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मार्च 22, 2026

POST : 2073 आदेश शैतान का ( नई व्यंग्य कथा ) डॉ लोक सेतिया

        आदेश शैतान का ( नई व्यंग्य कथा ) डॉ लोक सेतिया  

शैतान की पहचान करना सबसे बड़ी चुनौती है शैतान आदमी के भीतर रहता है कभी भी अपनी ताकत दिखला सकता है । भगवान तक का शैतान पर कोई बस इसीलिए नहीं चलता है क्योंकि भगवान ने जब दुनिया बनाई तब कुछ नियम निर्धारित किए थे जिस में एक नियम ये भी था जो हमेशा रहेगा स्वयं भगवान भी जिसको बदल नहीं सकता है , वो है आदमी को अपने विवेक से कुछ भी करने की अनुमति दी गई थी । तभी लोग भला बुरा जैसा भी आचरण करते हैं भगवान किसी को रोकता टोकता नहीं है , जैसा कुछ लोग बतलाते हैं उसकी मर्ज़ी से सभी कुछ होता है सच नहीं भ्रामक है शायद उन्होंने ऐसी बात किसी ख़ास मकसद से ही फैलाई है जबकि वास्तव में खुद उन्हीं पर भगवान का कोई अंकुश नहीं दिखाई देता है । शैतान की उलझन है कि उसको लगता है वही सबसे समझदार और ताकतवर भी है इसलिए दुनिया को बदलना अथवा सुधारना चाहता है जो उसको यकीन है गलत ढंग से चलती है । लेकिन आपको मालूम ही नहीं होता कब कोई किस रूप में आपको मिलता है , कोई पिता कोई दोस्त कोई परिजन कोई अन्य आपके संपर्क में रहने वाले को अनुभव होता है कि जैसा उसको चाहिए आप उस तरह से नहीं चलते हैं । ऐसे में आपको डांटकर या फिर फटकार लगाकर सुधर जाने को कहता है अन्यथा आपको विवश कर सकता है राह रंग ढंग बदलने को । जब कोई नहीं मानता उसकी बात तब शैतान अपने असली रूप में प्रकट होता है , आपके घर से गांव से शहर से राजधानी तक वही रहता है । आजकल दुनिया में तमाम ऐसे शासक बन गए हैं जिनको सभी देशों को उस राह पर लाना है जो वो बताते हैं समझाते हैं डराते हैं प्रलोभन भी देते हैं । शैतान शुरुआत में शराफ़त का इक पर्दा लगाए रखते हैं वार्तालाप समझौता अपनी शर्तों पर बंधने को आपकी भलाई और सुरक्षा से जोड़ते हैं । अभी कोई जल्दबाज़ी मत करना उसको लेकर कोई छवि बनाने में पहले अपना चेहरा देखना कोई शैतान उस के पीछे भी छुपा हुआ है जो तमाम लोगों को नासमझ मानता है और खुद को सबसे काबिल और जानकार । 
 
शैतान को समझाना किसी काम नहीं आता है जो उसको समझाने की कोशिश भी करता है शैतान उसको अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानता है । लेकिन आपको शैतान से टकराना नहीं है बचना है उस से दुरी बना कर चुपचाप अपने रास्ते चलना है । चिंता मत करना ऐसी राहों पर शैतान की शैतानियत बेअसर साबित होती है उसको उसकी डगर जाने देना उचित है आपको उसकी तरफ देखना नहीं है । शैतान से कोई समझौता कभी नहीं किया जा सकता है उसका कोई ऐतबार नहीं है उसकी चाल में फंसकर लोग अचानक  औंधे मुंह गिर जाते हैं । ज़िंदगी भर आपको ऐसे लोग मिलते रहते हैं जिनका कहना होता है वो कभी किसी का भी बुरा नहीं करते हैं लेकिन उनको सभी लोग बुरे दिखाई देते हैं उनको किसी और में कुछ अच्छाई नज़र ही नहीं आती है । आपको समझ आया होगा आसपास कितने लोग ऐसे समाज सुधारक बने फिरते हैं उनको किसी का  उस ढंग से जीना पसंद नहीं जैसा उनको लगता है सही है दुनिया से लेकर अपने करीब तक सभी को अपने ही रंग में रंगना चाहते हैं । उनका अपना कोई रंग नहीं होता है गिरगिट भी उन जैसा रंग नहीं बना सकती है ये रंग बदलती दुनिया है जिस में सभी अपने बालों पर नहीं चेहरे पर ख़िज़ाब लगाए हुए हैं । अब इक ग़ज़ल और इक कविता से बात को विराम देते हैं ।  
 
 

यहां तो आफ़ताब रहते हैं ( ग़ज़ल )

 डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

यहां तो आफताब रहते हैं
कहां , कहिये ,जनाब रहते हैं ।

शहर का तो है बस नसीब यही
सभी खानाखराब रहते हैं ।

क्या किसी से करे सवाल कोई
सब यहां लाजवाब रहते हैं ।

सूरतें कोई कैसे पहचाने
चेहरे सारे खिज़ाब रहते हैं ।

पत्थरों के मकान हैं लेकिन
गमलों ही में गुलाब रहते हैं ।

रूह का तो कोई वजूद नहीं
जिस्म ही बेहिसाब रहते हैं ।  
 
 

      ख़ुदा से बात ( कविता )

      डॉ लोक सेतिया

कहते हैं लोग
दुनिया में अच्छा-बुरा
जो भी होता है
सब होता है तेरी ही मर्ज़ी से ।

अन्याय अत्याचार
धर्म तक का होता है
इस दुनिया में कारोबार ।

तेरी मर्ज़ी है इनमें
मैं कर नहीं सकता
कभी भी स्वीकार ।

सिर्फ इसलिए कि याद रखें
भूल न जाएं तुझको
देते हो सबको परेशानियां
दुःख दर्द समझते हैं
दुनिया के  कुछ लोग ।

ऐसा तो करते हैं
कुछ  इंसान
कर नहीं सकता
खुद भगवान ।

खुदा नहीं हो सकता
अपने बनाए इंसानों से
इतना बेदर्द
निभाता होगा अपना हर फ़र्ज़ ।

लगता है
कर दिया है बेबस तुझको
अपने ही बनाए इंसानों ने
जैसे माता पिता
हैं यहां बेबस संतानों से ।

अपने लिए सभी
करते तुझ से प्रार्थना
मैं विनती कर रहा हूँ
पर तेरे लिए ।

बचा लो इश्वर
अपनी ही शान
फिर से बनाओ अपना ये जहान
होगा हम सब पर एहसान ।

अब फिर बनाओ दुनिया इक ऐसी
चाहते हो तुम खुद जैसी
अच्छा प्यारा खूबसूरत
बनाओ इक ऐसा फिर से जहां ।

जिसमें न हो दुःख दर्द कोई
मिलती हों सबको खुशियां ।

अन्याय  अत्याचार का
जिसमें न हो निशां
ऐ खुदा अब बनाना
इक ऐसी नई दुनिया । 
 
 
 

मार्च 18, 2026

POST : 2072 भारत से हथियार मांगे अमेरिका ने ( मानो या न मानो ) डॉ लोक सेतिया

भारत से हथियार मांगे अमेरिका ने ( मानो या न मानो ) डॉ लोक सेतिया   

ये कोई राज़ की बात तो नहीं है दुनिया जानती है हमारी धार्मिक कथाओं में वर्णित हथियार कितने कारगर साबित हुआ करते थे । अमेरिका के शासक को ईरान से जंग में मात दिखाई देने लगी तब उसको भारत के मित्र शासक की कही बात याद आई , उन्होंने बताया था हमारे देश में अभी भी जब किसी देश की टीम से खेल में आमना सामना करना हो हम धार्मिक आयोजन करते हैं विश्वास करते हैं ईश्वर हमारी टीम को विजयी बनाएगा । पौराणिक कथाओं में वर्णित तरह तरह के अस्त्र शस्त्र को लेकर भी विस्तार से जानकारी दी थी तब उन्होंने अमेरिका को जिसे तब अमेरिकी शासक ने अवैज्ञानिक तथ्यरहित समझ महत्व नहीं दिया था । लेकिन जब अभी युद्ध को लेकर आपस में विचार विमर्श हुआ तब अमेरिकी शासक  को ध्यान आई पुरानी बात और उन्होंने पूछा क्या अभी भी ऐसा कुछ आपके पास है । भारत के शासक ने प्रमाण प्रस्तुत करने को भगवत गीता रामायण से महाभारत पर बनाई फिल्मों के अंश भेजने के साथ साथ आधुनिक काल की बाहुबली जैसी कितनी फिल्मों के दृश्य भी भिजवा दिए । इतना ही नहीं हमारे टीवी सीरियल में नागिन से लेकर तंत्र मंत्र पर आधारित तमाम कहानियों को भी सांझा किया । अमेरिकी शासक ने पूछा क्या वास्तव में ऐसा सच हो सकता है तो भारत के शासक ने जवाब दिया अगर पूर्ण विश्वास करते हैं तब कुछ भी असंभव नहीं है । पुछले कितने साल से मेरी विजय का सबसे प्रमुख कारण यही आस्था और विश्वास है । जनता का बहुमत भरोसा करता है कि मैं चाहे कुछ भी करता हूं वही उचित है , इतना ही नहीं मुझ पर कोई शंका करना देशभक्ति पर प्रश्न चिन्ह प्रतीत होता है । लोकतांत्रिक राजनीतिक नैतिक परंपराओं से पहले मुझ पर आस्था और विश्वास समझा जाता है । अमेरिकी शासक ने तब उनको सभी पौराणिक हथियार उपलब्ध करवाने की मांग रख दी जिसे इनकार नहीं करना आपसी संबंधों की ज़रूरत है । मैं जानकारी लेता हूं कि ऐसा कैसे मुमकिन है कुछ समय की मोहलत अमेरिकी शासक ने घोषित कर दी जैसी उनकी आदत है । 
 
बात कहने से पहले सोचना चाहिए उस के बाद बात को तोलना चाहिए तब बाद में बोलना चाहिए , उनको सलाहकार ने बताया कि ऐसा बड़े बूढ़े कहते थे । लेकिन अब तीर कमान से निकल चुका है अब कोई ढंग ऐसा निकालना होगा कि चतुराई से अपनी लाज बच सके । ऐसे में एक विचारक ने जवाब लिख कर देने का दायित्व संभाला है । उन्होंने लिखा है जैसा आपको विदित है पौराणिक हथियार उपयोग करना केवल उन्हीं को आता है जिन्होंने धर्मशास्त्रों का अध्यन और पाठन कर सिद्धियां हासिल की हों । क्योंकि कुछ सालों से ऐसा केवल फ़िल्मी लोग कलाजगत उद्योग उपयोग करते रहें हैं उनके पास ही फारमूला नुस्ख़ा या सिद्धांत है जो इक गोपनीय है कोई किसी को बताता नहीं है । क्योंकि जिनके पास है उन्होंने यही सब दिखला कर इतना अधिक धन और शोहरत कमाई है जो उनकी अगली हज़ारों साल तक की आमदनी का सुरक्षित तरीका है उनसे कोई किसी कीमत पर हासिल नहीं कर सकता है । आपको ईरान के पास जितना तेल ईंधन सोना और कीमती सामान दिखाई देता है उन सभी से मूलयवान हमारी ये पूंजी है । अमेरिका की अर्थव्यस्था कभी हमारी बराबरी नहीं कर सकती अर्थात आपको वो सब बेचना संभव नहीं है आपका सब कुछ गिरवी रखना भी थोड़ा होगा । लेकिन क्योंकि आपने मित्रता की बात कही है इसलिए कभी बाद में युद्ध ख़त्म होने के बाद उसको लेकर कोई डील ठीक उसी तरह की जा सकती है जैसे अभी अभी आपने हम पर डील थोपी है भविष्य में कितने साल तक अमेरिका से खरीदारी को लेकर । अब आया ऊंठ पहाड़ के नीचे , जवाब ने लाजवाब कर दिया है ।  
 
आज के आधुनिक हथियार महाभारत के इन 5 शक्तिशाली अस्त्रों के आगे कुछ नहीं थे ।  5 most powerful weapons

मार्च 01, 2026

POST : 2061 अशांति का नॉबेल पुरस्कार ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

       अशांति का नॉबेल पुरस्कार ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

 कभी ऐसा होता नहीं कि किसी अमीर को कोई प्रेमिका ठुकरा कर किसी और की बन जाए । उनको पूरा यकीन था नॉबेल पुरस्कार का सबसे सही दावेदार सिर्फ वही हैं । फ़िल्मी कहानियों की तरह जो कभी नहीं होता घट गया उनको मांगने पर कितनी कोशिशों से भी नहीं मिला किसी और को बिना प्रयास ही प्राप्त हो गया । आशिक़ी में आधुनिक प्रेमी आंसू नहीं बहाते बल्कि समझते हैं कि उसकी किस्मत ही खराब थी जो मेरी नहीं हुई किसी और की हो गई । लेकिन बाहर कुछ भी कहते रहें ताकतवर लोग अंदर से खुद को अपनानित समझते हैं और नतीजा इसकी सज़ा दुनिया भर को देते रहते हैं जीवन भर अभद्रता पूर्वक आचरण करते हैं । लेखक उनका दर्द समझते हैं और उनसे संवेदना जताते हैं दिलासा दिलाना चाहते हैं समझाते हैं कभी किसी को सभी कुछ नहीं मिलता है पर ऐसी बातों से तकलीफ़ घटती नहीं बढ़ती ही है ।  
 
आप इस की कल्पना नहीं कर सकते कि जब किसी ताकतवर धनवान बाहुबली को उसकी मनवांछित चीज़ नहीं देते हैं तो उसकी अनबुझी प्यास उसको क्या से क्या बना देती है । उनको शांति का नॉबल पुरस्कार न देना कितना बड़ा अपराध है आपको नहीं मालूम था तो अब समझ गए होंगे । अपना आपा खोकर उन्होंने किस किस को कितनी बार अपमानित नहीं किया , तब भी उनको चैन नहीं आया तो देख लो उन्होंने उस दिखावे वाले किरदार को छोड़ अपना असली किरदार दुनिया को दिखलाया है । जो उनकी नहीं मानता उस पर मनचाहा टैरिफ़ लगाया है , भले खुद उनकी अदालत ने इसको अनुचित बताया है लेकिन कौन बच सकता है उन्होंने इक ऐसा जाल बिछाया है । सभी ने कुछ न कुछ खोया है बस इक वही है जिस ने जो चाहा सभी कुछ पाया है । सब उसकी माया है दुनिया उसको ख़लनायक समझती है कुछ भी कहती रहे उसको तो ये कर के दिल को चैन आया है । यकीन मानिये कि अगर उनको नॉबल पुरस्कार दे दिया गया होता तो उनको कुछ भी ऐसा करने में संकोच होता और भले कोई भी कारण होते वो अपने शांति पुरस्कार की लाज रखने को भले और शरीफ़ किरदार को निभाने को विवश होते ही । दुनिया की यही आदत है गुण नहीं दिखाई देते अवगुण नज़र आते हैं तभी लोग तानाशाह अन्यायी अत्याचारी बन कर अपनी शान बढ़ाते हैं । 
 
आपने उनका दिल दुखाया है अपनी भूल समझ कर प्रायश्चित करने को कोई उपाय करना ज़रूरी है , आंधी चलने लगी है चिंगारी सुलग रही है शोला भड़कना ज़रूरी है । पानी की खातिर कोई बरसात करवानी होगी उनकी नॉबेल संग तस्वीर बनवानी होगी । ऐसी इक अनोखी नई परंपरा चलाओ आधुनिक युग में शांति की कोई कद्र नहीं अशांति सभी को भाती है इक अशांति का नॉबल पुरस्कार चलाओ जिसका नियम ऐसा बनाओ हाथ जोड़ नहीं मांगो , छीन कर ले जाओ । दुनिया बैठी है परमाणु बम पर आप छोड़ दो शांतिगीत गाना चलो मिसाईल फैंको मौत का खेल रचाओ सभी कहेंगे आप से हमको बचाओ , आप लाशों पर खड़े होकर खुद को महान बतलाओ , जिस को भी चाहो मौत के घाट पहुंचाकर उसको ज़ालिम घोषित कर उचित ठहराओ । लोग आजकल सभी जगह खलनायकों पर फ़िदा हैं कोई आधुनिक गीत लिखो उनकी महिमा का बखान कर पत्थर से हीरा बन कर अपनी कीमत ऊंची लगवाओ । पत्रकारिता से आगे बढ़ो चाटुकारिता की पढ़ाई पढ़कर जिसकी खाते हो उसकी हाज़िरी लगाओ , हरियाणा में कहावत है जिसकी खाई बाजरी उसकी लगाई हाज़िरी । बहती हुई गंगा में हाथ धोने से काम नहीं चलता खुद नंगे होकर उन संग नहाओ नाचो झूमों मौज मनाओ कौन देखता है सोच कर कभी मत शर्माओ ।    
 

 हां हां मैं खलनायक हूं ( हास्य - कविता ) 

 
शराफ़त की कदर नहीं सुन मेरे यार
छोड़ भलाई डराने लगे भर के हुंकार   
आपने किया था उन पर अत्याचार 
उनको मांगने पर भी दिया नहीं था 
बस इक शांति का नॉबल पुरस्कार । 
 
छोड़ो उसकी बात करना है बेकार  
अब तो समझो अगर हैं समझदार 
क्या होता है उसका कोई आधार 
शुरू करो ऐसा ही अशांति पुरस्कार 
साबित होंगे वही सबसे बड़े हक़दार ।
 
 Ashantee Medal 1873 - 74 clasp Coomassie
 
  

फ़रवरी 27, 2026

POST : 2060 भगवान की मर्ज़ी ( व्यंग्य - कथा ) डॉ लोक सेतिया

        भगवान की मर्ज़ी ( व्यंग्य - कथा ) डॉ लोक सेतिया  

ख़लबली मची है धरती लोक में नहीं उस परलोक में जिस में रहते हैं भगवान और सभी देवता देवियां जिनको विधाता ने बनाया हुआ है दुनिया का कामकाज उसकी देखभाल और विधि का विधान चलाने की खातिर । विकट समस्या उतपन्न हो गई है जब भगवान ने घोषणा कर दी है कि वह अपने पदभार से निवृत हो रहे हैं । आपको अगर लगेगा कि तब उनकी जगह किसी और को ये अवसर मिलने वाला है तो आप कुछ भी नहीं जानते हैं जब देवी देवताओं को बनाने वाला भगवान खुद भगवान नहीं रहेगा तब अन्य सभी कुछ और बनना तो दूर जो बनाए गए हैं उस से भी वंचित होकर अपना अपना अस्तित्व खो बैठेंगे । नारद मुनि अकेले ऐसे हैं जो भगवान से बिना संकोच वार्तालाप कर सकते हैं , नारद जी बोले लगता है अपनी पत्नी संतान से कोई कहासुनी हुई है जिसकी सज़ा हम सभी देवी देवताओं से लेकर अपने प्रिय भक्तजनों को देने की बात कर रहे हैं । भगवान हमेशा हंसते थे नारद जी की बात से उनकी चिंता मिट जाया करती थी लेकिन आज भगवान के मुखमंडल पर हंसी नहीं गहरी उदासी दिखाई दे रही है । नारद जी समझ गए माजरा कुछ और है जो हमेशा की तरह किसी न किसी ढंग से उपाय करने से बात बन जाती रहती थी से गंभीर है । नारद जी बोले प्रभु अपने निर्णय पर पुनर्विचार करें अन्यथा अनर्थ हो जाएगा आपके बगैर कोई भी कैसे रह पाएगा । भगवान कहने लगे मेरा निर्णय अंतिम है और बदल नहीं सकता है , आपको भी मेरे भरोसे नहीं रहना चाहिए खुद अपने आप पर भरोसा रखना चाहिए । नारद जी ने कहा भगवन आप भी समझते हैं जानते हैं कि आप हम सभी को देवी देवता इंसान को आदमी औरत से लेकर कण कण को क्या से क्या बना सकते हैं । पेड़ पौधे पशु पक्षी जानवर कीड़े मकोड़े से पत्थर तक को कुछ भी बनाते हैं जल थल हवा सभी आपके आदेश से बनते हैं बिगड़ते हैं । कोई भी आपको कैसे बना सकता है ये कल्पना करना भी संभव नहीं है , अचानक प्रभु ने आखिरी इक करामात दिखलाई ताकि सभी को वास्तविक कारण समझाया जा सके । 
 
भारतभूमि पर कुछ लोग टीवी चैनल सोशल मीडिया से सभाओं में शहर शहर गांव गांव बस्ती बस्ती जगह जगह लगाए इश्तिहारों प्रचार प्रसार में साबित कर रहे नज़र आने लगे कि कोई आदमी भगवान से भी बढ़कर लोकप्रिय है । उसको बनाने वाली जनता उसको हटाने की बात सोच भी नहीं सकती है बोलना तो जैसे अक्षम्य अपराध है , जिस दल की सरकार है उस में सभी जानते हैं मानते हैं समझते हैं कि वही असली सरकार हैं उनके बगैर सभी सांसद सभी विधायक सभी मंत्री दल के सभी पदाधिकारी सदस्य कुछ भी नहीं हैं उनके खेल खिलौने हैं । कब किस का अस्तित्व ख़त्म हो जाये सिर्फ उनकी मर्ज़ी है , न्यायालय के न्यायधीश से चुनाव आयोग के आयुक्त तक हर ख़ास बड़े बड़े पद पर उनकी पसंद से लोग नियुक्त होते हैं कभी कोई पसंद का नहीं बन भी जाता है तो कुछ भी कर नहीं सकता अथवा त्यागपत्र देने की नौबत आ सकती है । जिनको शोर मचाना आता है उन्होंने अपना ईमान उनको बेच दिया है और अपना मालिक उनको समझ कर उनकी वंदना गुणगान कर बदले में मनवांछित वरदान पाते हैं । आजकल भारत देश में करोड़ों लोग उन्हीं के भक्त कहलाते हैं उनको हर बात पर सर झुकाते हैं उन जैसा कोई नहीं हुआ कोई दुनिया भर में नहीं है यही समझते हैं समझाते हैं । ऐसे भगवान ने अपने खास लोगों को क्या से क्या नहीं बना दिया है , लोग कभी नहीं देखते समझते उसने अपनी हसरत पूरी करने की चाहत में सब बना बनाया मिटा दिया है । अपना नाम हर जगह अंकित करवा खुद को अजर अमर बनवाने को हरा भरा गुलशन उजड़वा दिया है । उनके बनाये हुए भगवान रोज़ अपने रंग ढंग दिखलाते हैं सावन के अंधे भक्त हैं रात को दिन अंधेरे को उजाला बताते हैं । भगवान क्या कहना चाहते हैं सभी देवी देवताओं को समझ आ गया है असली भगवान से बढ़कर नकली भगवान दुनिया में छा गया है , भगवान भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते हैं संख्याबल में किस के अनुआई साथ नहीं छोड़ते किस को छोड़ देते हैं आर्टिफीसियल इंटेलिजेन्स से इसका नतीजा सामने आ गया है । जब लोगों ने असली भगवान से बढ़कर इंसान को नकली भगवान बनाकर उसी पर भरोसा करना शुरू कर दिया है तब पहले के वास्तविक भगवान से रिश्ता बचा ही कहां है ।     
 
 ग्राम प्रधान ने दिया त्यागपत्र, व्यक्तिगत कारणों का हवाला - Youth India News

फ़रवरी 16, 2026

POST : 2055 खिलाड़ी ख़ास वर्ग , गेंद साधरण लोग ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

 खिलाड़ी ख़ास वर्ग , गेंद साधरण लोग  ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

कहने को सब कुछ बदला है कुछ लोगों की तकदीर बदली है , लेकिन सही मायने में समाज देश साधारण जनता के लिए हालात बदले हैं लेकिन पहले से ख़राब हुए हैं । सच तो ये है कि तमाम सामान्य वर्ग को धकेल कर हाशिये से बाहर कर दिया गया है । राजनेताओं प्रशासन अधिकारियों कर्मचारियों धनवान उद्योगपतियों अन्य बड़े सफलता हासिल कर ख़ास बड़े वर्ग में शामिल लोगों की नज़र में जनता या उसकी परेशानियों से कोई सरोकार नहीं है । ऐसे तमाम लोग खेलते हैं अपनी अपनी पसंद ज़रूरत सुविधा से कोई भी खेल जिस में उनके निशाने पर गेंद की जगह साधरण लोग होते हैं । खेल कितने हैं फुटबॉल क्रिकेट वालीबॉल टेनिस बास्केटबॉल बिलियर्ड्स इत्यादि , गेंग को ठोकर लगाना पीटना तरह तरह से खिलाड़ी करते हैं कभी गेंद की हालत बिगड़ जाती है तो बदल जाती है । राजनेताओं की राजनीति सत्ता को लेकर होती हैं देश समाज को लेकर कभी हुआ करती थी आजकल नहीं की जाती है । जब से दुनिया इक व्यौपार का बाज़ार बन गई है तब से आदर्श नैतिक मूल्य सांस्कृतिक पहचान किसी तयखाने में दबाकर रखी नहीं बल्कि दफ़ना दी गई है । हर भौतिकतावादी देश की तरह से भारतीय सभ्यता झूठी बनावटी चमक दमक से प्रभावित होकर अपनी वास्तविक पहचान अपनी विरासत को खोटे सिक्कों में तोलने को तैयार है । भारत देश का संविधान और लोकतंत्र सिर्फ किसी किताब का बाहरी आवरण बन गई है जिस के भीतर जाने कब से क्या क्या अजीब दर्ज किया जाता रहा है । मगर 140 करोड़ लोग कभी नहीं जान सकते कि हमारी वास्तविकता क्या थी और कैसे क्या से क्या बना दी गई है । सत्ता को कोई भी ऐसी किताब जनता के सामने खुलना कदापि स्वीकार नहीं है ।शासक शब्दों से डरते भी हैं जबकि उनकी तमाम जंग भी शब्दजाल ही हैं जिसे वो सभी कभी सभाओं में कभी व्यक्तव्यों में कभी सोशल मीडिया में उपयोग करते हैं ।  विदेश नीति से आर्थिक रणनीति तक जैसे कोई खेल तमाशा लगती है जिस में कौन देश कैसे किस किस देश को अपनी शतरंजी चालों में जकड़ कर मात दे सकता है और सभी बेबस परेशान हो कर भी कुछ कर नहीं सकते बेहद विवश लगते हैं । 
 
विदेश नीति पुराने संबंधों को दरकिनार कर ऐसे नये ढंग तौर तरीके पर चल पड़ी है जिस में अंदेशा है कि शायद दोबारा से अंग्रेजी शासन जैसी क्या उस से भी भयानक गुलामी का शिकंजा कसा जा सकता है । आज की विवशता और बनावटी उज्ज्वल भविष्य की धुंधली तस्वीर कोई छल साबित हो सकती है मगर शासक वर्ग की चिंता सिर्फ और सिर्फ खुद की खातिर है । देश समाज जनता की खातिर उनके पास कोई सार्थक संवाद नहीं है केवल अविश्वसनीय वादे झूठे विज्ञापन और काल्पनिक शानदार व्यवस्था 2047 तक देने की बात है ।कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक , आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक । आज़ादी के दिन पैदा हुए लोग 78 साल के हो चुके हैं सौ साल की गारंटी सरकार नहीं दे सकती है उसकी हर गारंटी झूठी है जनता को बहलाने को दी जाती है । खिलाड़ी सभी खेल में सफ़ल हो रहे हैं लेकिन चुनवी गणतंत्र के जिस खेल में जनता का जीवन दांव पर लगाया जाता है उसकी हर बार हार होती है , गरीबी भूख शिक्षा स्वास्थ्य से रोज़गार की बात छोड़ न्याय तक उसको जीते जी नहीं मिलता है । सामन्य आदमी की सुरक्षा की कोई चिंता किसी शासक प्रशासक को रत्ती भर भी नहीं है उनको अपनी ज़िंदगी से बढ़कर किसी की जान नहीं लगती है । राजनेताओं को सबसे अधिक चिंता उनकी कुर्सी की रहती है अपनी जान से भी अधिक प्यारी लगती है ।  कुर्सी का खेल ख़तरनाक साबित हुआ है हमारे लिए , क्योंकि इस खेल में खिलाड़ी किसी नियम कानून किसी आदर्श को कभी नहीं मानते बल्कि सब कुछ तोड़ने को उचित समझते हैं ।  
 
 Raag Darbari (Hard) - Hindi book by - Srilal Shukla - राग दरबारी (सजिल्द) -  श्रीलाल शुक्ल

फ़रवरी 12, 2026

POST : 2053 सभी को स्वर्ग चाहिए ( आधुनिक व्यंग्य कथा ) डॉ लोक सेतिया

    सभी को स्वर्ग चाहिए  ( आधुनिक व्यंग्य कथा ) डॉ लोक सेतिया 

अपनी यही धरती पहले स्वर्ग से सुंदर हुआ करती थी अधिकांश लोग अच्छाई सच्चाई ईमानदारी ऊंचे आदर्शों पर चलते थे । सादगी भरा जीवन वास्तविक आचरण में नैतिकता का पालन करते थे देश समाज स्वर्ग लगता था दुनिया को शानदार बनाने की कोशिश करते थे हमारे पूर्वज । तब सभी मरने के बाद कामना करते थे मोक्ष की प्राप्ति की स्वर्ग यही है जानते थे नर्क की चिंता नहीं थी क्योंकि भले कर्म सही मार्ग पर चलना जानते थे । लेकिन हमारी बदनसीबी है कि हमने खुद अपने समाज को स्वर्ग से नर्क बनने दिया और बनाने में खुद भी योगदान देते रहते हैं । आज भौतिकता स्वार्थी स्वभाव अहंकार लोभ लालच और किसी भी तरह से सभी कुछ हासिल करने की चाहत का पागलपन जिस में अवसर मिले तो छीन लेना लूटना सामन्य बात हो गई है । यही नर्क है और हमारा देश समाज किसी भी नर्क से कम नहीं है बल्कि ऐसे नर्क की कल्पना भी हमारे पुरखों ने नहीं की होगी । हम सभी समझते हैं कि आधुनिक समय में हम समझदार बन गए हैं शायद सभी कुछ जानते हैं समझते हैं जो हमारी अज्ञानता का प्रमाण है । हम सोचते तक नहीं हैं कि हमने कैसे अपने देश को इस हद तक बर्बाद किया है कि शानदार स्वर्ग को नर्क बना दिया है , लेकिन हम इस अपनी दुनिया को फिर से अच्छा नहीं बनाना जानते न ही बनाने की कोशिश करते हैं हमने इसको स्वीकार कर लिया है कि ये खराब है और इतनी अधिक खराब है कि सुधारना संभव ही नहीं है । विडंबना ये है कि हम इस वास्तविकता को अपने झूठ और दिखावे के आडंबरों से ढकना छिपाना चाहते हैं , सोशल मीडिया से तमाम अन्य प्रकार से प्रचार प्रसार आयोजन से इक पर्दा डालने का कार्य निरंतर करते रहते हैं । हम समझते हैं विधाता से कुछ भी छिपाया जा नहीं सकता फिर भी उस ईश्वर से भी छल चतुराई करने की नासमझी करते हैं । 
 
मरना सभी को इक दिन है भले मरने की तैयारी कोई नहीं करता सभी जीना चाहते हैं मगर मौत आनी है आएगी भी सभी कामना करते हैं मर कर स्वर्ग में जगह मिलने की । स्वर्ग कोई अगर जगह होगी तब उस में प्रवेश से रहने की अनुमति तक क्या इतनी आसानी से हासिल हो जाएगी लगता तो नहीं है । जैसी भी पूंजी चाहिए होगी हमने वो कभी अर्जित की भी है जीवन में , नफरत भेदभाव सभी से हेरा फेरी ज़िंदगी भर हमने कुछ और कभी अर्जित किया ही नहीं । पाप छल कपट की झूठी नाम की शोहरत उस दुनिया में प्रवेश पाने से वर्जित ही कर सकती है । बबूल बोकर आम खाने की आकांक्षा है अपनी दुनिया को नर्कीय बनाकर किसी स्वर्ग की कामना रखना । मान लो किसी कारण हमको स्वर्ग में प्रवेश मिल भी जाए तब क्या हमको स्वर्ग की आबोहवा वहां का वातावरण पसंद आएगा , कभी नहीं हमको स्वर्ग में पल भर ठहरना कठिन लगेगा । नर्क को हमने बनाया ही नहीं उसको अपनी आदत दिनचर्या में शामिल कर लिया है । यकीन मानिए हमको उस स्वर्ग में भी अपने इस धरती के नर्क की याद आती रहेगी और इतना ही नहीं हमने विश्वास कर लिया है यही हमको सबसे शानदार लगता है इस नर्क से बिछुड़ना कोई नहीं चाहेगा । स्वर्ग मांगते हैं स्वर्ग को पसंद कदापि नहीं करते और मुमकिन है फिर किसी स्वर्ग को नर्क बनाकर पुरानी भूल दोहराना चाहते हों । स्वर्ग नर्क मोक्ष पर इक कविता पेश है श्रद्धांजलि सभा ।  स्वर्ग और नर्क की हक़ीक़त मालूम हो जाए तो मुमकिन है लोग अपना इरादा बदल कर मरने के बाद भी नर्क ही जाना चाहते हों , कविता पढ़ कर पुनर्विचार कर सकते हैं । 
 
 

श्रद्धांजलि सभा ( हास्य-व्यंग्य कविता )

 डॉ लोक सेतिया

टेड़ा है बहुत 
स्वर्ग और नर्क का सवाल 
सुलझाएं जितना इसे 
उजझता जाता है जाल ।

आपको दिखलाता हूं 
मैं आंखों देखा हाल 
देखोगे इक दिन आप भी 
मैंने जो देखा कमाल ।

बहुत भीड़ थी स्वर्ग में 
बड़ा बुरा वहां का हाल 
छीना झपटी मारा मारी
और बेढंगी थी चाल ।

नर्क को जाकर देखा 
कुछ और ही थी उसकी बात 
दिन सुहाना था वहां 
और शांत लग रही रात ।

पूछा था भगवान से 
स्वर्ग और नर्क हैं क्या 
और उसने मुझे 
ये सब कुछ दिया था दिखा ।

घबराने लगा जब मैं 
थाम कर तब मेरा हाथ 
बतलाई थी भगवान ने 
तब मुझे सारी बात ।

श्रधांजली सभा होती है 
सब के मरने के बाद 
सब मिल कर जहां 
करते हैं मुझसे फ़रियाद
स्वर्ग लोक में दे दूं 
सबको मैं कुछ स्थान 
बेबस हो गया हूं मैं 
अपने भगतों की बात मान ।

शोक सभाओं में 
ऐसा भी कहते हैं लोग 
स्वर्ग लोक को जाएगा 
आये  हैं जो इतने लोग ।

देखकर शोकसभाओं की भीड़ 
घबरा जाता हूँ मैं 
मुझको भी होने लगा है 
लोकतंत्र सा कोई रोग ।

कहां जाना चाहते हो 
सब से पूछते हैं हम 
नर्क नहीं मांगता कोई 
जगह स्वर्ग में है कम ।

नर्क वालों के पास 
है बहुत ही स्थान 
वहां रहने वालों की 
है अलग ही शान 
रहते हैं वहां 
सब अफसर डॉक्टर वकील 
बात बात पर देते हैं 
वे कोई नई दलील ।

करवा ली हैं बंद मुझसे 
नर्क की सब सजाएं 
देकर रोज़ मानवाधिकारों की दुआएं ।

बना ली है नर्क वालों ने 
अपनी दुनिया रंगीन 
मांगने पर स्वर्ग वालों को 
मिलती नहीं ज़मीन ।

नर्क ने बनवा ली हैं
ऊंची ऊंची दीवारें 
स्वर्ग में लगी हुई हैं 
बस कांटेदार तारें
नर्क में ही रहते हैं 
सब के सब बिल्डर 
स्वर्ग में बन नहीं सकता कोई भी घर ।

स्वर्ग नर्क से दूर भी 
बैठे थे कुछ नादान  
स्वर्ग नर्क मोक्ष पर इक कविता पेश है श्रद्धांजलि सभा ।
फुटपाथ पे पड़ा हुआ था 
जिनका सामान
उन्हें नहीं मिल सका था 
दोनों जगह प्रवेश 
जो रहते थे पृथ्वी पर 
बन कर खुद भगवान ।

किया था भगवान ने 
मुझसे वही सवाल 
स्वर्ग नर्क या है बस
मुक्ति का ही ख्याल ।

कहा मैंने तब सुन लो 
ए दुनिया के तात 
दोहराता हूँ मैं आज 
एक कवि की बात ।

मुक्ति दे देना तुम 
गरीब को भूख से 
दिला सको तो दिला दो 
मानव को घृणा से मुक्ति
और नारी को 
दे देना मुक्ति अत्याचार से 
मुझे जन्म देते रहना 
बार बार इनके निमित ।

मित्रो
मेरे लिये  स्वर्ग की 
प्रार्थना मत करना 
न ही कभी मेरी 
मुक्ति की तुम दुआ करना
मेरी इस बात को 
तब भूल मत जाना 
मेरी श्रधांजली सभा में 
जब भी आना ।  
 
 आज की कहानी: स्वर्ग और नरक - National Thoughts
 
 

फ़रवरी 03, 2026

POST : 2051 भगवान बना कर पछताये ( व्यंग्य - कथा ) डॉ लोक सेतिया

     भगवान बना कर पछताये ( व्यंग्य - कथा ) डॉ लोक सेतिया 

 
भगवन बनकर तू अभिमान ना कर 
तुझे भगवान बनाया हम भक्तों ने ।

पत्थर से तराशी खुद मूरत , उसे 
मंदिर में है सजाया हम भक्तों ने ।

तूने चाहे भूखा रखा हमको तब भी 
तुझे पकवान चढ़ाया हम भक्तों ने 
 

फूलों से सजाया आसन भी हमने ही 
तुझको भी है सजाया हम भक्तों ने ।

सुबह और शाम आरती उतारी है  
इक तुझी को मनाया हम भक्तों ने ।

सुख हो दुःख हो , हर इक क्षण में 
घर तुझको है बुलाया हम भक्तों ने ।

जिस हाल में भी रखा है हमको 
सर को है झुकाया हम भक्तों ने ।

दुनिया को बनाया होगा तुमने कभी  
खुद तुझी को है बनाया हम भक्तों ने । 
 
   ऊपर लिखा भजन मेरी मां माया देवी जी प्रतिदिन गाया करती थी , हम सभी को याद रहती है उनकी ये बात । लेकिन आज इसका ज़िक्र अलग  कारण से करना पड़ा है , आस्था से अलग विषय है आधुनिक युग में कोई भगवान कोई मसीहा होता नहीं है , और राजनीति में तो शराफ़त का कोई स्थान ही नहीं है । नासमझ लोग या ख़ुदगर्ज़ चाटुकार लोग जिस किसी को ऊंचाई के ऐसे शिखर पर बिठाते हैं कि भगवान ही समझने लगते हैं । बाद में उनकी वास्तविक बात सामने आने पर बगलें झांकते हैं , लेकिन तब भी अपनी भूल को स्वीकार करना कठिन होता है । सोशल मीडिया पर पुरानी कथनी अब की करनी से मेल खाती ही नहीं है और बनाये न बने बात छुपाए न बने की हालत बन जाती है ।  लेकिन शायद उस भजन में छुपी इक वास्तविकता भी उजागर हुई है , जनता जिनको ऊंचे सिंहासन पर बिठाती है शासक बनकर उसी पर मनमाने आदेश जारी कर उसको अपने आधीन रखने और स्वयं राजा महाराजा जैसा जीवन बिताते हैं । तर्कसंगत ढंग से समझें तो कोई भी किसी को भी खुद को समर्पित करता है  या आत्मसमर्पण करता है तो गुलामी करनी ज़रूरी होती है । खुद जिसको बनाया उसी की मूर्ति बनाकर वंदना करना विवशता हो जाती है , खुद भूखे नंगे रहते हैं और मूर्तियों को शानदार परिधान और तरह तरह से पकवान का भोग लगाते हैं । मंदिर में चढ़ाये फल मधुर मिष्ठान इत्यादि को पुजारी थोड़ा हिस्सा चढ़ाने वाले को प्रसाद बताकर देते हैं अधिकांश अपने लिए रखते हैं । शासक भी जनता से कर वसूली करते हैं और अधिकांश भाग खुद और प्रशासन मिलकर मौज से उपयोग करते हैं ।  भगवान को लेकर लिखी गई कथाओं ने यही परंपरा हमेशा से चलाई है । कितना अजीब लगता है कि अभी भी कुछ लोग किसी की वंदना करते हैं आंखें बंद कर जयजयकार करते हैं अपनी सोच अपनी आज़ादी को छोड़ कर भक्त कहलाते हैं किसी व्यक्ति के प्रशंसक बन कर ।  
 
आपने भगवान को लेकर जितनी कथाएं पढ़ी सुनी हैं सभी में लिखने वाले ने अपने आराध्य की हर बात को उचित ठहराने को आवश्यकता अनुसार परिभाषाएं मापदंड बदले हैं । भगवान शासक बनकर राजा कहलाते हैं मगर जिनसे संबंध रखते हैं उनकी खातिर सभी तरह से सहायता करते हैं । परममित्रों  को सहयोग देने खुद चले आते हैं किसी नारी  की लाज बचाते हैं किसी चाहने वाले  को कदम कदम सुरक्षा देते हैं । कोई  गरीब मित्र है कभी खुद उसकी खबर नहीं लेते सर्वज्ञानी होकर भी अनजान रहते हैं । जब खुद विवश हो चलकर आता है तब शायद महसूस होता है कि उसको भी बिना मांगे कुछ दे देते हैं ऐसा लोक लाज की खातिर करना पड़ा होगा । आज भी शासक अपने खास जानकर मित्रों को सभी कुछ बांटते हैं उनकी अपनी शान ओ शौकत कायम रखने को ज़रूरत पड़ती है तो नियम कानून बनते बदलते हैं । गरीब जनता की फ़िक्र कौन करता है उसको झूठे दिलासे देकर बहलाते हैं , अभी बीस तीस साल इंतिज़ार करो तकदीर बदलेगी । हज़ारों हज़ार साल लोग भगवान की आराधना पूजा पाठ भजन कीर्तन करते हैं लेकिन उस भगवान को कभी गरीबों की सुध लेना याद नहीं आया है । भगवान भरोसे बैठने से तकदीर नहीं बदली करोड़ों की , कुछ खास अमीरों पर भगवान अनुकंपा करते हैं उनको आवश्यकता से अधिक मिलता है , सब उसकी मर्ज़ी है । 
 
भगवान पर कोई शंका नहीं की जा सकती है , कथाओं लिखने वालों ने उसकी अनुचित बातों को भी सही बतलाया है । माखनचोर ही नहीं जाने क्या क्या गुणगान बनाया है , हर देवी देवता ने अपने भक्तों को वरदान देकर उनको अपराधी होने पर सज़ा से बचाया है कभी किसी को आवेश में मिटाया है । विधि का विधान ग़ज़ब है कहते हैं सब प्रभु की माया है । भगवान काल्पनिक है कि वास्तविक मालूम नहीं इक दुविधा रहती है , विधाता को सबकी खबर कहते हैं पल पल की रहती है । दुनिया में फिर क्यों उलटी गंगा बहती है समंदर की प्यास बुझती नहीं हर नदी उसी की तरफ बहती है । सरकार भी इसी अंदाज़ से कारोबार चलाती है जिनको प्यास नहीं उनकी प्यास बढ़ाती है जनता की हालत बदहाल होती जाती है । भगवान खुद बड़े बड़े आलीशान महलों में रहता है इंसान भिखारी बनकर सब दुःख परेशानी सहता है , सब पर कृपा करता है कोई बतलाता है । शायद किसी साहूकार जैसा उपरवाले का बहीखाता है  , असल से बढ़कर ब्याज चढ़ता जाता है । देश की सरकार की व्यवस्था भगवान भरोसे है जनता बेचारी भगवान को मनाते मनाते उम्र बिताती है आखिर किसी दिन हताशा निराशा की सीमा पार हो ही जाती है । दुनिया के धरती पर बनकर रहने वाले भगवानों और किसी आसमान पर रहने वाले असली भगवान सभी सुनते ही नहीं आदमी की व्यथा सुनाते हैं उपदेश और अपने महिमामंडन की कोई कथा । आख़िरी विनती है मत लेना इस बात को अन्यथा । 
 
 मैं ईश्वर को क्यों नहीं देख पा रहा/रही हूँ? - बाल सुसमाचार प्रचार फेलोशिप
  

जनवरी 30, 2026

POST : 2050 कौन गांधी , कैसा गांधी , किसका गांधी ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

 कौन गांधी , कैसा गांधी ,  किसका गांधी  ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

आपका कोई पता ठिकाना मालूम नहीं वर्ना आपको पत्र लिखता डाक से भेजता , आधुनिक युग है बापू क्या होता है महात्मा कैसे होते हैं मायने नहीं जानते लोग । आपकी अहिंसा की बात व्यर्थ प्रतीत होती है क्योंकि आजकल धौंस धमकी दे कर ताकतवर देश कमज़ोर देशों को विवश करते हैं अपनी बात मनवाने को । कहने को लोकतंत्र कहलाते हैं जबकि अन्य देशों की संप्रभुता की रत्ती भर भी परवाह नहीं करते हैं । आपको समाधि पर जाकर शीश झुकाते हैं तमाम देश विदेश के राजनेता लेकिन किसी को गांधीवादी विचारधारा की कोई परवाह नहीं है । कुछ लोग कहते हैं कि आज़ादी आपकी अहिंसा की नीति से चरखा चलाने से स्वदेशी को अपनाने विदेशी का बहिष्कार करने से नहीं मिली थी । आजकल शासक खुद अपने लिए सभी विदेशी वस्तुओं को पसंद करते हैं भारत की निर्मित चीज़ों की गुणवत्ता पर उनका भरोसा ही नहीं है । अंग्रेज़ी कंपनी की जगह शासक अपने देश की अपनी मनपसंद कंपनियों पर निर्भर होने को सभी कुछ ख़ास धनवान साहूकारों के हवाले करने लगे हैं । जनता द्वारा निर्वाचित शासक डमरू बजाने से अनगिनत रंग रूप वेशभूषा पहन कर अपना गुणगान करवाने पर धन संसाधन बर्बाद करते हैं । देश को 2047 में शानदार बनाने का झूठा ख़्वाब दिखलाते हैं जबकि उनको आज की हालत की समझ तक नहीं है , तमाम वादे प्रलोभन नाकाम साबित हुए हैं लेकिन शासक हैं कि अपनी भूल स्वीकार करने को तैयार ही हैं बल्कि खुद अपने मुंह मियां मिठू बनकर आत्ममुग्ध हैं ।   
 
कभी कहते थे महात्मा गांधी मज़बूरी का नाम है लेकिन आधुनिक युग की सरकार को गांधी जी इक अनचाहा बोझ प्रतीत होते हैं इसलिए तमाम ढंग से गांधी शब्द को हटाने मिटाने की कोशिश की जाने लगी है ।  गांधी जी आपकी बात वैष्वण जन तो तेने रे कहिए जे पीर पराई जाने रे , पर दुःखे उपकार करे तो ये , मन अभिमान न आणे रे ।  आजकल कथनी और करनी विपरीत होती है , भाषण देश सेवा जनता का कल्याण करने के देते हैं आचरण में अहंकार और शोषण अत्याचार करने को प्रशासन ही नहीं सुशासन कहने लगे हैं । भ्रष्टाचारी और अपराधी खुद को महान और माननीय कहलाने लगे हैं सत्ताधारी अपराधियों को गले लगाने उनको बचाने लगे हैं । सत्य के साथ गांधी जी आपने प्रयोग किए थे झूठ लूट पर प्रयोग शोध किया जाने लगा है । हर रिश्वतखोर खुद को देशसेवक बताने लगा है ईमानदारी का अर्थ घूस खाकर काम करना बतलाने लगा है । गांधी जी आपको 78 साल पहले क़त्ल किया गया था मगर आजकल रोज़ आपको क़त्ल किया जाता है शासक समझ नहीं पा रहे कैसे आप मर कर भी मरते नहीं हैं । इस सवाल से परेशान हैं आधुनिक शासक , कौन गांधी , कैसा गांधी , किसका गांधी । 
 
 Vaishnav Jan To Tene Kahiye - वैष्णव जन तो तेने कहिये भजन | Lyrics in Hindi  + English

जनवरी 13, 2026

POST : 2049 लूटने वाले आज भी हैं ( कटाक्ष ) डॉ लोक सेतिया

          लूटने वाले आज भी हैं ( कटाक्ष ) डॉ लोक सेतिया  

राष्ट्रीय सुरक्षा कलाकार अजीत डोभाल ने युवकों को संबोधित करते हुए कहा है कि हमें अपने इतिहास का प्रतिशोध लेना है ।  जाने ऐसे लोग देश की वास्तविक सुरक्षा को लेकर कितने संवेदनशील  हैं क्योंकि आजकल उनके ही कालखंड में देश की लूट में राजनेताओं अधिकारियों धनवान लोगों की मिलीभगत साफ दिखाई दी है , क्या सुरक्षा सलाहकार को वो सब उचित लगता है अथवा हज़ार साल पहले विदेशी लुटेरों से बदला लेने की सोच आधुनिक देश को लूटने वालों को लेकर खामोश रहना उनकी मानसिकता उचित हो सकती है । गंभीर समस्याओं जैसे आतंकवाद से लेकर चीन अमेरिका तक को लेकर लगता नहीं कि ऐसा ही आचरण शासक एवं सरकार का दिखाई दिया है हर बार शौर्य का डंका बजाते हैं लेकिन अंजाम तक कभी पहुंचते ही नहीं है । गीदड़ भभकी देना उचित नहीं है हम ताकतवर हैं दावा करते हैं मगर शीघ्र ही किसी के प्रभाव में आकर कदम पीछे खींच लेते हैं । काश अजीत डोभाल जी संदेश देते कि हमको पुराने इतिहास से सबक सीखना चाहिए और देश समाज को लूटने वाले चाहे जो भी हों उनका साहसपूर्ण विरोध करना चाहिए । विडंबना ही है कि जब अधिकांश राजनेता प्रशासनिक अधिकारी कर्मचारी बड़े बड़े उद्योगपति धर्म उपदेशक से खिलाड़ी भगवा धारण करने वाले व्यवसायी कलाकार तक तमाम जनता को गुमराह कर खुद मालामाल होने में शामिल हैं उनकी लूट खसूट की बात छोड़ पुरातन इतिहास से बदला लेने को युवकों को उकसाने का कार्य कर रहे हैं ये जानते समझते हुए कि इसका हासिल कुछ भी नहीं होगा । बल्कि शायद उनका मकसद इस युग की ऐसी तमाम खामियों से ध्यान हटाने की कोशिश लगती है ।  
 
कुछ अन्य संवैधानिक संस्थाओं की तरह से ही देश संविधान से अधिक शासक वर्ग से संबंध बनाने को ऐसा किया जाने लगा है , विशेषकर जब सुप्रीम कोर्ट ऐसी ही कितनी बातों पर हैरानी जता रहा है कि देश में नियम कानून भी कुछ ख़ास लोगों के लिए अलग अलग निर्धारित किए जाने लगे हैं उनको अपराध करने पर भी सज़ा से बचाने को संविधान संशोधन लाने लगे हैं । शासक बनकर अपनी डफली अपना अपना राग बजाने लगे हैं । लोकतंत्र को कब लूटतंत्र बना दिया गया किसी को खबर ही नहीं हुई , सांसदों विधायकों को कल्याण निधि के नाम पर ही नहीं बल्कि कितनी ही सुविधाओं पर बेतहाशा धन खर्च करना देश जनता की सेवा हर्गिज़ नहीं है बल्कि कानूनी डकैती है , जिस देश में करोड़ों को पांच किलो अनाज से जीने पर विवश किया जाता है और कितनी ही ऐसी लुभावनी योजनाओं का मकसद जनमत को प्रभावित कर सत्ता पर काबिज़ रहना है उस में प्रधानमंत्री मुख्यमंत्री से अन्य सभी शासक वर्ग का विलासिता पूर्वक जीवन समाज की सेवा नहीं ख़ज़ाने की लूट ही है । अधिकांश योजनाओं में पैसे का गलत उपयोग से भ्र्ष्टाचार करने तक सामने आता रहता है । पिछले कुछ सालों में बहुत कार्य झूठे कागज़ी आंकड़ों पर ही हुए हैं मगर कभी जांच नहीं हुई कि कौन कौन कैसे शासक वर्ग से मिलकर ये लूटने का कार्य करता रहा है । जिनको इस सब पर निगरानी करनी थी उन्होंने अपनी आंखें बंद कर सब गलत होने दिया है अपने स्वार्थ की खातिर ।   
 
अजीत डोभाल जी को मालूम होना चाहिए कि देश में धर्म की आड़ में अभी भी लूट चल रही है , क्या मंदिर मस्जिद गिरजाघर गुरूद्वारे का मकसद धन दौलत ज़मीन जायदाद एकत्र करना होना चाहिए या फिर दान से मिली राशि को दीन दुःखियों को सहायता देने पर खर्च करना चाहिए । सबसे महत्वपूर्ण बात किसी भी धर्म को राजनीति को बढ़ावा देने को भेदभाव नहीं करना चाहिए जैसा आजकल होने लगा है । धर्म को अपनी सत्ता की राजनीति का माध्यम बनाना भी देश समाज और संविधान की भावना के विपरीत है । आप पढ़ लिख कर ऊंचे  पद पर नियुक्त होने के बावजूद भी युवा समाज को इस तरह से भटकाने का प्रयास कैसे कर सकते हैं । क्या आप समाज को बताएंगे कि जिस तरह सत्ता मिलते ही राजनेताओं और राजनैतिक दलों के पास धन दौलत और आलीशान दफ़्तर से महलनुमा आवास बनते जाते हैं वो कैसे संभव है बिना सत्ता का दुरूपयोग कर लूट करने के चाहे उसको चंदा इलेक्टोरल बांड कुछ भी नानकरण कर दिया जाए । अफ़सोस है इस अनुचित राजनीति पर कोई कुछ नहीं बोलता क्योंकि सभी शामिल हैं अपना अपना हिस्सा पाने में लूट के भागीदार बन सोशल मीडिया अख़बार टेलीविज़न से तथकथित समाजसेवी तक ।  अंत में इक खरी बात कभी बाद में कोई इतिहास में दर्ज करेगा कि ऐसा भी हुआ था जब पुरानी लूट पर भाषण दिए गए थे मगर उस समय हो रही लूट खसूट पर एक आवाज़ नहीं सुनाई दी थी ।  अंत में इक ग़ज़ल , सियासत बोझ बनती जा रही है , विरासत आपको समझा रही है । 
 
 

विरासत अब समझ में आ रही है ( ग़ज़ल )

 डॉ लोक सेतिया ' तनहा ' 

 

सियासत बोझ बनती जा रही है 
विरासत आपको समझा रही है । 
 
नज़र तिरछी हुई सत्ता की देखो 
लो सबको याद नानी आ रही है ।  
 
भरोसा अब नहीं कोई भी बाकी 
हक़ीक़त देख कर पछता रही है । 
 
जो शोले राख में दहके हुए हैं 
उसे वो रौशनी बतला रही है । 
 
हुआ क्या हाल ' तनहा ' देश का है
फसल को बाड़ चरती जा रही है । 
 

 

जनवरी 03, 2026

POST : 2047 कहां से कहां आ गये हैं ( व्यंग्य - रंग बदलती दुनिया ) डॉ लोक सेतिया

कहां से कहां आ गये हैं ( व्यंग्य - रंग बदलती दुनिया ) डॉ लोक सेतिया   

कहां आ गये हम , मेरी पुरानी ग़ज़ल है जिस का वीडियो बनाया जा रहा है मेरे यूट्यूब चैनल गीतकार पर प्रसारित होने की प्रतीक्षा है , इस रचना का शीर्षक उपयुक्त प्रतीत हुआ मुझको । मैंने दो दिन पहले बताया था कि अगली पोस्ट का विषय होगा जब हम खुद को दर्पण में देख कर आनंदित होने लगते हैं तब अपने भीतर झांकना छोड़ देते हैं । अपनी बाहरी सुंदरता सजावट पर ध्यान देते हैं अंतर्मन को देखना तक नहीं चाहते हैं क्योंकि आवरण शानदार है भीतर सब मैला कुचौला है । इक ऐसी शुरुआत हुई है कि हर मुख्यमंत्री से देश के प्रधानमंत्री तक को देश की हर दीवार पर अपनी ही तस्वीर लगवानी है शोहरत की कामना है । मैंने कितनी बार जॉर्ज सिल्वे की कही बात को दोहराया है कि लोकप्रियता की आकांक्षा करना इक अपराध जैसा है , ये आपके नैतिक आचरण एवं व्यवहार पर निर्भर करता है कि आपको शोहरत मिलेगी अथवा नहीं । देश के खज़ाने से विज्ञापन प्रचार प्रसार से अपने नाम का डंका पीटना मानसिक रोग ही कहला सकता है । अब तो सरकार के सभी विभाग एवं प्रशासक राजनेता इस मानसिकता का शिकार हैं । सभी आत्ममुग्ध हैं किसी को सामाजिक पतन बदहाली की कोई चिंता ही नहीं है , दिखावा सभी करते हैं जबकि जानते हैं उन्होंने कुछ भी सार्थक करने का प्रयास ही नहीं किया । सभी को अधिक से अधिक खुद की खातिर चाहिए और अंजाम ये है कि जनता की खातिर कुछ बचता ही नहीं , सब मिल बांटकर मौज करते हैं । ख़ुशहाली चंद घरानों के लिए आरक्षित है जैसे जो रईस हैं उन्हीं को सब की भूख है , धर्म भी बताता है कि जिस के पास सभी कुछ हो फिर भी और अधिक पाने की हवस हो वो सब से दरिद्र होते हैं । 
 
बात इंसान की नहीं है सरकार समाज की व्यवस्था से लेकर तमाम जगह की यही है , सभी शोर मचाते हैं आगे बढ़ने का मगर किस दिशा को अग्रसर हैं कोई नहीं बताता कोई नहीं समझता कोई नहीं दिखलाता कि  असलियत क्या है कौन आगे बढ़ रहे हैं और कौन और भी पिछड़ रहे हैं सामाजिक खाई इतनी बढ़ गई है । 2026 देश की आज़ादी के 78 साल बाद देश समाज का आचार विचार व्यवहार इतना बदल चुका है कि सोचने समझने लगे तो घबराहट होती है । कभी महात्मा गांधी जी गरीब लोगों को नंगे बदन देख कर सिर्फ एक धोती पहनने का संकल्प लेते हैं , लाल बहादुर शास्त्री पुराने कपड़े पहन कर शपथ ग्रहण करते हैं जबकि आजकल हर मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री का शपथ ग्रहण समारोह भव्य आयोजित कर देश की गरीबी का नहीं करोड़ों गरीबों का उपहास किया जाता है । शासक प्रशासक कर्तव्य निभाने की चिंता ही नहीं करते उनकी प्राथमिकता खुद अपने लिए शानदार भवन हर शहर में सचिवालय राज्यों की राजधानी में शानदार बड़ी बड़ी इमारतें जिनमें सभी सुख सुविधाएं उपलब्ध हों , आधुनिक संचार माध्यम और तमाम राजसी शान ओ शौकत आवश्यक लगते हैं । उनको कोई फर्क नहीं पड़ता कि देश की अधिकांश जनता को पीने का साफ पानी बुनियादी सुविधाएं नहीं हासिल हुई हैं । अगर इसको जनकल्याण देशसेवा समझते हैं तो लोकतंत्र में कितना बड़ा अपराध है मालिक भूखा और उसका नौकर सेवक बन कर छप्पन भोग खाकर भी मानता है जनता पर उपकार करते हैं । 
 
सभी दलों के राजनेताओं ने खुद अपने लिए बंगले गाड़ियां और धन दौलत के अंबार एकत्र कर लिए हैं , शायद ही कोई मिल सकता है जिस नेता या सरकारी अधिकारी के पास उनकी वास्तविक आमदनी से हज़ारों लाखों गुणा जायदाद बेनामी नहीं है । जिस पर छापा डालते हैं पुलिस प्रशासनिक बड़े अधिकारी से छोटे कर्मचारी के पास करोड़ों रूपये बरामद होते हैं । सर्वोच्च न्यायालय के न्यायधीश तक के पास धन मिलता है कभी आग लगने से सामने आता है । जानकर हैरानी हुई कि सरकार ने ऐसा कानून बनाया हुआ है जिस में जायदाद ज़ब्त हो सकती है अथवा जुर्माना लगाया जा सकता है लेकिन उनको कोई सज़ा नहीं मिल सकती है । ऐसे ही कुछ अन्य संस्थाओं पर नियुक्त अधिकारी को अपराधी साबित होने पर भी कोई मुकदमा उन पर नहीं चलाने का नियम बनाया हुआ है , मैं चाहे जो करूं मेरी मर्ज़ी । ये कैसा मंज़र है कि देश को बताते हैं आगे बढ़ रहा है लेकिन अपराध गंभीर से गंभीर करने वाले शान से रहते हैं शायद ही कुछ को सज़ा मिलती है । हमारे देश के शासक रत्ती भर भी शर्मिंदा नहीं होते हैं ये देख जानकर कि अन्याय अत्याचार और अमीर गरीब में फ़ासला दिन पर दिन बढ़ता ही जाता है । सरकार सामान्य जनता के प्रति उदासीन है और धनवान लोगों और देश को लूटने वाले साहूकारों के प्रति दयावान है अर्थात अराजकता को बढ़ावा दे रही है । 
 
आजकल ईमानदारी नैतिकता और ऊंचे आदर्शों पर चलना तमाम बड़े लोगों ने छोड़ दिया है सच्चाई से रिश्ता तोड़ कर झूठ और आडंबर से ऐसा गठबंधन कर लिया है कि सही और गलत की परिभाषा बदलनी पड़ी है । इधर सरकारी योजनाओं का अंबार लगा हुआ है और निशदिन नई नई योजनाएं घोषित की जाती हैं जबकि तमाम घोषणाएं कागज़ी हैं कुछ भी हासिल नहीं हुआ इन सभी से सामन्य जनता को । सिर्फ कुछ खास वर्ग को लूटने और झूठे आंकड़े बनाकर जनता को दिखाने पर ही बेतहाशा धन टीवी अख़बार पर प्रचार प्रसार पर बर्बाद कर खुद अपनी पीठ थपथपाई जाती है सत्ताधारी शासकों द्वारा । हमने भौतिकता की खातिर सभी मूल्यों आदर्शों को त्याग दिया है जिस तरफ देखते हैं सभी खुदगर्ज़ी में समाज को विनाश की तरफ धकेल रहे हैं , सभी अर्थात तमाम लोग अपनी सही दिशा से भटक गए हैं और उस जगह खड़े हैं जहां कोई मंज़िल नहीं कोई रौशनी नहीं सिर्फ अंधकार दिखाई देता है दूर दूर तक ।    
 
 
 

 
 

दिसंबर 13, 2025

POST : 2044 कोई और करे तो गलत खुद करें तो सही ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

   कोई और करे तो गलत खुद करें तो सही   ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

कुछ बातें कभी भी बदलती नहीं हैं , उनका अर्थ उनका अभिप्राय बदल देते हैं , सरकार प्रशासन ही नहीं सामान्य लोग भी कहते हैं कि हमसे पहले कितना कुछ उचित नहीं था मगर हमने वही सब किया भी , लेकिन कोई अनुचित नहीं करार दे सकता है जैसे हमने किया बढ़िया है । सही क्या गलत क्या के मापदंड बदल देते हैं और कहते हैं कि समय बदल गया है हालात बदले हुए हैं जबकि वास्तव में बदलता कुछ भी नहीं है सिर्फ नामकरण कर दिया पाप को पुण्य घोषित कर दिया , लूट को समाज की सेवा कह दिया , मनमानी करने को देश कल्याण नाम दे दिया जाता है । कौन कहता है कि लिखी हुई इबारत को कोई मिटा नहीं सकता है इधर इतिहास को अलग ढंग से समझाया जाता है सूरज को दीपक दिखलाया जाता है । झूठ को सच साबित किया जाता है काले को सफ़ेद करने को सबको आंखें बंद रखने को आदेश देकर इस तरह चूना लगाया जाता है कि दुनिया को सही मार्ग से भटकाया जाता है । नियम कानून को दरकिनार कर अपने लिए रास्ता बनाने को पेड़ों को कटवा कर पर्यावरण संरक्षण को ठेंगा दिखाया जा रहा है , बाकी दुनिया को कुछ अलग सबक पढ़ाया और समझाया जा रहा है । कठपुलियों को उंगलियों पर नचाने का हुनर जानते हैं सत्ता का नंगा नाच खुलेआम खेल कर पर्दों से छिपाया जा रहा है । रोज़ हैरानी होती है कुछ लोग आपस में चर्चा करते हैं ज़माने भर की बातें बताते हैं अवगुण सभी के उनकी आंखों को नज़र आते हैं , मगर अपने आचरण पर कभी ध्यान ही नहीं देते खुद उसी तरह से व्यहवार करने को ज़रूरी समझते हैं ये फ़रमाते हैं ।  
 
 

सच और झूठ की लड़ाई में ( हास्य- कविता ) 

डॉ लोक सेतिया 

 
शिखर पर खड़ा हुआ है झूठ सच पड़ा हुआ खाई में  
इंसाफ़ क़त्ल होता रहता सच और झूठ की लड़ाई में
 
सियासत की अर्थी भी निकलेगी मगर बरात बन कर
जनता की डोली का दुःख दर्द दब जाएगा शहनाई में
 
शासकों को क्या खबर क्या क्या होने लगा समाज में 
जंग लाज़मी है चुनावी खेल में , हर भाई और भाई में
 
आत्मा ज़मीर आदर्श और ईमानदारी से फ़र्ज़ निभाना 
कोई कबाड़ी खरीदता नहीं ये सब सामान दो पाई में 
 
जिनको इतिहास लिखना आधुनिक समय का यहां 
भर लिया इंसानी खून उन्होंने कलम की स्याही में 
 
राजनेता अधिकारी धनवान लोग शोहरत जिनकी है 
खोटे साबित हुए सब कसौटी पर हर बार कठिनाई में 
 
सबका भला नहीं सिर्फ खुद अपने लिए जीना मरना 
खूब मुनाफ़ा अब बाजार में अच्छों की झूठी बुराई में  
 
 सूरज को दीया कौन दिखा सकता है? |Yog Se Yogyata | योग से योग्यता |  #Meditation With Ojaank Sir| - YouTube
 


दिसंबर 02, 2025

POST : 2042 कहनी है बात खरी खरी , भली लगे या लगे बुरी ( कटाक्ष ) डॉ लोक सेतिया

        पापियों के पाप धोते धोते ( कटाक्ष ) डॉ लोक सेतिया 

               { कहनी है बात खरी खरी , भली लगे या लगे बुरी }

टी एन शेषन  ने जो अभियान देश की गंदी राजनीति को स्वच्छ करने को 1990 में मुख्य चुनाव आयुक्त का प्रभार संभालने पर शुरू किया है 2025 तक कुछ ऐसा हुआ है कि भगीरथ की गंगा खुद ही इस कदर मैली लगने लगी है कि लोग चुनाव आयोग को लेकर आशंकित हैं । अंकुश जिन पर लगाना था उन को छोड़ अन्य सभी पर कठोर होने लगी है , अपराधी राजनेताओं और अनुचित ढंग से चुनाव लड़ने वालों पर मुलायम और मेहरबान हुई लगती है । चुनाव आयोग अपनी भूमिका बदल चुका है और उधर खड़ा दिखाई देता है जिधर सभी राजनेता सत्ता पाने को नियम कानून से आदर्श नैतिकता को ताक पर रखने को अपना अधिकार समझते हैं । आजकल लोकतंत्र का अर्थ जनता और समाज को बेहतर बनाना नहीं बल्कि सिर्फ और सिर्फ किसी भी तरह सत्ता पर अधिकार हासिल कर मनमानी करना है । खेद की बात है कि सभी दल एक जैसे हैं सरकार बदलने से भी जनता की देश की तस्वीर और तकदीर नहीं बदलती है । 
 

उन्होंने जो करना शुरू किया पहले उन पर ध्यान देना ज़रूरी है : - 

 
आचार संहिता को सख्ती से पालन करवाना । 
सभी मतदाताओं के लिए फोटो लगा पहचान पत्र शुरू करवाया । 
उम्मीदवारों के निर्धारित खर्चों पर अंकुश लगाना । 
चुनाव में पर्यवेक्षक तैनात करने की प्रक्रिया को सख़्ती से लागू किया ।  
 

कई भ्र्ष्ट प्रथाओं को ख़त्म करने की कोशिश : -

मतदाताओं को लुभाने या डराने की व्यवस्था का अंत करने का प्रयास । 
चुनाव के दौरान शराब और अन्य चीज़ें बांटने पर सख़्ती से रोक लगाना । 
प्रचार के लिए सरकारी मशीनरी के दुरूपयोग पर रोकने की कोशिश करना । 
जाति या साम्प्रदायिक आधार पर मतदाताओं से वोट देने की अपील पर रोक । 
चुनाव प्रचार के लिए धर्म स्थलों के इस्तेमाल पर रोक लगाना । 
पूर्व अनुमति के बगैर लाउडस्पीकर और तेज़ आवाज़ में संगीत पर रोक लगाना । 
 
आज ये सब पढ़कर अचरज होता है कि कभी इतने शानदार साहसी ईमानदार अधिकारी हुआ करते थे , चुनाव आयुक्त पर आसीन होने से पहले जब वह वन और पर्यावरण मंत्रालय में थे तब उस को भी सार्थक और कारगर बना दिया था । बड़े से बड़े सत्ताधारी को नहीं कहने की परंपरा उन्होंने ही शुरू की थी क्योंकि उनकी निष्ठा देश संविधान और जनता के प्रति थी किसी सरकार दल या संगठन के प्रति नहीं थी । अब सब कुछ सामने है चुनाव आयोग आंखें बंद कर सभी उपरोक्त नियमों की धज्जियां उड़ाने देता है । चुनाव घोषित होते ही जनता को प्रलोभन और प्रचार के लिए सत्ता का दुरूपयोग धन बल बाहुबल का खुला प्रदर्शन जनता को भयभीत करने से अपने बिछाये जाल में फंसाने को किया जाने लगा है । ऐसे माहौल में कोई शरीफ आदमी ईमानदारी से चुनाव लड़ ही नहीं सकता है क्योंकि कोई रोकने टोकने वाला नहीं है कि सभी इक समान अधिकार से चुनाव में भागीदार बन सकते हैं । 
 
लेकिन जो चुनाव आयोग 35 साल बाद भी अपने वास्तविक उद्देश्य से भटक कर जनता समाज संविधान सभी की उपेक्षा कर मनचाहे ढंग से ही नहीं बल्कि अपने अधीन कार्य करने वालों को लेकर भी निर्दयी होकर कितनी मौतों खुदकुशियों का तमाशाई बना हुआ है उस में साधरण नागरिक के प्रति संवेदना की कोई उम्मीद ही कैसे की जा सकती है । जानकारी मिली है कि इक चुनाव आयुक्त ने कुछ ऐसी टिप्पणी की थी लेकिन उसको सामने लाने की बात छोड़ रिकॉर्ड से हटाया गया तो उस पर मानवीय आधार पर विचार करने की ही कैसे होगी । हमने गंगा सफाई अभियान यमुना सफाई अभियान पर बहुत देखा समझा है मर्ज़ बढ़ता ही गया ज्यों ज्यों दवा की जैसी हालत है । सरकारी तमाम योजनाओं का अंजाम लूट खसूट से सिवा कुछ भी नहीं है क्योंकि सरकार शासक प्रशासन से लेकर न्याय करने वालों और निगरानी करने वाली संस्थाओं में सभी हम्माम में नंगे हैं कोई किसी को आईना कैसे दिखाएगा । संसद भवन नया बनने से उस में बैठने वालों में कोई बदलाव अच्छा नहीं आया है अपराधी और बदमाश संख्या में बढ़ते ही गए हैं और सत्ताधरी दल में संगीन अपराध का आरोपी होना जैसे प्रवेश का रास्ता लगता है । 
 
शासकों ने जिन संस्थाओं ने अनुचित संसाधन अपनाने पर निगरानी रखनी थी , उनका उपयोग अपने लिए चंदे के नाम पर जबरन वसूली करने का माध्यम बनाकर जैसे किया उसे जंगलराज ही कहना चाहिए । काला धन नहीं मिला बल्कि अब सरकार कहती है रिज़र्व बैंक नहीं जानता कि पिछले दस साल में देश से कितना काला धन विदेश गया है । काला धन गरीबी बेरोज़गारी की बातें सत्ता पाने को माध्यम थे सत्ता पाकर कुछ भी बदलना उनकी मंशा कभी नहीं थी । हैरानी की नहीं खेद ही नहीं शर्मसार होने की बात है कि हमारे देश में समाज के सभी अंगों में निरंतर पतन होता गया है । विकास और आधुनिकता की दौड़ में हम इतने पागल हुए हैं कि खुद अपनी सुध बुध खो बैठे हैं । हर कोई जिस शाख पर बैठा है उसी को काट रहा है , ऐसा कहावत में सुनते कहते थे हक़ीक़त में देखना पड़ेगा कभी कल्पना नहीं की थी । देश की गिरावट को लगता है टी एन शेषन जी ने भांप लिया था शायद उनकी पुस्तक  ' डीजनरेशन ऑफ़ इंडिया ' पढ़ कर मालूम हो , मैंने पढ़ी नहीं है अभी तक ।  विषय गंभीर है मैंने उस को कटाक्ष करने की भूल की है शायद क्योंकि आजकल सभी कुछ ऐसा ही करने लगे है बात रोने की पर ठहाके लगाने लगे हैं और इसको रोग भगाने की विधि बताने लगे हैं । साहिर लुधियानवी की ग़ज़ल फ़िल्म बहू बेग़म आशा भौंसले की आवाज़ लगता है आज की वास्तविकता है । 
 

निकले थे कहां जाने के लिए पहुंचे हैं कहां मालूम नहीं , 

अब अपने भटकते कदमों को मंज़िल के निशां मालूम नहीं । 

 

हमने भी कभी इस गुलशन में एक ख़्वाब - ए - बहारां देखा था ,

कब फूल झड़े कब गर्द उड़ी कब आई ख़िज़ां मालूम नहीं । 

 

दिल शोला - ए - ग़म से ख़ाक हुआ या आग लगी अरमानों में ,

क्या चीज़ जली क्यों सीने से उठता है धुंवा मालूम नहीं ।

 

बर्बाद वफ़ा का अफ़साना हम किससे कहें और कैसे कहें ,

ख़ामोश हैं लब और दुनिया को अश्कों की ज़ुबां मालूम नहीं । 

   
 इक हास्य व्यंग्य कविता से विषय का अर्थ समझाने की कोशिश मैंने भी की है ।    
 
 

 ग़ाफ़िल कहता ग़ाफ़िल की बात ( हास्य व्यंग्य कविता ) 

             डॉ लोक सेतिया

 
दिल ही समझा ना है दिल की बात 
लहरों से होती क्या साहिल की बात ।
 
दर्द अपना किसे बताएं लोग जब अब  
मुंसिफ़ ही कहता है क़ातिल की बात ।  

दिल्ली में कोहराम मचा हुआ है कोई
कीचड़ से सुन कर कमल की बात । 

जमुना का पानी रंग बदलता नहीं कभी  
मछलियां जब करती जलथल की बात ।
 
आई डी दफ़्तर में रखा है सर का ताज़
यही पुरानी आज बनी इस पल की बात ।
 
गूंगों बहरों की बस्ती में होता शोर बहुत 
यही है दिल्ली की हर महफ़िल की बात ।  
 

 
 
 
 

नवंबर 20, 2025

POST : 2039 बिहारी दूल्हे की बरात ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

     बिहारी दूल्हे की बरात  ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया  

    अबकी बार क्या होगी चुनावी नैया पार महीनों तक संशय था बेकार , नतीजों की आई ऐसी बहार फिर मिल बैठे चार यार शादी होगी शानदार छप चुके हैं इश्तिहार । चुनाव में शानदार प्रदर्शन करना महत्वपूर्ण नहीं रहा , उम्मीद से ज़्यादा झोली भरी हुई है सभी साथ मिलकर लड़ कर विजयी हुए थे अब कौन बनेगा क्या बनेगा की उलझन खड़ी हुई है । जैसे किसी गरीब की लॉटरी निकलती है कुछ लोग जानते ही नहीं उनको जनता ने निर्वाचित किया क्या देख समझ कर । सभी को मालूम है जनता को अभी तक सही गलत की छोड़ो भले बुरे की भी पहचान नहीं है अन्यथा अधिकांश लोग ऐसे हैं जिनको देश समाज संविधान नियम कानून की रत्ती भर भी समझ नहीं हैं शराफ़त से उनका कभी कोई नाता नहीं रहा है बदमाशी उनकी पूंजी है जिस के दम पर जनता से समर्थन मांगते नहीं छीनते हैं । अब शासन की बागडोर हाथ आई है तो सभी गठबंधन के संगी साथी आमने सामने खड़े हैं हिस्से की भागीदारी के सवाल पर । जैसे एक हसीना सौ दीवाने इक शमां सौ परवाने जैसा हाल है आग़ाज़ तो अच्छा है अंजाम खुदा जाने । 
 
कुछ असंजस की दशा बनी हुई है , दिल सभी के धड़कते हैं राजा जी कहलाने को मगर जब तक राजकुमारी हाथ में जीत की वरमाला लिए खड़ी नहीं दिखाई देती चुप रहना पड़ता है । लोकतंत्र की रीति अजीब है सत्ता की राजकुमारी खुद नहीं जानती पहचानती किस को वरमाला पहनानी है । सभी ससुराल वाले अपने अपने दावे प्रतिदावे पेश कर अपनी शर्तों से बाराती बुलाना चाहते हैं । लेकिन तमाम अटकलें थम गईं जब इक तथ्य पर चिंतन किया गया कि कहीं ऐसा नहीं हो पटना की रानी का चयन बिहारी जनता को अनुचित प्रतीत हो और पूरी की पूरी जीती हुई बाज़ी गंवा बैठें ।  दुल्हन वही जो पिया मन भाए लेकिन कौन पिया है किस किस का जी ललचाये , अपने लगने पराये रूठे कोई कोई मनाये । फिर वही कहावत लगती है जारी एक बिहारी सब पर भारी , जिसको समझे थे मज़बूरी वही बन गया इक लाचारी उस के बिना नहीं खुलता कोई ताला कौन है जीजा कौन है साला । गठबंधन है बड़ा निराला सांवला सलौना लगता है मतवाला नहीं मंज़ूर कोई बाहर वाला , ज़िद पर अड़ा हुआ है दूल्हा उसकी शादी होगी निराली , प्रेम विवाह जैसा बंधन नहीं है ये है बड़े बज़ुर्गों द्वारा तय किया रिश्ता है लेकिन कुछ भी रिश्तों संबंधों में इक समान नहीं है । हर कोई चतुर सुजान है राजनीति में कोई भी नादान नहीं है । किसी की ज़मीन नहीं किसी का कोई आसमान नहीं है । आपस का कारोबार है इक हाथ लेने इक हाथ देने का नियम है किसी का किसी पर एहसान नहीं है ।   
 
जिनकी आरज़ू दिल की अधूरी रह गई उनको लगता है कभी न कभी बिल्ली की किस्मत से छींका टूटेगा तो उनकी चाहत पूरी हो सकती है । सभी संग संग हैं तब तक जब तक कोई बेहतर विकल्प नहीं दिखाई देता ।  
आपको क्या अभी भी समझ नहीं आया कि हमारे देश में लोकतंत्र संविधान जनता समाज की भलाई देश की सेवा सभी झूठी बातें हैं असलियत सत्ता की लूट का इक खेल है । शपथ उठा ली गई है शपथ का अर्थ कोई नहीं समझता है निभाना कौन चाहता है । सत्ता की भागीदारी का बंटवारा लगता है जैसे कोई ख़ज़ाना मिल गया है हर कोई हड़पना चाहता है । बाहर कुछ दिल में कुछ और सभी की हालत ऐसी है लगता है कभी भी कोई भी कुछ भी तमाशा कर सकता है राम राम करते किसी तरह बरात तैयार हुई घुड़चढ़ी हो गई और दुल्हन भी मिल जाएगी । लेकिन आने वाले समय में सत्ता रानी कितनी स्यानी क्या सभी को खुश कर पाएगी , या आधुनिक कन्या की तरह अपना रंग दिखलाएगी सभी को तिगनी का नाच नचाएगी । दिल्ली भी बिचौलिया जैसी है क्या देगी क्या पाएगी ये उलझन कभी क्या सुलझ पाएगी । अभी अठखेलियां देखनी हैं सभी दल वाले गुल खिलाने वाले हैं इक युग्ल गीत गाने वाले हैं ।  
 
         बागों में बहार है , कलियों पे निखार है , 
         ............. तुमको मुझसे प्यार है 
 
         छोड़ो हटो जाओ पकड़ो न बैंयां , 
        आऊं न मैं तेरी बातों में सैंयां 
 
         तुमने कहा है देखो देखो मुझको सैंयां , 
         बोलो तुमको इकरार है ..............
 
        तुमने कहा था मैं सौ दुःख सहूंगी , 
        छुप के पिया तेरे मन में रहूंगी ............
 
        अच्छा चलो छेड़ो आगे कहानी , 
        होती है क्या बोलो प्यार की दीवानी 
         
        बेचैन रहती है प्रेम दीवानी 
       बोलो क्या दिल बेकरार है जीना दुश्वार है  ...........
 

       आपने ये गीत सुना हुआ है लेकिन यहां नायक की आवाज़ सुनाई दे रही है मगर 

       नायिका की ना ना ना ना आखिर में हां की आवाज़ म्यूट है जिसने धड़कनें बढ़ा दी हैं ।  

 
     Arranged Marriage Vs Love Marriage,क्या आप भी मम्मी-पापा की मर्जी से करने  जा रहे हैं शादी, तो अरेंज मैरिज करने से पहले जान लें ये बातें - these arranged  marriage facts that

नवंबर 05, 2025

POST : 2037 मैं हूं बिग्ग बॉस ( व्यंग्य - कथा ) डॉ लोक सेतिया

             मैं हूं बिग्ग बॉस ( व्यंग्य - कथा ) डॉ लोक सेतिया  

मैं क्या हूं क्यों हूं कहां हूं कैसे हूं सभी लोग तमाम दुनिया उलझी हुई है मेरी उलझन सुलझाने में , मगर चाहे जितना सुलझाए कोई उलझन बढ़ती जाती है । दुनिया वाले क्या भगवान भी मुझसे अनजान है क्योंकि मेरी बनाई दुनिया में उसका नहीं कोई नाम है न कोई निशान है । आप समझे नहीं ये किसी टीवी शो की बात नहीं है मेरी सबसे ऊंची निराली शान है मेरे लिए हर शख्स नासमझ है अभी नादान है । मेरा सभी कुछ है कुछ भी मेरा है नहीं लेकिन जो भी है सब कुछ मेरे अधिकार में है , आपका जीना आपका मरना कोई मायने नहीं रखता है जो भी है सिर्फ मेरे ही इख़्तियार में है । मेरी सत्ता इस पार से उस पार तलक फैली है मेरा आकार  धरती से फ़लक तक से बढ़कर , शून्य से अनगिनत संख्या जैसे किसी विस्तार में है , किसी देश में किसी शासक में वो बात कहां है जो विशेषता मेरी सरकार में है । मुझे नाचना नहीं आता नचाना जानता हूं सभी को अपने इशारों पर सब नहीं जानते असली लुत्फ़ सत्ता देवी की पायल की मधुर झंकार में है । मेरा ही मोल सबसे महंगा दुनिया के हर बाज़ार में है जो कहीं नहीं है वो चमत्कार मेरे ही किरदार में है । मुझे जानते हैं सभी पहचानता कोई नहीं मुझ जैसा कोई हुआ कभी न ही कभी होगा पहला आखिरी भी शुरुआत भी अंत भी मैं खुद से खुद तक रहता हूं हर बात सच्ची है जो भी मैं कहता हूं । मेरे हाथ मेरी आंखें पहुंचती हैं देखती हैं पल पल जहां भी कुछ भी घटित होता है , सब मालूम है कोई हंसता है किसलिए कौन किस बात पर रोता है । मेरी शरण में जो भी आता है सब पाता है , मुझसे बिछुड़ने वाला अपनी हस्ती को खोता है । मेरा साथ पाकर सभी गुनाह माफ़ हो जाते है जितने भी अपराध किये पिछले सभी पाप धुल जाते हैं , खुशियों के कमल कीचड़ में भी खिल जाते हैं ।     
 
मेरी दुनिया के सभी दस्तूर निराले हैं बचना इस खंडहर जैसी हवेली में कदम कदम पर फैले जाले हैं , कोई भी खिड़की दरवाज़ा नहीं है लेकिन पांव में बेड़ियां हैं जंज़ीरों से बंधे हुए लोग हैं ,  सलाखों की कैद में जादुई लगे ताले हैं । मुझे ढूंढने वाले गुम हो जाते हैं जिनको चाहत है मेरे भीतर समाकर शून्य हो जाते हैं । कोई दादी नहीं कोई नहीं नानी है फिर भी ख़त्म कभी होती नहीं मेरी प्रेम कहानी है , राजा महाराजा शाहंशाह कुछ भी समझ सकते हैं मेरा परिवार बड़ा है कोई भी नहीं मेरी रानी महारानी है । जिस को समझ आई मेरी बात इक वही जानकर है नहीं समझ पाया कोई जो महाअज्ञानी है । मेरी लीला निराली है चेहरे पर लाली दिल में कालिख़ से बढ़कर छाई काली परछाई है मैंने आपका चैन लूटा है दुनिया की नींद चुराई है , चोर छिपकर रहते हैं मुझी में मैंने चोरों की नगरी इक अलग बसाई है । मैं भी फंस गया हूं अपने खुद के बुने जाल में सामने है कुंवां और पीछे गहरी खाई है । मैंने सबको ख़त्म करने की शपथ उठाई है नाम से मेरे हर चीज़ घबराई है हर जगह थरथराई है मैंने स्वर्ग को नर्क बनाया है वही खुश है जो शरण में मेरी आया है , सामने जिस ने सर अपना भूले से उठाया है उसका शीश कट गया मरकर भी पछताया है । आपने मुझे क्यों बनाया है कुछ समझ नहीं आपको आया है इक अजूबा सामने नज़र आता है कोई जूते साफ करता है कोई तलवे चाटता है कोई पांव दबाता है कोई जूता फैंकता है मगर कोई बच कर खैर मनाता है । मुझे जब भी कुछ बहुत भाया है मैंने उसको खाया चबाया है मैंने सभी को खुद से बौना साबित करने को दुनिया को ये मापदंड समझाया है , सबको लगता है बिग्ग बॉस शाम ढलते है कोई साया है ।  
 
 Bigg Boss 19 को लेकर सामने आया बड़ा Update, यूट्यूबर्स और इंफ्लूएंसर्स हुए  बैन? - Punjab Kesari

अक्टूबर 26, 2025

POST : 2034 भटकती रहेगी रूह उसकी ( व्यंग्य - कथा ) डॉ लोक सेतिया

    भटकती रहेगी रूह उसकी ( व्यंग्य - कथा ) डॉ लोक सेतिया  

मुझसे पूछती है उसकी आत्मा किसलिए उसकी मौत की खबर सभी को बताई मैंने । क्या बताऊं मैं भी हैरान हूं सोशल मीडिया पर हर दिन कितनी ऐसी खबरें पढ़ने को मिलती हैं , हर ऐसी खबर पर तमाम लोग लिखते हैं दुःखद है । उसकी आत्मा की शांति की प्रार्थना करते हैं संवेदनाएं जताते हैं , ईमानदारी की मौत की खबर पर किसी ने इक शब्द भी लिखना आवश्यक नहीं समझा । ईमानदारी की आत्मा भटका करेगी आखिर कब उसकी खातिर कोई प्रार्थना भी करेगा शांति के लिए । मुमकिन है आजकल लोग जानते ही नहीं हों की उनकी दुनिया में कभी ईमानदारी भी हुआ करती थी जिस को धन दौलत नाम शोहरत सभी से अधिक महत्व दिया जाता था । मालूम नहीं कब दुनिया का ईमानदारी से रिश्ता इस हद तक टूट गया कि किसी को किसी की भी ईमानदारी पर यकीन ही नहीं रहा । आधुनिक समाज में माना जाता है कि ईमानदार कोई होता ही नहीं जिस को बेईमानी चोरी हेरा फेरी का अवसर ही नहीं मिलता बस उसकी बदनसीबी है ईमानदारी से जीना । जैसे कहते हैं मज़बूरी का नाम महात्मा गांधी है उसी तरह से ईमानदार होना किसी की चाहत नहीं हो सकता । ईमानदारी का स्वभाव ही कुछ ऐसा हुआ करता था कि उसको किसी ने भी अपना समझा ही नहीं क्योंकि जब लोग ईमानदार हुआ करते थे तब दोस्ती दुश्मनी नहीं करते थे जो सही उसकी तरफ खड़े रहते थे । वास्तव में ईमानदारी ने कभी किसी का कुछ भी नहीं बिगाड़ा कभी लेकिन दुनिया को जो चाहिए उसको किसी भी पाना हासिल नहीं हो तो छीन लेना तक पसंद था उनकी राह में हमेशा किसी की ईमानदारी रुकावट बनकर खड़ी रहती थी । ईमानदारी सभी को अच्छी लगती थी लेकिन खुद को छोड़कर बाकी सभी में ईमानदारी देखना चाहते थे । ईमानदारी को अपने घर आंगन में तो दूर अपने अंतर्मन तक में कोई जगह नहीं देना चाहता था , ईमानदारी अकेली अकेलेपन का शिकार हो कर भी ज़िंदा रहती रही जब तक संभव हुआ । ईमानदारी ने कभी घबरा कर ख़ुदकुशी नहीं की जैसे कुछ लोग करते रहते हैं । 
 
दार्शनिक समझाते हैं बहुत बातें काफी कुछ बेहद कीमती हुआ करते थे जिनको कोई खरीद ही नहीं सकता था सभी कुछ चुकाकर भी मोल अदा नहीं होता था । सोना चांदी हीरे मोती तमाम रत्न जवाहरात का ढेर लगा कर भी मिलती नहीं थी ईमानदार की ईमानदारी । ईमानदार को क़त्ल करने पर भी ईमानदारी की मौत नहीं होती थी अमर बनकर सामने अडिग खड़ी रहती थी ईमानदारी । आप ने कभी उसको जाना नहीं ठीक से पहचाना नहीं किसी दिन झूठ फरेब जालसाज़ी की अपनी दुनिया से तंग आकर उसकी याद आएगी उसे इधर उधर तलाश करोगे उसकी तस्वीर बनाओगे सीने से लगाओगे , उसे नहीं पाकर बहुत पछताओगे । सरकार ने कहीं उसकी याद में इक स्मारक बनवाया है जाओगे उस पर फूल चढ़ाओगे कोई शमां जलाओगे आंसू बहाओगे । ईमानदारी आपकी बूढ़ी नानी दादी थी जिस ने आपके गोदी में खिलाया था , अच्छे सच्चे बनने का सबक उसीने सिखलाया था जो कभी किसी को समझ नहीं आया था । जिस ने आपका बचपन खुशहाल बनाया आपने बड़े होते उसको भुलाया कभी एहसान का बदला नहीं चुकाया । बाप मां दादा का क़र्ज़ याद है बहुत बकाया है जिस को याद रखना था जानकर भुलाया था , ईमानदारी हम सभी पर कितना बड़ा क़र्ज़ छोड़ गई है कभी चुकता नहीं कर पाएंगे जीवन भर मौज उड़ाएंगे , एहसान फरमोश कहलाएंगे ।  माना उसका हमसे नहीं खून वाला रिश्ता नाता था लेकिन बगैर उसके कभी किसी को जीने का ढंग नहीं आता था , हमने जीने का सलीका भुलाया है सब खोया कुछ भी नहीं हाथ आया है । 
 
शायद कोई बूढा जोगी मिल जाये किसी दिन सुनाये उसकी कहानी , ईमानदारी नाम की हुआ करती थी इस देश की बड़ी खूबसूरत इक रानी । उसको किसी की नज़र लग गई थी उसने जिस को भी जन्म दिया उसकी हर संतान असमय ही मर गई थी । किसी ज़ालिम शाहंशाह ने उसको कैद कर लिया था बंद तहखाने में उसकी सांसों की आवाज़ गूंजती रहती थी लेकिन कोई उसको रिहा नहीं करवा पाया था । देश का शासक बदलता रहा शासन का तौर तरीका बदलता रहा लेकिन किसी भी बेरहम शासक प्रशासक को उस पर रत्ती भर भी तरस नहीं आया था सभी ने उसका शोषण किया सितम पर सितम ढाया था । सभी को सपने में डराता था जो वो कुछ और नहीं ईमानदारी का कोई साया था । लोकतंत्र ने जिस को सत्ता पर बिठाया था उसी ने लोकतंत्र का लहू बहाया था , सत्ता ने हैवान सभी को बनाया था ।  ईमानदारी कौन थी कोई नहीं जानता हिंदू थी सिख थी मुसलमान थी ईसाई थी , उसने सभी धर्मों की रीत निभाई थी फिर भी अजनबी रहती शौदाई थी । किसी ने उसको चाहा न पाला पोसा न ही संभाला इक ऊपरवाला ही था उसका रखवाला जिस दिन उसकी अर्थी गई थी उठाई कोई भी आंख नहीं उसकी खातिर भर आई । उसकी आत्मा भटकती रहती है सबक पढ़ना ईमानदारी का सिर्फ इतना कहती है , लोग जाने क्यों इस बात से घबराते हैं रोज़ झूठी कसमें खाकर याद रखते हैं , ईमानदारी से बचकर रहना है बेईमानी हर शख़्स का कोई गहना है ।  
 
 मरने के बाद यहां भटकती है आत्मा, यमलोक पहुंचने में लगता है इतना समय
 

अक्टूबर 23, 2025

POST : 2033 भ्र्ष्टाचार पुराण की कथा ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

          भ्र्ष्टाचार पुराण की कथा ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

   { भ्र्ष्टाचार के अंत के बाद , 2014 की बात से आगे 2025 की बात । जारी }

 
मुझे जान लो मुझे समझ लो मुझे पहचान लो , मुझमें सभी हैं सब में मैं हूं , मेरी आराधना कर मनचाहा हमेशा वरदान लो । मुझे मिटाने की बातें करते हैं जो लोग खुद कितनी आरज़ूएं रखते हैं , हर आरज़ू पर दम निकलता है मेरी चौखट पर हर शख़्स फिसलता है । आपको क्या मालूम जिनको ऐसी संस्था में नियुक्ति दी जाती है उनका पहला कदम ही मेरी तरफ ही उठता है , किसी उच्च पद  से सेवानिवृत होकर पहले से बढ़कर वेतन सुविधाएं पाने का सुखद अनुभव समझाता है किस से किस का कितना गहरा नाता है । मेरा अंत खुद ऐसे लोगों को भविष्य को ही अंधकारमय बनाता है , भला कोई अपने हाथ से अपने पांव पर कुल्हाड़ी चलाता है । मुझे ख़त्म करने वाला विभाग मेरे नाम से सभी पाता है खाता खिलाता है मुझको अपना स्वामी समझ कर हर दिन मेरे गीत गाकर खुशियां मनाता है हम दोनों का अटूट नाता है ।  सरकार सभी विभाग पुलिस प्रशासन जानते हैं जिस दिन अपराध लूट बेईमानी झूठ अन्याय अत्याचार समाज में नहीं रहे उनकी कीमत दो टके की नहीं रहेगी । जब सभी को हर अधिकार न्याय खुद ब खुद मिलने लगेगा कौन उनके सामने आकर सर झुका हाथ जोड़ कर उनका रुतबा ऊंचा होने का एहसास करवाएगा । लोकतंत्र संविधान कायदा कानून जिस दिन वास्तविकता बन जाएगा सबसे अधिक मुश्किल शासक वर्ग की बढ़ाएगा , कौन अंधे को घर बुलाएगा जब पता होगा साथ इक देखने वाला आकर बोझ बढ़ाएगा । 
 
भगवान को सामने किसी ने देखा है कभी भी नहीं लेकिन विश्वास सभी करते हैं कोई है ज़रूर , कुछ ऐसा ही मेरे लिए है मैं हर जगह रहता हूं सभी जानते समझते हैं । रिश्वत दलाली कमीशन घूस देने लेने वाले जानते हैं लेकिन सामने नहीं आने देते मैं सौ पर्दों में छिपकर रहता हूं मैं आपका आप सभी मेरे हैं ये सिर्फ मैं ही कहता हूं । आजकल की दुनिया में कोई इतना रिश्ता निभाता है बस मेरी शरण जो भी आता है उसका कल्याण हो जाता है । मुझको बुरा कहने वाले भी मुझे दिल से चाहते हैं  कुछ लोग महफ़िल जमाते हैं जाम से जाम टकराते हैं कुछ मयखाने में छुपते छुपाते आते हैं होश वाले क्या जाने कैसे बिना पिये कदम डगमगाते हैं । जिनको शान ओ शौकत आन बान चाहिए वो मुझको क्या समझेंगे मेरा अस्तित्व कैसे मिटाएंगे मुझे बिछड़ कर खुद अपनी हसरतों का जनाज़ा कैसे उठाएंगे । सागर हाथ में लिए क्या प्यासे ही मर जाएंगे ,  सुबह शाम झूठी कसम खाकर मौज मनाएंगे ।  रिश्वत की कहानी कितनी पुरानी है , अनंत काल से रिश्वत शासन और साधरण जनता के बीच का पुल है जो सत्ता की नदी पर बनाया गया है , आपसी सहमति से इस हाथ ले उस हाथ दे का संबंध निभाया गया है । रिश्वत खाकर भी काम नहीं करना बुरी बात है सभी मंत्रालयों को यही सबक पढ़ाया समझाया गया है । जब भी सरकार पर कोई आंच आई है कोई जांच आयोग बनाया गया है हमेशा ये नुस्ख़ा आज़माया गया है दुनिया को निर्दोष होने का प्रमाणपत्र दिखाकर उल्लू बनाया गया है । कविता में यही विस्तार से समझाया गया है । लोकपाल भी इसी तरह कुछ लोगों को रोज़गार देने का शानदार ढंग बनाया है किसी को कुछ समझ नहीं आया है भ्र्ष्टाचार चरम पर खड़ा है उसका परचम ऊंचा लहराया है । भगवान के अलग अलग अवतार जैसे ही मेरे स्वरूप बदलते रहते हैं , पैसा नहीं कुछ भी उपहार से लेकर नकद उधार तक आपसी भरोसे से आदान प्रदान किया जाता है जिस से पूछो गाता मेरी गाथा है , सामने मेरे झुकता हर सर हर माथा है । 
 
 

जांच आयोग ( हास्य व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

काम नहीं था
दाम नहीं था
वक़्त बुरा था आया
ऐसे में देर रात
मंत्री जी का संदेशा आया
घर पर था बुलाया ।

नेता जी ने अपने हाथ से उनको
मधुर मिष्ठान खिलाया
बधाई हो अध्यक्ष
जांच आयोग का तुम्हें बनाया ।

खाने पीने कोठी कार
की छोड़ो चिंता
समझो विदेश भ्रमण का
अब है अवसर आया ।

घोटालों का शोर मचा
विपक्ष ने बड़ा सताया
नैया पार लगानी तुमने
सब ने हमें डुबाया ।

जैसे कहें आंख मूंद
सब तुम करते जाना
रपट बना रखी हमने
बिलकुल न घबराना ।

बस दो बार
जांच का कार्यकाल बढ़ाया
दो साल में रपट देने का
जब वक़्त था आया ।

आयोग ने मंत्री जी को
पाक साफ़ बताया
उसने व्यवस्था को
घोटाले का दोषी पाया ।

लाल कलम से
फाइलें कर कर काली
खोदा पर्वत सारा
और चुहिया मरी निकाली ।    
 
    लोकपाल की संरचना | VIA मध्यस्थता केंद्र