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अगस्त 02, 2026

POST : 2099 अभी तलक दोस्त ढूंढता हूं ( मेरी चाहत ) डॉ लोक सेतिया

   अभी तलक दोस्त ढूंढता हूं ( मेरी चाहत ) डॉ लोक सेतिया  

जैसा कि मैंने हमेशा ही बताया है मैंने लिखना शुरू ही दोस्त की तलाश में किया था , मेरी ज़िंदगी दोस्ती के नाम है और जितना भी लिखा पिछले पचास वर्ष में उस इक गुमनाम अनजान दोस्त को समर्पित है जो मेरा यकीन है मौत से पहले किसी दिन मिलेगा अवश्य मुझे ।  उस दोस्ती उस अपनेपन की मेरी प्यास का कोई अंदाजा नहीं लगा सकता है दुनिया के अथाह सागर से बस इक बूंद काफ़ी है जो सिर्फ मुझे हासिल हो मेरी प्यास बुझा सकती हो । आपको काल्पनिक असंभव बात लगती होगी क्योंकि आपने दोस्ती का अर्थ गहराई से समझा ही नहीं होगा । इक छोटी सी कहानी पढ़ी थी कि कोई निकला एक दोस्त और उस भगवान की तलाश में तो रास्ते में उसको दोस्त मिल गया , उसके बाद उसको भगवान की आवश्यकता ही नहीं रही । मिला है कभी आपको कोई ऐसा दोस्त जो भगवान से बढ़कर हो , भगवान की भी कितनी शर्तें होती हैं मनाने अपना बनाने की मगर दोस्ती में कोई शर्त नहीं कोई अनुबंध नहीं कोई हिसाब किताब नहीं । दोस्त से कभी कुछ मांगना ही नहीं पड़ता है दोस्ती में आनंद मिलता है देकर अपना सभी कुछ बगैर किसी चाहत के पाने की कुछ भी बदले में । आपने जितनी बातें पढ़ी सुनी होंगी सुदामा कृष्ण जैसी उन में कुछ देना कुछ पाना हुआ होगा जो समानता का अनुभव नहीं करवाता है जबकि सच्ची दोस्ती में बराबर होते हैं जिसका जितना भी है दोस्त का खुद का अपना ही है मांगने की आवश्यकता कभी नहीं पड़ती है । कभी किसी दोस्त के घर पर दीवार पर टंगी हुई थी इक शीशे में जड़ी हुई उद्धरण की बात , दोस्त के घर को जाती सड़क कभी लंबी नहीं होती है , चले आओ । 
 
ऐसा बिल्कुल नहीं कि मैंने दोस्त बनाये नहीं या मैंने कभी दोस्ती नहीं की , बचपन के स्कूल से कॉलेज और उसके बाद तमाम शहरों गांवों में मुझे कितने ही लोग मिलते रहे दोस्त बनाये मैंने । मैंने तो अनगिनत ऐसे भी लोग दोस्त बनाये हमेशा जिन से कभी मिलना हुआ ही नहीं कोई मिलने का बिछुड़ने का अवसर तक नहीं था । ऐसे कितने दोस्त हैं अभी भी और रहेंगे जीवन भर की बात नहीं है मैंने अपने दोस्तों के दुनिया से अलविदा कहने के बाद भी उनकी जगह रखी है दिल दिमाग़ दोनों जगह ही । सभी कुछ न कुछ अलग अपना ख़ास संकल्प बनाते रहते हैं , मेरी चाहत है कहीं किसी जगह ऐसा एक घर बनाया जाये जिस में रहने वाले सिर्फ दोस्ती की हसरत रखते हों । कोई जाति धर्म अमीर गरीब कोई भेदभाव नहीं केवल पावन प्रेम दोस्ती का रत्ती भर भी छल कपट दिखावा नहीं । अपनी ऐसी दुनिया बसाना जिस में कोई भी पराया नहीं हो ।  
 
हर किसी ने समझाया कि ऐसी कोई दुनिया कहीं भी नहीं है कोई भी बिना मतलब रिश्ते नाते नहीं निभाता है आप इक मृगतृष्णा की बात करते हैं ।  लेकिन मैंने कभी ऐसी बातों से निराश होकर अपना संकल्प छोड़ा नहीं है , भरोसा है कोई मुझ जैसा मेरी ही तलाश में रहता है हमेशा । आखिर में इक कविता इक नज़्म से विषय को विराम देते हैं , अंत कभी नहीं होता इस चर्चा का जीवन में। 
 
 

       वो जहां ( कविता ) 

देखी है हमने तो
बस एक ही दुनिया
हर कोई है स्वार्थी जहां 
नहीं है कोई भी
अपना किसी का ।

माँ-बाप भाई-बहन
दोस्त-रिश्तेदार
करते हैं प्रतिदिन
रिश्तों का बस व्यौपार ।

कुछ दे कर कुछ पाना भी है
है यही अब रिश्तों का आधार ।

तुम जाने किस जहां की
करते हो बातें
लगता है मुझे जैसे 
देखा है शायद 
तुमने कोई स्वप्न 
और खो गये हो तुम । 
 

 

ये सबने कहा अपना नहीं कोई ( नज़्म ) 

ये सबने कहा अपना नहीं कोई
फिर भी कुछ दोस्त बनाए हमने ।

फूल उनको समझ कर चले कांटों पर
ज़ख्म ऐसे भी कभी खाए हमने ।

यूं तो नग्में थे मुहब्बत के भी
ग़म के नग्मात ही गाए हमने ।

रोये हैं वो हाल हमारा सुनकर
जिनसे दुःख दर्द छिपाए  हमने ।

ऐसा इक बार नहीं , हुआ सौ बार
खुद ही भेजे ख़त पाए  हमने ।

उसने ही रोज़ लगाई ठोकर 
जिस जिस के नाज़ उठाए हमने । 

हम फिर भी रहे जहां में "तनहा"
मेले कई बार लगाए  हमने । 
 
 
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जुलाई 22, 2026

POST : 2087 लोकनायक जयप्रकाश को गलत आपात्काल को उचित साबित कर दिया { ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया }

लोकनायक जयप्रकाश को गलत आपात्काल को उचित साबित कर दिया  

                          ( आलेख )  डॉ लोक सेतिया 

चलिए आपको 51 साल 24 दिन पीछे लिए चलते हैं , 25 जून 1975 की उस सभा का ये लेखक गवाह ही नहीं वहीं से शुरुआत हुई थी मेरे बौधिक सामाजिक विषयों पर खुद को समर्पित करने की । गंगा जमुना से कितना पानी बहता रहा और कितने शासक बनते बदलते रहे मगर मैं अपनी जगह पर अडिग खड़ा रहा हमेशा । कुछ शब्द और उनका भावार्थ समझना ज़रूरी है , जेपी ने उस दिन सभा में विशेष तौर पर इक बात कही थी जिसे देश की जनता से सत्ताधारी शासकों ने भुला दिया है । उन्होंने सुरक्षाबलों से आग्रह किया था कि क्योंकि उनकी निष्ठा संविधान और देश के कानून की तरफ है किसी राजनेता अथवा सरकार के प्रति नहीं इसलिए अगर कोई भी शासक आपको शांतिपूर्वक प्रदर्शन विरोध करने वाले लोगों पर लाठी गोली चलाने का आदेश दे तो उसे अनुचित असंवैधानिक समझ कर जनता पर हिंसा नहीं करनी चाहिए । अगर वह बात अनुचित थी तो जो लोग उसी आंदोलन में शामिल थे और आज सत्ता पर आसीन हैं उनको आपात्काल घोषणा पर कोई सवाल खड़ा करने या इंदिरा गांधी को दोष देने का अधिकार नहीं है। लेकिन आपात्काल की यातनाओं की दुहाई देने वाले आज 20 जुलाई को उस से कहीं अधिक तानाशाही और दमन का इतिहास रच रहे हैं । सबसे खेदजनक बात मुख्यधारा के मीडिया का एकतरफ़ा और झूठा पक्ष बनाकर विरोध को बदनाम करना है जो साबित करता है कि उनके लिए सरकारी पैसा विज्ञापन और तमाम अन्य सुख सुविधाएं प्राथमिकता हैं जनता की बात उसकी आवाज़ उसके अधिकार नहीं ।  
 

                         ये ज़ब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने  ,

                        लम्हों ने ख़ता की थी सदियों ने सज़ा पाई । 

                                   । । मुज़फ़्फ़र रज़्मी । । 

 

बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी। आज का टेलीविज़न अख़बार शोर मचा रहे है कि वो सभी देशहित में सरकार का पक्ष रख कर महान कार्य कर रहे हैं , अर्थात जनता के विरोध को अनुचित साबित करने को कुतर्क देकर तानाशाही को बढ़ावा देने का अधर्म कर रहे हैं । अगर उनका ये कदम सही है तो 1975 का संपूर्ण क्रांति अंदोलन से अन्ना हज़ारे का लोकपाल नियुक्त करने का आन्दोलन अनुचित था , जिसका समर्थन तब इन्हीं सभी चैनलों ने अख़बारों ने प्रमुखता से किया था ।  दूसरे शब्दों में ये पत्रकार अपने पुराने बड़े बड़े साहसी पत्रकारों को गलत साबित करना चाहते हैं या उनको मूर्ख समझते हैं जो उन्होंने शासक वर्ग से फ़ायदा उठाने का अवसर छोड़ जनहित की बात को उजागर कर अवसर खो दिया बहती गंगा में डुबकी लगाने से वंचित रह गए। जो अख़बार पत्रकार या लेखक या कलाकार टीवी फिल्म निर्माता सामाजिक सरोकार को छोड़ अपने लाभ की खातिर लिखता बोलता है उस को पीत पत्रकारिता कहते हैं । आज इन सभी की हालत ऐसी ही है पीलिया ही नहीं बल्कि कोई कैंसर जैसा रोग उनको लग गया है जो भीतर ही भीतर उनको खोखला कर रहा है। 
 
विसंगति देखिए जो लोग सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को नहीं मानते और अयोध्या में ढांचे को गैरकानूनी ढंग से तोड़ कर अपराधी साबित होने पर सज़ा से बच जाते हैं उनका आंदोलन सही था जिस में सभी मर्यादाओं का उलंघन किया गया और सत्ता की खातिर देश को धर्म के नाम पर विभाजित करने को कितने ही आयोजन करते रहे। लेकिन देश की वास्तविक समस्याओं पर चर्चा तक करना गुनाह कहलाने लगा है । आर्थिक बदहाली से चीन अमेरिका के सामने घुटने टेकना शौर्य कैसे कहला सकता है मगर शासक और पुलिस सुरक्षाबल अपना शौर्य प्रदर्शित करते है जनता पर लाठी आंसू गैस और ताकत का प्रदर्शन कर , उनकी सीमा पर विफलता ढक जाती है क्या ऐसा करने से।  

आखिर में शायर कुलदीप सलिल जी की लाजवाब ग़ज़ल आधुनिक दौर में सार्थक है : 

इस कदर कोई बड़ा हो मुझे  मंज़ूर नहीं 

कोई बन्दों में खुदा हो मुझे मंज़ूर नहीं।

रौशनी छीन के घर घर से चिरागों की अगर 

चाँद बस्ती में उगा हो मुझे मंज़ूर नहीं।

मुस्कुराते हुए कलियों को मसलते जाना 

आपकी एक अदा हो मुझे मंज़ूर नहीं।  

सीख ले दोस्त भी कुछ तो तजुर्बे से कभी 

काम ये सिर्फ मेरा हो मुझे मंज़ूर नहीं।  

खूब तू खूब तेरा शहर ता उम्र मगर 

एक ही आबो हवा हो मुझे मंज़ूर नहीं। 

हूं मैं कुछ आज अगर तो हूं बदौलत उसकी 

मेरे दुश्मन का बुरा हो मुझे मंज़ूर नहीं।   

हो चरागां तेरे घर में मुझे मंज़ूर सलिल 

गुल कहीं और दिया हो मुझे मंज़ूर नहीं।  

 

 
 Best Motivational Shayari in Hindi Status | मोटिवेशनल शायरी स्टेटस हिंदी
 

जुलाई 05, 2026

POST : 2080 दुनिया की पहचान ख़ुद से अनजान ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया

    दुनिया की पहचान ख़ुद से अनजान ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया 

सभी की उलझन यही है अपनी पहचान बनाना ज़माने भर से परिचित रहना , कभी भी कहीं भी कुछ लोग जब मिल कर बैठते हैं तब बातचीत चर्चा का विषय घूम फिर कर इसी शून्य के गिर्द घूमता रहता है । लोग जिन विषयों से ठीक से परिचित नहीं होते हैं उन पर भी पूरे विश्वास और अधिकार पूर्वक सबको उपदेश देते रहते है । अजीब विडंबना है जिस राह पर कभी चलना नहीं सीखा दुनिया को उस राह चलने की नसीहत देते हैं । आदमी संसार भर की जानकारी समझ रखता हैं बस खुद से अपने आप से कभी परिचित नहीं होता है । आजकल नकली होशियारी ए आई की चर्चा है जिस से आप कुछ भी हासिल कर सकते हैं मगर कभी उस से सवाल करें की ख़ुद मेरे बारे में भीतर अंतर्मन में क्या है तो आपको सही जवाब कभी भी नहीं मिलेगा । आज़माना जो भी जवाब मिले उस पर चिंतन करना क्या वास्तव में मेरा यही सच है हैरान मत होना आपको निराशा मिलेगी। कितना कुछ है जो आपने दुनिया से छुपाया हुआ है दिखलाते कुछ सोचते कुछ और आचरण में कुछ और करते हैं ए आई भी नहीं जानता उस आपकी वास्तविक तस्वीर को आपकी पोशीदा जीवनी को । तमाम लोग आत्मकथा लिखते लिखवाते हैं जिस में हमेशा जितना बताया गया होता है उस से अधिक को छुपाया गया होता है और ऐसा करने के लिए कितना कुछ वास्तविकता से कोसों दूर मनघड़ंत बताया जाता है। इक अजीब बात है अक्सर हम पुरातन युग के किरदारों से आधुनिक काल के लोगों की तुलना करते हुए किसी को उन जैसा भला बुरा महान अथवा नीच कहने की बात कर अनुचित करते है। दुनिया में कोई भी इंसान किसी दूसरे जैसा हूबहू मिलता ही नहीं विधाता का ये करिश्मा है मगर हम फिर भी ये हिमाकत करते हैं। अधिक विस्तार से लिखने से बेहतर है अपनी पुरानी डायरी से 20 मार्च 1996 की लिखी ग़ज़ल कहकर विषय का सार समझने की कोशिश की जाए । 
 

                 मैं कौन हूं मुझे पता ही नहीं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

 

मैं कौन हूं मुझे पता ही नहीं 
ख़ुद को कभी भी देखता ही नहीं ।  
 
हर रोज़ झूठ बोलते लोग पर 
ये बात कोई मानता ही नहीं । 
 
धनवान को तो सब हैं पहचानते 
मुफ़लिस को कोई जानता ही नहीं । 
 
इक रोज़ मर के जाएंगे सब समझ 
हर क़र्ज़ हो सका अता ही नहीं ।  
 
ज़िंदादिली से ज़िंदगी को जिएं
थक टूट कर भी हारता ही नहीं ।  
 
खामोश रह के ज़ुल्म सहते रहे 
जो बोलना है बोलता ही नहीं । 
 
' तनहा ' बता जहान में कौन है 
जिस ने कभी भी की ख़ता ही नहीं।  
 
 

 

जून 27, 2026

POST : 2079 देते हैं भगवान को धोखा ( विमर्श ) डॉ लोक सेतिया

      देते हैं भगवान को धोखा ( विमर्श ) डॉ लोक सेतिया  

कब तक धर्म और ईश्वर के नाम पर ठगों चोरों लुटेरों की तिजोरियां भरते रहोगे , सब कुछ सामने देख कर भी आंखों वाले अंधे बनकर अपनी मूर्खता को उचित ठहराते रहोगे । पहले अपने धर्म को समझने की आवश्यकता है समझने को पढ़कर चिंतन की ज़रूरत है । आपका धर्म आपको कभी नहीं कहता है कि आस्था के नाम पर सही गलत की पहचान ही मत करो बल्कि वास्तविक धर्म दीन दुखियों की गरीबों की भूखों की सहायता करना होता है ये संदेश देता है। धर्म और ईश्वर के नाम पर संचय करना कभी धर्म हो ही नहीं सकता है इसलिए आपको मानवधर्म समझ कर जितना संभव हो किसी ज़रूरतमंद की सहायता करनी चाहिए । भला ईश्वर को किसी से कुछ भी क्यों चाहिए होगा , भगवान के नाम पर जो अपना कारोबार व्यौपार करते हैं उनको अपने स्वार्थों से बढ़कर कुछ भी नहीं लगता है । आपको लोभ मोह माया का त्याग करने का उपदेश देने वाले खुद कितना अधिक खुद जमा किये हैं कोई दान पुण्य किसी की सहायता कदापि नहीं करते हैं बल्कि कुछ सामाजिक सेवा करने का दिखावा और आडंबर भी करते है तो खुद अपनी ख़ातिर । गरीबों पर रत्ती भर रहम नहीं करने वाली सरकार कुछ लोगों को कितनी ही कीमती ज़मीन कहने को एक रूपये में 90 साल को पटे पर देने का कार्य कर चोर चोर मौसेरे भाई का रिश्ता निभाती है ताकि वो लोग शासन की अनुचित और धर्म समाज विरोधी कार्यप्रणाली पर समर्थन देने का कार्य करें । ऐसे तमाम साधु सन्यासी क्या खुद धर्म और ईश्वर को समझते हैं । 
 
अगर आपको धर्म दान पुण्य करना है तो दिखावा करने और बदले में कुछ भी चाहत रखने की जगह ज़रूरतमंद लोगों की सहायता करना सही होगा । भगवान कोई हिसाब किताब नहीं रखता है कि आपने कितना चढ़ावा धन दौलत अर्पित की है ताकि बदले में आपको कुछ उपहार वरदान दे या फिर आपके बुरे कर्मों को माफ़ कर दे । ऐसा समझते हैं तो आपको भगवान को लेकर कुछ भी समझ नहीं है , ऊपरवाला सब देखता है जानता है और सही समय पर निर्णय न्याय भी करता है । ये अलग बात है कि हम समझ नहीं पाते हमको जो भी अच्छा बुरा परिणाम हासिल हुआ वो अपने ही बीजे हुए कर्मों का फल मिलता है। सुःख दुःख का परेशानियों का कारण हम खुद ही होते है कोई भी हमको बचा नहीं सकता अपने अच्छे बुरे कार्यों के परिणाम से। जिनसे आपको ऐसी उम्मीद आशा अपेक्षा रहती है खुद उनको भी कर्मफल का परिणाम मिलता है , सामने है सभी आपको समझ नहीं आता तो आपकी समझ पर निर्भर है । क्या आपने ईमानदारी से मेहनत से कमाई की है तो आपकी नेक कमाई किसी गलत कार्य में ऐसे व्यक्ति को नहीं देनी चाहिए जो दान का सही पात्र नहीं हो। किसी की चिकनी चुपड़ी बातों पर भरोसा कर ऐसे दान या सहायता नहीं देनी चाहिए जिसका गलत उपयोग किया जा सकता है और अगर ऐसा हुआ भी है तो आपको ऐसे लोगों संगठनों और संस्थानों का विरोध करना चाहिए जो धर्म ईश्वर और समाजसेवा की आड़ में अपनी तिजोरियां भरते हैं । 
 
  

    छाई हुई घटा घनघोर है ( हास्य-कविता ) 

      डॉ लोक सेतिया 

चोर सबको कहता लुटेरा अजब तौर है  ,
देश की सियासत का यही नया दौर है । 
 
अब अंधेरे उजालों को समझाने लगे हैं 
बंद आंखों से देख समझो हो गई भौर है ।
 
सबको ये तमाशा लाज़मी देखना होगा 
हम्माम में सभी नंगे है ये तो हर ठौर है ।
 
इक पहेली है सच क्या और झूठ क्या 
लबों पर है कुछ दिल की बात और है ।  
 
हमने इरादा किया बनाएंगे राह इक नई 
फुर्सत मिले सोचते हैं काबिल ए गौर है ।  
 
शहंशाह को भूख है जो मिटती ही नहीं है
छीन लो गरीबों से हाथ अगर इक कौर है ।  

उनका दस्तूर है सब परस्तिश उनकी करें 
उनकी मर्ज़ी जो चाहें वही ख़ुद सिरमौर है । 
 
खुद मसीहा है हर गुनाह उसका मुआफ़ है 
जो है उसका मुख़ालिफ़ शख़्स वो चोर है । 

 

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मार्च 06, 2026

POST : 2064 आधुनिक युग की कथा क्या है ( विमर्श ) डॉ लोक सेतिया

     आधुनिक युग की कथा क्या है ( विमर्श ) डॉ लोक सेतिया  

साहित्य भले अधिकांश लोग नहीं पढ़ते हैं लेकिन धार्मिक ग्रंथों की कथाओं कहानियों से सभी परिचित हैं ।जानकारी और समझना अलग बात है मगर सबसे विचित्रता यही है कि शायद ही कभी अधिकांश लोग अपने विवेक से अथवा अंतरात्मा से पूछते हैं कि आदर्शों नैतिकता के मूल्यों की कसौटी पर खुद कितने खरे कितने खोटे हैं । शायद जितना बड़ा समझते हैं अपने आप को उतने ही छोटे हैं कभी सोचा है हम क्या करते हैं गंभीर विषय पर हंसते हैं जिन बातों का कोई मतलब नहीं उनका रोना रोते हैं । जानता हूं आज कोई भी रामायण गीता महाभारत जैसे ग्रंथ की रचना करने की बात सोचता ही नहीं शायद किसी को ऐसी किताब का कोई महत्व ही नहीं महसूस होता है फिर भी सोचना अगर उन ग्रंथों की बातों पर गौर किया जाए तो हम सभी हमारा समाज कैसा है । पुरातन कथाओं को छोड़ अपने पुराने इतिहास को ही जानते समझते तो समझ पाते कि हम कितने बौने नकली किरदार वाले बनते जा रहे हैं । क्या हम किसी धर्मयुद्ध में शामिल हैं या नहीं हैं सिर्फ दर्शक हैं तमाशाई हैं , हम में साहस ही नहीं सही और गलत की पहचान परख करने का अर्थात हम कायर और विवेकहीन लोग हैं जो अपनी असलियत छिपाने को ढकने को कोई आवरण ओढ़े रहते हैं । दुनिया हमेशा उनको महत्व देती है जो अपने समय में इस तरफ या उस तरफ खड़े होते हैं जो कौरव और पांडव राम और रावण कृष्ण और कंस में किसका चयन करना है नहीं निर्णय कर पाए उनको कालखंड की बात लिखने वालों ने किसी कूड़ेदान में भी जगह नहीं दी उनका कोई वजूद कहीं नहीं दिखाई देता है ।
 
हमको सोचना चाहिए हम खुद भी और हमारी शासन वर्ग की व्यवस्था कैसी है , कोई अपना तौर तरीका है कोई रास्ता जो भले कितना कठिन हो उस पर चलना ही है अपनी विचारधारा से पीछे हटना स्वीकार नहीं है । अगर वही हमने खो दिया है तो हमारे पास बचा कुछ भी नहीं हैं , कभी उधर कभी इधर अवसरवादी बन कर अथवा कायरता को किसी तरह से कुछ और नाम देकर इतिहास से नज़रें चुराते हैं । कभी हमारे देश और समाज के कुछ नायक हुआ करते थे जिन्होंने हमेशा अपने स्वार्थों धन दौलत शोहरत ऐश आराम को छोड़ अपनी विवेकशीलता से सही और गलत को समझ कर खुद भी सही को चुना और सभी को सही दिशा दिखलाई थी । लेकिन आज कैसे लोग नायक कहलाने लगे हैं हम कैसे उनको महानायक बतलाने लगे हैं जो सत्ता ताकत नाम शोहरत धन दौलत की खातिर खुद अपनी कीमत लगवाने लगे हैं । बिकने वाले कभी ख़रीदरार नहीं हो सकते हैं कोई बचा है जो किसी कीमत पर किसी हालात में बिकता नहीं है ।  ये सभी विडंबनाएं हमारे सामने हैं हम देख कर देखना ही नहीं चाहते अपनी आंखें नहीं सोचने समझने की शक्ति को ही छोड़ दिया है आंखों वाले अंधे बन गए हैं ।   
 
बात सिर्फ हथियारों की जंग की नहीं है हमने आसानी से सभी हासिल करने की चाहत में जीवन की लड़ाई लड़ने से पहले समझौता कर हार मान ली है । सोचते ही नहीं हम कैसा समाज बन गए हैं जो भेड़चाल की तरह चलता जाता है बुद्धि का उपयोग करना भूल गए हैं । हमने जितने भी धार्मिक ग्रंथ पढ़े हैं उन सभी में दो पक्ष अच्छाई बुराई या कुछ भी अन्य कारण से आमने सामने खड़े थे लेकिन दोनों तरफ कुछ लोग साथ देने विरोध करने की खातिर खुद समझ से निर्णय लिया करते थे जीतना हारना महत्व नहीं रखता आपका कोई मकसद होना आवश्यक है । लेकिन आजकल हम सभी खुद को विशेष मानते हैं जबकि ऐसी कोई विशेषता हम में होती ही नहीं है । आधुनिक शिक्षा ने हमारे समाज को ज़िंदा समाज से किसी निर्जीव समाज में बदल दिया है जो मशीनी ढंग से रहता है आचरण करता है वास्तविक ज्ञान से हम ख़ाली हो गए हैं । कैसे विडंबना है कि हम अपनी पुरानी विरासत परंपराओं पर गर्व की बात करते हैं जबकि हमारी खुद की कोई भी गौरवशाली परंपरा या विरासत भविष्य को सौंपने को नहीं पास हमारे । शायद तभी कोई  चाह कर भी कुछ लिख नहीं सकता है जो वास्तविकता है उसको अनकहा छोड़ना बेहतर है ताकि आने वाली पीढ़ियां शर्मिंदा नहीं हों । 
 
अंत में मुझे इक लोककथा याद आती है , किसी नगर को शानदार बनाने को इक जादूगर अपने जादू से सभी इंसानों से जीव जंतुओं पेड़ पौधों को चमकीले लिबास से ढक देता है । ठीक जैसे हमने खुद को कितनी तरह के उजले कपड़ों कीमती ज़ेवर इत्यादि से सजाया हुआ है । भैतिक ही नहीं आध्यात्मिक तौर भी झूठी नकली चीज़ों से खुद को ढक लिया है जिस से दिखाई देता है शानदार है मगर भीतर धीरे धीरे खोखलापन बढ़ता गया है और उस जादूगर की दिखावे की दुनिया अचानक किसी जर्जर इमारत की तरह ध्वस्त हो जाने को अभिशप्त है । हमारी हर चीज़ काल्पनिक है वास्तविकता से हमारा देश समाज कोई मेल नहीं खाता है । संक्षेप में हमने पत्थरों को हासिल करने में अनमोल रत्नों को गंवा दिया है और हम धरती से आकाश छूने चांद पर जाने के नाम पर नीचे रसातल में पहुंच चुके हैं , अब पछताने से भी क्या हासिल होगा ।  
 

  

फ़रवरी 06, 2026

POST : 2052 देश की संसद में सांसदों से खतरा ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया

     देश की संसद में सांसदों से खतरा ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया  

 शायर बशीर बद्र जी कहते हैं , बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना । मुझे हमेशा बड़े लोगों से बचकर रहना ज़रूरी लगता है , नेताओं की सभाओं में जाना सामान्य नागरिक के लिए परेशानी का सबब बन जाता है । कितनी बार वीवीआईपी लोगों का सड़क पर ख़तरनाक़ रफ़तार से निकलता वाहनों का काफ़िला हमको भयभीत करता है क्योंकि उनकी गाड़ियां अपनी साइड को छोड़ गलत साइड भी दौड़ती हैं जब सड़क पर कोई डिवाईडर नहीं होता है । अधिकारी राजनेता ही नहीं अन्य कुछ लोग भी सार्वजनिक सड़क पार्क पर कोई भी आयोजन कर किसी एम्बुलेंस की रह में बाधा पैदा कर रोगी की ज़िंदगी पर संकट पैदा करते हैं । आजकल शासक रोज़ाना सभाएं आयोजित कर अपना रुतबा ऊंचा करने को व्याकुल रहते हैं , उनको जनता की बात सुननी पसंद नहीं होती केवल जय जयकार सुनना चाहते हैं । सुरक्षा कर्मी उनकी सुरक्षा से बढ़कर इस बात को लेकर सजग होते हैं कि गलती से कोई विरोध की आवाज़ नहीं सुनाई दे । अधिकांश सभाओं में काले रंग की पोशाक से लेकर कोई कपड़ा तक लोग लेकर नहीं आएं ये देखना होता है । जनता को ये सभी कोई सुरक्षा का एहसास नहीं करवाते बल्कि भय का वातावरण पैदा करते हैं । शासकों को जनता से कोई खतरा नहीं है मगर अब उनको अपने ही साथ रहने वाले सहकर्मियों से डर लगता है ऐसा कुछ घटनाओं से मालूम हुआ है बात ख़ुदकुशी करने तक पहुंच गई है लेकिन विषय को अधिक तूल नहीं दिया गया क्योंकि ऐसा करने से जाने क्या क्या सामने आने का अंदेशा था ।  अब मामला संसद में सांसदों से सरकार तक की सुरक्षा पर पहुंच गया है जो अप्रत्याशित है ।  
 
ये साधारण बात कदापि नहीं है ये बेहद गंभीर चिंता की बात है किसी टीवी चैनल या सोशल मीडिया पर किसी की कही बात नहीं बल्कि लोकसभा के अध्यक्ष की कही बात है । लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला जी ने बताया है कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र  मोदी जी को सदन में नहीं आने का अनुरोध किया था क्योंकि उनको किसी अप्रिय घटना के घटने का अंदेशा था । संसद भवन पर आतंकवादी हमले से सांसदों को बचाने को सुरक्षा कर्मी अपनी जान पर खेलकर सफल रहे थे 13 दिसंबर 2001 को , लेकिन आज समझाया जा रहा है कि देश के प्रधानमंत्री और सदन के नेता को संसद में सांसदों से ही खतरा महसूस होने लगा है लोकसभा अध्यक्ष को ही । सबसे पहला प्रश्न तो यही है कि क्यों कैसे ऐसे सांसद निर्वाचित होकर लोकतंत्र का मंदिर कहलाने वाले संसद भवन में पहुंच गए हैं जिन से असभ्य अशिष्ट और अशोभनीय व्यवहार की आशंका हो सकती है । लेकिन उस से भी बढ़कर संसदीय मर्यादा को लेकर चिंतन की आवश्यकता है , संसद में सत्ता पक्ष और प्रतिपक्ष क्या शालीनता पूर्वक विचार विमर्श नहीं कर सकते हैं । दोष किसी एक पक्ष का नहीं है लगता है सभी ने मर्यादा की सीमाओं को लांघने में कोई संकोच नहीं किया है । खुद देश के प्रधानमंत्री ही राज्य सभा में उनसे पहले के सभी प्रधानमंत्रियों को लेकर आपत्तिजनक बातें कहते हैं और सत्तापक्ष के सभी सांसद समर्थन करते हैं । ऐसा अहंकार कभी पहले नहीं दिखाई दिया है बल्कि जिनको लेकर प्रधानमंत्री जी हमेशा आलोचना करते हुए मर्यादा की सीमा भूल जाते हैं उन्होंने अपने समय में विपक्ष को महत्व देने और आदरपूर्वक उनकी बात को सुनने का प्रयास किया था संसद में  । 
 
आज प्रधानमंत्री कहते हैं कि पहले के सभी प्रधानमंत्री देश को लेकर संजीदा नहीं थे उनकी कोई सोच नहीं थी समाज को लेकर कोई दृष्टि नहीं थी ।  जबकि उनको मालूम होना चाहिए कि लोकतंत्र की आधारशिला मज़बूत बनाने में उनकी भूमिका कितनी महत्वपूर्ण रही है । उनकी समझ उनकी मनोकामनाओं को कम आंकना किसी अपराध जैसा है तमाम नेताओं ने देश को शानदार भविष्य देने की कोशिशें की हैं । केवल सत्ता पाने की भूख तब नहीं दिखाई देती थी और न किसी को छोटा बनाकर अपना कद बढ़ाना किसी ने ऐसा किया था । नई शिक्षा आधुनिक समय के साथ कदम मिलाकर चलना जानते थे तभी गरीबी के समय भी परमाणु विज्ञान और शिक्षा स्वास्थ्य से लेकर देश में आपसी भाईचारा कायम रखने में उन सभी ने पूरी निष्ठा और देश समाज के प्रति ईमानदारी से कर्तव्य निभाया है । यहां तक की देश की आज़ादी की लड़ाई में अपना जीवन और सर्वस्व अर्पित किया है । संविधान बनाने से संवैधानिक संस्थाओं का निर्माण करने तक उनकी भूमिका और योगदान भुलाया नहीं जा सकता है । इतना ही नहीं जो लोग स्वतंत्रता संग्राम में शामिल नहीं थे बल्कि अंग्रेजी हुकूमत की सहायता करते थे उनको भी आज़ाद देश में बराबर अवसर प्रदान कर किसी भी तरह से कोई भेदभाव नहीं करना लोकतांत्रिक परंपरा स्थापित करना मकसद रहा है । आज लगता है कि जैसे कोई व्यक्ति देश समाज संविधान कानून से ऊपर दिखाई देने लगा है जिस पर कोई सवाल कोई विरोध करना सत्ता को स्वीकार नहीं है । ये तो लोकतांत्रिक संवैधानिक और मौलिक अधिकारों का हनन कहला सकता है , कोई भी राजनेता आलोचना से परे नहीं हो सकता है । शायद सभी दलों में अपराधी प्रवृति के लोग सांसद या विधायक बनकर माननीय कहलाते हैं तभी संसद में आचरण का स्तर गिरता ही जा रहा है ।  देश की राजनीति में अब आपसी विश्वास सदभावना का नितांत आभाव दिखाई दे रहा है , मगर वास्तव में डर किसी और से कम शायद खुद अपने आप से भीतर से अधिक महसूस होता है ।  शायद ही कभी किसी को सामन्य जनता के ख़ास वर्ग द्वारा कुचले जाने की घटनाओं पर कभी चिंता हुई हो उन पर अंकुश लगाने की चर्चा हुई हो , ख़ास लोगों की जान की कीमत होती है साधारण जनता तो कीड़े मकोड़े कभी अनचाहे अवरोध की तरह मसले कुचले जाते हैं । 
 
 
 May be an image of text that says "The TheStatesman tatesman Om Birla says he asked M Modi not to to attend Lok Sabha session over safety concerns"
 
 

जनवरी 08, 2026

POST : 2048 अपराध करने का अधिकार ( ग़ज़ब इंसाफ़ ) डॉ लोक सेतिया

     अपराध करने का अधिकार ( ग़ज़ब इंसाफ़ ) डॉ लोक सेतिया 

संविधान में सभी एक समान हैं तो कायदे कानून नियम सभी पर समान लागू होने चाहिएं , बल्कि जिनको अदालत से सरकारी दफ़्तर तक में न्याय करना हो अगर वही किसी कारण गलत फ़ैसले करते हैं तब ऐसे में उनको सख़्त और अधिक सज़ा मिलनी चाहिए । टिप्पणी सुनकर हैरानी हुई कि निचली अदालत अथवा किसी विभाग के अधिकारी की एक समान आपराधिक घटना पर दो लोगों को अलग अलग निर्णय करने पर किसी राज्य के उच्चतम न्यायालय के बर्ख़ास्त करने के आदेश को अनुचित घोषित कर दिया । इतना ही नहीं बल्कि ये भी कहा गया कि सिर्फ गलत या त्रुटिपूर्ण फैसले से किसी न्यायधीश पर कोई विभागीय जांच या कोई करवाई नहीं की जा सकती है । सर्वोच्च न्यायालय को क्या इतना भी समझना ज़रूरी नहीं प्रतीत होता है कि देश में नीचे से ऊपर तक अदालतों से तमाम प्रशासनिक विभागीय अधिकारियों द्वारा मनमानी पूर्वक और विवादस्पद आदेशों से करोड़ों लोगों को न्याय नहीं मिलता बल्कि निर्दोष भी दोषी करार दिए जाते हैं और कैद में जीवन बिताते हैं । जबकि हमारी न्याय प्रणाली की निष्पक्षता पर सवाल खड़ा होता है जब ख़ास लोगों को गंभीर अपराध करने के बाद दोषी साबित होने पर भी ज़मानत से लेकर पैरोल तक बड़ी आसानी से मिलती रहती है । खेदजनक कड़वी वास्तविकता तो ये है कि बड़े लोगों ख़ास समझे जाने वाले वीवीआईपी वर्ग पर शिकायत दर्ज करवाने से लेकर जुर्म साबित करने तक कदम कदम पर अड़चनों और मुसीबतों से टकराना पड़ता है क्योंकि शुरू से आखिर तक यही लोग जांच सबूत गवाह सभी को मिटाने को सक्षम होते हैं । शायर कृष्ण बिहारी नूर जी का शेर है धन के हाथों बिके हैं सभी अब किसी जुर्म की सज़ा ही नहीं । 
 
प्रशासनिक बड़े अधिकारियों से अदालती प्रणाली में शामिल सभी इक ऐसी व्यवस्था का अंग हैं जहां हर जगह रिश्वत से तारीख बढ़ाने से अन्य तमाम कामकाज होता है जिसे अनिवार्य समझ लिया गया है । देश की आज की बदहाली इन्हीं सभी शासक वर्ग की आपराधिक शैली की बदौलत है जिस में भ्र्ष्टाचारी खुले फिरते हैं और गरीब पिसते रहते हैं अपना सभी कुछ दांव पर लगाकर भी इंसाफ़ नहीं मिलता । सच बताऊं तो हमारे देश की प्रशासनिक प्रणाली विधायिका मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री सभी शपथ संविधान की उठाते हैं सभी के साथ समान रूप से निष्पक्ष होकर बिना अनुराग या बैर रखे विधि अनुसार न्याय करेंगे । लेकिन ऐसा होता कभी दिखाई नहीं देता है बल्कि सभी चोर चोर मौसेरे भाई की तरह आचरण करते हैं साधरण व्यक्ति को न्याय देना उनकी प्राथमिकता ही नहीं है मगर जिनको राहत देनी होती है उनके लिए सिर्फ रास्ते ही नहीं बनाये जाते बल्कि कायदे कानून ताक पर रखने तोड़ने से बदलने तक का कार्य निसंकोच किया जाता है । राजनीति में तो खैर अपराधी होना विशेषता समझा जाने लगा है , प्रशासन भी सत्ताधारी राजनेताओं से तालमेल बिठाकर खुद अपने स्वार्थ सिद्ध करते हैं । कितनी विडंबना है कि उच्च शिक्षा ऊंचे पदों पर बैठ कर भी देश समाज के प्रति ईमानदारी से कार्य नहीं करते हैं , विवेकशीलता का नितांत आभाव है । राजनेता अधिकारी फिल्म जगत के बड़े बड़े अभिनेता नायक फिल्म निर्माता तक सभी अपराध करते हैं राजनेताओं से मिलकर और कभी उनको सज़ा नहीं मिलती है । टेलीविज़न अख़बार में उनकी ऐसी खबरों को छुपाया जाता है अन्यथा जिनको लोग ख़ुदा या फ़रिश्ता समझते हैं उनकी छवि धूमल हो सकती है । टीवी सीरीज़ और कॉमेडी शो से खिलाड़ी तक जनता को गुमराह करते हैं सिर्फ पैसा कमाना उनका एक मात्र मकसद है । 
 
सबसे बड़ी अदालत को कभी चिंता ही नहीं हुई कि देश की न्याय व्यवस्था की शोचनीय दशा को कैसे सुधारा जा सकता है । जब न्यायधीश सेवामुक्त होने के बाद सांसद अथवा किसी अन्य संसथान में नियुक्ति पाकर शानो शौकत से राजसी जीवन बिताना अधिक महत्वपूर्ण समझते है इस से कि उनको समाजिक निस्वार्थ कार्यों को करना चाहिए जनकल्याण की भावना रखते हुए , तब बदलाव क्या होगा कैसे संभव है । बड़े प्रशासनिक अधिकारी भी राजनेताओं सरकार से मेलजोल रख कर अपना कार्यकाल बढ़ाने से अन्य किसी पद पाने को लालायित रहते हैं किसी की चाहत मिटती ही नहीं है । आख़िर में अपनी इक ग़ज़ल से पहले आपको इक लोककथा की बात करते हैं । इक बादशाह ने देखा सड़क बहुत सारे गधे इक कतार में चल रहे हैं , बादशाह ने धोबी से पूछा ये इक कतार में सीधे कैसे चलते हैं । धोबी ने बताया जो कतार तोड़ता है मैं उसे सज़ा देता हूं । बादशाह ने पूछा क्या तुम मेरे राज्य में अमन कायम कर सकते हो , धोबी ने हामी भर ली । बादशाह  ने उसे मुंसिफ़ अर्थात न्यायधीश बना दिया , शहर आकर न्यायधीश बन कर फ़ैसला करने का पद पाकर अदालत में सुनवाई करने लगा । इक चोर को पकड़ कर लाया गया जुर्म साबित हुआ , धोबी ने आदेश दिया इस चोर के हाथ काट दो । सज़ा देने वाले जल्लाद ने इशारा किया कि चोर वज़ीर का ख़ास आदमी है , धोबी ने फिर कहा उसका हाथ काट दो । तब वज़ीर ने सरगोशी की अपना आदमी है थोड़ा ख़्याल करो , धोबी ने इस बार ज़ोर से आदेश दिया कि चोर का हाथ और वज़ीर की ज़ुबान दोनों काट दो । कहते हैं ऐसे अमन कायम हो गया । आजकल ऐसे भाईचारा निभाने वाले राजनेता अधिकारी पुलिस से लेकर तभी धनवान उद्योगपति टीवी फिल्म धर्म उपदेशक हैं जिनका आपसी लेन देन का हिसाब है , ऐसे लोग अन्याय अत्याचार करते ही नहीं बल्कि नियम कानून संविधान को अपनी ठोकर पर रखते हैं । सभी जानते हैं उनको सज़ा कभी नहीं मिलती लेकिन अब चाहते हैं उनके अपराध को ही उनका कर्तव्य या अधिकार घोषित कर दिया जाना चाहिए ।     
 
पहले सिर्फ देश के राष्ट्रपति को लेकर ऐसा सुनते थे क्योंकि उस पद पर आसीन व्यक्ति बेहद ईमानदार और काबिल हुआ करता था । आजकल तो उस पद की गरिमा भी बची नहीं है और लगता है कि जैसे वहां भी सत्ता धारी लोग अपनी कठपुतली बिठाने लगे हैं जो उनकी हर बात पर मोहर लगाने को विवश है । लेकिन लोकतंत्र में न्याय में भेदभाव कैसे हो सकता है , जिनके गुनाहों की सज़ा अधिक कड़ी होनी चाहिए उनको जुर्म करने की अघोषित छूट है कि उनको सुरक्षा कवच दिया जाए अपराधी होने पर भी उनकी कोई जांच तक ही नहीं हो सकती हो । ग़ज़ल पेश है :- 
 
 

फैसले तब सही नहीं होते ( ग़ज़ल ) 

डॉ लोक सेतिया "तनहा"

फैसले तब सही नहीं होते
बेखता जब बरी नहीं होते ।

जो नज़र आते हैं सबूत हमें
दर हकीकत वही नहीं होते ।

गुज़रे जिन मंज़रों से हम अक्सर
सबके उन जैसे ही नहीं होते ।

क्या किया और क्यों किया हमने
क्या गलत हम कभी नहीं होते ।

हमको कोई नहीं है ग़म  इसका
कह के सच हम दुखी नहीं होते ।

जो न इंसाफ दे सकें हमको
पंच वो पंच ही नहीं होते ।

सोचना जब कभी लिखो " तनहा "
फैसले आखिरी नहीं होते । 
 
 सेवानिवृत्ति के बाद विभागीय जांच पर सुप्रीम कोर्ट की रोक, MSWC का रिकवरी  आदेश रद्द | Court Book Hindi

दिसंबर 25, 2025

POST : 2046 देश समाज की बर्बादी को अग्रसर ( लूट का शासन ) डॉ लोक सेतिया

  देश समाज की बर्बादी को अग्रसर ( लूट का शासन ) डॉ लोक सेतिया 

शायद नहीं अब यकीनन कहा जा सकता है कि हमारे देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में शामिल सभी अंग विधायिका कार्यपालिका न्यायपालिका का गठजोड़ पैसे वाले और गुंडे बदमाश से लेकर गंभीर अपराधियों तक से पूर्णतया हो चुका है । देश की अधिकांश जनता के लिए इन सभी के भीतर रत्ती भर भी मानवीय संवेदना नहीं है बल्कि उसको किसी न किसी तरह बहला फुसला कर झूठे वादों प्रलोभन के जाल में फंसा कर जैसे बेबस कर दिया गया है । राजनेताओं की राजनीति सभी दलों की सिर्फ सत्ता पर काबिज़ होकर पूरी व्यवस्था को अपने लिए हथियाना बन चुका है । देशभक्ति समाजसेवा जनकल्याण गरीबी भूख असमानता ये सब किसी राजनेता किसी प्रशासक किसी न्यायधीश की प्राथमिकता नहीं रही है , इन बातों का झूठा प्रचार कर डंका पीटना जानते हैं आचरण बिल्कुल उल्टा करते हैं । धनवान बड़े बड़े पूंजीपतियों से राजनेताओं सरकारी उच्च अधिकारियों न्यायधीशों तक सत्ता और पैसे की हवस में इस सीमा तक पागल हो चुके हैं कि देश की लोकतांत्रिक प्रणाली को घुन की तरह खोखला करने के बाद और भ्र्ष्टाचार को अधिकार बनाने के बाद अब प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर मानव जीवन तक को खतरे में डालने को आतुर हैं । समाज के प्रति कोई कर्तव्य किसी को भी याद नहीं है बल्कि समाज की बुनियाद को खोखला कर रहे हैं । जनता को धोखा देने को समझाते हैं कि आने वाले इतने सालों बाद देश अर्थव्यवस्था की बुलंदी पर पहुंच जाएगा और कोई भी भूखा बेघर नहीं रहेगा ।  आज़ादी का अर्थ ये कदापि नहीं था कि कुछ लोग सरकार की योजनाओं से लेकर धर्म और समाजसेवा एवं पत्रकारिता फिल्म टेलीविज़न को अपने स्वार्थों के लिए दुरूपयोग कर उनकी असली छवि को ही धूमिल कर देंगे । 
 
आजकल सभी सरकारी योजनाएं बड़ी बड़ी कुछ कंपनियों की तिजोरियां भरकर बदले में चंदा रिश्वत लेकर खुद ऐशो आराम की ज़िंदगी हासिल कर मौज मनाने का माध्यम बन गई हैं । उद्योगपतियों की मर्ज़ी से नियम कानून बनाने बदलने में नैतिकता की बात क्या पर्यावरण तक को दांव पर लगाने का कार्य किया जाने लगा है । विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि सरकार जंगलों पहाड़ों से पर्यावरण का विनाश कर रही है जिस से भविष्य में मानवता का जीवन खतरे में पड़ने वाला है । लेकिन इन सभी को करोड़ों लोगों की कोई चिंता नहीं है क्योंकि इन सभी ने भारत देश को अपना समझा ही नहीं हैं इन सभी को कभी किसी और देश में जाकर बसना है । तमाम ऐसे लोगों ने ऐसा प्रबंध कर लिया है अपने परिवार को किसी सुरक्षित देश में भेजने का । ऐसे लोग कभी देशभक्त नहीं होते हैं सिर्फ देशभक्ति की बातें करते हैं देश को समाज को कुछ देते नहीं बल्कि बदहाल कर रहे हैं । आपको लगता होगा ये धार्मिक आचरण करते हैं जबकि वास्तविक जीवन में अधर्म ही उनका आधार है सच्चाई और ईमानदारी धर्म की राह पर चलते तो ख़ुदगर्ज़ नहीं परमार्थ की बात करते और देश समाज का ऐसा खराब हाल होता ही नहीं । आपने कभी चावार्क ऋषि की बात सुनी होगी , ऐसा केवल एक व्यक्ति नहीं था बल्कि दार्शनिक शोध करने वाले बताते हैं कि ये इक विचारधारा थी जिस के कितने ही अनुयायी हुआ करते थे ।    
 
चावार्क की सोच वाले ये सभी बड़े बड़े लोग हैं जिनको लगता है कि बस यही लोक ही वास्तविक है और कोई स्वर्ग नर्क नहीं है कोई भगवान नहीं है । आपको मौज मस्ती करनी है अपनी ख़ुशी की खातिर जीना है , जब ऐसे शासक प्रशासक अन्यायी अत्याचारी और अपराधी लोगों को संरक्षण देते हैं तब उनको पाप पुण्य भलाई बुराई की नहीं बस अपनी आकांक्षाओं की पूर्ति करनी होती है । ऐसे लोगों का धार्मिकता प्रदर्शन अपने असली चरित्र को छिपाने को होता है । लेकिन सिर्फ वही नहीं हम में भी बहुत लोग यही करते हैं मंदिर मस्जिद गुरुद्वारे गिरजा घर जाते हैं लेकिन सभी अनुचित कर्म भी करते रहते हैं । कुछ लोग गुमराह करते हैं कि जितने भी पाप करते रहो कुछ तरीके हैं पापमुक्त होने को , जबकि वास्तव में अगर परमात्मा है तो ऐसा होने कैसे दे सकता है । अपने भीतर से अपराधबोध को हटाने का ये खोखला प्रयास है , व्यक्ति हमेशा बेचैन रहता है खुद अपनी ही अंतरात्मा से डरता है । आजकल शासक पुरानी सभी परिभाषाओं को बदल रहे हैं जिन बातों को अनैतिक और असमाजिक कहा जाता था उनको आवश्यक घोषित किया जाने लगा है , विकास के नाम पर विनाश को आमंत्रित करने लगे हैं लोभी ख़ुदगर्ज़ स्वार्थी सत्ताधारी लोग ।  पिछले कुछ सालों में सरकारी योजनाओं की भेंट करीब तीन करोड़ पेड़ काटकर किये गए हैं जबकि आदमी का सांस लेना दूभर हो गया है , मगर सरकार की बेशर्मी झलकती है जब ब्यान आता है कि फेफड़ों का स्वच्छ हवा से कोई रिश्ता नहीं है जैसे शासकों का ईमानदारी और समाज कल्याण से वास्तव में कोई नाता नहीं है उनको सभी कुछ चाहिए किसी भी कीमत पर और ऐसा करने में सामने आने वाली बाधा को मिटाया जाना उसको अपना अधिकार लगता है । 
 

ठंडी ठंडी छांव ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

घर के आंगन का वृक्ष हूं मैं
मेरी जड़ें गहराई तक फैली हैं
अपनी माटी में
प्यार से सालों साल सींचा है
माली ने पाला है जतन से
घर को देता हूं छाया मैं ।

आये हो घर में तुम अभी अभी
बैठो मेरी शीतल शीतल छांव में
खिले हैं फूल कितने मुझ पर
निहारो उनको प्यार से
तोड़ना मत मसलना नहीं
मेरी शाखों पत्तों कलियों को
लगेंगे फल जब इन पर
घर के लिये  तुम्हारे लिये 
करो उसका अभी इंतज़ार ।

काटना मत मुझे कभी भी
जड़ों से मेरी
जी नहीं सकूंगा 
इस ज़मीन को छोड़ कर
मैं कोई मनीप्लांट नहीं
जिसे ले जाओ चुरा कर
और सजा लो किसी नये गमले में ।

देखो मुझ पर बना है घौसला
उस नन्हें परिंदे का
उड़ना है उसे भी खुले गगन में
अपने स्वार्थ के पिंजरे में
बंद न करना उसको
रहने दो आज़ाद उसको भी घर में
बंद पिंजरे में उसका चहचहाना
चहचहाना नहीं रह जायेगा
समझ नहीं पाओगे तुम दर्द उसका ।

जब भी थक कर कभी
आकर बैठोगे मेरी ठंडी ठंडी छांव में
माँ की लोरी जैसी सुनोगे
इन परिंदों के चहचहाने की आवाज़ों को
और यहां चलती मदमाती हवा में
आ जाएगी तुम्हें मीठी मीठी नींद । 
 
 
 Aravali mountain range, अरावली पर्वत श्रृंखला, विश्व की सबसे पुरानी पर्वत  श्रृंखला, अरावली पर्वत, - YouTube

नवंबर 26, 2025

POST : 2041 सच कहने पे जाँ मत वारो ( सच मत बोलना ) डॉ लोक सेतिया

      सच कहने पे जाँ मत वारो ( सच मत बोलना   ) डॉ लोक सेतिया  

            ( ये पोस्ट सच की खातिर जान देने वाले सत्येंद्र दुबे जी की याद में लिखी है  ) 

कभी हुआ करते थे ऐसे ऊंचे आदर्शवादी लोग जो सच पर खड़े रहते थे और कभी पीछे नहीं हटते थे बेशक जान ही चली जाए । समाज में आजकल कोई सच बोलकर आफत मोल नहीं लेता जब झूठ और पाप की राह पर चलने से आपकी राहों पर फूल बिछे हों , शानदार सभाओं में मंच सजाया जाता हो खज़ाना लुटाया जाता हो , स्वागत को लाल कालीन बिछाया जाता हो । हम कब से पुराने उसूलों को छोड़ चुके हैं और अब सिर्फ आडंबर करते हैं महान आदर्शवादी बातों को भाषण में बोल कर रत्ती भर संकोच नहीं होता है । दुष्यंत कुमार के शब्दों में इस सिरे से उस सिरे तक सब शरीके जुर्म हैं , आदमी या तो ज़मानत पर रिहा है या फरार ।   अब किसी को भी नज़र आती नहीं कोई दरार , भ्र्ष्टाचार की महिमा है अपार । 

         साबिर दत्त जी की ग़ज़ल से शुरू करते हैं : - 

 
सच्ची बात कही थी मैंने , लोगों ने सूली पे चढ़ाया 
मुझको ज़हर का जाम पिलाया , फिर भी उनको चैन ना आया 
सच्ची बात कही थी मैंने , सच्ची बात कही थी मैंने ।
 
ले के जहाँ भी वक़्त गया है , ज़ुल्म मिला है ज़ुल्म सहा है 
सच का ये इनाम मिला है , सच्ची बात कही थी मैंने । 
 
सब से बेहतर कभी ना बनना , जग के रहबर कभी ना बनना 
पीर पयम्बर कभी ना बनना , सच्ची बात कही थी मैंने । 
 
चुप रह कर ही वक़्त गुज़ारो , सच कहने पे जाँ मत वारो 
कुछ तो सीखो मुझसे यारो , सच्ची बात कही थी मैंने ।   
 
अब कोई भी कुर्बान नहीं होता है सच पर , सब झूठ बोलकर  अपनी ज़िंदगी को शानदार बनाते हैं , भ्र्ष्टाचार की बहती गंगा में डुबकी लगाते हैं खुद भी खाते हैं ऊपर से नीचे तक मिल बांटकर खाते हैं । इतना बढ़ गया है सरकारी विभागों में लूट का बाज़ार कि होने लगी है रिश्वत पर आर या पार , ख़ुदकुशी करने का पढ़ लिया समाचार । खुद सत्ताधारी राजनेता ने ये बताया है कि पुलिस विभाग में बड़े अधिकारी से छोटे अधिकारी तक ख़ुदकुशी करने का कारण भ्रष्टाचार है । जानते हैं अब मुख्यमंत्री कोई और है लेकिन खुद उनकी दल की सरकार है जिस में भ्र्ष्टाचार अब अपराध नहीं शिष्टाचार है ।  खुद सरकार के मुखिया जिस शहर में जाते हैं लोग उनको मिलते हैं बताते हैं जिस झील बनाने पर करोड़ों रूपये खर्च हुआ उसकी हालत देख सकते हैं जांच करने को अधिकारी आते हैं सच और झूठ आमने सामने टकराते हैं । ये सिर्फ इक मिसाल है वास्विकता तो ये है कि हर योजना इक गोलमाल है सत्ताधारी नेता से तमाम विभाग वाले होते जाते मालामाल हैं देश की मत पूछो खज़ाना लुट चुका हुआ कंगाल है । 
 
अब कोई भी सच्चाई की ईमानदारी की बात नहीं करता है , सच की खातिर कोई नहीं मरता है । हमारे देश में धर्म का शोर बहुत है सभी शासक प्रशासक मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा गिरजाघर जाते हैं मगर जनता को छलते हैं झूठ बोलने से नहीं कतराते हैं किसी भगवान से बिल्कुल नहीं डरते मनमानी करते हैं मौज मनाते हैं । बड़े बड़े पदों से संवैधानिक संस्थाओं पर नियुक्त अफ़्सर शासक राजनेता के पांव दबाते हैं हाथ जोड़ सर को झुका जो हुक्म मेरे आका कहकर उनकी खातिर आसान राहें बनाकर बदले में मनचाहा आशिर्वाद पाते हैं । कभी बाद में वही अधिकारी खुद कितने जूते किस राजनेता से खाये थे गिनती तक बताते हैं । साधरण लोग जिन बड़े अधिकारियों से बात करते घबराते हैं बिना कोई अपराध उनसे डांट से लाठी डंडे तक खाते हैं वो अधिकारी अपनी गरिमा को शासक के दरबार में खो बैठते हैं ख़ामोश रहकर उनका हौंसला बढ़ाते हैं ।  शासक दल में शामिल संगीन अपराध में आरोपी मंत्री बनकर ग्रह मंत्रालय पाकर कानून को अपना रखवाला बनाते हैं । 
 
लोग भी भूल चुके हैं वो बस इक घटना ही थी जब इक बड़े अधिकारी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री जी को इक गोपनीय पत्र लिख कर भ्र्ष्टाचार को उजागर किया है और 27 नवंबर 2003 को बिहार में क़त्ल कर दिया गया था अपने तीस साल की उम्र में जन्म दिन पर 27 नवंबर 1973 के दिन । अब शायद कोई कल्पना भी नहीं कर सकता कि देश में कोई अधिकारी या कोई राजनेता वास्तव में भ्र्ष्टाचार रुपी दैत्य का अंत करने भी चाहता है । अब तो सभी की रगों में यही बहता है कोई गुरु नानक नहीं है जो उनकी लूट की कमाई दौलत की रोटी को निचोड़ सके जिस में करोड़ों गरीबों का लहू बहता है । नेक कमाई मेहनत की हक की कमाई नहीं चाहता कोई भी सभी को पैसा चाहिए ऐशो आराम चाहिए मगर बिना किसी काम चाहिए । देश में लोग डरे सहमे हैं सच बोलने का अर्थ ज़िंदगी से हाथ धोना है सत्ताधारी राजनेताओं प्रशासन और धनवान लोगों के लिए लोकतंत्र इक खिलौना है , जनता को रोते रोते हंसना हैं या फिर झूठी नकली हंसी हंसते हंसते रोना है ।  लेकिन ऐसा नहीं है कि भ्र्ष्टाचार की चर्चा ही नहीं होती है सभी विभाग कभी कभी किसी दिन शपथ उठाते हैं लेकिन किस की कसम कौन जाने याद नहीं रखते भूल जाते हैं । अंत में इक ग़ज़ल पुरानी है मेरी  किताब      ' फ़लसफ़ा - ए - ज़िंदगी ' में शामिल है पढ़ते हैं । 
 
 

बहस भ्र्ष्टाचार पर वो कर रहे थे ( ग़ज़ल ) 

डॉ लोक सेतिया "तनहा" 

 

बहस भ्रष्टाचार पर वो कर रहे थे
जो दयानतदार थे वो डर रहे थे ।

बाढ़ पर काबू पे थी अब वारताएं
डूब कर जब लोग उस में मर रहे थे ।

पी रहे हैं अब ज़रा थक कर जो दिन भर
मय पे पाबंदी की बातें कर रहे थे ।

खुद ही बन बैठे वो अपने जांचकर्ता
रिश्वतें लेकर जो जेबें भर रहे थे ।

वो सभाएं शोक की करते हैं ,जो कल
कातिलों से मिल के साज़िश कर रहे थे ।

भाईचारे का मिला इनाम उनको
बीज नफरत के जो रोपित कर रहे थे ।  
 

 
 
 

नवंबर 23, 2025

POST : 2040 हम लेखक कुछ नहीं करते ( विचार - विमर्श ) डॉ लोक सेतिया

    हम लेखक कुछ नहीं करते ( विचार - विमर्श ) डॉ लोक सेतिया 

दुनिया करे सवाल तो हम क्या जवाब दें , पूछते हैं करते क्यां है जनाब , बताते हैं कि साहित्य सृजन करते हैं तो कहते हैं ये तो आपका शौक है , लिखने को क्या है हम भी लिख सकते हैं , क्या करें इतने काम हैं कि फुर्सत ही नहीं मिलती । ऐसा हमेशा हुआ है समझते हैं कि कलम उठाई जो मन चाहा लिख दिया , कौन समझाए कि साहित्य ऐसा नहीं होता है जब तक आप आपने खुद से बाहर निकल समाज के दुःख सुःख परेशानियों से चिंतित हो कर वास्तविक संवेदनाओं को नहीं महसूस करते लिखना नहीं आता है । अधिकांश सोशल मीडिया पर ऐसा ही निर्रथक लिखा जाता है जिसका कोई प्रभाव समाज पर नहीं पड़ता है , सिर्फ़ नाम पहचान की खातिर लिखने को लिखना नहीं कहा जाता है । अधिकांश नहीं तमाम लोग समझते हैं जिस कार्य से अच्छी आमदनी नहीं हो उसको करना किस काम का और समझते हैं की हम लेखक कुछ भी नहीं करते हैं । यकीन करना ये कुछ भी नहीं करने जैसा काम बड़ा कठिन है लेकिन महत्वपूर्ण है , अगर धन दौलत की चाहत में दुनिया की इस अंधी दौड़ में शामिल होकर लोग लिखना छोड़ देते तो आज हमको कोई महान साहित्य कितने ग्रंथ कितनी कथाएं कितनी कहानियां कितनी शानदार रचनाएं पढ़ने को नहीं मिलती जो हमको मानवीयता का अर्थ समझाती हैं । साहित्य भविष्य की पीढ़ी के लिए लिखा जाता है जैसे कोई मशाल जलाई जाती है किसी घने अंधकार भरे सुनसान रास्ते में मुसाफ़िर को राह दिखलाने के लिए । वास्तविक लेखन आसान नहीं बेहद दुश्वार है कदम कदम डगर डगर लांघनी पड़ती कंटीली दीवार है । जर्जर नैया है टूटी हुई पतवार है कितने तूफ़ान हैं भंवर हैं बीच मझधार मांझी लाचार है लेकिन जाना उस पार है जिसका कोई पता ठिकाना नहीं सपनों का संसार है । 
 
लिखने वालों की खुद अपनी नई राह बनानी पड़ती है पुरानी सड़कों से उनका सफ़र नहीं चलता है , सबसे अलग अपनी मंज़िल की तलाश करते हैं । कोई साथी कोई कारवां नहीं हौंसलों से चलना है जीवन भर कहीं भी कोई ठहराव नहीं आना चाहिए साहित्य लेखन इक बहता दरिया है जिस को कभी किसी समंदर में नहीं मिलना अन्यथा अपना अस्तित्व ही मिट जाता है । मैंने जब से अपना डॉक्टर होने का रोगियों का उपचार करने का कार्य छोड़ दिया है जिस से कुछ आय हुआ करती थी 45 साल तक किसी तपस्या की तरह ही अपना कार्य किया है अब पूरा ध्यान लेखन कार्य पर है जिस से कुछ नाम दौलत मिलने की कोई चाहत भी नहीं है न ही चालीस साल लिखने के बाद कुछ मिला है सिवा आत्मसंतुष्टि के । कभी कभी लगता है लोगों को ये भी स्वीकार नहीं है कि कोई अपनी ख़ुशी से सामाजिक सरोकारों और समस्याओं पर समाज को जगाने की कोशिश भी करे । नासमझ समझते हैं तो भी कोई बात नहीं लेकिन जिनको उद्देश्य नहीं मालूम वो जब कहते हैं कि आप कुछ नहीं करते इसलिए ये कार्य करते हैं जबकि ऐसे लोग खुद कुछ भी किसी के लिए नहीं कर सकते जो भी करना है खुद अपनी ख़ातिर ही करते हैं । हमको जिस से कुछ भी भौतिक हासिल नहीं होता मानसिक सुःख और इक सुकून महसूस होता है , उस से बढ़कर भला क्या हो सकता है , कुछ भी और करते तो जितना भी कुछ मिलता कितना स्थाई होता , जबकि हमारा लेखन जो जैसा भी है दीर्घकालीन पूंजी की तरह है जिसे हमारे बाद भी दुनिया को पढ़ने को मिलेगा कुछ सार्थकता अवश्य है इस की , भले हम नहीं जानते कोई भी नहीं समझता आज तब भी । कुछ लोग महल सड़कें कितना कुछ निर्माण करते हैं लेकिन कुछ और लोग उन सभी को निर्माण करने को नक़्शा बनाते हैं योजना बनाते हैं , लेखक भी ऐसा ही करते हैं उनको इक खूबसूरत दुनिया की चाहत है परिकल्पना है उनकी और उसी को लेकर सतत प्रयास करते हैं । कुछ नहीं करते समझते हैं दुनिया वाले जबकि जो कर रहे हैं करना चाहते हैं वो अनमोल है , कोई उसकी कीमत नहीं लगा सकता है ।   
 
  
 

                              मुझे लिखना है  ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

 
कोई नहीं पास तो क्या
बाकी नहीं आस तो क्या ।

टूटा हर सपना तो क्या
कोई नहीं अपना तो क्या ।

धुंधली है तस्वीर तो क्या
रूठी है तकदीर तो क्या ।

छूट गये हैं मेले तो क्या
हम रह गये अकेले तो क्या ।

बिखरा हर अरमान तो क्या
नहीं मिला भगवान तो क्या ।

ऊँची हर इक दीवार तो क्या
नहीं किसी को प्यार तो क्या ।

हैं कठिन राहें तो क्या
दर्द भरी हैं आहें तो क्या ।

सीखा नहीं कारोबार तो क्या
दुनिया है इक बाज़ार तो क्या ।

जीवन इक संग्राम तो क्या
नहीं पल भर आराम तो क्या ।

मैं लिखूंगा नयी इक कविता
प्यार की  और विश्वास की ।

लिखनी है  कहानी मुझको
दोस्ती की और अपनेपन की ।

अब मुझे है जाना वहां
सब कुछ मिल सके जहां ।

बस खुशियाँ ही खुशियाँ हों 
खिलखिलाती मुस्कानें हों ।

फूल ही फूल खिले हों
हों हर तरफ बहारें ही बहारें ।

वो सब खुद लिखना है मुझे
नहीं लिखा जो मेरे नसीब में । 
 
 
 
 
  Do Not Think - Hindi Status : The Best Place For Hindi Quotes and status

नवंबर 10, 2025

POST : 2038 अनजान राहों का मुसाफ़िर ( दरअसल ) डॉ लोक सेतिया

    अनजान राहों का मुसाफ़िर ( दरअसल ) डॉ लोक सेतिया   

 मुसाफ़िर को मालूम ही नहीं सफ़र कब शुरू हुआ और कब इसका अंत होगा , चलना है रुकना नहीं बहते दरिया की तरह उसको । हमसफ़र न सही कोई हमराही तो मिलता थोड़ी दूर तलक ही सही साथ चलते मगर ऐसा भी मुमकिन नहीं हो पाया कठिनाई में सभी दामन छुड़ाते रहे । जाने कितनी बार किसी न किसी से जान पहचान हुई रास्ते में इधर उधर की कई बातें जिनको मुलाकातें कहना कठिन है यूं ही साथ चलना ख़ामोशी को तोड़ने की तरह से , जैसे कोई मौसम की बात करता है । हमेशा सभी जब तक ज़रूरी लगता साथी बनकर चलते जब मनचाहा बीच राह में रास्ता ही नहीं इरादा भी बदल लेते मौसम बदलता लोग बदल जाते । कुछ लोग वापस ही लौट जाते थक कर अलविदा कहना कभी फिर किसी अगले मोड़ पर मिलना बार बार बिछुड़ना अजीब रिश्ता बना लेते थे । संबंधों के कितने नाम लिखवाये लिख कर फिर मिटाये उनको सफ़रनामा में शामिल करने नहीं करने पर यकीन नहीं शंका या संदेह है कि कोई ख़्वाब था कि हक़ीक़त थी । कहीं किसी मंज़िल की तलाश नहीं थी बस इक आरज़ू थी कुछ लोग अपने दोस्त या कुछ भी अन्य संबंध प्यार का अपनत्व का बनाना और हमेशा साथ साथ रहना वो भी किसी अनुबंध किसी विवशता में नहीं  खुद अपनी ख़ुशी से , कहीं कोई आशियाना बनाकर ज़िंदगी बसर करते मुहब्बत की दुनिया बसाकर । 
 
ज़िंदगी कुछ इस तरह बिताई है , भीड़ में मिली हमेशा तन्हाई है , कदम कदम ठोकर खाई है कैसे कहें कौन भला कौन बुरा है किस्मत ही अपनी हरजाई है । बहुत अजीब दौर है जाने भीतर मन में कितना शोर है सच कोई कहां समझता है हर किसी का जब ख़ुदग़र्ज़ी का नाता रिश्ता है । सभी औरों पर अधिकार जताते हैं खुद चाहते हैं पाना सब कुछ लौटाना पड़ता है बदले में अवसर आने पर आंख चुराते हैं । दुनिया हमको नहीं रास आई है ज़िंदगी खुद अपनी नहीं पराई है हमको सभी ने समझा नाकाबिल और नासमझ है ख़ामोशी अपनी किसी को नहीं समझ आई है । चाहत थी कोई मेरे जज़्बात मेरे एहसास को समझता मगर हर किसी ने भावुकता को मूर्खता समझा और मेरे स्वभाव का अनुचित लाभ उठाया ।  आखिर ये बात समझ आई है इस दुनिया की प्रीत झूठी है खुद ही साथ अपना निभाना है दिल ही अपना इक ठिकाना है । दिल को किसी तरह से समझाना है चार दिन जीने को इक बहाना है कौन जाने किस दिन ये सफ़र ख़त्म होना है अभी कितना ज़हर खाना है दर्द जैसे अपना ख़ज़ाना है ज़ख़्म को दुनिया से छुपाना है । साथ कुछ इस तरह निभाना है जैसे अपना है वो भी जो हमसे बेगाना है , रस्म है यही दुनियादारी को निभाना है ,  पिजंरे के पंछी का दर्द कौन समझता है खुद हो चुपके चुपके आंसू बहाना है । आखिर इक दिन छोड़ जाना है , मुझको याद है कितना अच्छा गीत है उसको समझना है , चल उड़ जा रे पंछी ।  
 
चल उड़ जा रे पंछी , कि अब ये देश हुआ बेगाना , 
चल उड़ जा रे पंछी ।  
 
ख़त्म हुए दिन उस डाली के जिस पर तेरा बसेरा था 
आज यहां और कल हो वहां ये जोगी वाला फेरा था 
ये तेरी जागीर नहीं थी , चार घड़ी का डेरा था 
सदा रहा है इस दुनिया में किस का आबो - दाना 
चल उड़ जा रे पंछी । 
 
तूने तिनका तिनका चुनकर नगरी एक बसाई 
बारिश में तेरी भीगी पांखें धूप में गर्मी आई 
ग़म न कर जो तेरी मेहनत तेरे काम न आई 
अच्छा है कुछ ले जाने से दे कर ही कुछ जाना 
चल उड़ जा रे पंछी । 
 
भूल जा अब वो मस्त हवा वो उड़ना डाली डाली 
जग की आंख का कांटा बन गई चाल तेरी मतवाली 
कौन भला उस बाग़ को पूछे हो न जिसका माली 
तेरी किस्मत में लिखा है जीते जी मर जाना 
चल उड़ जा रे पंछी । 
 
रोते हैं वो पंख पखेरू साथ तेरे जो खेले 
जिनके साथ लगाये तूने अरमानों के मेले 
भीगी अंखियों से ही उनकी आज दुआएं ले ले 
किसको पता अब इस नगरी में कब हो तेरा आना 
चल उड़ जा रे पंछी ।  
 
 
 
 On a Path Unknown – Poppy Walks the Dog …

नवंबर 02, 2025

POST : 2036 क्या मिला , क्या बनाया , होगा क्या ( सृष्टि रहस्य ) डॉ लोक सेतिया

क्या मिला ,  क्या बनाया , होगा क्या  ( सृष्टि रहस्य ) डॉ लोक सेतिया 

कुछ भी निर्धारित नहीं है कोई विधाता खुद अपनी बनाई रचना को बनाने के बाद उसका भविष्य निर्धारित नहीं करता है । जैसा हम लोग मानते हैं विश्वास करते हैं कि किसी ईश्वर की मर्ज़ी से सभी कुछ होता है सोचो अगर वैसा होता तो कोई अपनी बनाई दुनिया को बर्बादी की तरफ जाने देता । जैसा तमाम तरह के वैज्ञानिक जाने कितने शोध कर समझने का प्रयास भर करते हैं कि कैसा करने से क्या होना तय है लेकिन हज़ारों ढंग से प्रयोग करने के बावजूद भी कभी परिणाम वांछित नहीं प्राप्त होते हैं । तब उस को लेकर भी शोध कार्य किया जाता है कि क्यों जैसा अपेक्षित था नहीं हुआ और जो हुआ आखिर किस कारण हुआ । कुछ ऐसा ही हमारा भूतकाल वर्तमान काल और भविष्य को लेकर है जिस रहस्य को समझने की कोशिश ही शायद किसी ने की ही नहीं । हमको हैरानी होती है जिनको खिलता गुलशन मिलता है वो लोग गुलशन को खिलाने की नहीं उजाड़ने की बातें करते हैं इसलिए आने वाली पीढ़ियों को गुलशन नहीं बर्बादी मिलती है विरासत में । लेकिन हमने देखा नहीं भी तो पढ़ते सुनते हैं कि कितने ही महान लोगों ने अपने देश समाज को शानदार बनाने में अपनी ज़िंदगी समर्पित कर कितना अच्छा बदलाव किया अपनी मेहनत लगन और तमाम कठिनाईयों से लड़ते जूझते हुए । अगली पीढ़ी को विरासत में जो जैसा मिला उसका कर्तव्य था उसे और शानदार बनाने का लेकिन जब ऐसा नहीं कर किसी पीढ़ी ने मिली विरासत को सुरक्षित नहीं रख कर उसके साथ मनमर्ज़ी से छेड़खानी की अपने मतलब स्वार्थों को हासिल करने को तब विकास के नाम पर विनाश होता गया । 
 
आपको कोई धर्म कोई ज्योतिष विशेषज्ञ कभी नहीं बता सकता है क्या था पहले आज क्या है और भविष्य क्या होना है । क्योंकि खुद उन लोगों ने ही अपनी परंपराओं को सहेजा संभाला तक नहीं है । जिसको जो मिला सभी ने उसका दोहन किया है उसको फलने फूलने नहीं दिया ये बात सामने हैं ध्यान पूर्वक देखने से समझ सकते हैं । दुनिया सृष्टि किसी को पूर्वजों से मिली विरासत नहीं है , प्रकृति ने सभी कुछ सबको इक समान देने का कार्य किया है , हवा रौशनी अंधकार दिन रात बारिश आंधी बदलते मौसम किसी से कोई भेदभाव नहीं करते हैं । कुछ लोग शासक मालिक बन बैठे और उन्होंने अपने अपने स्वार्थों की खातिर कुछ ऐसे नियम कायदे बनाकर थोप कर विधाता समझने लगे अपने आप को । विधाता ईश्वर किसी से कुछ मांगता नहीं है जैसा धरती पर शासक बनकर अपनी सत्ता स्थापित करने वालों ने खुदगर्ज़ी का इक जाल बिछाया है ।लेकिन अगर आधुनिक ढंग से मौसम विज्ञान की तरह समझने की कोशिश करें तो हमको समझ आएगा कि हमारा भूतकाल वर्तमान और भविष्य इक कड़ी है जिसको जैसा सही गलत उपयोग किया जाता है वो उसी अनुरूप अच्छा या खराब बनता जाता है । कभी पुरातन काल में अधिकांश लोग सही राह पर चलने और कुछ आदर्शों मूल्यों का पालन करने वाले हुआ करते थे , उन्होंने समाज को अच्छा बनाने की कोशिश की हमेशा ही भविष्य को बेहतर सौंपने का प्रयास किया । 
 
अब लोग समाज और व्यवस्था इस कदर सड़ी गली बन चुकी है कि हर कोई जैसा चाहे सामाजिक माहौल को बिगाड़ने को तत्पर दिखाई देता है कोई समाज को अच्छा बनाने में कोई योगदान नहीं देना चाहता । ऐसा हमारी सभ्यता में कभी नहीं था कि जिसे भी अवसर मिले वही अपनी महत्वकांशा पूर्ण करने को अन्य सभी से भेदभाव कर अपने अधीन करने लगे । बड़े बड़े महान पुरुष महात्मा संत सन्यासी दार्शनिक समझाते रहे कि हमारे पास सभी की आवश्यकता को काफी है लेकिन किसी की हवस लोभ लालच पूरा करने को कदापि नहीं है । खेद है कुछ लोग धनवान शासक बनकर समाज को बनाने नहीं लूट कर अपनी हवस मिटाने को पागलपन की सीमा तक बेरहम और मतलबी बने हुए हैं । उनको शायद नहीं पता है कि जो पेड़ बबूल वाले वो बो रहे हैं भविष्य में उनके कांटों पर उन्हीं को चलना होगा , ज़रूरी नहीं किसी को जीवन काल में कर्मों का नतीजा मिल जाए लेकिन जिनकी खातिर ऐसे लोग समाज को बर्बादी की तरफ ले जा रहे हैं  वही भविष्य में दुःख परेशानी झेलेंगे । आपका लिखवाया झूठा इतिहास किसी काम का साबित नहीं होगा जब भविष्य आपकी कार्यशैली पर विचार विमर्श कर शोध कर आपको देश समाज ही नहीं सम्पूर्ण सृष्टि को तहस नहस करने का दोषी समझेगा । संक्षेप में तीन कालों का लेखा जोखा यही है भूतकाल से मिला वर्तमान का किया ही भविष्य का निर्माण करता है ।  
 
 भूतकाल सपना, भविष्यकाल कल्पना, किन्तु वर्तमान अपना है… - Shiv Amantran |  Brahma Kumaris

अक्टूबर 30, 2025

POST : 2035 दौड़ना भी साथ रहना भी ( समाजवाद ) डॉ लोक सेतिया

      दौड़ना भी साथ रहना भी ( समाजवाद ) डॉ लोक सेतिया  

एकता की खातिर दौड़ना अच्छा है , तभी जब सभी को बराबर समझ साथ लेकर कदम बढ़ाया जाये , लेकिन जब मकसद खुद आगे बढ़ना अन्य सभी को छोड़ कर पीछे का बन जाये तब , एकता नहीं संभव हो सकती है । लगता है जैसे भीड़ में भी सभी अलग अलग अकेले अकेले हैं । हमने साथ निभाना छोड़ दिया है हमको साथी भी चाहिए तो ऐसा जो हमको बढ़ने दे खुद पीछे पीछे चलकर , वास्तविकता यही है । कम से कम बड़े लोग  शासक वर्ग प्रशासन धनवान लोग कभी लगता नहीं अपने समान कदम से कदम मिलाकर सभी को चलने देना पसंद करते हैं । जब तक आदमी आदमी में इतना अधिक अंतर रहेगा कि कुछ लोग लाखों करोड़ों रूपये सिर्फ अपनी खातिर खर्च कर रहे हों जब अधिकांश को जीवन भर में लाख तो क्या हज़ार रूपये भी बुनियादी ज़रूरत को हासिल नहीं हों ऐसी भेदभाव पूर्ण व्यवस्था देश की बनाई गई है तब तक एकता कहने भर को दिखावा हो सकती है वास्तविक नहीं । लगता नहीं है कि जिन्होंने देश की धन संपदा का सबसे बड़ा हिस्सा किसी न किसी तरह अपने आधीन कर लिया है वो भूखे नंगे लोगों को अपने पैरों पर खड़े होना भी देंगे । सभी राजनैतिक दलों से कारोबार उद्योग व्यौपार करने वालों ने अपनी अधिक से अधिक हासिल कर एकत्र करने की हवस कर  मानवधर्म को भुला दिया है । अपने से छोटे की खातिर कुछ भी छोड़ना नहीं बल्कि जितना भी मुमकिन हो उनसे छीनना आदत बन गई जिसे उन्होंने अपना अधिकार मान लिया है । बीस तीस प्रतिशत ख़ास वर्ग में शामिल लोग कभी साधरण जनता को आत्मनिर्भर होने नहीं देना चाहते हैं । लोकतंत्र के नाम पर लूट का ऐसा वातावरण बना दिया गया है जिस में भले चंगे लोग लूले लंगड़े बना दिए गए हैं जिनको हर कदम बैसाखियों की ज़रूरत पड़ती है । सिर्फ सरकारी आयोजन के लिए ही सड़कों के गड्ढे नहीं भरे जाते सही मायने में साधरण इंसान के लिए इतनी कठिनाईयां इतने अवरोध ये सभी खड़े करते हैं कि लोग लड़खड़ाते नहीं औंधे मुंह गिरते हैं और ये बेरहम प्रणाली हंसती है कोई सहायता को नहीं हाथ बढ़ाता । आपको जो लोग कहने को समाजसेवा करने वाले दिखाई देते हैं उनकी भी बदले में कितनी महत्वकांक्षाएं स्वार्थ छिपे रहते हैं । दान धर्म समाजसेवा तक सभी कारोबार बन गए हैं और इतना ही नहीं सभी में होड़ लगी है खुद को महान कहलवाने की प्रचार प्रसार कर के । 
 
काश जितना पैसा हम तमाम ऐसे आयोजनों पर समारोहों पर बर्बाद करते रहते हैं उस का उपयोग वास्तव में जनता और सामाजिक कल्याण पर खर्च किया जाये बिना कोई शोर शराबा या शोहरत पाने की लालसा के तो कुछ बेहतर नतीजे मिल सकते हैं । जबकि यहां जितना ये सब बढ़ता गया है इंसान इंसान से उतना ही अलग होता गया है हर शख्स खुद को छोड़ समाज को लेकर सोचता समझता ही नहीं है । हमने हर समस्या को गंभीरता पूर्वक नहीं समझा और उसका हल ऐसे ही किसी दिन कुछ करने से मानते हैं कि कोई रस्म निभा दी है । आडंबर करना हमारी कार्यशैली बन गई है इसलिए हमने वास्तविक प्रयास करना छोड़ ही दिया है , एकता कायम रखने के लिए सभी को आपस में विश्वास और संवेदना से आपसी मतभेद भुलाकर दिल से अपनाना होगा । बीती बातों को भुलाना होगा और इक नई सुबह को लाना होगा कोई दीपक जलाना होगा ये गीत याद करना होगा गुनगुनाना होगा । नया ज़माना आएगा  : -  शायर आनंद बक्शी । 
 
कितने दिन आंखें तरसेंगी , कितने दिन यूं दिल तरसेंगे 
इक दिन तो बादल बरसेंगे , आय मेरे प्यासे दिल 
आज नहीं तो कल महकेगी , ख़्वाबों की महफ़िल 
नया ज़माना आएगा , नया ज़माना आएगा । 
 
सूने सूने से मुरझाये से हैं क्यूं , उम्मीदों के चेहरे 
कांटों के सर पे ही बांधे जाएंगे , फूलों के सेहरे 
नया ज़माना आएगा , नया ज़माना आएगा । 
 
ज़िंदगी पे सब का एक सा हक है , सब तसलीम करेंगे 
सारी खुशियां सरे दर्द बराबर , हम तकसीम करेंगे 
नया ज़माना आएगा , नया ज़माना आएगा ।  
 
 Join the Run for Unity: Celebrating Sardar Patel's 150th Birth Anniversary

अक्टूबर 20, 2025

POST : 2032 ख्वाबों ख्यालों की दुनिया ( जागते - सोते ) डॉ लोक सेतिया

       ख्वाबों ख्यालों की दुनिया ( जागते -  सोते  ) डॉ लोक सेतिया 

सपना ही था पिछली रात का अभी तक उलझन है कि उसका अर्थ क्या है , मैंने तो कभी तमाम अन्य लोगों की तरह चाहत नहीं की थी उसकी दुनिया में जाने की तो क्या कभी पास जाकर करीब से देखने की भी । मैंने तो हमेशा दूर से भी उस दुनिया को देखने से बचने की कोशिश की थी जिधर जिस रास्ते से जाना होता है उस राह की तरफ जाने से बचता ही रहा । उसको लेकर भव्यता और ऐसी तस्वीर सभी से सुनी समझी थी जिस का कोई ओर छोर मिलता ही नहीं कहां से शुरू कहां तक उसकी सीमा है कोई नहीं जान पाया हर कोई उलझकर रह गया । मुझे ऐसी दुनिया और दुनिया वालों को लेकर कोई कौतूहल मन में नहीं रहा कभी सोचा मेरे काम की नहीं ऐसी दुनिया जहां कोई बड़ा कोई छोटा कोई आम कोई ख़ास समझा जाता हो । फिर कैसे रात सपने में उस दुनिया में चला गया सामने ऊंची महल की दीवार की तरफ कोई प्रवेशद्वार ढूंढा नहीं और पीछे पहुंच कर हैरान था कच्ची मिट्टी की दीवार थी कोई सीढ़ी भी नहीं थी फिसलने का गिरने का डर था फिर भी जैसे कोई मुझे बुला रहा था चले आओ घबराओ मत । और मैं बिना किसी सहारे जाने कैसे उस ऊंचाई पर चढ़ता ही गया और ऊपर से भीतर नीचे उस दुनिया में पहुंच गया था , हवाओं में उड़ने जैसा प्रतीत हुआ था । लेकिन उस दुनिया को लेकर जैसा सोचा था उस के विपरीत घना अंधेरा छाया हुआ था कोई शोर शराबा नहीं आवाज़ नहीं ख़ामोशी छाई हुई थी । उस दुनिया के मालिक बनाने वाले को देखने की कोशिश की तो मिलते जुलते अनगिनत लोग नज़र आये लेकिन यकीन नहीं हुआ कोई सही में वह ही है । यही सोच कर ठहरा तो कुछ आहत सी सुनाई दी जैसे कोई पुकार रहा हो , जाकर देखा तो वह अकेला कुछ अजीब हालत में दिखाई दिया । महसूस हुआ यही है इस दुनिया को बनाने वाला इसका मालिक पर किसलिए ऐसा जैसे कोई अपने ही घर में अजनबी हो हमारी ही तरह से । बैठा था ज़मीन पर मैले कुचैले कपड़े पहने मैं भी वहीं बैठ गया बिना कुछ भी बोले , अभिवादन करना भी ज़रूरी नहीं लगा हम दोनों को शायद । 
 
ऐसा पहली बार हुआ जैसे कभी कोई दोस्त हुआ करता था जिस का साथ घंटों तक चुपचाप बैठे बीत जाता था बगैर कोई शब्द बोले ही कितनी बातें कह सुन लेते थे । कुछ वैसे ही मन में जो भी बात कोई सवाल आता अपने ही भीतर से जवाब मिल जाता , ऐसा वार्तालाप समझाना संभव नहीं है , फिर भी कोशिश करता हूं जो भी समझ आया मुझे उस ख़ामोशी में बैठे । जैसे उसको मालूम है मुझे क्या क्या पूछना है वह बताता ही गया मैं समझता भी रहा । उसने क्या क्या नहीं बनाया था कुछ इंसानों को भरोसा कर अपना उत्तराधिकारी घोषित कर सभी कुछ उन्हीं को सौंप कर बताया कि ये किसी किताब की तरह लिखा हुआ है क्या कर्तव्य है क्या कैसे करना है और दुनिया में सभी से प्यार कर बराबर बांटना है । शपथ उठाने जैसी बात कभी ज़रूरी ही लगी थी क्योंकि खुद अपने ही बनाये खिलौने जैसे लोग कभी बनाने वाले को ही अनावश्यक समझने लगेंगे ये भला कल्पना भी कैसे करता कोई भी बनाने वाला । लेकिन मुझे कहा गया आपको कुछ भी करने की ज़रूरत नहीं है हमने आप से सभी हासिल कर लिया है और आपकी दुनिया अब हमारी विरासत है उसको और भी समृद्ध कर आगे बढ़ाना हमारा धर्म है । मेरे कच्ची मिट्टी के बनाये घर को सुरक्षित रखने को ईंट पत्थर जाने क्या क्या लाकर पर्वत जैसी इक दीवार खड़ी कर सामने अपनी महलों जैसी दुनिया रंगीन और चमकदार निर्मित कर दुनिया को आधुनिक बनाने लग गए सभी । पहले कुछ साधु सन्यासी मुझे खोजते थे फिर कुछ जिज्ञासु मुझे समझने में जीवन व्यतीत किया करते थे आजकल मुझे चुनौती देने लगे हैं मगर मुझे खुद को प्रमाणित या साबित करने की आवश्यकता ही नहीं है । 
 
मुझे मालूम ही नहीं है कि मैं क्या कोई अपराधी हूं जिसे युगों युगों तक इक कैद में रहना है , कोई मुझसे मिलता नहीं मेरा हालचाल नहीं पूछता सभी जिनको मैंने बनाकर सर्वस्व सौंप दिया उसे अमानत नहीं बल्कि अपनी मलकियत समझ कर मनचाहे ढंग से उपयोग करने लगे हैं । मैंने उनसे उनकी बनाई दीवार के बाहर नहीं जाने और देखने का वादा किया था जिसे निभाते निभाते लगने लगा है जैसे मैं खुद ही अपनी पहचान खो बैठा हूं या भूल ही चुका हूं कि असली सिर्फ मैं ही हूं बाक़ी सभी इक दिन ख़त्म होने को ही बनाये हैं । हैरान होता हूं चार दिन की ज़िंदगी मिली है सभी को फिर भी सभी समझते हैं उनका कभी अंत नहीं होना है । देख रहें है कितने लोग आये जिये और अपनी ज़िंदगी बिताकर चले भी गए कहां किसी को नहीं मालूम फिर भी अपने अंजाम को लेकर कभी सोचते ही नहीं , आगाज़ भी याद नहीं है कि इतनी बड़ी कायनात जिस में कितने धरती अंबर से अंतरिक्ष तक सीमारहित सृष्टि में इक कतरा इक बूंद भी उनका अस्तित्व नहीं खुद को क्या क्या समझते हैं कहलाते हैं । शुरू में ही बता दिया था कि इक सपना देखा था लेकिन शायद अभी आधा ही देखा था कि नींद से जाग गया लेकिन ख़्वाब अभी तक ख्यालों में विचरण कर रहा है । कौन था किस का सपना था मुझे समझना है अभी ज़िंदगी छोटी है अर्थ गहरा है ।   
 
 Khayalon Ki Duniya | Hindi Poetry | By Vipin Baloni

अक्टूबर 15, 2025

POST : 2029 बहारें ख़ुदकुशी करने लगी ( दर्द - ए - गुल्सितां ) डॉ लोक सेतिया

  बहारें ख़ुदकुशी करने लगी ( दर्द - ए - गुल्सितां ) डॉ लोक सेतिया 

अब जो होने लगा है अनहोनी नहीं है सदियों की भूल की सज़ा है जिनको रखवाली करनी थी माली बन कर बगिया की वही खुद कंटीली झाड़ियां बन कर छलनी छलनी कर रहे हैं चमन में आने जाने वालों के दामन से उलझकर । तलवार बंदूक पिस्तौल समाज की सुरक्षा की बजाय सत्ता के मनमाने ढंग से आतंक और भय का वातावरण बनाने लग जाएं तो कभी न कभी शिकारी खुद शिकार होना अंजाम सामने है । अभी भी लगता नहीं है कि देश समाज की नींद खुले और समझने का प्रयास किया जाये कि हमने अपनी प्रशासनिक व्यवस्था को इस हद तक सड़ा गला बना दिया है कि इसको फिर से दोबारा पूर्णतया सही करना बेहद कठिन होगा या असंभव है तब तक जब तक शासक वर्ग खुद अपने पर अंकुश स्वीकार कर कायदे कानून पर चलना नहीं सीखते । जिस देश की सरकार खुद कानून को संविधान को नैतिकता के मूल्यों को आदर्शों को कुचलती रौंदती जाती है किसी आवारा सांढ की तरह खेत को उजड़ने जैसा आचरण करती है उस में खुद उसका ही अंग कोई विभाग ऐसे हालात में पहुंच गया है जहां हर शाख पर उल्लू बैठा है । दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल से समझते हैं । 
 
कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं , 
गाते गाते लोग चिल्लाने लगे हैं ।  
 
अब तो इस तालाब का पानी बदल दो 
ये कँवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं । 
 
वो सलीबों के करीब आए तो हमको 
कायदे- कानून समझाने लगे हैं । 
 
एक कब्रिस्तान में घर मिल रहा है 
जिसमें तहखानों से तहखाने लगे हैं । 
 
मछलियों में खलबली है , अब सफ़ीने
उस तरफ जाने से कतराने लगे हैं । 
 
मौलवी से डांट ख़ाकर अहले मक़तब 
फिर उसी आयत को दोहराने लगे हैं । 
 
अब नयी तहज़ीब के पेशे - नज़र हम 
आदमी को भून कर खाने लगे हैं ।   
 
लोग ज़िंदगी से ही नहीं दुनिया से कभी खुद अपने आप से तंग आकर ख़ुदकुशी करते रहते हैं , आजकल साधारण आदमी की ज़िंदगी की कोई कीमत है न बेमौत मरने की , ये खबरें अब सुर्खियां नहीं बनती हैं । हमने फ़िल्मी नायक का ऐसा रंग ढंग वास्तविक समाजिक माहौल में स्वीकार कर लिया है जिस में पुलिस की वर्दी पहन कर आपराधिक कृत्य करना सामान्य समझा जाता है । देश की सर्वोच्च अदालत जानते देखते कुछ भी कर नहीं सकती जब शासक राजनेता और प्रशासनिक गठबंधन खुद को कानून संविधान से बड़ा समझने लगे हैं । चाहे जैसे भी हुआ हो हमने अपराधी गुंडे बदमाशों को चुनकर संसद विधानसभाओं में भेजा है और हमेशा उनकी जयजयकार करते रहते हैं भले उनका आचरण जैसा भी हो । खोखले लोग शासक वर्ग से मिलने पर उनके साथ अपनी फोटो करवा समझते हैं कुछ शान बढ़ गई है जबकि वास्तव में उनका किरदार बौना लगता है जिस किसी को अपना आदर्श समझना चाटुकार लोग करते हैं । 
 
राजनीति की सौगत ने कार्यपालिका न्यायपालिका तक को लोहे की तरह जंग लगा इतना कमज़ोर कर दिया है कि पूरी व्यवस्था कभी चरमरा कर ढह सकती है । बाहरी चमक दमक से कुछ भी ठीक किया नहीं जा सकता है । हमने सपना देखा था गुलमोहर जैसे रंगीन पेड़ों की शीतल छांव देने वाले लोकतांत्रिक प्रणाली से उगाने का लेकिन कब कैसे कंटीले कैक्टस बबूल और ऐसी विषैली बेलें सभी तरफ बाग़ में फैलती गई हैं और लोग घायल होकर तड़पने लगे हैं । आखिर ये सभी कांटेदार पेड़ पौधे आपस में भी एक दूजे का अस्तित्व मिटाना चाहते हैं हर कोई सिर्फ अपना वर्चस्व स्थापित करने को व्याकुल है , सुलग रही है भीतर ही भीतर कोई चिंगारी जिसे बुझाया नहीं गया तो कुछ भी बचना मुश्किल होगा ।  
 
आज सवाल हमारे देश समाज की दिन पर दिन बिगड़ती दशा को सुधरने का है , कौन कौन दोषी है इस बहस में पड़ने से कुछ हासिल नहीं होगा । लेकिन अभी भी सचेत नहीं हुए तो भविष्य अंधकारमय होना लाज़मी है चलो मिलकर अपने खुद से पहले देश समाज के प्रति कर्तव्य को महत्व दे कर पूर्ण निष्ठा से जो भी खोया है उसको फिर से पाने का संकल्प लेते हैं , ये हमारा देश है और हमको ही इसको बेहतर बनाना है ।  
 


अक्टूबर 06, 2025

POST : 2027 लौटना गुज़रे हुए वक़्त में ( संस्मरण ) डॉ लोक सेतिया

          लौटना गुज़रे हुए वक़्त में ( संस्मरण ) डॉ लोक सेतिया 

 

अपनी इक ग़ज़ल से बात शुरू करने का मकसद है कितने लोग रह गए छूट गए पहले उनकी याद ज़रूरी है । 

         हर मोड़ पर लिखा था आगे नहीं है जाना ( ग़ज़ल ) 

            (  डॉ लोक सेतिया "तनहा" )   


हर मोड़ पर लिखा था आगे नहीं है जाना
कोई कभी हिदायत ये आज तक न माना ।

मझधार से बचाकर अब ले चलो किनारे
पतवार छूटती है तुम नाखुदा बचाना ।

कब मांगते हैं चांदी कब मांगते हैं सोना
रहने को झोंपड़ी हो दो वक़्त का हो खाना ।

अब वो ग़ज़ल सुनाओ जो दर्द सब भुला दे
खुशियाँ कहाँ मिलेंगी ये राज़ अब बताना ।

ये ज़िन्दगी से पूछा हम जा कहाँ रहे हैं
किस दिन कहीं बनेगा अपना भी आशियाना ।

मुश्किल कभी लगें जब ये ज़िन्दगी की राहें
मंज़िल को याद रखना मत राह भूल जाना ।

हर कारवां से कोई ये कह रहा है "तनहा"
पीछे जो रह गए हैं उनको था साथ लाना । 

     
( नाख़ुदा = नाविक ,  मांझी , केवट , कर्णधार )


 
आदमी की कुछ ऐसी ही फितरत है वर्तमान से नज़रें नहीं मिलाता भविष्य को लेकर आशंकित रहता है और हमेशा बीते हुए पलों को वापस बुलाना चाहता है ।  गीत याद आया है याद न जाये बीते दिनों की , जाके न आये जो दिन , दिल क्यूं बुलाये , उन्हें दिल क्यों बुलाये । दिन जो पखेरू होते पिंजरे में मैं रख लेता , पालता उनको जतन से  , मोती के दाने देता , सीने से रहता लगाये । दिल एक मंदिर फ़िल्म का ये गीत कॉलेज के समय कितनी बार गाया और सुना होगा । करीब महीने भर से अपने कॉलेज के एलुमनाई मीट का सभी ने बेसब्री से इंतज़ार किया शायद यही कारण रहा होगा वापस लौटने की दिलों की छुपी चाहत जिसे हक़ीक़त में सच करना संभव नहीं कुछ घंटे वर्तमान से चुराकर अतीत में जीने की आरज़ू दिल की । कभी सोचा है हम बचपन से युवा अवस्था से उम्र के साथ कितने मित्रता या अन्य संबंधों को अपनी तथाकथित व्यस्तताओं के कारण निभाना भूल जाते हैं , गांव शहर क्या सामने रहने वाले लोगों तक से मिलने बात करने की कोई कोशिश ही नहीं करते , कभी सोचते हैं पहल कोई और करे या फिर आजकल व्हाट्सएप्प संदेश ही काफी लगता है रिश्ते कायम रकने को । फिर भी ऐसे में हम सभी पचास साल से अधिक समय गुज़र जाने के बाद अपने कॉलेज की पुराने छात्रों की मिलन की बेला की सभा को लेकर कितने उत्सुक थे , कारण वही बीती हुई यादों को ताज़ा कर जीवन में नई ऊर्जा का संचार करना उन पलों में वापस लौटने की ख़्वाहिश । 
 
अब बात 4 अक्टूबर 2025 संजीवनी संगम - 2025 , बाबा मस्तनाथ आयुर्वेदिक कॉलेज अस्थल बाहर रोहतक में आयोजित कार्यक्रम की । जैसा सोचा था उस से भी बढ़कर शानदार आयोजन ही नहीं बल्कि उस से अधिक महत्वपूर्ण आयोजक मंडली के सभी सदस्यों के साथ संसथान और वहां शिक्षा प्राप्त कर रहे नवयुवकों युवतियों का आत्मीयता पूर्वक व्यवहार अभिभूत कर गया सभी को । भौतिकता की बात छोड़ भावनात्मक स्नेह का एहसास कोई कभी भूल नहीं सकता है वो भी ऐसे लोगों से जिनसे हमारी कोई जान पहचान ही नहीं थी शायद बाद में भी उनके चेहरे धुंधली याद में रह जाएंगे नाम नहीं मालूम हैं । आपने अपने घर परिवार समाज में कितने समारोह देखे होंगे लेकिन कभी ऐसा शायद अनुभव किया होगा जैसा उस दिन छह से आठ घंटों में सभी को अनुभव हुआ होगा । अपने कॉलेज की प्रगति शानदार प्रदर्शन से लेकर अपने सहपाठियों से मिलकर जो ख़ुशी मिली उनका वर्णन नहीं किया जा सकता , मंच आपका स्वागत कर रहा था आपको आमंत्रित कर आपकी उन्नति को जानकर गौरान्वित था । जिस तरह से हर महमान को अतिविशेष आदरणीय होने का आभास हुआ क्या कभी किसी अन्य जगह हुआ होगा , कभी नहीं । एक दिन साथ रहकर हमने कितनी भूली बिसरी बातों को ताज़ा किया क्या क्या नया जाना समझा जो ज़िंदगी में हासिल करना आसान नहीं होता है ।  
 
सब जानते हैं कि जब हम कॉलेज में पढ़ते थे शायद ही लगता होगा कि सभी कुछ शानदार है बल्कि सदा महसूस हुआ करता था काश कुछ अच्छा आधुनिक होता । लेकिन आज लगता है उस सादगीपूर्ण जीवन की खुशियां कितनी अनमोल थी जिनको फिर नहीं पाया जा सकता है , लगता है मन में इक अनुभूति रहती है कि हमने ही उस सवर्णिम काल को समझने में देरी कर दी ।  बड़ी देर बाद समझ आया कि वास्तविक ज़िंदगी की चाहत दोस्ती और निस्वार्थ प्यार संबंध से आपस में सहयोग त्याग की भावनाएं उस वक़्त के साथ जाने कहीं खो गई हैं । आपने कभी गांव का जीवन जिया है तो समझ आएगा सालों बाद अपने गांव जाने पर सभी कुछ बदला हुआ दिखाई देता है यहां तक कि रहने वाले लोग भी अलग होते हैं तब भी उन गलियों की उस धरती की कोई महक आपको महसूस होती है । कुछ आधुनिक नवीन निर्मित हुआ होता है तो कहीं कोई पुरानी ईमारत जर्जर नज़र आती है , आपको उसे देख कर उदास नहीं होना चाहिए बल्कि सोचना चाहिए कि ईंट पत्थर से बढ़कर हम सभी में जो भावनाएं थीं कैसे आज भी कायम हैं । दार्शनिकता की बात की जाये तो आपको दिखाई देता है इक दिन हमको भी मिट्टी में मिलना ही है । क्या आपको नहीं लगता कि उस जगह की मुहब्बत की अनुभूतियां अभी पहले सी ही हैं । आज इतना ही कुछ तस्वीरें देख सकते हैं , सबसे सुंदर छवि कॉलेज की शुरुआत की पहले बैच की छात्रा रही 1958 बैच की डॉ जयंत वीर कौर तनेजा जी की सभा में मंच पर उपस्थिति को कहना चाहता हूं ।