अप्रैल 30, 2024

सांसद - विधायक बनने का मोल ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

  सांसद - विधायक बनने का मोल ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

कितना सरल उपाय है पहले समझ क्यों नहीं आया सब मिल बैठ सोच रहे हैं , ये कुछ कुछ सर्वदलीय बैठक जैसा है । उन्होंने अपना नाम जगज़ाहिर नहीं करने की शर्त रखी है इक ऐसा तरीका खोज लिया है की नेता जनता दोनों का भला भी होगा और ख़ुश भी सभी लोग हो जाएंगे । सभी जनप्रतिनिधि निर्वाचित किये जाएंगे इसी ढंग से और अधिकांश समस्याओं का समाधान अपने आप निकल जाएगा । चुनाव का समय आने से पहले खुली बोली जैसा प्रावधान किया जाना संभव है , किसे क्या बनना है उसकी बढ़ चढ़ कर कीमत लगानी होगी । कौन कितने हज़ार करोड़ खर्च कर सांसद बनना चाहता है सबसे बड़ी बोली लगाने वाले को उतना धन साल भर में अपने क्षेत्र पर खर्च कर संसदीय क्षेत्र का कायाकल्प करना होगा । राजनीति जब व्यौपार बन चुका है तो लाज शर्म कैसी नंगा नाच होगा शादी पर दूल्हे वाले नोटों की बारिश करते हैं जैसे । बस एक साल में पहले जो करना है कर दिखाओ फिर चार साल मौज मनाओ । लोकतंत्र ही होगा मगर अग्रिम भुगतान से पहले देना होगा बाद की बात कौन याद रखता है । हां सिर्फ धनवान लोग ही सांसद विधायक से नगरपरिषद प्रतिनिधि बन सकेंगे तो कोई बात नहीं गरीब लोग ऐसा ख़्वाब नहीं देखते हैं उनको चांद भी रोटी लगता है । कोई खड़ा हुआ कहने लगा चुनाव आयोग इस की अनुमति देगा क्या , तब इक राज़ खोला गया की पहले इक प्रधानमंत्री का चुनाव किसी अदालत ने रद्द कर दिया था कभी लेकिन इक नेता ने प्रधानमंत्री बनने के बाद चुनाव आयोग को इक पत्र भेजा था जिस में ये उपाय किया गया था कि भविष्य में प्रधानमंत्री की चुनावी सभाओं का प्रबंध और खर्च सरकार अपने खज़ाने से किया करेगी । विकास की राह में जो भी बाधा आए उसे हटाया जा सकता है , ये नैतिकता आदर्श और मर्यादा की खोखली बातें किसी और ज़माने की हैं । चूहों की सभा ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया है लेकिन वही पुरानी पहेली बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधेगा और कब ऐसा आधुनिक संविधान बनाकर लागू होगा । प्रयोजक तैयार हैं अब इलेक्टोरल बॉब्ड नहीं सीधा धंधा होगा जब नाचन लागी तो घूंघट काहे । 
 
आपको ये तौर तरीका पसंद नहीं आया तो क्या हुआ अभी तक जो रंग ढंग चलता रहा उसे कौन लोकतंत्र कहता है । सब ऐसा करते हैं उस ने किया तो क्यों हाय तौबा सभी समझाते हैं लगता है हमने मंज़ूर कर लिया है इसी को जीना कहते हैं घुट घुट कर अश्क़ पीना जनता का नसीब है । सरकार ने कब से हर काम अनुबंध पर ठेके पर किसी निजी क्षेत्र को सौंप जान छुड़ा ली है राजनेताओं अधिकारी वर्ग से पुलिस न्यायपालिका तो क्या अख़बार टीवी मीडिया वाले केवल एक ही विषय पर सारा ध्यान रखते हैं कि सरकार चल रही है चलती जा रही है । कोल्हू के बैल की तरह आंखों पर पट्टी बंधी है और सबको लगता है हमने कितना सफर तय कर लिया है जबकि देश वहीं का वहीं अटका हुआ है । आपको बात समझ नहीं आई ये नया बाज़ार का नया दस्तूर है जो खुद बिका हुआ हो वही कुछ भी खरीद सकता है , धनवान खरीदार लगते हैं मगर होते खुद बिके हुए हैं । लेबल से पता चलता है किस की डोर किस के हाथ है कठपुतली का नाच है देश की राजनीति । अब तो सभी सरकारें आदमी पर भरोसा नहीं करती मशीन ऐप्प पर पूरा विश्वास है जबकि तमाम सरकारी वेबसाइट अपने ही बोझ तले कब दम तोड़ देती है पता नहीं चलता उनकी सांस रुक रुक कर चलती है कभी थम भी जाती है तब सभी को इंतज़ार करना पड़ता है । भारत देश की व्यवस्था क्या जनतंत्र और आज़ादी तक सब जाने किस किस देश किस किस कंपनी के हाथ का खिलौना बन गई है । ठेकेदारी को लेकर मुझे अच्छी जानकारी है क्योंकि मेरे पिता दादा भाई बंधू सभी यही काम करते रहे हैं । मैं नाकाबिल साबित हुआ जो उनकी राह छोड़ इस लेखन और आयुर्वेदिक प्रणाली में जीवन भर खूब मेहनत की और नतीजा कभी इक धेला कमाई नहीं की खोटा सिक्का साबित हुआ पिताजी की तिजोरी का । अधिकांश लोग परिवार में कम पढ़े लिखे थे मैंने पढ़ाई की लेकिन किस काम की पढ़ाई जब नहीं की कमाई , ठेकेदारी समझ आई होती तो आज किसी बड़े पद पर बैठा सौदेबाज़ी कर मालामाल हो सकता है , लेकिन खुद को बेचना मुझे मंज़ूर नहीं अन्यथा दिल्ली कोई दूर नहीं ।  



 

अप्रैल 29, 2024

संविधान की आत्मा का संदेश ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

    संविधान की आत्मा का संदेश ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

 जाँनिसार अख़्तर जी का शेर है , शर्म आती है कि उस शहर में हम हैं कि जहां , ना मिले भीख तो लाखों का गुज़ारा ही न हो । अब यही हाल देश का है जब सरकार करोड़ों लोगों को मुफ़्त राशन देने की बात करती है जिस का अर्थ गरीबी भूख से 80 करोड़ जनता बदहाल है । अनुचित आपराधिक है जब उस समय एक एक नेता पर हर दिन करोड़ों खर्च नहीं बर्बाद किए जाते हैं ऐसे हज़ारों पद हैं देश की राजधानी में राष्ट्रपति से लेकर शहर शहर तक इक जाल फैला है ।  
 
आपको किसी और से कुछ नहीं चाहिए आपको ख़ुद अपने आप को ठीक से पहचानना ज़रूरी है , मैं सिर्फ एक किताब या दस्तावेज़ नहीं हूं । सबसे महत्वपूर्ण बात है कि मेरा अस्तित्व किसी की कलम कागज़ से नहीं है  ,  संविधान बनाया गया उस से अधिक महत्वपूर्ण विषय है कि , आपने देश की जनता ने उसे अपनाया है । यही शुरुआत है हम भारत के लोग वी दी पीपल ऑफ़ इंडिया , अपने संविधान को अपनाते हैं लागू करते हैं । तो सबसे पहले इस को समझना आवश्यक है कि कोई भी व्यक्ति या कोई संगठन अथवा राजनीति करने वाला दल जनता को कुछ भी नहीं देता है और न ही कभी किसी राजनेता अथवा दल की कोई सरकार बनी और न ही कभी बन सकती है । सरकार देश की होती है और जनता द्वारा बनाई जाती है जब तक ये बुनियादी बात सभी नहीं समझते तब तक लोकतंत्र का वास्तविक शासन जो जनता का राज होना चाहिए नहीं कायम किया जा सकता है । जनता को कोई राजनेता या संगठन अथवा संस्था तो क्या न्यायपालिका प्रशासन कोई भी कुछ भी दे नहीं सकता है बल्कि उनको नियुक्त मनोनीत किया गया है निर्वाचित किया गया है जैसा देश का संविधान निर्देश देता है वो करना उनका दायित्व है और नहीं करना अनुचित और असंवैधानिक । आज़ादी के 76 साल बाद जब लगता है कि वास्तविक आज़ादी देश के सभी नागरिकों को हर प्रकार की समानता अभी लगता है इक ऐसा ख़्वाब है जिसे सच करने की कोशिश तो दूर की बात उस को लेकर सार्थक विमर्श तक कोई नहीं करता है । संविधान की अवधारणा है सभी लोग देश सेवा को समर्पित ईमानदार और निस्वार्थी प्रतिनिधि अपने बीच से चयन कर सदन में भेजें जो लोकसभा अथवा विधानसभा में निर्वाचित सदस्यों में से काबिल और सभी पक्षों का आदर करने वाला कोई अपना नेता चुनकर संसद द्वारा जनता की कल्याणकारी सरकार का गठन करने का कर्तव्य निभाएं । संविधान में किसी दल या गठबंधन को लेकर कोई धारणा नहीं बताई गई है । लोकतंत्र में सत्तापक्ष प्रतिपक्ष परस्पर विरोधी नहीं बल्कि शासन और सरकार की बहती नदिया को अपनी सीमा में बनाए रखने वाले किनारे हैं , और बहाव को उचित राह पर नदी की गरिमा और लोकतंत्रिक मर्यादा में रखना अनिवार्य इक परंपरा रही है । सदन के नेता बनकर खुद को अन्य सभी से ताकतवर या बड़ा समझना संविधान की भावना और जनमत का निरादर होगा । अच्छा प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री सभी सदस्यों को आदर देकर सभी की राय को समझ कर इक तारतम्य कायम रखता है । 

अब जो होता है वो देश के संविधान , लोकतंत्र के अनुरूप नहीं है , सदन का सदस्य चुनने से पहले कोई दल या गठबंधन किसी को पहले से प्रधानमंत्री मुख्यमंत्री घोषित कर संवैधानिक नियम की मर्यादा को दरकिनार कर बाद में निर्वाचित सदस्यों का सदन का नेता चुनने का अधिकार छीन उसे इक औपचारिकता बना देता है । प्रधाममंत्री मुख्यमंत्री संविधान के अनुसार अन्य सदस्यों के समान ही होता है नेता होना अर्थात किसी समूह का मार्गदर्शक होना न कि अन्य को अपने आधीन समझना , कितनी अचरज की बात है कि सभी राजनीतिक दलों ने अलोकतांत्रिक ढंग से नियम बनाकर अपने अपने दल के सदस्यों को किसी बंधक की तरह विवश कर दिया है की उनकी बात से असहमत या विपरीत राय होने पर भी गुलाम की तरह चुपचाप किसी के पीछे चलना पड़ेगा । लोकतंत्र तो संसद विधानसभाओं के सदस्यों को जनता की बात कहने का अधिकार देता है मगर इस तरह से तो खुद निर्वाचित सदस्य का अपना अधिकार छिन जाता है । इधर अक्सर लोग सवाल करते हैं कि प्रधानमंत्री मुख्यमंत्री कुछ ख़ास नामों से ही कोई हो सकता है जो अनुचित है , आपको याद नहीं जवाहरलाल नेहरू जी के बाद लाल बहादुर शास्त्री जी को सदन का नेता चुना गया तो किसी को पहले से कुछ पता नहीं था बल्कि जब मंच से उनका नाम प्रस्तावित किया गया तब सभी ढूंढने लगे की शास्त्री जी कहां हैं । कोई भरोसा करेगा कि वो सभागार में आखिर में प्रवेश द्वार की सीढ़ियों पर नीचे बैठे थे इस निर्णय से अनभिज्ञ । तब उनको आगे लाया गया और कुर्सी पर बैठने को कहा गया । जिस संसद में जोड़ तोड़ और खरीद फ़रोख़्त होकर सरकार बनती है उसे संविधान और लोकतांत्रिक मर्यादा को तार तार करना कहते हैं । 
 
अगर लोकतंत्र है और किसी परिवार का सदस्य होना कोई महत्व नहीं रखना चाहिए तो किसी दल या संगठन का किसी व्यक्ति विशेष को शासक घोषित करना गुलामी की मानसिकता एवं कुछ लोगों का सत्ता को अपने इशारों पर चलाने का प्रयास जनहित और जनभावनाओं के ख़िलाफ़ है । कब किसने कैसे किया जो भी हो लेकिन संविधान को बहुमत के दम पर अपनी सुविधा से बदलना अनुचित था जिसे होने देना इक अपराध था जो किया जाता रहा है । किसी भी तरह शोहरत मिलना किसी को किसी पद के योग्य नहीं बनाता है वैसे भी आजकल शोहरत बदमाशी करने वालों को अधिक मिलती है शराफ़त से रहने वालों के बजाय । आपको जितने भी लोग खबरों में मिलते हैं अधिकांश ऐसे ही दिखाई देते हैं , शर्म आती है जब किसी बाहुबली अपराधी को कोई दल अपना उम्मीदवार बनाता है जीतने की संभावना को देख कर । धीरे धीरे देश की राजनीति की गंगा इतनी मैली हो गई है कि जनता के पास विकल्प ही गलत लोगों से किसी एक का चुनाव करने का बचा है । नोटा विकल्प भी व्यर्थ है जब उसे अधिक लोग दबाएं तब भी चुना उन्हीं से कोई जाएगा फिर ये विकल्प किस काम का है । 
 
संविधान की बात सभी करते हैं पढ़ता कोई नहीं ये कितना अजीब है , आपको संक्षेप में मौलिक अधिकारों एवं कर्तव्यों की बात बताने से पहले जो कड़वी बात कहना ज़रूरी है वो ये है कि हमको किसी राजनेता किसी राजनीतिक दल किसी विचारधारा से पहले देश और संविधान को रखना चाहिए और अपने अपने स्वार्थ को छोड़ समाज को महत्व देना होगा । परिवारवाद जितना अनुचित है व्यक्तिवाद उस से भी अधिक अनुचित है अत: हमको किसी से प्रभावित होने से पहले निष्पक्ष होकर उसकी मानसिकता पर विचार करना चाहिए । जिस भी शासक को चाटुकारिता अपना गुणगान पसंद हो वो न्याय और कानून की समानता पर कभी खरा साबित नहीं हो सकता है । खरी बात ये कहना चाहता हूं कि क्या एक सौ चालीस करोड़ लोगों से हम 542 अच्छे ईमानदार प्रतिनिधि नहीं खोज सकते , क्यों देश की संसद जो लोकतंत्र का पवित्र मंदिर है वहां अपराधी और गुंडे बदमाश बैठे दिखाई देते हैं । कुछ लोक जो खुद को लोकतंत्र का स्तंभ घोषित करते हैं वास्तव में अपना कर्तव्य भुला कर खुद ही अपना गुणगान कर अभ्व्यक्ति की आज़ादी के नाम पर मनमानी कर अपना उल्लू साधने में लगे हैं लेकिन खेद है कि हम टीवी सोशल मीडिया से परववित होकर निर्णय लेने लगे हैं । मैंने कुछ साल पहले इक आलेख लिखा था देश का सबसे बड़ा घोटाला , जो टीवी अख़बार को मिलने वाले सरकारी विज्ञापन हैं , जिस भी धन से जनता का कोई भला नहीं होता हो और केवल किसी को फायदा पहुंचाने को सरकारी खज़ाने का उपयोग किया जाता हो वो भ्रष्टाचार ही होता है । देश के खज़ाने की लूट में खुद मीडिया टीवी चैनल शामिल हैं ऐसे में इस गंभीर विषय पर ध्यान कौन दिलवाएगा , जिन का दावा है बड़ी तेज़ गति से दौड़ रहे हैं सरकारी विज्ञापन की बैसाखियों का सहारा नहीं मिले तो झट से नीचे गिर जाएं । बिका ज़मीर कितने में हिसाब क्यों नहीं देते , सवाल पूछने वाले जवाब क्यों नहीं देते । अभी भ्रामक विज्ञापन देने को लेकर किसी को सुप्रीम कोर्ट ने अपराधी माना है लेकिन जिन टीवी अखबार वालों ने विज्ञापन छाप कर दिखला कर कितना पैसा बनाया क्या वो जुर्म में शामिल नहीं समझे जाने चाहिएं क्योंकि उनको सब पता रहता है कोई भी बहाना काम नहीं आएगा , चोर चोर मौसेरे भाई हैं विज्ञापन देने वाले और प्रकाशित करने छापने दिखाने वाले ।
 
पचास साल पहले सरकार या विभाग इश्तिहार देते थे अपनी योजनाओं की जानकारी देने को और जन साधारण को जागरुक करने के मकसद से । अब हमने इतने साल शासन किया जैसे आयोजन और उनका प्रचार खुद का महिमामंडन अनुचित है । कोई राजनेता अगर भाषण में अथवा इश्तिहार में जनता को कुछ भी देने का गुणगान करता है तो इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता क्योंकि किसी राजनेता या दल ने खुद अपनी निजी आय जायदाद से नहीं बल्कि देश में जनता से ही प्राप्त तमाम तरह से करों से एकत्र धन को खर्च कर अपना कर्तव्य निभाया होता है । इसको अनुकंपा नहीं कहलाया जा सकता है , वास्तविकता विपरीत है पहले सत्ता पर बैठे लोग सादगी से जीवन बिताते थे जबकि आजकल प्रधानमंत्री मुख्यमंत्री तो क्या अधिकारी से सभी निर्वाचित प्रतिनिधि शानो-शौकत से मौज मस्ती कर देश की गरीबी की बातें करने का मज़ाक़ ही किया करते हैं ।  हमारे राजनेताओं का किरदार कभी ऊंचा होता था जिस से सभी को त्याग करने का प्रोत्साहन मिलता था जबकि अब मैं चाहे जो करूं मेरी मर्ज़ी की मिसाल देख सभी सकते में हैं । आखिर में देश के संविधान में जिन अधिकारों और जिन कर्तव्यों का उल्लेख है उनकी बात से पहले इक ताज़ा ग़ज़ल मेरी पेश करता हूं ।

 ग़ज़ल - डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

 
इस क़दर किरदार बौना हो गया है
आस्मां , जैसे      बिछौना हो गया है ।
 
घर बनाया था कभी शीशे का तुमने 
किस तरह , टूटा खिलौना हो गया है । 
 
मथ रहे पानी मिले क्या छाछ मख़्खन 
शख़्स  , पानी में चलौना ,  हो गया है ।
 
है निराला  , आज का , दस्तूर भाई 
बिन बियाहे सब का गौना हो गया है । 
 
छान कर सब पीस कर कितना संवारा 
फिर हुआ क्या सब इकौना हो गया है । 
 
पी गया कितने ही दरिया को वो सागर 
था उछलता , और  , पौना हो गया है ।
 
ख़ूबसूरत था जहां ' तनहा ' हमारा 
हर नज़ारा अब , घिनौना हो गया है ।
 
 

 संविधान , अधिकार और कर्तव्य :-   

 प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य होगा :- 


(ए) संविधान का पालन करना और उसके आदर्शों और संस्थानों, राष्ट्रगान और राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान करना।

(बी) हमारे राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम को प्रेरित करने वाले महान आदर्शों को संजोना और उनका पालन करना।

(सी) भारतीय राष्ट्र की एकता, संप्रभुता और अखंडता को बनाए रखना और उसकी रक्षा करना।

(डी) देश की रक्षा करना और जब भी ऐसा करने के लिए कहा जाए तो राष्ट्रीय सेवा प्रदान करना।

(ई) धार्मिक, भाषाई और क्षेत्रीय या अनुभागीय विविधताओं से परे भारत के सभी लोगों के बीच सद्भाव और समान भाईचारे की भावना को बढ़ावा देना; महिलाओं की गरिमा के प्रति अपमानजनक प्रथाओं का त्याग करना।

(च) हमारी समग्र संस्कृति की समृद्ध विरासत को महत्व देना और संरक्षित करना।

(छ) वनों, झीलों, नदियों और वन्य जीवन सहित प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और सुधार करना और जीवित प्राणियों के प्रति दया रखना।

(ज) वैज्ञानिक स्वभाव, मानवतावाद और जांच और सुधार की भावना विकसित करना। 

(i) सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना और हिंसा का त्याग करना।

(जे) व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधि के सभी क्षेत्रों में उत्कृष्टता की दिशा में प्रयास करना ताकि राष्ट्र लगातार प्रयास और उपलब्धि के उच्च स्तर तक पहुंच सके।

(के) जो माता-पिता या अभिभावक है, वह छह से चौदह वर्ष की आयु के बीच के अपने बच्चे या, जैसा भी मामला हो, प्रतिपाल्य को शिक्षा के अवसर प्रदान करेगा।

 

भारतीय संविधान द्वारा गारंटीकृत छह मौलिक अधिकार हैं ।

 वे इस प्रकार हैं :-   समानता का अधिकार  ,   स्वतंत्रता का अधिकार ,   शोषण के विरुद्ध अधिकार  ,  धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार  ,    सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार  ,   संवैधानिक उपचारों का अधिकार

 


 

 
 

अप्रैल 25, 2024

भय बिनु होई न प्रीति ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

      भय बिनु  होई  न प्रीति  ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

साम दाम दंड भेद सब आज़मा लिया फिर भी संशय है कि जिसकी चाहत में दिल बेकरार है उस पर कुछ असर दिखाई नहीं देता है । लालच प्रलोभन से भगवान के नाम पर ही दे दो से भी यकीन नहीं आया तो भयभीत करने का ब्रह्मास्त्र उपयोग करने लगे हैं । मुझ से अच्छा कौन है भले मुझ में लाख अवगुण हैं तब भी वरमाला उस को पहनाई तो वो सभी कुछ छीन लेगा मेरा क्या है पहले से कुछ छोड़ा ही नहीं तुम्हारा सब मेरा ही है मुझे खुद सौंपना ख़ुशी ख़ुशी से मेरी प्रीति की निशानी है । जिस को सब कुछ खोने का डर होता है वही घबरा कर ऐसे ढंग अपनाता है । डर फ़िल्म का नायक नायिका से पागलपन की हद तक मुहब्बत करने का दम भरता है तू हां कर या ना कर तू है मेरी किरन । ये आशिक़ी का भूत जिस किसी पर सवार होता है वो वहशीपन की सीमा तक अपनी ही माशूका की जान का दुश्मन बन जाता है । कुछ साल पहले इक प्रदेश में सरकार ने ऐसे मजनुओं के ख़िलाफ़ अभियान चलाया था , लेकिन जिनका सिक्का खोटा भी चलता है ऐसे भी रुतबे वाले लोग हुआ करते हैं जो अपहरण कर भी जिसे चाहते हैं उस से विवाह कर लिया करते हैं । कुछ ऐसा ही इक शासक का हाल है सत्ता सुंदरी से बिछुड़ने का भय सताने लगा तो खुद नहीं जानते क्या से क्या हो गए हैं । पहले समझाया कि अभी तक तो मैंने कुछ किया ही नहीं सिर्फ ट्रेलर था जिसे देखा तुमने आगे जो कभी सपने में नहीं सोचा तुमने वो चांद सितारे तोड़ कर दामन भर दूंगा बस मुझे छोड़ किसी का ख़्याल भी मन में नहीं लाना । देखो मेरे वचन निभाने की बात मत करना तुमको तो अपने वचन निभाने हैं , सत्ता की कुर्सी कहने लगी भला मैंने कब किसी का साथ देने की शपथ उठाई कभी भी । यहां जितने भी आये हैं और आएंगे उनको शपथ उठानी पड़ती है मैं तभी मिलती हूं , मुझ पर बैठते खुद को मुझसे ऊंचा समझने वालों का अंजाम यही होता है । भूल गए कभी कहते थे मेरा क्या है जब चाहा झोला उठा कर घर छोड़ चला जाऊंगा । 
 
दिन का चैन रातों की नींद खो जाती है साहब आपको इश्क़ हो गया है ना ना करते प्यार उसी से कर बैठे जिस सत्ता सुंदरी का स्वभाव ही है जो भी उसका होता है बेवफ़ाई का सबक पहले दिन पढ़ना चाहता है । मुझ से पहले किस किस ने तुमसे क्या वादे किए तुमने किसी से वफ़ा निभाई या हुई बेवफ़ाई सब को दिल से भुला दो अपना साथ कभी नहीं टूटेगा ये हाथ मेरे हाथों से नहीं छूटेगा , कितने मधुर स्वर से ये ग़ज़ल उसे सुनाई । रेगिस्तान में फूल खिले हैं वीराने में बहार आई पांच साल तलक बजती रही शहनाई किसी ने बंसी बजाई किसी ने डफ़ली की धुन पर नचाया दोनों की आंख खुली तब जब चुनाव सामने आया । अचानक किसी ने नींद से जगाया शर्तनामा पढ़ कर सुनाया सत्ता का नशा उतरा तब समझ आया खूब भरपेट खाया बड़ा मज़ा आया मगर अब दूध फटने लगा आएगी कैसे मलाई मिलावट का माजरा है ग़ज़ब मेरे भाई । अब दिल उदास है मन कहता है चल उड़ जा रे पंछी कि अब ये देश हुआ बेगाना , अफ़साना फ़साना बन गया है नया था जो पुराना बन गया है और उनको पुरानी बातें पुरानी मुलाकातें बहुत बेचैन करती हैं । यादों की बारातें उम्र भर तड़पाती हैं अधूरी मुहब्बत की कहानी का अंजाम बुरा होता है बद भला होता है बदनाम बुरा होता है । तुम अगर मुझको न चाहो तो कोई बात नहीं तुम किसी और को चाहोगी तो मुश्किल होगी ।  



 
 

अप्रैल 24, 2024

इस क़दर किरदार बौना हो गया है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

 इस क़दर किरदार बौना हो गया है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा ' 

इस क़दर किरदार बौना हो गया है
आस्मां , जैसे      बिछौना हो गया है ।
 
घर बनाया था कभी शीशे का तुमने 
किस तरह , टूटा खिलौना हो गया है । 
 
मथ रहे पानी मिले क्या छाछ मख़्खन 
शख़्स  , पानी में चलौना ,  हो गया है ।
 
है निराला  , आज का , दस्तूर भाई 
बिन बियाहे सब का गौना हो गया है । 
 
छान कर सब पीस कर कितना संवारा 
फिर हुआ क्या सब इकौना हो गया है । 
 
पी गया कितने ही दरिया को वो सागर 
था उछलता , और  , पौना हो गया है ।
 
ख़ूबसूरत था जहां ' तनहा ' हमारा 
हर नज़ारा अब , घिनौना हो गया है ।    



अप्रैल 22, 2024

मिलावट पर शोध ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

           मिलावट पर शोध ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

मैंने अभी कुछ ही दिन पहले 15 अप्रैल को इक पोस्ट लिखी थी आपको उस को पहले पढ़ लेना चाहिए था , आजकल गारंटी गारंटी का शोर मचा हुआ था तभी मुझे अचानक नील कमल फ़िल्म का साहिर लुधियानवी जी का लिखा गीत याद आया । उस पोस्ट में गीत पढ़ कर समझ सकते हैं कि किस किस में क्या क्या मिलावट होने का अंदेशा है । 1968 का ज़माना था तब ऐसा ख़तरा लगता था तो 2024 में 56 साल बाद कोई कल्पना नहीं कर सकता हालत क्या होगी । विदेश में जांच होने पर हमारे देश की कंपनियों के पदार्थ मिलावटी पाए जाने पर सरकार को चिंता होनी स्वाभाविक है । हमारे देश की आम जनता को मिलावटी खाद्य पदार्थ खाने से अधिक ख़तरा तरह तरह की मिलावट से है । राजनीति में इतना कुछ मिला दिया गया है कि सर्वोच्च न्यायालय को चुनाव आयोग को पवित्रता शब्द का उपयोग करना पड़ा है । राम तेरी गंगा मैली हो गई पापियों के पाप धोते धोते , देश की न्याय व्यवस्था की दशा ऐसी है कि करोड़ों रूपये के घोटाले हुए साबित होने पर भी नेता अधिकारी बेगुनाह करार दिए जाते रहते हैं तो घोटाले क्या जनता ने किए थे । ताज़ा ताज़ा मामला इलेक्टोरल बॉण्ड का है जो असवैंधानिक करार दिए जाने पर भी गुनहगार का अता पता नहीं और कौन कितना खा कर हज़्म कर गया उसका हिसाब कभी नहीं । देश की राजनीति की मिलावट की तो कोई सीमा ही नहीं है भाषणों में झूठ की मिलावट से भाषा में अपशब्दों की असभ्य शब्दों की मिलावट से कितनी नफरत और हिंसा का आभास होता है बगैर किसी तीर तलवार के घायल होने वाला जानता है । आपत्ति जताने पर ब्यान वापस लेना खेद जताना भी अब नहीं किया जाता विवश हो कर कहना पड़ता है मेरी बात को तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया । बड़े से बड़े पद पर आसीन व्यक्ति भी अपने पद की गरिमा की चिंता नहीं करता है झूठ सच ही नहीं साबित किया जाता बल्कि इतिहास तक को इतना अनुचित ढंग से पेश किया जाता है कि समझना कठिन होता है कि आज़ादी किस ने दिलाई थी और देश कब आज़ाद हुआ था । 
 
कोई प्रयोगशाला मिर्च मसालों की शुद्धता की जांच कर परख कर प्रमाणित कर सकती है मिलावटी है या नहीं है लेकिन हमारे देश की राजनीति करने वाले दलों में कितनी मिलावट है भगवान भी नहीं समझा सकता । कौन कितनी बार कितने दलों में आया गया इस का हिसाब लगाना आसान नहीं उस पर कितने राजनेता दल बदल कर अपराधी से बेदाग़ घोषित हुए ये करिश्मा कोई डिटर्जेंट नहीं कर सकता है सिर्फ एक का दावा रहा है कि दाग़ अच्छे हैं । खुद सरकार ने इतना कुछ आपस में डगमग कर दिया है कि कोई नहीं समझ सकता किस योजना का किस विभाग से क्या लेना देना है । सरकारी विज्ञापन का सच साबित होना संभव ही नहीं है क्योंकि उन में कोरी कल्पनाओं से सपनों की मिलावट कर हक़ीक़त को ऐसे ढक दिया जाता है कि देख कर सभी सोचते हैं जैसे किसी जादूगर ने उनको वास्तविक ज़िंदगी की परेशानियों से दूर किसी कल्पनालोक में पहुंचा दिया है । मिलवट हमारे देश की परेशानी या समस्या नहीं है बल्कि इक परंपरा है जो हमको विरासत में मिली और हमने उसे दोगुना चौगुना नहीं सौ गुना कर आगे सौंपने का संकल्प उठाया हुआ है । कौन माई का लाल हमको आगे बढ़ने से रोक सकता है । मिलावटी तेल से कितने लोग मरे थे जांच आयोग ने विदेशी हाथ की शंका प्रकट की थी । मिलावटी शराब पर क्या क्या नहीं हुआ अभी इक सीरीज बनाई गई है , हमारे टीवी फ़िल्म बनाने वालों को ये सब मनोरंजन का विषय लगते हैं सच कहूं तो आजकल का सिनेमा इतना मिलवती है कि कोई हिसाब नहीं । उस पर कहते हैं जो दर्शक पसंद करते हैं परोसना पड़ता है अब इस से बढ़कर मानसिक दिवालियापन क्या हो सकता है । मिलावट पर जितना चाहो लिख सकते हो यहां तक की अब साहित्य में भी मिलावट होने लगी है टीवी पर कॉमेडी शो से लेकर तथाकथित बड़े बड़े कवि सम्मेलन तक कविता ग़ज़ल नहीं चुटकुले और घटिया स्तर का मज़ाक बेशर्मी से प्रस्तुत किया जाता है । महिलाओं को किसी वस्तु की तरह पेश करना से लेकर खुद महिलाओं का अपनी गरिमा का ध्यान नहीं रखना दिखाई देता है तो मालूम पड़ता है कि सिक्कों की झंकार ने किस किस का ईमान गिरा दिया है । मिलावट की शुरुआत दूध में पानी मिलाने से हुई होगी जो अब नकली दूध घी तक पहुंच चुकी है । हम दुनिया में मसाले बनाने बेचने ही नहीं खरीदने में भी अव्वल नंबर पर हैं यही दौड़ है जिस में कोई हमको पछाड़ नहीं सकता है हमारा तो चरित्र ही मिलावटी है ख़ालिस नहीं , भीतर कुछ होता बाहर कुछ और दिखाई देते हैं । हमारी आस्था से विश्वास तक सभी रंग बदलते हैं गिरगिट भी हमारा मुकाबला नहीं कर सकती है और क्या कह सकते हैं ।  आपको इक मिसाल से समझाना चाहता हूं की अज्ञानता कितनी ख़तरनाक होती है , इक नीम हकीम खुद को आयुर्वेद का जानकर बताता था उस को वास्तविक जानकारी कुछ भी नहीं थी और उस ने अपनी सोच से शहद और घी दोनों को स्वास्थ्य के लिए लाभकारी मानते हुए अपनी बनाई दवा में दोनों को मिला दिया जो आयुर्वेद के अनुसार विष अर्थात ज़हर बन जाता है आप ऐसे लोगों से सावधान रहना समझदार हैं इशारा काफ़ी है । कुछ लोग मिलावट करते हैं तो उनको पता ही नहीं होता क्या मिला दिया । सागर में आज यार का जलवा दिखा दिया , ज़ालिम मेरी शराब में ये क्या मिला दिया ।  अंत में इक पुरानी हास्य-व्यंग्य की कविता मिलावट पर पेश है । 
 

मिलावट ( व्यंग्य - कविता ) डॉ लोक सेतिया

यूं हुआ कुछ लोग अचानक मर गये
मानो भवसागर से सारे तर गये ।

मौत का कारण मिलावट बन गई
नाम ही से तेल के सब डर गये ।

ये मिलावट की इजाज़त किसने दी
काम रिश्वतखोर कैसा कर गये ।

इसका ज़िम्मेदार आखिर कौन था
वो ये इलज़ाम औरों के सर धर गये ।

क्या हुआ ये कब कहां कैसे हुआ
कुछ दिनों अखबार सारे भर गये ।

नाम ही की थी वो सारी धर-पकड़
रस्म अदा छापों की भी कुछ कर गये ।

शक हुआ उनको विदेशी हाथ का
ये मिलावट उग्रवादी कर गये ।

सी बी आई को लगाओ जांच पर
ये व्यवस्था मंत्री जी कर गये । 
 

 
 

आईने का सामना कौन करे ( भली लगे कि बुरी लगे ) डॉ लोक सेतिया

 आईने का सामना कौन करे ( भली लगे कि बुरी लगे ) डॉ लोक सेतिया 

ऐसा अक़्सर होता है सुबह उठते ही मन में कोई उथल-पुथल होती है तो सोचता हूं की सैर पर जाना छोड़ पहले लिख लूं बाद में शायद विषय का ध्यान ही नहीं रहे । और अगर सुबह जल्दी उठ गया होता हूं तो लिखने बैठ जाता हूं अन्यथा पार्क जाना भी सैर करने के लिए नहीं और भी बहुत देखने समझने तथा सोचने को काम आता है । ज़िंदगी में संतुलन बनाना भी अपने आप में छोटी बात नहीं है । तो आज सुबह जो विचार आया था वो था आज़ादी का अर्थ महत्व समझने का और अपनी नहीं सभी की आज़ादी को लेकर सही मायने में स्वतंत्रता का पक्षधर होने का । पार्क पहुंचते ही बाहर से जो नज़ारा दिखाई दिया उस ने सावधान रहने का ख़्याल ज़हन में ला दिया । सरकारी वाहन पुलिस और सुरक्षाकर्मी वातावरण को सामान्य नहीं रहने देते हैं लेकिन खैर कोई घबराने की चिंता की बात नहीं थी चुनाव हैं कोई सत्ताधारी नेता वोट मांगने आया हुआ था ।आमना सामना हुआ परिचय हुआ डॉक्टर कौन से डॉक्टर लेखक क्या पीएचडी वाले नहीं डॉक्टर और इक लेखक । इतनी जल्दी होती हैं उनको संक्षेप में ही बात औपचरिक होना संभव होता है , घर घर जाकर वोट मांगना अब कोई नहीं करता बल्कि अधिकांश सोशल मीडिया पर इकतरफ़ा संवाद करते हैं । नेता जी ने शायद यूं ही कह दिया लिखते रहना और कोई काम हो तो बताना , दिल में बहुत कुछ आया और सोचा भी कि उनसे जाकर पूछ कर देश की जनता का छोटा सा सवाल किया जाये भले उनके पास जवाब नहीं भी हो कम से कम इतना तो उनको समझना ही चाहिए । कोई तीस साल पहले की लिखी अपनी कविता मैं उनको सुनाना चाहता था लेकिन जानता था ये अधिकांश लोगों को पसंद नहीं आएगा क्योंकि उनको अपनी बात कहनी होती है जनता की समझनी ही नहीं होती , आगे लिखने से पहले वही कविता पढ़वाता हूं । 
 

बेचैनी ( नज़्म )  डॉ  लोक सेतिया 

पढ़ कर रोज़ खबर कोई
मन फिर हो जाता है उदास ।

कब अन्याय का होगा अंत
न्याय की होगी पूरी आस ।

कब ये थमेंगी गर्म हवाएं
आएगा जाने कब मधुमास ।

कब होंगे सब लोग समान
आम हैं कुछ तो कुछ हैं खास ।

चुनकर ऊपर भेजा जिन्हें
फिर वो न आए हमारे पास ।

सरकारों को बदल देखा
हमको न कोई आई रास ।

जिसपर भी विश्वास किया
उसने ही तोड़ा है विश्वास ।

बन गए चोरों और ठगों के
सत्ता के गलियारे दास ।

कैसी आई ये आज़ादी
जनता काट रही बनवास ।
 
अधिकांश लोग खुद को लेकर खुशफ़हमी या गलतफ़हमी में रहते हैं उनको लगता है की हम जो भी करते हैं कोई और नहीं करता हम बड़े ख़ास महान हैं । जबकि उन सभी का सच कुछ और होता है कोई योग और आयुर्वेद के नाम पर अपना धंधा बढ़ाता है तो कोई तथाकथित देश समाज जनता की भलाई की बात कह कर शासक बन कर राज सुःख भोगना चाहता है । किसी को धर्म उपदेश देकर अपने लिए आश्रम मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा बनवा कर अपना अधिपत्य वर्चस्व स्थापित करना है , सबको लोभ मोह से बचने की राह दिखलाने वाले खुद संचय करते करते भवसागर में डूब जाते हैं । हमको डुबोया है उन्होंने ही जो हमारी नैया पार लगाने को खिवैया बन कर ठगते रहे उम्र भर । हमने पिछले 76 सालों में अपनी खुद की देश की समाज की पुरानी वास्तविक पहचान को ही खो दिया है । जाने क्या क्यों कैसे हुआ जो हम धीरे धीरे बेहद स्वार्थी और काफी हद तक विवेकहीन बनते गए हैं , कथनी और करनी बिल्कुल मेल नहीं खाती और हर कोई मनमानी कर समाज से छल कपट कर भी चाहता है नायक समझा जाए उसको । आजकल नायक असली नहीं झूठे और नकली अधिक दिखाई देते हैं । लगता है कोई सच का दर्पण देखता ही नहीं अन्यथा हमारा मन जानता है कि जैसा हम चाहते हैं लोग हमारे बारे सोचना हम वैसे कभी हो ही नहीं सकते , दूसरे शब्दों में खुद अपनी ही नज़र में लोग दोगले हैं । 
 
क्या हम आज़ादी का अर्थ समझते हैं , अगर पिता अपने बेटे से चाहता हो कि जो भी वो चाहता है बेटे को बिना कुछ सोचे स्वीकार करना चाहिए तो बेटे की उचित अनुचित को परखने की आज़ादी को बंधन में जकड़ कर छीन लेना चाहता है । किसी का अधिकार किसी और का हक़ छीन कर अपने आधीन रखना नहीं होना चाहिए और ऐसा पति पत्नी या बड़ा छोटा भाई बहन अथवा कोई नाता करने को संस्कार या कोई नियम नहीं बता सकता है । शायद हमारा समाज अपनी कायरता को ढकने को ऐसे कुछ तर्क घड़ लेता है और इतना ही नहीं उस पर कोई चर्चा कोई वार्तालाप करने को तैयार नहीं होता है । जब तक हम अपनी गलत बातों को स्वीकार ही नहीं करना चाहते हम अपनी झूठी अनुचित परम्पराओं को बदल कैसे सकते हैं । परिवार की ही तरह सरकार प्रशासन में अपनी असफलताओं और समाज विरोधी आचरण को राजनेता अपनी शान एवं विशेषाधिकार मानते हुए भ्र्ष्टाचार से लेकर अहंकारी व्यवहार तक  उस पर शर्मिंदा नहीं होते अपितु गर्व करते हैं जो सबसे विचित्र विडंबना है । अधिकांश लोग भी ऐसे नेताओं अधिकारियों के सामने सर झुकाए खड़े मिलते हैं उनको खरी बात कहने का जोख़िम उठाना ज़रूरी नहीं समझते ये सोच कर कि कहीं कभी उन के साथ भी अन्याय अत्याचार नहीं हो जाए । जब तक अपना घर नहीं चपेट में आता हम आग लगाने वालों को बस्तियां जलाते देखते रहते हैं चुपचाप तमाशाई बन कर । क्या इसे आज़ादी कहते हैं क्या हम वास्तव में गुलामी और तानाशाही को स्वीकार कर अपने पांव पर कुल्हाड़ी मारने की मूर्खता नहीं करते हैं । 



अप्रैल 20, 2024

बहुत चिराग़ जलाओगे ( कथा-कहानी ) डॉ लोक सेतिया

        बहुत चिराग़ जलाओगे ( कथा-कहानी ) डॉ लोक सेतिया

 कभी कभी किसी ख़बर को सुन कर हम सकते में आ जाते हैं , क्या महसूस होता है कहने को शब्द नहीं मिलते हैं । कई साल पहले किसी शहर से इक पति - पत्नी जोड़े की ख़ुदकुशी की ख़बर पढ़ कर इक अर्से तक मन में उथल पुथल रही जिस का नतीजा इक ग़ज़ल कही थी , ख़ुदकुशी आज कर गया कोई । इस विषय पर मैंने अलग अलग ढंग से रचनाओं में अपनी भावनाएं संवेदनाएं प्रकट की हैं जबकि देखता हूं हर ऐसी घटना कुछ दिन बाद भुला देते हैं अधिकांश लोग । शायद ये वास्तविक बात इंगलैंड की है अभी भी उस संस्था की शाखाएं देश विदेश में हैं भारत में संजीवनी नाम से इक संस्था से संपर्क रहा था जब दिल्ली रहता था । इक मनोचिकित्सक ने प्रचारित कर रखा था कि जो भी जीवन से निराश हो कर ख़ुदक़ुशी करने का सोचता हो इक बार आकर मुझ से अवश्य मिले और कहते हैं वो हमेशा सभी को जीने का मकसद समझा कर ख़ुदक़ुशी नहीं करने पर सहमत करवा लिया करता था । मगर इक दिन इक व्यक्ति की वास्तविकता और ज़िंदगी की कुछ परेशानियों को सुनकर वह मनोचिकित्सक भी नहीं समझ पाया कि उसे जीने को कैसे मनवा सकता है । वो व्यक्ति ये देख कर समझ गया कि अब जीना नहीं मर जाना ही उस के लिए एकमात्र विकल्प है । लेकिन उस डॉक्टर की सहायक बाहर बैठी उनकी बात सुन रही थी , जैसे ही वो निराश व्यक्ति बाहर निकला उस महिला ने पूछा अब आपको क्या करना है । उस ने कहा बस आखिरी उम्मीद थी शायद ये कोई रास्ता बताते मगर अब निर्णय कर लिया है जीना नहीं है किसी भी तरह मौत को गले लगाना है । 
 
उस महिला ने कहा आप जो समझें कर सकते हैं लेकिन क्या उस से पहले मेरे साथ एक एक कप कॉफ़ी पीना चाहेंगे मुझे बहुत पसंद है कोई साथ हो अकेले नहीं पीना चाहती । ठीक है और दोनों पर इक कॉफी शॉप पर चले आये , कॉफी पीते पीते महिला ने उसे अपना दोस्त बना लिया ये कह कर कि उसको जैसा दोस्त चाहिए था कोई कभी नहीं मिला । जुदा होने की घड़ी थी उस महिला ने कहा धन्यवाद आपने मेरी बात मान कर मुझे थोड़ी देर को ही सही अपनी दोस्त माना जो मेरे लिए बड़ी ख़ुशी की बात है । उस व्यक्ति ने कहा काश कि मैं आपको हमेशा ख़ुशी दे सकता , महिला ने कहा मुश्किल क्या है आप भी मुझे अपनी तरफ से कॉफी का निमंत्रण दे सकते हैं । आपको ख़ुदकुशी करनी है तो मैं रोकूंगी नहीं लेकिन इतना तो आप अपनी दोस्त की खातिर कर सकते हैं हां जितने भी समय आप ज़िंदा हैं हमारी दोस्ती रहेगी और हम एक दूसरे का हर दुःख दर्द आपस में सांझा कर सकते हैं , जब नहीं होंगे तब अकेले होने से जो होगा देखा जाएगा । और इस तरह उस मनोचिकित्सक की सहायक ने उस व्यक्ति को ख़ुदक़ुशी नहीं करने पर मनवा लिया । जब वापस जाकर अपने बॉस को ये बताया तो उस ने अपनी संस्था का नाम बदल कर उसी महिला के नाम पर रख दिया था । 
 
फिल्मों में ऐसा कई बार दर्शाया जाता रहा है , पुराने काफ़ी गीत भी हैं जो आपको निराशा से निकलने और आशा का दामन थामने की राह समझाते हैं । आजकल हम सभी अपने अपने संकुचित दायरे में खुद ही कैद रहते हैं अपनी उलझनों परेशानियों से बाहर दुनिया अन्य समाज की तरफ देखते ही नहीं हैं । मानवीय संवेदनाओं से रिश्ता तोड़ कर मतलबी और आत्मकेंद्रित हो गए हैं , आस पास किसी को असफल या निराश देखते हैं तो उस को साहस बढ़ाने नहीं बल्कि कभी कभी किसी के ज़ख्मों पर नमक छिड़कने का कार्य करते हैं । कोई फ़िसलता है तो गिरे को हाथ देकर उठाने नहीं उस पर कटाक्ष करते हैं जिस का अर्थ है कि हम निर्दयी बनते जा रहे हैं । काश हम हर किसी से इंसानियत का नाता निभाते तो कोई भी इतना अकेला और निराश नहीं होता कि घबरा कर अपनी जीवन लीला ही ख़त्म करने को विवश हो जाता । अंत में दो ग़ज़ल इक मेरी जो किसी की ख़ुदक़ुशी की बात सुन कर अनुभव करता हूं उस की मनोदशा को सोच कर और इक ग़ज़ल जिसे मैंने कॉलेज के ज़माने से अक्सर गुनगुनाया है , शायर  -  मख़मूर देहलवी जी की है ।
 

          
 
हर एक रंज में राहत है आदमी के लिये
पयाम-ए-मौत भी मुज़दा है ज़िंदगी के लिये ।

(रंज = कष्ट, दुःख, आघात, पीड़ा), 
(पयाम-ए-मौत = मृत्यु का सन्देश), 
(मुजदा = अच्छी ख़बर, शुभ संवाद)

मैं सोचता हूँ के दुनिया को क्या हुआ या रब
किसी के दिल में मुहब्बत नहीं किसी के लिये ।

चमन में फूल भी हर एक को नहीं मिलते
बहार आती है लेकिन किसी किसी के लिये ।

हमारे बाद अँधेरा रहेगा महफ़िल में
बहुत चराग़ जलाओगे रोशनी के लिये ।

हमारी ख़ाक को दामन से झाड़ने वाले
सब इस मक़ाम से गुज़रेंगे ज़िंदगी के लिये ।

उन्हीं के शीशा-ए-दिल चूर चूर हो के रहें
तरस रहे थे जो दुनिया में दोस्ती के लिये ।

जो काम आये मेरी ज़िन्दगी तेरे हमदम
तो छोड़ देंगे दुनिया तेरी ख़ुशी के लिये  ।

किसी ने दाग़ दिए दोस्ती के दामन पर
किसी ने जान भी लुटा दी दोस्ती के लिये । 
 
शायर  -  मख़मूर देहलवी ।



अप्रैल 19, 2024

हम कर्ज़दार हैं दौलतमंद नहीं हैं ( सच का दर्पण ) डॉ लोक सेतिया

 हम कर्ज़दार हैं दौलतमंद नहीं हैं ( सच का दर्पण ) डॉ लोक सेतिया 

मैं लिखता हूं और मुझे लिखना है , ये क्या मेरी मज़बूरी है आदत है शौक है या फिर सनक है पाठक क्या सोचते हैं समझते हैं दो दिन पहले इक पोस्ट लिखी थी सोशल मीडिया फेसबुक व्हाट्सएप्प पर साथ कुछ पत्र पत्रिकाओं को ईमेल से भी भेजा था । ब्लॉग का एक भाग कुछ पेज हैं जिन पर लिखना मिटाना चलता रहता है कुछ पब्लिश हैं कुछ ड्राफ्ट ही रहते हैं और ये पेज पाठक को पढ़ने को शेयर नहीं करता , मुझे इनको छिपाना नहीं लेकिन काफी हद तक अपने तक सिमित रखना चाहता हूं लेकिन कभी कभी कोई किसी तरह उनको ढूंढ लिया करता है । कल अचानक किसी सार्वजनिक आयोजन में किसी ने कहा क्या आपने लिखना छोड़ दिया है , मैंने संक्षेप में जवाब दिया जी नहीं मैं नियमित निरंतर लिखता रहता हूं । जैसे फेसबुक पर पोस्ट में कहा था मेरा अनुभव पाठकों से जो समझा वही बात है लोग जिस जगह पढ़ते हैं मैं केवल उस जगह नहीं लिख कर भेजता इसलिए तमाम लोग जिनको चाहत होती है मुझे गूगल सर्च से या सोशल मीडिया पर ढूंढ लिया करते हैं । मिल कर याद आया पढ़ते थे पसंद करते थे लेकिन ये भी समझ आया उनको चाहत होती तो तलाश कर सकते थे । आज की पोस्ट पाठक को लेकर नहीं बल्कि अधिक महत्वपूर्ण है और सभी के लिए इक संदेश है । 
1974 की बात है सरिता पत्रिका में संपादक विश्वनाथ जी हर अंक में जो पंद्रह दिन बाद आता था कॉलम लिखा करते थे , आप पढ़े लिखे हैं कारोबार नौकरी करते हैं जो भी आपने घर बना लिया परिवार बना कर संतान को काबिल बना लिया जितना भी धन संचय कर लिया तब भी आपने अगर अपने देश समाज अपनी माटी का क़र्ज़ नहीं उतारा तो आपने कुछ भी नहीं किया है । मेरा लिखना उसी मकसद की एक शृंखला है और मैं जब भी कोई मेरे उद्देश्य की बात पूछता है तब उस से वही सवाल किया करता हूं और मुझे बड़ी हैरानी और अफ़सोस होता है जब कोई भी ये सोचता समझता ही नहीं कि उस ने अपने देश समाज को क्या कुछ लौटाया है पाया बहुत है शायद सोचा ही नहीं है । आओ विचार करते हैं हमको समाज से कितना कुछ मिला है जो अगर नहीं होता तो हम जो भी करते हैं बन पाए हैं कभी नहीं बन पाते , ये शिक्षा स्कूल अध्यापक ही नहीं समाज की बनाई गई अनगिनत राहें हैं जिन से हमको क्या करना किधर जाना क्या हासिल करना है तो किस तरह से संभव हो सकता है ये तमाम संस्थाएं और नौकरी व्यवसाय करने को बुनियादी ढांचा हमारे पुरखों ने आसानी से नहीं निर्मित किया होगा । सोचना अगर किताबें और देश की व्यवस्था सामाजिक ढांचा ही नहीं होता तो हम शायद सही इंसान भी नहीं बन पाते । 
 
मुझे आपको सभी को जन्म लेते ही ये सब बेहद मूलयवान अपने आप मिल ही नहीं गया बल्कि हमको इन सभी पर अपना अधिकार भी हासिल हुआ जिस का मोल कोई चुका नहीं सकता है । अपने महान लोगों की बातें पढ़ी सुनी होंगी क्या क्या नहीं किया उन्होंने कितनी मेहनत और प्रयास से देश को समाज को जैसा उनको मिला उस से अच्छा और बेहतर जीवन जीने को बनाया अपनी खातिर नहीं सभी की खातिर । मैंने देखा है अधिकांश लोग गौरान्वित महसूस करते हैं निचले पायदान से ऊपर पहुंचने पर और अपनी रईसी शान ओ शौकत पर इतराते भी हैं लेकिन शायद उन्होंने कभी सोचा तक नहीं कि उनको अपनी धरती अपनी माटी अपने देश समाज को कुछ लौटाना भी था जिस पर उनका ध्यान ही नहीं । धर्म ईश्वर वाले पाप पुण्य जैसे लेखे जोखे की बात नहीं ये मानवीय मूल्यों प्रकृति और पर्यावरण की तरह अपने गांव शहर देश को प्रयास कर भविष्य की आने वाली पीढ़ी को सुंदर सुरक्षित बना कर सौंपने का फ़र्ज़ निभाने की बात है । इस विषय को जितना चाहें विस्तार दे सकते हैं लेकिन समझने को संक्षेप में पते की बात कही है । सभी संकल्प लें की हम अपना ये क़र्ज़ पूरी तरह से नहीं उतार सकतें हैं जानते हैं लेकिन जितना भी संभव हो कुछ कम अवश्य कर सकते हैं । अन्यथा हम इक एहसानफरमोश समाज की तरफ बढ़ रहे हैं जिसे पाना ही आता है चुकाना नहीं आता या किसी ने ये ज़रूरी पाठ पढ़ाया ही नहीं जो कभी शिक्षा का पहला सबक हुआ करता था ।  कुछ भी साथ नहीं ले जा सकते दुनिया से जाते हुए हां कुछ बांट कर जाना कुछ कर जाना किया जा सकता है । अच्छा है कुछ ले जाने से दे कर ही कुछ जाना  , चल उड़ जा रे पंछी । 
 
चल उड़ जा रे पंछी
कि अब ये देश हुआ बेगाना
चल उड़ जा रे पंछी...

खत्म हुए दिन उस डाली के
जिस पर तेरा बसेरा था
आज यहाँ और कल हो वहाँ
ये जोगी वाला फेरा था
सदा रहा है इस दुनिया में
किसका आबो-दाना
चल उड़ जा रे पंछी...

तूने तिनका-तिनका चुन कर
नगरी एक बसाई
बारिश में तेरी भीगी काया
धूप में गर्मी छाई
ग़म ना कर जो तेरी मेहनत
तेरे काम ना आई
अच्छा है कुछ ले जाने से
देकर ही कुछ जाना
चल उड़ जा रे पंछी...

भूल जा अब वो मस्त हवा
वो उड़ना डाली-डाली
जब आँख की काँटा बन गई
चाल तेरी मतवाली
कौन भला उस बाग को पूछे
हो ना जिसका माली
तेरी क़िस्मत में लिखा है
जीते जी मर जाना
चल उड़ जा रे पंछी...

रोते हैं वो पँख-पखेरू
साथ तेरे जो खेले
जिनके साथ लगाये तूने
अरमानों के मेले
भीगी आँखों से ही उनकी
आज दुआयें ले ले
किसको पता अब इस नगरी में
कब हो तेरा आना
चल उड़ जा रे पंछी..
 
 
 

                  किसी शायर ने कहा है :-

 ' माना चमन को हम न गुलज़ार कर सके , कुछ खार कम तो कर गए गुज़रे जिधर से हम '। 



 
 


  

अप्रैल 18, 2024

पति की प्रशंसा का दिन ( अजब दस्तूर ) डॉ लोक सेतिया

   पति की प्रशंसा का दिन ( अजब दस्तूर ) डॉ लोक सेतिया 

ग़ज़ब करते हैं भला कभी कोई पति कभी अपनी पत्नी की नज़र में तारीफ़ के काबिल हो भी सकता हैं । सच जिस किसी को ऐसा नसीब मिला है फिर और क्या चाहिए ज़िंदगी में इतना काफ़ी है । कभी चुपके से छुपकर किसी महिला मंच की सभा को देखना हर महिला को शिकायत रहती है मेरी किस्मत ही खराब थी जो ऐसा पति मिला मुझे भगवान से ये तो नहीं मांगा था । आपने दुनिया भर में कितना कुछ पतियों का कहा लिखा सुना होगा अपनी पत्नी से अच्छी समझदार और खूबसूरत कोई नहीं लगा जिनको , ऐसा कभी किसी पत्नी ने भी कहा हो शायद ही पढ़ा हो । विधाता ने पति नाम की प्रजाति का भाग्य जिस स्याही से लिखा होगा वो शायद पानी की तरह होगी जिस को खुद लिखने वाला भी पढ़ना चाहे तो पढ़ नहीं सकेगा , मुझे लगता है ऐसा मुमकिन है की जब ईश्वर पतियों का भविष्य लिखने बैठा होगा उसकी पत्नी ने किसी काम से आवाज़ दी होगी और ऐसे में उसको अपनी पत्नी की बात के सिवा कुछ ध्यान नहीं रहा होगा । आप और मैं क्या हैं सच बताता हूं भगवान या देवताओं की पत्नियां भी अपने पतियों से खुश कभी नहीं रही होंगी । ये एक दिन की रिवायत जिस ने भी बनाई होगी उसने सोचा होगा चलो एक दिन तो जिसे जो नहीं मिलता मिलने का उपाय किया जाए ।  तमाम तरह से दिवस बनाए गए हैं और उनका कुछ असर भी ज़रूर होता भी होगा लेकिन प्रशंसा करना इक अलग बात है ये तभी हो सकती है जब कोई किसी को प्रशंसा के काबिल समझता हो अन्यथा सिर्फ कहने को कुछ कहना ऐसा ही है जैसे किसी छात्र को शिक्षक नालायक समझता हो फिर भी ये समझ कर कुछ अंक बढ़ा कर पास कर दे कि थोड़ा रहम करते हैं , कभी स्कूल में परीक्षाफल घोषित किया जाता था किसी को खरैती पास कहते थे । आपको लगता है कि ये छात्र का अपमान करना था जबकि ये शिक्षक की अपनी नाकामी को छिपाने की इक कोशिश हुआ करती थी । मेरा मानना है कि पतियों को ऐसी भिक्षा में मिली प्रशंसा की आवश्यकता नहीं होती है । कोई मेरी बात से सहमत हो चाहे नहीं हो अपने प्रधानमंत्री जी शत प्रतिशत सहमत होंगे ही उनको अपनी पत्नी से तारीफ़ की कामना नहीं हो सकती है वैसे भी उनकी पत्नी अगर अपने पति की प्रशंसा भी करेगी तो कुछ अलग ढंग से , शायद कहेगी कि उनकी प्रशंसा करती हूं कि नहीं निभाना था तो छोड़ दिया कम से कम अनचाहे बंधन से मुक्त होकर अपना जीवन बिताया है । महिलाओं की आदत होती है कि खुद को छोड़ बाकी सभी महिलाओं से व्यर्थ की पर्तिस्पर्धा रहती है , कोई महिला किसी महिला की तकलीफ़ कभी नहीं समझती है अन्यथा देश की आधी आबादी की महिलाएं क्या मोदी जी की समर्थक बन सकती थी । यहां तो कोई पति मोदी जी की किसी बात से असहमति जताए तो पहला विरोध घर में खुद अपनी पत्नी से झेलना पड़ता है आखिर खामोश हो जाते हैं क्योंकि इस अदालत में कोई वकील कोई दलील काम नहीं आती है । यूं तो मैंने अपनी तीसरी ग़ज़ल अपनी पत्नी के नाम पर ही समर्पित की है लेकिन लगता नहीं कि उनको इस से कोई फ़र्क पड़ता है मगर आप भी चाहें तो कभी अपनी अर्धांगिनी को मेरी ग़ज़ल सुना कर कोशिश कर सकते हैं , मुमकिन है आपकी मन की बात उन तलक पहुंच जाए । मोदी जी ने सौ बार ये कोशिश की अवश्य है मगर किसी को खबर नहीं उनके मन की आवाज़ किस को पुकारती थी मगर सभी जानते हैं कि वो भटकती रही किसी मंज़िल पर नहीं पहुंची । 
 
  पाकिस्तान की शायरा हुई हैं परवीन शाकिर जी उनका इक शेर है ' कैसे कह दूं की मुझे छोड़ दिया है उस ने  , बात तो सच है मगर बात है रुसवाई की ।  किसी काबिल मशहूर और बेहद खूबसूरत महिला के लिए ये असंभव ही नहीं ऐसा हादिसा है जिस की कभी कल्पना ही नहीं करता कोई । अधिकांश लोग बड़े नाम शोहरत पैसा रुतबा मिलते अपने पुराने साथी को कोई और मिलते ही छोड़ जाते हैं इस दुनिया में ये तो कम ही देखा है उन्हें निभाते हुए अच्छे हालात में बुरे दिनों में हाथ थामने वालों का । उस पति की कमनसीबी थी जिस ने परवीन शाकिर जैसी महिला की कदर नहीं की अन्यथा आजकल खुद महिलाएं ठोकर लगा देती हैं जिस को लेकर कहना पड़ा हो कि ' वो कहीं भी गया लौटा तो मेरे पास आया , बस यही बात है अच्छी मेरे हरजाई की '।  जन्म - जन्म का रिश्ता आजकल बदल गया है , क्या मिला कोई नहीं देखता जो भी चाहते हैं उस के नहीं मिलने का मलाल रहता है ।  अपनी जीवनसंगिनी पर इक ग़ज़ल कही थी , पढ़ सकते हैं नीचे लिख रहा हूं ।
 

हमको तो कभी आपने काबिल नहीं समझा (ग़ज़ल ) 

         डॉ लोक सेतिया  "तनहा"

हमको तो कभी आपने काबिल नहीं समझा
दुःख दर्द भरी लहरों में साहिल नहीं समझा ।

दुनिया ने दिये  ज़ख्म हज़ार आपने लेकिन
घायल नहीं समझा हमें बिसमिल नहीं समझा ।

हम उसके मुकाबिल थे मगर जान के उसने
महफ़िल में हमें अपने मुकाबिल नहीं समझा ।

खेला तो खिलोनों की तरह उसको सभी ने
अफ़सोस किसी ने भी उसे दिल नहीं समझा ।

हमको है शिकायत कि हमें आँख में तुमने
काजल सा बसाने के भी काबिल नहीं समझा ।

घायल किया पायल ने तो झूमर ने किया क़त्ल
वो कौन है जिसने तुझे कातिल नहीं समझा ।

उठवा के रहे "लोक" को तुम दर से जो अपने
पागल उसे समझा किये साईल नहीं समझा ।
 
 

 

अप्रैल 16, 2024

ख़्वाबों ख़्यालों की दुनिया ( फ़लसफ़ा ) डॉ लोक सेतिया

    ख़्वाबों ख़्यालों की दुनिया ( फ़लसफ़ा ) डॉ लोक सेतिया 

बड़ा खूबसूरत लगता है ये नामुराद रोग है , फिल्मों का असर ही नहीं फ़िल्मी कहानियों की मेहरबानी है । इक फिल्म आई थी सपनों का सौदागर उसकी कहानी का नायक पीड़ित दुःखी लोगों को सुंदर सपने दिखलाता है ताकि वो अपनी बदहाली और बुरे हालात को भूलकर ख़्वाबों ख़्यालों की दुनिया में कुछ पल इक काल्पनिक सुःख का अनुभव कर सकें । जिस अभिनेता ने वो किरदार निभाया था बॉलीवुड का सबसे बड़ा शोमैन माना जाता था मगर उसने बताया था कि उसे ये किरदार पसंद नहीं था और सिर्फ पैसे की खातिर उस ने अभिनय किया था । फ़िल्मी लोग अधिकतर ऐसा खरा सच बोलने से बचते हैं लेकिन 1977 में उन्होंने इक पत्रिका को साक्षात्कार देते हुए बताया था कि उनको कुछ बुरी फ़िल्में भी करनी पड़ीं थीं । ज़िंदगी का सभी का अपना तौर तरीका होता है लेकिन कोई भी किसी को परेशानियों से जूझने की बजाय उनसे नज़रें चुराने का सबक नहीं पढ़ा सकता है । ये अलग बात है कि मनोरंजन की दुनिया हमको कुछ घंटे आनंद का अनुभव करवाती है लेकिन नाटक संगीत या फ़िल्म से आपका पेट नहीं भर सकता है इसलिए दर्शक को झूठी तस्सली से बहलाना सही कार्य नहीं है । ज़माने के दुःख दर्द को अपने फायदे के लिए बाज़ार में बेचना किसी कथाकार या किसी कलाकार का सही काम नहीं हो सकता है । सुनहरे भविष्य के सपने संजोना और उनको हक़ीक़त में बदलने का प्रयास करना अच्छा होता है और अक्सर सभी ऐसा करते हैं कुछ लोककथाओं में भी कुछ गीतों में भी निराशा को छोड़ आशावादी दृष्टिकोण अपनाने को प्रेरित किया जाता है लेकिन ये दो बातें बिल्कुल अलग हैं किसी की निराशा को भगाना या किसी की बर्बादी का तमाशा देख उसे अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करना ।आजकल ये भी कोई व्यवसाय की तरह किया जाने लगा है , राजनेता जनता को अपने जाल में फंसाने को क्या क्या नहीं करते हैं , कुछ लोग योग से आयुर्वेद तक को अपना कारोबार बनाकर मालामाल हो गए हैं । तथाकथित बड़े बड़े नाम वाले लोग अभिनेता खिलाड़ी कहने को समाज सेवा करने को कोई संस्था बना शोहरत हासिल करते हैं जबकि पर्दे के पीछे उनका मकसद कुछ और ही होता है । राजनैतिक दल भी कभी अपने प्रचार के लिए तो कभी उनसे करोड़ों रूपये चंदा ले कर उनको राज्य सभा का सदस्य चुनवाते या मनोनीत करते हैं । लोग जिस किरादर को देख अभिनेता के कायल हुए होते हैं ये लोग वास्तविक जीवन में उसके विपरीत आचरण करते हैं कौन समझता है । 
 
हमारे समाज की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि सत्ता धन दौलत नाम शोहरत सब हासिल कर के भी कुछ लोग वास्तविक जीवन में इंसानियत और ईमानदारी से कोसों दूर होते हैं पैसा ही उनका भगवान बन जाता है । लेकिन हमने उनकी चमकती हुई नकली दुनिया को असली ही नहीं समझ लिया बल्कि उनकी चकाचौंध में हमने खुद अपना अस्तित्व तक भुला दिया है । आज़ादी भी हमने अनगिनत कुर्बानियां दे कर पाई थी और देश में इक ऐसा संविधान बनाया गया था जिस में सभी नागरिकों को बराबरी से जीने का ही नहीं न्याय और अन्य तमाम अधिकार पाने से लेकर अपनी बात कहने विचार अभिव्यक्त करने से लेकर तमाम मौलिक अधिकार शामिल हैं । लेकिन क्या वास्तव में ऐसा हुआ है बिल्कुल भी नहीं बल्कि जिनको शासन का अवसर मिला उन लोगों ने सत्ता पर बैठ प्रशासनिक पदों को पाकर न्याय-व्यवस्था का भाग बनकर संविधान की अवधारणा को अनदेखा कर खुद कर्तव्य निभाना भूल कर विदेशी शासकों से अधिक अत्याचारी निरंकुश शासक बनते गए । अदालत संवैधानिक संघठन और उच्च पदों पर आसीन लोग राजनैतिक सत्ता पाने वालों की हाथ की कठपुतलियां बन कर रह गए हैं ।  शायद एक तिहाई लोग देश का सभी कुछ हथियाए बैठे हैं चाहे किसी भी तरह से कोई सभी को समानता की बात सोचता ही नहीं है जिस से ये देश उनकी आज़ादी और बाकि अधिकांश की गुलामी की मिसाल बन चुका है । 80 करोड़ जनता को सस्ते या मुफ्त राशन का अर्थ कोई गर्व या शान की नहीं शर्म की बात है जब कुछ लोग जनता की कमाई से अपने पर करोड़ों खर्च कर देश को लूट कर बर्बाद कर रहे हैं । जनता को झूठे सपनों से आखिर कब तक ठगते रहोगे कभी तो अर्थशास्त्र का पहला नियम सभी को समझाना ही होगा कि आप करोड़ों लोग इसलिए भूखे नंगे गरीब और बेबस बदहाल हैं क्योंकि कुछ लोग ज़रूरत से कहीं ज़्यादा धनवान हैं फिर भी उनकी अधिक पाने की हवस मिटती नहीं हैं । आपको अगर धर्म अधर्म की बात समझनी है तो किसी भी धार्मिक ग्रंथ को उठा कर पढ़ना सभी यही बताते हैं कि सबसे दरिद्र वो लोग होते हैं जिन के पास सभी कुछ होता है तब भी उनकी और हासिल करने की हवस मिटती नहीं है । मैंने भी सपने ही नहीं देखे बल्कि सपनों में ज़िंदगी गुज़ारी है इक कविता ब्लॉग पर 2012 में लिखी याद आई है शायद कोई समझेगा ।
 
 

सपनों में जीना ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

अक्तूबर 24, 2012

देखता रहा
जीवन के सपने
जीने के लिये ,
शीतल हवाओं के
सपने देखे
तपती झुलसाती लू में ।

फूलों और बहारों के
सपने देखे ,
कांटों से छलनी था
जब बदन
मुस्कुराता रहा
सपनों में ,
रुलाती रही ज़िंदगी ।

भूख से तड़पते हुए
सपने देखे ,
जी भर खाने के
प्यार सम्मान के
सपने देखे ,
जब मिला
तिरस्कार और ठोकरें ।

महल बनाया सपनों में ,
जब नहीं रहा बाकी
झोपड़ी का भी निशां 
राम राज्य का देखा सपना ,
जब आये नज़र
हर तरफ ही रावण ।

आतंक और दहशत में रह के
देखे प्यार इंसानियत
भाई चारे के ख़्वाब ,
लगा कर पंख उड़ा गगन में
जब नहीं चल पा रहा था
पांव के छालों से ।

भेदभाव की ऊंची दीवारों में ,
देखे सदभाव समानता के सपने
आशा के सपने ,
संजोए निराशा में
अमृत समझ पीता रहा विष ,
मुझे है इंतज़ार बसंत का
समाप्त नहीं हो रहा
पतझड़ का मौसम।

मुझे समझाने लगे हैं सभी
छोड़ सपने देखा करूं वास्तविकता ,
सब की तरह कर लूं स्वीकार
जो भी जैसा भी है ये समाज ,
कहते हैं सब लोग
नहीं बदलेगा कुछ भी
मेरे चाहने से ।

बढ़ता ही रहेगा अंतर ,
बड़े छोटे ,
अमीर गरीब के बीच ,
और बढ़ती जाएंगी ,
दिवारें नफरत की ,
दूभर हो जाएगा जीना भी ,
नहीं बचा सकता कोई भी ,
जब सब क़त्ल ,
कर रहे इंसानियत का ।

मगर मैं नहीं समझना चाहता ,
यथार्थ की सारी ये बातें ,
चाहता हूं देखता रहूं ,
सदा प्यार भरी ,
मधुर कल्पनाओं के सपने ,
क्योंकि यही है मेरे लिये ,
जीने का सहारा और विश्वास । 



अप्रैल 15, 2024

ख़ाली की गारंटी दूंगा ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

            ख़ाली की गारंटी दूंगा ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया  

 मामला बेहद संजीदा है उनको गारंटी कार्ड छपवाने हैं , पहला सवाल यही है कि क्या एक सौ चालीस करोड़ जनसंख्या में सभी को अलग अलग वितरण करना होगा या सिर्फ उनको जिनके पास प्रमाण पत्र होगा कि  सरकार बनवाने में योगदान किया है । नहीं बिलकुल नहीं ये इलेक्टोरल बॉण्ड की बात नहीं है जिन्होंने भी चंदा दिया उनका हिसाब बराबर है इस हाथ लो उस हाथ दो की बात थी । उस को दुनिया भूल गई फिर क्यों दुखती राग को छेड़ते हो , वोट देने वालों का मामला है । चुनाव आयोग से भी सहयोग मिल जाए तो क्या बात हो वीवीपैट की गिनती करते करते देख कर बंद लिफ़ाफ़े में गारंटी कार्ड बंटवाना संभव होगा , या जैसे बैंक भेजते हैं डेबिट क्रेडिट कार्ड गोपनीय किसी काले कागज़ से छिपाकर । पर ये दोनों ही हिसाब मांगने लगते हैं कितना खर्चा कितनी आमदनी क्या क्या । आजकल व्हाट्सएप्प पर निमंत्रण से अन्य सभी संदेश भिजवाते हैं जिन का कोई हिसाब किताब नहीं , और उनको नतीजे घोषित होने के दिन तक ही सुरक्षित रखने का भी विकल्प हो सकता है । सरकार बने नहीं बने गारंटी का कोई प्रमाण निशानी नहीं बचनी चाहिए अच्छे दिन आने वाले हैं लोग अभी भी उलाहना देते हैं । 
 
योगी बाबा जी को ये ख़बर मिली तो आग बबूला हो गए , मेरी गारंटी झूठी उसकी सच्ची ये तो ठीक नहीं है । मैंने क्या क्या नहीं बेचा किसी ने पीठ नहीं थपथपाई उन्होंने बनाया क्या बना बनाया मिला उसे भी संभाला नहीं कुछ तोड़ा , फोड़ा कुछ खाया पिया बाक़ी सब बर्बाद किया ताकि कोई और कभी आये तो कुछ नहीं बचा रहे । कोई पढ़ने भी लगे तो उनकी गारंटी पढ़ते पढ़ते फिर से चुनाव की घड़ी आ जाए , अभी तक सभी कहते थे कोई जादू की छड़ी नहीं है कि झट पट सबकी सारी मांगे पूरी हो जाएं । लगता है शायद अब कोई अलादीन का चिराग़ मिल गया है जिसे रगड़ते ही हुक्म मेरे आका बोलता जिन्न हाज़िर हो जाता है । कहीं किसी पर दिल तो नहीं फ़िदा हो गया जो आसमान से चांद सितारे तोड़ने जैसी बात करने लगे हैं । इस गारंटी शब्द ने अनगिनत लोगों को तबाह किया है कहना आसान करना असंभव है , हां याद आया पिछली बार का ऐलान था सब मुमकिन है नामुमकिन कुछ भी नहीं अब बात वही है शब्दों का हेर फेर किया है । बात करने में बात बदलने में उनका सानी कोई नहीं बात पर खरे उतरना थोड़ा कठिन है उसकी नौबत नहीं आने देते बात ही बदल देते हैं । गारंटी पर लोग भरोसा करें इस का उपाय है इक गीत है जिसे सुन कर हर कोई ख़ुशी से झूमने लगेगा , पढ़ते हैं । 

साहिर लुधियानवी , नील कमल फिल्म का गीत । 

खाली डिब्बा खाली बोतल ले ले मेरे यार
खाली से मत नफरत करना खाली सब संसार

बड़ा-बड़ा सा सर खाली डब्बा ,  
बड़ा-बड़ा सा तन खाली बोतल
 
वो भी आधे खाली निकले 
जिन पे लगा था भरे का लेबल
हमने इस दुनिया के दिल में झाँका है सौ बार 
 
खाली डिब्बा खाली बोतल ले ले मेरे यार ....

भरे थे तब बंगलों में ठहरे
खाली हुए तो हम तक पहुंचे
 
महलों की खुशियों के पाले , 
फुटपाथों के गम तक पहुंचे
इन शरणार्थियों के सर पे दे दे थोड़ा प्यार |
खाली डिब्बा खाली बोतल ले ले मेरे यार....

खाली की गारंटी दूंगा ,  
भरे हुए की क्या गारंटी
 
शहद में गुड के मेल का डर है ,
घी के अन्दर तेल का डर है
 
तम्बाखू में घास का ख़तरा ,
सेंट में झूटी बास का ख़तरा
 
मक्खन में चर्बी की मिलावट ,
केसर में कागज की खिलावट
 
मिर्ची में ईंटों के घिसाई ,
आटे में पत्थर की पिसाई
 
व्हिस्की अन्दर टिंचर घुलता,
रबड़ी  बीच बलोटिन तुलता
 
क्या जाने किस चीज़ में क्या हो,
गरम मसाला लीद भरा हो

खाली की गारंटी दूंगा
भरे हुए की क्या गारंटी
 
क्यों दुविधा में पड़ा है प्यारे ,  
झाड़ दे पाकिट खोल दे अंटी
 
छान पीस कर खुद भर लेना ,  
जो कुछ हो दरकार 
 
खाली डिब्बा खाली बोतल ले ले मेरे यार....
 
 
खाली डिब्बा खाली बोतल-KHALI DABBA KHALI BOTAL-NEELKAMAL-MANNA DEY-FUNNY  SONG-BY SAMEER BHATTACHARYA - YouTube





गारंटी वाले बाबाजी ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

       गारंटी वाले बाबाजी ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

हालांकि ये कानून है कि कोई भी चिकित्सक किसी भी रोग का ईलाज करने की गारंटी देने की बात नहीं कह सकता है तब भी झोला छाप से लेकर बड़े बड़े अस्पतालों के विशेषज्ञ थोड़ा शब्दों का हेर-फेर कर रोगी को ऐसा यकीन करने पर विवश कर ही देते हैं । कंपनियों की बात अलग है अमिताभ बच्चन तक जिनका प्रचार किया करते थे उनके विज्ञापन झूठे साबित हुए तो किसी ने अमिताभ बच्चन जी को दोषी नहीं समझा । तभी किसी ने ये तरीका अपनाया है और उनके दल ने उनके नाम की गारंटी से अपनी नैया चुनावी समंदर में उतार दी है । आपको भरोसा है तो ठीक है अगर नहीं है तो उनके नाम के भरोसे कश्ती में सवार हो जाओ फिर चाहे भंवर हो या तूफ़ान आए आपको पार उतरना ही है इस पार से भवसागर पार तक नाम का सहारा काफ़ी है । किसी बाबा की गलती पकड़ी गई तो बार बार मांगी अदालत से माफ़ी है क्या इतना काफ़ी है ये तो गब्बर सिंह की बात है बड़ी नाइंसाफ़ी है । बच गए तीनों खूब कहकहे लगाए आखिर गोली खाये क्योंकि जो डर गया समझो मर गया । इतिहास में गब्बर सिंह का इंसाफ़ दर्ज है रहेगा हर कोई तेरा क्या होगा कालिया कहेगा और कोई मैंने आपका नमक खाया है हाथ जोड़ कहेगा । आखिर सबको जाना है हर कोई चार दिन दुनिया में ज़िंदा रहेगा । 
 
आप को जब कोई गारंटी देता है तो गारंटी कार्ड है कि वारंटी कार्ड है ध्यान से देखना , कब से कब तक की अवधि भी जांच लेना अन्यथा ग़ज़ब ढाते हैं लोग , रात को दिन बताते हैं लोग । अपना नाम पता जांच लेना ज़रूरी है कोई हिरण भागता रहता है अंदर उसके कस्तूरी है । बड़ा शोर है पिछले दस साल में कोई फ़िल्म नहीं बनी वो तो फ़िल्म का प्रोमो है ट्रेलर था फ़िल्म अभी बाक़ी है । आप समझ रहे थे क्या शो है क्या अदाकारी है क्या खेल तमाशा है पता चला जो खाया नहीं अभी इक बताशा है , आपको ट्रेलर देखने में होने लगी हताशा है फ़िल्म चलेगी और खूब चलेगी आपकी ज़िंदगी जितनी है तब तक देखते रहना । मेरा नाम जोकर फ़िल्म का नायक अंत में कहता है अभी उसका तमाशा ख़त्म नहीं हुआ है ये तो इंटरवेल है यानि मध्यांतर है जो कितना है उसे भी पता नहीं था । जोकर का तमाशा लोग कभी भूलते नहीं हैं , अरे भाई ये दुनिया इक सर्कस है और इस में बड़े को भी छोटे को भी नीचे से ऊपर ऊपर से नीचे आना जाना पड़ता है , हीरो से जोकर बन जाना पड़ता है । जोकर हंसता नहीं हंसाता है दुनिया को और राजनीति की सर्कस है जो जनता को रुलाती है तभी मोगैंबो खुश होता है । गारंटी कार्ड पर किसी का नाम दर्ज नहीं जिसको मिली गारंटी और न नीचे किसी की मोहर लगी है कोई हस्ताक्षर नहीं हैं ऐसा कार्ड वैध नहीं साबित होगा कभी शर्तों पर खरा नहीं उतरने पर नौबत आई तो आपको समझ आएगा चाहा क्या क्या मिला बेवफ़ा आ आ तेरे प्यार में गाईड फिल्म का नायक सोचता है , काहे नाचे सपेरा , मुसाफ़िर जाएगा कहां ।
 

 

घोषणापत्र की भूल-भुलैया ( अप्सरा कल्पना ) डॉ लोक सेतिया

    घोषणापत्र की भूल-भुलैया ( अप्सरा कल्पना ) डॉ लोक सेतिया 

हर चुनाव में ये भी रस्म निभाई जाती है , दुल्हन की डोली सजाई जाती है उसको ससुराल की सतरंगी दुनिया की रंगीन तस्वीर दिखलाई जाती है । बस ग्रह प्रवेश तक फूल राह पर बिछाए जाते हैं कांटों की सेज की असलियत छुपाई जाती है । कभी कोई कभी कोई और नाम देते हैं सभी राजनीतिक दल वाले वफ़ा चाहते हैं खुद वफ़ा से वाक़िफ़ नहीं होते लोग झूठों को सच छिपाने का नाहक इल्ज़ाम देते हैं । अभी तक जो हुआ किसी को खबर नहीं भविष्य में क्या होगा भगवान भी नहीं जानते मगर वोट मांगने वाले जनता को खैरात देने का वादा करते हैं अजब काम करते हैं । कौन दाता है कौन भिखारी है ये इक लाईलाज बिमारी है । कौन जाने कब तक कैसे जीना है हर किसी की सौ बरस जीने की तयारी है । शान से जीना क्या होता है स्वाभिमान से जीना किसे कहते हैं शायद हमने गुलामी को बरकत समझ लिया है । जिनको खुद हम चुनते हैं वही हम पर शासक बनकर कोड़े बरसाते हैं और हम दया करने की विनती करते हैं कायर बन सर झुकाते हैं । चलिए आज सभी राजनैतिक दलों के पुराने घोषणापत्र पढ़ते हैं और उनका मतलब समझाते हैं , इधर उधर की नहीं साफ़ साफ़ विषय पर आते हैं । 
 
सत्ताधारी उम्मीदवार से कहा आपके दल ने जो संकल्प पत्र जारी किया है ज़रा पढ़ कर सुनाओ और समझाओ । चार दिन बाद जिस को आधार बना कर वोट मांगते हैं अभी पढ़ा ही नहीं ठीक से बस कुछ शीर्षक जैसे रटे हुए थे जिनका अर्थ नहीं मालूम न ही ये समझते हैं कि उन को करना कैसे है । कोई दार्शनिक थे बोले नादान हैं इतना भी नहीं समझते कि जनता से सभी कुछ लिया जाता है अधिकांश खुद पर अपने साधनों सुविधाओं पर खर्च किया जाता है बच जाता है जितना जनता को लौटाया जाता है सैंकड़ों अड़चनों को लांघने की शर्त पूरी कर सकते हैं तभी ऊंठ के मुंह में जीरे की तरह । आपकी रगों से खून निचोड़ते हैं उस के बाद आपको खून बढ़ाने की दवा देने का वादा किया है लेकिन कितनों को मिलेगा कितने तड़पते तड़पते किसी और दुनिया में चले जाएंगे इस की गरंटी कौन दे सकता है । चतुर सुजान बतला रहे थे कि जिनकी किस्मत खराब होती है वही भिखारी बनकर हाथ फैलते हैं जिनको खुद पर भरोसा होता है उनको किसी से कोई खैरात नहीं मांगनी पड़ती वो अपने दम पर मेहनत से ज़िंदगी बसर कर लिया करते हैं । 
 
आपको अभी तक समझ नहीं आया कि जम्हूरियत वो तर्ज़े हुक़ूमत है जिस में बंदों को गिना करते हैं तोला नहीं करते , अर्थात आदमी की क़ाबलियत की नहीं संख्या का महत्व समझा जाता है । शासन करने वाले राजनेता अधिकारी तमाम संस्थाओं पर नियुक्त लोग देश को कुछ भी देते नहीं न देना चाहते हैं उनको सभी अधिकार खुद अपने लिए चाहिएं कोई फ़र्ज़ निभाना लाज़मी नहीं तभी 75 साल बाद देश की अधिकांश जनसंख्या मौलिक अधिकारों और बुनियादी सुविधाओं से महरूम है बेबस है लाचार है । देश और जनता की सेवा करने वालों को चुनने का कोई विकल्प ही नहीं है सभी सत्ता का अनुचित उपयोग करने वाले खड़े हैं । जैसे अधिकांश लोग अपनी लड़की का रिश्ता लोभी लालची और खुदगर्ज़ परिवार में नाकाबिल लड़के से कर पछताते हैं जनता भी सही ईमानदार की तलाश करने की कोशिश छोड़ जल्दी में गलत निर्णय लेती रही है । अब पछताए क्या होय जब चिड़िया चुग गई खेत , इन सभी राजनेताओं ने बाढ़ बनकर खेल की सुरक्षा करने की जगह सभी कुछ खा लिया है । इनके पेट ही नहीं आलीशान भवन शान ओ शौकत सभी गरीब जनता की दो वक़्त की रोटी छीन कर ही कायम है । ये तीसरा व्यक्ति कोई और नहीं सरकार नाम का इक दैत्य है जो रोटी बनाता नहीं रोटी खाता भी नहीं रोटी से खेलता है । 
 
जनहित और लोककल्याण की बात मत करना ये किसी और युग की बात है आजकल सभी सिर्फ और सिर्फ खुद या अपने दल संघठन की चिंता भी तभी तक करते हैं जब तक कोई मकसद पूरा होता रहता है अन्यथा किसी को बदलते देर नहीं लगती । विचारधारा से कोई मतलब नहीं किसी को और अपराधी बदमाश भी अपनी टोली में शामिल होते ही भलेमानस लगते हैं । सच तो ये है कि जनता की बात क्या खुद किसी राजनीतिक दल के लोग भी अपने घोषणापत्र को देखते तक नहीं है और उनकी कीमत रद्दी से बढ़कर नहीं रहती है चुनाव ख़त्म होते किसी को उनकी आवश्यकता नहीं रहती है । पौराणिक कथाओं में देवता हुआ करते थे जो खुद कुछ नहीं संचय करते थे अन्य लोगों को बांटते थे जितना पास होता , लेकिन कुछ राक्षस भी हुआ करते थे जो सभी से सभी छीन कर भी भूखे ही रहते थे । आज भी जिनको सब अपनी खातिर चाहिए वो राक्षस ही हैं लेकिन उनकी पहचान करना आसान नहीं है अक्सर जिसे देवता समझा वही दानव निकलता है । 
 
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