YouTube लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
YouTube लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मार्च 16, 2026

POST : 2070 241 ( Repeat ) ईमान अपना बेच कर कुछ करोड़ में ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

ईमान अपना बेच कर कुछ करोड़ में ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

ईमान अपना बेच कर , कुछ करोड़ में 
शामिल हुए सब लोग इस भाग - दौड़ में ।  
 
अच्छा - बुरा कोई नहीं सोचता यहां  
सारा ज़माना लग गया है जोड़ - तोड़ में ।  
 
देखो तुम्हें ये वक़्त क्या क्या दिखा रहा 
फंसते ही जाते लोग इसकी , मरोड़ में । 
 
हैरान सारा देश उनको ख़बर नहीं 
नुक़सान को कहने लगे लाभ , जोड़ में ।  
 
क्यों कर सभी को साथ लेकर चले नहीं 
अटके खड़े हैं लोग कितने ही , मोड़ में । 
 
नेता यूं करने लग गए प्यार देश को 
उठने लगी हो ख़ाज जैसे कि कोड़ में । 
 
' तनहा ' ज़माना दौड़ता हांफता यहां 
होते नहीं शामिल , कभी आप दौड़ में ।  
 

 

मार्च 14, 2026

POST : 2069 रिमझिम - रिमझिम सी बरसात और होती ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

 रिमझिम - रिमझिम सी बरसात और होती ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया 

 
रिमझिम रिमझिम सी बरसात और होती  
ऐसी कोई  ,  मुलाक़ात और होती ।  
 
कहने को आज रंगीन थी वो महफ़िल
आते तुम भी अगर , बात और होती ।
 
कर लेते हम कभी दिल की उनसे बातें 
होता दिन और , वो रात और होती । 
 
दामन फ़ैला नहीं ये किसी के आगे 
झोली में वरना ख़ैरात और होती । 
 
जो इस दुनिया के बाज़ार में न बिकता 
ऐसे दूल्हे की , बारात और होती ।  
 
बाज़ी हारे थे हम , खेल खेल में ही 
खेले हम होते , शह - मात और होती ।  
 
दुनिया के दर्दो - ग़म सब मिटा दे कोई 
' तनहा ' ऐसी करामात और होती ।  
 

 
   

मार्च 13, 2026

POST : 2068 सच कोई किसी को बताता नहीं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

 सच कोई किसी को बताता नहीं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा ' 

सच कोई किसी को बताता नहीं 
ये लोगों को वैसे भी भाता नहीं ।  
 
कहना तो आसां है मगर फिर भी 
मुश्किल है कि ज़ुबां पे आता नहीं । 
 
हम से वो हमारा पता जान कर 
नाम तक भी अपना बताता नहीं । 
 
मुस्कराया करो अपने हर ग़म पे 
रोने वालों को कोई हंसाता नहीं । 
 
फूल ने अर्थी से किया ये सवाल 
कोई दुल्हन को ऐसे सजाता नहीं । 
 
जा तो रहे हो , पत्थरों के शहर 
लौट के वहां से कोई आता नहीं । 
 
दवा जान के पी जाते हैं कुछ लोग 
ज़हर मरने को , कोई खाता नहीं ।  
 

 
 

मार्च 05, 2026

POST : 2063 हमको वापस अभी तो जाना है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

  हमको वापस अभी तो जाना है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा ' 

 
हमको वापस अभी तो जाना है  
इक ठिकाना , कहीं बनाना है ।  
 
लोग कितना बदल गए देखो 
रोज़ , कोई , नया बहाना है । 
 
उम्र भर , कौन साथ देता है 
एक दिन सब ने छोड़ जाना है । 
 
था बुरा कौन कौन अच्छा था 
सिर्फ़ बीता हुआ ,  ज़माना है । 
 
हमको आवाज़ कौन अब देगा 
किसलिए अब हमें बुलाना है । 
 
मुझको इतना ज़रा बताओ तो 
याद रखना , किसे भुलाना है ।
 
चंद सांसें अभी बची ' तनहा '
धड़कता दिल ठहर ही जाना है ।  
 

 

फ़रवरी 13, 2026

POST : 2054 ईमान अपना बेच कर कुछ करोड़ में ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

    ईमान अपना बेच कर कुछ करोड़ में ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

ईमान अपना बेच कर , कुछ करोड़ में 
शामिल हुए सब लोग इस भाग - दौड़ में ।  
 
अच्छा - बुरा कोई नहीं सोचता यहां  
सारा ज़माना लग गया है जोड़ - तोड़ में ।  
 
देखो तुम्हें ये वक़्त क्या क्या दिखा रहा 
फंसते ही जाते लोग इसकी , मरोड़ में । 
 
हैरान सारा देश उनको ख़बर नहीं 
नुक़सान को कहने लगे लाभ , जोड़ में ।  
 
क्यों कर सभी को साथ लेकर चले नहीं 
अटके खड़े हैं लोग कितने ही , मोड़ में । 
 
नेता यूं करने लग गए प्यार देश को 
उठने लगी हो ख़ाज जैसे कि कोड़ में । 
 
' तनहा ' ज़माना दौड़ता हांफता यहां 
होते नहीं शामिल , कभी आप दौड़ में ।   
 

 

जुलाई 26, 2024

POST : 1868 हमको मिली सज़ाएं हर बार तेरे दर पे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

  हमको मिली सज़ाएं हर बार तेरे दर पे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

  
हमको मिली सज़ाएं , हर बार तेरे दर पे 
आये हैं आज फिर हम सरकार तेरे दर पे । 
 
कोई नहीं यहां जो फ़रियाद अपनी सुनता 
शायद मिले किसी दिन वो प्यार तेरे दर पे । 
 
हमदर्द कौन किसका , बेदर्द  दुनिया सारी
आते हैं लोग होकर लाचार तेरे दर पे । 
 
भगवान बन के बैठे इंसान हमने देखे 
देखी बनी इबादत बाज़ार तेरे दर पे । 
 
सब झूठ के पुजारी मुजरिम हों जैसे सच के 
लेकिन छुपा रखे हैं क़िरदार तेरे दर पे ।
 
दस्तूर है निराला बस शोर करते रहना 
होती नहीं मधुर अब झंकार तेरे दर पे । 
 
जब देखता सभी कुछ ख़ामोश कैसे रहता 
होने लगी है इस पर तकरार तेरे दर पे । 
 
हमको तबाह करके ख़ुद चैन से है सोता 
हमने बना लिया है घर-बार तेरे दर पे । 
 
अहसान कर रहे हैं वरदान देने वाले 
सब लूट का लगा कर संसार तेरे दर पे । 
 
दी ज़िंदगी भी ऐसी जो मौत से हो बदतर
झोली रही है ख़ाली हर बार तेरे दर पे । 
 
' तनहा ' कभी जनाज़ा अपना उठेगा आख़िर 
उल्फ़त बुला ही लेगी इक बार तेरे दर पे ।  
 






 
 
 

मई 31, 2024

POST : 1832 नाम बदनाम होना बड़ी बात है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

        नाम बदनाम होना बड़ी बात है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

नाम , बदनाम होना , बड़ी बात है 
बस यही बन गई उनकी औकात है ।  
 
ज़ुल्म सहते नहीं लोग चुप चाप अब
शह हमारी  , हुई  आपकी मात है । 
 
होश आया , उड़ी नींद , ग़ुम चैन भी
खुल गई , आपकी , राज़ की बात है । 
 
हर तरफ़ था धुवां , सो रही रौशनी 
जल गया दीप , कैसी करामात है ।
 
शोर था हर तरफ़ एक बस आप हैं
अब मगर सच से करनी मुलाक़ात है । 
 
है हक़ीक़त इसे मान लो आप भी
बाद गर्मी सदा  , होती बरसात है । 
 
इक कहावत जो ' तनहा ' सुनी थी कभी  
ठीक कूबड़ हुआ , इक पड़ी लात है ।    





 
 

अप्रैल 24, 2024

POST : 1806 इस क़दर किरदार बौना हो गया है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

 इस क़दर किरदार बौना हो गया है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा ' 

इस क़दर किरदार बौना हो गया है
आस्मां , जैसे      बिछौना हो गया है ।
 
घर बनाया था कभी शीशे का तुमने 
किस तरह , टूटा खिलौना हो गया है । 
 
मथ रहे पानी मिले क्या छाछ मख़्खन 
शख़्स  , पानी में चलौना ,  हो गया है ।
 
है निराला  , आज का , दस्तूर भाई 
बिन बियाहे सब का गौना हो गया है । 
 
छान कर सब पीस कर कितना संवारा 
फिर हुआ क्या सब इकौना हो गया है । 
 
पी गया कितने ही दरिया को वो सागर 
था उछलता , और  , पौना हो गया है ।
 
ख़ूबसूरत था जहां ' तनहा ' हमारा 
हर नज़ारा अब , घिनौना हो गया है ।    



नवंबर 12, 2023

POST : 1744 अजब नज़ारा ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

              अजब नज़ारा ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

चाहता था कुछ कहना 
लग रहा जैसे बेज़ुबान था ,
सड़क किनारे खड़ा हुआ 
दुनिया का वो भगवान था । 
 
भूल गया था जैसे कोई 
अपना ही पता ठिकाना ,
खुद बनाया था सबको 
सब से मगर अनजान था । 
 
मंदिर के दर पर गया फिर 
मस्जिद की सीढ़ियां चढ़ा ,
पंडित को देख परेशान था 
मौलवी से मिल हैरान था । 
 
ढूंढ ढूंढ थक गया मिला न
उसको घर अपना कहीं भी ,
जहां पर थी कल इक बस्ती 
वहां पे बना हुआ श्मशान था ।
 
बे-शक़्ल आदमी थे या कि 
हर तरफ दिख रहे शैतान थे ,
थर- थर्राता - सा खड़ा वहां 
इक किनारे पे छुपा ईमान था ।  
 
लिखा था लाशों पर सभी 
ये हिंदू था वो मुसलमान था ,
वो बनाता रहा हमेशा से ही 
सिर्फ और सिर्फ इंसान था । 
 
मैंने क्या बनाया था इनको 
और ये कैसे ऐसे बन गये हैं ,
देख कर हाल दुनिया का वो 
हुआ बहुत अधिक पशेमान था ।  

(    बहुत  पुरानी डायरी से पुरानी लिखी रचना है । व्यंग्य-यात्रा पत्रिका के अंक में भी शामिल है    ) 
 

 
 
 



     

अक्टूबर 31, 2023

POST : 1734 रुसवाई ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

                रुसवाई ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया  

न बार बार आज़माया करो 
यूं ही न दिल को जलाया करो । 
 
वो न बदलेंगे कभी 
न ये उम्मीद लगाया करो । 
 
जहां होती हो रुसवाई 
न उस गली में जाया करो । 
 
मिले जो चुरा के नज़र 
उसे न कुछ समझाया करो । 
 
झूठ के चाहने वालों को 
सच न कोई बताया करो । 
 
फ़रेब हर बात में है 
इन बातों में न आया करो । 
 
कभी जो प्यार से नहीं मिलता 
न उसे घर बुलाया करो । 
 
      
 

 

जून 26, 2023

POST : 1684 सुनो गर दास्तां तुमको सुनाएं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

     सुनो गर दास्तां तुमको  सुनाएं  ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

सुनो गर दास्तां तुमको सुनाएं  
तुम्हें हम मेहरबां अपना बनाएं ।

नज़र आये नया कोई  सवेरा   
डराने लग गई काली घटाएं ।
 
सभी इंसान हों इंसानियत हो   
यही मज़हब चलो अपना बनाएं ।  
                                           
है दिल ऊबा हुआ तनहाइयों से
कोई अपना मिले घर पर बुलाएं ।

हमें रुसवा नहीं करना है उनको  
किसी को ज़ख्म कैसे हम दिखाएं ।

चलेंगे साथ मिलकर ज़िंदगी भर  
सभी शिकवे गिले हम भूल जाएं ।

तुम्हारा साथ मिल जाए हमें तो
मुहब्बत क्या ज़माने को दिखाएं । 
 
   {  1973 की लिखी अपनी  पहली ग़ज़ल को सुधारा है फिर से   }




अप्रैल 18, 2023

POST : 1652 सच बोलना तुम न किसी से कभी ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

  सच बोलना तुम न किसी से कभी ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

सच बोलना तुम न किसी से कभी 
बन जाएंगे दुश्मन , दोस्त सभी । 
 
तुम सब पे यक़ीं कर लेते हो 
नादान हो तुम ऐ दोस्त अभी । 
 
बच कर रहना तुम उनसे ज़रा 
कांटे होते हैं , फूलों में भी ।  

पहचानते भी वो नहीं हमको 
इक साथ रहे हम घर में कभी । 

कोई  याद उन्हें आया होगा  
सीने में दर्द उठा है तभी ।
 

 


अप्रैल 20, 2021

POST : 1487 ज़िंदगी तू बेवफ़ा क्यों है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

    ज़िंदगी तू बेवफ़ा क्यों है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा ' 

ज़िंदगी , तू बेवफ़ा क्यों है 
मौत मुझसे ही ख़फ़ा क्यों है । 
 
बेगुनाही की भी है पादाश    
ये जहां का फ़लसफ़ा क्यों है । 
 
( पादाश :  सज़ा )  
 
ऐ मेरे क़ातिल , बता तू ही 
मुझ को तुझ से ही वफ़ा क्यों है ।  
 
क्यों इनायत है रकीबों पर 
तेरी हम से ही ज़फ़ा क्यों है । 
 
कर के वादा फिर मुकर जाना  
यूं ही करता हर दफ़ा क्यों है ।  

 
ज़िंदगी से , मौत सस्ती है  
इस ख़सारे में , नफ़ा क्यों है ।  
 
( ख़सारा : नुकसान ) 
 
प्यार लिखना था जहां ' तनहा '
रह गया ख़ाली सफ़ा क्यों है ।  
 
 

 

 

अप्रैल 03, 2021

POST : 1481 हम जो चाहत में आह भरते हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

हम जो चाहत में आह भरते हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

हम जो चाहत में आह भरते हैं 
जैसे कोई गुनाह करते हैं । 
 
मार कर पत्थरों से अहले-जहां 
पेड़ से फल की चाह करते हैं । 
 
याद करके अतीत हम अपना 
अपनी रातें सियाह करते हैं । 
 
हमको उनसे नहीं गिला कोई 
दिल को हम खुद तबाह करते हैं । 
 
एक सहरा में हम - से दीवाने 
ख़्वाब में सैरगाह करते हैं ।  
 
हम  मुसाफ़िर कहां ठहरते हैं  
नित नई एक  राह करते हैं । 
 
दाद मांगी कभी नहीं  ' तनहा '  
लोग ख़ुद  वाह - वाह करते हैं ।
 
 


मार्च 31, 2021

POST : 1478 इक मुसाफ़िर को अभी तक कारवां की तलाश है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

      इक मुसाफ़िर को अभी तक कारवां की तलाश है ( ग़ज़ल ) 

                            डॉ लोक सेतिया   ' तनहा '

इक मुसाफ़िर को अभी तक कारवां की तलाश है 
ख़्वाब में देखा था जिसको , उस जहां की तलाश है । 
 
अजनबी लगने लगे जब , दोस्त दुश्मन यहां सभी  
इस जहां में अब सभी को  , मेहरबां की तलाश है । 
 
बोल खुद पाते नहीं , कहनी उन्हें एक दास्तां 
बेज़ुबानों को यहां पर , हमज़ुबां की तलाश है । 
 
कुछ मुसाफ़िर थे जिन्हें खुद मंज़िलें ढूंढती रहीं 
है अजब तक़दीर अपनी इक मकां की तलाश है । 
 
मौसमों से मिट गए हैं , काफ़िलों के निशान तक 
हर किसी को आज कल इक कारवां की तलाश है । 
 
पूछती शायद , सड़क की लाश , सब से सवाल है 
क़त्ल खुद करके तुम्हें अब किस निशां की तलाश है । 
 
गुफ़्तगू आवाम से करनी है  ' तनहा ' निज़ाम ने 
दाद दे  हर बात पर , उस बेज़ुबां की तलाश है । 






 
 
 
 
 

मार्च 07, 2021

POST : 1475 गांव का अपना सब मकां ढूंढते हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

गांव का अपना सब मकां ढूंढते हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

गांव का अपना सब मकां ढूंढते हैं 
गर्मियों की फिर छुट्टियां ढूंढते हैं । 
 
जा के वापस कच्ची गली में वहां पर  
अपने पांवों के  कुछ निशां ढूंढते हैं । 
 
ख़्वाब जितने देखे रहे सब अधूरे 
उम्र भर हम फिरते गुमां ढूंढते हैं । 
 
सुन के खबरें सबकी हुई नींद गायब  
निगहबानी को  , पासबां ढूंढते हैं । 
 
सबक नफरत का भूलने के लिए अब  
प्यार वाली  , इक  दास्तां ढूंढते हैं । 
 
पा के ऊंचे पद लोग थे झुक के रहते 
हम उन्हीं जैसे , रहनुमां ढूंढते हैं । 
 
मतलबी  दुनिया बेरहम लोग कितने   
हम कहां  ' तनहा '  मेहरबां ढूंढते हैं ।
 

 
 

सितंबर 24, 2018

POST : 912 इक गुलाबी रुमाल आया है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

  इक गुलाबी रुमाल आया है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

इक गुलाबी रुमाल आया है
बन के लेकिन सवाल आया है । 

दरो-दीवार सहमे सहमे हैं
जैसे घर में बवाल आया है । 

खेल सत्ता कई दिखाती है
ये तमाशा कमाल आया है । 

अब परिन्दे लगे समझने हैं
ले के सय्याद जाल आया है । 

गर्दिशे वक़्त और तुम देखो
इक नई चल के चाल आया है । 

खत ये लिक्खा हुआ गुलाबी है
जैसे होली- गुलाल आया है । 

आज ' तनहा ' निखार कलियों पे
देख फिर बेमिसाल आया है । 
 

 
 


 



सितंबर 21, 2018

POST : 909 इधर - उधर सब धुआं - धुआं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया 'तनहा'

इधर - उधर सब  धुआं - धुआं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  'तनहा' 

इधर उधर  सब  धुआं - धुंआ
न रौशनी का बचा  निशां । 

ये पूछती है नज़र - नज़र 
है आदमी का कोई मकां  । 

समझ सके जो यहां है कौन 
जरा - सी इक बच्ची की ज़ुबां । 

कहीं भी दिल लगता ही नहीं 
जो कोई जाए भी तो कहां  । 

सुनाएं कैसे किसी को हम 
इक उजड़े दिल की ये दास्तां । 
 
वही चमन ख़ुद जला रहे 
जो बन के बैठे हैं बागबां ।  

तबाह ' तनहा ' करो न अब 
बसा सकोगे न फिर जहां । 
 
 

War Images - Free Download on Freepik

 


 

मार्च 20, 2017

POST : 621 खामोश रहना जब हमारी एक आदत बन गई ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

     खामोश रहना जब हमारी एक आदत बन गई ( ग़ज़ल ) 

                        डॉ लोक सेतिया "तनहा"

खामोश रहना जब हमारी एक आदत बन गई
हर सांस पर पहरे लगाना सब की चाहत बन गई ।

इंसान की कीमत नहीं सिक्कों के इस बाज़ार में
सामान दुनिया का सभी की अब ज़रूरत बन गई ।

बेनाम खत लिक्खे हुए कितने छुपा कर रख दिये
वो शख्स जाने कब मिले जिसकी अमानत बन गई ।

मतलूब सब हाकिम बने तालिब नहीं कोई यहां
कैसे बताएं अब तुम्हें ऐसी सियासत बन गई ।

( मतलूब=मनोनित। तालिब=निर्वाचित )

अनमोल रख कर नाम खुद बिकने चले बाज़ार में
देखो हमारे दौर की कैसी कहावत बन गई ।

सब दर्द बन जाते ग़ज़ल , खुशियां बनीं कविता नई
मैंने कहानी जब लिखी पैग़ामे-उल्फ़त बन गई ।

लिखता रहा बेबाक सच " तनहा " ज़माना कह रहा
ऐसे  किसी की ज़िंदगी कैसी इबादत बन गई ।   
 

 

जुलाई 09, 2013

POST : 351 झूठ वाला पर कदे नां अखबार बणना ( पंजाबी ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

     झूठ वाला पर कदे नां अखबार बणना ( पंजाबी ग़ज़ल )

                          डॉ  लोक सेतिया

कुझ वी भांवें होर बंदे सौ वार बणना
झूठ वाला पर कदे नां अखबार बणना ।

दुश्मनी करना बड़ा सौखा कम है लोको
पर बड़ा औखा है हुंदा दिलदार बणना ।

राह मेरी रोक लैणा मैं भुल न जावां
मैं नहीं भुल के कदीं वी सरकार बणना ।

लोक तैनूं जाणदे हन सौ झूठ बोलें
सिख नहीं सकिया किसे दा तूं यार बणना ।

हर किसे दे नाल करदा हैं बेवफाई
कम अदीबां दा नहीं इक हथियार बणना ।

नावं चंगा रख के कीते कम सब निगोड़े
सोच लै हुण छड वी दे दुहरी धार बणना ।

शौक माड़ा हर किसे दे दिल नूं दुखाणा
आखदे ने लोक मंदा हुशियार बणना ।