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सितंबर 12, 2024

POST : 1883 अजनबी बन जाएं हम दोनों ( व्यंग्य- कथा ) डॉ लोक सेतिया

   अजनबी बन जाएं हम दोनों ( व्यंग्य- कथा ) डॉ लोक सेतिया  

सदियां पुराने दो पेड़ हैं इस वन में , इक परंपरा है नाकाम आशिक़ अपने प्यार को पाने में असफल होकर यहां आते हैं अपनी व्यथा सुनाते हैं । मान्यता है कि ऐसा करने से अगर दोनों का प्यार सच्चा है तो उनका मिलन अवश्य हो जाता है । जिस पेड़ पर लाल रंग के फूल खिले हैं प्रेमिकाओं की बात सुनता है और पीले फूल जिस पर खिले हैं वो प्रेमियों की बात सुनता समझता है । दोनों पेड़ अपने पास आये प्रेमी प्रेमिका की बात को सुनते हैं और अपना आशीर्वाद देने को उन पर इक फूल गिराते हैं जिसे प्यार की सच्चाई स्वीकार करने का प्रमाण समझा जाता है । अकेले में दोनों पेड़ अपनी शाखाओं से आपस में लिपटते हैं और लगता है कुछ वार्तालाप करते हैं शायद जो दिन भर कोई आकर उनको बता गया है उस की बात करते हैं । दूर दूर तक इन पेड़ों को लेकर कहानियां प्रचलित हैं उन सभी ने इक बात समान बताई जाती है कि ये कभी दो प्रेमी थे जिनका मिलन नहीं हुआ किसी पिछले जन्म में और पुनर्जन्म लेकर ये पेड़ बनकर इस वन में साथ साथ रहने लगे कुछ फ़ासला रख कर । कहते हैं ये भी इक सबक है कि प्यार हमेशा बना रहे इस के लिए इन की तरह थोड़ा फ़ासला रखना चाहिए , आपस में बात कर सकें देख सकें मगर इक दायरा रहे जकड़ना नहीं चाहिए इक दूजे को कभी भी । प्यार ऐसा एहसास है जिसे महसूस किया जाता है परखने की ज़रूरत नहीं होती है । प्यार को कभी किसी भी तराज़ू पर तोला नहीं जा सकता कि कौन किसी से कितना प्यार करता है । 
 
आज इक लड़की आई है पेड़ से लिपट कर अपना दर्द बताने लगी है , तुझसे लिपट कर लगता है अपनी सब से प्यारी सखी से मिल रही हूं , जैसे वो मुझे उदास देख कितने सवाल पूछ रही हो । तुम्हारी आवाज़ नहीं सुनाई देती मगर मेरे मन में अपने आप सवाल आने लगे हैं शायद उसकी तरह तुम भी मेरा दुःख दर्द समझ रहे हो मैं कुछ भी छिपाना नहीं चाहती सब बताउंगी । मेरा नाम अंजलि है कॉलेज में पढ़ती हूं हम लड़कियां महिलाएं सजती संवरती हैं बनाव श्रृंगार करती हैं सुंदर वस्त्र पहनती हैं और इक सपना देखती हैं  कि कोई दिल की गहराई से चाहने वाला कभी मिले और अपना बना कर सब उसी पर न्यौछावर कर दें । माना नारी को सभी को खूबसूरत बनाया है मगर शारीरिक नहीं भीतरी सुंदरता किसी किसी में होती है , हर लड़की शायद लड़का भी ढूंढता है उसको जो उसके सुंदर मन को देख सके और प्यार करे । इसलिए जब कोई हमको वह बात कहता है जिसे सुनने को हम व्याकुल हैं तब हमारा दिल उड़ने लगता है ऊंचाइयों को छूने को क्योंकि ऐसा प्रतीत होता है वही दुनिया में इक है जो हमारे लिए और हम उसी के लिए हैं । प्यार करने वालों के पास वही कुछ तौर तरीके होते हैं चांद तारे तोड़ लाना बिना आपके नहीं जीना जैसी बातें कहना जो काल्पनिक हैं जानते हुए भी अंतर्मन को छू जाती हैं । 
 
मुझे भी साहिल ने कहा था और मुझे उस पर विश्वास हो गया था , मैंने जैसे अपनी ज़िंदगी अपनी दुनिया सिर्फ साहिल तक सिमित कर ली थी , उसे पाकर कुछ भी और पाना बाकी नहीं रह गया था । हम सुनहरे सपनों की अपनी दुनिया में सातवें आसमान पर खुश थे । आपस में एक दूसरे को इक साधारण चांदी का छल्ला देते तो लगता ज़माने की सबसे कीमती चीज़ है । अचानक दो साल बाद साहिल बदला बदला लगने लगा है , वो विवाहित जीवन की ज़रूरतों परेशानियों पर संवाद करता है और घर बजट की चिंता पर विचार करने लगा है ।मेरा मन शादी करने से घबराने लगा है । खुले गगन में आज़ाद पंछी सी चिड़िया को पिंजरे का मंज़र सताने लगा है । साहिल कहता है विवाह ठीक से सोच समझकर करना चाहिए केवल प्यार से ज़िंदगी नहीं चलती है ।लगता है उस के प्यार में वो  पहले जैसी कशिश नहीं रही , इक ख़्वाब टूटता महसूस होने लगा है । उसकी प्रेमिका होना चाहती हूं जैसी पत्नी उसकी ज़रूरत है मेरे लिए बन पाना कठिन क्या नामुमकिन लगता है । मैंने सोचा है तो लगता है हमारा रिश्ता यहीं तक शानदार है विवाहित संबंध बनाने से प्यार बचेगा नहीं उसे जैसी संगिनी चाहिए कोई और हो सकती है । तभी इक फूल अंजलि की झोली में गिरा था और उसका अर्थ यही समझ आया था कि अंजलि का विचार सही है । अंजलि मन में कितनी उलझनें लिए आई थी मगर लौट रही थी शांत हो कर उचित निर्णय या निष्कर्ष पर पहुंच कर । 

लड़की के चले जाने के बाद दोनों पेड़ उसी की चर्चा करने लगे थे , लाल फूल वाला पेड़ कह रहा था कि आजकल की युवती युवक को सालों लगते हैं समझने में प्रेमी प्रेमिका में जो अच्छा लगता है पति पत्नी में नहीं स्वीकार कर पाते हैं । उनको पति चाहिए जिस के पास ऐशो आराम सुख सुविधा और खूबसूरत आमदनी का साधन उपलब्ध हो कोई आर्थिक भौतिक कमी नहीं होनी चाहिए , बेशक प्यार की करने की फुर्सत तक नहीं मिले । शायद इस लड़की के माता पिता ने कोई ऐसा लड़का ढूंढ लिया है जिस से शादी करने को ये हामी भर देगी और प्रेमी से किसी अगले जन्म में मिलने की बात कह भूलने भुलाने का वादा करेगी , उस लड़के की सोच क्या है कौन जाने । 

अगले दिन सुबह ही उस लड़की अंजलि का प्रेमी साहिल पीले फूलों  वाले पेड़ के पास आया था । बेहद उदास था असमंजस में लग रहा था दिल कुछ चाहता था दिमाग़ कुछ अलग समझाना चाहता था । दुविधा में कोई निर्णय लेना कठिन होता है पेड़ से मुखतिब हो बोला था दोस्त तुम ही बताओ मुझसे कहां भूल चूक हुई जो मेरी प्रेमिका ने कल मुझे प्रेम संबंध को तोड़ने की बात कही है । उसको खुश रखने को क्या क्या नहीं किया अभी तक लेकिन पढ़ाई खत्म कर नौकरी मिली तो अलग शहर में रहने पर तजुर्बा हुआ कि वेतन में गुज़ारा करना है तो खर्चों में कटौती करना ज़रूरी होगा । माता पिता दोस्त कब तक सहयोग कर सकते हैं प्रेमिका को जिस शानदार आरामदायक ज़िंदगी की चाहत है उसे पूरा करने में खुद को भुलाना होगा जीना दुश्वार हो सकता है । ज़रूरतें बढ़ती जाती हैं महीने के आखिर में क्रेडिट कार्ड की सीमा समाप्त हो जाती है , प्रेमिका को समझाना कठिन है और शादी के बाद पत्नी से नहीं कहा जा सकता कि कोई चिराग़ नहीं होता जो मांगने पर असंभव को भी संभव करे । अंजलि प्यार भरे सपनों की बात सुनना चाहती है समझना नहीं चाहती कि जीवन सपना नहीं कठोर वास्तविकता है । 

          आप से दोस्त की तरह सच बता रहा हूं कि मुझे नहीं मालूम ज़िंदगी में प्यार महत्वपूर्ण है या फिर व्यावहारिकता से निर्णय लेना चाहिए । मुझे बड़ा भाई समझाता है कि अपने साथ दफ़्तर में नौकरी करने लड़की से संबंध बना लेना चाहिए उसे लगता है वो भी ऐसा चाहती है तभी मुझ से अपनी ज़िंदगी की बातें करती है । दोस्ती प्यार की  शुरुआत हो सकती है शायद वो दफ़्तर की साथी यही चाहती है मैंने महसूस किया है लेकिन अंजलि को लेकर जैसा होता है वो भावना नहीं लगती मुझे । लेकिन मेरा यकीन है कि वो जीवन की वास्तविकता को समझती है और अच्छी पत्नी साबित होगी । क्या मैं अंजलि से संबंध तोड़ कर उस कार्यालय सहयोगी से गंभीरतापूर्वक विवाह करने को संबंध बनाने की पहल कर सही करूंगा जब खुद अंजलि भी यही सोचती है । शायद हम दोनों का प्यार अपनी परिणीति तक नहीं पहुंच सकता है । अपने चाहने वाले की इच्छा पूरी करना , ये भी प्यार ही तो है ।  अब लगता है तुम दोनों लाल फूल और पीले फूल अलग अलग क्यों हुए होंगे । मुझे भी हालात को समझ यही निर्णय स्वीकार कर दूर से ही प्यार को देखना  उसकी महक को ज़िंदा रखना होगा । जैसे ही साहिल ने ये बात कही पेड़ से इक फूल उसकी झोली में आ गिरा था । उसकी चिंता दूर हो गई थी ज़िंदगी को इक मोड़ देना था खूबसूरत छोड़ने से नई शुरुआत करने के लिए ।
 
 Sahir Ludhianvi Nazm Chalo Ek Baar Phir Se Ajnabi Ban Jayein - Amar Ujala  Kavya - टूटे हुए दिलों को ख़ूबसूरत मोड़ देती है साहिर की यह नज़्म
 
     

अप्रैल 20, 2024

POST : 1803 बहुत चिराग़ जलाओगे ( कथा-कहानी ) डॉ लोक सेतिया

        बहुत चिराग़ जलाओगे ( कथा-कहानी ) डॉ लोक सेतिया

 कभी कभी किसी ख़बर को सुन कर हम सकते में आ जाते हैं , क्या महसूस होता है कहने को शब्द नहीं मिलते हैं । कई साल पहले किसी शहर से इक पति - पत्नी जोड़े की ख़ुदकुशी की ख़बर पढ़ कर इक अर्से तक मन में उथल पुथल रही जिस का नतीजा इक ग़ज़ल कही थी , ख़ुदकुशी आज कर गया कोई । इस विषय पर मैंने अलग अलग ढंग से रचनाओं में अपनी भावनाएं संवेदनाएं प्रकट की हैं जबकि देखता हूं हर ऐसी घटना कुछ दिन बाद भुला देते हैं अधिकांश लोग । शायद ये वास्तविक बात इंगलैंड की है अभी भी उस संस्था की शाखाएं देश विदेश में हैं भारत में संजीवनी नाम से इक संस्था से संपर्क रहा था जब दिल्ली रहता था । इक मनोचिकित्सक ने प्रचारित कर रखा था कि जो भी जीवन से निराश हो कर ख़ुदक़ुशी करने का सोचता हो इक बार आकर मुझ से अवश्य मिले और कहते हैं वो हमेशा सभी को जीने का मकसद समझा कर ख़ुदक़ुशी नहीं करने पर सहमत करवा लिया करता था । मगर इक दिन इक व्यक्ति की वास्तविकता और ज़िंदगी की कुछ परेशानियों को सुनकर वह मनोचिकित्सक भी नहीं समझ पाया कि उसे जीने को कैसे मनवा सकता है । वो व्यक्ति ये देख कर समझ गया कि अब जीना नहीं मर जाना ही उस के लिए एकमात्र विकल्प है । लेकिन उस डॉक्टर की सहायक बाहर बैठी उनकी बात सुन रही थी , जैसे ही वो निराश व्यक्ति बाहर निकला उस महिला ने पूछा अब आपको क्या करना है । उस ने कहा बस आखिरी उम्मीद थी शायद ये कोई रास्ता बताते मगर अब निर्णय कर लिया है जीना नहीं है किसी भी तरह मौत को गले लगाना है । 
 
उस महिला ने कहा आप जो समझें कर सकते हैं लेकिन क्या उस से पहले मेरे साथ एक एक कप कॉफ़ी पीना चाहेंगे मुझे बहुत पसंद है कोई साथ हो अकेले नहीं पीना चाहती । ठीक है और दोनों पर इक कॉफी शॉप पर चले आये , कॉफी पीते पीते महिला ने उसे अपना दोस्त बना लिया ये कह कर कि उसको जैसा दोस्त चाहिए था कोई कभी नहीं मिला । जुदा होने की घड़ी थी उस महिला ने कहा धन्यवाद आपने मेरी बात मान कर मुझे थोड़ी देर को ही सही अपनी दोस्त माना जो मेरे लिए बड़ी ख़ुशी की बात है । उस व्यक्ति ने कहा काश कि मैं आपको हमेशा ख़ुशी दे सकता , महिला ने कहा मुश्किल क्या है आप भी मुझे अपनी तरफ से कॉफी का निमंत्रण दे सकते हैं । आपको ख़ुदकुशी करनी है तो मैं रोकूंगी नहीं लेकिन इतना तो आप अपनी दोस्त की खातिर कर सकते हैं हां जितने भी समय आप ज़िंदा हैं हमारी दोस्ती रहेगी और हम एक दूसरे का हर दुःख दर्द आपस में सांझा कर सकते हैं , जब नहीं होंगे तब अकेले होने से जो होगा देखा जाएगा । और इस तरह उस मनोचिकित्सक की सहायक ने उस व्यक्ति को ख़ुदक़ुशी नहीं करने पर मनवा लिया । जब वापस जाकर अपने बॉस को ये बताया तो उस ने अपनी संस्था का नाम बदल कर उसी महिला के नाम पर रख दिया था । 
 
फिल्मों में ऐसा कई बार दर्शाया जाता रहा है , पुराने काफ़ी गीत भी हैं जो आपको निराशा से निकलने और आशा का दामन थामने की राह समझाते हैं । आजकल हम सभी अपने अपने संकुचित दायरे में खुद ही कैद रहते हैं अपनी उलझनों परेशानियों से बाहर दुनिया अन्य समाज की तरफ देखते ही नहीं हैं । मानवीय संवेदनाओं से रिश्ता तोड़ कर मतलबी और आत्मकेंद्रित हो गए हैं , आस पास किसी को असफल या निराश देखते हैं तो उस को साहस बढ़ाने नहीं बल्कि कभी कभी किसी के ज़ख्मों पर नमक छिड़कने का कार्य करते हैं । कोई फ़िसलता है तो गिरे को हाथ देकर उठाने नहीं उस पर कटाक्ष करते हैं जिस का अर्थ है कि हम निर्दयी बनते जा रहे हैं । काश हम हर किसी से इंसानियत का नाता निभाते तो कोई भी इतना अकेला और निराश नहीं होता कि घबरा कर अपनी जीवन लीला ही ख़त्म करने को विवश हो जाता । अंत में दो ग़ज़ल इक मेरी जो किसी की ख़ुदक़ुशी की बात सुन कर अनुभव करता हूं उस की मनोदशा को सोच कर और इक ग़ज़ल जिसे मैंने कॉलेज के ज़माने से अक्सर गुनगुनाया है , शायर  -  मख़मूर देहलवी जी की है ।
 

          
 
हर एक रंज में राहत है आदमी के लिये
पयाम-ए-मौत भी मुज़दा है ज़िंदगी के लिये ।

(रंज = कष्ट, दुःख, आघात, पीड़ा), 
(पयाम-ए-मौत = मृत्यु का सन्देश), 
(मुजदा = अच्छी ख़बर, शुभ संवाद)

मैं सोचता हूँ के दुनिया को क्या हुआ या रब
किसी के दिल में मुहब्बत नहीं किसी के लिये ।

चमन में फूल भी हर एक को नहीं मिलते
बहार आती है लेकिन किसी किसी के लिये ।

हमारे बाद अँधेरा रहेगा महफ़िल में
बहुत चराग़ जलाओगे रोशनी के लिये ।

हमारी ख़ाक को दामन से झाड़ने वाले
सब इस मक़ाम से गुज़रेंगे ज़िंदगी के लिये ।

उन्हीं के शीशा-ए-दिल चूर चूर हो के रहें
तरस रहे थे जो दुनिया में दोस्ती के लिये ।

जो काम आये मेरी ज़िन्दगी तेरे हमदम
तो छोड़ देंगे दुनिया तेरी ख़ुशी के लिये  ।

किसी ने दाग़ दिए दोस्ती के दामन पर
किसी ने जान भी लुटा दी दोस्ती के लिये । 
 
शायर  -  मख़मूर देहलवी ।



मार्च 28, 2024

POST : 1789 गांव की महिलाओं का गीत-संगीत ( खूवसूरत विरासत ) डॉ लोक सेतिया

गांव की महिलाओं का गीत-संगीत ( खूवसूरत विरासत ) डॉ लोक सेतिया  

आपने क्या कभी देखा है कुछ परंपरिक परिधान वेश भूषा में सार्वजनिक जगह पर बैठी कुछ महिलाओं को अपने आप में मग्न गीत गुनगनाते हंसते खिलखिलाते हुए । मैं सैर पर पार्क में जाते हुए कितनी बार उनको देखता और सोचता था कि अपने गांव से शहर की भीड़ में भी कैसे उन्होंने अपनी विरासत को ज़िंदा रखा हुआ है । कुछ समय पहले उन्हीं से इक महिला से वार्तालाप का अवसर मिला इक इत्तेफ़ाक़ से , मैंने उनसे आग्रह किया बताएं ये क्यों इतना महत्वपूर्ण है । जो उन्होंने बताया शायद मेरी तरह अधिकांश लोग उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते होंगे । गांव में उनके बचपन में यही उनकी माएं और मुंहबोली मौसियां किया करती थी जब भी उनको किसी अवसर पर संग संग सुःख दुःख बांटने का संयोग होता था । लेकिन खुद उस महिला को ये सब मालूम नहीं था तब तक जब तक उसका विवाह तय नहीं हुआ था ।
 
शादी से पहले मां उसे साथ ले जाती थी और सभी मौसियां कोई नानी भी जो वास्तव में रिश्ते की नहीं मगर उस से बढ़कर अपनत्व रखने वाली महिलाएं हुआ करती थी । तब बिना किसी के समझाए इक बात उनको समझ आ गई थी कि उन सभी महिलाओं को घर परिवार गांव खेत खलियान में अथक मेहनत करने के बाद भी पीड़ा ही मिलती थी आदर नहीं कोई महत्व नहीं । घर में सार्वजनिक ढंग से विरोध तो क्या रोना तक और भी ताने सुनने का कारण बन जाता था । लेकिन चौपाल में गांव की अपनी उम्र की महिलाओं संग किसी तीज त्यौहार पर गीत संगीत से नाचना अपनी परेशानियों को भुला देता था । बस जाने कब से ये परंपरा बनी हुई है सब चिंताओं में भी कुछ पल संगी सहेलियों साथ आनंद से बिताने की । शादी से पहले हर मौसी उस लड़की को कोई ऐसा गीत गाने को साथ कहती याद करवाती और बतलाती उसे किस ने ये सिखाया था । शायद ये उनकी ऐसी सौगात थी जो हमेशा साथ रहती है उम्र के हर छोड़ तक । 
 
उन्होंने बताया उन सभी गीतों में मायके और ननिहाल की मधुर यादों की बात कही जाती है जबकि ऐसा सभी को वास्तव में मिलता हो ज़रूरी नहीं था । लेकिन बचपन में भी लड़कियों को अन्य कड़वे अनुभव के बीच वही इक सुखद एहसास लगते थे । शादी के बाद जिस भी गांव शहर जाकर रहती हैं ऐसी अपनी उम्र की महिलाएं मिल ही जाती हैं जो इंतज़ार करती हैं उन कुछ दिनों का जब वो साथ मिल बैठ कर सारी परेशानियां चिंताएं भुलाकर कुछ पल हंस लेती हैं । ये कुछ दिन का आनंद उनको जीने की ऊर्जा देता है ।  



जनवरी 20, 2024

POST : 1775 सबकी अपनी रामकहानी ( लघुकथा ) डॉ लोक सेतिया

      सबकी अपनी रामकहानी ( लघुकथा ) डॉ लोक सेतिया 

पत्रिका आजकल कागज़ के पन्नों पर नहीं सॉफ्टवेयर द्वारा पीडीऍफ़ फ़ाइल पर प्रकाशित होने लगी है ऐसी ही इक पत्रिका जो स्वयं को विश्व प्रसिद्ध बताती है ने सभी लिखने वालों को अपनी अपनी रामकहानी आगामी अंक के लिए घोषित तिथि तक भेजने का अनुरोध किया । कुछ पल बाद नियम घोषित किया गया पंजीकरण का शुल्क सौ रूपये भेजना अनिवार्य है । पिछले अंक में तीन सौ रचनाएं छपी थी अर्थात तीस हज़ार पत्रिका की इक पीडीऍफ़ फ़ाइल बनाने की कीमत पहले आओ पहले छपवाओ की नीति निर्धारित हुई । जिनको सौ रूपये नहीं देने उनकी मर्ज़ी भला इतने नेक कार्य में इतना भी योगदान कोई नहीं करना चाहता । हम सिर्फ एक ही को जानते हैं उन्हीं से अनुमति मांगी ताकि कोई कॉपीराइट का झगड़ा बाद में नहीं खड़ा हो । उनकी जगह कोई प्रतिनिधि मिले सचिव जैसे पद की तरह हालांकि आजकल निजि सचिव नहीं ख़ास लोगों के प्रवक्ता प्रतिनिधि जनसंपर्क अधिकारी जैसे प्रभावशाली शब्द उपयोग किए जाते हैं । देखा वहां लंबी कतार लगी थी अनगिनत लोग उनके आयोजित होने वाले कार्यक्रम की जानकारी सब से पहले अपने टीवी चैनल पर दिखाना चाहते थे । हर कोई चाहता था पल पल की खबर जिस घड़ी वो आयोजन स्थल को चलें लाइव दर्शक को दिखला सकें सभी की सीधे प्रसारण की आई बी वैन प्रतीक्षा कर रही थी । 
 
जाने ये करिश्मा कैसे हुआ कि मैंने खुद को भगवान जी के विशेष कश में उनके सामने पाया । जैसा कि हम सभी को मालूम है ईश्वर बिना कुछ बोले हमारे अंतर्मन की बात सुन लेते हैं वही हुआ । प्रभु बोले पता है क्या चाहते हो आप लेखक , लेकिन जिस रामकहानी की अनुमति लेना चाहते हो उस का कोई अता - पता कोई ओर - छोर खुद मुझी को ख़बर नहीं है । राम तो एक ही है सृष्टि की शुरुआत से हर जगह कण कण में रहता है अब ये किस की बात हो रही है कौन कहां से कहां आने-जाने वाला है । मैंने भी इतना शोर अपने नाम को पहले कभी नहीं सुना है बस उत्सुकता है ख़ुद देखते हैं क्या खेल तमाशा किस की माया है । पूछने से पहले ही बता दिया किसी हाथी घोड़े रथ या विमान की आवश्यकता नहीं उनको जहां जाना पहुंच जाते हैं । कोई बुलाए तो सही शुद्ध अंत:करण से  , समय व्यतीत होता रहा प्रभु को कोई आवाज़ नहीं सुनाई दी क्योंकि सभी मुख से जो बोल रहे थे भीतर अंत : करण से आवाज़ नहीं आ रही थी । मैंने कहा भगवन आप व्यर्थ पुरातन ढंग से अनुरोध पाने की राह देख रहे हैं आजकल व्हाट्सएप्प सोशल मीडिया पर संदेश भेजते हैं सभी और देख लो नगर नगर क्या उत्सव का माहौल है । भगवान मान गए और कहने लगे आप को जिस भी लोकेशन का पता है चलते हैं साथ साथ , और मैंने गूगल मैप से सही दिशा निर्देश पाने को जगह शेयर कर दी । 
 
पकल झपकते ही हम पहुंच गए लेकिन प्रवेश द्वार पर पहचान निमंत्रण पत्र की मांग सुरक्षाकर्मी करने लगे । भगवान ने समझाया भला भगवान जिस जगह रहते या रहने वाले उस जगह किसी को चिंता करने की क्या आवश्यकता है । जो सभी का रखवाला है उसकी रक्षा कोई इंसान करेगा , समझदार हो जानते नहीं उस की मर्ज़ी बगैर इक पत्ता नहीं हिल सकता तो उस का घर कोई तोड़ सकता है बल्कि किस इंसान की हैसियत है भगवान को रहने को कोई आवास बनवा कर दे सके । संसार को बनाने वाले को दुनिया का कोई इंसान कुछ भी देने योग्य नहीं है जो भी है उसी का है फिर ये तेरा मेरा का झगड़ा कौन कर रहा है । मुझे निराश देख प्रभु ने कहा लेखक काहे निराश हो जिस रामकहानी की ख़ोज कर रहे अभी शुरू ही नहीं हुई है बस इक सपना है जो लोग नींद में सोते हुए नहीं दिन को जागते देख रहे दिखलाना चाहते हैं । क्या तुमको मालूम है इन में किसी को कोई रामकहानी पढ़नी भी नहीं है , ये सभी तो बचपन की चित्रकथाओं से आगे कुछ भी जानते तक नहीं हैं । बड़ी बड़ी किताबें पढ़ना इनको पसंद ही नहीं मगर बिना किसी भी ग्रंथ को पढ़े समझे ये तमाम उन पर बहस चर्चा झगड़े करते हैं । कोई वास्तविक ज्ञानवान या संत इनको कुछ नहीं समझा सकता है । मेरी जो भी रामकहानी है उसका प्रारंभ कोई नहीं जानता और अंत कभी हो नहीं सकता है ये जितनी भी धार्मिक कथाओं की सभी बात करते हैं ये मेरी वास्तविक कहानी में किसी कहानी के किस्से हैं जो वाचक विषय को समझाने को घड़ते रहते हैं । जैसे धरती गगन का कोई सिरा नहीं मिलता ठीक उसी प्रकार विधाता की कोई कहानी किसी किताब में कैद नहीं की जा सकती न ही उसे किसी दायरे में सीमित किया जा सकता है । ये कोशिश करने वाले समझते हैं सब जानते हैं जबकि जो जानता है कि वो सब नहीं जानता कुछ जनता है , लेकिन जो सोचता है सभी कुछ जानता है वो कुछ भी नहीं जानता है । 
 

 
 
 छोटी विचित्रताएँ - मुझे अपनी कहानी बताओ

सितंबर 02, 2023

POST : 1706 करीब होकर भी दूरियां ( कहानी ) डॉ लोक सेतिया

      करीब होकर भी दूरियां ( कहानी ) डॉ लोक सेतिया 

कहानी शीर्षक देने से ये कहानी नहीं बन सकती है ये बताना लाज़मी है कि ये किसी की कहानी नहीं लेकिन हम सभी की ज़िंदगी की हक़ीक़त ज़रूर है । कविता ग़ज़ल या व्यंग्य निबंध कुछ भी इस विषय को पूर्णतया समझा नहीं सकता और उपन्यास बन नहीं सकता इसलिए यही विकल्प बचता है कहानी कह दिया जाए । मगर इस को कहानी बनाना चाहता नहीं क्योंकि तब कितने किरदार बनाने पड़ते हैं और पाठक उन सभी किरदारों में वास्तविक संदेश को अनदेखा कर सकते हैं । आप इस को चर्चा समझ सकते हैं और बिना किसी को मुजरिम ठहराए विमर्श कर सकते हैं कौन सही कौन गलत है इस का निर्णय करना व्यर्थ है । कुछ गलतियां अपनी कुछ सामने वाले साथी की हो सकती हैं मगर समझना इस बात को है कि परिवार में दोस्ती में प्यार में कैसे मधुरता बनाई और कायम की जा सकती है ताकि अनावश्यक टकराव की नौबत ही नहीं आये । 
 
अधिकांश लोग चाहते हैं जिनसे प्यार का रिश्ता है भाई बहन पिता माता अथवा पति - पत्नी का उनको बदल सकें और जैसा हम चाहते हैं उस तरह से आचरण करना सिखला सकें । यही सबसे बड़ी समस्या है किसी को प्यार करते हैं तो उसको आज़ादी से क्यों नहीं जीने देना चाहते हैं । बेशक अपनों की भलाई को देख किसी बात पर मार्गदर्शन किया जाना उचित है लेकिन समझाने के बाद क्या सही है क्या नहीं ये निर्णय तो उस पर छोड़ना होगा अन्यथा विवश करना किसी को कैद में गुलामी के पिंजरे में रखना प्यार नहीं खुदगर्ज़ी होगी ।  कोई वास्तव में किसी को चाहता है तो ऐसा कभी नहीं कर सकता है जिस से उस को ख़ुशी नहीं दर्द और तकलीफ़ मिले जिस से प्यार करने का दम भरते हैं । ख़ासकर पति - पत्नी दो अलग अलग परिवेश से बड़े होते हैं और बचपन से दोनों की अपनी अपनी समझ पसंद विकसित होती है , लेकिन ऐसा होता है कि दोनों में कोई स्वीकार नहीं करता कि दूसरा उसकी बात को नहीं माने जबकि खुद वो उसकी भावनाओं की कदर नहीं करता है । सामान्यतय: हम अनचाहे मन से स्वीकार कर लेते हैं और किसी भी तरह रिश्ता निभाते रहते हैं । लेकिन ऐसा जीवन कभी कोई वास्तविक ख़ुशी नहीं दे सकता है और मन के भीतर इक असंतोष दबाए रहते हैं । सही नाते में इक दूसरे को समझना भी ज़रूरी है और आपस में इक दूजे की भावनाओं का आदर करना भी । मतभेद होने पर स्वस्थ संवाद किया जा सकता है मगर उस के बाद उचित अनुचित का निर्णय अपना अपना होना चाहिए और इतना ही नहीं हमें अपने पति पत्नी प्रेमी प्रेमिका दोस्त पर विश्वास करना चाहिए कि वो कुछ भी ऐसा नहीं करेगा जिस से आपको ठेस पहुंचे और यही आपको भी समझना ज़रूरी है ।
 
अजीब बात है इधर हम कहने को बेहद करीब होते हैं पर असल में हम में दूरियां बढ़ती जाती हैं । कैसी विडंबना है कभी फासले हुआ करते थे मिलना जुलना कठिन होता था तब भी दिलों में चाहत रहती थी और आज जब आने जाने के साधन अच्छे हैं हम आपस में मिलने की चाहत नहीं रखते बल्कि समय पैसा होने पर कोई जगह ढूंढते हैं सैर करने को कुछ दिन ख़ुशी से बिताने को । घूमना फिरना बुरी आदत नहीं है लेकिन जब अपने दोस्तों परिजनों से मिलने को छोड़ अनजान अजनबी जगहों पर जाते हैं तो कुछ दिन की ख़ुशी मिलती है लेकिन अगर अपने मित्रों संबंधियों से मिलने जाते तो इक स्थाई ख़ुशी हमेशा हमको भी उनको मिलती । सोचा ही नहीं था कभी चिट्ठी का इंतज़ार किया करते थे फिर फोन पर हालचाल पूछते थे और अब हर किसी के पास स्मार्ट फोन है तब भी बिना मतलब कोई किसी से बात करना नहीं चाहता है । फेसबुक वहट्सएप्प ने तो ऐसा कमाल कर दिया है कि गैर से रिश्ते बनाते हैं और अपनों से फासले बढ़ाते हैं । किस किस को किसी ने क्यों ब्लॉक किया है ये किसी पहेली से कम नहीं , कारण कुछ और हैं और कहते हैं उनकी सोच हमारी सोच से नहीं मिलती या फिर फुर्सत नहीं का बहाना है जबकि दिन भर व्यर्थ की बातों में समय बर्बाद किया करते हैं । इधर ज़िंदगी भर किसी से मिलते नहीं लेकिन मौत होने पर शोक-सभा में अवश्य जाते हैं इक तस्वीर पर फूल चढ़ाने जिस को मुमकिन है हमेशा कांटे ही मिलते रहे हों जीवन भर । 
 

 
 
    

जुलाई 15, 2023

POST : 1694 चंदा मामा ख़ुश हुए ( व्यंग्य कहानी ) डॉ लोक सेतिया

    चंदा मामा ख़ुश हुए ( व्यंग्य कहानी ) डॉ लोक सेतिया 

                                 

चंद्रयान को लेकर इक फ़िल्म बनानी पड़ेगी बॉलीवुड की नज़र थी सौ तरीके ढूंढ लेते हैं फ़िल्मकार बड़ी चतुराई से चोरी चोरी चुपके चुपके इक नायक को चंद्रयान के गुप्त कक्ष में जगह उपलब्ध करवा चांद पर भेज दिया गया ये राज़ कोई नहीं जानता आप भी बताना मत बस उधर से आने वाली सूचनाओं को जानिए । चांद को देखा तो हैरान हुए अभिनेता ये पाकर कि जैसा सोचा था वैसा कुछ भी नहीं नज़र आ रहा था मगर जाने कहां से मधुर गीतों की आवाज़ सुनाई दे रही थी कोई आशिक़ अपनी माशूका को सुनहरे सपने दिखला रहा था । ये रात ये चांदनी फिर कहां , चौदवीं का चांद हो या आफ़ताब हो , चांद सी महबूबा हो मेरी , चांदनी है रात सितारों की बारात हम थामे हाथों में हाथ निभाना जन्म जन्म का साथ , कितने नये पुराने गीत बज रहे थे । आखिर ढूंढा तो मिल गया इक उपकरण जिस में ये संगीत भरा खुद बज रहा था । बड़ी ही उबड़ खाबड़ जगह थी उसको ज़मीन नहीं कह सकते थे पांव रखते तो फ़िसल कर सीधे पाताल जाने का ख़तरा सामने दिखाई देता था धरती पहाड़ समंदर सब गायब थे जैसे किसी तेज़ हवा में तिनके जाने कहां खो गए हों । शायद कुछ नशा सा छाया था या नींद आने लगी और नायक गहरी मदहोशी में चला गया ।

नींद में ख़्वाब था अभिनेता के सर पर ताज था चांदनगरी इक देश था जिस पर उसका राज था । उसका भव्य शानदार दरबार था वही जनता वही राजा खुद अपनी सरकार था । बस इक मामा था जो किसी जादूगर की कहानी का जिन था जो मांगो सब तैयार था । मामा को उस से प्यार था यही इक ऐतबार था हर दिन इक रविवार था खाने की भूख नहीं न कोई पीने की प्यास थी कोई पेड़ पौधा नहीं कोई घोड़ा गधा नहीं बस बड़ी दूर दिखाई देती हरी हरी घास थी । चांद पर चांदनी की नहीं कोई औकात थी अंधेरा था न उजाला था कोई दिन था न कोई रात थी फिर भी कुछ तो बात थी फ़ैली हुई चमचमाती लुभाती कोई सौगात थी । अचानक इक आवाज़ आई संभलना मेरे भाई छूना मत किसी को भूले से ये सब है करिश्माई । ख़्वाब में ख़्वाब पूरा हो रहा था अभिनेता फिर से जवान होने लगा बुढ़ापा अपनी निशानी मिटो चुका था । धरती पर अपने चाहने वाले राजनेता को फोन लगाया था पहुंच गया सुरक्षित आपने जिस जगह भिजवाया था । हम दोनों यहां मिलकर झूमेंगे नाचेंगे गाएंगे अपनी दुनिया नई बसाकर विधाता हैं कहलाएंगे सदियों तक पूजे जाएंगे । खाने को पीने को कुछ नहीं है हम सबको यहां लाएंगे लेकर बस्तियां बसाएंगे भूखे नंगे ख़ुशहाल कहलाएंगे खाली पेट भजन गाएंगे । जागो सुबह हो गई है पत्नी ने जगाया था तब महानायक को होश आया था सीधे आसमान से धरती पर आया था । चांदनी का ख़्वाब था कि कोई घना काला साया था रात अधिक पी ली थी सर चकराया था जाने कौन था जिसको मामा समझा था जो घर छोड़ने आया था । 
 


दिसंबर 16, 2022

POST : 1612 किताबें मेरी ख़त हैं दोस्ती वाले ( अंदाज़ अलग है ) डॉ लोक सेतिया 

 किताबें मेरी ख़त हैं दोस्ती वाले ( अंदाज़ अलग है )  डॉ लोक सेतिया 

                        जनाब साक़िब लखनवी अज़ीम शायर हैं कहते हैं

               ' ज़माना बड़े शौक से सुन रहा था  ,  हमीं सो गये दास्तां कहते कहते '।

                       कोई पचास साल पहले कही थी मैंने पहली ग़ज़ल 

               ' किसे हम दास्तां अपनी सुनाएं  , कि अपना मेहरबां किस को बनाएं ।

  उसी इक दोस्त इक मेहरबां की तलाश में क्या क्या नहीं लिखता रहा । बेनाम शख़्स अनजान नगर गांव  , बिना पता - जाने , ठिकाना बताए , भेजे ख़त लिख लिख कर कोई जवाब नहीं मिला , अधिकांश ग़ुम हो गए , कुछ वापस लौट आए मेरे पास खुद ही भेजे खुद ही पढ़े बार बार । ज़माना खुद को समझदार कहता है दावा करते हैं लिफ़ाफ़ा देख कर ख़त का  मज़मून भांप लेते हैं काश किसी ने खोला होता और समझने की कोशिश की होती कि मेरे लिखे ख़त नहीं भीतर इक कोरा कागज़ भेजा है । मेरी मन की किताब को किसी ने झांका तक नहीं बस बाहर से आवरण को देख कुछ और ही समझते रहे लोग । पुस्तक का बाहरी कवर देख लोग भटक भी जाते हैं तो कभी अंदर लिखा पढ़ कर हैरान हो जाते हैं कुछ ऐसा संभव था कोई मुझे भीतर तक गहराई से जानता समझता तो जैसा सोचा उस के विपरीत पाकर दंग रह जाता । हर कोई चेहरा देखता रहा लिबास की सिलवटें गिनता रहा , साफ मन की कद्र किसी ने नहीं जानी । कभी जब लिखनी होगी किसी किताब के पन्नों पर अपनी कहानी , प्यास को हम लिखेंगे तब पानी । यही आदत रही है हमने कभी साक़ी को अपनी प्यास दिखलाई ही नहीं ज़िंदगी भर खाली जाम लिए बैठे रहे दुनिया की महफ़िल के मयख़ाने में । दोस्ती की भाषा समझते ही नहीं लोग , सभी को निस्वार्थ दोस्ती क्या होती है नहीं पता मतलब की बात सभी जानते हैं । इस दौर की दुनिया की महफ़िल में सिर्फ मैं ही तनहा नहीं रहा सच तो ये है कि भीड़ में हर कोई अकेला नज़र आया मुझे । ये कहने को लिखी अपनी पुरानी इक ग़ज़ल पढ़ता हूं , शायद समझ सके कोई ।
 

ग़ज़ल - डॉ लोक सेतिया ' तनहा '


महफ़िल में जिसे देखा तनहा-सा नज़र आया
सन्नाटा वहां हरसू फैला-सा नज़र आया ।

हम देखने वालों ने देखा यही हैरत से
अनजाना बना अपना , बैठा-सा नज़र आया ।

मुझ जैसे हज़ारों ही मिल जायेंगे दुनिया में
मुझको न कोई लेकिन , तेरा-सा नज़र आया ।

हमने न किसी से भी मंज़िल का पता पूछा
हर मोड़ ही मंज़िल का रस्ता-सा नज़र आया ।

हसरत सी लिये दिल में , हम उठके चले आये
साक़ी ही वहां हमको प्यासा-सा नज़र आया ।   
 
   साक़िब लखनवी जी इक शेर में कहते हैं ,  कोई नक़्श और कोई दीवार समझा , ज़माना हुआ मुझ को  चुप रहते रहते । शायद यही होता है ख़ामोश रहने से मगर बोलने से कब कौन क्या समझता है कहना और भी मुश्किल है । तभी बहादुर शाह ज़फ़र जी कहते हैं बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी , जैसे अब है तेरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थी । मैंने कुछ और लिखा मगर ज़माने ने कुछ और पढ़ा समझा जो जिस का नज़रिया था उस ने अपने ढंग से अर्थ निकाल लिया । जब कई साल बाद मुझे अपने लेखन को  पुस्तक के आकार में छपवाना शुरू किया तब जान पहचान वाले लोगों दोस्तों को शायद लगा जैसा सभी किताब छपवाते हैं नाम शोहरत ईनाम पुरुस्कार आदि की कतार में खड़े होने को वही चाहत रही होगी । कुछ दिन बाद कुछ लोग पूछने लगे कि कैसा रहा पाठक वर्ग की प्रतिक्रिया , मुझे यकीन है ये सवाल करने वालों ने खुद मेरी किसी किताब को ठीक से पढ़ा नहीं होगा अन्यथा वो मुझ से रचनाओं भावनाओं की बात करते न कि इस तरह औपचारिक दुनियादारी की बातें । उनको रूचि थी कितनी किताबें बिकी कितनी आमदनी घाटा हुआ क्या खोया क्या पाया , मुझे इनकी चिंता कभी नहीं थी । कभी कभी होता है लेखक की बात पाठक को अपने अनुसार कुछ अलग लगती है जो स्वाभाविक है मगर कभी कोई शब्दों भावनाओं को ही नहीं समझता तब उलझन होती है । मुझे जिस की चाहत थी आखिर वो दिन वो पल-क्षण आ ही गए हैं । हर दिन कहीं से कोई फोन पर कॉल कर बात करता है क्या डॉ लोक सेतिया जी बात कर रहे हैं , हां कहने पर बताते हैं आपकी किताब मिली किसी तरह से पढ़ कर मन किया बातचीत करने को जानने समझने को । यही वास्तविक मूल्य है किताब का चाहे किसी भी लेखक की हो ।
 
   कई बार ये बात कही है पहले भी , मैंने हर वर्ष डायरी शुरू करते एक ही हिसाब याद किया है वो ये कि पिछले साल कितने दोस्त बने कितने खो गए कितने अजनबी साथ चले कितने हमराही बिछुड़ गए । जैसे अधिकांश दुनिया वाले धन दौलत सोना चांदी हीरे जवाहरात के बढ़ते घटते खज़ाने का बही खाता लगाते हैं । मेरे पास इक पलड़े में दोस्ती रिश्ते नाते रहे हैं और तराज़ू की दूजी तरफ पलड़े में सच लिखने का मेरा जूनून और दोनों को बराबर रखने का असंभव सा काम जैसे दोधारी तलवार पर चलना मेरी विवशता रही है । सदा यही भरोसा किया है कोई भी मुझे पढ़ेगा समझेगा तो दोस्त बन कर हमेशा साथ रहेगा । किताबों ने मुझे कितने ऐसे लोगों से परिचित करवाया है यही दोस्ती मेरी सच्ची पूंजी हैं । कभी पढ़ा था किसी लेखक को समझना है तो उस के लेखन को पढ़ना ज़रूरी है अन्यथा नहीं जान सकते । मुझे आप या अन्य लोग जो समझते हैं बिना पढ़े ही सही नहीं हो सकता है , जानता हूं किसी को फुर्सत कहां मुझे जाने समझे फिर भी कभी जिन को दोस्ती प्यार मुहब्बत की ज़रूरत है पढ़ कर मेरी तरह दोस्त तलाश कर सकते हैं । मुझसे करोगे दोस्ती या कोई और मुझ से बेहतर ढूंढना चाहोगे ये आपकी मर्ज़ी है । 
 

 




 

फ़रवरी 09, 2022

POST : 1568 कौन मुजरिम क़लम के क़त्ल का ( व्यथा-कथा ) डॉ लोक सेतिया

  कौन मुजरिम क़लम के क़त्ल का ( व्यथा-कथा ) डॉ लोक सेतिया 

पुस्तकालय की बंद अलमारी से जाने कब से लाल रंग का लहू जैसा तरल पदार्थ बहता बहता फ़र्श पर दाग़ बनता जा रहा है लाख कोशिश की मगर धब्बे मिटते ही नहीं। सरकार को खबर मिली तो सीबीआई को जांच पर लगा दिया क्योंकि टीवी चैनल को इंसानी खून की गंध महसूस हुई और इंसानी खून की गंध अख़बार टीवी चैनल को हमेशा करीब आने को विवश करती है। विशेषज्ञ बड़ी बारीकी से देखते परखते हादिसे की तह तक पहुंचे तो माजरा सुलझने की जगह और उलझता लगा। लिखने वाले की सैंकड़ों किताबों के नीचे उसकी कलम दबी कुचली पड़ी बरामद हुई। सरकारी विभाग की सोने से बनी कलम जो लिखने वाले को ईनाम पुरुस्कार के साथ भेंट की गई थी उसकी हालत देख कोई नहीं समझ पाया कि जान बाकी है या नहीं लेकिन कचूमर निकलने के बाद भी उस के भीतर से स्याही की जगह लहू की धारा निरंतर बहती जाती थी। राज़ खुला कि शासक ने खुश होकर लिखने वाले को सोने की कलम हीरे मोती से जड़ी उपहार स्वरूप भेंट दी थी जिस में स्याही की जगह गरीबों का लहू भरा हुआ था। इतनी महंगी कीमत की कलम लिखने वाले ने किताबों के ढेर के नीचे दबाकर क्यों रखी थी और कैसे इतनी किताबों का बोझ उसको दबाता कुचलता रहा और कलम में भरा स्याही की जगह लहू बहते बहते पुस्तकालय को क़त्ल की वारदात की जगह घोषित करने को विवश हुआ। लहू की हर बूंद मिट्टी के कण कण में बसी अनगिनत कविताओं ग़ज़लों कहानियों की रचनाओं की वास्तविक दास्तां की तरफ इशारा कर रही थी। रूह कांपने लगी है इतनी लाशें दबी पड़ी अचानक सामने देख कर। सीबीआई के पास तमाम जानकर होते हैं जांच रपट लिखने लिखी को बदलने की ज़रूरत पड़ती रहती है तब कलम स्याही कागज़ की समझ वाले विशेषज्ञ बुलाने पड़ते हैं। कलम की जांच कर जानकार ने बताया कि अभी बचने की उम्मीद बाकी है। 
 
     वेंटीलेटर पर जैसे रोगी को रखते हैं उसी तरह कोशिश करने पर कलम में हलचल होने पर घायल कलम से सवाल किया गया तुम्हारी इस दशा का कारण क्या है। एक एक करके किताबों की रतफ इशारा किया लिखने वाले को गुनहगार बताते हुए। सभी किताबों को खोलना पड़ा सावधानी से पन्ने पलटते हुए ताकि सबूत सुरक्षित रहें और इस तरह सैंकड़ों किताबों में कलम को दबाने कुचलने तोड़ने मरोड़ने के निशान मिल ही गए। कहीं इतिहास को बदलने कहीं घोटाले के अपराधी को बचाने को नज़ीर बनाने की बात करने और झूठ को सच बनाकर ख़लनायक को नायक घोषित करने का कार्य कर लिखने वाले ने खुद अपना ज़मीर बेचने एवं कलम की आत्मा को लहू-लुहान किया था। कविता ग़ज़ल को घायल किया मंच पर तालियां और चंद चांदी के सिक्के पाने की चाहत में। कभी लघुकथा को उपन्यास कभी हक़ीक़त को अफ़साना बना दिया। यहां तक कि आने वाले भविष्य को गुज़रा कोई पुराना ज़माना बना बेचा सस्ते दाम पर। वहीं कहीं लिखने वाले की डायरी मिली लेखक की आत्मकथा जो कभी किताब नहीं बन पाई। प्यार की दास्तां सिनेमा पर फिल्मकार ने नफरत डर और हिंसा रोमांच बना दिया लिखने वाले की विवशता देखते हुए लालच का जाल बिछाकर। किसी संपादक ने किसी टीवी सीरियल निदेशक ने हर अंक हर एपिसोड में दर्शक को भटकाते हुए काली अंधेरी रात को रौशनी का नाम देकर गुमराह किया धन दौलत कमाने की खातिर। 
 
लंबा समय अथक महनत रंग लाई और सीबीआई ने कितने बड़े बड़े नाम वाले जाने माने लोगों के चेहरों से शराफत की नकाब हटाकर उनकी असली सूरत दिखलाई जो हैरान परेशान करने से बढ़कर भयभीत करती दिखाई दी। उसी टीवी चैनल जिसने घटना पर एपिसोड बनाकर सनसनी फैलाई थी जांच रिपोर्ट मालूम करने पर गोपनीय ढंग से जानकारी मिली उसको सबसे बड़ा गुनहगार साबित किया गया है। शासक और सत्ताधारी दल की अनुकंपा हासिल थी इसलिए जोड़ तोड़ कर सीबीआई जांच बदल कर साज़िश को मज़ाक बनाकर जारी किया गया। जांच का नतीजा खोदा पहाड़ निकाली चुहिया वो भी मरी हुई । 
 

                      डॉ लोक सेतिया की ग़ज़ल कहती है   :-

 
इक आईना उनको भी हम दे आये
हम लोगों की जो तस्वीर बनाते हैं।
 
बदकिस्मत होते हैं हकीकत में वो लोग
कहते हैं जो हम तकदीर बनाते हैं।

सबसे बड़े मुफलिस होते हैं लोग वही
ईमान बेच कर जो जागीर बनाते हैं।

देख तो लेते हैं लेकिन अंधों की तरह
इक तिनके को वो शमशीर बनाते हैं।

कातिल भी हो जाये बरी , वो इस खातिर
बढ़कर एक से एक नज़ीर बनाते हैं।
मुफ्त हुए बदनाम वो कैसो लैला भी
रांझे फिर हर मोड़ पे हीर बनाते हैं। 
 


 
 

दिसंबर 17, 2021

POST : 1562 किस को सुनाएं से सुन ज़माने तक ( कागज़ - कलम का सफर ) डॉ लोक सेतिया

          किस को सुनाएं से सुन ज़माने तक 

             ( कागज़ -  कलम का सफर ) डॉ लोक सेतिया 

शीर्षक संक्षेप में नहीं संभव इस पोस्ट का क्योंकि 1973 में पहली ग़ज़ल कही थी ' हम अपनी दास्तां किस को सुनाएं , कि अपना मेहरबां किस को बनाएं '। करीब आधी सदी का लंबा सफर साहित्य से चाहत का मुहब्बत से जूनून होने तक का जिया है हर दिन परस्तिश की है। किताबें छपवाने की शुरुआत देर से सही मगर सोच विचार कर करने चला हूं ताकि सिर्फ मेरी ही नहीं सभी लिखने वालों की मुश्किलों दुश्वारियों और हौंसलों की बुलंदी से थकान तक का एहसास पाठक वर्ग को हो सके। जाने कितने सोच विचार अंतर्द्वंद से गुज़रते हुए कलम हाथ में उठाते हैं विचार भावना को शब्दों में पिरोना रचना का आंखों से मस्तिष्क और रूह तलक पहुंचना सिर्फ रचनाकार जानता है तपस्या क्या होती है। आपको ग़ज़ल की 151 रचनाएं पढ़ने में कुछ घंटे लगेंगे लिखने में सालों हर हर्फ़ के मायने समझने में बीते हैं। लिखना ऐसे समय में जब हर कोई सोशल मीडिया टीवी चैनल अनगिनत ऐप्प्स और गूगल पर दुनिया देखना समझना चाहता है साहस का कार्य है। इसलिए पुस्तक से साहित्य से समाज को जोड़ना अधिक महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि ज़िंदगी की वास्तविकता और सामाजिक समस्याओं की वास्तविक भावनाओं को महसूस करने को यही एक विकल्प बचा लगता है। किताब से अच्छा दोस्त कोई नहीं दुनिया में और अच्छे साहित्य से बढ़कर मार्गदर्शन कोई अन्य नहीं कर सकता है। पुस्तक के पन्ने निर्जीव वस्तु नहीं होते हैं पाठक से संवाद करते हैं कभी हमदर्द लगते हैं कभी निराशा के अंधकार से बाहर निकाल रौशनी से मिलवाते हैं। किताबें बंद अलमारी की शान बढ़ाने को नहीं हो सकती हैं बेशक इधर बहुत मशहूर जाने माने लोग सिर्फ खुद के गुणगान जीवनी और अधिकांश अनावश्यक घटनाओं की व्यर्थ चर्चा कर ख्याति हासिल करने को इसका अनुचित उपयोग करते हैं। और सरकारी संस्थान संघठन ऊंचे दाम खरीद लायब्रेरी की शोभा बढ़ाते हैं। सच्चा कलम का सिपाही अपनी नहीं समाज की बात कहता है।  

ग़ज़ल संग्रह के बाद कविताओं की उसके बाद व्यंग्य रचनाओं पर आधारित पुस्तक और चौथी किताब ज़िंदगी की कहनियों की हाज़िर करनी है। मकसद दौलत शोहरत पाना कदापि नहीं है बल्कि आपको खुद अपने आप से मिलवाने का उद्देश्य है। ये आपको निर्णय करना है खुद से नज़रें मिलाना चाहते हैं अथवा नज़र बचाना चाहेंगे। बुद्धिजीवी लोगों से समीक्षा लिखवाना अनावश्यक होगा पाठक को रचनाएं खुद से जुड़ती हुईं लगती हैं और सामाजिक सरोकार की चिंता जागृत करने को सफल होती हैं तभी सार्थकता होगी रचनाओं की। इंतज़ार नहीं स्वागत नहीं करें लेकिन निवेदन है पुस्तक जिस भी किसी लेखक की हो आपको मिलती है तो उसको रद्दी की टोकरी में फैंक कर सरस्वती का निरादर कदापि नहीं करें। पढ़ना नहीं पसंद तो जैसे अख़बार पत्रिका के संपादक खेद सहित लौटाते हैं ताकि अन्य किसी के लिए उपयोगी हो सके जैसा कदम उठाना बुरा नहीं है। लिखने वालों को इसकी आदत होती है दस जगह भेजी रचना एक जगह छप जाती है तब भी ख़ुशी मिलती है बेशक रॉयल्टी तो क्या उचित मानदेय भी हमेशा नहीं मिलता। 
 

 

मई 23, 2021

POST : 1506 जहांपनाह भावुक हुए ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

        जहांपनाह भावुक हुए ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

 नहीं टीवी चैनल वाले नहीं देख सकते अपने पालनहार के मुखमंडल पर उदासी का भाव। जनता का क्या है रोना उसका नसीब है आपकी पलकों पर नमी नहीं अच्छी लगती है। दिन भर यही सबसे ज़रूरी खबर चलती रही। मान गए प्यार हो तो ऐसा ही हो अपने महबूब का खिलता चेहरा कभी मुरझाया नज़र नहीं आये सच टीवी एंकर को लग रहा था खबर पढ़ना छोड़ वो भी रो दे काश कि सामने बैठे होते हज़ूर तो अपने टिशू पेपर से उनकी पलकों को पौंछती। आंचल दुपट्टा रहा नहीं क्या करें साड़ी का पल्लू ही होता लेकिन फैशन जीन टॉप का ठहरा। जो हमने दास्तां जनता की सुनाई आप क्यों रोये तबाही तो वाराणसी की जनता पे आई आप क्यों रोये। ये गीत बजाना चाहिए था मगर हो नहीं पाया मगर जहांपनाह की उदासी की वजह कुछ लोगों की जान जाना नहीं हो सकता है। मामला गंभीर है मन की बात शायद अभी कुछ समझनी समझानी रह गई है। इस में कोई शक नहीं कि वास्तविक कीमती अश्क़ वही होते हैं जिनको कोई पलकों से ढलने नहीं देता चुपचाप पी जाते हैं बेबसी के आंसू लोग आह भी नहीं भरते। लेकिन कीमत समझी जाती है उन अश्क़ों की जो बहते ही नहीं किसी दामन को भिगोते भी हैं। टुकड़े हैं मेरे दिल के ए यार तेरे आंसू , देखे नहीं जाते हैं दिलदार तेरे आंसू। उनका हाल देख कर लोग ज़ार ज़ार रोने लगे , हमारा दर्दो ग़म है ये इसे क्यों आप सहते हैं फ़ना हो जाएगी सारी खुदाई आप क्यों रोये। सैलाब की तरह बहाकर ले गए सभी को इतने लोग तो समंदर में आये ताउते तूफ़ान में तबाह नहीं हुए जितना उनकी भीगी पलकों में डूब कर फ़नाह हो गए हैं। 
 
 आंसुओं की दास्तां लिखते लिखते कथाकार की कलम उदास हो जाती है। आशिक़ के अश्क़ों पर कितने बेमिसाल शेर हैं शायरी में अश्क़ का रुतबा बड़ा ऊंचा है मुस्कुराहट की तो कोई कीमत नहीं आंसुओं से हुई है हमारी क़द्र , उम्र भर काश हम यूं ही रोते रहें आज क्योंकि हुई है हमें ये खबर। बादलों की तरह हम तो बरसे बिना लौट जाने लगे थे मगर रो पड़े। आज दिल पे कोई ज़ोर चलता नहीं मुस्कुराने लगे थे मगर रो पड़े। कभी लिखा था हमने भी बस ज़रा सा मुस्कुराए तो ये आंसू आ गए वर्ना तुमसे तो कहना ये अफ़साना न था। ये राजनीति है जनाब यहां एक एक आंसू का हिसाब रखते हैं गिन गिन कर बदला लेते हैं। कोई कलाकार पेंटिग बना सकता है बादशाह के इंसाफ के तराज़ू के पलड़े पर कितनी लाशें एक पलड़े पर मगर झुका हुआ पलड़ा होता है जिस पलड़े पर किसी का इक आंसू गिर गया है। महिलाओं को अच्छी तरह मालूम है ये हथियार कभी नाकाम नहीं होता है उनका रोना किसी को जीवन भर रुला सकता है जब कोई तरकीब नहीं काम आती है आज़मा सकता है। आंसुओं पर दो कविताएं इक नज़्म पेशा हैं।

दो आंसू ( कविता ) 

हर बार मुझे
मिलते हैं दो आंसू
छलकने देता नहीं
उन्हें पलकों से।

क्योंकि
वही हैं मेरी
उम्र भर की
वफाओं का सिला।

मेरे चाहने वालों ने
दिया है
यही ईनाम
बार बार मुझको।

मैं जानता हूं
मेरे जीवन का
मूल्य नहीं है
बढ़कर दो आंसुओं से।

और किसी दिन
मुझे मिल जायेगी
अपनी ज़िंदगी की कीमत।

जब इसी तरह कोई
पलकों पर संभाल कर 
रोक  लेगा अपने आंसुओं को
बहने नहीं देगा पलकों  से
दो आंसू।  
 

मां के आंसू ( कविता ) 

कौन समझेगा तेरी उदासी
तेरा यहाँ कोई नहीं है
उलझनें हैं साथ तेरे
कैसे उन्हें सुलझा सकोगी।

ज़िंदगी दी जिन्हें तूने
वो भी न हो सके जब तेरे
बेरहम दुनिया को तुम कैसे 
अपना बना सकोगी।

सीने में अपने दर्द सभी
कब तलक छिपा सकोगी
तुम्हें किस बात ने रुलाया आज
मां
तुम कैसे बता सकोगी।

बड़े लोग ( नज़्म ) 

बड़े लोग बड़े छोटे होते हैं
कहते हैं कुछ
समझ आता है और

आ मत जाना
इनकी बातों में
मतलब इनके बड़े खोटे होते हैं।

इन्हें पहचान लो
ठीक से आज
कल तुम्हें ये
नहीं पहचानेंगे

किधर जाएं ये
खबर क्या है
बिन पैंदे के ये लोटे होते हैं।

दुश्मनी से
बुरी दोस्ती इनकी
आ गए हैं
तो खुदा खैर करे

ये वो हैं जो
क़त्ल करने के बाद
कब्र पे आ के रोते होते हैं।  
 

 
 
 
 
 

मई 21, 2021

POST : 1505 व्यथा-कथा चिट्ठी की ( दास्तान- ए- ज़माना ) डॉ लोक सेतिया

   व्यथा-कथा चिट्ठी की ( दास्तान- ए- ज़माना ) डॉ लोक सेतिया 

 सदियों पुराना लंबा सफर है संदेश भिजवाने का मिलने का खुला पोस्टकार्ड मिलता था कभी बंद लिफ़ाफ़े को देख कर हाल समझ जाते थे। कितने फ़िल्मी गाने प्यारे प्यारे सुनाई देते थे चिट्ठी न कोई संदेश जाने वो कौन सा देश जहां तुम चले गए। जो दुनिया से रुख़सत हो जाते उनकी याद आती थी तब यही कहते थे उधर से कोई डाकिया चिट्ठी लेकर आता किसी तरह। अब मत पूछो संदेश भेजते हैं अपने दिल के जज़्बात बयां करते हैं हालात बतलाते हैं तो सोशल मीडिया पर कोई समझता ही नहीं। भीड़ है मगर सभी अकेले हैं जानते हैं मगर सभी अजनबी लगते हैं कभी कभी कोई पढ़ता है तो सच पढ़कर नाराज़ हो जाता है क्योंकि अजीब मौसम है व्हाट्सएप्प मेसेंजर का हर कोई अपनी कहता है और जवाब भी चाहता है जो उसको भला लगता हो वही लिख कर भेजे कोई।  ख़त दोस्ती और मुहब्बत को कायम रखते थे मगर ये नामुराद सोशल मीडिया वाले संदेश आपसी दूरी को और भी बढ़ा देते हैं चार कदम दूर बैठा भी दिल से इतना दूर हो जाता है कि सात समंदर पार की दूरी से भी अधिक फ़ासला लगता है। मुझे याद आया कॉलेज में रहते थे तब परिसर में छोटा सा डॉकघर हुआ करता था क्लॉस से हॉस्टल जाते बीच में रुकते दोपहर का भोजन करने से पहले कोई ख़त मिले यही हसरत होती थी प्यार की दोस्ती की अपनेपन की भूख पेट की भूख को भुला देती थी। कमरा नंबर बताते थे और डाकिया चिट्ठी पकड़ा देता था हज़ार युवक पढ़ते थे किसी का नाम ज़रूरी नहीं हुआ करता था। शायद ही किसी दिन मुझे निराशा होती थी जब कोई डॉक मेरे नाम की नहीं मिलती थी सभी दोस्त हैरान होते थे मुझे रोज़ कैसे चिट्ठियां मिलती हैं ये किसी ने नहीं समझा कि मैं हर दिन कितने अपनों को खत लिख कर भेजता था। उस ज़माने में कितने लोगों से कितने साल पास नहीं होकर भी रिश्तों में नज़दीकी बनाये रखी थी। वास्तव में मेरी ख़त लिखने की आदत ने ही मुझे लेखन की राह पर ला दिया है।
 
चिट्ठियां बड़ी संभाल कर रखते थे बंद बक्से में अलमारी में और कुछ बिस्तर पर सिरहाने तकिये के नीचे आधी रात को जागते फिर से पढ़ते थे। ख़त लिख दे सांवरिया के नाम बाबू कोरे कागज़ पे लिख दे सलाम बाबू। क्या ज़माना था स्याही की खुशबू की महक समाई होती थी लिखावट में जो पढ़ने वाले के भीतर समा जाती थी। बाज़ार से किताबों की दुकान से लेटर पैड और पैन चुनकर लाया करते थे। रंग बिरंगे पैड पर कलाकारी की हुई होती थी भेजने वाले की पहचान नज़र आती थी। कलम-दवात की स्याही से जेल पैन तक पहुंचते पहुंचते शब्द लिखावट साफ और गहराई बढ़ती गई मगर दिल को छूने वाले एहसास जज़्बात जाने कहां खो गए हैं। बात रूह तक नहीं पहुंच पाती आंखों से दिल में उतरती नहीं दिल से नहीं दिमाग़ से काम लेते हैं हम आजकल। शायद अब कभी कोई इतिहास की धरोहर बनकर किताब में दर्ज किसी जाने माने नायक की लिखी चिट्ठियों को लोग याद ही नहीं करते। अमृता प्रीतम की जीवनी रसीदी टिकट जैसा अनुभव मिलता नहीं इधर शोहरत वाले अपनी आत्मकथा लिखते लिखवाते हैं मगर ज़िंदगी की वास्तविकता से कोसों दूर बनावट की बातें। अब  राजनेता की रेडियो पर कही तथाकथित मन की बात में मन की कोई बात होती ही नहीं अनबन की बात लगती है। 
 
फोन क्या आया सब बदलता गया और बदलते बदलते इतना बदला जो लोग खुद ही बदल गए। कभी फोन पर सभी से आपसी हाल चाल की बातें हुआ करती थीं। धीरे धीरे फोन का महत्व कम होता गया और औपचारिकता की बातें होने लगी। अब बस कुछ करीबी लोगों को छोड़ किसी का फोन आता है तो इक चिंता होती है क्यों आया है फिर भी सब ठीक हो तो सोचने लगते हैं कोई मतलब कोई ज़रूरत कुछ काम होगा और पूछने से बचते हैं बल्कि सोचने लगते हैं कोई बहाना बनाकर पीछा छुड़ाने को लेकर। रिश्तों की मधुरता जाने कब ख़त्म हो गई जब लोग स्वार्थी और खुदगर्ज़ बनते बनते आदमी से बेजान पत्थर बन गए हैं। अभी बीस साल पहले अख़बार पत्रिका में पाठकों की बात बड़ी महत्वपूर्ण समझी जाती थी संपादक पाठक को भगवान की तरह आदर देते थे आलोचना करने पर भी आभार जताया जाता था। विज्ञापन और पैसा टीआरपी जब से पाठक से बड़े लगने लगे टीवी अख़बार पत्रिका को प्रशंसा के पत्र ईमेल ही अच्छे लगने लगे हैं। डॉक से मिले खत रचनाएं धूल चाटती पड़ी होती हैं कहीं। वास्तव में ईमेल कभी चिट्ठियों की जगह नहीं ले सकते हैं। कारोबारी  बात सामान बेचने खरीदने या सरकारी सामाजिक संगठनों संस्थाओं की सूचनाओं का आदान प्रदान जानकारी टीवी अख़बार के खबर आदि से लेकर अपने आर्थिक उद्देश्य की ज़रूरत भर बन गए हैं पल भर बाद कूड़ेदान में मिलते हैं। 
 
यूं तो खतो -किताबत पर बहुत लिखा लिखने वालों ने। नसीम अंसारी कहते हैं " मैं रौशनी पे ज़िंदगी का नाम लिख के आ गया , उसे मिटा मिटा के ये सियाह रात थक गई।" लेकिन मैंने जब से चिट्ठी की जगह सभी को संदेश भेजने शुरू किये व्हाट्सएप्प के मायाजाल में उलझकर बड़े हैरतअंगेज़ अनुभव हुए हैं लोग सच से घबराकर बिना पढ़े समझे मुझे समझाने लगते थे व्यर्थ समय बर्बाद करते हैं किसी को सच्चाई से कोई मतलब नहीं रहा। लेकिन हद की भी हद नहीं होती जब लोग पढ़कर जवाब देने की जगह सवाल उठाते हैं लिखने का हासिल क्या है पूछते हैं। ऐसे में दुष्यन्त कुमार का शेर याद आना ज़रूरी है। कहते हैं दुष्यन्त कुमार " हमने सोचा था जवाब आएगा , एक बेहूदा सवाल आया है।"






नवंबर 08, 2020

POST : 1402 15 लाख मिलने के बाद ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

    15  लाख मिलने के बाद ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

  ये चिट्ठी डाकविभाग की गलती से जिनको भेजी गई थी उनको नहीं मिली और मेरे हाथ लग गई है शायद जिसे डाकिया दे गया उसको समझ नहीं आया चिट्ठी का मकसद क्या है । आदरणीय नाम लिखा हुआ है जो बताना ज़रूरी नहीं समझने की बात है । मैं आपके चाहने वालों में एक होकर भी अनेक होने की तरह होने जैसी बात है क्योंकि सभी जो आपको चाहते हैं सोचते हैं कि आपको अपनी कही बात पर खरे उतरना चाहिए 15 लाख की घोषणा जुमला वोट पाने को था ये सुनकर अच्छा नहीं लगता है । खज़ाना बेशक खाली है जो आपने ही किया है कोई और पिछले पांच साल से अधिक समय से लूटने नहीं आया है लेकिन अभी भी आपको अपनी कही बात पर खरा साबित होना है तो आपको बेहद आसान ढंग बताना है । चार साल पहले 8 नवंबर को आठ बजे रात आपने घोषणा की थी पांच सौ और हज़ार रूपये के नोट आधी रात के बाद बंद करने को लेकर । अब वही पुराने नोट आरबीआई की अलमारी में रद्दी की तरह पड़े हुए हैं जिनका कोई उपयोग नहीं है आपको उन्हीं बंद नोटों को जनता को बांटना है ये घोषणा खुद 8 नवंबर 2020 को ठीक 8 बजे करने की ज़रूरत है । हींग लगे न फिटकरी और रंग भी चौखा आने का ये सबसे लाजवाब उपाय है । चलन से बाहर हैं तो क्या हुआ सरकार बांटेगी तो लोग कतार में खड़े होकर उन बेकार करंसी नोटों को भी ले लेंगे । मैंने सही पता लिख कर स्पीड-पोस्ट से उनको भेज दी है इसलिए मुमकिन है सही समय पर आपको ये घोषणा सुनकर सदमा नहीं लगे या आप विचलित नहीं हों इसलिए आपको सावधान किया जा रहा है । 

  कल्पना कीजिए ये सपना सच हो जाये तो क्या होगा । आपको टीवी पर सीधे भाषण में पचास दिन तक जिस जिस ने जितने पुराने नोट जमा करवाए थे उनका हिसाब आधार कार्ड से जोड़ने को कहा जाएगा । आपने भले इक नोट भी जमा नहीं करवाया हो पंजीकरण करवाना ज़रूरी होगा क्योंकि 15 - 15 लाख की खैरात सभी को बड़े छोटे रईस गरीब को इक समान मिलेगी । छोड़ो क्या फायदा कहने की मूर्खता मत करना क्योंकि ये हज़ार और पांच सौ वाले नोट वास्तव में बेकार नहीं हैं । अभी भी कुछ लोग उनको लकी मानते हैं और हमेशा जेब में रखते हैं उनका भरोसा है ऐसा करने से उनकी जेब कभी खाली ही नहीं होती है । वास्तव में उन पुराने नोटों को जब छापा गया था तब बड़े शुभ मुहूर्त को ध्यान में रखा गया था इसलिए उनको खर्च नहीं करना केवल तिजोरी या घर की अलमारी में रखना ही फलदाई होता है । आपने पैसा पैसे को खींचता है ये सुना होगा बस यही नोट हैं जो चुंबकीय शक्ति वाले हैं आपको दीपावली पर लक्ष्मी पूजन उन्हीं से करना शुभ मंगलकारी साबित हो सकता है । लालच बुरी बला है लोग पढ़ लिखकर लालच में मूर्खता करते हैं ये अभी किसी डॉक्टर ने विदेश से आकर इक ठग से सोने का चिराग़ खरीदा दो करोड़ देकर । जब अपनी काबलियत से इतना धन कमाया था तब लालच में आकर बिना मेहनत धन पाने की चाहत रखना पागल बनना होता है । पागलपन में सही गलत की समझ नहीं रहती है । सावधानी के लिए फिर पुरानी कहानी याद करते हैं । 

किसी लालची को किसी ने वरदान मांगने को कहा और उसने यही वरदान मांग लिया कि जिस चीज़ को हाथ लगाए वही सोने की बन जाये । तथास्तु कह दिया वरदान सच साबित हुआ । जब उसने रोटी खानी चाही तो अनाज की रोटी सोने की धातु की बन गई जो चबाई नहीं जा सकती भूख नहीं मिटाती । उसने अपनी पत्नी बच्चे जिनको भी छुआ वो भी सोने के बन गए निर्जीव धातु की मूर्ति की तरह । कोई ऐसा वरदान पाकर सत्ता पर बैठा हुआ है और उसका नतीजा सामने है धन दौलत मौज मस्ती नाम शोहरत सब पाकर भी वास्तव में भूखा है खाली झोला लिए रहता है उठाकर चलने को मगर अब धरती पर चलने की आदत भूल गया है हवा में उड़ने की लत लगी है । अफ़सोस आसमान पर अभी कोई घर बनाकर नहीं रह सकता जिसने धरती पेड़ पौधों से नाता तोड़ लिया उसकी दशा वही जानता है । 15 लाख लेने से पहले ज़रा समझ लेना अंजाम यही हो सकता है । 
 

 

अगस्त 12, 2020

POST : 1362 इक गुनहगार जैसी ज़िंदगी ( हिक़ायत ) डॉ लोक सेतिया

   इक गुनहगार जैसी ज़िंदगी ( हिक़ायत ) डॉ लोक सेतिया 

मैंने भूलना चाहा था भुलाया भी मगर भूली हुई कहानी हमेशा की तरह फिर से याद आई और मुझे तेरे मंदिर की चौखट पर ले आई चुपचाप आंसू बहाने को । कितनी बार पहले भी निराशा के घनघोर अंधेरे में चला आता रहा तेरे पास कोई और नहीं जिसको अपनी व्यथा कहता । जिनको हंसी ख़ुशी नहीं दे सका उनको अपने दर्द और बेबसी के आंसू कैसे दिखलाता उनके मन को और तकलीफ़ देने का मुझे कोई अधिकार नहीं है । मैंने कभी किसी को कुछ भी नहीं दिया देना चाहा मगर दे पाया नहीं विवशता थी चाहे बदनसीबी । तुम हो भी कि नहीं हो क्या खबर लेकिन अपनी बदनसीबी का इल्ज़ाम और किसी पर कैसे धरता भला । भरोसा था कभी तो कोई उजाला होगा मेरे जीवन में पर इतनी लंबी ज़िंदगी में घना अंधेरा छोड़कर कोई सवेरा रात के बाद लेकिन मेरे जीवन में कभी किसी रात की कोई सुबह नहीं हुई । शायद कभी कभी थोड़ी रौशनी मुझे मिली भी तो जैसे मांगी हुई क़र्ज़ की तरह या उधार की अथवा चुराई हुई जिस पर मेरा हक नहीं था । मेरे हाथ खाली रहे और दामन में कांटे ही कांटे भरे हुए कोई फूल नहीं था किसी को देने क्या तुझे चढ़ाने तक को । मेरे आंसू मेरी आहें शायद तुझ पर भी कोई असर नहीं ला सकीं कभी । बस तेरे दर पर आकर रोने आंसू बहाने से मन का बोझ कुछ हल्का हो जाता रहा और मुझे इक झूठी उम्मीद इक दिलासा मिलता रहा कि अब शायद मेरी फरियाद सुनकर तुझे रहम आएगा और मेरी परेशानियों का अंत हो जाएगा । 

     मुझे दुनिया से कोई गिला शिकवा शिकायत करने का कोई अधिकार ही नहीं था क्योंकि मैंने कभी किसी अपने की दोस्तों की आशाओं को पूरा नहीं किया था । चाहना कोशिश करना ये तो झूठे बहाने हैं अपनी हर नाकामी को छुपाने को । वास्तविकता यही है मुझसे किसी की उम्मीदें पूरी हुई नहीं कभी । हर कोई मुझे बड़ा खुशनसीब और अमीर समझता रहा जबकि मैंने हर दिन जीने को अपने दर्द आंसू और बेबसी का सौदा किया हालात से विवश होकर । भगवान मैंने कोई बहुत अधिक नहीं मांगा तुझसे बड़े छोटे छोटे सपने रहे हैं मेरे पल भर कोई हंसी ख़ुशी और जीवन में कुछ साल महीने या गिनती के दिन ऐसे जैसे कोई ख्वाब हो । मेरी मज़बूरी है तुझ पर आस्था विश्वास खोकर जीने को और कोई साहरा ही नहीं था । ये भी सच है कि मुझे आता नहीं है तुझे किसी तरह से मनाना भी जाने कैसे करते हैं तेरी पूजा आरती इबादत सभी लोग । मेरा मन भटक जाता है जब भी तेरे सामने बैठकर कोशिश की तुझे मनाने की तेरा गुणगान भजन कीर्तन करना नहीं आता है मन ही मन तुझसे अपनी बात कहना आता है अपने दुःख दर्द और अनचाहे भी बहने वाले आंसू रोकना नहीं आया मुझे , तुझे भी देखना भला कैसे भाएगा जब कोई किसी को रोते बिलखते देख कर खुद को परेशान नहीं करना चाहता है । 

   कितनी बार सोचा था अपनी व्यथा कथा जीवनी लिखने को मगर लिखी गई नहीं क्योंकि दुनिया में किसी को दोष देना उचित नहीं था मुझे किसी अपने पराये से कोई शिकायत क्यों होती जब मैंने भी किसी की आशाओं को पूरा किया नहीं कभी । सभी का मुजरिम मैं रहा गुनहगार बनकर सज़ा मांगता रहा मिलती भी रही जीवन भर मुझे सज़ाएं । कभी तो तुझसे शिकवा गिला करता रहा कि तुमने मुझे दुनिया में जन्म दिया तो क्या इस तरह बेबसी भरी ज़िंदगी जीने को । कुछ तो लिखता मेरे नसीब में जो वास्तव में ज़िंदगी कहलाता । मांगना क्या है बताना किसे है तुम सभी कुछ जानते हो खुद ही समझ लो पता नहीं कितना और जीना बाकी है आखिर वक़्त ही सही चाहता हूं अपने मन के बोझ को उतार अपने सभी क़र्ज़ बकाया उधार चुकाकर तेरे पास कोई और दुनिया अगर है तेरी तो आकर इतना ज़रूर पूछूं मेरा कसूर क्या था जो इस तरह की ज़िंदगी मिली मुझे । 
 

 

जुलाई 31, 2020

POST : 1356 मां ने कहा है बेटा बहु को ले आओ ( कहानी ) डॉ लोक सेतिया

   मां ने कहा है बेटा बहु को ले आओ ( कहानी ) डॉ लोक सेतिया 

चिट्ठी लिखी है मां ने बेटे के नाम । सबसे ऊपर लिखा है राम जी का नाम । फिर लिखा है करना है इक ज़रूरी काम । इस से पहले कि आगाज़ करो याद करो शपथ निभाने को भूलने का अंजाम । दो शब्दों में समझ लो किस्सा तमाम देखो ढलने लगी है जीवन की शाम । बनाओ जो भी बनाना है बनाओ पर पहले मेरी बहु को घर पर ले कर आओ फिर आशिर्वाद दोनों मिलकर मुझसे पाओ । संग संग भूमिपूजन करते हैं ये बात है सच सच से नहीं मुकरते हैं । रामायण पढ़ी है तुमने कभी बच्चे धार्मिक अनुष्ठान बिन अर्धांगनी हैं आधे अधूरे कच्चे । बनवानी होगी कोई सोने की सबसे ऊंची मूर्ति छोटी बनाना तुम नहीं जानते क्या अपनी मां का कहा भी नहीं मानते । तैयार है कब वो आने को दुलारी है सुहागिन मेरी है दुलारी तुम राजकुंवर तो वो भी है इक राजकुमारी। इक बात समझ लो पत्नी से नहीं जीतोगे ये है वो जिस से सब दुनिया है हारी । ये राम राज्य कैसा है महलों में शान से रहते राजा और बन बन भटकती है जनक दुलारी । मां हूं बेटे के अवगुण कैसे बताऊं मुझे नहीं मालूम घर को स्वर्ग कैसे बनाऊं मैं ये ज़िद छोड़ो घर बहु लो लाऊं मैं मन की बात मैं भी उसको बताऊं मैं अपने हाथों से महंदी उसको लगाऊं मैं दुल्हन की तरह खुद उसको सजाऊं मैं । मेरा घर बने मंदिर कहीं और क्यों जाऊं मैं । खत्म करो सुनी थी दादी नानी से जो कहानी । इक था राजा इक थी रानी । शर्म को चाहिए चुल्लू भर पानी कब तक चलेगी आखिर मनमानी । खत को तार समझना कहीं मत बात को बेकार समझना पहले कभी नहीं समझे हो इस बार समझना । सात कसम निभाने का व्यवहार समझना ।

चिट्ठी पढ़कर सुनाई अधिकारी ने और पूछा लिखना है कोई जवाब भेजना है आपको मां को । सरकार को हंसी आई कहने लगे कौन किसकी मां अब कौन किसका भाई । तुमको हमारी बात अभी तक समझ नहीं आई । मेरा नहीं है कोई किसी से नाता कुर्सी है भगवान मेरा कुर्सी है मेरी माता दुनिया के रिश्ते नाते और सभी भली बातें इश्तिहार की है बात मेरे दिन उनकी हैं घनी अंधेरी रातें । मां से होती हैं इक दिन मुलाकातें हमने कभी किसी की समझी नहीं मन की बातें ये चालें राजनीति की सीखी हैं हमने घातें भोले हैं लोग क्या जाने सत्ता की होती हैं सूखी बरसातें । मां ही नहीं भगवान भी हमने नहीं बुलाये ये मामले अजब हैं अब कौन उनको बताये मंदिर मस्जिद क्यों जाते हैं बनवाये राजनेता कभी किसी के होते नहीं हैं अपने हम हैं सभी के अपने और सभी हमारे लिए पराये । मतलब है जिनसे वही लोग हैं बुलाये पत्नी और मां हैं दूर से अच्छी लगती कोई पांव की है बेड़ी हमने ली छुड़ाय मां को कौन पैर उसके दबाये हर गलत बात पर कोई क्यों डांट खाय । हमने सीखा है बस यही उपाय जवाब लिखेंगे सब कुछ बीत जाये लिख देंगे चिट्ठी मिली है बाद में मां आपकी मिलती समय पर तो क्या सकते थे आदेश को ठुकराय । ये राम जानते हैं कोई झूठ मत बुलवाए  आएगी घड़ी सासु-बहु को आएंगे हम लिवाय ये सपना आपका कहीं सच हो नहीं जाये । दिल मोरा मैया मोरी सोच सोच घबराये बासी रोटी कौन भला खाये जब हलवा पूरी मिले छपन्न भोग लगवाए । 
 

 

जुलाई 11, 2020

POST : 1345 गणिका डाकू और सिपहसलार ( व्यंग्य-कथा ) डॉ लोक सेतिया

   गणिका डाकू और सिपहसलार  ( व्यंग्य-कथा ) डॉ लोक सेतिया 

    जाने कितने आशिक़ थे उस के जो उसकी अदाओं पर फ़िदा थे । उसका नाच देखते गाना सुनते और उस पर अपनी दौलत उड़ाते रहते । इक डाकू उस से दिल लगा बैठा और उसे कहा बाकी सब को अपने ठिकाने पर आने से रोक दो बस मेरे लिए नाचना गाना होगा । गणिका भला किसी एक की होकर कैसे रहती उसने नगर के सिपहसलार को संदेसा भिजवा कर अपने ठिकाने बुलवा लिया । जैसे सभी को अपनी सच्ची मुहब्बत का भरोसा दिलवाना जानती थी सिपहसलार को भी अपने प्यार के जाल में फंसा लिया । जब लगा वो पूरी तरह बस में है तो डाकू से बचाने की बात कह दी । सिपहसलार ने अपने कितने राज़ गणिका को बता दिए जिसे जानकर गणिका को लगने लगा कि शायद डाकू उसको माफ़ कर भी दे गलती मानने पर लेकिन ये जो नगर का सुरक्षा का काम करने को नियुक्त किया गया है शासक द्वारा डाकू से अधिक खतरनाक है ।

  काफी समय तक गणिका दोनों से मुहब्बत का दिखावा करती रही निभाती रही अपने ठिकाने पर किसी को भी नहीं आने दिया और उन दो सिरफिरे आशिक़ों से उनके अपनी माशूक़ा को दिए ठिकानों पर मिलती रही । राजदरबार में गणिका की अच्छी जान पहचान बढ़ती गई और कई रईस नवाब उसको छुपकर अकेले में मिलते रहे । धीरे धीरे गणिका का रुतबा राजा के दरबार से उसके महल तक होता गया । इक गणिका और चाहने वाले तमाम लोग आपसी रंजिश हो गई और बढ़ते बढ़ते जान से मरने का खेल होने लगा । ऐसे में जो कभी नहीं होना संभव था हो गया जब खुद गणिका को कोई इतना भाया कि नगर छोड़ उसके साथ किसी और राजा के राज्य में चली गई । मगर जाने से पहले डाकू को भी और सिपहसलार को भी खत लिख कर दोनों को दूसरे पर अपहरण करने की धमकी देने की बात बता गई ताकि वो आपस में उलझे रहे और उसे कहीं तलाश नहीं करें ।

   सिपहसलार ने अपने सिपाही डाकू को पकड़ मारने को भेज दिए मगर डाकू को पहले ही जानकारी मिल गई थी और डाकू  गिरोह ने सिपहसलार के सिपाही को मार डाला । ये खबर होते ही सिपहसलार ने जाकर डाकू का ठिकाना तहस नहस कर दिया जब उसको पकड़ नहीं सका । बस हर तरफ शोर मच गया सिपहसलार के सिपाही डाकू के शिकार हो गए हैं । आखिर उसने इक इक कर डाकू के सारे साथी मौत के घाट उतार डाले मगर सरगना को नहीं पकड़ सका । मगर फिर इक और गणिका ने डाकू को बचाने और सिपहसलार से समझौता करवाने का वादा किया और अपने पास डाकू को हिरासत में पकड़वा दिया । सौदेबाज़ी में कोई गड़बड़ नहीं हुई मगर उस से दूर जाने पर सिपहसलार ने अपनी माशूक़ा गणिका को लेकर पूछा तो बात बिगड़ गई और सिपहसलार के सिपाहियों ने उसके आदेश पर डाकू को कत्ल कर दिया । जिस गणिका के पास कितने ही राज़ थे उसका कभी कोई पता नहीं चला और राजा ने अपने सिपहसलार को मौत की सज़ा दे दी ये सोचकर कि उसने गणिका को कहीं अपने पास रख लिया है ।
  
         गणिका अभी भी नाच रही होगी किसी और को खुश करने को जो उसकी बाज़ारी मुहब्बत जो बिकती है सिक्कों की खातिर को असली समझ जान लेने जान देने का खेल खेलने को तैयार हैं ।

मई 14, 2020

POST : 1297 सोने-चांदी के कलम नहीं लिखेंगे आंसू की दास्तां ( गरीबी की पीड़ा ) डॉ लोक सेतिया

सोने-चांदी के कलम नहीं लिखेंगे आंसू की दास्तां ( गरीबी की पीड़ा ) 

                                     डॉ लोक सेतिया 

जो लिखना चाहता हूं उस असहनीय दर्द की व्यथा कथा को लिखने को अश्कों का इक समंदर चाहिए । पता नहीं जो टीवी पर अपने घर किसी तरह वापस जाते भूखे नंगे गरीब मज़दूर महिलाएं बच्चे सैकड़ों मील का फासला धूप या बारिश जैसा भी मौसम हो जाते नज़र आ रहे हैं उनकी पीड़ा को कोई समझ भी रहा है । उनकी बदहाली को भी टीवी चैनल वाले बताते दिखलाते हैं तब रत्ती भर भी मानवीय संवेदना उनके चेहरे और खबर बताने के ढंग में दिखाई नहीं देती है । दो दिन से तो मोदी जी की भारत सरकार द्वारा की बीस लाख करोड़ की घोषणा की चर्चा से अधिक महत्व किसी और विषय का नहीं का रह नहीं गया है । सरकार के लोग टीवी पर आकर बीस लाख करोड़ का विवरण बताते हुए अपने चेहरे पर गर्व और मुस्कुराहट लिए नज़र आते हैं जिसे देख कर लगता ही नहीं उनको करोड़ों बेबस उन गरीबों की दशा का कोई एहसास भी है । खुद ही अपनी पीठ थपथपाते लगते हैं जबकि जो भी किया गया या किया जाना है वो कोई उपकार नहीं है आपको करना ही चाहिए था और माफ़ करें ये जनता का धन है जनता के लिए ही है कोई महानता की बात नहीं है । क्या हम को अपनी साहूलियत से इस बात को अनदेखा कर देना चाहिए कि कोरोना को लेकर लॉक डाउन घोषित करने से पहले क्यों सरकार को देश की सबसे नीचे की पायदान पर गरीबी रेखा से नीचे के करोड़ों उन मज़दूरों की कोई चिंता नहीं होनी चाहिए थी जो अपने घर से हज़ार मील दूर रोज़ी रोटी की खातिर गए हुए हैं । अगर आप कोरोना की आहत होने के बाद भी नमस्ते ट्रम्प आयोजित करते हैं तो क्यों नहीं काम और सभी अन्य तरह की रोक लगाने से पहले उनकी उचित व्यवस्था करते । घोषणा करने से हुआ कुछ नहीं लोग बेसहारा और मज़बूर होकर अपनी जान हथेली पर रखकर निकल पड़े । 

हमने सुनी हैं दर्द की कहानियां उन से जो आज़ादी के समय बंटवारा होने पर इधर आये उधर से या उधर गए इधर से । मुहाज़िरनामा , मुनव्वर राणा की ज़ुबानी सुनते ही आपकी आंखें अगर नम नहीं होती है तो फिर आप ज़िंदा नहीं हैं एहसास मर चुके हैं । मगर तब हालात और थे नफरत की आग थी दोनों तरफ ही और कोई नहीं जानता था जिधर जा रहे हैं उधर भविष्य क्या होगा । सब कुछ छोड़ या जितना मुमकिन था समेट कर घर नहीं मकान नहीं शहर नहीं बहुत कुछ छोड़ आये थे । जाने कितने साल लगे थे उनको फिर से खुद को खड़ा करने में फिर भी जीवन भर इक तीस चुभती रहती थी जब कोई उनको शरणार्थी कोई मुहाज़िर कह कर बुलाता । आज अपने ही देश में अपने ही घर लौटने में अपनी ही बनाई सरकारों की असंवेदनशीलता ने जो दर्द उनको दिया है वो बंटवारे से बढ़कर है । उस से अधिक खेदजनक बात है देश राज्य की सरकार के साथ बाकी समाज का भी उनको लेकर उदासीन नज़र आना । आपने सोचा नहीं होगा भले जानते हैं कि देश की सड़कें बहुमंज़िला इमारतें आलीशान बाजार जहां जो भी है इन्हीं की मेहनत और पसीने से ही निर्मित हैं । कोई उद्योग कोई विकास इनके बिना नहीं मुमकिन था मगर जब इनको ज़रूरत थी कोई आसरा नहीं कोई दर्द बांटने वाला नहीं मिला । अपनी सबसे अधिक पसंद की गई ग़ज़ल से कुछ शेर यहां उपयुक्त हैं । 

ग़ज़ल - डॉ लोक सेतिया


हमको ले डूबे ज़माने वाले ,
नाखुदा खुद को बताने वाले।

देश सेवा का लगाये तमगा ,
फिरते हैं देश को खाने वाले।
उनको फुटपाथ पे तो सोने दो ,
ये हैं महलों को बनाने वाले।

तूं कहीं मेरा ही कातिल तो नहीं ,
मेरी अर्थी को उठाने वाले।

मैं तो आइना हूँ बच के रहना ,
अपनी सूरत को छुपाने वाले।

उन लाखों लोगों के आंसू भी खुश्क हो चुके हैं उनके चेहरे जाने कैसे अपनी निराशा और बेबसी को छुपाए अपने बच्चों की भूख और पांव के छालों को अनदेखा कर चल रहे हैं । जाने कितने कब कैसे कोरोना से नहीं अव्यवस्था का शिकार हो कर परलोक सिधार गए कोई उसका दोषी नहीं कोई मुजरिम नहीं । आज उनकी मौत कोई हादिसा नहीं कोई समाचार नहीं और कुछ दिन बाद उनके लंबे दर्द भरे सफर की भी कोई बात किसी इतिहास के पन्ने पर दर्ज हुई नहीं दिखाई देगी । उनकी मौत बेमौत मरना उनकी नियति समझी जाएगी और हमेशा की तरह गरीबी अभिशाप है कहकर भूल जाएंगे गरीबी क्यों है । आज बीस लाख करोड़ का पैकेज कोई पहला नहीं है पचास साल से कितनी योजनाओं का नतीजा शून्य रहा है । और ये तो घोषणा गरीबी को मिटाने की है ही नहीं ये तो है अर्थव्यवस्था को फिर से खड़ा करने की । जिनके पास कुछ है उनको थोड़ा और साथ या सहारा देने की बात है जिनके पास कुछ भी नहीं उनके लिए कुछ है भी नहीं ।

 बीस लाख करोड़ की राशि को बताते हुए टीवी वाले दो के बाद 13 जीरो लगती हैं सुनकर इक बात का ख्याल आया की आज से पांच सौ साल पहले बीस रूपये की कीमत कितनी होती थी । तब नानक को पिता ने बीस रूपये देकर कोई अच्छा कारोबार करने को भेजा था । रस्ते में उनको कुछ भूखे साधुओं की टोली मिली । तब उनको लगा इनको रोटी खिलाने से अच्छा और कोई कारोबार क्या हो सकता है । और उन्होंने सारे बीस रूपये इसी नेक काम पर खर्च कर दिए थे । वो इक अकेले इंसान की बात थी पांच सौ साल पहले । मुझे नहीं लगता आज इतने बढ़े देश की सरकार के बीस लाख करोड़ की कीमत उस से बढ़कर होगी । मगर इन में भी वास्तव में भूखे गरीबों को क्या कब कितना मिलता है विश्वास से कोई नहीं जानता क्योंकि भाषण बहुत सुनते रहे हैं हुआ क्या सामने है । दो और बातें हैं जो बाद में कहनी हैं इक गांव की मुखिया की बेटी ऐश्वर्या की और इक बड़ी पुरानी कविता पंजाबी की ।

                    वतन से इश्क़ गरीबी से बैर और प्यार अमन से ,

                         सभी ने ओढ़ रखे हैं नकाब जितने हैं।





अप्रैल 10, 2020

POST : 1259 कौन भले कौन मंदे ( अफ़साना ए कुदरत ) डॉ लोक सेतिया

  कौन भले कौन मंदे ( अफ़साना ए कुदरत ) डॉ लोक सेतिया 

आपने जाने किस किस को खुदा भगवान मसीहा समझा हुआ था घोषित किया हुआ था । और जाने किस किस को अपनी ताकत दौलत शोहरत और किस किस का अहंकार है या रहा है । आज इक अनाम या बदनाम शब्द ने सबको अपने सामने बौना ही नहीं साबित कर दिया बल्कि सोचने को विवश कर दिया है कि मौत के सामने किसी की नहीं चलती है और जब मौत का डर सताता है तो कुछ भी और याद नहीं रहता है । दुनिया बनाने वाले ने किसी को बड़ा छोटा अच्छा बुरा नहीं बनाया था हमने ही कितनी तरह से इंसान को इंसान से और इंसानियत से अलग करने का अपराध किया है । हम भूल गए थे मौत से डरना चाहिए और ये भी कि सजन रे झूठ मत बोलो खुदा के पास जाना है । मैली चादर ओढ़ के कैसे द्वार तुम्हारे आऊं । अपने अपने स्वार्थ में अंधे होकर हर किसी ने केवल खुदगर्ज़ी की सोच रखकर अपने लिए इतना जमा कर लिया कि बाकी के लिए छोड़ा नहीं कुछ भी । आपके ऊंचे ऊंचे महल और कितने ही साधन धन दौलत किसी काम के नहीं हैं जब कोई इक ऐसा शब्द आपके सामने खड़ा हो ।

   भारत में ही बताते हैं कि सौ लोगों के पास जितना है उसका दस बीस फीसदी बाकी करोड़ों को मिला है क्या ये अनुचित और अपराध नहीं है । चाहे किसी ने मंदिर मस्जिद गिरजाघर गुरूद्वारे के नाम पर या उपदेशक बनकर शहर शहर गांव गांव अपने डेरे अपने आलीशान बड़े बड़े भवन बना रखे हैं और उनकी कोई सीमा नहीं है और अधिक की चाह की या कोई उद्योगपति या कारोबारी या इधर तो समाज सुधारक से योग सिखाने से स्कूल कॉलेज में शिक्षा का व्यौपार करने या बड़े बड़े अस्पतालों में उपचार के नाम पर अधिक से अधिक धन संचय करने वाले लोग एवं राजनीति और सरकारी विभाग के अधिकारी से कलाजगत से टीवी अख़बार के लोग ये सभी अपने वास्तविक धर्म कर्म को छोड़ केवल इक अंधी दौड़ में शामिल हैं । और बड़ा और ऊंचा और अमीर और ताकतवर बन जाने के पागलपन में ये जानते हुए भी आखिर इंसान को दो ग़ज़ ज़मीन ही चाहिए या शायद वो भी नहीं बस राख बनकर बिखर जाना है । अर्थशास्त्र का सिद्धांत है कि किसी के अधिक तभी होता है जब किसी को कम मिलता है और अमीर बनने का तरीका किसी को गरीब बनाकर हासिल होता है । जब सबको अपनी काबलियत महनत का सही मूल्य मिले तब अमीर और अमीर गरीब और गरीब नहीं हो सकते हैं । 

  कभी आपने सोचा है हमने क्या किया है धरती को कुदरत को सुरक्षित नहीं रख सके बल्कि उसका अस्तित्व खतरे में डालते रहे हैं अपनी ज़रूरत और चाहत पूरी करने को । बड़े बड़े विनाशकारी हथियार बनाते रहे मगर बातें विश्व कल्याण की करने का आडंबर करते रहे । हर कोई आदमी से देश तक अपने से कमज़ोर को मिटाने की कोशिश करता रहा सबसे बड़ा ताकतवर होने को । चांद को छूना कितना ज़रूरी है क्या चांद पर जाओगे आज भागकर मौत से घबराकर । मौत इक हक़ीक़त है आनी ही है ये जानते हैं मगर फिर भी समझते रहे जैसे करोड़ों साल जीना है इतना सामान इकट्ठा किया है कुछ मुट्ठी भर लोगों ने क्या आज अपना सब कुछ दे कर इक पल भी जीवन खरीद सकते हैं । आज वैज्ञानिक करोड़ों रूपये खर्च कर गार्ड पार्टिकल की खोज कर समझते हैं हम शायद कोई अपनी दुनिया बना सकते हैं । नानक जी ने ये बात कितनी आसानी से समझाई थी कुछ शब्दों में ।

 अव्वल अल्लाह नूर उपाया , कुदरत दे सब बंदे ।

 एक नूर ते सब जग उपजेआ कौन भले कौन मंदे । 

  धर्म की महनत की कमाई मिलकर बांटकर खाना सबकी भलाई का सबक देकर आदमी को अंधविश्वास और  भ्रमजाल से जागरूक करने का कार्य किया । ईश्वर को मानते थे सर्वेश्वरवादी थे रूढ़ियों कुसंस्कारों का विरोध किया और ईश्वर का साक्षात्कार बाह्य साधनों से नहीं वरन आंतरिक साधना से संभव है ये कहा । उनके दर्शन में वैराग्य तो है साथ ही तत्कालीन राजनीतिक धार्मिक और सामाजिक दशाओं पर भी नज़र डाली । संत साहित्य में शायद वही अकेले हैं जिन्होंने उस युग में भी नारी को बड़प्पन दिया है । हिंदू मुस्लिम या अन्य सभी को उपासना की अच्छे मार्ग पर चलने की बात की है । यहां सिख धर्म की बात नहीं है मगर ऐसे सभी साधु संतों की बात है जो समानता और आपसी मेल मिलाप की सीख देते रहे हैं ।

   पिछले कई सालों से नफरत की फसल बोने का काम करते रहे हैं लोग लोकलाज छोड़ किसी व्यक्ति को बदनाम करते रहे झूठ सच की मिलावट से । गांधी को आपने भी अपनाया कब उपयोग किया है समाधि पर फूल चढ़ाने से गांधीवादी नहीं हो जाते बल्कि गांधी को जाने कितनों ने मरने के बाद भी उनकी आत्मा को घायल किया है । अंतिम व्यक्ति की आंख का आंसू पौछना छोड़ आपने अपने बाणों से हर किसी को रुलाया भी और करोड़ों की मुश्किल बढ़ाई पर अपनी भूल नहीं स्वीकार की । ये किस धर्म की शिक्षा है कि जिस देश में करोड़ों लोग बेघर हैं भूखे हैं उनको जीने की बुनियादी ज़रूरत की चीज़ें नहीं मिलती सरकार या सत्ताधारी लोग अथवा धनवान अपने पैसे को आडंबर करने अपने ऐशो आराम करने ही नहीं उन लोगों की समाधियां और मूर्तियां बुत बनाने पर देश का धन सम्पदा बर्बाद करने का पाप करें । ऐसा करके उनको जीवित नहीं बार बार मरते हैं । अपने से पहले हुए राजनेताओं की गलतियां बुराईयां आपको दिखाई देती हैं मगर ये नहीं नज़र आया उनका योगदान भी रहा है देश समाज को बनाने में । औरों को छोटा साबित करने को आपने नफरत का ज़हर हर तरफ फैलने दिया या फैलाया है । नानक कबीर को छोड़ो आपने तो जेपी जैसे व्यक्ति या विनोबा भावे जैसे संत की भी विचारधारा को नहीं समझा है । मंदिर मस्जिद के झगड़े किसी देश समाज की भलाई नहीं कर सकते हैं आपसी बैर भेदभाव को बढ़ाना देशभक्ति कदापि नहीं है । 

     सत्ता पाने की खातिर कितना धन खर्च किया क्या क्या हथकंडे नहीं अपनाये और सत्ता का गलत उपयोग कर ही आपके दल को कोई नहीं जानता किस किस ढंग से इतना पैसा मिला कि दुनिया का सबसे अमीर राजनैतिक दल आपके दल को समझने लगे हैं । जिनको लगता है यही सब होना ताकतवर होना है उनको पिछले इतिहास को पढ़ना समझना होगा । भारतवर्ष की परंपरा उनको आदर्श मानने की रही है जिन्होंने अपना सब कुछ जनकल्याण पर खर्च किया न कि जिन्होंने अपने नाम अपनी आकांक्षाओं पर देश का धन बर्बाद किया । जिनको आपने खराब समझा समझाया और साबित करने की कोशिश की उन्होंने भी अपने आप पर बेतहाशा धन खर्च नहीं किया होगा । लोग औरों की की गलतियों से सबक लेते हैं उनको दोहराते नहीं तभी समझदार कहलाते हैं अन्यथा जो आज ज़िंदा नहीं उनकी आलोचना कर उनका क्या बिगाड़ लेंगे खुद को ही इक ऐसा व्यक्ति साबित कर सकते हैं जो ऊंचा होकर भी किसी को साया नहीं देता न ही उसके फल किसी को मिलते हैं । खजूर की तरह ऊंचे पेड़ जैसी मूर्तियां बनाना व्यर्थ है ये मिसाल जानते हैं । अच्छी अच्छी चिकनी चुपड़ी बातें करने से क्या हासिल जब भी कोई निष्पक्ष होकर विवेचना करेगा तो न केवल आपके गलत निर्णय की बात होगी बल्कि आपने जिन जिन संस्थाओं को अपने मतलब की खातिर नुकसान पहुंचाया उसकी भी चर्चा अवश्य की जाएगी । 

  आपके सामने उद्दाहरण है जब विपत्ति आई तो अमेरिका को उसके हथियार या लड़ाकू विमान नहीं काम आये और भारत से इक दवा की मांग करनी पड़ी । किसी भी अहंकारी का अहंकार हमेशा कायम नहीं रहता है । कहते हैं फलदार पेड़ झुकता है और इतना ही नहीं फलदार पेड़ को कोई पत्थर भी मारता है तो बदले में फल देता है । जिन जिनको भी कुदरत ने समय ने नसीब ने ये सब दिया है उनको कुदरत या ऊपर वाले का उपकार समझ इसका उपयोग औरों की भलाई को करना चाहिए । इतना सबक नहीं सीखा पढ़ा तो धर्म को नहीं जाना है इन लोगों ने मंदिर मस्जिद जाकर बेकार समय और साधन उपयोग किये हैं । मुझे फिर से कवि गंगभाट और रहीम जी की चर्चा याद आई है आखिर में उसकी बात करते हैं । 

रहीम इक रियासत के नवाब थे जो अपने पास आने वाले लोगों की सहयता किया करते थे । इक दिन उनकी सभा में कवि गंगभाट ने देख कर उनसे इक दोहा पढ़कर सवाल किया :-

     सीखियो कहां नवाब जू ऐसी देनी दैन , ज्यों ज्यों कर ऊंचों करें त्यों त्यों नीचो नैन । 

अर्थात नवाब जी आपका ये क्या ढंग है कि जैसे ही किसी को कुछ देते हैं आपका हाथ आगे बढ़ता है ऊपर जाता है मगर तब आपकी आंखें झुकी हुए रहती हैं । रहीम ने उनको जवाब दिया था :-

         देनहार कोऊ और है देत रहत दिन रैन , लोग भरम मोपे करें या ते नीचे नैन । 

अर्थात देने वाला तो कोई और है जो रात दिन देता रहता है मगर लोग समझते हैं मैं दे रहा हूं यही सोचकर मुझे एहसास होता है और मेरी नज़र झुक जाती है । 

   अब जो भी राजनेता सरकार कुछ भी समाज पर खर्च करती है वास्तव में उनकी अपनी कमाई नहीं है देश की जनता का ही धन जनता को देना उपकार नहीं है बल्कि शायद इक अपराध ही है जिस देश में करोड़ों लोग गरीब बदहाल हैं उसके शासक खुद शानो शौकत पर अपने खुद पर इतना धन व्यर्थ खर्च करते हैं । 

        कबीरा खड़ा बाजार में मांगे सबकी खैर , न काहू से दोस्ती न काहू से बैर ।

    समाज की असलियत बताना अपना कर्तव्य है किसी से कोई विरोध नहीं समर्थन नहीं । 


 


       

सितंबर 04, 2019

POST : 1192 ग़म है बर्बादी का क्यों चर्चा हुआ ( अजीब दास्तां है ये ) डॉ लोक सेतिया

       ग़म है बर्बादी का क्यों चर्चा हुआ ( अजीब दास्तां है ये ) 

                                          डॉ लोक सेतिया 

चलो इस तरह हमने दिखला दिया कि हम संवेनशील समाज हैं। साल में दो चार बार ऐसा होता है जब हमारे बीच किसी की संवेदना जाग उठती है और कोई खबर की सुर्ख़ियों में आकर सोशल मीडिया पर छा जाता है। जैसा अभी रानू मरिया मंडल के कोलकात्ता की रेलगाड़ी में इक प्यार का नग़्मा है गीत गाने को लेकर हुआ। हर दिन हादसे का शिकार हो रहे लोगों का वीडियो बनाने वाले किसी भूखे बच्चे और गिद्ध की तस्वीर लेने वाले संवेदनारहित लोग नाम कमा लेते हैं। कोई नहीं सोचता ये किस दुनिया में हम रहते हैं जहां ऐसे हज़ारों लाखों नहीं करोड़ों लोग हुनर क़ाबलियत होते हुए भी जाने कहां कहां अंधेरी दुनिया में घुट घुट कर जीते हैं मर जाते हैं। टीवी चैनल पर किसी रियल्टी शो में मंच पर बैठे और देखने वाले दर्शक दो पल को पलकें भिगो कर इंसानियत का दिखावा करते नज़र आते हैं। और इस के पीछे इक सच छुपा रह जाता है कि उस के इलावा और कितने गुमनामी में बेबसी भरा जीवन जीते हैं क्योंकि यहां काबलियत को नाम पहचान यूं ही नहीं मिलती है मिलती है किसी बड़े की ख़ास शख्सीयत की निगाह ए रहमदिली पड़ने के बाद। और कौन बनेगा करोड़पति जैसे शो में कितनी तरह से कैसे भी कमाई करने वाले लोग दयालु बनकर उभरते हैं और उनके पास धन दौलत के अंबार कैसे जमा हुए इसकी बात कोई नहीं करता है। आपको ख़ुशी होती है किसी एक की भलाई हुए जानकर मगर कितने नहीं आये सामने कोई नहीं सोचता है। हम जिसे संवेदनशीलता समझते हैं वास्तव में वो हमारी समाज की और उच्च वर्ग की बेहरमी को दिखाता आईना हो सकता था जिसको शोषण करने वाले वर्ग ने ही तमाशा बना दिया है। 

  ये समाज रहमदिल नहीं रहा है हम अपने आस पास बेबस लोगों से कोई सहानुभूति नहीं रखते हैं कोई किसी को सहारा नहीं देता है कोई गरीब भूखे को खाना खिलाना इंसानियत नहीं समझता है। हम जाकर किसी दिन किसी को पैसे भोजन देते हैं औपचारिकता निभाने को रस्म अदायगी को अमावस को किसी त्यौहार के दिन। हमारी सरकार भी यही करती है मतलब और शोहरत की खातिर कोई ऐलान करती है और साथ साथ कोई और ढंग अपना कर अपनी तिजौरी भरती जाती है। दान का चर्चा घर घर पहुंचे लूट की दौलत छुपी  रहे , नकली चेहरा सामने आये असली सूरत छुपी  रहे। क्या मिलिए ऐसे लोगों से जिनकी फ़ितरत छुपी रहे।  इज़्ज़त फ़िल्म का ये गीत बड़े लोगों की असलियत को ब्यान करता है। फिर बार बार दोहराना पड़ता है अपने नाम शोहरत या कोई मकसद हासिल करने को कितना पैसा बर्बाद करते हैं रईस लोग राजनेता अमीर लोग और सरकारी विभाग भी इश्तिहार छपवाने लगवाने पर क्या उस से कोई समाज की भलाई करने की बात सोचता है। दान भी देते हैं तो नाम लिखवा कर अपनी दयाशीलता का दिखावा करने को। अधिकांश लोग उन्हें दान देते हैं जिनको शायद सहायता की ज़रूरत नहीं होती और उन्होंने इस को धर्म का नाम देकर अपने लिए सुख सुविधा का उपाय कर लिया है। वास्तविक धर्म ये नहीं कहता है सच्चा दान वो है जो आप किसी अपने पहचान वाले की तसल्ली को नाम को दिखावे को नहीं देते जब किसी को असहाय देखते हैं तो चुपचाप दे देते हैं। सच बताओ अब किस किस धर्म की जगह भूखे की भूख मिटाने का धर्म निभाया जाता है किस जगह कोई मुसाफिर या बेघर आसरा पा सकता है। 

     हम सब की अपनी चाहत और अधिक पाने की और शानो शौकत दिखाने की हमको किसी और की मज़बूरी किसी की तकलीफ़ दर्द मुसीबत समझने देती ही नहीं है। हमारा समाज अजीब है जो आडंबर पर जितना बर्बाद करता है उतने से बहुत सार्थक भलाई का काम किया जा सकता है। हर दिन समाज सरकार कितना धन खर्च करती है अनावश्यक आयोजन करने आदि पर और नेता अधिकारी अपने खुद पर। जितना खाते हैं उस से अधिक फैंकते भी हैं किसी कचरे के डिब्बे में या कभी गटर में भी जाता है भोजन। अपने कितने ऐसे दाग़ को ढकने को कभी कभी ऐसा कुछ करते हैं तो भी अपने नाम का डंका पीटते हैं। हमारा देश और समाज कुछ और हुआ करता था जैसे कोई चमन हो अब तो इक सहरा बन गया है किसी रेगिस्तान की तरह है और ये जो हम समझते हैं पानी है सबकी प्यास बुझाएगा वास्तव में इक मृगतृष्णा है। ये चमक झूठी है भटका रही है।