अगस्त 29, 2025

POST : 2005 फेसबुक से अलग दुनिया ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

       फेसबुक से अलग दुनिया ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया  

     आप भी शायद ऐसा करते हों किसी को ढूंढने को फेसबुक पर तलाश करते हों अथवा किसी का नंबर व्हाट्सएप पर है कि नहीं इस चिंता में रहते हों । तमाम लोग अपनी पहचान के लोगों से इसी तरह से संपर्क में रहते हैं । सोशल मीडिया पर कौन कैसा मौजूद लगता है अंदाजा लगा लेते है मिलने की ज़रूरत नहीं हाल चाल बढ़िया है व्हाट्सएप्प पर संदेश से समझ लेते हैं । कुछ लोग दुनिया छोड़ चले गए लेकिन उनकी फेसबुक व्हाट्सएप्प कोई परिजन जीवित रखे है , अमर होने का कितना सरल उपाय है । हैरान मत होना कभी किसी दिन आपको खुद जिस नाम की फेसबुक है वही जानकारी दे कि आज पुण्यतिथि है । हमेशा दिवंगत आत्मा के परिजन ऐसी सूचना देते थे कि बाबूजी माताजी के निधन की दुःखद घड़ी में शोकसभा इत्यादि की बात । आजकल जिस किसी को देखते हैं फोन पर व्यस्त रहते हैं , कहते हैं दायरा बड़ा है दिन में सैंकड़ों से वार्तालाप करना पड़ता है । लेकिन अधिकांश लोग मिलते जुलते कुछ ख़ास लोगों से है वो भी मतलब या ज़रूरत की बात , अन्यथा कब किसी से मिलना जुलना क्या बात करना फ़ोन पर छूट गया याद ही नहीं । कुछ लोग मिलते ही हैं दो अवसर पर शादी समारोह या श्रद्धांजलि सभाओं में , जाने कितनी मधुरता बची है रिश्ते नातों में । किसी शायर ने कहा था आंखे खुली रही मरने के बाद किसी के इंतज़ार में , आज ये वास्तविकता बनता जा रहा है । आप जिनको चाहते हैं बुलाना मिलना अपने सुःख दुःख बांटना किसी कोशिश कर लें नहीं आने को सौ नहीं हज़ार बहाने हैं , क्या क्या गिनवाएं । लेकिन जिस दिन आपकी मौत की खबर मिलेगी ऐसे दौड़े चले आएंगे जैसे इसी का इंतज़ार था , नहीं कोई किसी की मौत नहीं मांगता लेकिन जिस की खोज खबर ज़िंदगी में नहीं ली मरने पर अधिक आंसू बहाने से क्या होगा । 
 
आपने खुद को कैद कर लिया है इक स्मार्ट फोन की बनावटी दुनिया में भूल गए हैं कि असली दुनिया कोई और है जो हुआ करती थी । हमने काल्पनिक संसार बना लिया है जिस में ख़ुशी से ग़म तक सभी दिखाई शानदार लगते हैं वास्तव में पर्दे के पीछे खोखलापन रहता है । आपको सोशल मीडिया पर नज़र आना है तो कैसे लगते हैं महत्वपूर्ण हैं कहां हैं क्यों हैं इसकी चिंता छोड़ देते हैं । लगता है अब कोई किसी से अपने मन की बात नहीं करता होगा , कोई बताता नहीं किसी को क्या क्या परेशानी है सभी कहते हैं अच्छे हैं । लेकिन मुझे दुनिया अपने आस पास की ऐसी सतरंगी दिखाई नहीं देती है , ऐसे हालात में कोई कितने झूठ बोल सकता है कि मैं अच्छा हूं और बाकी सब भी शानदार है । हर शख़्स बनने लगा सरकारी इश्तिहार है , सरकार बताती है जिसे पतझड़ समझ रहे हैं वही असली बहार है । फेसबुक व्हाट्सएप और स्मार्ट फोन ने हमको झूठ बोलने में माहिर बना दिया है , कहां है क्या वास्तव में व्यस्त हैं किसे खबर है । इस नकली दुनिया के रिश्ते नाते कितने सही कितने झूठे हैं ये राज़ कोई नहीं जानता है । आख़िर में इक कविता नाट्यशाला से अंत करते हैं ।  
 

नाट्यशाला ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

मैंने देखे हैं
कितने ही
नाटक जीवन में
महान लेखकों की
कहानियों पर
महान कलाकारों के
अभिनय के ।

मगर नहीं देख पाऊंगा मैं
वो विचित्र नाटक
जो खेला जाएगा
मेरे मरने के बाद
मेरे अपने घर के आँगन में ।

देखना आप सब
उसे ध्यान से
मुझे जीने नहीं दिया जिन्होंने कभी
जो मारते  रहे हैं बार बार मुझे
और मांगते रहे मेरे लिये
मौत की हैं  दुआएं ।

कर रहे होंगे बहुत विलाप
नज़र आ रहे होंगे बेहद दुखी
वास्तव में मन ही मन
होंगे प्रसन्न ।

कमाल का अभिनय
आएगा  तुम्हें नज़र
बन जाएगा  मेरा घर
एक नाट्यशाला । 

What is Metaverse, why facebook is focusing in this segment, know all about  metaverse | What is Metaverse: मेटावर्स एक ऐसी दुनिया जहां आपको सबकुछ अलग  नजर आएगा, जानिए इसमें क्या है

अगस्त 27, 2025

POST : 2004 छुपा - छुपी खेल रहे हैं ( हास - परिहास ) डॉ लोक सेतिया

   छुपा - छुपी  खेल रहे हैं ( हास - परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

बड़ी उम्र में भी बचपन के खेल खेलना जिनकी आदत होती है उनको हुनर आता है आधी अधूरी बात बताने का जितनी बताते हैं उस से ज़्यादा छुपा लेते हैं ।  राज़ खुल गया तो कहते हैं बताया तो था मगर लगा जितनी ज़रूरी है उतनी बताना चाहिए । घर दफ़्तर की हर बात बताना संभव नहीं होता है कांट छांट करना मज़बूरी है कुछ दूरी कुछ फासले रखना समझदारी है । इक अंग्रेजी कहावत है कि जो अपनी पत्नी को सभी कुछ जो भी जानता है बता देता है , वो कुछ भी नहीं जानता है । लेकिन कोई कितना भी चतुर सुजान हो पत्नी से कुछ भी छिपा रहता नहीं है आधुनिक युग में स्मार्ट फ़ोन से लेकर पति के सहयोगी मित्र से तमाम अन्य सूत्र होते हैं जिस का उपयोग करना हर नारी जानती है । मेरा जीवन खुली किताब है कहने वाले किताब में सूखे फूल को लेकर लाख कोशिश करें इश्क़ छुपाने से छिपता नहीं है । अनारकली जानती है कि बादशाह को चुनौती देना मुसीबत को दावत देना है , पर्दा नहीं जब कोई खुदा से बंदों से पर्दा करना क्या जब प्यार किया तो डरना क्या । आंकड़े छुपाना हमेशा सरकार की आदत रही है , कभी अपनी असलियत छुपाना जो नहीं हैं बताना भी राजनीति का हिस्सा समझे जाते हैं । 
 
पारदर्शिता सामाजिक सार्वजनिक जीवन में आवश्यक है , लोकतांत्रिक व्यवस्था का आधार है देश समाज से कुछ भी छिपाने से शंका होती है कि सच को सामने लाना चाहिए । पत्रकारिता का पहला सबक खबर की परिभाषा से शुरू होता है , ' खबर वो सूचना है जो जनता से छुपाई जा रही है पत्रकार का फ़र्ज़ है उस की तलाश करना और सभी तक पहुंचाना ' , इसको भुलाना पीत पत्रकारिता कहलाता है । लेकिन जब पैसे से विज्ञापन और तमाम अन्य भौतिक संसाधन मिलने से पत्रकार उसी बात का चौबीस घंटे शोर मचाते हैं जिस का डंका शासक पीटते हैं तब माजरा संगीन लगता है । जनता की तरफ नहीं सत्ता संग रंगरलियां मनाना खुद ही अपनी मान मर्यादा का त्याग कर चाटुकारिता करने को पत्रकारिता का पतन कहलाता है । कितने ही लोग खुद अपनी असली सूरत नहीं दिखलाते तो छुपने छुपाने की ज़रूरत होती है । शरारती बच्चे अध्यापक की नज़र से बचने को कभी किसी कभी किसी की ओट लेकर छुपने की कोशिश करते हैं , आजकल शासक पत्रकार से इंसाफ़ की कुर्सी पर आसीन लोग आपस में तालमेल बिठाकर इक दूजे को ढकने का प्रयास करते करते खुद अपने आप को ही नंगा कर रहे हैं । 
 
बड़े बड़े लोग खुद कभी अपनी आत्मकथा लिखा करते थे और तमाम ऐसी घटनाएं जिनका किसी को पता नहीं था सार्वजनिक करते थे । मकसद होता था अपनी सफलताओं विफलताओं के पीछे कितना कुछ रहता हैं जिनसे कुछ होता कुछ नहीं संभव होता है । इधर जीवनी शासकों की किसी से लिखवाई जाती है जिस में केवल उजला पक्ष दर्शाया जाता है कालिख़ लगाने की बात नहीं सामने आती है । सत्ताधरी की ऐसी जीवनी सरकारी और निजी कॉलेज पुस्तकालय को खरीदने को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग कहता है ऊंचे दाम पर मगर बाद में वही पुस्तक आपको मिल सकती है बेहद सस्ते दाम पर । साहस का काम होता है अपने द्वारा हुए अनुचित कार्यों की बात को स्वीकार करना , आजकल कौन इतना सच्चा है इक कसौटी पर खरा उतरना जो चाहता हो , अपना गुणगान करवाना कोई बड़ा काम नहीं होता है । अपनी ऊंचाई को बढ़ाने को किसी चोटी पर खड़े होने की ज़रूरत बौने लोगों को पड़ती है और कुछ लालबहादुर छोटे कद के भी किरादर से बड़े साबित होते हैं दुनिया की नज़र में ।  
 
 ज़रा सामने तो आओ छलिये Zara Saamne To Aao Chhaliye - निरुपा रॉय सोंग - लता  मंगेशकर, मोहम्मद रफ़ी - YouTube

अगस्त 26, 2025

POST : 2003 अधर में लटके हुए हैं ( व्यंग्य - खरी खरी ) डॉ लोक सेतिया

       अधर में लटके हुए हैं ( व्यंग्य - खरी खरी  ) डॉ लोक सेतिया 

दो पाटों में पिसना इसी को कहते हैं , त्रिशंकु जैसी हालत है न ज़मीन पर न किसी आसमान पर , या फिर आज़ाद नहीं ग़ुलाम भी नहीं । गूंगे नहीं हैं मगर आवाज़ है निलकती ही नहीं है ,  कुछ लोग भटकते रहते हैं धोबी का गधा घर का न घाट का ।  लोकतंत्र का लेबल बाहर भीतर का खेल तमाशा बिल्कुल विपरीत छुपाए से छुपता नहीं जब छुपाना भी जिसे मुश्किल बताना भी जिसे मुश्किल आगे कुंवा पीछे खाई , होने लगी जगहंसाई । निकले थे किधर जाने को पहुंच गए हैं जिधर जाना वर्जित था , जनता समझती है अपनी सरकार बनाई है बड़े बड़े कारोबारी जानते हैं असली शासक वही हैं । सरकार और धनवान लोग जिस चलती चक्की के दो पाट हैं जनता को उसमे डालना पड़ता है पिसाई करनी पड़ती है , साबुत बचा न कोय । कबीर नहीं है कोई आजकल जनता की दुर्दशा देख रोने वाला , ख़ाता है कोई खेलता है रोटी से भूखा रहता है बीज बोने वाला । अमीर गरीब बड़ा छोटा का सवाल पीछे छूट गया है ख़रीदार बनकर साहूकार से सरकार तक जनता को निचोड़ते हैं खून पसीना बन जाता है उनकी तिजोरी का माल पैसा पूंजी कितने ही रूप में । संविधान समानता सुरक्षा सभी खोखले साबित होते हैं जब संस्थाएं विफल साबित होती हैं निष्पक्षता पूर्वक अपना कर्तव्य निभाने में और सत्ताधारी शासकों की कठपुतलियां बनकर संविधान की बात को दरकिनार कर लोकतंत्र को खेल खिलौना समझ तोड़ते मरोड़ते हैं । 
 
देश की एक सौ चालीस करोड़ जनता विवश होकर लूटेरों अपराधी लोगों के सामने बेबस है हाथ जोड़ रहम की भीख मांगती हुई कैसी आज़ादी है कैसे सपने हैं जो बिखर गए हैं टूट चुके हैं । शासक बनते ही राजनेता जनता की वास्तविक समस्याओं को छोड़ कर केवल अपने स्वार्थ साधने में लगे हुए हैं । ग़ज़ब की व्यवस्था है बड़े बड़े अपराधी माननीय कहलाते हैं जबकि साधरण नागरिक बिना किसी अपराध ज़ुल्म सहते हैं कोई अदालत उनकी बात सुनना तो दूर उनकी तरफ देखती तक नहीं है । प्रशासनिक अधिकारियों से लेकर सांसदों विधायकों क्या पूर्व विधायकों को पेंशन सुविधाएं हासिल हैं जनप्रतिनिधि होने से कभी रहने से मगर जिन्होंने उनको निर्वाचित किया उनको मिलता है ऐसा असुरक्षित जीवन जिस में जीना मरना ही नहीं बार बार मरना लगता है । अमृत महोत्सव की गूंज है मगर अमृत किस को मिलता है वास्तविकता में जिन्होंने हमेशा ज़हर उगला है नफ़रत की फ़सल बोई है । ईश्वर धर्म सभी को अपनी शतरंज के मोहरे बनाकर नेता प्रशासक जनता की बात करने का दम भरने वाले अख़बार इलेक्ट्रॉनिक मीडिया धनवान लोग मिलकर देश की संपत्ति और ख़ज़ाने की लूट में अपना दीन ईमान भुलाये हुए हैं । 
 
जनता का हर अधिकार अधर में लटका हुआ है , कितने भंवर उसको घेरे हुए हैं , पतवार टूटी हुई है नाव जर्जर है लहरों से टकराती है । डूबना नियति है और डुबोने वाले खुद को खेवनहार कहते हैं जो खुद किनारे पहुंच जाते हैं सुरक्षा जैकेट की बदौलत , हमको दूर से हाथ हिलाकर दिलासा देते हुए कि इंतज़ार करो अगली बार नैया होगी पार , पढ़ लिया सभी का झूठा इश्तिहार । जनता की सुनता कोई नहीं चीख पुकार नेताओं की होती है जयजयकार देश का कर बंटाधार , कोई इस पार कोई उस पार मची हाहाकार ।  हर कोई हैरान परेशान है ये कैसा हिन्दुस्तान है अभिशाप बन गया वरदान है व्यर्थ लगने लगा शहीदों का बलिदान है । मतलब परस्त हैं सभी जान है तो जहान है ये सिर्फ झूठी शान है । माझी बनकर डुबाने लगे हैं जनता को जी भर के सताने लगे हैं नया भारत जिस को बताते हैं तस्वीर देख लोग घबराने लगे हैं , रहनुमा जनता को डराने लगे हैं । शायद दुल्हन की डोली कहार राह में लूटकर अपनी हवस मिटाने की खातिर अस्मत लूट कर बेटियों को जलाने लगे हैं , ये कैसे मंज़र नज़र आने लगे हैं , इक नई तहज़ीब के पेशे नज़र आदमी को भूनकर खाने लगे हैं । 
 
आख़िर में इक ग़ज़ल मेरी बहुत पुरानी 14 अप्रैल 1999 की डायरी पर लिखी हुई पेश है । 
 
 

 हमको ले डूबे ज़माने वाले ( ग़ज़ल ) 

डॉ लोक सेतिया "तनहा"

हमको ले डूबे ज़माने वाले
नाखुदा खुद को बताने वाले ।
 
आज फिर ले के वो बारात चले 
अपनी दुल्हन को जलाने वाले ।

देश सेवा का लगाये तमगा
फिरते हैं देश को खाने वाले ।

ज़ालिमों चाहो तो सर कर दो कलम
हम न सर अपना झुकाने वाले ।

हो गये खुद ही फ़ना आख़िरकार 
मेरी हस्ती को मिटाने वाले । 
 
एक ही घूंट में मदहोश हुए 
होश काबू में बताने वाले । 
 
उनको फुटपाथ पे तो सोने दो
ये हैं महलों को बनाने वाले ।

काश हालात से होते आगाह 
जश्न-ए-आज़ादी मनाने वाले । 
 
तूं कहीं मेरा ही कातिल तो नहीं
मेरी अर्थी को उठाने वाले ।

तेरी हर चाल से वाकिफ़ था मैं
मुझको हर बार हराने वाले ।

मैं तो आइना हूँ बच के रहना
अपनी सूरत को छुपाने वाले ।
 
( ब्लॉग पर 26 जुलाई 2012 को पब्लिश की हुई पोस्ट 19 ) 
 
 चलती चक्की देखकर दिया कबीरा रोय। कबीरदास जी के दोहे। Kabir ke dohe।#kabir  #motivational
 
 


 
  

अगस्त 25, 2025

POST : 2002 तकदीर से कुछ मिला नहीं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ( बाईस वर्ष पुरानी लिखी ग़ज़ल 2003 की डायरी से )

       तकदीर से कुछ मिला नहीं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

                     (  बाईस वर्ष पुरानी लिखी ग़ज़ल 2003 की डायरी से )  

तक़दीर से कुछ मिला नहीं 
दुनिया से शिकवा गिला नहीं । 
 
इक शाख़ से फूल टूटकर 
मुरझा गया फिर ख़िला नहीं ।  
 
वो ज़ख़्म दिल के करीब है 
जो चारागर से सिला नहीं । 
 
इस शहर का नाम दर्द है 
हमदर्द कोई मिला नहीं ।  
 
मंज़िल नहीं हमसफ़र नहीं 
आता नज़र काफ़िला नहीं । 
 
तूफ़ान आ कर गुज़र गए 
वो पेड़ उनसे हिला नहीं । 
 
' तनहा ' अकेले खड़े हुए 
बाक़ी रहा सिलसिला नहीं ।  
 

 


 
 

अगस्त 21, 2025

POST : 2001 अपराधियों की लक्ष्मणरेखा ( व्यंग्य - विनोद ) डॉ लोक सेतिया

  अपराधियों की लक्ष्मणरेखा ( व्यंग्य - विनोद ) डॉ लोक सेतिया 

हद निर्धारित करना ज़रूरी है , अपराध करना बुरा नहीं है अपराध कर आप राजनीति में प्रवेश करने को स्वतंत्र हैं , आप सांसद विधायक बनकर मौज से सत्ता की मलाई खाने का कार्य कर सकते हैं समर्थन देकर सरकार बनवा कर । लेकिन आप खुद सरकार नहीं बन सकते , मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री बनने का सपना देखना सीमा का उलंघन करना है । सांसद , विधायक ही नहीं धनवान उद्योगपति भी चंदा देकर पर्दे के पीछे छुपकर कुछ भी कर सकते हैं करवा सकते हैं लेकिन लोभ लालच की लक्ष्मणरेखा का पालन करना ज़रूरी है । यहां आपको रामायण काल की बात पर नहीं सोचना कि रावण कौन है लक्ष्मण कौन सीता कौन , आधुनिक युग में कब किरदार बदल जाते हैं पता ही नहीं चलता है रावण सीता को ही लक्ष्मणरेखा  से बाहर आने को विवश कर हरण करे ज़रूरी नहीं है आधुनिक युग में कोई नारी किसी सीमा को लांघने से संकोच नहीं करती है । ये अपराधी बाहुबली राजनेताओं को चेतावनी है कि गंभीर से गंभीर अपराध कर के भी आप जीवन भर सज़ा से बच कर सब कुछ हासिल कर सकते हैं सिर्फ सर्वोच्च पद पर बैठना संभव नहीं मना है । 
 
इसको नया भारत कहते हैं सत्ता की हवेली में गुनाहों के झरने जब बहते हैं मुजरिम बेगुनाह समझे जाते हैं सत्ता जानती हैं गहरे से गहरे दाग़ कैसे मिटाए जा सकते हैं । शासक जिस शीशे के महल में रहते हैं बुलंदी पर कभी किसी हाल में नहीं ढहते हैं । राजनीति जिसको समझते हैं इक पत्थरों का शहर है पत्थर के लोग बसते हैं दिल भी शीशे के नहीं होते और मोम की तरह इंसान पिघलते नहीं हैं बर्फ़ जैसे मिजाज़ हैं किसी धूप से गर्मी से भी पानी पानी नहीं होते हैं ग़ज़ब की बात है । अपराधी भी मासूम चेहरे वाले दिखाई देते हैं और शरीफ़ लोग भी कभी शक़्ल सूरत से डरावने लगते हैं , इधर नायक ख़लनायक अच्छाई बुराई की पहचान बदल गई है ।
 
लक्ष्मणरेखा की कल्पना पुरानी है लेकिन इसकी बदलती रहती कहानी है ये शीला की जवानी है आपके हाथ कभी नहीं आनी है । सोने के हिरण जैसा मायाजाल है मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री का पद आप अपराधी हैं और समझदार हैं किसलिए होते मोहमाया का शिकार हैं आपको इस उलझन से बचाना है यही लक्ष्मणरेखा का असली निशाना है । सोना का हिरण सोने की लंका कल्पना नहीं हक़ीक़त होती है आजकल , शासक की भूख ख़त्म कभी नहीं होती जनता हर युग में भूखे पेट सोती है । जनता को सुनहरे सपने दिखाने हैं हमको कई आलीशान महल बनवाने हैं आपको जितना मिलता है थोड़ा है आप किस की खातिर होते दीवाने हैं , ये रस्ते अभी अनजाने हैं जिन पर जाने की मनाही है प्रवेश करने पर सभी कुछ खोने की आशंका है । अयोध्या जिसकी उसी की लंका है बजने लगा कहीं डंका है । 
 
अपराध और अपराधी भी देश की व्यवस्था का इक अंग हैं , सिर्फ अदालतों की आवश्यकता नहीं है कितने लोगों की रोटी उन्हीं के दारोमदार पर निर्भर है ।  राजनेताओं की राजनीति को खाद पानी उन्हीं से मिलता है अपराधी जनता के लिए दुःखदायी भले हों सत्ता पुलिस राजनेताओं के लिए हमेशा काम आते हैं । कभी भी किसी शासक ने अपराध को मिटाने की कोशिश नहीं की है बढ़ाने को कोई कसर नहीं छोड़ी है । आपने कभी किसी वैश्या का ठिकाना देखा है उसकी सुरक्षा से लेकर उसका धंधा चलाने तक कोई शरीफ़ काम आता है न कोई पुलिस या कोई सरकार , उनके बाज़ार में उनकी सत्ता चलती है उनके कायदे कानून लागू होते हैं । राजनीति भी वैश्यवृति जैसी है जिस में ईमान बेच कर कुछ भी मिलता है , राजनेताओं को चुनाव में रैलियों को आयोजित करने में अपराधी बहुत काम आते हैं । आजकल लोग खुद अपनी मर्ज़ी से कहां आते हैं नेताओं की झूठी बातें सुनकर ताली बजाने , सभी उनकी वास्तविकता जान चुके हैं । अपराधी को मंच से नेता जी आदरणीय और लोकप्रिय कहते हैं जबकि जानते हैं कि सच्चाई क्या है । जनता जितना पुलिस से डरती है उस से अधिक आपराधिक छवि वाले बदमाशों से घबराती है बच कर चलती है । राजनेताओं को मालूम है आजकल पुराना समय नहीं जब जनता अपने नेताओं को प्यार से भरोसे से चुना करती थी , आज जनता को भयभीत होना पड़ता है कि उनको वोट नहीं डाला तो क्या क्या होना संभव है । 
 
मुख्यमंत्री बनते ही लोग खुद ही अपने ख़िलाफ़ दायर मुक़दमें वापस लेकर शराफ़त का प्रमाण हासिल कर लिया करते हैं । कितने ही अपराध मुख्यमंत्री बनकर राजनेता करते रहे और सबूत गवाह मिटाते रहे कोई अदालत कोई न्यायधीश कुछ नहीं कर सका न्याय की देवी की आंखों पर बंधी पट्टी हमेशा सत्ता की सहयोगी साबित हुई है । कितने जुर्म कैसे भी अपराध कर अपराधी राजनीति की शरण में आकर बेगुनाह साबित होने की राहें बनाते रहे हैं , इसलिए उनके लिए इक सीमा निर्धारित करनी ज़रूरी है । आपको याद है बिल्ली और शेर की कहानी बिल्ली शेर की मौसी है उसने शेर को सभी दांव पेच सिखलाये थे लेकिन जैसे शेर को लगा कि सभी सबक सीख लिए शेर झपटा था बिल्ली को खाने को । तब बिल्ली पेड़ पर चढ़ गई छलांग लगा कर , शेर ने पूछा मुझे ये करना तो नहीं सिखाया था । माजरा कुछ वैसा ही है खुद अपने को बचाने को इक पैंतरा ऐसा ज़रूरी है जिस को गुरु किसी शिष्य को कभी नहीं सिखलाता है । बिल्ली कौन शेर कौन है समझने को पहले आपको लोमड़ी को लेकर जानकारी हासिल करनी पड़ेगी , समझ आई बात ।  
 
 बिल्ली को 'मौसी' क्यों कहते हैं? 99% लोग नहीं जानते होंगे ये बात - Guru ka  Gyan

अगस्त 20, 2025

POST : 2000 कठपुतलियां नाच रहीं ( यत्र - तत्र - सर्वत्र ) डॉ लोक सेतिया

    कठपुतलियां नाच रहीं ( यत्र - तत्र - सर्वत्र  ) डॉ लोक सेतिया 

कब से दुनिया समझ रही थी इक बस उन्हीं का चर्चा है जिधर नज़र जाती जब भी कुछ आवाज़ सुनाई देती इक नाम का जाप तमाम तरह से होता था । जब उनको ख़ास अवसर पर शिखर जैसी ऊंचाई पर खड़े हो कर हमेशा की तरह खुद ही अपना गुणगान करना था जिसका कभी कोई सोच भी नहीं सकता था उस संगठन का नाम क्या वंदना तक करने में खुद अपनी गरिमा को गौण कर दिया तब सभी को समझ आया कि ऊंठ पहाड़ के नीचे किस तरह आता है । समझने वाले समझ गए कि जनाब भी किसी के हाथ की कठपुतली ही हैं और जैसे उधर से डोर कसने लगी घुटनों पर आना पड़ा है झुक कर सलाम करने लगे हैं पहले छुप छुपकर अब सरेआम करने लगे हैं । जब चादर लगी फटने , खैरात लगी बटने । लोकतंत्र के प्रहरी जनमत के रक्षक समझने वाले खुद ही सत्ता की लूट को ढकने में अपनी आबरू गंवा बैठे हैं , झूठ छल जालसाज़ी की पैरवी जब अदालत ही पक्ष में दलील देने लगे तब उनकी डोर कोई पकड़े उनको पतंग की तरह उड़ा रहा है । चुनावी पतंग कब कट कर कहां गिरती है और कितने लोग झपटने की कोशिश में उसके पुर्ज़े पुर्ज़े कर देते हैं कोई नहीं जानता मगर सभी को साफ़ लगने लगा है उड़ान हिचकोले खा रही है । राजनीती प्रशासन से समाचार चैनल सोशल मीडिया क्या उद्योग कारोबार करने वाले लोग सभी जाने कितनों के इशारों पर नाचते हैं शतरंज के खिलाड़ी प्यादों को मोहरे बनाकर कब कैसी चाल चलें कि शह को मात में बदल सकते हैं । 
 
अभिनेता फ़िल्मकार निर्माता निर्देशक से टीवी पर सीरियल बनाने वाले ख़रीदार नहीं बिकाऊ सामान हैं कोई झूठे विज्ञापन दिखलाने की कीमत देकर अपना खोटा सिक्का बाज़ार में चला रहा है । बेज़मीर हैं सभी जिस्म है अंतरात्मा मर चुकी है जैसे कोई लाशों की दुनिया है चलती फिरती मुर्दा ज़िंदगी कभी कल्पना भी नहीं की थी हमने । इंसान का कोई वजूद नहीं है लोग नाचने को विवश हैं कौन किसको नचा रहा है कोई नहीं जानता क्योंकि कठपुतली नचाने वाला ऊपर कहीं बैठे अपनी उंगलियों से डोर को जब जैसे चाहे खींचता है कभी ढीली छोड़ता रहता है । ग़ज़ब का तौर तरीका है जिसे देखो खुद को गंगाजल जैसा पावन बताता है अपने गुनाहों का दोष किसी और पर लगाता है भला कोई मुर्दा कभी अपनी बेगुनाही साबित करने कब्र से बाहर आता है । सत्ता ने झूठी कसम खाई है लोकतंत्र का खेल तमाशा उनका है जनता सिर्फ तमाशाई है जान पर जिसकी बन आई है सामने कुंवां है पीछे खाई है । 
 
दुनिया आधुनिक युग में विज्ञान और शिक्षा के महत्व पर ध्यान केंद्रित कर समस्याओं का निदान खोज रही है जबकि हमारे देश में शासक प्रशासक पौराणिक गाथाओं की कथाओं से कपोल कल्पनाओं की पिंजरे में बंद तोते में राजकुमारी की कहानियां नये रूप में घड़ने लगा है जनता को भाग्य भरोसे छोड़ खुद मनचाहे ढंग से खुद को सेवक नहीं देश का मालिक मानने लगे हैं । हम जल्दी ही महाशक्ति बनने वाले हैं ख़्वाब दिखाने लगे हैं अभी तक शासकों ने कभी अपने कहे वचन पूर्ण नहीं किये इस हक़ीक़त से नज़रे चुराने लगे हैं । सच को सूली चढ़ाने लगे हैं झूठ की महिमा समझाने लगे हैं कभी आपको आज़माने लगे हैं सितम पर सितम ढाने लगे हैं क्या क्या ज़ुल्म ज़ालिम करते हैं अपनी हद को बढ़ाने लगे हैं । लोग घबरा कर ज़हर भी दवा की जगह खाने लगे हैं हर घड़ी इश्तिहार जगह जगह बर्बादी को छिपाने लगे हैं कुछ हुआ कुछ बताकर दुनिया भर को बरगलाने लगे हैं ।   दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल याद आई है । 
 
अब किसी को भी नज़र आती नहीं कोई दरार 
घर की हर दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तिहाऱ । 
 
आप बचकर चल सकें ऐसी कोई सूरत नहीं 
रहगुज़र घेरे हुए मुरदे  खड़े हैं बेशुमार । 
 
रोज़ अख़बारों में पढ़कर ये ख़्याल आया हमें 
इस तरफ आती तो हम भी देखते फस्ले - बहार । 
 
मैं बहुत कुछ सोचता रहता हूं पर कहता नहीं 
बोलना भी है मना , सच बोलना तो दरकिनार । 
 
इस सिरे से उस सिरे तक सब शरीके जुर्म हैं 
आदमी या तो ज़मानत पर रिहा है या फ़रार । 
 
हालते इनसान पर बरहम न हों अहले-वतन 
वो कहीं से ज़िंदगी भी मांग लाएंगे उधार । 
 
रौनक़े जन्नत ज़रा भी मुझको रास आई नहीं 
मैं जहन्नुम में बहुत खुश था मेरे परवरदिगार । 
 
दस्तकों का अब किवाड़ों पर असर होगा ज़रूर 
हर हथेली ख़ून से तर और ज़्यादा बेक़रार ।  
 
( साये में धूप से आभार सहित )   
 
 
कठपुतली कला – जयपुर विश्व धरोहर



अगस्त 18, 2025

POST : 1999 कुछ कुत्तों की मौज कुछ को सज़ा ( व्यंग्य - कथा ) डॉ लोक सेतिया

 कुछ कुत्तों की मौज कुछ को सज़ा ( व्यंग्य - कथा ) डॉ लोक सेतिया  

 कुत्तों का महत्व सभी जानते हैं लेकिन पहली बार कुत्तों का वर्गीकरण करने की आवश्यकता प्रतीत होती है किस को आवारा किस को प्रशिक्षित पालतू श्रेणी में गिनती की जाए , अदालत को आंकड़ों से सरोकार है । क्या कुत्तों को समानता का अधिकार हासिल होना लाज़मी है या उनसे भी भेदभाव किया जा सकता है । अमीर का कुत्ता टॉमी कहलाता है गरीब का कालू क्या यहां भी ऊंच नीच की बात है । वफ़ादारी का अर्थ ये तो नहीं होना चाहिए , सबसे खेदजनक बात है उनकी तुलना उस बिक चुके मीडिया चैनलों से होने लगी है जो तलवे चाटने में कुत्तों से आगे निकल चुके हैं , कुत्तों ने कभी अपना ईमान नहीं बेचा । कुत्तों को बेचना खरीदना बंद होना चाहिए कुत्ते कोई निर्जीव वस्तु नहीं हैं उनकी भावनाएं आहत हुई हैं हालात देख कर । 
 

मामला बेहद संवेनशील और गंभीर है संसद सड़क अदालत तक आवाज़ सुनाई देने लगी है , कुतिया अपनी शान पर इतराने लगी कुत्तों की बरात झूमने गाने लगी है । गधों की ढेंचू ढेंचू से प्रभावित होकर गधों की सुरक्षा का कानून कभी का बनाया जा चुका है अब कुत्तों की बारी है , जगह जगह टीवी चैनल से सोशल मीडिया तक बहस जारी है । अपनी जान सभी को लगती प्यारी है कुत्तों की सत्ता से भी यारी है अपने प्रतिनिधि से मिल कर मांगपत्र देने की तैयारी है । कुत्तों की अपनी पहचान है कुत्तों से राजनीति ने सबक सीखा है भौंकना डराना तलवे चाटना दुम दबाकर भागना क्या क्या नहीं समझा जान है तो जहान है । कुत्तों को विश्वास है आदमी की क्या औकात है उसकी खातिर कानूनी लड़ाई लड़ते हैं कुत्ते भला कभी अदालत से कानून से डरते हैं । किसी लेखक ने अपनी किताब छपवाई थी मुझको कुत्ते ने पाल रखा है , आपने भी सिक्का उछाल रखा है । गली के आवारा कुत्ते बेमौत मरते हैं उनको बचाना ज़रूरी है । सभी नेताओं अधिकारियों व्यौपारियों को कुत्तों को गोद लेने पर पदोन्नति पुरुस्कार पदक वितरित करना कारगर साबित हो सकता है । अपनी पसंद का चयन कर सकते हैं और जितने चाहें जहां चाहें रख सकते हैं , पालतू बनते ही कुत्ते आदमी को क्या से क्या बना देते हैं गधे से आदमी आदमी से जोरू के गुलाम से बड़ा बना देते हैं । आपको इक कथा सुनाते हैं । 
 
दुनिया बनाने वाले से सभी जीव जंतु अपनी अपनी शिकायत रखने लगे थे , विधाता ने समझाया सभी को इक न इक जन्म में जानवर पंछी कितना कुछ बनना होता है चौरासी लाख योनियां हैं कुत्ते की बारी आई तो रहस्य खुला कि अगले जन्म में भौंकने वाले निरंतर भौंकने वाले को बेहद शानदार जीवन मिलता है । कुछ भी नहीं करना आदमी का जन्म मिलते ही पिछले जन्म का तजुर्बा आज़माना है बेमकसद बकना भौंकना है बस बिना कारण भौंकते जाना है । आपका गुणगान महिमामंडन आपकी चर्चा दुनिया में बस आप ही आप सभी के माई बाप समझे जाएंगे , लोग रोएंगे चिल्लाएंगे आपको नज़र नहीं आएंगे आप सब सर पर ताज़ पहन अपनी डफली अपना राग सुनाएंगे । बड़े ही सलीके से सभी को बोटी बोटी चबाकर खाते जाएंगे दुनिया को आपके हुनर बहुत भाएंगे आपको विदेशी शासक खाने पर बुलाएंगे जंग का सामान बेचेंगे शांतिपाठ पढ़ाएंगे आप सब समझ जाएंगे , सबसे बढ़िया भौंकने वाले को नॉबल पुरुस्कार मिलना चाहिए दुनिया को बताएंगे ।  
 
किसी कवि की हास्य कविता है , कुत्तों से मुझको प्यार है , किसी का नहीं ऐतबार है बस उसको कुत्ता मत कहना वर्ना होती तकरार है । कुत्तों की अपनी मंडी है इंसान की कीमत कुछ नहीं किस बात का घमंडी है । कुत्ते कितने प्यारे हैं मालकिन को अपने पति से लगते दुलारे हैं हमने भी देखा है कुत्ते और पति झगड़े आमने सामने कुत्ते जीते पति बाज़ी हारे हैं । कुत्तों की कथा का अंत इसी गीत से करते हैं जो लोग उनको मनवांछित वरदान कुत्ते देते हैं ।  
 
 बाप रे! कुत्ते से प्यार कर बैठी Bihar की ये लड़की, करती है महीने का लाखों  खर्च!

अगस्त 17, 2025

POST : 1998 सब पराए हैं ज़िंदगी ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

 सब पराए हैं ज़िंदगी ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 


सब पराए हैं ज़िंदगी , 
देख आए हैं ज़िंदगी । 
 
बिन बुलाए ही आ गए , 
चोट खाए हैं ज़िंदगी । 
 
हम खिज़ाओं के दौर में , 
फूल लाए हैं ज़िंदगी । 
 
कौन दुश्मन है दोस्त भी , 
आज़माए हैं ज़िंदगी । 
 
छा रही हर तरफ ख़िज़ा , 
गुल खिलाए हैं ज़िंदगी । 
 
छोड़ सारा जहान घर , 
लौट आए हैं ज़िंदगी । 
 
दर्द के गीत शाम - सुब्ह , 
गुनगुनाए     हैं ज़िंदगी । 
 

 
 
 

POST : 1997 जाएं तो जाएं कहां ( विचार - विमर्श ) डॉ लोक सेतिया

     जाएं तो जाएं कहां ( विचार - विमर्श ) डॉ लोक सेतिया   

घर से बाहर खुली हवा में सैर करने निकलते हैं हम सुबह शाम ,  दिखाई देते हैं दुनिया भर के लोग कुछ जाने पहचाने कुछ अनजान अजनबी कुछ को देख कर लगता है जैसे होकर भी नहीं हैं बिना आत्मा जिस्म चलते फिरते । झुंड बनाकर खड़े बैठे कितने लोग सामने होते हैं , कोई योग कर रहा होता है कोई अपनी पुरानी संकुचित मानसिकता को बढ़ावा देने का प्रयास करता है कुछ लोग बेमतलब की बातों से दिल बहलाते हैं   समय बिताते हैं या जाने वक़्त बर्बाद करते हैं , कुछ किसी धर्म इत्यादि की चर्चाओं में खोये लगते हैं । कितनी तरह के अलग अलग टोलियां बनाये लोग खुश होने का आभास दिलवाते हैं वास्तविक परेशानियों से बचकर कोई जगह तलाश करते हैं । मैं कई बार किसी न किसी झुंड के करीब जाकर लौट आता हूं मुझे वहां भीड़ में अकेलापन और भी अधिक परेशान करता है । इसलिए मैं अकेला खुद से ही वार्तालाप करता रहता हूं शायद इसलिए कि कोई मुझे मिला ही नहीं जो मुझसे बात करता अपना मेरा हालचाल पूछता बतलाता , यहां किसी को किसी के लिए फुर्सत कहां है जिसे देखो अपनी ही बात करता है दूसरे की सुनना समझना कौन चाहता है । महफ़िलों में सन्नाटा पसरा है शोर है कुछ सुनाई नहीं देता समझ ही नहीं आता , काश पेड़ पौधे होते हम लोग बिना बातचीत भी कितनी शीतलता का वरदान मिला हुआ है । बहार पतझड़ आंधी बारिश तूफ़ान सर्दी गर्मी सबसे बेपरवाह सभी को स्वीकार कर अपनी धरती से जुड़े हुए । 
 
मैं इक कतरा हूं दुनिया महासागर है , सिर्फ़ प्यार का दरिया बहता है मुझमें मगर ज़माना है कि नफरतों की फ़सल कांटों का चमन बनाने की कोशिश करता है । मिलना जुलना बिना मतलब नहीं करते लोग ज़रूरत पढ़ने पर याद आते हैं सभी लोग , ख़ुदपरस्ती का लगा है सभी को रोग , ख़त्म कभी नहीं होगी मगर अपनी दोस्ती की जन्म जन्म की खोज । दिल चाहता है कुछ संगी साथी मिलकर चलते जाएं कहीं दूर कोई नई दुनिया बसाने की चाह में , लेकिन जाएं किधर कोई रास्ता नज़र ही नहीं आता है । अंत में इक नज़्म पुरानी नये सलीके से पेश है । 
 
सब पराए हैं ज़िंदगी , देख आए हैं ज़िंदगी । 
 
बिन बुलाए ही आ गए , चोट खाए हैं ज़िंदगी । 
 
हम खिज़ाओं के दौर में , फूल लाए हैं ज़िंदगी । 
 
कौन दुश्मन है दोस्त भी , आज़माएं हैं ज़िंदगी । 
 
छा रही हर तरफ ख़िज़ा , गुल खिलाए हैं ज़िंदगी । 
 
छोड़ सारा जहान घर , लौट आए हैं ज़िंदगी । 
 
दर्द के गीत शाम - सुब्ह , गुनगुनाए हैं ज़िंदगी ।   
 
 Jayen To Jayen Kahan - indianslyrics.com

अगस्त 14, 2025

POST : 1996 ज़मीन नहीं आसमान नहीं ( 78 साल बाद ) डॉ लोक सेतिया

   ज़मीन नहीं आसमान नहीं ( 78 साल बाद ) डॉ लोक सेतिया 

                          {  पिछली पोस्ट से आगे  }   

डींगे हांकना बहादुरी का काम नहीं है , वास्तविकता को देखना समझना स्वीकार करना ईमानदारी कहलाता है , शासक अगर सही मायने में ईमानदार हैं एवं जनता की देश की भलाई और सेवा करते हैं तो उनको शर्मसार होना चाहिए  कि  देश की आधी से अधिक जनसंख्या बदहाल है जिसे सरकार आत्मनिर्भर नहीं बनाना चाहती बल्कि भिखारी की तरह कितनी तरह की ख़ैरात पर गुज़र बसर करने को विवश करती है । ये पचास से अस्सी करोड़ की दिल की चाहत तो बिल्कुल भी नहीं है , ये देश के शासकों प्रशासकों की नाकामी और मानवीय संवेदनाओं की शून्यता का प्रमाण है । इसको कोई लोकतंत्र नहीं कह सकता है ये कुछ प्रतिशत लोगों की अनुचित सोच और गलत कार्यप्रणाली का नतीजा है । बीस प्रतिशत लोग देश की अधिकांश ज़मीन जायदाद संपत्ति संसाधनों पर काबिज़ हैं बाक़ी का हक और अधिकार छीन कर । अभी तक लोग शिक्षा स्वास्थ्य सेवाएं तो क्या निडर होकर सुरक्षित जीने तक से वंचित हैं धनवान और साधन संपन्न वर्ग को न्याय से लेकर सभी कुछ आसानी से मिलता है मगर सामन्य नागरिक को कदम कदम कठिनाईयों से जूझना पड़ता है , मर मर कर जीना होता है । असमानता बढ़ती जा रही है और राजनीति में अपराधियों का परचम फहराता है कोई भी दल कोई मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री अपराधी लोगों से गठजोड़ करने में संकोच नहीं करता है । अंग्रेज़ों से कम अत्याचारी कायदे कानून नहीं है आजकल की सभी सरकारों के जिनका विरोध तक करने की अनुमति नहीं है । सत्ता का विरोध सामाजिक भलाई नहीं बल्कि देशभक्त होने पर शंका जताई जाती है दशा दिन पर दिन भयावह होती जा रही है । 
 
शासक प्रशासक किसी भी देश राज्य के कैसे होने चाहिएं पूछा जाये तो सीधा सरल जवाब है जिनको खुद अपने ऐशो-आराम से पहले देश राज्य निवासी जनता नागरिक की समस्याओं की चिंता ही नहीं होनी चाहिए बल्कि अपने सुःख त्याग कर भी जनकल्याण को प्राथमिकता देनी चाहिए । आज़ादी के  78 साल बाद भी देश में जनता अक्सर शासकों प्रशासकों से भयभीत रहती है क्योंकि सत्ता पाकर अहंकारी लोग खुद को जनसेवक नहीं राजा महाराजा समझने लगते हैं और नागरिक को मौलिक अधिकार से मानवाधिकार तक पाना कठिन दिखाई देता है । कैसी विडंबना है कि खुद अपने चुने प्रतिनिधि जनसामान्य से उनकी परेशानियां या समस्याएं जानना तक नहीं चाहते बल्कि समाधान पाने को सरकारी प्रशासनिक बाधाओं से जूझना पड़ता है । अधिकांश जनसंख्या आभाव और बेबसी भरा जीवन बिताती है जबकि तथाकथित लोकतांत्रिक व्यवस्था इस सब से लापरवाह खुद अपने लिए सभी आरक्षित करने को महत्व देती है । जिस देश की करोड़ों की आबादी बेघर और बदहाली में रहने को विवश है यहां तक की बुनियादी सुविधाओं से वंचित है उस देश के शासक प्रशासक देश के ख़ज़ाने को अनावश्यक आयोजनों समारोहों पर बर्बाद करते हैं । सांसदों विधायकों पर अन्य सरकारी पदों पर नियुक्त कर्मचारियों से अदालतों और पुलिस सुरक्षा व्यवस्था पर बेतहाशा धन खर्च करने के बाद भी देश को निराशा मिलती है जब अभी तक महंगाई बेरोज़गारी भ्र्ष्टाचार से मुक्ति नहीं मिली है । 
 
15 अगस्त 2025 को 78 साल बीत चुके हैं देश को आज़ाद हुए , लेकिन सरकारें पूर्णतया असफल साबित हुई  हैं  उस स्वतंत्र भारत का निर्माण करने में जिस का सपना आज़ादी की लड़ाई लड़ने वाले महान आदर्शवादी नायकों और शहीदों ने देखा था । खेद की बात है की राजनेताओं से प्रशासनिक अधिकारियों तक इस गंभीर विषय को लेकर उदासीनता है उनको रत्ती भर एहसास नहीं जो करना था किया जाना संभव था नहीं करने को लेकर ।सच कहा जाये तो हमारी व्यवस्था किसी सफ़ेद हाथी की तरह बोझ बन चुकी है और दो तिहाई जनता उनके असहनीय बोझ तले दब कर मर रही है । आज स्वतंत्रता दिवस है मगर जिधर भी नज़र जाती है लोग गुलामी की जंज़ीरों में जकड़े  खुद को महसूस करते लगते हैं आज़ादी का जश्न मनाते हैं सोशल मीडिया पर दिखाई देते हैं वास्तव में चीथड़े पहने हुए लोग नहीं जानते उनको कैसी आज़ादी मिली है । कभी जो हर्षो उल्लास हुआ करता था अब कहीं भी नहीं है सभी औपचरिकता निभाते हैं देशभक्ति इक तमाशा बन गई है ।  
 
कौन इस सब को देखेगा जनता को बताएगा , कौन विरोध करेगा आईना दिखलाएगा जब सभी के मुंह आंख कान बंद हैं स्वार्थ की पट्टी बंधी हुई है सत्ता से यारी निभाते हैं रेवड़ियां खाते हैं भौंकने वाले हड्डी मुंह में लिए चबाते हैं । जिस की बाजरी खाते उसकी हाज़िरी लगाते हैं । झूठ को सच अंधेरे को उजाला बताकर रोज़ ग़ज़ब ढाते हैं । पत्रकारिता का पतन इस हद तक हो गया है कि कभी घोटालों का पर्दाफ़ाश करने वाले पत्रकार हुआ करते थे जब की आजकल पत्रकारिता अलोकतांत्रिक अमर्यादित आचरण करने वालों को ढकने की कोशिश में खुद को निर्वस्त्र कर रही है । आखिर में अपनी इक नज़्म पेश है
 

बेचैनी ( नज़्म )  डॉ  लोक सेतिया 

पढ़ कर रोज़ खबर कोई
मन फिर हो जाता है उदास ।

कब अन्याय का होगा अंत
न्याय की होगी पूरी आस ।

कब ये थमेंगी गर्म हवाएं
आएगा जाने कब मधुमास ।

कब होंगे सब लोग समान
आम हैं कुछ तो कुछ हैं खास ।

चुनकर ऊपर भेजा जिन्हें
फिर वो न आए हमारे पास ।

सरकारों को बदल देखा
हमको न कोई आई रास ।

जिसपर भी विश्वास किया
उसने ही तोड़ा है विश्वास ।

बन गए चोरों और ठगों के
सत्ता के गलियारे दास ।

कैसी आई ये आज़ादी
जनता काट रही बनवास ।  
 

 
 

अगस्त 13, 2025

POST : 1995 कितनी ज़मीन ज़रूरी है इंसान के लिए ? ? ( 15 साल पुरानी रचना 2025 तक हक़ीक़त ) डॉ लोक सेतिया

            कितनी ज़मीन ज़रूरी है इंसान के लिए ? ? 

        ( 15 साल पुरानी रचना 2025 तक हक़ीक़त ) डॉ लोक सेतिया  

अपनी इक पुरानी अलमारी से ढूंढने पर फाइल में मिल गई है दिन महीना साल नहीं लेकिन पढ़ते ही समझ आता है कि तब अटल बिहारी वाजपेयी जी प्रधानमंत्री थे । जो तब लिखा हुआ टाइप किया हुआ है पहले उसी को दोहराता हूं । लिखा हुआ है ' करीब नौ दस साल पुरानी बात है '। 

अमेरिका में रहने वाले रौशन आहूजा ने तब के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी को एक खुला पत्र लिख कर सवाल पूछा था कि वो खुद अपने आपको क्या समझे , देशभक्त या पागल । वाजपेयी जी ने तब उसका क्या जवाब दिया था मुझे मालूम नहीं । शायद जवाब देना ही ज़रूरी नहीं समझा गया हो । लेकिन मेरा मानना है कि देशभक्त और पागल में कुछ ख़ास फ़र्क नहीं होता है । अच्छा है कि अभी भी देश के लिए सर्वस्व अर्पित करने वाले कुछ पागल बचे हुए हैं वर्ना कई बार लगता है कि अब देश के लिए समर्पण और कुर्बानी देने वाले लोगों की प्रजाति का अंत हो चुका है और देश को बर्बाद करने लूटने वाले खुद को देशप्रेमी घोषित करने लगे हैं । रौशन आहूजा ने वह पत्र क्यों लिखा था बताना ज़रूरी है ।  
 
वे डेढ़ करोड़ की विदेशी मुद्रा साथ ले कर भारत आये थे ताकि यहां अपनी बेटी के नाम पर पुस्तकालय बना सकें ।  रौशन आहूजा ने विदेश में अपने सामने किसी को भारत की निंदा नहीं करने दी और इस आदत के चलते अपने कितने मित्र खो दिये । आज भी सरकार प्रशासन के लोग उनके दर्द को समझ नहीं सकते कि कैसे उन्होंने अपनी व्यथा लिख कर प्रधानमंत्री को भेजी होगी । जिस प्रधानमंत्री कार्यालय ने उस आईएस अधिकारी के भेजे गोपनीय पत्र को भ्र्ष्टाचारी लोगों तक पहुंचा दिया था जिन्होंने राष्ट्रीय राजमार्ग योजना में होने वाले भ्र्ष्टाचार की जानकारी दी थी जिस से सत्येंद्र दुबे को भ्र्ष्ट लोग क़त्ल कर देते हैं उनका तौर बदला नहीं अभी तक भी । अब तो यहां देश को लूट कर बर्बाद कर सबसे बड़े देशभक्त होने का परचम फहराते हैं ' यह मेरा इंडिया आई लव माई इंडिया ' गीत गाकर रंगारंग कार्यक्रम मनोरंजन के लिए आयोजित कर जश्न मनाते हैं मिल बांट कर खाते मौज उड़ाते हैं । देशभक्ति आजकल भावना नहीं दिखावा बनकर रह गई है । शासक प्रशासक जनता पर अन्याय अत्याचार करते हुई अपनी अंतरात्मा में नहीं झांकते हैं । 
 
रौशन आहूजा सरकारी विभाग से प्रशासनिक अधिकारियों से मिले और उनको पुस्तकालय बनाने की अपनी योजना बताई तो उनको हैरानी हुई । सरकारी विभाग उनको सार्वजनिक पुस्तकालय बनाने को ज़मीन इस शर्त पर देना चाहते थे कि उनको भावी प्रबंधक या इंचार्ज बना दिया जाये । अगर उनको खुद पुस्तकालय बनाना और चलाना है तो उनको कोई रूचि नहीं है ।  उन्होंने महसूस किया कि सरकारी दफ्तरों में लोग बैठे हैं किसी गिद्ध की तरह नज़र लगाए हुए जो उनके पास आने वालों की बोटी बोटी नोच कर खाने की प्रतीक्षा कर रहे होते हैं । पढ़ लिख कर बड़े ओहदे पर आसीन होकर भी उनकी लोभ लालच की पैसे की हवस ख़त्म ही नहीं होती कभी । तमाम कोशिशें कर भी उनको ज़मीन नहीं मिली और वह डेढ़ करोड़ विदेशी मुद्रा ले कर वापस चले गए थे । जब अख़बारों में ये खबर छपी तो कितने ही नेताओं और अधिकारियों से समाज सेवा का मुखौटा लगाए लोगों को बड़ी मायूसी हुई , सोचते कि काश रौशन आहूजा उनसे मिलते तो वे उसे शीशे में उतार सकते थे । कोई मुख्यमंत्री उनसे अपने राज्य में निवेश करवाने की बात करता तो कोई सेठ साहूकार उनको समझाता कि पढ़ाई लिखाई में क्या रखा है अपनी बेटी के नाम से सांझेदारी में कंपनी खोल कर खूब कमाई कर सकते हैं । यहां सरकारी अधिकारी मिलकर बांटते हैं खाते खिलाते हैं ऐसा कभी नहीं होने देते की घर आई आसामी हाथ से निकल जाये , इतनी बड़ी चूक कैसे हुई , ज़मीन देकर भी उनको अपने बिछाये जाल में तड़पाया जा सकता था । विभाग पूरी कीमत देकर खरीदे प्लॉट पर अलॉटी को जीवन भर ठगता रहता है उनको कटघरे में खड़ा कर , घर बनवाना उनका मकसद नहीं धंधा है जिसे हर मुख्यमंत्री खुद अपने आधीन रखता है यही राम नाम की लूट है कुछ खास लोगों को मिलती छूट है । 
 
आपको लग रहा होगा इतने साल बाद मुझे उनकी याद कैसे आई है । हरियाणा सरकार ने किसी सत्ताधरी दल के राजनेता की ट्रस्ट को करोड़ों की कृषि भूमि लीज़ पर दी है 33 वर्ष के लिए । दल कोई भी हो राजनेताओं का भूमाफिया खेल कभी थमता नहीं है और सरकारी विभाग की निगाह इस तरफ नहीं जाती है ।शासक राजनेता का करीबी आज भी पांच हज़ार एकड़ ज़मीन खरीद सकता है कौड़ियों के दाम पर नवी मुंबई में और कोई शहंशाह कहलाता हैं करोड़पति खेल से पहचान है लोनावला में खेती की ज़मीन खरीद सकता हैं फ़र्ज़ी किसान का प्रमाणपत्र बनवाकर । सरकार और सरकारी विभागों के काले कारनामों पर पर्दा डालते हैं जो लोग सच का दर्पण और खुद को लोकतंत्र का रखवाला कहते हैं अन्यथा आयोग जांच कर सकता कोई तो इस हम्माम में सभी नंगे हैं । मुंबई से अधिक प्लॉट्स फ़्लैट गुरुग्राम में सभी रिश्वतखोर अधिकारियों नेताओं के आसानी से जांच की जा सकती है मगर संसद में सभी एकमत है आपसी भाईचारा कायम रखना है । क्या आपको मालूम है कि पूर्व प्रधानमंत्रियों ने कब कहां पहाड़ों पर अपने आलीशान महल बनवाये नियम कानून सभी बदलने पड़े , जबकि वो कभी जाकर उन घरों में रहे ही नहीं । आपके हमारे हर शहर में सरकार अपने खास लोगों को जगह देती है जिस सामाजिक कार्य करने को वो उन जगहों पर होटल शोरूम दुकानें बनाकर मालामाल हो रहे हैं कभी कोई नहीं पूछता उचित अनुचित की बात । ये तलवार सामन्य नागरिक की गर्दन पर लटकी रहती है हमेशा यही हमारा रामराज्य है धर्म है जनकल्याण कहलाता है ।  अभी इस पोस्ट को यहीं पर छोड़ते हैं अगली पोस्ट में 78 साल बाद हमारे देश की वास्तविकता पर चर्चा की जाएगी । 
 
                           ( शेष अगली पोस्ट पर जारी है ) 
 
 
 लगता नहीं है दिल मिरा उजड़े दयार में - बहादुर शाह ज़फर
 
 
 
 
 
( आज मेरा जैसा अनुभव है कोई जवाब देना दूर प्रधानमंत्री को भेजे साधरण नागरिक के पत्र ईमेल उनकी जानकारी में ही नहीं होते बल्कि पीएमओ में बैठे लोग संवेदना रहित गंभीर बात को औपचारिक समझ कूड़ेदान में फेंकते हैं अथवा तथकथित जनशिकायत पोर्टल पर दर्ज कर अगले दिन कोई नोडल अधिकारी निपटान करने का संदेश भेज देता है नीचे देख सकते हैं । )  
 
{  Your grievance has been successfully registered in Public Grievances Portal.please note your Registration Number - PMOPG/D/2025/0048676 for later references} 
 
[  पंजीकरण संख्या PMOPG/D/2025/0048676 के साथ आपकी शिकायत का निपटारा कर दिया गया है। विवरण के लिए https://pgportal.gov.in पर जाएँ और प्रतिक्रिया सबमिट करें। आप कॉल सेंटर एजेंट को भी फीडबैक दे सकते हैं जो शीघ्र ही आपसे संपर्क करेगा। ]

अगस्त 10, 2025

POST : 1994 नकली की शान है मौला ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

          नकली की शान है मौला  ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया  

हद से अब तो गुज़र गये हैं लोग ( ग़ज़ल ) 

डॉ लोक सेतिया "तनहा"

हद से अब तो गुज़र गये हैं लोग
जाने क्यूँ सच से डर गये  हैं लोग ।

हमने ये भी तमाशा देखा है
पी के अमृत भी मर गये  हैं लोग ।

शहर लगता है आज वीराना
कौन जाने किधर गये  हैं लोग ।

फूल गुलशन में अब नहीं खिलते
ज़ुल्म कुछ ऐसा कर गये  हैं लोग ।

ये मरुस्थल की मृगतृष्णा है
पानी पीने जिधर गये हैं लोग । 
 
ग़ज़ल से शुरू करते हैं कविता से अंत करते हैं ये कोई शर्त नहीं आसानी से बात कहना है । 
 
अब हमारे देश को नवीन कीर्तिमान स्थापित करने से कौन रोक सकता है ,  जिधर देखते हैं नकली का परचम फ़हरा रहा है । सर्च करने पर मालूम होता है कि आज किस किस जगह क्या क्या नकली निकले हैं । मिलावट होने लगी है सामान से इंसान तक असली हैं या नकली हैं कोई नहीं जानता , इधर नकली डॉक्टर पकड़े गए थे उधर नकली आईएएस अधिकारी मिल गए हैं । नकली सर्टीफिकेट से वोटर तक नकली साबित हुए हैं अब जाने किस की बारी है कहीं नकली ईमेल आयकर विभाग का मिला है आये दिन चेतावनी मिलती है सावधान रहें नकली पुलिस या जांच अधिकारी बनकर कोई आपको ठग सकता है । सरकारी विभाग खुद साबित कर रहे हैं कि आपको धोखा लूट से बचाने को सरकारी तंत्र असफल ही नहीं बल्कि शायद अपना कार्य करने में काबिल ही नहीं है । इसका मतलब भी यही है कि वो सब भी दिखावे को हैं वास्तव में उनका होना नहीं होना कोई महत्व नहीं रखता है । कभी असली का प्रमाणपत्र मिलता था किसी नाम या कारोबारी पेटेंट इत्यादि के रूप में आजकल राजनेता अधिकारी क्या देशभक्त देशसेवक तक नकली अधिक हैं असली कहीं नहीं मिलता जो देश को समर्पित हो । आप क्या क्या परखेंगे और कैसे झूठ को झूठ साबित करेंगे जब हर कोई नकली प्रमाणपत्र बनवाये घूमता है शराफ़त ईमानदारी और शुद्ध पुण्यात्मा होने का । फेसबुक से सोशल मीडिया तक चेहरा और चाल चलन इतने गुमराह करने वाले हैं कि नकली की निराली शान है असली खुद हैरान परेशान है । अख़बार टीवी चैनल पर सच कभी का क़त्ल किया जा चुका है न्यायालय और संवैधानिक संस्थाओं में आईसीयू में गंभीर दशा में है पल दो पल का महमान है ।  लोकतंत्र से मौलिक अधिकार तक गिड़गिड़ा रहे हैं मानवाधिकार बेचैन हैं उनकी जगह कितना कुछ देश समाज में देखने को उनकी शक़्ल जैसा लगता है लेकिन वास्तविक आचरण में बिल्कुल उलट और नकली है । नकली असली से अधिक चमकदार और सभी की पसंद बनकर खड़ा है , समझने को इतना ही बहुत है । नकली नोट हाथी के नकली दांत नकली दवाएं सुनते थे अब सरकार की असलियत तक पर शंका होने लगी है ।
 
असली क्या है नकली क्या है पूछो दिल से मेरे , भावनाएं तक असली नहीं हैं , सुनते थे पढ़ते थे महान लोग नायक असली चरित्र के लोग हुआ करते थे आजकल चलन से बाहर किए जा चुके हैं । नकली चाल चलन और मुखौटे लगाए लोग हमको भाने लगे हैं हम भगवान जिनको बनाने लगे हैं जो ठोकर हमको लगाने लगे हैं हम आख़िर हमेशा पछताने लगे हैं । सब अपनी हक़ीक़त छुपाने लगे हैं कहानी कोई झूठी बनाने लगे हैं गज़ब है खुद अपने को खुद मिटाने लगे हैं जिधर जाना नहीं कभी आने जाने लगे हैं । आस्मां पर ठिकाने बनाने लगे हैं ज़मीं से अलग होकर टूटे हुए दिल मुहब्बत के फ़साने सुनाने लगे हैं रोने की बात पर हंसने मुस्कुराने लगे हैं । नकली का बाज़ार सजा है सपनों ने हर बार ठगा है लेकिन हम समझदार होने का दम भरने वाले झांसों में फंस कर पतझड़ को बहार बताने लगे हैं हर दिन पहले से नीचे गिरते हैं राई को पहाड़ बताने लगे हैं । असली कुछ बचा नहीं हमारे देश समाज में नकली का बोलबाला है असली मदिरा नहीं है मयकदे का कोई टूटा प्याला है ये दौर बड़ा ही निराला है गोरा है दिल का काला है उस हाथ में मोतियों की माला है । सोना चांदी हीरे और जवाहरात पर ख़ालिस होने की मोहर लगी है खुद पहनने वाला बाहर से कुछ भीतर से कुछ और लगता है पग पग पर यही घोटाला है ।  शिक्षक तक नकली हैं तो पढ़ाई भी क्या होगी , नकली पुलिस का दफ़्तर खोल लोग मिसाल कायम करने लगे हैं ज़हर भी नकली है लोग ज़हर पीकर ज़िंदा हैं अमृत पी कर मरने लगे हैं । 
 
बहुत साल पहले लिखी हास्य व्यंग्य की कविता ब्लॉग पर 2012 में पब्लिश है शेयर कर रहा हूं । 
 
 

मिलावट ( व्यंग्य - कविता ) डॉ लोक सेतिया

यूं हुआ कुछ लोग अचानक मर गये
मानो भवसागर से सारे तर गये ।

मौत का कारण मिलावट बन गई
नाम ही से तेल के सब डर गये ।

ये मिलावट की इजाज़त किसने दी
काम रिश्वतखोर कैसा कर गये ।

इसका ज़िम्मेदार आखिर कौन था
वो ये इलज़ाम औरों के सर धर गये ।

क्या हुआ ये कब कहां कैसे हुआ
कुछ दिनों अखबार सारे भर गये ।

नाम ही की थी वो सारी धर-पकड़
रस्म अदा छापों की भी कुछ कर गये ।

शक हुआ उनको विदेशी हाथ का
ये मिलावट उग्रवादी कर गये ।

सी बी आई को लगाओ जांच पर
ये व्यवस्था मंत्री जी कर गये ।  
 
 
 CM नीतीश कुमार के नालंदा में शान से नौकरी बजा रहे हैं फर्जी शिक्षक
 

अगस्त 08, 2025

POST : 1993 लोकतंत्र के सारे राजा डाकू हैं ( संविधान - ? ) डॉ लोक सेतिया

 लोकतंत्र के सारे राजा डाकू हैं ( संविधान - ? ) डॉ लोक सेतिया 

आजकल चुनाव आयोग की प्रणाली पर इतने गंभीर सवाल उठने लगे हैं की देश की राजनीति सकते में है और कमाल की बात है कि लगता है अभी भी समस्या की जड़ को समझने का कोई प्रयास ही नहीं हो रहा है । क्या आपने सोचा है कि संविधान जिस व्यवस्था की बात कहता है उस में कोई राजनीतिक दल किसी दलीय चुनावी प्रणाली की चर्चा ही नहीं है । अपने मताधिकार का प्रयोग कर जनता को अपना प्रतिनिधि विधायक या सांसद चुन कर भेजना है और उन प्रतिनिधियों को चुन जाने के बाद अपना नेता चुनना है । आपको कभी खबर ही नहीं हुई कि कब राजनीतिक दलों ने इक व्यवस्था बनवा ली जिस में वही मैदान के प्रमुख खिलाड़ी बनकर बाज़ी लगा सकते हैं और जीतने की संभावनाएं उनको बिना किसी राजनीतिक दल निष्पक्ष खड़े होने वाले प्रत्याशी से बढ़त देती हैं । अर्थात समानता का अधिकार ख़त्म हो जाता है और कुछ संगठित राजनेता जनता पर अपना वर्चस्व स्थापित करने में साम दाम दंड भेद कुछ भी अपना कर शासन पर काबिज़ हो सकते हैं । राजनीतिक दलों में अधिकांश संसद विधायक बंधक जैसे होते हैं उनको पहले से घोषित राजनेता अथवा दल के संचालक को ही अपना नेता चुनना होता है । कैसी विचित्र विडंबना है कि जनता के निर्वाचित जनप्रतिनिधि खुद स्वतंत्र नहीं होते हैं , कभी ऐसा नहीं हुआ करता था लेकिन फिर सभी राजनीतिक दलों ने आपस में मिलकर जिस दलबदल विरोधी नियम को बनाकर लागू किया उसका मकसद ही लोकतान्त्रिक व्यवस्था को जकड़ कर अपनी कैद में रखना था । अभी बहुत परतें खुलनी हैं थोड़ा सोचने समझने की आवश्यकता है कुछ लाजवाब शायरों की कही बात पढ़ते हैं ।  
 

जमहूरियत  - अल्लामा इक़बाल

इस राज़ को इक मर्दे-फिरंगी ने किया फ़ाश ,
हरचंद कि दाना इसे खोला नहीं करते । 
 
जमहूरियत इक तर्ज़े - हुक़ूमत है कि जिसमें 
बन्दों को गिना करते हैं टोला नहीं करते । 

  नई तहज़ीब -  अल्लामा इक़बाल 

उठाकर फैंक दो बाहर गली में  
नई तहज़ीब के अण्डे हैं गंदे । 

इलेक्शन मिम्मबरी कैंसिल सदारत 
बनाए खूब आज़ादी के फंदे । 

मिंयां नज़्ज़ार भी छीले गए साथ 
निहायत तेज़ हैं युरूप के रंदे । 
 
 

बलबीर राठी जी के कुछ शेर :-

रूठ गया हमसाया कैसे ,
तुमने वो बहकाया कैसे । 
 
इतना अंधेरा मक्कारों ने ,
हर जानिब फ़ैलाया कैसे । 
 
तुमने अपने जाल में इतने ,
लोगों को उलझाया कैसे ।

वास्तव में हमारी पूरी चुनावी प्रणाली दोषपूर्ण है कभी भी देश की जनता के वोटों के बहुमत की सरकार नहीं बन सकती है अधिकांश तीस से चालीस प्रतिशत वोट पाने वाले निर्वाचित होते हैं अर्थात अधिकांश जो सांसद विधायक विजयी होते हैं उनके विरोध में अधिक मतदान हुआ होता है । लेकिन बात इतनी ही होती तो शायद मान लेते मगर चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित नियमों और संसाधनों का उपयोग कर शायद ही कोई चुनाव जीत सकता है मतलब ये कि ये सभी धनबल बाहुबल ही नहीं बल्कि झूठा शपथपत्र दे कर सदस्य बनते हैं । क्यों चुनाव आयोग सुप्रीम कोर्ट इतने गंभीर विषय पर अपने आंखें कान मुंह बंद रखते हैं । अपराधियों  पर सुप्रीम कोर्ट से चुनाव आयोग तक मेहरबान क्यों है , आज का सबसे बड़ा प्रश्न राजनेताओं का सभी दलों का जनता को प्रलोभन के जाल में फंसाना है जो असंवैधानिक है क्योंकि कोई भी राजनीतिक दल कुछ भी अपने खज़ाने से नहीं देता बल्कि जनता का पैसा बर्बाद किया जाता है सही मकसद की जगह अपनी स्वार्थ की गलत राजनीति को बढ़ावा देने की खातिर । यहां फिर लोकतंत्र और संविधान की बात आती है कभी सोचा है कि संविधान विधायिका कार्यपालिका और न्यायपालिका तीन स्तंभों पर आधारित व्यवस्था करता है , किसी भी सांसद विधायक मंत्री को आर्थिक अधिकार की बात नहीं करता है । सांसद निधि विधायक निधि जैसा प्रावधान बाद में राजनेताओं ने चोर चोर मौसेरे भाई की तरह किया कानून बनाकर । 
 
छलिया हैं ये सभी राजनेता जनता को विज्ञापन भाषण प्रचार से कुछ हज़ार की सहायता राशि की बात शोर मचाकर बताते हैं कि कितने लाख करोड़ कितने लोगों को दी गई मगर कभी नहीं बताया जाता कि उस से लाखों करोड़ गुणा धनराशि कैसे खुद राजनेताओं प्रशासनिक लोगों और सरकार समर्थक उद्योगपतियों से टीवी चैनल मीडिया को विज्ञापन इत्यादि के रूप में देकर सरकारी जनता के धन की लूट हमेशा से चलती रही है जो देश में आज तक का सबसे बड़ा घोटाला है । देश सेवा की राजनीति कब की खत्म हो चुकी है और आज की राजनीति छल कपट और षड्यंत्र की राजनीति बनकर खड़ी है जिस में संविधान से लोकतंत्र तक के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है । बात कड़वी है मगर खरी है कि राजनीतिक दल ठगों की मंडलियां जैसे हैं और गठबंधन बंदरबांट की शर्तों पर बनते बिगड़ते हैं विचारधारा कोई भी नहीं है । हमारे साथ इतना बड़ा धोखा हुआ है मगर हम तालियां बजा रहे हैं झूठों के सच बोलने का उपदेश सुनकर यही विडंबना है हम खुद शिकार हो रहे हैं और ज़ालिमों को मसीहा समझ रहे हैं ।  हमने जैसा सोचा था संविधान सभी की समानता हर प्रकार की सभी को न्याय की बात को प्रभावी बनाएगा वो कभी किसी भी शासन प्रशासन ने होने ही नहीं दिया बल्कि सभी जनता पर शासन कर उसका दोहन करने को अपना अधिकार समझने लगे अज्ज हालत चिंताजनक और लोकतंत्र को छिन्न भिन्न करने जैसी है । कहने को बहुत  कुछ है मगर अभी कुमार विश्वास जी की कविता से विराम देते हैं । 
 
 

 
 


 

अगस्त 07, 2025

POST : 1992 परदेसियों को है इक दिन जाना ( हास - परिहास ) डॉ लोक सेतिया

  परदेसियों को है इक दिन जाना ( हास - परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

कोई हैरानी नहीं हुई जब अपने नगर से तीन महीने बाहर रहना पड़ा , जानता था किसी को मेरे होने नहीं होने से कोई फर्क नहीं पड़ता है । दो चार लोगों ने फोन कर घर पर नहीं होने की बात पूछी किसी मकसद से अन्यथा भला क्यों कोई जान पहचान वाले की खबर रखता कब से दिखाई नहीं देने पर । मसरूफ़ ज़माना मेरे लिए क्यों वक़्त अपना बर्बाद करे , साहिर ने कहा था , कुछ लोग उनको याद करते हैं क्योंकि उन का कारोबार ही यही है अन्यथा कोई याराना नहीं यूट्यूब पर वीडियो बनाकर साहिर की रचनाओं को नहीं खुद अपनी चाहत पूरी करते हैं कमाई भी और कहने को शायरी से गायकी से मुहब्बत भी । कभी हम भी बाज़ार में बिक पाए तो चाहने वाले ढूंढ लेंगे । लेकिन बाहर से अपने शहर में लौटने पर कुछ भी बदला नहीं था वही पुराने लोग वही तौर तरीका वही औपचरिकताएं निरर्थक महसूस होती हुई । लेकिन किसी ने पूछा बड़े दिनों बाद नज़र आये हैं तो बताना पड़ा शहर से बाहर था । उनका अगला सवाल था किस देश में गए हुए थे , मैंने बताया कि किसी और देश में नहीं अपने ही मुल्क़ में किसी अन्य राज्य में किसी शहर में , लगता उनको निराशा हुई कि अपने देश में परदेसी बन लौटना भी बात है । हमने इस विषय पर शोध किया कुछ समझदार लोगों से चर्चा की और निष्कर्ष ये निकला कि हमारे लिए अपना देश ही रहने को उचित जगह है , विस्तार से नहीं संक्षेप में समझाते हैं । 
 
सबसे पहले विदेश जाने को कोई सरकारी अथवा किसी संगठन संस्था का आसरा चाहिए जो हम जैसे साधरण लोगों के लिए नहीं होता है । या कोई विदेशी किसी को नाम शोहरत से प्रभावित होकर आमंत्रित कर सकता है मगर अपना ऐसा कोई डंका नहीं बजता है गुमनाम अनाम लेखक जीवन भर खुद से अनजान रहते हैं कुछ अख़बार पत्रिकाओं को नाम पता मालूम होता है सिर्फ इतना संबंध लेखक प्रकाशक का संपादक का । कई देशों की यात्रा कर चुके हास्य कवि ने समझाया कि विदेश जाना क्या होता है , दो प्रकार के देश प्रमुख होते हैं पहले अच्छे माहौल वाले शानदार देश जिन में रहना बहुत महंगा पड़ता है । सालों की जमा की हुई पूंजी सफ़ेद काली कमाई कुछ दिन में खर्च कर हासिल होती हैं कुछ खूबसूरत तस्वीरें उन देशों की शानदार सतरंगी रंगीनियों की जो कभी हमको नसीब नहीं होती ये एहसास छुपाये रहती हैं । हंसती मुस्कुराती मगर उदासी निराशा छुपी रहती है जिन में , टीस  रहती है काश हम उस देश में जन्म लेते । हास्य कवि जी ने कुछ ऐसे भी देशों में जाकर देखा जिनकी बदहाली हमारे देश से बढ़कर है , थोड़ा सुकून मिला कि अपना देश अभी कुछ छोटे छोटे देशों से बेहतर है ।   
 
हमारे देश में स्वर्ग कभी जीते जी नहीं मिलता धर्मगुरु से सरकार तक स्वर्ग बनाने के ख़्वाब दिखलाते हैं मगर नर्क बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते यही हमारा नसीबा है । बबूल ही बबूल हैं कांटेदार जिन से मीठे आम खाने की उम्मीद लगाए बैठे हैं । सुनते थे पहले लोग गांव से शहर जाते तो लोग पूछते थे शहर कैसा है , अब कोई देश में किसी राज्य में किसी शहर में जाने की बात नहीं जानना चाहता सभी समझते हैं कुछ ख़ास अंतर नहीं है । आपने भी जाकर देखा होगा कितनी जगह चेहरे नये मिलते हैं तौर तरीके वही रहते हैं । तीन महीने में कुछ अनुभव हासिल हुए हैं लेकिन कौन पूछता है किसी को ये मनोरंजक नहीं लग सकती शायद किसी दिन कुछ यादों को खुद ही ताज़ा कर दिल बहलाना अच्छा होगा ।
 
सच तो ये है कि हमारे देश के बड़े बड़े राजनेता अनगिनत देशों की सैर पर हज़ारों करोड़ खर्च करते हैं और विदेशी शासकों कारोबारियों से संबंध बनाते हैं लेकिन हालात बदलते ही विदेशी शासक दोस्त दुश्मनी की सीमा लांघ जाते हैं । शासकों की दोस्ती पर कभी ऐतबार मत करना कब आपको नीचा दिखाने लग जाएं कोई ख़बर नहीं । ये लोग  प्रवासी पंछी की तरह होते हैं ,  मौसम बदलते ही उडारी मार किसी और देश को चल देते हैं ।  
 
 Migratory birds are taking off from Morel Dam, bird lovers gathered to see  beautiful birds | फिर लौट कर आना परदेसी...: मोरेल बांध से प्रवासी पक्षी ले  रहे हैं विदा, गजब की

अगस्त 05, 2025

POST : 1991 जिस्म यहां , आत्माएं विदेश भटकती ( राजनैतिक व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

जिस्म यहां , आत्माएं  विदेश भटकती ( राजनैतिक व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

हमारे देश के राजनेताओं की दशा यही है , मैंने करीब तीस साल पहले इक रचना लिखी थी ' विदेश जाओ हमेशा के लिए ' पब्लिश हुई थी लेकिन अब खो गई है शायद बंद अलमारी में किसी बंडल या फ़ाइल में दबी पड़ी होगी । शीर्षक याद है बाकि कुछ याद नहीं अब समय बदल गया है और हालत पहले से खराब हो गई है ।आजकल अधिकांश राजनेताओं की रूह ही नहीं ज़मीर तक किसी एक नहीं कितने विदेशी शानदार महलों में कैद नहीं है खुद बसती है रंगरलियां मनाती है । शासक ही नहीं सभी दलों को अपने देश की गरीबी बदहाली से दूर किसी खुशहाल माहौल में रहना आनंददायक लगता है , अपने देश की जनता से प्यार सिर्फ वोट पाने के वक़्त उमड़ता है अन्यथा दिल में उनकी छवि भेड़ बकरियों जैसी लगती है । शासक राजनेताओं प्रशासनिक अधिकारियों  को विदेश सैर सपाटे और तरह तरह के आयोजन में जाकर कोई सोच समझ नहीं विकसित हो सकती हैं बल्कि विदेशी चकाचौंध जगमगाहट से भृमित होकर असली नकली का भेद करना छूट जाता है । अधिकांश भारतीय राजनेताओं और प्रशासनिक लोगों से लेकर शिक्षित वर्ग क्या धनवान उद्योगपति से तमाम संतों सन्यासियों को विदेशी मोह मायाजाल ने जकड़ कर अपना ग़ुलाम बना लिया है । उन्होंने देश से अर्जित अपनी आमदनी धन दौलत को विदेशों में निवेश किया हुआ है छुपाया हुआ है । देश में उनको सभी कुछ हासिल होता है तब भी चैन विदेश में मिलता है कुछ अजब मानसिकता है रहना चाहते कहीं हैं मगर रहना पड़ता कहीं और है । आपने प्रेम कथाओं में पढ़ा होगा ये अलग ढंग की मुहब्बत है देश की जनता पत्नी की तरह मुसीबत लगती है मगर झूठ मूठ प्यार जतलाना पड़ता है साथ निभाना मज़बूरी है , प्रेमिका कोई अन्य देश है कभी एक नहीं कितने देश अफ़सोस उनसे ठोकर खाकर भी खुश होते हैं यही आशिक़ी होती है । 
 
सभी बड़े और विकसित देशों के राजनेता से साधरण लोग तक अपने देश को सबसे महान मानते है , लेकिन भारतवर्ष जैसे कुछ देश हैं जहां के शासक अपने देश अपने नागरिकों को पसंद ही नहीं करते उनका याराना उनकी दोस्ती मधुर संबंध विदेशी लोगों से होते हैं । जो मज़ा उनको विदेशी धरती पर कुछ पलों को मिलने वाले आदर सत्कार पुरस्कार से मिलता है देश की जनता से मिलने वाले अपनत्व से अधिक महत्वपूर्ण लगता है । घर की मुर्गी दाल बराबर लगती है , जनता घर की मुर्गी है कभी रोज़ एक अंडा सोने का देना भी कम लगता है तो एक साथ काटने की बात करते हैं शासक सरकार प्रशासन मगर भूखे रहते हैं हमेशा । कभी कभी उनको लगता है कहीं किसी शानदार विदेश में जाकर बस जाएं मगर परेशानी है कि किसी और देश में ऐसे मतलबी और नाकाबिल लोगों को अहमियत नहीं मिल सकती । अगर भारत देश के शासक प्रशासक नहीं होते तो उनकी हैसियत दो कौड़ी की भी किसी देश में नहीं समझी जाती । हमको गर्व है कि हमारे देश के ये खोटे सिक्के विदेश में चलते ही नहीं दौड़ते हैं इसी को हमारे लोकतंत्र की ताकत कहते हैं । ये अध्याय नहीं है पूर्वकथन जैसा है मगर अब पूरी रामायण महाभारत लिखना कठिन पढ़ना असंभव है अत: इसको गागर में सागर समझ कर खुद विश्लेषण कर अथाह की थाह का विस्तार पाने की आवश्यकता है ।  किसी दार्शनिक का कहना है कि भारत के सभी राजनेताओं को विदेश भेजना देश और जनता के लिए कल्याणकारी साबित होगा मगर कौन ये शुभ कार्य कैसे करे इस पर शोध होना बाक़ी है । 
 
 
 
 विदेश में पढ़ाई करते समय अपनी भाषा कौशल कैसे सुधारें | विदेश जाएँ