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जुलाई 23, 2026

POST : 2089 हमें जो ज़िंदगी ने ना सताया होता ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

    हमें जो ज़िंदगी ने ना सताया होता ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया 

हमें जो ज़िंदगी ने ना सताया होता 
उसे हमने भी दुल्हन सा सजाया होता । 
 
मुस्कराना हमें भी आ गया होता , गर 
गले हमको कभी अपने लगाया होता । 
 
किसी तस्वीर की तकदीर बनती हाथों 
ब्रश जो हाथ में मेरे थमाया होता । 
 
मेरी आवाज़ से आवाज़ जो मिल जाती 
सुरीला राग मिलकर साथ गाया होता । 
 
तुझी से हम शिकायत क्यों तुम्हारी करते 
था जितना बोझ मिलकर जो उठाया होता । 
 
बिना मांगे मुहब्बत मिल ही जाती हमको  
तुम्हारे सामने सर ना झुकाया होता । 
 
कभी ना मौत को आवाज़ ' तनहा ' देते 
किसी का साथ उनको रास आया होता । 
 

 

जुलाई 16, 2026

POST : 2085 ख़ुद हमीं मझधार जाते रहे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

     ख़ुद हमीं मझधार जाते रहे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

ख़ुद हमीं मझधार जाते रहे 
जब किनारे पास आते रहे । 
 
अजनबी सब लोग भाये हमें
जो थे अपने वो सताते रहे । 
 
पास , चाहे दूर सबसे रहे 
प्यार की रस्में निभाते रहे ।  
 
आप पंछी की तरह उड़ गए 
मौसमों से आते - जाते रहे । 
 
उनको आना था न आये कभी 
ख़्वाब में आ कर सताते रहे ।  
 
कल कहां था दिल कहां आज है 
ख़ुद ही खोकर दिल को पाते रहे । 
 
बेख़बर लहरों से ' तनहा ' रहे 
रेत के घर  , फिर बनाते रहे । 
 

 
  
 

जुलाई 15, 2026

POST : 2084 आईना झूठ बोलने लगा है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

       आईना झूठ बोलने लगा है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

आईना झूठ बोलने लगा है 
वो तराज़ू भी डोलने लगा है । 
 
अपनी कीमत बड़ा-चढ़ा रहे सब 
अपने को आप तोलने लगा है । 
 
हर तरफ लूटमार हो रही है 
अब लहू सबका खौलने लगा है ।  
 
क्या सियासत की बात पूछते हो 
फिर वही  ज़हर घोलने लगा है । 
 
चोर को छोड़ कोतवाल अब तो 
रह गया कुछ , टटोलने लगा है । 
 
चीज़ अनमोल मिल गई किसी को 
धूल में उसको  रौलने लगा है । 
 
जान से हाथ धोएगा किसी दिन 
' लोक ' सच रोज़ बोलने लगा है ।  
 

 

जुलाई 14, 2026

POST : 2083 हर किसी के अहसान बहुत ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

       हर किसी के अहसान बहुत ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया 

 
हर किसी के अहसान बहुत
दिल के बाक़ी अरमान बहुत । 
 
सीखना क्या है , सीख लिया 
झूठ - सच की , पहचान बहुत । 
 
बस हमीं रहते घर पे सदा 
आते - जाते महमान बहुत । 
 
हमको महफ़िल में देख वहां  
हो गए सब , हैरान बहुत । 
 
मिल रहा बस इंसान नहीं 
मिल ही जाते शैतान बहुत । 
 
कुछ शराफ़त का मोल नहीं 
बिक रहे हैं , ईमान बहुत । 
 
ग़म - ख़ुशी ' तनहा ' एक यहां 
भावनाएं ,  बेजान बहुत ।     
 

 

जुलाई 06, 2026

POST : 2082 लब हैं ख़ामोश अश्क़ पीते हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

    लब हैं ख़ामोश अश्क़ पीते हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

लब हैं ख़ामोश अश्क़ पीते हैं  
लोग कुछ इस तरह भी जीते हैं । 
 
चारागर ढूंढते नहीं हम तो 
आप अपने ही ज़ख़्म सीते हैं । 
 
मयकदे में भी बैठे प्यासे हैं 
जाम मिलते ही जिनको रीते हैं । 
 
हम ख़िज़ा को बहार कह देते 
दिन युंहीं ज़िंदगी के बीते हैं । 
 
माल चोरी का बिक रहा ऐसे 
माप करने को बांस फीते हैं । 
 
आपको फ़ल मिला उसी का है 
कर्म जैसे भी रोज़ कीते हैं । 
 
पूछते लोग कौन ' तनहा ' हैं 
कुछ नहीं हम तो सिर्फ़ मनमीते हैं । 
 

  

जुलाई 05, 2026

POST : 2081 मैं कौन हूं मुझे पता ही नहीं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

 मैं कौन हूं मुझे पता ही नहीं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

 

मैं कौन हूं मुझे पता ही नहीं 
ख़ुद को कभी भी देखता ही नहीं ।  
 
हर रोज़ झूठ बोलते लोग पर 
ये बात कोई मानता ही नहीं । 
 
धनवान को तो सब हैं पहचानते 
मुफ़लिस को कोई जानता ही नहीं । 
 
इक रोज़ मर के जाएंगे सब समझ 
हर क़र्ज़ हो सका अता ही नहीं ।  
 
ज़िंदादिली से ज़िंदगी को जिएं  
थक टूट कर भी हारता ही नहीं ।  
 
खामोश रह के ज़ुल्म सहते रहे 
जो बोलना है बोलता ही नहीं । 
 
' तनहा ' बता जहान में कौन है 
जिस ने कभी भी की ख़ता ही नहीं। 
 

 

जून 20, 2026

POST : 2077 बिकते जहां पे नेता बाज़ार मिल गया है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

 बिकते जहां पे नेता बाज़ार मिल गया है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया 

बिकते जहां पे नेता , बाज़ार मिल गया है
भटके हुओं को आखिर घर- बार मिल गया है ।   
 
अपना नसीब इक दिन शायद बदल ही जाए 
हलवा उन्हें  , हमें बस आचार मिल गया है । 
 
जितने गुनाह उनके सब माफ़ हो गए हैं 
देखो यहां खुला इक दरबार मिल गया है । 
 
सोना जहां पड़ा था , दौलत जहां पड़ी थी 
सब लुट गया है ख़ाली भंडार मिल गया है । 
 
जंगल में अब भी बाक़ी कुछ पेड़ तो खड़े हैं 
कुछ लोग कह रहे हैं विस्तार मिल गया है । 
 
देखो यहां नया इक भगवान आ गया है 
लो आपको ये सारा संसार मिल गया है । 
 
सच बोलना मना है ' तनहा ' न कुछ भी कहना 
बस झूठ लिख रहा है अख़बार मिल गया है ।  
 

 

मार्च 17, 2026

POST : 2071 फिर वही सिलसिला हो गया ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

   फिर वही सिलसिला हो गया ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

 
 
फिर वही सिलसिला हो गया 
बोला सच , वो खफ़ा हो गया । 
 
ज़िंदगी का मैं बोझा लिए 
आदमी से गधा हो गया । 
 
आई कश्ती जो मझधार में 
नाख़ुदा ही ख़ुदा हो गया । 
 
हाल दिल का न पूछे कोई 
जो हुआ , बस हुआ , हो गया ।  
 
हमने इल्ज़ाम सर पर लिया 
क़र्ज़ जितना , अदा हो गया । 
 
हम खड़े थे , खड़े रह गए 
इस तरह वो जुदा हो गया । 
 
ख़ुश है ' तनहा ' उसे देख कर 
दोस्त कितना बड़ा हो गया ।  
 
 

 
 

मार्च 16, 2026

POST : 2070 241 ( Repeat ) ईमान अपना बेच कर कुछ करोड़ में ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

ईमान अपना बेच कर कुछ करोड़ में ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

ईमान अपना बेच कर , कुछ करोड़ में 
शामिल हुए सब लोग इस भाग - दौड़ में ।  
 
अच्छा - बुरा कोई नहीं सोचता यहां  
सारा ज़माना लग गया है जोड़ - तोड़ में ।  
 
देखो तुम्हें ये वक़्त क्या क्या दिखा रहा 
फंसते ही जाते लोग इसकी , मरोड़ में । 
 
हैरान सारा देश उनको ख़बर नहीं 
नुक़सान को कहने लगे लाभ , जोड़ में ।  
 
क्यों कर सभी को साथ लेकर चले नहीं 
अटके खड़े हैं लोग कितने ही , मोड़ में । 
 
नेता यूं करने लग गए प्यार देश को 
उठने लगी हो ख़ाज जैसे कि कोड़ में । 
 
' तनहा ' ज़माना दौड़ता हांफता यहां 
होते नहीं शामिल , कभी आप दौड़ में ।  
 

 

मार्च 14, 2026

POST : 2069 रिमझिम - रिमझिम सी बरसात और होती ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

 रिमझिम - रिमझिम सी बरसात और होती ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया 

 
रिमझिम रिमझिम सी बरसात और होती  
ऐसी कोई  ,  मुलाक़ात और होती ।  
 
कहने को आज रंगीन थी वो महफ़िल
आते तुम भी अगर , बात और होती ।
 
कर लेते हम कभी दिल की उनसे बातें 
होता दिन और , वो रात और होती । 
 
दामन फ़ैला नहीं ये किसी के आगे 
झोली में वरना ख़ैरात और होती । 
 
जो इस दुनिया के बाज़ार में न बिकता 
ऐसे दूल्हे की , बारात और होती ।  
 
बाज़ी हारे थे हम , खेल खेल में ही 
खेले हम होते , शह - मात और होती ।  
 
दुनिया के दर्दो - ग़म सब मिटा दे कोई 
' तनहा ' ऐसी करामात और होती ।  
 

 
   

मार्च 13, 2026

POST : 2068 सच कोई किसी को बताता नहीं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

 सच कोई किसी को बताता नहीं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा ' 

सच कोई किसी को बताता नहीं 
ये लोगों को वैसे भी भाता नहीं ।  
 
कहना तो आसां है मगर फिर भी 
मुश्किल है कि ज़ुबां पे आता नहीं । 
 
हम से वो हमारा पता जान कर 
नाम तक भी अपना बताता नहीं । 
 
मुस्कराया करो अपने हर ग़म पे 
रोने वालों को कोई हंसाता नहीं । 
 
फूल ने अर्थी से किया ये सवाल 
कोई दुल्हन को ऐसे सजाता नहीं । 
 
जा तो रहे हो , पत्थरों के शहर 
लौट के वहां से कोई आता नहीं । 
 
दवा जान के पी जाते हैं कुछ लोग 
ज़हर मरने को , कोई खाता नहीं ।  
 

 
 

मार्च 11, 2026

POST : 2067 ख़ुद से वाक़िफ़ मेरा शहर नहीं है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

  ख़ुद से वाक़िफ़ मेरा शहर नहीं है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा ' 

ख़ुद से वाक़िफ़ मेरा शहर नहीं है  
आम इसके शामो - सहर नहीं है ।  
 
जिस जगह जाकर सब करें इबादत 
क्या कहीं ऐसा , एक घर नहीं है ।  
 
हम समझते हैं आज की हक़ीक़त 
टूटने का ख़्वाबों के , डर नहीं है । 
 
दोस्त सारे , दुश्मन बने हुए हैं 
प्यार सी कोई शै इधर नहीं है । 
 
कर नहीं सकते वो कभी मुहब्बत 
गर उन्हें होना दर - बदर नहीं है ।  
 
मोड़ पर ठहरें हैं कई मुसाफ़िर 
मंज़िलों की , कोई डगर नहीं है । 
 
लोग उन पर , रखते नज़र हमेशा  
सिर्फ़ ' तनहा ' को ही खबर नहीं है ।  
 

 
 

मार्च 06, 2026

POST : 2065 ऐसी भी खताएं कर गए ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

    ऐसी भी खताएं कर गए ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा ' 

ऐसी भी खताएं कर गए  
हम जीने से पहले मर गए ।  
 
दुश्मनों के सितम सहते रहे 
देखा दोस्तों को तो डर गए ।
 
ढूंढते फिरे , यहां - वहां 
बुलाया उसने तो न उधर गए । 
  
पूछा जो हमसे हमारा पता 
जानते नहीं कह मुकर गए ।
 
लिखे थे ख़त हाले दिल के 
रह जेब में मगर गए ।   
 
बाद जाने के सोचा किए 
करना था क्या क्या कर गए । 
 
हम बढ़ा सके न कदम 
कुछ दूर से वो गुज़र गए ।  


 
( 16 मार्च 1996 डायरी से )  
 

 
 
 
 

मार्च 05, 2026

POST : 2063 हमको वापस अभी तो जाना है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

  हमको वापस अभी तो जाना है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा ' 

 
हमको वापस अभी तो जाना है  
इक ठिकाना , कहीं बनाना है ।  
 
लोग कितना बदल गए देखो 
रोज़ , कोई , नया बहाना है । 
 
उम्र भर , कौन साथ देता है 
एक दिन सब ने छोड़ जाना है । 
 
था बुरा कौन कौन अच्छा था 
सिर्फ़ बीता हुआ ,  ज़माना है । 
 
हमको आवाज़ कौन अब देगा 
किसलिए अब हमें बुलाना है । 
 
मुझको इतना ज़रा बताओ तो 
याद रखना , किसे भुलाना है ।
 
चंद सांसें अभी बची ' तनहा '
धड़कता दिल ठहर ही जाना है ।  
 

 

मार्च 03, 2026

POST : 2062 हम जिएं कैसे , हम मरें कैसे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

 हम जिएं कैसे , हम मरें कैसे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा ' 

 
हम जिएं कैसे , हम मरें कैसे  
क्या करें और क्या करें कैसे ।
 
जिस्म घायल है रूह भी घायल 
ज़ख़्म ही ज़ख़्म हैं , भरें कैसे । 
 
वो जो झांसों में उनके आ जाएं 
उनसे दुश्मन भी फिर डरें कैसे । 
 
हम न तदबीर ही करें कोई 
दोष तक़्दीर पर धरें कैसे । 
 
दुश्मनी हम से है ज़माने को 
' तनहा ' उल्फ़त भी हम करें कैसे ।  
 
 

   

फ़रवरी 17, 2026

POST : 2056 उन पे अश्क़ों का कुछ भी असर न हुआ ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

   उन पे अश्क़ों का कुछ भी असर न हुआ ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

उन पे अश्क़ों का कुछ भी असर न हुआ  
हमने सोचा था उन पे मगर न हुआ । 
 
जोड़ कर अपने हाथ सभी थे खड़े 
तब भी सिजदे में अपना सर न हुआ ।
 
उम्र भर घर की लोग तलाश किए 
पर मय्यसर हर एक को घर न हुआ ।
 
फ़ासला अपने बीच बहुत तो न था 
ख़त्म हम दोनों से ही सफ़र न हुआ । 
 
लोग चलने को साथ चले तो सही 
हमसफ़र कोई एक भी पर न हुआ । 
 
दी सदाएं हमने , सब को हरदम 
जो ख़ुला मिलता एक भी दर न हुआ ।
 
धूप में जलते उम्र कटी ' तनहा '
छांव देने को एक शजर न हुआ ।  
 

 
 
 
 
  
  

फ़रवरी 13, 2026

POST : 2054 ईमान अपना बेच कर कुछ करोड़ में ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

    ईमान अपना बेच कर कुछ करोड़ में ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

ईमान अपना बेच कर , कुछ करोड़ में 
शामिल हुए सब लोग इस भाग - दौड़ में ।  
 
अच्छा - बुरा कोई नहीं सोचता यहां  
सारा ज़माना लग गया है जोड़ - तोड़ में ।  
 
देखो तुम्हें ये वक़्त क्या क्या दिखा रहा 
फंसते ही जाते लोग इसकी , मरोड़ में । 
 
हैरान सारा देश उनको ख़बर नहीं 
नुक़सान को कहने लगे लाभ , जोड़ में ।  
 
क्यों कर सभी को साथ लेकर चले नहीं 
अटके खड़े हैं लोग कितने ही , मोड़ में । 
 
नेता यूं करने लग गए प्यार देश को 
उठने लगी हो ख़ाज जैसे कि कोड़ में । 
 
' तनहा ' ज़माना दौड़ता हांफता यहां 
होते नहीं शामिल , कभी आप दौड़ में ।   
 

 

सितंबर 14, 2025

POST : 2018 देशसेवा का खेल देखिए ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

     देशसेवा का खेल देखिए ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा ' 

 
देशसेवा का खेल देखिए 
राजनेता बे-मेल देखिए ।  
 
कौन खोटा है कौन है खरा 
बिक रहे सब ही सेल देखिए । 
 
खून पीकर सरकार चल रही 
क्या सियासत का तेल देखिए । 
 
जुर्म साबित होंगे नहीं कभी 
होगी कैसे फिर जेल देखिए । 
 
बदनसीबी तकदीर देश की 
हो गए ' तनहा ' फेल देखिए ।  
 
 

 

POST : 2017 सांप है आस्तीन का ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

   सांप है आस्तीन का ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा ' 

 
सांप है आस्तीन का 
लो मज़ा और बीन का । 
 
जब नज़र से नज़र मिली 
लुत्फ़ देखा हसीन का । 
 
आज का जश्न क्या कहें 
तेरहा का न तीन का । 
 
खेल पूरा न हो सका  
उस इक तमाशबीन का ।  
 
रात दिन शोर है मचा 
घर है अपना ये टीन का ।  
 
 

 


 
 
 

सितंबर 10, 2025

POST : 2013 अगर ग़म में नहीं शामिल ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

   अगर ग़म में नहीं शामिल ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा ' 

 

अगर ग़म में नहीं शामिल 
मुहब्बत के नहीं क़ाबिल । 
 
चलेंगे साथ मिलकर हम 
सफ़र कोई नहीं मुश्किल । 
 
अदावत छोड़ दी , सबसे 
हुआ कुछ भी नहीं हासिल ।  
 
यहां लाशें कई , जिनका 
मिला अब तक नहीं क़ातिल । 
 
भंवर ढूंढो ,  कहीं ' तनहा ' 
अगर मिलता नहीं साहिल ।