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मई 12, 2021

POST : 1500 रही हसरत अभी बाकी ( उल्टा-पुल्टा ) डॉ लोक सेतिया

      रही हसरत अभी बाकी ( उल्टा-पुल्टा ) डॉ लोक सेतिया 

   इतना बड़ा महल जैसा घर फिर भी लगता नहीं है दिल मेरा सोचते रहते हैं। रातों को नींद खुल जाती है अकेले बिस्तर पर करवटें बदलते हैं। न जाने क्यों इस हवेली में उनको पिछले शासकों के साये नज़र आते हैं डराते हुए क्या क्या सवालात करते दिखाई देते हैं। दर्पण के सामने खड़े अपने आप को निहारते हैं और खुद ही अपने से कहते हैं मुझ सा कोई हुआ न कभी होगा। हवाओं की सरसराहट सुनाई देती है तो लगता है कोई दबे पांव आकर किसी खिड़की के पीछे छिपकर झांकता है। ज़िंदगी को समझते समझते मौत का मंज़र दिखाई देता है जब से इतने बड़े महलनुमा घर में आकर रहने लगे हैं घर से भागने को दुनिया भर आवारा की तरह घूमते रहे हैं। अचानक हाथ आई दौलत खज़ाना मिल गया बिना कोई महनत किये उसको संभालना नहीं सीखा बर्बाद करने का भी कोई ख़ास मज़ा आया नहीं। कहने को चाहने वाले तमाम हैं मगर जानते हैं सब सत्ता के संगी साथी हैं सुःख के साथी हैं दुःख दर्द बांटने वाला हमराही हमसफ़र कोई भी नहीं है। जाने ये इक किताब यहां कौन छोड़ गया है दुष्यन्त कुमार की " साये में धूप " उठाकर पढ़ते हैं तो सच्चाई सामने दिखाई देती है। मेज़ की दराज से मिली पुरानी इक डायरी लेकर देखते हैं जिस पर कुछ शेर लिखे हुए हैं सोचते हैं कभी फुर्सत में समझने की कोशिश करेंगे। आधी रात को ये काम करना अच्छा लगता भी है और बेचैनी को बढ़ाता भी है। लिखा हुआ है जो बार बार पढ़ते हैं मिटाने को मन करता है मगर कोशिश करते हैं तो शब्द और उभरने लगते हैं जैसे लगान फिल्म के बच्चे को भयभीत करते थे। पढ़ते हैं अभी अभी लिखा क्या है किसी ने बात अटल है सत्य है शाश्वत है । इसी घर में कोई कविहृदय शासक रहता था उसकी निशानी मिटाना मुमकिन नहीं है उन जैसा बनना संभव नहीं पर उनकी विरासत को सहेजना ज़रूरी है।
 
    ये ज़ुबाँ हमसे सी नहीं जाती , ज़िंदगी है कि जी नहीं जाती। देखिए उस तरफ उजाला है , जिस तरफ रौशनी नहीं जाती। मुझको ईसा बना दिया तुमने , अब शिकायत भी की नहीं जाती। पन्ना पलटते हैं आगे लिखा हुआ पढ़ते हैं। वो निगाहें सलीब हैं , हम बहुत बदनसीब हैं। हम कहीं के नहीं रहे , घाट औ घर करीब हैं। हालाते जिस्म सूरते जां और भी खराब , चारों तरफ ख़राब यहां और भी ख़राब। नज़रों में आ रहे हैं नज़ारे बहुत बुरे , होंठों में आ रही है ज़ुबां और भी खराब। मूरत संवारने से बिगड़ती चली गई , पहले से हो गया जहाँ और भी ख़राब। सोचा था उनके देश में महंगी है ज़िंदगी , पर ज़िंदगी का भाव वहां और भी ख़राब। अगले पन्ने को पढ़ते ही खुद अपने आप को किसी कटघरे में खड़ा पाते हैं बस दो शेर पढ़ते ही किताब डायरी को वापस तिजौरी में सुरक्षित रख देते हैं ये शेर असली शेर से ख़तरनाक लगते हैं पढ़ते हैं। तुम्हारे पांव के नीचे कोई ज़मीन नहीं , कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यकीन नहीं। तेरी ज़ुबान है झूठी जम्हूरियत की तरह , तू इक ज़लील सी गाली से बेहतरीन नहीं। 
 
  दिल में हसरत अभी बाकी है लेकिन किसी को खुद कह भी नहीं सकते मुझे भगवान की तरह पूजने को मेरा भी इक मंदिर नगर नगर गली गली गांव गांव होना चाहिए। लोग भरोसा करें मुझसे जो फरियाद करेंगे सच्चे भक्त बनकर उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण अवश्य होंगी। ऊपर वाले ने दुनिया बनाई थी तो किसी को घर सामान कुछ भी नहीं दिया था नीचे धरती ऊपर गगन रहने को सारा जहां। मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे खुद ऊपर से आशीर्वाद देते दिखाई देते हैं। इतना ही करना होता है खुदा ईश्वर बनकर कठिनाई क्या है मेरे दर से जाओगे तो जाओगे कहां। भगवान ने किसी को सब कुछ नहीं दिया जिनको जितना मिला उनको थोड़ा लगता है फिर भी भगवान खुदा ईश्वर अल्लाह होने पर कोई शंका नहीं कर सकता मुझसे भी लोग हाथ जोड़कर मांगते रहते नहीं मिलता तो भी कोई बस नहीं तकदीर को दोष देने से हासिल क्या होता।
 
     दावा किया करते थे अठारह घंटे काम दिन रात की दौड़ धूप दुनिया की सैर मौज मस्ती खेल तमाशे दोस्ती दुश्मनी का उनका तरीका अलग है। अब आना जाना सब बंद तो कुछ नहीं करने वाले बहुत कुछ करते हैं दिमाग़ी खलल कहते हैं , ख़ाली दिमाग़ को कब क्या सूझे कोई नहीं जानता इसलिए उन्होंने तय कर लिया जो भी घर महल हवेलियां पहले पिछले शासकों ने तामीर करवाईं उनको हटाकर सब नया आधुनिक बनवाना है जिस पर सिर्फ इक नाम खुदवाना है अपना नाम अपनी तस्वीर सबसे ऊंची सबसे शानदार जैसे उनके खूबसूरत लिबास हैं। लोग बाहरी  चमक दमक देखते हैं चकाचौंध रौशनी से चुंधिया जाती हैं आंखें।
 
लोग क्या सोचते हैं ये शंहशाह नहीं सोचते हैं बादशाह आवाम की नहीं अपनी शोहरत की फ़िक्र करते हैं गरीबों के लहू से उनकी मुर्दा लाशों पर बुनियाद के पत्थर रखकर ताजमहल से चीन की दीवार तक बनाई जाती है महबूबा की लाश ताजमहल में दफनाई जाती है उसको ज़िंदगी भर क्या मिला बात छुपाई जाती है। फिर इक शहंशाह ने देश के गरीबों की गरीबी का मज़ाक उड़ाया है। कोरोना से बचने का तरीका समझ आया है सबसे अलग सुरक्षित शासन चलाने वालों का संसार बसाने का संकल्प उठाया है कोई ज़ोर ज़ोर से हंसता हुआ नज़र आया है आदमी जिसकी आवाज़ से घबराया है। दो गज़ ज़मीन ने जाने कितनों को भगाया है ये कोई साया है किसी के हाथ कभी नहीं आया है।
 
 
 SC refuses to stay Central Vista project, says no urgency as COVID-19  pandemic is on

मई 11, 2021

POST : 1499 तेरी आवारगी ने मुझको आवारा बना डाला ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

तेरी आवारगी ने मुझको आवारा बना डाला ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

चमकते चांद को टूटा हुआ तारा बना डाला , तेरी आवारगी ने मुझको आवारा बना डाला। ग़ुलाम अली की आवारगी ग़ज़ल आपने सुनी होगी इस दश्त में इक शहर था वो क्या हुआ आवारगी। ये दिल ये पागल दिल मेरा क्यों बुझ गया आवारगी। मगर आवारगी शीर्षक से इक और ग़ज़ल है जो सुनकर मौजूदा हालात की सच्ची बात लगती है। परस्तिश की आदत बड़ी खराब होती है किसी भी बुत को खुदा समझने लगते हैं आशिक़ जिस पर फ़िदा होते हैं उसके हुस्न की दीवानगी में उसी पर मरते ही नहीं क़ातिल को दुआ भी देते हैं। जाँनिसार अख़्तर जी की ग़ज़ल पढ़ते हैं पहले फिर बात को आगे बढ़ाते हैं। 
 

जब लगे ज़ख़्म तो क़ातिल को दुआ दी जाए 

है यही रस्म तो ये रस्म उठा दी जाए। 

दिल का वो हाल हुआ है ग़में दौरां के तले 

जैसे इक लाश चटानों में दबा दी जाए। 

हमने इंसानों के दुःख-दर्द का हल ढूंढ लिया 

क्या बुरा है जो ये अफ़वाह उड़ा दी जाए। 

हम को गुज़री हुई सदियां तो न पहचानेंगी 

आने वाले किसी लम्हे को सदा दी जाए। 

हम से पूछो कि ग़ज़ल क्या है ग़ज़ल का फ़न क्या 

चंद लफ़्ज़ों  में कोई आग छुपा दी जाए। 

कम नहीं नशे में जाड़ों की गुलाबी रातें 

और अगर तेरी जवानी भी मिला दी जाए। 

 

आवारगी कहते हैं कहीं टिक कर नहीं रहने की आदत को वक़्त भी कहीं ठहरता नहीं है बदलता रहता है। नानी की कहानी की तरह किसी भटकने वाले को हमने महल तख्तो-ताज देकर भिखारी से शहंशाह बना डाला और उसने खूब जमकर अपनी हसरतों को पूरा करने में खज़ाना लुटा डाला। लोग उसकी दिलकश अदाओं पर ऐसे लट्टू हुए कि उसके सितम भी करम इनायात लगने लगे। बस यही देखा तो जाँनिसार जी की ग़ज़ल याद आई। हम खुद देखते सुनते हुए नादान बने रहते हैं मगर कोई विदेशी हमको समझाता है तब पता चलता है हम क्या हैं। हमारे टीवी अख़बार हमें वास्तविकता से परिचित करवाने के बदले उलझाने का काम करते हैं ऐसे में विश्व प्रसिद्ध जॉर्नल लांसेट लिखता है भारत में दस लाख लोग मर सकते हैं कुछ महीनों में जिसका दोष मौजूदा मोदी सरकार ही है। किसी शायर ने कहा था " वो अगर ज़हर देता तो सबकी नज़र में आ जाता , तो यूं किया कि मुझे वक़्त पर दवाएं नहीं दीं "। मोदी सरकार ने ही नहीं देश में सभी राज्यों की सरकारों ने भी यही किया है कोरोना ही नहीं तमाम अन्य समस्याओं पर जो कदम उठाने ज़रूरी थे नहीं उठाकर शोर मचाने दलगत राजनीती करने और सत्ता को अपनी बपौती बनाने में लगे रहे। नेता जीतते रहे जनता हारती रही मरती रही और कोई मुजरिम नहीं ठहराया गया कभी भी। 

लोग सिर्फ कोरोना से बिना ईलाज नहीं मरे हैं लोग सरकार की बिना सोची विचारी गलत नीतियों को लागू करने से भी बेमौत मरते रहे हैं। चुनाव और सत्ता का घिनौना खेल इंसान को इस कदर वहशी बना देता है कि शासक गरीबी भूख बदहाली को मिटाने नहीं ढकने लगता है। दुनिया को देशवासियों को झूठी तस्वीर दिखाई देती है जबकि सत्ताधारी अपने ऐशो-आराम सुख सुविधा नहीं रईसाना शौक पर खज़ाना लुटाते हैं। संवैधानिक संस्थाओं सर्वोच्च न्यायलय आरबीआई सीबीआई सभी कठपुतली बनकर रह गए हैं सीएजी तक गूंगी अंधी बहरी बन गई है। शोर किसी और बात का सुनाई देता है जबकि ख़ामोशी में चीखें दबी पड़ी हैं। हम लोग अभी भी न्याय समानता के अधिकार की बात छोड़कर बहकावे में आकर उनकी जयजयकार करते हैं जो देश की बुनियादी समस्याओं को हल करना  नहीं चाहते और धर्म जाति मंदिर मस्जिद में उलझाकर जनता को पागलपन की तरफ धकेलते रहते हैं। और हमने इसको अपनी नियति मान लिया है जो शासकों की नाकामी और लापरवाही  बल्कि जानकर कुछ नहीं करने की आपराधिक कार्यशैली से होता है हो रहा है। 
 
इधर लोग ऐसी ऐसी कहानियों पर फिल्म बनाते हैं जो अच्छे अच्छे पढ़े लिखे लोगों की अकल पर खुदगर्ज़ी का पर्दा पड़ जाने से झूठ को सच समझने लगते हैं। गुडलक ऐसी फिल्म है कोई किसी को तीन महीने गुडलक की ऑफर बेचता है मुफ्त में और शर्त ये कि अगर काम आया तो आपको हमेशा को गुडलुक पास रखने को अनुबंध करना होगा कीमत चुकानी होगी। तीन महीने बाद कीमत बताई जाती है आपको किसी का क़त्ल करना होगा अन्यथा आपका मिला गुडलुक चला जाएगा। बस किसी ने गुडलुक को बेचा अच्छे दिन नाम देकर किसी ने योग आयुर्वेद का लेबल लगाकर किसी ने करोड़पति बनने का सपना कहकर। और उसके बाद लोग उनकी बेची चीज़ खरीद बदले में मौत के कुंवे का तमाशा देख तालियां बजा रहे हैं। पहले ज्योतिष वाले झांसा देकर किस्मत बदलने को केवल पैसा लूटते थे अन्धविश्वास बढ़कर अपना सिक्का चलाते मालामाल होते थे। अब तीन लोग नहीं उनकी टोली वाले यही मौत से ज़िंदगी खरीदने का कारोबार अपनी अपनी तरह कर कमाल नहीं धमाल कर रहे हैं। 

भारत देश खुद को खुद ही महान बतलाता है यहां लोग पैसा कमाने की खातिर अधिक की चाह में देश को छोड़ विदेश जाकर बसते हैं मगर वहां से देश को प्यार करने की बात सोशल मीडिया पर करते हैं। मुसीबत में देश के काम नहीं आते मगर जब विदेश में खुद मुसीबत में पड़ते हैं तब देश वापस आने की गुहार लगाते हैं। देशभक्त अपने देश में थोड़े से गुज़ारा चलाते हैं अपना देश आखिर अपना है बज़ुर्ग समझाते हैं। जाने किस ने समझाया है कि  जब देशवासी आपदाग्रस्त हैं जनाब सरकार अपने लिए बीस हज़ार करोड़ खर्च कर नया आवास बनवा कर कीर्तिमान स्थापित कर सकता है अपनी आकांक्षा पूरी करने को।




मई 10, 2021

POST : 1498 क्यों उदास रहते हैं हम ( दास्तान -ए-ज़िंदगी ) डॉ लोक सेतिया

   क्यों उदास रहते हैं हम ( दास्तान -ए-ज़िंदगी ) डॉ लोक सेतिया 

आपको अजीब लगेगा शायद नापसंद भी हो मुझे उदास रहना बुरा नहीं लगता दर्द भर गीत गुनगुनाना मेरी आदत है । कॉलेज में हॉस्टल में उल्टे सीधे नाम देते थे और सूचना पटल पर सबके नाम की सूचि लगा दी जाती थी । बताना नहीं चाहता मुझे जो नाम मिला था मगर मतलब यही था ये सुबह होते ही शाम ए ग़म की ग़ज़ल गाता है । अठारह साल की उम्र में ये होता नहीं मगर हम दो दोस्त कुछ ऐसे थे दूजा अब दुनिया में नहीं है मगर उसका भी पसंद का गीत था ऐ मेरे दिल ए नादां तू ग़म से न घबराना । कुछ साल पहले इक दोस्त फेसबुक पर मिला पूछा याद आया कौन हूं तो उसने मैसेज में वही गीत लिख भेज दिया जिसको लेकर वो मुझे चिढ़ाता था कि ये सुबह हुई और गाता है हुई शाम उनका ख़्याल आ गया । जो कॉलेज में सुनकर खराब लगती थी कितने साल बाद पढ़कर ख़ुशी हुई थी । बात फिर आज भी वही है मुझे उदासी वाले गीत फ़िल्में कहानियां क्यों अच्छी लगती हैं और किसलिए मैं ये लिखता हूं इक लेखक दोस्त शिकायत करते थे निराशा की दुःख दर्द की परेशानी की ही रचनाएं क्यों लिखता हूं । अधिकांश लोग हैरान होते हैं कि इसको सब मिला है मौज से रहता है कभी बदहाल नहीं दिखाई दिया फिर ये ऐसा लिखता क्योंकर है । 
 
लोग दर्द से घबराते हैं मुझे दर्द अच्छे लगते हैं खुशियां कभी कभी पास आती हैं छोड़ जाती हैं ग़म कभी साथ नहीं छोड़ते दिल में बसते हैं । समस्या ये है हम लोग चाहते हैं सब हमेशा इक जैसा रहना चाहिए मगर जीवन सभी रंगों से मिलकर बनता है । गीत ग़ज़ल लिखने वालों ने ख़ुशी के गाने लिखे और ग़म वाले भी मिलन के गीत लिखे जुदाई के भी । क्योंकि ये सब दुनिया का सच है दिन बदलता है सुबह दोपहर शाम ढलती है रात होती है । हर रात को सुबह का इंतज़ार रहता है गुलाब है गुलाब में छिपे कांटें भी हैं । नाज़ुक फूल और पत्थर के साथ शीशा भी अपनी अपनी सभी की पहचान है जो जैसा है उसको उसी तरह स्वीकार करना ज़रूरी है मगर हम चाहते हैं सब जैसा हम पसंद करते हैं वैसा होना चाहिए । सभी इंसान इक जैसे नहीं हो सकते तब किसी की कोई पहचान नहीं बचेगी । मौसम बदलते हैं ये कुदरत का करिश्मा नहीं उपहार है पतझड़ के बाद बहार आना और खूबसूरत लगता है जब आप ख़ुशी के अवसर पर खुशियों के गीत गाते हैं तब सिर्फ ख़ुशी बढ़ती ही नहीं जो ख़ुशी से महरूम हैं उनको भी ख़ुशी का एहसास होता है । दुःख की घड़ी में आशा के गीत नहीं गाये जाते दर्द वाले गीत दर्द को सहने समझने की ताकत देते हैं । निराशा के समय आशावादी गीत सुनकर उम्मीद जागती है तो दुःख की घड़ी में दर्द की बात बेचैनी से आराम देती है । 
 
सभी लोग काले नहीं हो सकते न ही गोरा होना ज़रूरी है जो जैसा है वैसा अच्छा है मानना होगा । पेड़ पौधे पशु पंछी जंगली जानवर कुदरत की बनाई सभी चीज़ों का अपना अपना मकसद है ज़रूरी है संतुलन बनाये रखने को । सब फल फूल इक जैसे सभी खाद्य पदार्थ इक स्वाद के होते हो क्या मज़ा आता मीठा नमकीन कड़वा भी शीतल गर्म सभी अपनी जगह हैं । जिनको दर्द की बात सुनकर घबराहट होती है ज़िंदगी भर डर के साये में जीते हैं मुश्किलें आने पर घबरा जाते हैं उनसे लड़ना नहीं चाहते । गीतकार कथाकार सभी की बात कहते हैं सबका सुख दुःख समझते हैं तभी हर अच्छी खराब हालत पर लिखते हैं । पढ़कर सुनकर सभी को लगता है कि जो मैंने दर्द झेला है सिर्फ मुझे नहीं दुनिया में बहुत को मिला है इक तसल्ली मिलती है ये सब भी बदलेगा निराशा की बात कहानी ग़ज़ल में भी उम्मीद छुपी रहती है । क्या सभी तालाब इक जैसे होते सभी नदियां इक जैसी सभी झरने समंदर सबका पानी ठहरा हुआ या बहता हुआ इक जैसा होता तो क्या लगता । ज़िंदगी भी सुख दुःख दर्द राहत परेशानी और उम्मीद से मिलकर बनती है बदलाव नियम है संसार की हर वस्तु की तरह ज़िंदगी पल पल बदलती रहती है । ज़िंदगी को जी भर जियो जब जैसी है अपनाकर । किसी को भी दोष नहीं देता बस कभी कभी सोचता हूं जिनको लगता है मैं उदास निराश और सभी दोस्तों में रहते हुए भी अकेला हूं तभी तनहा उपनाम रखा है , कभी नहीं समझा कि ऐसा क्यों है । मेरी तन्हाई उदासी को दूर करने का ख़्याल कभी किसी को नहीं आया , ये आदत चाहत नहीं विवशता है जो मिला है जीवन से उसे अपनाना होता है चाहे कुछ भी एहसास होता है । अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जाएंगे , मर कर भी चैन न पाया तो किधर जाएंगे । ज़िंदगी ज़िंदादिली है मगर मौत से दुःख दर्द से भागना बुझदिली है । दो रंग जीवन के और दो रास्ते  ये लाजवाब गीत समझाता है । बस ये चुप सी लगी है नहीं उदास नहीं । 
 
 
 Tera Mela Piche Chhuta Rahi Chal Akela : Mukesh | Sad Hindi Song | Mukesh  Dard Bhara Geet | 70s Hits
 






 

मई 09, 2021

POST : 1497 मैंने जान लिया है राज़ क्या है ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

   मैंने जान लिया है राज़ क्या है ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

  जो लोग फेसबुक पर नहीं हैं उनके अपने उनको भूल जाते हैं अन्यथा उनका भी जन्म दिन वर्षगांठ विवाह की उत्सव जैसा दिखाई देता ये समझ आया तो ढूंढ ढूंढ दोस्त बनाने लगे जिनको हमारी याद नहीं आती मुद्दत हुई । बाकी कुछ नहीं रहेगा बस इक इसी का नाम हमेशा रहेगा । भगवान की नहीं बात फेसबुक की है । दस साल से भटकता रहा नहीं जान पाया ये क्या सिलसिला है कैसा माजरा है । कब कहां क्या हुआ इक इसी को पता है जो नहीं जानता ये उसी की खता है । दोस्त रिश्ते नाते सभी निभ रहे हैं जहां पर हम रह गए थे ज़मीं पर सब जा पहुंचे आस्मां पर । फेसबुक बगैर हम अजनबी हो गए थे आदमी सब थे जितने खुद नबी       ( पैगंबर ) हो गए हैं  ।  होश आया तो जाना बस यही है इक यही है इसके बिना दोस्ती कुछ नहीं है ज़िंदगी कुछ नहीं सब होकर भी आदमी कुछ नहीं है । सबका घर है यहां पर हर खबर है यहां पर लोग मिलते यहीं हैं और जाएं भी कहां पर । कीमत समझ आती है हर चीज़ की मगर वक़्त आने पर लोग मिलते थे कभी मंदिर में मिलते हैं अब शराबखाने पर । चौपाल लगती नहीं पीपल तले गांव में बात पहुंचती है पुलिस थाने तक हमको मालूम है तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक । लोग चले गए दुनिया से रुखसत होकर खबर पहुंची नहीं शाम की सहर से शाम शाम से सहर होने तक । हाल पूछते हैं ठीक होने के बाद हंसते हैं मिलकर रोने के बाद । दुनिया बड़ी है पर सिमट कर स्मार्ट फोन में रह गई है ग़ज़ल कविता कहानी कहीं नहीं मिलती चुटकले की लंबी आयु हो व्हाट्सएप्प वाली देवी कह गई है । 
 
  सोशल मीडिया से कोई खुदा बन गया है झूठ सच बन गया फ़लसफ़ा बन गया है । ढूंढते रहे हम पहचान अपनी मिली नहीं और कोई इसी को बनाकर सहारा खुदा बन गया है । तो इस तलाश का अंजाम भी वही निकला , मैं देवता जिसे समझा था आदमी निकला । शायर का नाम भी याद नहीं आता फेसबुक पर जो नहीं उसको तलाश करना आसान नहीं है । इक़बाल साजिद फरमाते हैं , रुखे रौशन का रौशन एक पहलू भी नहीं निकला ,  जिसे मैं चांद समझा था वो जुगनू भी नहीं निकला । इस सपनों की दुनिया का सच यही है जुगनू भी नहीं चांद बन बैठे हैं सूरज के सिंघासन पर घने अंधेरों का डेरा है क्या तेरा है क्या मेरा है ये जोगी वाला फेरा है । कुछ तो निशानी छोड़ जा अपनी कहानी छोड़ जा गीत सुनते थे मगर कैसे हर कोई ताजमहल बनवा नहीं सकता लेकिन कमाल किया है फेसबुक बनाने वाले ने 4 फ़रवरी 2004 को मार्क ज़ुकेरबर्ग ने सभी को अवसर देकर अपना नाम रौशन करने का साधन उपलब्ध करवाकर । लोगों को मौत से बढ़कर चिंता रहती है बाद में उनको लोग याद करेंगे कि भूल जाएंगे । फेसबुक आपकी रहेगी हमेशा अगर आप चाहेंगे ।
 
सोशल मीडिया पर एक्टिव होना आपके होने का असली सबूत है ख़ास बात ये भी है कि आपकी मर्ज़ी है चाहो तो दुनिया से जाने के बाद भी फेसबुक पर आप ज़िंदा रह सकते हैं । इस नकली दुनिया ने सभी को भटकाया भी है बहलाया भी और जो किसी किताब ने नहीं पढ़ाया वो समझाया भी । ग़ालिब ने कहा था मस्जिद के जेरे साया घर बना लिया है , ये बंदा ए कमीना हमसाया ए खुदा है । फेसबुक पर आप बड़े नाम वाले नायक खिलाड़ी नेता धर्मगुरु से दुनिया की तमाम जानी मानी हस्तियों के दोस्त बन सकते हैं । धरती पर इतने मंदिर मस्जिद नहीं हैं जितने देवता ईश्वर खुदा मसीहा पीर पय्यमबर इस जगह साक्षात हैं कमेंट में लिखते ही मनोकामना पूर्ण होने का भरोसा दिलाते हैं लोग आपको जिनसे खुद कभी नहीं मिलते मिलवाते हैं । इक यही दुनिया हैं जहां इक साथ जश्न भी मातम भी मनाते हैं बधाई भी मिलती है अफ़सोस भी जताते हैं किसी के घर जाते नहीं न किसी को घर बुलाते हैं फिर भी रिश्ते हर किसी से निभाते नज़र आते हैं । गुलदस्ता मिलता है ख़ास दिन और श्रद्धासुमन भी चढ़ाते हैं लोग इस दुनिया को वास्तविक समझते हैं ख्वाब बुनते हैं दिल को बहलाते हैं लाइक कमेंट की दुनिया का लुत्फ़ उठाकर जिन खोजा तिन पाईया राज़ समझाते हैं । हमने देखा है समझा है जाना है अब कोई शिकायत नहीं है कोई नहीं बहाना है जिनसे पहचान हैं उनको अपना दोस्त बनाना है फेसबुक वाला याराना ही याराना है । दिल में नहीं सबको दोस्त कितने हैं लिस्ट में नंबर बनाना है । मासूम सी मुहब्बत का बस इतना सा फ़साना है , कागज़ की हवेली है बारिश का ज़माना है । अब कुछ पीछे वापस मुड़कर देखते हैं कितना कुछ बदला है इस सोशल मीडिया के चलन से । 
 
यूं ही कोई मिल गया था सरे राह चलते चलते की तरह इक कहानी मिली लेखक से गुनगुनाती हुई ना उम्र की सीमा हो ना जन्म का हो बंधन जब प्यार करे कोई तो देखे केवल मन । शादी विवाह समाज घर सभी को भूलकर दो आशिक़ अपनी दुनिया में खो गए । अचानक साल भर बाद प्यार से पेट नहीं भरता समझ आया तो चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों । माशूका घर वापस चली गई सुबह की भूली भटकी शाम को लौट आई सबको बताया नौकरी करने गई थी अब शादी करने घर चली आई है । उधर आशिक़ भी अपनी पत्नी को छोड़ महबूबा संग रंगरलियां मना लौट आये थे सब ठीक हो गया चार दिन की चांदनी के बाद । फेसबुक पर स्टेटस मौसम से जल्दी बदल जाता है रिलेशनशिप से विवाहित होने का ऐलान हो गया । लेखक को पहली दास्तां को छोड़कर नई कहानी लिखने को कहा और पुरानी लिखी मिटाने को अनुरोध किया गया । शायद विधि का विधान है कि जल्दी ही पति का निधन हो गया और स्टेटस सिंगल का सामने दिखाई दिया । 
 
चार महीने पहले पति की मौत की खबर की पोस्ट पर संवेदना देने वाले आज फेसबुक पर शादी की वर्षगांठ की मेमरी देख बिना सोचे भूलकर पति की मौत की खबर शुभकामनाएं देने लगे हैं । इधर  अपने पति से जान से बढ़कर प्यार करने वाली पत्नी जो उसको जाने कितने अच्छे संबोधन देकर बुलाती थी चार महीने बाद मौज मस्ती की झूमती गाती नाचती तस्वीरें फेसबुक पर पोस्ट करती है तो समझना कठिन है कहानी सच्ची थी या काल्पनिक थी । कुछ दिन पहले मुझे फेसबुक से नोटिफ़िकेशन मिला कोई लेखक जो मित्र थे उनका निधन हो गया कब का , आज उनका जन्म दिन है । कुछ अजीब लगा कितने लोगों ने उनकी टाइमलाइन पर बधाइयां शुभकामनाएं देने की पोस्ट शेयर की हुई थीं । समझ नहीं आया ऐसी पहचान को क्या समझें जिस में जन्म दिन याद है मरने की जानकारी नहीं होती है ।  
 

  

मई 08, 2021

POST : 1496 चेहरा नहीं मुखौटा है पहचान ( अनजान लोग ) डॉ लोक सेतिया

   चेहरा नहीं मुखौटा है पहचान ( अनजान लोग ) डॉ लोक सेतिया 

सोशल मीडिया पर पोस्ट लिखते हैं व्हाट्सएप्प पर संदेश भेजते हैं लगता है आदमी नहीं देवता हैं। सबकी भलाई की कामना सभी के लिए प्यार भरा दिल और झूठ छल कपट से दूर इंसान और इंसानियत को महत्व देने वाले हैं। धन दौलत शोहरत अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज देश और भलाई की राह चलने की भावना उनके लिए महत्वपूर्ण है। धर्म की बात तो यहां हर कोई इस सीमा तक करता दिखाई देता है जैसे संसार में रहकर मोह माया लोभ अहंकार को त्याग संत महात्मा बन कर दुनिया के कल्याण को जीवन समर्पित किया हुआ है। लेकिन सभी की अनुचित बातों पर चिंता और विरोध जतलाने वाले खुद अपने वास्तविक जीवन में कारोबार नौकरी और दोस्ती रिश्तेदारी में पहले दर्जे के खुदगर्ज़ और मतलबी बन जाते हैं। इतना ही काफी नहीं बल्कि अपने अनुचित और आपत्तिजनक आचरण को उचित ठहराने को बेझिझक कहते हैं सभी ऐसे हैं हम उनसे अलग नहीं हैं यहां जीने रहने को सब करना पड़ता है ज़रूरी है। अर्थात अपने गलत कार्य को जानते हुए भी कि गलत कर रहे हैं सही ठहराने का काम करते हैं। शायद उनको खुद अपनी पहचान तक नहीं है वर्ना कोई अपने आप से नज़र मिलाकर ऐसा कैसे कर सकता है। 
 
गीता कुरआन बाईबल गुरुबाणी पढ़ने सुनने से मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे जाने से उपदेश सतसंग सुनकर कोई उदघोष लगाने से कोई फायदा नहीं अगर उनसे हम में कोई अंतर नहीं आता है अच्छाई बुराई को समझने को। शायद दुनिया को धार्मिक होने का दिखावा कर सकते हैं लेकिन अपने आप को कैसे झांसा दे सकते हैं ज़मीर से बचकर भाग नहीं सकते हैं। शायद इस से बढ़कर कोई हमारे विवेक को जगा नहीं सकता था कि इतनी बड़ी आपदा विश्व भर के सामने खड़ी है जब सभी को आपस में सुख दुःख बांटने और अपने स्वार्थों को दरकिनार कर विश्व कल्याण की सोच को अपनाना ज़रूरी लगता। मगर विडंबना की बात है कि ऐसे समय में भी तमाम लोग इंसानियत को भुलाकर खुदगर्ज़ी में डूबे ऐसे ऐसे कार्य करते हैं कि इंसानियत शर्मसार हो गई है। ज़िंदगी को बचाने की जगह मौत का कारोबार करने लगे हैं जो आपदा पीड़ित लोगों की विवशता को अधिक पैसा कमाने का अवसर समझ दवाओं जीवनरक्षक उपकरणों यहां तक कि एम्बुलेंस जो कोई कमाई का  ज़रिया नहीं मरीज़ को बचाने को सहायता देने को होने चाहिएं मनमाने दाम लेकर अपने व्यवसाय को बदनाम कर रहे हैं।
 
सिर्फ कुछ लोग नहीं बाकी सभी भी अपने अपने कारोबार नौकरी में हर किसी की मज़बूरी का लाभ उठाकर घर भरने को लगे हैं। ये समय था जब सभी को अपनी खुदगर्ज़ी छोड़ वास्तविक इंसानियत का धर्म निभाने की घड़ी में इक कठिनाई का सामना करना था मिलकर आपस में। लेकिन इसी वक़्त हमने अपने संयम अपने धैर्य को खो दिया है। आधुनिक समाज कितना विकसित लगता है मगर भीतर से इस कदर खोखला है ऐसी कल्पना नहीं की होगी कभी किसी ने। 

 

मई 07, 2021

POST : 1495 इस हक़ीक़त को फ़साना समझना ( आधुनिक व्यंग्य कथा ) डॉ लोक सेतिया

    मैं इक चोर मेरी नहीं रानी , तू मेरा राजा जनता तेरी रानी 

                  ( आधुनिक व्यंग्य कथा ) डॉ लोक सेतिया 

                             इस हक़ीक़त को फ़साना समझना। 

वैधानिक चेतावनी की तरह शुरुआत में छोटे छोटे शब्दों में लिख देते हैं ये इक काल्पनिक कहानी है किसी व्यक्ति से इसका कोई ताल्लुक इत्तेफ़ाक़ हो सकता है। हमारा उद्देश्य किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाना कदापि नहीं है। बाद में सामने अभिनय करने वाले दिखाई देते हैं तब आपको समझने में ज़रा देर नहीं लगती ये किस जाने माने व्यक्ति की छवि है। मिलिए इन सभी से आपको मिलवाते हैं पहचान का ध्यान रखना आपका काम है। 

निर्माता निर्देशक :- 

असली खेल उन्हीं का है बाकी सभी खिलाड़ी उनके ख़ास अपने हैं जिनको हर डायलॉग की शुरुआत उनके नाम से करनी होती है। जब उनका शासन है तो सब लाजवाब बेमिसाल है वो रात को दिन बना सकते हैं दिन को तारे दिखला सकते हैं। सच को झूठ झूठ को सच बना सकते हैं देश क्या विदेश तक कठपुतलियां बनाकर अपनी उंगलियों पर नचा सकते हैं। अच्छे दिन की बात कहकर ऐसी हालत पर देश को पहुंचा सकते है कि लोग कुछ नहीं कर सकते न रोकर आंसू बहा सकते हैं न हंसकर गा सकते हैं मन की बात सुनते हैं खुद दिल की दास्तां नहीं सुना सकते हैं। चिड़िया चुग गई खेत कुछ नहीं हो सकता पछता सकते हैं। खुद आफ़त को घर बुलाया नहीं पीछा छुड़ा सकते हैं। लोग ज़िंदा रहें या मर जाएं जनाबेआली रंगरलियां मना सकते हैं। उनके इशारे पर सब होता है मनमर्ज़ी चलाकर दिखला सकते हैं आपको सपने दिखाकर आपका सब चुराकर चौकीदार से बढ़ते बढ़ते साहूकार बनकर आपको अपना कर्ज़दार बना सकते हैं। गब्बर सिंह की तरह सिक्का उछालकर हर बारकिस्मत आज़मा सकते हैं दोनों तरफ उनकी जीत का राज़ आखिर समझा सकते हैं। 
 

नायक अभिनेता :- 

आपको शराफ़त छोड़ कर डॉन बनकर रहने की हिंसा की गुंडागर्दी की उल्टी राह पर चला सकते हैं। भूखे गरीब का किरदार निभाते हुए करोड़ों कमा कर दिखला सकते हैं। सब जो भी कोई पैसे देकर बेचने को कहे बिकवा सकते हैं। असली नकली का खेल क्या है उलझा कर जो खुद खाना नहीं चाहते दुनिया को खिला सकते हैं। आपको चिंतामुक्त करने का तेल बताकर चिंता अपनी मिटा सकते हैं। आपको करोड़पति बनने का राज़ नहीं बताते करोड़पति बनाने के नाम पर खुद माल कमाकर दिखला सकते हैं। अपनी फ़िल्मी कहानी के किरदार नहीं हैं ये कहलाते हैं महानायक पर नायक कहलाने के हकदार नहीं हैं। पैसे का इनसे बढ़कर कोई बीमार नहीं है झूठ वाला कोई और ऐसा फनकार नहीं है। 
 

महमान कलाकार नाचने गाने वाले और प्रयोजक :-

 कोई बाबा है कोई बड़ा धनवान कोई बिचौलिया कोई धर्म का खिलाड़ी ये सब लगते हैं अनाड़ी वास्तव में हैं बदले रूप में गिरधारी भगवाधारी अनाचारी जिनको चाहिए दुनिया सारी की सारी। कोरोना नहीं है इनसे बड़ी माहमारी जिनकी है उपरवाले से मतलब की यारी। योग से रोग को कैसा भगाया है हर किसी ने उनकी बात को आज़माया है खोया है मगर नहीं हाथ कुछ भी आया है। कोई नहीं समझा खोया है हमने उसने पाया है जो कहता है झूठी मोह माया है। हर चीज़ पर लेबल अपने नाम का लगाया है टीवी पर सभी चैनल पर उसका पड़ा साया है। असली नकली में उलझकर खूब माल बनाया है काला सफेद होकर चमकता है डिटर्जेंट बनाया है।  देशभक्ति और धर्म को मिलाकर चूर्ण बनाया है जिनको खिलाया उनके मन भाया है अच्छे अच्छों को पागल बनाकर खुद को सभी का बाप बताया है। 

पटकथा डॉयलॉग नृत्य निर्देशक :- 

लखुकथा जैसी कहानी है बिल्ली शेर की नानी है। इक बेटा है और इक नई नई बहुरानी है। दोनों को जिस जिस ने सर पर बिठाया है पलकों पर बिठाना ठीक था अपने सर पर चढ़ाया है उसी ने सर पर नाचकर सितम ढाया है। किसी को इतना मत चाहो कि खुदा समझने लगे शायर कहता है सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा , इतना मत चाहो उसे वो बेवफ़ा हो जाएगा। राजनेता हों या कारोबारी होते हैं भिखारी बनकर शिकारी दिखलाते हैं मक्कारी। मसीहा दुनिया में कोई नहीं है ये सच है बुरे सब हैं मगर ऐसे खराब लोगों से बढ़कर बुरा कोई नहीं है। कोरोना से बचते फिरते हो इनसे कैसे जान बचाओगे हर जगह यही नज़र आएंगे घबराओगे मर जाओगे।  इनकी बनाई हर कहानी झूठ की दास्तान है ये कहते हैं कुछ करते हैं कुछ और नहीं समझते इनके तरीके हैं क्या और क्या हैं तौर बन बैठे हैं सिरमौर अजब है ये दौर। गरीबी भूख शिक्षा रोज़गार सब समस्याओं से बढ़कर समस्या खड़ी है सांस लेने को हवा नहीं है मौत बिना मांगे मिलती है।
 

 



मई 06, 2021

POST : 1494 कह दो नहीं मंज़ूर मूर्ख बनना ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

     कह दो नहीं मंज़ूर मूर्ख बनना ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

      सच बताना कोई बेसिर-पैर की बातें करता हो क्या आप ख़ामोशी से सुनकर जी हां कह सकते हैं और अगर करते हैं तो बेकार की झूठी बातें करने वाला सोचता होगा पहले दर्जे के नासमझ लोग हैं इतना भी नहीं सोचते ये सब मुमकिन ही नहीं है। चलो उन सभी से मुलाकात करते हैं जो हर दिन हमको उल्लू बनाते हैं। आपका समय नहीं कटता घर बैठे हैं टीवी पर मनोरंजन के नाम पर सीरियल कॉमेडी शो देखते हैं। आपको खीज नहीं होती इतनी अतार्किक कहानियां परोसते हैं टीवी सीरियल वाले। सब को समझ आता है ये खलनायक है घर में रहकर तमाम हथकंडे अपनाता है किसी को बंधक किसी को अपने जाल में फंसवाता है और नायक और समझदार सामने घटती घटनाओं से अनजान रहते हैं। और हर टीवी सीरियल की कहानी में वही बार बार दोहराया जाता है। वास्तव में इन  कथाकार कलाकार सृजन कार्य करने वालों के पास कोई नवीन सार्थक विषय समाज को दिखलाने जागरूक करने को नहीं है सभी इक कुंवे के मेंढक खुद को दुनिया का मालिक समझते हैं। उनको रहने दो उनकी छोटी सी कुंवे की दुनिया है आप क्यों खुद को कुंवे के मेंढक बनने दे रहे हैं। छोड़ दो इस दुनिया को बाहर निकलो और देखो समझो अपनी आंखों से वास्तविक दुनिया का सच जो बिल्कुल अलग है। टीवी वालों की खबरें खबरें कम किसी को बदनाम किसी का गुणगान अधिक है और खबर किसे कहते ये खुद उसकी परिभाषा भूल गए है। " खबर वो सूचना है जो कोई जनता तक पहुंचने नहीं देता पत्रकार का फ़र्ज़ है उसे तलाश करना और उजागर करना। " लेकिन ये कोई छिपी बात नहीं तलाश करते ये जो कोई खुद बताता है उसी को दोहराते हैं बस शोर मचाते हैं। चोर चोर चिल्लाते हैं चोरों से दोस्ती निभाते हैं। हम क्यों इनके बहकावे में आते हैं। 
 
 चलो राजनीति का नंगा नाच दिखलाते हैं चुनाव लड़ने को खुलेआम जनता को भड़काते हैं अपने अपने विरोधी को अपराधी गुंडा कहते हैं मगर चुनाव बाद आपको रहने नहीं देंगें की धमकियां देकर खुद क्या हैं बतलाते हैं। नेता भरी सभाओं में गाली धमकी और डराते धमकाते हैं चुनाव आयोग संविधान के रखवाले खड़े दुम हिलाते हैं न्यायव्यवस्था वाले आंखों पर पट्टी कान पर हाथ धरे मुंह बंद रखकर बापूजी के बंदर बन जाते हैं। लेकिन ऐसी असभ्य और नफरत की आग लगाने वाले नेताओं की सभाओं में हम किसलिए जाते हैं इतना ही नहीं जिन घटिया बातों पर जूते फेंकने होते हैं हम तालियां बजाते हैं। यही जिनको हम अपना सेवक चुनते हैं हम पर शासक बनकर हुक्म भी चलाते हैं और हर बार हम पांच साल तक हाथ मलते हैं पछताते हैं। हमने कैसे कैसे शहंशाहों के ताज उछाले हैं कितने तख़्त गिराए हैं भूल क्यों जाते हैं। हम देखेंगे लाज़िम है कि हम भी देखेंगे फैज़ अहमद फैज़ की नज़्म याद नहीं करते बल्कि जो ये नहीं चाहते उनकी चालों में फंसते जाते हैं। आवाम की आवाज़ को धर्म से जोड़कर ये नेता हमको उल्टा सबक पढ़ाते हैं। लोकराज में तानाशाह बनकर इतराते हैं देश को बेचते जाते हैं बंटाधार करते हैं समाज का और उसको विकास कहकर सभी को मूर्ख बनाते जाते हैं। 
 
    चलिए उनकी तरफ भी नज़र दौड़ाते हैं जो आपको धर्म की भगवान की अल्लाह की जीसस की गुरुनानक की कथा बताते हैं। अपनी सहूलीयत से कथा कहानी बनाते हैं आपको चमत्कार और अंधविश्वास की अंधी गली में लिए जाते हैं बाहर निकलने रौशनी पाने का कोई मार्ग नहीं रहने देते कूप-मंडूक बनाकर आपको भूखा रखते हैं खुद हलवा पूरी खाते हैं। ईश्वर से नहीं मिलवाते आपको धर्म के नाम पर गुमराह करते रोज़ मौज मनाते हैं। मानवता और दीन दुःखी लोगों की पीड़ा को नहीं समझते असली धर्म भूलकर आडंबर करते जाल बिछाते हैं। हम उपदेश सुनते हैं समझते नहीं हैं जो लोभ मोह से बचने को कहते हैं खुद धर्म के नाम पर कितना बढ़ाते जाते हैं इंसानियत की खातिर कभी नहीं मंदिर मस्जिद वाले खुद धर्म निभाने सामने आते हैं। भूखे नंगे लोगों को भजन सुनाते हैं भूखे भजन ना होय गोपाला साधु समझाते हैं।  मतलब इसका इक कहावत से समझते हैं कोई अपने गधे पर बैठ कर सफर कर रहा था मगर अपने सर पर गठड़ी का बोझ उठाये हुए था किसी ने पूछा ये गठड़ी अपने सर से उतारकर गधे पर अपने आगे रख दो किसलिए सर पर रखे हुए हो। वो बोला मुझे खुद अपना बोझ उठाना है गधा मेरा बोझ उठाये है काफी है नासमझ को कौन समझाए सारा बोझ फिर भी गधा चुपचाप ढो रहा है। हम सभी भी अपने गधों का बोझ खुद अपने सरों पर ढोने का काम कर रहे हैं। बल्कि सच तो ये है जिनको हमारा बोझ उठाना था वही गधे हम पर बोझ बन गये हैं। 
 

 

मई 05, 2021

POST : 1493 कांच के टुकड़ों पे चलना ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

        कांच के टुकड़ों पे चलना ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

 कहां से बात शुरू करूं यही मुश्किल है , राजेश रेड्डी जी का शेर याद आता है " न बोलूं सच तो कैसा आईना मैं , जो बोलूं सच तो चकनाचूर हो जाऊं। ये कब चाहा कि मैं मशहूर हो जाऊं , बस अपने आप को मंज़ूर हो जाऊं। नसीहत कर रही है अक्ल कब से , कि मैं दीवानगी से दूर हो जाऊं।" 
   सच लिखना तलवार की धार पर चलना है और सच शासक ताकवर धनवान सत्ताधारी लोगों को हमेशा दुश्मन लगता है। सच लिखने की पहली शर्त है अपने बेगाने की नहीं खुद अपनी भी वास्तविकता को साहस से उजागर करना। जो लेखक टीवी मीडिया वाले सबकी सूरत दिखाते हैं खुद अपनी महिमा अपने मुंह से सुनाते हैं सच से हमेशा नज़रें चुराते हैं। आज आपको कहानी नहीं सच बताते हैं सच लिखने की कीमत हर दिन चुकाते हैं। आंख से आंख मिलाकर झूठ को झूठ बताना मतलब होता है किसी पत्थर की दीवार से सर टकराना मगर हम ने इक बार नहीं सौ बार किया है। सच को जान से बढ़कर है चाहा ये गुनाह बार बार किया है अपने क़ातिल से भी हमने सिर्फ प्यार किया है गुनाह यही मैंने मेरे यार किया है। आज कितनी घटनाएं भूली हुई यादों की तरह फ्लैशबैक की तरह नज़रों के सामने चल रही हैं। ये जुर्म बेलज्ज़त है अर्थात ऐसा अपराध जिस में कोई लुत्फ़ कोई आनंद कोई मज़ा नहीं है सज़ा ही सज़ा है क़ज़ा ही क़ज़ा है। 
 
   पीछे जाने से पहले अभी किसी की कही बात से शुरू करते हैं दोस्त ने कहा आपकी इज्ज़त करते हैं। सही कहते हैं सभी जब तक सच उनके बारे में नहीं किसी और को लेकर हो अच्छा लगता है बहुत बार हुआ है। मैंने कभी किसी से अनुचित को उचित कहने को नहीं कहा ये मुझसे होगा भी नहीं फिर जाने क्यों शासक लोग अफ़्सर नेता यही कहते रहे हैं कि आपकी बड़ी इज्ज़त करते हैं अपने लिहाज़ नहीं किया लिखते हुए हमारे बारे में। सच कभी किसी को मीठा लगता नहीं है सच सुनना ही नहीं चाहते लोग सच का आदर करना जानते तो झूठ पर इतराते नहीं। गुरुनानक जी जेल में भी शासक को सामने कहते हैं बड़ा ज़ालिम है तू सच की डगर चलने वाले जान हथेली पर रख कर चलते हैं। इज्ज़त तभी इज्ज़त है जब लोग आपकी सच्चाई को जानकर आदर करें अन्यथा दिखावे की इज्ज़त धोखा होता है जैसे लोग नेताओं अधिकारी वर्ग और दौलतमंद की करते हैं मतलब की खातिर। अपनी इक ग़ज़ल पेश करता हूं।
 
वो पहन कर कफ़न निकलते हैं
शख्स जो सच की राह चलते हैं।

राहे मंज़िल में उनको होश कहाँ
खार चुभते हैं , पांव जलते हैं।

गुज़रे बाज़ार से वो बेचारे
जेबें खाली हैं , दिल मचलते हैं।

जानते हैं वो खुद से बढ़ के उन्हें
कह के नादाँ उन्हें जो चलते हैं।

जान रखते हैं वो हथेली पर
मौत क़दमों तले कुचलते हैं।

कीमत उनकी लगाओगे कैसे
लाख लालच दो कब फिसलते हैं।

टालते हैं हसीं में  वो उनको
ज़ख्म जो उनके दिल में पलते हैं।
 
नाम नहीं लेना चाहता मगर इक पुलिस के बड़े अधिकारी से जान पहचान हुई तीस साल पुरानी बात है अक्सर सुबह ही अख़बार में मेरी रचना पढ़कर वाह डॉक्टर साहब लाजवाब कलम है आपकी ये शब्द सुनाई देते थे। इक दिन अख़बार की मैगज़ीन के पहले पन्ने पर छपी रचना पढ़कर उनको खराब लगा पुलिस को लेकर उनको मेरे शब्द नापसंद आये थे जबकि वही शब्द अधिकारी नेता डॉक्टर सभी के लिए मीडियम बनाकर उपयोग किया गया था कटाक्ष में लेकिन उनको उम्मीद नहीं थी कि उनकी पहचान दोस्ती का ध्यान नहीं रखेगा ये व्यंग्यकार जिसकी तारीफ करते हैं जनाब। नहीं ये कीमत दोस्ती की महंगी है चुकाना खुद से बेईमानी होगा। ऐसे इक उपयुक्त महोदय तबादला होने पर साहित्य की हमारी संस्था को चेक देने लगे अपने को सम्मानित करवाने को तो नहीं स्वीकार की कभी राशि किसी नेता अधिकारी या धनवान से मुख्य अतिथि बनाकर। जैसा सभी करते हैं मैंने नहीं किया और बदले में किसी से गलत काम में सहयोग करने को नहीं कहा। ये अजीब खेदजनक बात है कि लोग आपकी उचित बात का समर्थन उचित होने के कारण करते हैं मगर उसको भी उपकार मानते हैं। 
 
   कितनी अख़बार मैगज़ीन वाले संपादक उनकी वास्तविकता को लेकर लिखने पर नाराज़ होते रहे हैं। आपको छपवानी है रचनाएं तो उनको सलाम करना होगा और देखता हूं लोग फेसबुक पर धन्यवाद करने की बात लिखते हैं रचना स्वीकृत करने के लिए सम्मानित करने के लिए। होना ये चाहिए की संपादक लिखने वाले को अच्छी रचना भेजने को धन्यवाद देने की बात कहे क्योंकि अभी तक उचित मेहनताना तो अख़बार मगज़ीन वाले देते नहीं , नहीं देने को बहाने बहुत हैं। उनको भी उनकी वास्तविकता बताना नराज़ करना है जबकि ये बाकी सभी खर्चे छपाई कागज़ दफ्तर और कर्मचारी का वेतन देते हैं सिर्फ लेखक को ही गुज़ारे लायक पैसा देना उनको शोषण नहीं लगता है। साहित्य के साथ इस से अधिक अनुचित कुछ हो नहीं सकता है। मैंने साहित्य अकादमी के निदेशक की अनुचित बात मंज़ूर नहीं की उनकी कार्यशैली का हिस्सा बनने से मना कर दिया कवि सम्मलेन आयोजित करने में अकादमी के धन का बंदरबांट करना। सरकारी सम्मानों को लेकर मैंने लिखी कविता साहित्य अकादमी को भेजी जो उसी अंक में छपी जिस में इक और दोस्त को ईनाम मिलने की खबर छपी थी आमने-सामने पेज पर। ये  मुझे नहीं पता था कि ऐसा भी हो सकता है और कई दोस्तों ने फोन किया मुझे भी उस दोस्त को भी तमाशा देखने को लेकिन अच्छा है दोस्त पहले से जानता था मेरी कविता और सोच क्या है। मैं जो मानता हूं उसे लिखते हुए संकोच नहीं करता न घबराता हूं कि कोई बुरा मानेगा। लिखना मैंने ईबादत की तरह किया है काम समाज जनहित को अपने लाभ नुकसान या पैसे शोहरत से नहीं आंका कभी भी। सच लिखने बोलने से दोस्त दोस्त नहीं रहते तो मंज़ूर है सच की ये कीमत चुकानी पड़ती है। लिखना हिंदी में अभी भी घर फूंक तमाशा देखने जैसा है छापने वाले मालामाल और लिखने वाला बदहाल ये अजब कमाल है। वक़्त की उल्टी सीधी चाल है कुछ लोगों की अपनी सुर ताल है। आखिर में जगजीत सिंह जी की गाई ग़ज़ल सब कहती है लिखने को बहुत बाकी है। 
 

 



मई 03, 2021

POST : 1492 जनता का आह भरना जुर्म शासकों की लापरवाही उनकी मर्ज़ी ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

   जनता का आह भरना जुर्म शासकों की लापरवाही उनकी मर्ज़ी 

            ( आलेख - कड़वी सच्चाई तथ्य सहित ) डॉ लोक सेतिया 

    ये संवेनहीनता की हद है सरकार नेता पुलिस सभी जनता को दोषी समझते हैं उनके आदेशों और निर्देशों का पालन नहीं करते कोरोना को हराने बढ़ने से रोकने और बचाव के तरीकों पर गौर नहीं करते हैं। ये समय आरोप लगाने का नहीं है मगर जब सत्ताधारी अपनी नाकामी और वास्तविक कर्तव्य नहीं निभाने की वास्तविकता को स्वीकार करने की जगह जो मर रहे हैं उनकी गलतियां बताने लगे तो जले पर नमक छिड़कने का काम लगता है। सोलह महीने में कोरोना को लेकर देश और राज्यों का स्वास्थ्य विभाग कितना कुछ कर सकता था ये सवाल भी छोटा है आपको असली कारण समझने को और पीछे जाकर देखना समझना होगा। सोलह साल पहले जो शुरआत की जा सकती थी सरकारें नेता बदलते रहे बदलाव करना किसी को ज़रूरी नहीं लगा। शिक्षा और स्वास्थ्य को बजट नाम को निर्धारित किया जाता रहा आबादी को देखते हुए इक नागरिक पर एक दो से बढ़कर अधिकांश पांच रूपये जो इमारत कर्मचारी वेतन के बाद वास्तव में दवा अदि के लिए कुछ भी नहीं बचता। मगर विकास के नाम पर बुत बनाने से आडंबर करने पर बेतहाशा धन बर्बाद किया जाता है हर दिन। मानव जीवन की सुरक्षा से बढ़कर चांद और मंगल पर जाने को अधिक ज़रूरी समझते रहे।
 
मनमोहन सिंह की सरकार में डॉ अंबुमनी रामदासा स्वस्थ्य मंत्री बने थे मई 2004 में तब उन्होंने देश की स्वास्थ्य सेवाओं की दुर्दशा को सुधारने को सख्त नियम कानून बनाने को बिल संसद में पेश किया था। अस्पताल क्लिनिक सरकारी या निजी सभी को मापदंड अनुसार न केवल पंजीकरण करने बल्कि उपचार को लेकर शुल्क की सीमा तक निर्धारित करने तथा ईलाज और अस्पताल में दाखिल करने को मरीज़ की हालत को सामने रखना न कि पैसे या सिफारिश को महत्व देने का नियम की बात थी और निर्धारित कानून और नियम का अनुपालन नहीं करने पर अस्पताल पर कठोर करवाई की बात भी शामिल थी। लेकिन उस कानून को संसद की कमेटी को भेजकर ठंडे बस्ते में डालकर भुला दिया गया राजनितिक कारणों से और जो डॉक्टर देश की स्वास्थ्य सेवाओं को सही करना चाहता था उसको पद से हटवा दिया गया। नागरिक स्वास्थ्य से अधिक महत्व आर्थिक कारणों को दिया गया क्योंकि देश में अधिकांश नर्सिग होम अस्पताल निजी क्या सरकारी खरे साबित नहीं होते थे। मतलब ये कि उनको मनमानी करने और मरीज़ों की ज़िंदगी की कोई कीमत नहीं समझने की की गई और भविष्य में जो जैसा चल रहा था जारी रहने दिया गया। हमारे देश के शासक नेताओं अफसरों को नागरिक की स्वास्थ्य सेवा पाने की उम्मीद को कभी समझना ज़रूरी नहीं माना क्योंकि उनको जब ज़रूरत हो बड़े अस्पताल और विदेश जाकर ईलाज की सुविधा हासिल होती है।
 
पिछले कुछ सालों से जनता की समस्याओं को खिलौना समझने की बात की जाती रही है। आपको हर बात के लिए ऐप्प्स बना कर समझाया गया चुटकी बजाते समाधान मिलेगा। मगर वास्तव में तमाम ऐप्प्स नाकारा और बेकार साबित हुई क्योंकि अफसरशाही बाबूशाही और सरकारी कर्मचारी दर्ज शिकायत को जब मर्ज़ी हटा देते बिना समाधान किये अपने आंकड़े सही करने को। झूठ और फरेब का मायाजाल रचा गया वास्तविक हल नहीं किया गया। अधिकारी नेता मनमर्ज़ी से अपनी सुविधा के नियम बनाते बदलते रहे। पुलिस नेता अपराध को बढ़ाते रहे और कानून व्यवस्था का बंटाधार करते रहे। अपराधी को पकड़ना सज़ा देना छोड़ अपराध करवाना उनका कारोबार बन गया। जनता पर लाठी भांजने वाले खुद मुजरिमों के साथी बनकर आगे बढ़ते बढ़ते वहां तक पहुंच गए कि संसद विधानसभा में बहुमत बाहुबली और गंभीर अपराध करने के आरोपी का होने लगा। वोटों की खातिर बलात्कार के आरोपी को बचाते उसके गैरकानूनी काम को वैध करते रहे। 
 
अब तो चुनाव जीतना ध्येय बन गया और सत्ता पाना और शासक बनकर जनविरोधी विचारधारा जनमत विरोधी कार्य और कानून बनाना आदत बनता गया। देश समाज के कल्याण को छोड़ अपनी विचारधारा थोपने को हथकंडे अपनाकर संविधान तक की अनदेखी की जाती रही। विरोध की आवाज़ को दबाने कुचलने से टीवी अख़बार मीडिया को खरीदने का तानाशाही ढंग अपनाया जाता रहा। भूल गए देश की करोड़ों की आबादी को रोटी शिक्षा स्वास्थ्य चाहिए मंदिर मस्जिद धर्म के नाम पर बांटना अनुचित है। कितनी बड़ी अर्थव्यवस्था की बात कहां रह गई जब सपनों की कांच की बुनियाद पर खड़ी ऊंची इमारत विकास की चरमरा कर ढह गई। कोरोना की आपदा कड़वा सच कह गई। झूठ की नगरी में सच का कत्ल होता रहा शासक मुस्कुराता रहा आमजन रोता रहा। क्या होना चाहिए था और क्या होता रहा। हालत ये है कि ऑक्सीजन नहीं मिलने से अस्पताल में बिस्तर नहीं मिलने से लोग बेमौत मर रहे हैं। आह भरते हैं तो सरकार जनाब को लगता है गुनाह कर रहे हैं। लाशों पर राजनीती की बात सच होती लगती है सावन के अंधों को मगर हरियाली नज़र आती है। 
 
आखिर में भयानक तस्वीर आपको दिखाते हैं कभी गूगल पर सर्च करना तो किसी अख़बार में आपको डॉ अंबुमणी रामदासा का संसद में पेश किया स्वास्थ्य सेवाओं को सुधारने वाले बिल का मसौदा मिल जाएगा। पढ़कर दंग रह जाओगे कि इतने साल पहले किसी ने इतनी गहनता से विमर्श कर स्वास्थ्य सेवाओं को सुधारने की कोशिश की थी जो नाकाम नहीं कर दी गई होती तो आज जो बेबसी और दर्द खुद डॉक्टर्स और नगरिक महसूस कर रहे हैं कदापि नहीं होती। जिन को हम चुनते हैं देशभक्ति की समाज सेवा की बातें सुनकर वो सांसद विधायक बनते केवल अपने खुद के लिए सब हासिल करने वाले कानून पल भर में पारित कर लेते हैं जबकि जनता की भलाई की खातिर कोई पहल करता भी है तो उसको सही अंजाम तक नहीं पहुंचने देते हैं। बीस तीस साल पहले बनाये अच्छे कानून राज्य सरकारें लागू नहीं करती मगर अपने ख़ास लोगों की ज़रूरत को उनकी गलत मांग को भी अध्यादेश लेकर तुरंत पूरा किया जाता है। हम खुद को देशभक्त कहते हैं मगर देश समाज विरोधी आचरण करने वाले लोगों के सामने सर झुकाये खड़े रहते हैं। स्वार्थी खुदगर्ज़ सत्ता का अनुचित उपयोग करने वालों की बातें सुनकर तालियां बजाते हैं। अपने देश को बर्बाद करता देख हमारा खून खौलता नहीं हैं जैसे हमारी धमनियों में खून नहीं पानी बहता है। अनुचित को अनदेखा करना विरोध नहीं करना कायरता है फिर कैसे हम अपने गैरवशाली इतिहास की बात करते हुए सीना चौड़ा करते हैं। जिन्होंने देश को आज़ाद करवाया गुलामी की जंज़ीरें तोड़कर उनके सामने हम शर्मसार नहीं होते जब उनकी महिमा का गुणगान करते हैं और उनके सपनों को तार तार करने वालों को मसीहा कहते हैं। 
 
आपको लग सकता है कि कुछ ऐसे कानून बन जाने से क्या वास्तव में बदलाव हो सकता है , तो आपको बताना चाहता हूं कि स्वस्थ्य शिक्षा को मुनाफे का कारोबार नहीं बनाने दिया जाता और स्कूल अस्पताल को शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं सभी को उपलब्ध करवाने का लक्ष्य दिया जाता और ऐसा नहीं करने वालों को ये पेशा करने की अनुमति नहीं मिलती तब क्या हो सकता था। तब फार्म हॉउस बड़ी बड़ी गाड़ियां खरीदने और रहने को ऊंचे भवन बनाने की जगह चिकिस्तक अपने अस्पताल में नर्सिंग होम या सरकारी नागरिक अस्पताल में अपनी सुविधाओं से पहले रोगी का उपचार और निदान करने को ज़रूरी साधन उपलब्ध करवाने पर ध्यान देते। भगवान के बाद जिनको महान समझा जाता है उनको खुद कुछ पाने की चाहत नहीं त्याग की भावना महत्वपूर्ण लगती। 

 

मई 01, 2021

POST : 1491 कोई समझा नहीं कोई जाना नहीं ( अजब-ग़ज़ब ) डॉ लोक सेतिया

 कोई समझा नहीं कोई जाना नहीं ( अजब-ग़ज़ब ) डॉ लोक सेतिया 

   जिसको देखते हैं वही भगवान को लेकर ईश्वर परमात्मा खुदा जीसस वाहेगुरु को लेकर सबको बहुत कुछ समझाता नज़र आता है जबकि सच ये है कि खुद नहीं समझता समझाना किसे है समझना क्या है। सदियों से लोग उलझे हुए हैं उस विषय की चर्चा में जो कोई उलझन ही नहीं है उलझाने को उलझन बनाकर नासमझ लोगों ने विश्वास आस्था को काल्पनिकता का सहारा लेकर मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे को उसका घर बता दिया है जिसका निवास कण कण में है हर इंसान जीव जंतु पेड़ पौधे से हवा पानी कुदरत की हर वस्तु में है। आजकल कोरोना को लेकर कुछ उसी तरह से होने लगा है जिसका किसी को कुछ पता नहीं उसको लेकर हर कोई समझाने लगा है दुनिया को। शायद हम अपनी नासमझी पर शर्मिंदा नहीं होते गर्व करते हैं। किसी दार्शनिक ने कहा था जो समझता है उसको सब मालूम है वो कुछ भी नहीं जानता और जो कहता है कि उसे सब पता नहीं वो कुछ समझता है। ये विडंबना है हैरानी है या इत्तेफ़ाक़ है कि भगवान की तरह कोरोना का शोर सभी जगह है लेकिन उसको पहचानता नहीं ठीक से कोई भी। इक भूलभुलैयां में भटकाते हैं लोग और ऐसे भी हैं जो भगवान की ही तरह कोरोना का भी कारोबार करते हैं भयभीत कर अपना अपना स्वार्थ पाने को। कोई उपचार नहीं होने की बात जानकर भी अपने फायदे को उपचार की बात कहकर अपना मकसद तलाशता है तो कोई वैज्ञानिक और विशेषज्ञ लोगों की खोज वैक्सीन पर अनावश्यक टिप्पणी कर आशा की बात को निराशा में बदलने की कोशिश करता है। खेद की बात है मानवीय आपदा को भी निजी हित को उपयोग करने की अमानवीय कोशिश करना। 
 
सोशल मीडिया पर इतनी झूठी सच्ची और आधाररहित जानकारी लोग भेजते हैं और हम बिना विचारे औरों को भेजने का कार्य कर भागीदार बन जाते हैं इक सच को रहस्य बनाने में। जिस का जो काम है जिस विषय की समझ और जानकारी है उन्हीं पर उस विषय को छोड़ना उचित है। सभी को सब कुछ समझ आना संभव नहीं है। कम से कम निराशाजनक और तर्करहित बातों को बढ़ावा देना कभी नहीं करना चाहिए। इन आधी अधूरी कच्ची पक्की बातों से लोग सच पर संदेह और झूठ पर विश्वास कर सकते हैं जिस से उनको ऐसा नुकसान हो सकता है जिसकी भरपाई नहीं की जा सकती है। सोचिए कोई भटका हुआ आपसे किसी गांव नगर या जगह का रास्ता पूछता है और आपको वास्तव में मालूम नहीं होने पर बिना सोचे किसी डगर पर इशारा करते हैं तब मुमकिन है आप विपरीत दिशा दिखलाकर अच्छाई की जगह बुराई का कार्य कर रहे हैं। व्हाट्सएप्प फेसबुक पर यही पागलपन दिखाई देता है। 
 

          चलो कोशिश करते हैं कुछ समझने की ( चिंतन ) बाकी बात आगे 

  जिनको हमने क्या क्या समझा उन सभी को लेकर सोचना चाहिए। भगवान का नाम लेने से क्या भगवान खुश हो जाएंगे जैसे नेता उपदेशक भगवाधारी अपनी शोहरत के भूखे होते हैं। कभी इस कभी उस स्थल जाकर दर्शन करते हैं अगर दर्शन हो गए तो दूसरी जगह जाना ही नहीं पड़ता सब मिल जाता ईश्वर से मिलकर बाकी क्या रह जाता पाने को। मगर उनको कुछ और चाहिए जितना मिला कम लगता है दाता नहीं भिखारी हैं ये कभी संतुष्ट नहीं होते। और पैसा और ताकत और सत्ता का विस्तार इनकी हवस की कोई सीमा नहीं। आपको जो कलाकार जो टीवी सिनेमा खेल के खिलाड़ी भगवान की तरह लगते हैं उनको पैसे पद और दिखावे के आदर की भूख रहती है ये किसी को कुछ भी देते नहीं देने की बात करते हैं बदले में और पाने को। तथाकथित बाबा लोग कितना धन जमा हो उनको थोड़ा लगता है बातें बड़ी बड़ी करते हैं। अख़बार टीवी वाले लिखने वाले भी खुद को सब जानने समझने की बात कहते हैं वास्तव में पैसे की खातिर रसातल में पहुंच चुके हैं उनका भगवान पैसा है जो खरीदता है उसी को अपना ज़मीर बेचते हैं। धर्म की जनसेवा की बात करने वाले खुद अपने लिए अधिक पाने को पागल होते हैं। इनको आपने आदर्श समझ लिया है यही सब से बड़ा गुनाह है क्योंकि सत्य को छोड़ आप झूठ की महिमा का गुणगान करते हैं। 
 
राम राम जपने से कल्याण होता है तो कोरोना कोरोना की रट लगाने से भी मुमकिन है कोरोना को आप पर दया आ जाये मगर ऐसा नहीं होता लगता है। कोरोना का जाप छोड़ कोई और अच्छा काम करें तो बेहतर होगा और माला फेरने से मोमबत्ती जलाने से इबादत करने से अच्छा है किसी को जाकर सहारा दो किसी भूखे को रोटी खिलाओ किसी बीमार को उपचार उपलब्ध करवाओ किसी को शिक्षा का वरदान देने का दर्दमंद बनकर इंसान को इंसान समझ भाईचारा और मेलजोल बढ़ाने की बात करो। नफरत की अहंकार की बातों से बचकर सही राह अपनाओ।
 

 

अप्रैल 29, 2021

POST : 1490 ज़िंदा नहीं क्यों ख़ौफ़ मौत का है ( दरसल ) डॉ लोक सेतिया

    ज़िंदा नहीं क्यों ख़ौफ़ मौत का है ( दरसल ) डॉ लोक सेतिया 

   सोचते रहते हैं सांस की गिनती कितनी है कितनी बाक़ी है दिल की धड़कन बढ़ती घटती रहती है नींद रात रात भर नहीं आती क्या ये जीना है मौत का ख़ौफ़ ज़िंदगी पर भारी है। सच तो ये है हमने जीना कभी सीखा ही नहीं जितना जिये जैसे जिये उसको ज़िंदा रहना कहते ही नहीं बस समझते रहे कि हम ज़िंदा हैं जीना क्या होता है समझा नहीं सीखा नहीं। सच को सच झूठ को झूठ अच्छे को अच्छा बुरे को बुरा कहने का साहस नहीं किया जब जिसने मज़बूर किया हमने सर झुका कर उसको अपना मालिक और खुद को गुलाम बना लिया। बड़ी इज्ज़त से घर बुलाकर बेइज्ज़त किया हर किसी ने और हम डरे सहमे ख़ामोश रहे किसी की दिलफ़रेब बातों को सुनकर झूठी तसल्ली खुद को देते रहे कि ये सितमगर कभी हमारे दुःख दर्द को समझेगा और हमको जीने की आज़ादी देगा। वास्तव में हम बेहद कायर लोग हैं जो अपनी आज़ादी अपने अधिकार की लड़ाई खुद लड़ना नहीं चाहते बस ख़ैरात में हासिल करना चाहते हैं। धीरे धीरे हम पर ज़ुल्म और हम पर शासन करने वाले लोग हमें इतने भाने लगे कि उनसे नफरत करना उनसे जंग लड़ना छोड़ हम उन्हीं के कदमों पर चलने उन जैसा बनने लग गए। सभी अपने से नीचे और अपने से कमज़ोर पर ज़ोर आज़माने लगे और झूठ को सच बताकर सच से नज़रें चुराने लगे। ज़मीर को मारकर  बेजान किसी  लाश जैसे चलते फिरते लोग क्या क्या हैं इसका शोर मचाने लगे। मौत तो हर हाल सभी को इक दिन आनी ही है मगर अफ़सोस इसका है कि हम में से अधिकांश लोग कभी ज़िंदा रहने जीने का ढंग भी नहीं समझ पाये। सालों की गिनती को जीना नहीं कहते हैं जीना कहते हैं हौंसलों से ज़िंदगी की हर चुनौती से हराकर जीतना साहस से अपने दम पर। 
 
  जीना उसी का सार्थक होता है जो सिर्फ अपनी खातिर नहीं देश समाज की खातिर सही मार्ग पर चलकर सच्चाई ईमानदारी और निडरता पूर्वक रहता है हर हालात में कठिनाई से घबराकर गलत से समझौता नहीं करता कभी। धन दौलत से सामान मिलता है ईमान नहीं और पढ़ लिख कर उच्च शिक्षा अथवा पद पाकर भी नैतिकता और आदर्शों का पालन नहीं करना तो अज्ञानता से भी खराब है जैसे आंखें होते आंखों पर स्वार्थ की पट्टी बांध अंधा बनकर जीना। जो उजाला करने को जलने की जगह अंधेरों का कारोबार करते हैं बड़े बदनसीब लोग होते हैं। ऐसी शिक्षा जो आपको अच्छा इंसान नहीं बनाती उसको हासिल करना किस काम का है। हैरानी की बात है लोग शोहरत दौलत को पाकर अहंकार करते हैं ये समझते हैं कि उनके बाद उनका नाम रहेगा जबकि वास्तव में जीते जी ऐसा कुछ नहीं करते जो समाज देश और विश्व कल्याण के लिए उपयोगी साबित हो। हमने इंसान बनकर अपना कर्तव्य निभाना ज़रूरी नहीं समझा है हमने जो कहा आचरण में नहीं किया खुद को अच्छा सच्चा महान कहना वास्तव में छोटे होने का सबूत है। लोग आपको बड़ा समझें ये आपकी चाहत नहीं होनी चाहिए बल्कि सही मार्ग पर चलते इसकी चिंता ही नहीं करनी चाहिए। खुद को अपने सामने रखकर विवेक से सवाल करना चाहिए कि क्या सच में मुझे ऐसा होना चाहिए जैसा हूं। 
 
हम समझते हैं दुनिया को अपनी चतुराई से समझ से धोखा देकर खुद ऊपर बढ़ रहे हैं जबकि असल में हम अपने आप से नज़रें नहीं मिलाते खुद से सबसे अधिक छल कपट करते हैं। जो लोग बौने कद वाले होते हैं समझते हैं जिनका कद हैसियत उनसे बड़ी ऊंची है उनको छोटा साबित कर खुद उनसे महान और बड़े बन जाएंगे वास्तव में पहाड़ पर चढ़ कर और भी छोटे लगते हैं। ऊंचाई पर खड़े होने से कोई बड़ा नहीं होता है इसी तरह बड़े पद पर आसीन होने से कोई ऊंचाई को नहीं हासिल कर सकता है। ज़िंदगी जीने का अर्थ है देश समाज को सभी को कुछ देने का कार्य करना जो शायद ही हम करते हैं हम तो सिर्फ खुद अपने लिए अपने स्वार्थ सुख सुविधा अधिकार पाने को लालायित रहते हैं किसी पागलपन की तरह धन दौलत शोहरत की अंधी दौड़ में शामिल होकर ज़िंदगी को जीने का अर्थ ढंग सलीका सीखते नहीं कभी। बस जिये और मर गए इक नाम बनकर।
 

 
 
    

अप्रैल 24, 2021

POST : 1489 अपना गुणगान खुद करने वाले ( सारे जहां से अलग हम ) डॉ लोक सेतिया

     अपना गुणगान खुद करने वाले ( सारे जहां से अलग हम ) 

                                       डॉ लोक सेतिया 

इसको पागलपन कहते हैं अपने मुंह मियां मिट्ठू बनना। हमारा कौमी तराना यही है शान से गाते हैं सारे जहां से अच्छा। बड़े बढ़ाई ना करें बड़े ना बोलें बोल , रहिमन हीरा कब कहे लाख टका मेरो मोल। बुरा जो देखन मैं चला बुरा न मिलिया कोय , जो दिल खोजा आपना तो मुझ से बुरा न कोय। रहीम और कबीर कह गये हम समझे नहीं रटते रह गये। हम ऐसे लोग हैं जो अपनी सूरत को कभी दर्पण में सामने रख कर देख कर विचार नहीं करते कि हम कितने डरावने चेहरे वाले हैं अच्छाई और खूबसूरती का मेकअप या मुखौटा लगाकर भले बने रहते हैं मन में कालिख़ और स्वार्थ लोभ मोह अहंकार भरा है मगर हाथ में माला है मनके फेरते रहते हैं गिनती करते हैं लेकिन जपते जपते जो कहना करना भूल जो नहीं करना चाहिए वही करने को सोचते रहते है राम छोड़ मरा मरा बोलने लगते हैं। हर कोई खुद को महान समझता है अपने सिवा सभी को नासमझ नादान समझता है। इंसान से भयानक कोई जीव जंतु जानवर पशु पंछी धरती आकाश दुनिया भर में नहीं है जिस शाख पर बैठे हैं उसको काटने को विकास और जाने क्या क्या समझते हैं। राजनेता देश को बदलने की बात कहते हैं खुद को नहीं बदलते हैं ये परजीवी हैं जनता का लहू पीकर पलते हैं गिद्ध मुर्दा लाश खाते हैं ये शासक लोग सरकार बनते ज़िंदा इंसान के जिस्म को नोंचते हैं। चुनाव जीतने को इंसानियत धर्म क्या नियम कानून संविधान तक को क़त्ल करते हैं। 
 
अदालत में बैठ कर न्यायधीश बन सवाल करते हैं किस किस ने क्या अपराध किया पाप की पुण्य की परिभाषा गढ़ते हैं। न्यायव्यवस्था की बदहाली की चर्चा से डरते हैं ज़िंदगी की कालाबज़ारी है पुलिस पर अपराधी भारी है हर गुनाहगार से सत्ता की यारी है ये सबसे बड़ी महामारी है। इक दिन सबकी आनी बारी है आखिर ख़त्म हुआ दुनिया का हर ज़ालिम अत्याचारी है। सरकार जो लोग चलाते हैं आग से आग को बुझाते हैं लाशों के अंबार पर सत्ता की रोटियां पकाते हैं। सबको बातों से बहलाते हैं झूठ को सच बताकर उल्लू बनाते हैं जितना नीचे गिरते जाते हैं उतना गर्व से खुद को ऊंचा पहाड़ समझ इतराते हैं। देश का धन चोरी का माल समझ कर बांसों के गज से नापकर कारोबार चलाते हैं चोर जब साहूकार बन जाते हैं चोर औरों को कहते हैं चोर चौकीदार मिलकर मौज मनाते हैं। हमने यही अपराध किया है बिना परखे ऐतबार किया है बस यही हर बार किया है किसी बड़बोले को सरदार किया है। अपने कर्मों की सज़ा पाई है आगे कुंवां पीछे खाई है नौकर ने अपनी असलियत दिखाई है बन बैठा घरजंवाई है। 
 
चलो उनसे भी चल के मिलते हैं जो सच की कथा सुनाते हैं चौबीस घंटे हज़ार चैनल लाख अख़बार खुद को सबसे बड़ा बतलाते हैं। बेचते हैं ज़मीर पहले खुद अपना फिर सवालात पूछते जाते हैं जो बिक गये खरीदार वही हैं अपनी कीमत बढ़ाते जाते हैं। उनसे बढ़कर कोई और नहीं हराम की खाते हैं मगर हरामखोर नहीं उन पर चलता किसी का ज़ोर नहीं। शोर उनका है जिनको पसंद किसी और की आवाज़ नहीं ये बात कोई राज़ की बात नहीं। सोशल मीडिया के जितने बंदे हैं सभी आंखों वाले अंधे हैं सच खोजना नहीं आता है झूठ से उनका गहरा नाता है नैतिकता से उनको बैर है बचना उनसे मनानी खैर है। दाता बनकर जो भीख देते हैं ये उनकी हाज़िरी लगाते हैं बात जनता की करते हैं पर सत्ता के गुण गाते हैं कभी कभी सरकार को आंखें दिखाते हैं ये मज़बूरी है करना पड़ता है पल भर में बात को बदलते हैं सरकार ने सब ठीक किया इसको अपनी खबर का असर बताते हैं। सच्चाई शराफत ईमानदारी धर्म ईमान नैतिकता ये सभी चलते नहीं आजकल खोटे सिक्के हैं। आप खुद हैं तीन गुलाम बेगम बादशाह हाथ में लिए असली खिलाड़ी है जिसके पास तीन इक्के हैं। जिसको समझे थे बापू के बंदर वो लकंदर बन गये हैं सिकंदर। उनका इतिहास कौन लिखेगा ये सब झूठ है है कोरी बकवास कौन लिखेगा। 
 

 



अप्रैल 22, 2021

POST : 1488 शिकायत है कोरोना को ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

      शिकायत है कोरोना को ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

अपनी तो ये आदत है कि हम कुछ नहीं करते , कोरोना को भी शिकायत है कि हम कुछ नहीं करते। कोरोना कौन है बिन बुलाया महमान है या मुफ्त में हुआ बदनाम है जाने क्या क्या उस पर इल्ज़ाम है। कोरोना से लड़ना मज़बूरी है जब कुछ नहीं समझ आये तो ये कहना ज़रूरी है। सरकार ने उसको अवसर बताया था शायद वोटर समझ प्यार से मनाया था। राजनेताओं ने राजनीति का हथियार तक बनाया मगर कोरोना नासमझ नहीं चालाक निकला किसी दल किसी नेता के हाथ नहीं आया। बात की तह तक जाना होगा सबको आईना दिखाना होगा। एक एक कर सबको मिलवाना है कोरोना का पता क्या है कहां ठिकाना है। हम सभी रोज़ खुद ही मरते हैं जीना नहीं सीख सके बेमौत मरते हैं ज़िंदगी से प्यार नहीं करते हैं मौत पर तोहमत धरते हैं। सोचते हैं क्या क्या किस किस ने करना था जो नहीं किया सभी ने यही किया कुछ भी नहीं किया। कब क्यों किसे क्या क्या करना था क्या नहीं किया कैसे बताएं किस किस को सामने लाएं किसको बचाएं छुपाएं। शामिल हैं इस तरफ से उस तरफ सभी जुर्म के मुजरिम सच सच बताएं।
 
  सरकारों ने अस्पताल कितने बनवाये मगर स्वास्थ्य सेवाओं को तंदरुस्त नहीं रख पाए। अस्पताल नर्सिंग होम डॉक्टर वैद हकीम सरकारी विभाग संस्थाएं नियम कानून सभी कहने को बहुत करते हैं मगर सच समझते नहीं बड़ी बड़ी बातों का दम भरते हैं। दुनिया चांद पर पहुंचने की बात करती है धरती पर इंसान को कैसे जीना है उसकी चिंता नहीं इंसानियत शासकों से डरती है। आपने महल अपने बनाये हैं दुनिया भर को नाप आये हैं देशवासी भूखे नंगे बदहाल हैं आपको नहीं लगते अपने लोग जो अपने हैं बने पराये हैं। कानून कितने बनाये हैं स्वास्थ्य सेवा की बात पर कोई नियम नहीं है धोखे देते हैं धोखे खाये हैं। जैसे अस्पताल नर्सिंग होम क्लिनिक डॉक्टर स्वस्थ्य सुविधाएं होनी चाहिएं सभी को हासिल उसकी वास्तविकता बड़ी निराशाजनक खराब है। लापरवाही बेहिसाब है कोई नहीं देता सवाल का जवाब है। मर्ज़ बढ़ते गए ईलाज करने से ये क्या आशिक़ी निभाई है। ये चिकिस्या है कि राम नाम की लूट है मनमर्ज़ी की छूट है।
 
 पुलिस वालों को समझ नहीं आया इतना बड़ा गुनहगार उनके हाथ नहीं क्यों आया है। जाल बिछाया नाका लगाया है हिरासत में नहीं आया है नहीं तो उनसे बच नहीं पाता ज़मानत मिलती खिलाने पिलाने से भागता किस तरह पुलिस थाने से मुठभेड़ में मारा जा सकता था। अपनी असलियत छुपा सकता था झूठ को सच साबित करने को झूठी हवाही सबूत दिखला सकता था। कोई वकील अदालत को यकीन दिला सकता था बेवजह फंसाया है जुर्म कर नहीं सकता है। मासूम है बेचारा है कोरोना हालात का मारा है रहम की भीख मांगता है सब उसको ख़त्म करना चाहते हैं पनाह मांगता है। पुलिस को मिलता कोई सुराग नहीं सीबीआई का भी जवाब नहीं। लिखने वालों ने किया क्या है कोरोना की कहानी नहीं लिखी ये बताते कि कथा क्या है। धर्म वाले भी नहीं पहचान पाये दैत्य है कि कोई अवतार है उसका सारा संसार है क्या कलयुग का भगवान है उसका मंदिर कोई बनाया है ये शाम का लंबा होता साया है। न्यायपालिका हैरान है अदालत में अनचाहा महमान है अदालत का रखता नहीं सम्मान है नासमझ नहीं नादान है खो चुका पहचान इंसान है।
 
   टीवी अख़बार वाले ढूंढते आतंकवादी गुनहगार से साक्षात्कार करते हैं कोरोना को स्टूडियो में बुलाया नहीं अपनी हैसियत को बढ़ाया नहीं। चर्चा बहस बेकार झूठी बेमतलब बिना मकसद करते रहे विज्ञापन से तिजोरी भरते रहे कोरोना से यारी की न दुश्मनी की है भूल की है बहुत बड़ी की है। दर्शकों को क्या समझाया है खुद उनको कुछ भी नहीं समझ आया है। कोरोना को भगाना है हराना है बस यही इक तराना है दिन रात फोन पर बजाना है आपको सुनाना है समझाना नहीं डराना है। डर के आगे जीत नहीं होती है जग की ऐसी रीत नहीं होती है बॉलीवुड महात्मा गब्बर सिंह जी  समझाते थे जो डर गया समझो मर गया। अपनी हालत यही हो गई है तेरा क्या होगा कालिया सरकार मैंने आपका नमक खाया है अब गोली खा। कितने आदमी थे सांभा खामोश है बसंती नाचेगी जब तक सांस चलती है कोरोना की बड़ी गलती है खुद सामने नहीं आता है जबकि उसके पास जाने किस किस का बही खाता है। जिनको जीना नहीं आया न मरना ही आया हम ऐसे लोग हैं जिनको कुछ करना नहीं आया। सोशल मीडिया पर बकवास लिखते हैं सच पढ़ना नहीं आया समझाते सभी को हर विषय खुद समझना नहीं आया। कोरोना को शिकायत है कि हम कुछ नहीं करते , अपनी तो ये आदत है कि हम कुछ नहीं करते।

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अप्रैल 20, 2021

POST : 1487 ज़िंदगी तू बेवफ़ा क्यों है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

    ज़िंदगी तू बेवफ़ा क्यों है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा ' 

ज़िंदगी , तू बेवफ़ा क्यों है 
मौत मुझसे ही ख़फ़ा क्यों है । 
 
बेगुनाही की भी है पादाश    
ये जहां का फ़लसफ़ा क्यों है । 
 
( पादाश :  सज़ा )  
 
ऐ मेरे क़ातिल , बता तू ही 
मुझ को तुझ से ही वफ़ा क्यों है ।  
 
क्यों इनायत है रकीबों पर 
तेरी हम से ही ज़फ़ा क्यों है । 
 
कर के वादा फिर मुकर जाना  
यूं ही करता हर दफ़ा क्यों है ।  

 
ज़िंदगी से , मौत सस्ती है  
इस ख़सारे में , नफ़ा क्यों है ।  
 
( ख़सारा : नुकसान ) 
 
प्यार लिखना था जहां ' तनहा '
रह गया ख़ाली सफ़ा क्यों है ।  
 
 

 

 

POST : 1486 हम जिएं कैसे हम मरें कैसे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

   हम जिएं कैसे हम मरें कैसे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

हम जिएं कैसे हम मरें कैसे 
क्या करें और क्या करें कैसे । 
 
जिस्म घायल है रूह भी घायल 
ज़ख़्म ही ज़ख़्म हैं भरें कैसे । 
 
उनके झांसों में लोग आ जाते 
चाल समझे नहीं डरें कैसे । 
 
दुश्मनी उनको है ज़माने से 
लोग उल्फ़त भला करें कैसे । 
 
लोग खुद जाल में फंसे "तनहा"
दोष तकदीर पर धरें कैसे । 
 

 

 

अप्रैल 18, 2021

POST : 1485 मुसीबत से डरने वाले ( जंग नहीं लड़ना ) डॉ लोक सेतिया

    मुसीबत से डरने वाले  ( जंग नहीं लड़ना  ) डॉ लोक सेतिया

    ये ऐसे कैसे पेड़ लगाए हैं हमने जो छाया नहीं देते कोरोना की धूप में। कोरोना इक दुश्मन है जिसने हमला किया तब सीमा पर तैनात सैनिक सोये हुए थे अर्थात सरकार स्वास्थ्य विभाग और विश्व स्वास्थ्य संघठन निक्क्मे नाकाबिल साबित होने के बाद नसीहत देकर अपनी गलती को स्वीकार ही नहीं करते हैं। सोचो अगर सीमा पर तैनात फौजी दुश्मन के हमले पर सामने डटकर लड़ने की बजाय लोगों को भागो अपनी जान बचाओ घर में बंद हो जाओ अपने आप को छुपाओ किसी को नज़र नहीं आओ सबको दुश्मन समझो हाथ से हाथ नहीं मिलाओ दूर होकर उसको दूर भगाओ। ये कोई नहीं बता सकता है सरकारी रोज़ बदलते आदेश किस काम आये मुमकिन है जिनको कोरोना से बचाया जा सकता था नहीं बचे क्योंकि बचाने वाले सैनिक अपनी जान को खतरे में नहीं डालना चाहते थे उनको छूना तक नहीं जांच और उपचार कैसे संभव है आडंबर किया जाता है। जिनको पैसा और शोहरत अधिक महत्वपूर्ण लगते हैं उनको फ़र्ज़ की खातिर जान जोखिम में डालना कैसे मंज़ूर होगा। भगवान जानता होगा अगर कोई भगवान वास्तव में कहीं है कि कितने रोगी किसी और रोग से पीड़ित थे मगर कोरोना के नाम पर बलि चढ़ा दी गई। जब दवा ईलाज वैक्सीन तक सब जगह वास्तविक उपयोग से अधिक महत्व अन्य बातों पर विचार किया जाए और सरकार कंपनी तक इसको खेल समझने का अपराध करते हैं तब नतीजा क्या होगा। 
 
  जो लोग किसी राजनेता को कोई लड़ाई हारने का दोषी बताते रहे खुद उसी दुश्मन की चाल में फंसकर अपनी साख को दांव पर लगाते रहे। जिस समय दुश्मन दोस्ती की आड़ में पीठ में छुरा घोंपता है तब लापरवाही कह सकते हैं मगर जब वही दुश्मन फिर से आपके साथ उसी बात को दोहराता है तब हम मूर्ख साबित होते हैं। सरकार टीवी सोशल मीडिया स्वास्थ्य विभाग ने साल में कोरोना से जंग लड़ने का शोर किया है लड़ने की तैयारी नहीं की बस टोटके आज़माते रहे और केवल अपने बचने के रस्ते ढूंढते रहे। 130 करोड़ जनता की जान से अधिक उनको सत्ता चुनाव और धर्म के नाम पर भीड़ जमा कर अपनी नासमझी से हालत बिगाड़ने का काम किया है। असली जंग का मैदान छोड़कर ये सभी खुद को जो बन नहीं सकते होने कहलाने की कोशिश करते रहे। क्या ऐसे नेताओं और सरकारों के आपराधिक आचरण की अनदेखी की जा सकती है। अस्पताल श्मशानघाट सभी शहर गांव उनकी नाकामी और विवेकहीनता विचारहीनता की मिसालें सामने देख रहे हैं। अंधी पीसे कुत्ता खाये यही हो रहा है क्या अपने इस से बदतर हालात पहले कभी देखे हैं। 

 

अप्रैल 15, 2021

POST : 1484 अथ: कोरोना कथा : सुनसान हैं सारे तीरथ नदियां सारी ( दिलकश नज़ारा ) डॉ लोक सेतिया

सुनसान हैं सारे तीरथ नदियां सारी ( दिलकश नज़ारा ) डॉ लोक सेतिया 

दुनिया भरके तमाम लोग जीवन भर घूमते रहे जिसकी मिलन की दर्शन की आस लिए नदियां पर्वत तीरथ कभी उसको कभी इसको विधाता समझ कर उसको छोड़ और जाने क्या क्या देखा। प्यास बढ़ती गई इक बूंद पीने को नहीं मिली उस प्यार के अथाह सागर से। ज़िंदगी कब गुज़री मौत सामने खड़ी दिखाई दी तब समझे व्यर्थ भटकते रहे हासिल क्या हुआ। पाप धुले नहीं दर्द मिटे नहीं राहत का कोई एहसास हुआ नहीं। जो खुद हमारे भीतर रहता है कस्तूरी मृग की तरह हम भागते रहे दुनिया भर में उसके पीछे और पाया नहीं अंदर झांका नहीं कभी। आसान था मुश्किल बना दिया मन आत्मा परमात्मा का संबंध बनाना। अंतिम घड़ी तक बाहरी शोर तमाशे को समझते रहे सच है और सच अपने अंदर मरता रहा कभी पहचाना नहीं सत्य ईश्वर को। बोध किया नहीं बुद्ध को पढ़ते रहे दुनिया को जाना खुद को जानना भूल गए।  
 
पावन नदी तालाब और बड़े बड़े आलीशान भवन जिन में तमाम धर्म के ईश्वर देवी देवता खुदा अल्लाह वाहेगुरु जीसस का नाम लिखा है सुनसान नज़र आते हैं। ऊपर किसी आसमान पर बैठा भगवान सोच रहा है कैसे ये करिश्मा हो गया है। शायद लोगों ने पाप करना छोड़ दिया है तभी पाप धोने को पावन नदी में नहाने की ज़रूरत नहीं रही और खुदा से ईश्वर से जीसस वाहेगुरु से हाथ जोड़ मांगने की आदत छोड़ दी खुद कोशिश महनत से काबलियत से जितना हासिल कर सकते हैं उसको पाकर संतुष्ट रहने लगे हैं। इंसान को अपनी ताकत और समझ पर यकीन हो गया है किसी भी भगवान की कोई ज़रूरत ही नहीं रही है। सभी ईश्वर खुदा भगवान अल्लाह यीशु एक ही हैं और अपने बनाये इंसान को अपने खुद बनाये धर्म के जाल से मुक्त हुआ देख कर सभी चिंताओं से मुक्त होकर चैन महसूस करते हैं। 
 
दुनिया बनाने वाले ने इंसान बनाया था और सब कुछ दिया था जीवन बिताने रहने को। बस यही एक दुनिया बनाई थी मगर आदमी को जाने किसलिए क्या क्या हासिल करने की तलाश करने की चाह ने भटकाया इधर उधर और सपनों को सच करने को जो मिला था उसकी कीमत नहीं समझ कर उसको दांव पर लगा दिया। विकास और आधुनिकता के जुआघर में जीतने की धुन में हार का जश्न मनाते सदियां बिता दी इंसान इंसानियत को गंवाकर शराफ़त ईमानदारी छोड़कर ज़मीन पर रहना त्याग ऊपर चांद सूरज आकाश को पाने का लोभ लालच करते करते विनाश की तरफ बढ़ता गया। बेबस होकर झूठे सहारे ढूंढने लगा और नदी तालाब धर्म स्थल जा जाकर वास्तविक उजाले की जगह घने अंधकार और काल्पनिक स्वर्ग-नर्क अंधविश्वास में फंसकर खुद अपने साये से ख़ौफ़ खाने लगा। 

शिक्षा विज्ञान और तर्क शक्ति पर कायरता आडंबर अंधविश्वास अधिक भारी पड़े और समझदारी छोड़ मूर्खताओं की तरफ बढ़ता गया। आखिर इक ऐसा रोग फैला जिस ने दुनिया को विवश कर दिया ये समझने को कि कुदरत से खिलवाड़ कर विकास का आधुनिक ढंग कितना खतरनाक है। और जब सामने इक छोटा सा कीटाणु दैत्याकार खड़ा अट्हास करने लगा और कोई धर्म कोई ईश्वर कोई स्नान कोई दर्शन कोई धार्मिक आडंबर किसी काम नहीं आया करोड़ों लोग उपसना आरती ईबादत करते करते थक गए मगर समस्या मिटाने ये तथाकथित शक्तिमान उपयोगी साबित नहीं हुए तब जाकर इंसान की अक़्ल ठिकाने आई और उसको खुद अपने भरोसे जीने और अपनी दुनिया को वास्तव में अच्छी और रहने के काबिल बनाने को निर्णय करना पड़ा कि जो भगवान जो ख़ुदा अल्लाह जीसस देवी देवता इंसान की रक्षा करने उसको बचाने नहीं आया उसको कब तक मनाते रहें। जो सामने खड़ा है उसी दैत्य को मनाना उसकी मिन्नत करना शायद कारगर हो इस लिए सभी दिन रात उसी के नाम उसके गुणगान करने में लगे हैं। भगवान का बुलावा कभी भी आ सकता है ये बात झूठी साबित हुई है बस इक वायरस का साया हर जगह दिखाई देता है उसी से उस से बचाव की तरकीब पूछते हैं। 
 

                          अथ: कोरोना कथा

 


अप्रैल 13, 2021

POST : 1483 उलझन सुलझती नहीं उलझाने से ( भगवान से इंसान तक ) डॉ लोक सेतिया

     उलझन सुलझती नहीं उलझाने से ( भगवान से इंसान तक ) 

                                    डॉ लोक सेतिया 

        कौन बड़ा है भगवान या मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे।  हमने ईश्वर को सत्य में नहीं आडंबर में खोजा और बिना समझे बिना पाये ही पत्थर को किताब को इमारत को भगवान कहने लगे। किसी ने कहा तुमको ईश्वर से मिलवा सकता हूं और आप उसको ईश्वर से बड़ा समझने लगे और लोग भगवान को सामान बनाकर बेचने लगे। भगवान को इंसान क्या दे सकता है और भगवान को पैसा या कोई उपहार कुछ खाने को कपड़े गहने आरती पूजा ईबादत की अपने गुणगान की क्या ज़रूरत है क्या मिलता है ईश्वर को अपनी आराधना से ख़ुशी महसूस होती है नहीं उपासना करने से बुरा लगता है फिर वो भगवान कदापि नहीं हो सकता है। भगवान के इंसान के बनाये घरों में जाकर माथा टेकने उपसना आरती इबादत करने के बाद इंसान से झूठ छल कपट धोखा और स्वार्थ की खातिर तमाम अनुचित कार्य करते हैं और मानते हैं भगवान के भक्त उपासक हैं। इतना ही नहीं हम ईश्वर से हिसाब किताब रखते हैं लिया दिया बदले में क्या क्या। भगवान को बाज़ार समझ बैठे हैं। 
 
   संसद को लोकतंत्र का मंदिर कहते हैं जिस में वो लोग बैठे हैं जिनको सत्ता के अधिकार और खुद अपने लिए तमाम साधन सुविधा चाहिएं जनसेवा के नाम पर चोरी ठगी लूट की जगह बना दिया। न्याय करने वाले न्याय का आदर नहीं अपने अनादर की चिंता करते हैं। न्यायालय में न्याय की हालत बदहाल है। कुछ नेताओं अधिकारी बने लोग कर्मचारी पुलिस सुरक्षा के लोग दफ़्तर में बैठ जनता को हड़काने वाले अपनी जेबें भरते लोग , कुछ धनवान बने लोगों और बाबा गुरु बनकर पैसा कमाने वाले लोगों ने इंसानियत को ताक पर रखकर कर्तव्य निभाने की जगह अनैतिक आमनवीय आचरण किया है। खुद नहीं जानते मगर आपको समझाते हैं ठग हैं साधु संत महात्मा बने हुए हैं।
 
स्कूल कॉलेज शिक्षक राह भटक कर शिक्षा का कारोबार कर अज्ञानता को बढ़ा रहे हैं। समाजसेवा कह कर अपने स्वार्थ सिद्ध करते हैं चालाक और मक्कार लोग और हम पापी अधर्मी अनुचित कार्य करने वालों को सर झुकाकर सलाम करते हैं और सच बोलने वालों को अपमानित करते हैं। कोरोना क्या है हम नहीं जानते उसका उपाय और रोकथाम को टीका बन गया फिर भी रोग नहीं होगा कोई  नहीं बताता बस यही भगवान सरकार धर्म उपदेशक सभी हैं कहने को भरोसा किसी का नहीं ज़रूरत और वक़्त पर सब बेकार साबित हुए हैं। हमारी नासमझी और मूर्खता कि हमने ऐसे पण्डित पादरी उपदेशक कथावाचक लोगों को ईश्वर से अधिक महत्व देना शुरू कर दिया और उनको धर्म भगवान के नाम पर उचित अनुचित जो मर्ज़ी करते रत्ती भर संकोच नहीं होता है। भगवान ये समझते हैं उनका बंधक बन गया है जिसको ये जैसे मर्ज़ी उपयोग कर सकते हैं। भगवान ने सबको बनाया है बताते हैं लेकिन समझते हैं ईश्वर को उन्होंने बनाया है उसको इनका आभारी होना चाहिए। 
 

 

अप्रैल 03, 2021

POST : 1482 दिखाने को पर्दा करते हैं ( कव्वाली ) डॉ लोक सेतिया

      दिखाने को पर्दा करते हैं ( कव्वाली ) डॉ लोक सेतिया 

हुस्न वाले जलवा अपना , 
दिखाने को पर्दा करते हैं 
 
समझना मत वो चेहरा 
छुपाने को पर्दा करते हैं । 
 
बस देख इक झलक कोई 
हो जाये आशिक़ दीवाना 
 
नज़रों से नज़र चुपके से 
मिलाने को पर्दा करते हैं । 
 
बनते हैं बेखबर तोड़कर 
दिल आशिकों का कितने 
 
बेवफ़ा अपनी बेवफ़ाई 
छिपाने को पर्दा करते हैं । 
 
दिल ही दिल खुश होते 
हुस्न की तारीफ सुनकर 
 
बुरा मानते शर्म हया को 
दिखाने को पर्दा करते है । 
 
जब बेपर्दा बाहर आये तो 
देखा न किसी ने उस दिन  
 
पर्दानशीं क्या बात उनकी 
समझाने को पर्दा करते हैं ।  
 
शोलों को और भड़काने 
आता है मज़ा सताने में  
 
दिलजलों की दिल्लगी 
बढ़ाने को पर्दा करते हैं । 
 
कौन कहता है हुस्न को 
छुपाने को पर्दा करते हैं 
 
चिलमन खुद उठाकर के 
गिराने को पर्दा करते हैं । 



 

POST : 1481 हम जो चाहत में आह भरते हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

हम जो चाहत में आह भरते हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

हम जो चाहत में आह भरते हैं 
जैसे कोई गुनाह करते हैं । 
 
मार कर पत्थरों से अहले-जहां 
पेड़ से फल की चाह करते हैं । 
 
याद करके अतीत हम अपना 
अपनी रातें सियाह करते हैं । 
 
हमको उनसे नहीं गिला कोई 
दिल को हम खुद तबाह करते हैं । 
 
एक सहरा में हम - से दीवाने 
ख़्वाब में सैरगाह करते हैं ।  
 
हम  मुसाफ़िर कहां ठहरते हैं  
नित नई एक  राह करते हैं । 
 
दाद मांगी कभी नहीं  ' तनहा '  
लोग ख़ुद  वाह - वाह करते हैं ।