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मार्च 17, 2026

POST : 2071 फिर वही सिलसिला हो गया ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

   फिर वही सिलसिला हो गया ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

 
 
फिर वही सिलसिला हो गया 
बोला सच , वो खफ़ा हो गया । 
 
ज़िंदगी का मैं बोझा लिए 
आदमी से गधा हो गया । 
 
आई कश्ती जो मझधार में 
नाख़ुदा ही ख़ुदा हो गया । 
 
हाल दिल का न पूछे कोई 
जो हुआ , बस हुआ , हो गया ।  
 
हमने इल्ज़ाम सर पर लिया 
क़र्ज़ जितना , अदा हो गया । 
 
हम खड़े थे , खड़े रह गए 
इस तरह वो जुदा हो गया । 
 
ख़ुश है ' तनहा ' उसे देख कर 
दोस्त कितना बड़ा हो गया ।  
 
 

 
 

मार्च 16, 2026

POST : 2070 241 ( Repeat ) ईमान अपना बेच कर कुछ करोड़ में ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

ईमान अपना बेच कर कुछ करोड़ में ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

ईमान अपना बेच कर , कुछ करोड़ में 
शामिल हुए सब लोग इस भाग - दौड़ में ।  
 
अच्छा - बुरा कोई नहीं सोचता यहां  
सारा ज़माना लग गया है जोड़ - तोड़ में ।  
 
देखो तुम्हें ये वक़्त क्या क्या दिखा रहा 
फंसते ही जाते लोग इसकी , मरोड़ में । 
 
हैरान सारा देश उनको ख़बर नहीं 
नुक़सान को कहने लगे लाभ , जोड़ में ।  
 
क्यों कर सभी को साथ लेकर चले नहीं 
अटके खड़े हैं लोग कितने ही , मोड़ में । 
 
नेता यूं करने लग गए प्यार देश को 
उठने लगी हो ख़ाज जैसे कि कोड़ में । 
 
' तनहा ' ज़माना दौड़ता हांफता यहां 
होते नहीं शामिल , कभी आप दौड़ में ।  
 

 

मार्च 14, 2026

POST : 2069 रिमझिम - रिमझिम सी बरसात और होती ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

 रिमझिम - रिमझिम सी बरसात और होती ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया 

 
रिमझिम रिमझिम सी बरसात और होती  
ऐसी कोई  ,  मुलाक़ात और होती ।  
 
कहने को आज रंगीन थी वो महफ़िल
आते तुम भी अगर , बात और होती ।
 
कर लेते हम कभी दिल की उनसे बातें 
होता दिन और , वो रात और होती । 
 
दामन फ़ैला नहीं ये किसी के आगे 
झोली में वरना ख़ैरात और होती । 
 
जो इस दुनिया के बाज़ार में न बिकता 
ऐसे दूल्हे की , बारात और होती ।  
 
बाज़ी हारे थे हम , खेल खेल में ही 
खेले हम होते , शह - मात और होती ।  
 
दुनिया के दर्दो - ग़म सब मिटा दे कोई 
' तनहा ' ऐसी करामात और होती ।  
 

 
   

मार्च 13, 2026

POST : 2068 सच कोई किसी को बताता नहीं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

 सच कोई किसी को बताता नहीं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा ' 

सच कोई किसी को बताता नहीं 
ये लोगों को वैसे भी भाता नहीं ।  
 
कहना तो आसां है मगर फिर भी 
मुश्किल है कि ज़ुबां पे आता नहीं । 
 
हम से वो हमारा पता जान कर 
नाम तक भी अपना बताता नहीं । 
 
मुस्कराया करो अपने हर ग़म पे 
रोने वालों को कोई हंसाता नहीं । 
 
फूल ने अर्थी से किया ये सवाल 
कोई दुल्हन को ऐसे सजाता नहीं । 
 
जा तो रहे हो , पत्थरों के शहर 
लौट के वहां से कोई आता नहीं । 
 
दवा जान के पी जाते हैं कुछ लोग 
ज़हर मरने को , कोई खाता नहीं ।  
 

 
 

मार्च 11, 2026

POST : 2067 ख़ुद से वाक़िफ़ मेरा शहर नहीं है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

  ख़ुद से वाक़िफ़ मेरा शहर नहीं है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा ' 

ख़ुद से वाक़िफ़ मेरा शहर नहीं है  
आम इसके शामो - सहर नहीं है ।  
 
जिस जगह जाकर सब करें इबादत 
क्या कहीं ऐसा , एक घर नहीं है ।  
 
हम समझते हैं आज की हक़ीक़त 
टूटने का ख़्वाबों के , डर नहीं है । 
 
दोस्त सारे , दुश्मन बने हुए हैं 
प्यार सी कोई शै इधर नहीं है । 
 
कर नहीं सकते वो कभी मुहब्बत 
गर उन्हें होना दर - बदर नहीं है ।  
 
मोड़ पर ठहरें हैं कई मुसाफ़िर 
मंज़िलों की , कोई डगर नहीं है । 
 
लोग उन पर , रखते नज़र हमेशा  
सिर्फ़ ' तनहा ' को ही खबर नहीं है ।  
 

 
 

मार्च 06, 2026

POST : 2065 ऐसी भी खताएं कर गए ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

    ऐसी भी खताएं कर गए ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा ' 

ऐसी भी खताएं कर गए  
हम जीने से पहले मर गए ।  
 
दुश्मनों के सितम सहते रहे 
देखा दोस्तों को तो डर गए ।
 
ढूंढते फिरे , यहां - वहां 
बुलाया उसने तो न उधर गए । 
  
पूछा जो हमसे हमारा पता 
जानते नहीं कह मुकर गए ।
 
लिखे थे ख़त हाले दिल के 
रह जेब में मगर गए ।   
 
बाद जाने के सोचा किए 
करना था क्या क्या कर गए । 
 
हम बढ़ा सके न कदम 
कुछ दूर से वो गुज़र गए ।  


 
( 16 मार्च 1996 डायरी से )  
 

 
 
 
 

मार्च 05, 2026

POST : 2063 हमको वापस अभी तो जाना है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

  हमको वापस अभी तो जाना है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा ' 

 
हमको वापस अभी तो जाना है  
इक ठिकाना , कहीं बनाना है ।  
 
लोग कितना बदल गए देखो 
रोज़ , कोई , नया बहाना है । 
 
उम्र भर , कौन साथ देता है 
एक दिन सब ने छोड़ जाना है । 
 
था बुरा कौन कौन अच्छा था 
सिर्फ़ बीता हुआ ,  ज़माना है । 
 
हमको आवाज़ कौन अब देगा 
किसलिए अब हमें बुलाना है । 
 
मुझको इतना ज़रा बताओ तो 
याद रखना , किसे भुलाना है ।
 
चंद सांसें अभी बची ' तनहा '
धड़कता दिल ठहर ही जाना है ।  
 

 

मार्च 03, 2026

POST : 2062 हम जिएं कैसे , हम मरें कैसे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

 हम जिएं कैसे , हम मरें कैसे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा ' 

 
हम जिएं कैसे , हम मरें कैसे  
क्या करें और क्या करें कैसे ।
 
जिस्म घायल है रूह भी घायल 
ज़ख़्म ही ज़ख़्म हैं , भरें कैसे । 
 
वो जो झांसों में उनके आ जाएं 
उनसे दुश्मन भी फिर डरें कैसे । 
 
हम न तदबीर ही करें कोई 
दोष तक़्दीर पर धरें कैसे । 
 
दुश्मनी हम से है ज़माने को 
' तनहा ' उल्फ़त भी हम करें कैसे ।  
 
 

   

फ़रवरी 17, 2026

POST : 2056 उन पे अश्क़ों का कुछ भी असर न हुआ ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

   उन पे अश्क़ों का कुछ भी असर न हुआ ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

उन पे अश्क़ों का कुछ भी असर न हुआ  
हमने सोचा था उन पे मगर न हुआ । 
 
जोड़ कर अपने हाथ सभी थे खड़े 
तब भी सिजदे में अपना सर न हुआ ।
 
उम्र भर घर की लोग तलाश किए 
पर मय्यसर हर एक को घर न हुआ ।
 
फ़ासला अपने बीच बहुत तो न था 
ख़त्म हम दोनों से ही सफ़र न हुआ । 
 
लोग चलने को साथ चले तो सही 
हमसफ़र कोई एक भी पर न हुआ । 
 
दी सदाएं हमने , सब को हरदम 
जो ख़ुला मिलता एक भी दर न हुआ ।
 
धूप में जलते उम्र कटी ' तनहा '
छांव देने को एक शजर न हुआ ।  
 

 
 
 
 
  
  

फ़रवरी 13, 2026

POST : 2054 ईमान अपना बेच कर कुछ करोड़ में ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

    ईमान अपना बेच कर कुछ करोड़ में ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

ईमान अपना बेच कर , कुछ करोड़ में 
शामिल हुए सब लोग इस भाग - दौड़ में ।  
 
अच्छा - बुरा कोई नहीं सोचता यहां  
सारा ज़माना लग गया है जोड़ - तोड़ में ।  
 
देखो तुम्हें ये वक़्त क्या क्या दिखा रहा 
फंसते ही जाते लोग इसकी , मरोड़ में । 
 
हैरान सारा देश उनको ख़बर नहीं 
नुक़सान को कहने लगे लाभ , जोड़ में ।  
 
क्यों कर सभी को साथ लेकर चले नहीं 
अटके खड़े हैं लोग कितने ही , मोड़ में । 
 
नेता यूं करने लग गए प्यार देश को 
उठने लगी हो ख़ाज जैसे कि कोड़ में । 
 
' तनहा ' ज़माना दौड़ता हांफता यहां 
होते नहीं शामिल , कभी आप दौड़ में ।   
 

 

सितंबर 14, 2025

POST : 2018 देशसेवा का खेल देखिए ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

     देशसेवा का खेल देखिए ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा ' 

 
देशसेवा का खेल देखिए 
राजनेता बे-मेल देखिए ।  
 
कौन खोटा है कौन है खरा 
बिक रहे सब ही सेल देखिए । 
 
खून पीकर सरकार चल रही 
क्या सियासत का तेल देखिए । 
 
जुर्म साबित होंगे नहीं कभी 
होगी कैसे फिर जेल देखिए । 
 
बदनसीबी तकदीर देश की 
हो गए ' तनहा ' फेल देखिए ।  
 
 

 

POST : 2017 सांप है आस्तीन का ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

   सांप है आस्तीन का ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा ' 

 
सांप है आस्तीन का 
लो मज़ा और बीन का । 
 
जब नज़र से नज़र मिली 
लुत्फ़ देखा हसीन का । 
 
आज का जश्न क्या कहें 
तेरहा का न तीन का । 
 
खेल पूरा न हो सका  
उस इक तमाशबीन का ।  
 
रात दिन शोर है मचा 
घर है अपना ये टीन का ।  
 
 

 


 
 
 

सितंबर 10, 2025

POST : 2013 अगर ग़म में नहीं शामिल ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

   अगर ग़म में नहीं शामिल ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा ' 

 

अगर ग़म में नहीं शामिल 
मुहब्बत के नहीं क़ाबिल । 
 
चलेंगे साथ मिलकर हम 
सफ़र कोई नहीं मुश्किल । 
 
अदावत छोड़ दी , सबसे 
हुआ कुछ भी नहीं हासिल ।  
 
यहां लाशें कई , जिनका 
मिला अब तक नहीं क़ातिल । 
 
भंवर ढूंढो ,  कहीं ' तनहा ' 
अगर मिलता नहीं साहिल ।  
 

 
 

सितंबर 08, 2025

POST : 2012 कभी तो किसी से मुलाक़ात होगी ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

 कभी तो किसी से मुलाक़ात होगी ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

 
कभी तो किसी से मुलाक़ात होगी  
किसी मोड़ पर कुछ नई बात होगी ।  
 
अगर ज़िक्र सावन के मौसम का आया 
तभी आंसुओं की ही बरसात होगी ।  
 
न कोई खिलाड़ी मुक़ाबिल में होगा 
न बाज़ी लगेगी न शह - मात होगी ।  
 
ज़माने हमारी भी अर्थी उठेगी 
कई  हसरतों की भी बरात होगी । 
 
हुई बंद पलकें न फिर खुल सकेंगी 
किसी रोज़ ' तनहा ' हंसी रात होगी ।  
 
 

 

सितंबर 04, 2025

POST : 2009 दर्द की क्या दवा हम नहीं जानते ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

 दर्द की क्या दवा हम नहीं जानते ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

 

 
दर्द की क्या दवा हम नहीं जानते 
चारागर का कहा हम नहीं मानते ।  
 
शोर चारों तरफ मिल गया इक ख़ुदा 
हम मगर सब खुदाओं को पहचानते । 
 
आस्मां को समझते हैं जो सायबां 
काग़ज़ी चादरें  , वो नहीं तानते । 
 
मुश्किलें लाख हैं हौसलें कम नहीं 
हार मानी नहीं , जीत ही ठानते ।
 
ग़ुम हुई मंज़िलें , खो गए कारवां 
ख़ाक राहों की ' तनहा ' रहे छानते ।  
 
 
 
 

 

सितंबर 03, 2025

POST : 2008 आ भी जाओ हमें अब लगा लो गले ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

  आ भी जाओ हमें अब लगा लो गले ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

आ भी जाओ हमें अब लगा लो गले  
दोस्तो ख़त्म कर के सभी फ़ासले ।  
 
है यही आरज़ू हमसफ़र जो बने 
उम्र भर हाथ में हाथ लेकर चले । 
 
ये मुलाक़ात कितनी सुहानी है अब 
थम ही जाएं ये घड़ियां यहीं दिन ढले ।  
 
प्यार का एक पौधा उगा कर उसे 
दो दुआएं  कि  वो खूब फूले फले ।
 
कौन देगा नसीहत उन्हें फिर भला 
मानते ही नहीं आजकल मनचले । 
 
सिर्फ़ उनके सहारे है ये  ज़िंदगी 
दर्द बन कर मेहरबान दिल में पले ।   
 
महफ़िलें ढूंढते फिर रहे लोग अब 
वो जो कहते कभी थे हैं 'तनहा' भले ।  
 
 दिल को छूने वाली ग़ज़ल
 
 

अगस्त 25, 2025

POST : 2002 तकदीर से कुछ मिला नहीं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ( बाईस वर्ष पुरानी लिखी ग़ज़ल 2003 की डायरी से )

       तकदीर से कुछ मिला नहीं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

                     (  बाईस वर्ष पुरानी लिखी ग़ज़ल 2003 की डायरी से )  

तक़दीर से कुछ मिला नहीं 
दुनिया से शिकवा गिला नहीं । 
 
इक शाख़ से फूल टूटकर 
मुरझा गया फिर ख़िला नहीं ।  
 
वो ज़ख़्म दिल के करीब है 
जो चारागर से सिला नहीं । 
 
इस शहर का नाम दर्द है 
हमदर्द कोई मिला नहीं ।  
 
मंज़िल नहीं हमसफ़र नहीं 
आता नज़र काफ़िला नहीं । 
 
तूफ़ान आ कर गुज़र गए 
वो पेड़ उनसे हिला नहीं । 
 
' तनहा ' अकेले खड़े हुए 
बाक़ी रहा सिलसिला नहीं ।  
 

 


 
 

मई 25, 2025

POST : 1972 एक हम हैं इक ख़ुदा है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

    एक हम हैं इक ख़ुदा है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा ' 

 
एक हम हैं इक ख़ुदा है 
बस वही सब जानता है । 

बेवजह क्यों लड़ रहे हैं 
हर किसी से ही गिला है ।
 
मौत बन जाती तमाशा 
क्या अजब ये हादिसा है । 
 
सब पुराने दोस्त अपने 
पर ज़माना अब नया है । 
 
ज़हर सबसे पूछता है 
क्या मुझे तुमने चख़ा है । 
 
नफरतों का दौर है अब 
प्यार करने की सज़ा है । 
 
बोलते हैं सच सभी बस 
झूठ ' तनहा ' बोलता है । 
 

 

मई 24, 2025

POST : 1971 सियासत बोझ बनती जा रही है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

सियासत बोझ बनती जा रही है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा ' 

 
सियासत बोझ बनती जा रही है 
विरासत आपको समझा रही है ।
 
नज़र तिरछी हुई सत्ता की देखो 
लो सबको याद नानी आ रही है ।  
 
भरोसा अब नहीं कोई भी बाकी 
हक़ीक़त देख कर पछता रही है । 
 
जो शोले राख में दहके हुए हैं 
उसे वो रौशनी बतला रही है । 
 
हुआ क्या हाल ' तनहा ' देश का है
फसल को बाड़ चरती जा रही है । 
 
 

 
 

POST : 1970 किसी दिन हम अपनी कहानी लिखेंगे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

किसी दिन हम अपनी कहानी लिखेंगे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा ' 

 
 
किसी दिन हम अपनी कहानी लिखेंगे 
जहां प्यास लिखना हो पानी लिखेंगे । 
 
बुरा वक़्त आया नहीं दोस्त कोई 
की सबने बड़ी मेहरबानी लिखेंगे । 
 
वो बेदर्द ज़ालिम लुटेरे थे बेशक 
मगर थे सभी खानदानी लिखेंगे । 
 
न पूछा कभी नाम क्या आपका है 
है तस्वीर किस की पुरानी लिखेंगे । 
 
हुई थी मुलाक़ात ख्वाबों में ' तनहा '
उसे अपने सपनों की रानी लिखेंगे ।