्यकता अनुसार परिभाषाएं मापदंड बदले हैं । भगवान शासक बनकर राजा कहलाते हैं मगर जिनसे संबंध रखते हैं उनकी खातिर सभी तरह से सहायता करते हैं । परममित्रों  को सहयोग देने खुद चले आते हैं किसी नारी  की लाज बचाते हैं किसी चाहने वाले  को कदम कदम सुरक्षा देते हैं । कोई  गरीब मित्र है कभी खुद उसकी खबर नहीं लेते सर्वज्ञानी होकर भी अनजान रहते हैं । जब खुद विवश हो चलकर आता है तब शायद महसूस होता है कि उसको भी बिना मांगे कुछ दे देते हैं ऐसा लोक लाज की खातिर करना पड़ा होगा । आज भी शासक अपने खास जानकर मित्रों को सभी कुछ बांटते हैं उनकी अपनी शान ओ शौकत कायम रखने को ज़रूरत पड़ती है तो नियम कानून बनते बदलते हैं । गरीब जनता की फ़िक्र कौन करता है उसको झूठे दिलासे देकर बहलाते हैं , अभी बीस तीस साल इंतिज़ार करो तकदीर बदलेगी । हज़ारों हज़ार साल लोग भगवान की आराधना पूजा पाठ भजन कीर्तन करते हैं लेकिन उस भगवान को कभी गरीबों की सुध लेना याद नहीं आया है । भगवान भरोसे बैठने से तकदीर नहीं बदली करोड़ों की , कुछ खास अमीरों पर भगवान अनुकंपा करते हैं उनको आवश्यकता से अधिक मिलता है , सब उसकी मर्ज़ी है । 
 
भगवान पर कोई शंका नहीं की जा सकती है , कथाओं लिखने वालों ने उसकी अनुचित बातों को भी सही बतलाया है । माखनचोर ही नहीं जाने क्या क्या गुणगान बनाया है , हर देवी देवता ने अपने भक्तों को वरदान देकर उनको अपराधी होने पर सज़ा से बचाया है कभी किसी को आवेश में मिटाया है । विधि का विधान ग़ज़ब है कहते हैं सब प्रभु की माया है । भगवान काल्पनिक है कि वास्तविक मालूम नहीं इक दुविधा रहती है , विधाता को सबकी खबर कहते हैं पल पल की रहती है । दुनिया में फिर क्यों उलटी गंगा बहती है समंदर की प्यास बुझती नहीं हर नदी उसी की तरफ बहती है । सरकार भी इसी अंदाज़ से कारोबार चलाती है जिनको प्यास नहीं उनकी प्यास बढ़ाती है जनता की हालत बदहाल होती जाती है । भगवान खुद बड़े बड़े आलीशान महलों में रहता है इंसान भिखारी बनकर सब दुःख परेशानी सहता है , सब पर कृपा करता है कोई बतलाता है । शायद किसी साहूकार जैसा उपरवाले का बहीखाता है  , असल से बढ़कर ब्याज चढ़ता जाता है । देश की सरकार की व्यवस्था भगवान भरोसे है जनता बेचारी भगवान को मनाते मनाते उम्र बिताती है आखिर किसी दिन हताशा निराशा की सीमा पार हो ही जाती है । दुनिया के धरती पर बनकर रहने वाले भगवानों और किसी आसमान पर रहने वाले असली भगवान सभी सुनते ही नहीं आदमी की व्यथा सुनाते हैं उपदेश और अपने महिमामंडन की कोई कथा । आख़िरी विनती है मत लेना इस बात को अन्यथा । 
 
 मैं ईश्वर को क्यों नहीं देख पा रहा/रही हूँ? - बाल सुसमाचार प्रचार फेलोशिप