डेमोक्रेसी का सपना ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया
कल रात मेरे सपने में वो आ गई जिसे मैं चाहता रहा हमेशा से । मैं जिसका दीवाना था । मेरे इतना करीब कि मैं छू सकता था उसे । मगर फिर वही पुरानी आदत कि मैं उसे कभी दिल की बात कह भी नहीं सका न अपना हाथ बढ़ा कर उसका दामन भी थाम न सका । नाम सुना था बहुत उसका मगर कभी नज़र आई नहीं थी कहीं वो । जैसे हर कुंवारे की कल्पना होती है , कुछ उसी तरह हमारे मन में डेमोक्रसी की मोहिनी सूरत का ख्वाब पलता रहा । इसलिये जब विश्वस्त सूत्रों ने सूचना दी कि आ रही है वो , तो हम खुशी से फूले नहीं समाये और उसका स्वागत करने को तैयार हो कर बैठ गये । कहीं दूर से शोर सुनाई दे रहा था उसकी जय जयकार हो रही थी ,और हम अपने घर से निकल कर सड़क पर चले आये । देखा हर कोई उसको फूलों की माला पहनाने को बेताब है । सब यही समझ रहे थे कि वो हमारे घर की शोभा बढ़ाने को आ रही है । तभी पता चला कि वो राजनेता की हवेली में प्रवेश कर गई और हवेली का द्वार बंद कर दिया गया उसकी सुरक्षा की बात कह कर । आम जनता बैठी रह गई उसकी सूरत को एक नज़र देखने की आस लगाये , और वो किसी बड़े घर की दुल्हन की तरह छिप गई हवेली के पर्दों के पीछे जाकर । सबने यही सोच अपना दिल बहला लिया कि जिसमें उसकी ख़ुशी हम भी उसी में खुश हैं । अब सभी के मन की मुराद वो कैसे पूरी करती , अबला की तरह ।अचानक रात को हम राजनेता की हवेली के पीछे से गुज़र रहे थे कि हमें अंदर से रोने सुबकने की आवाज़ें सुनाई दी । हमने जाकर खिड़की से दरार में से भीतर झांका तो हमें अंदर का नज़ारा दिखाई दे ही गया । अंदर नयी दुल्हन सी सजी संवरी डेमोक्रेसी इक कमरे में कैद थी और मुझे कोई बचाओ की गुहार लगा रही थी । मगर उसकी आवाज़ दब कर रह जाती थी हवेली के उस कमरे में ही । हमने भी सोच लिया कि चाहे जो भी हो आज हम डेमोक्रसी का हाल जान कर रहेंगे और भीतर जाकर मिलेंगे उससे । किसी तरह हम हवेली की दीवार को फांद कर पहुंच ही गये अपनी महबूबा के पास । राजसिंघासन जैसी सजी सेज पर सजी धजी बैठी डेमोक्रसी को देखा तो लगा हमारा सपना साकार हो गया है । हमने पूछा उससे कि इस शाही चमक दमक , इतने बनाव श्रृंगार के बावजूद भी तुम्हारे चेहरे पर उदासी क्यों दिखाई दे रही है हमें । इस भरी जवानी में किस बात की चिंता है तुम्हें , यहां हर कोई तो तुम्हारा चाहने वाला है । तुम्हारे लुभावने रूप की चर्चा है हर तरफ । नेता अफसर सब पल पल तुम्हारा नाम जपते हैं , तुहारी चाहत का दम भरते हैं । जनता में तुम्हारी सुंदरता की ऐसी छवि बनी हुई है कि तुम्हें पाना चाहती है अपना सब कुछ लुटा कर भी । तुमसे प्यार है देश की सारी जनता को , ऐसा लगता है कि तुम्हें कोई वरदान मिला हुआ है चिरयौवन का जो आज़ादी के इतने सालों बाद भी तुम्हारा सलोना रूप मोह रहा है सभी को ।
मेरी बात सुनते ही आंसुओं से भर आई डेमोक्रसी को आंखें । कहने लगी ये सारा मेकअप है मेरे असली चेहरे को सब से छुपाने के लिये । मेरे चेहरे का रंग तो पीला पड़ चुका है और रो रो कर मेरी आंखों के नीचे काले धब्बे पड़ गये हैं । भ्रष्टाचार रूपी कैंसर मेरे फेफड़ों को खाये जा रहा है और मेरा दम तो खुली हवा में भी घुटने लगा है आजकल । मेरे पूरे बदन पर निशान हैं राजनीति से मिले अनगिनित ज़ख्मों के जो छुपे हुए हैं इस चमकीले खूबसूरत लिबास के भीतर । मेरी आत्मा लहुलूहान हो चुकी है , कब से सत्ता की हवेली में कुछ लोगों का दिल बहलाने को नाचकर । जैसे दहेज के लोभी ससुराल वाले अपनी दुल्हन को सताते हैं उसके परिवार वालों से धन ऐंठने के लिये , वैसा ही अत्याचार हो रहा हर दिन मुझ पर । ये सब नेता अफसर मेरे साथ अनाचार करते रहते हैं और बेचारी जनता किसी बेबस बाप की तरह चुपचाप सब देख कर भी कुछ नहीं कर पा रही है । जनता को समझ नहीं आ रहा कि अपनी इस राजदुलारी को कैसे बचाये ।
मैंने कहा डेमोक्रसी अब ज़माना बदल चुका है , अब बहू पे अत्याचार करने वालों को बेटी के माता पिता सबक सिखा देते हैं । दुल्हन को जलाने वालों के विरुद्ध धरने परदर्शन किये जाते हैं । महिलाओं की रक्षा के लिये बहुत कड़े कानून लागू हो चुके हैं । तुम अपनी व्यथा अपना दुःख अपने माता पिता रूपी जनता को सुनाओ , आखिर कब तक भीतर ही भीतर घुटती रहोगी । डेमोक्रसी बोली तुम भी जानते हो दुनिया चाहे जितनी भी बदल चुकी हो महिलाओं की दशा नहीं बदली है आज तक । इसीलिये तुम्हें आज अपने पास बुलाया है ताकि तुम मेरी बात सुन कर सब को बताओ बाहर जाकर । मेरे साथ होते अत्याचार की कोई एफ आई आर दर्ज करवाओ , किसी तरह से मुझे इंसाफ दिलाओ । तभी हवेली के बाहर से डेमोक्रसी की जय जयकार के नारों की आवाज़ें सुनाई देने लगी थी , शायद रात खत्म होने को थी । अचानक मेरी नींद खुल गई और मेरा सपना टूट गया था । मेरे घर के बहार वोट मांगने वालों का शोर सुनाई दे रहा था ।