मार्च 08, 2026

POST : 2066 सबका नसीब बताते जानते नहीं खुद का हाल ( हास्य - कविता ) डॉ लोक सेतिया

   सबका नसीब बताते जानते नहीं खुद का हाल  ( हास्य - कविता )

                      डॉ लोक सेतिया 

 
पंडित जी से इक दिन पूछा बतलाओ कैसी है ग्रहचाल 
ख़ाली जेब रहना है कब तक होंगें सब लोग मालामाल  
 
नाम जानकर बोले मुझसे जैसे गुज़रे हैं पिछले सब साल 
जैसे भारत देश की हालत बिगड़ रही है साल दर साल 
 
लोक की लोकतंत्र की राशि इक है ग्रहों की उलटी चाल 
जनता का कसूर नहीं है डेमोक्रैसी का भाग्य ही बदहाल
 
भारत और भ्र्ष्टाचार दोनों का ही ग़ज़ब है अपना कमाल
कोई रहता है पात पात पर कोई रहता है हर डाल डाल 
 
बेचती हमेशा झूठे सपने राजनीति की सभी की टकसाल 
पंछी समझता है मिला है दाना नहीं समझता कैसा जाल 
  
मायाजाल में फंस कर लोग भूल गए सब अपनी सुर ताल
सय्याद दिलाता भरोसा रखता है वो सब का बड़ा ख़्याल  
 
पिंजरे के तोते की तरह बतलाते उनकी किस्मत का हाल
चुनाव नतीजे में मुमकिन ही नहीं पाती अपनी सकें निकाल 
 
राजनेताओं की प्रशासन की हमेशा होती तिरछी है हर चाल 
चाबुक है उनके हाथ में जब तक , बचाओ सब अपनी खाल 
 
सांसद विधायक सभी बिकते हैं राजधानी बन गई घुड़साल 
सर पर सबके लटक रही तलवार बचने को नहीं कोई ढाल  
 
कुछ हलवा पूरी छीन खाते सबको नहीं मिलती रोटी - दाल 
न्यायालय की बात मत पूछो निकलते हैं रोज़ बाल की खाल  
 
नचाती नाचती सत्ता की सुंदरी घने काले लम्बे जिसके बाल 
राजनीति की कालिख़ लगाई जाती तो बन जाती रंग गुलाल  
 
सितारे बदले खेल बदलेगा है काली पूरी उन की हुई है दाल  
कुंडली खुलने लगी है लोगों की किसका खून सफेद या लाल  
 
सांवली सलौनी सूरत पिया की सबको लुभाती थी बीते साल 
कोई रोग लगा है चेहरे की हवाईयां उड़ीं बिखरे बिखरे हैं बाल 
 
ख़ामोशी सी उन पर छाई है घर दफ़्तर सब की लगती हड़ताल
जन्मपत्रिका ग़ुम कौन चुरा गया तिजौरी से , होगी जांच पड़ताल   
 
 

 
 


 


     
 
 

मार्च 06, 2026

POST : 2065 ऐसी भी खताएं कर गए ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

    ऐसी भी खताएं कर गए ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा ' 

ऐसी भी खताएं कर गए  
हम जीने से पहले मर गए ।  
 
दुश्मनों के सितम सहते रहे 
देखा दोस्तों को तो डर गए ।
 
ढूंढते फिरे , यहां - वहां 
बुलाया उसने तो न उधर गए । 
  
पूछा जो हमसे हमारा पता 
जानते नहीं कह मुकर गए ।
 
लिखे थे ख़त हाले दिल के 
रह जेब में मगर गए ।   
 
बाद जाने के सोचा किए 
करना था क्या क्या कर गए । 
 
हम बढ़ा सके न कदम 
कुछ दूर से वो गुज़र गए ।  


 
( 16 मार्च 1996 डायरी से )  
 

 
 
 
 

POST : 2064 आधुनिक युग की कथा क्या है ( विमर्श ) डॉ लोक सेतिया

     आधुनिक युग की कथा क्या है ( विमर्श ) डॉ लोक सेतिया  

साहित्य भले अधिकांश लोग नहीं पढ़ते हैं लेकिन धार्मिक ग्रंथों की कथाओं कहानियों से सभी परिचित हैं ।जानकारी और समझना अलग बात है मगर सबसे विचित्रता यही है कि शायद ही कभी अधिकांश लोग अपने विवेक से अथवा अंतरात्मा से पूछते हैं कि आदर्शों नैतिकता के मूल्यों की कसौटी पर खुद कितने खरे कितने खोटे हैं । शायद जितना बड़ा समझते हैं अपने आप को उतने ही छोटे हैं कभी सोचा है हम क्या करते हैं गंभीर विषय पर हंसते हैं जिन बातों का कोई मतलब नहीं उनका रोना रोते हैं । जानता हूं आज कोई भी रामायण गीता महाभारत जैसे ग्रंथ की रचना करने की बात सोचता ही नहीं शायद किसी को ऐसी किताब का कोई महत्व ही नहीं महसूस होता है फिर भी सोचना अगर उन ग्रंथों की बातों पर गौर किया जाए तो हम सभी हमारा समाज कैसा है । पुरातन कथाओं को छोड़ अपने पुराने इतिहास को ही जानते समझते तो समझ पाते कि हम कितने बौने नकली किरदार वाले बनते जा रहे हैं । क्या हम किसी धर्मयुद्ध में शामिल हैं या नहीं हैं सिर्फ दर्शक हैं तमाशाई हैं , हम में साहस ही नहीं सही और गलत की पहचान परख करने का अर्थात हम कायर और विवेकहीन लोग हैं जो अपनी असलियत छिपाने को ढकने को कोई आवरण ओढ़े रहते हैं । दुनिया हमेशा उनको महत्व देती है जो अपने समय में इस तरफ या उस तरफ खड़े होते हैं जो कौरव और पांडव राम और रावण कृष्ण और कंस में किसका चयन करना है नहीं निर्णय कर पाए उनको कालखंड की बात लिखने वालों ने किसी कूड़ेदान में भी जगह नहीं दी उनका कोई वजूद कहीं नहीं दिखाई देता है ।
 
हमको सोचना चाहिए हम खुद भी और हमारी शासन वर्ग की व्यवस्था कैसी है , कोई अपना तौर तरीका है कोई रास्ता जो भले कितना कठिन हो उस पर चलना ही है अपनी विचारधारा से पीछे हटना स्वीकार नहीं है । अगर वही हमने खो दिया है तो हमारे पास बचा कुछ भी नहीं हैं , कभी उधर कभी इधर अवसरवादी बन कर अथवा कायरता को किसी तरह से कुछ और नाम देकर इतिहास से नज़रें चुराते हैं । कभी हमारे देश और समाज के कुछ नायक हुआ करते थे जिन्होंने हमेशा अपने स्वार्थों धन दौलत शोहरत ऐश आराम को छोड़ अपनी विवेकशीलता से सही और गलत को समझ कर खुद भी सही को चुना और सभी को सही दिशा दिखलाई थी । लेकिन आज कैसे लोग नायक कहलाने लगे हैं हम कैसे उनको महानायक बतलाने लगे हैं जो सत्ता ताकत नाम शोहरत धन दौलत की खातिर खुद अपनी कीमत लगवाने लगे हैं । बिकने वाले कभी ख़रीदरार नहीं हो सकते हैं कोई बचा है जो किसी कीमत पर किसी हालात में बिकता नहीं है ।  ये सभी विडंबनाएं हमारे सामने हैं हम देख कर देखना ही नहीं चाहते अपनी आंखें नहीं सोचने समझने की शक्ति को ही छोड़ दिया है आंखों वाले अंधे बन गए हैं ।   
 
बात सिर्फ हथियारों की जंग की नहीं है हमने आसानी से सभी हासिल करने की चाहत में जीवन की लड़ाई लड़ने से पहले समझौता कर हार मान ली है । सोचते ही नहीं हम कैसा समाज बन गए हैं जो भेड़चाल की तरह चलता जाता है बुद्धि का उपयोग करना भूल गए हैं । हमने जितने भी धार्मिक ग्रंथ पढ़े हैं उन सभी में दो पक्ष अच्छाई बुराई या कुछ भी अन्य कारण से आमने सामने खड़े थे लेकिन दोनों तरफ कुछ लोग साथ देने विरोध करने की खातिर खुद समझ से निर्णय लिया करते थे जीतना हारना महत्व नहीं रखता आपका कोई मकसद होना आवश्यक है । लेकिन आजकल हम सभी खुद को विशेष मानते हैं जबकि ऐसी कोई विशेषता हम में होती ही नहीं है । आधुनिक शिक्षा ने हमारे समाज को ज़िंदा समाज से किसी निर्जीव समाज में बदल दिया है जो मशीनी ढंग से रहता है आचरण करता है वास्तविक ज्ञान से हम ख़ाली हो गए हैं । कैसे विडंबना है कि हम अपनी पुरानी विरासत परंपराओं पर गर्व की बात करते हैं जबकि हमारी खुद की कोई भी गौरवशाली परंपरा या विरासत भविष्य को सौंपने को नहीं पास हमारे । शायद तभी कोई  चाह कर भी कुछ लिख नहीं सकता है जो वास्तविकता है उसको अनकहा छोड़ना बेहतर है ताकि आने वाली पीढ़ियां शर्मिंदा नहीं हों । 
 
अंत में मुझे इक लोककथा याद आती है , किसी नगर को शानदार बनाने को इक जादूगर अपने जादू से सभी इंसानों से जीव जंतुओं पेड़ पौधों को चमकीले लिबास से ढक देता है । ठीक जैसे हमने खुद को कितनी तरह के उजले कपड़ों कीमती ज़ेवर इत्यादि से सजाया हुआ है । भैतिक ही नहीं आध्यात्मिक तौर भी झूठी नकली चीज़ों से खुद को ढक लिया है जिस से दिखाई देता है शानदार है मगर भीतर धीरे धीरे खोखलापन बढ़ता गया है और उस जादूगर की दिखावे की दुनिया अचानक किसी जर्जर इमारत की तरह ध्वस्त हो जाने को अभिशप्त है । हमारी हर चीज़ काल्पनिक है वास्तविकता से हमारा देश समाज कोई मेल नहीं खाता है । संक्षेप में हमने पत्थरों को हासिल करने में अनमोल रत्नों को गंवा दिया है और हम धरती से आकाश छूने चांद पर जाने के नाम पर नीचे रसातल में पहुंच चुके हैं , अब पछताने से भी क्या हासिल होगा ।  
 

  

मार्च 05, 2026

POST : 2063 हमको वापस अभी तो जाना है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

  हमको वापस अभी तो जाना है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा ' 

 
हमको वापस अभी तो जाना है  
इक ठिकाना , कहीं बनाना है ।  
 
लोग कितना बदल गए देखो 
रोज़ , कोई , नया बहाना है । 
 
उम्र भर , कौन साथ देता है 
एक दिन सब ने छोड़ जाना है । 
 
था बुरा कौन कौन अच्छा था 
सिर्फ़ बीता हुआ ,  ज़माना है । 
 
हमको आवाज़ कौन अब देगा 
किसलिए अब हमें बुलाना है । 
 
मुझको इतना ज़रा बताओ तो 
याद रखना , किसे भुलाना है ।
 
चंद सांसें अभी बची ' तनहा '
धड़कता दिल ठहर ही जाना है ।  
 

 

मार्च 03, 2026

POST : 2062 हम जिएं कैसे , हम मरें कैसे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

 हम जिएं कैसे , हम मरें कैसे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा ' 

 
हम जिएं कैसे , हम मरें कैसे  
क्या करें और क्या करें कैसे ।
 
जिस्म घायल है रूह भी घायल 
ज़ख़्म ही ज़ख़्म हैं , भरें कैसे । 
 
वो जो झांसों में उनके आ जाएं 
उनसे दुश्मन भी फिर डरें कैसे । 
 
हम न तदबीर ही करें कोई 
दोष तक़्दीर पर धरें कैसे । 
 
दुश्मनी हम से है ज़माने को 
' तनहा ' उल्फ़त भी हम करें कैसे ।  
 
 

   

मार्च 01, 2026

POST : 2061 अशांति का नॉबेल पुरस्कार ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

       अशांति का नॉबेल पुरस्कार ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

 कभी ऐसा होता नहीं कि किसी अमीर को कोई प्रेमिका ठुकरा कर किसी और की बन जाए । उनको पूरा यकीन था नॉबेल पुरस्कार का सबसे सही दावेदार सिर्फ वही हैं । फ़िल्मी कहानियों की तरह जो कभी नहीं होता घट गया उनको मांगने पर कितनी कोशिशों से भी नहीं मिला किसी और को बिना प्रयास ही प्राप्त हो गया । आशिक़ी में आधुनिक प्रेमी आंसू नहीं बहाते बल्कि समझते हैं कि उसकी किस्मत ही खराब थी जो मेरी नहीं हुई किसी और की हो गई । लेकिन बाहर कुछ भी कहते रहें ताकतवर लोग अंदर से खुद को अपनानित समझते हैं और नतीजा इसकी सज़ा दुनिया भर को देते रहते हैं जीवन भर अभद्रता पूर्वक आचरण करते हैं । लेखक उनका दर्द समझते हैं और उनसे संवेदना जताते हैं दिलासा दिलाना चाहते हैं समझाते हैं कभी किसी को सभी कुछ नहीं मिलता है पर ऐसी बातों से तकलीफ़ घटती नहीं बढ़ती ही है ।  
 
आप इस की कल्पना नहीं कर सकते कि जब किसी ताकतवर धनवान बाहुबली को उसकी मनवांछित चीज़ नहीं देते हैं तो उसकी अनबुझी प्यास उसको क्या से क्या बना देती है । उनको शांति का नॉबल पुरस्कार न देना कितना बड़ा अपराध है आपको नहीं मालूम था तो अब समझ गए होंगे । अपना आपा खोकर उन्होंने किस किस को कितनी बार अपमानित नहीं किया , तब भी उनको चैन नहीं आया तो देख लो उन्होंने उस दिखावे वाले किरदार को छोड़ अपना असली किरदार दुनिया को दिखलाया है । जो उनकी नहीं मानता उस पर मनचाहा टैरिफ़ लगाया है , भले खुद उनकी अदालत ने इसको अनुचित बताया है लेकिन कौन बच सकता है उन्होंने इक ऐसा जाल बिछाया है । सभी ने कुछ न कुछ खोया है बस इक वही है जिस ने जो चाहा सभी कुछ पाया है । सब उसकी माया है दुनिया उसको ख़लनायक समझती है कुछ भी कहती रहे उसको तो ये कर के दिल को चैन आया है । यकीन मानिये कि अगर उनको नॉबल पुरस्कार दे दिया गया होता तो उनको कुछ भी ऐसा करने में संकोच होता और भले कोई भी कारण होते वो अपने शांति पुरस्कार की लाज रखने को भले और शरीफ़ किरदार को निभाने को विवश होते ही । दुनिया की यही आदत है गुण नहीं दिखाई देते अवगुण नज़र आते हैं तभी लोग तानाशाह अन्यायी अत्याचारी बन कर अपनी शान बढ़ाते हैं । 
 
आपने उनका दिल दुखाया है अपनी भूल समझ कर प्रायश्चित करने को कोई उपाय करना ज़रूरी है , आंधी चलने लगी है चिंगारी सुलग रही है शोला भड़कना ज़रूरी है । पानी की खातिर कोई बरसात करवानी होगी उनकी नॉबेल संग तस्वीर बनवानी होगी । ऐसी इक अनोखी नई परंपरा चलाओ आधुनिक युग में शांति की कोई कद्र नहीं अशांति सभी को भाती है इक अशांति का नॉबल पुरस्कार चलाओ जिसका नियम ऐसा बनाओ हाथ जोड़ नहीं मांगो , छीन कर ले जाओ । दुनिया बैठी है परमाणु बम पर आप छोड़ दो शांतिगीत गाना चलो मिसाईल फैंको मौत का खेल रचाओ सभी कहेंगे आप से हमको बचाओ , आप लाशों पर खड़े होकर खुद को महान बतलाओ , जिस को भी चाहो मौत के घाट पहुंचाकर उसको ज़ालिम घोषित कर उचित ठहराओ । लोग आजकल सभी जगह खलनायकों पर फ़िदा हैं कोई आधुनिक गीत लिखो उनकी महिमा का बखान कर पत्थर से हीरा बन कर अपनी कीमत ऊंची लगवाओ । पत्रकारिता से आगे बढ़ो चाटुकारिता की पढ़ाई पढ़कर जिसकी खाते हो उसकी हाज़िरी लगाओ , हरियाणा में कहावत है जिसकी खाई बाजरी उसकी लगाई हाज़िरी । बहती हुई गंगा में हाथ धोने से काम नहीं चलता खुद नंगे होकर उन संग नहाओ नाचो झूमों मौज मनाओ कौन देखता है सोच कर कभी मत शर्माओ ।    
 

 हां हां मैं खलनायक हूं ( हास्य - कविता ) 

 
शराफ़त की कदर नहीं सुन मेरे यार
छोड़ भलाई डराने लगे भर के हुंकार   
आपने किया था उन पर अत्याचार 
उनको मांगने पर भी दिया नहीं था 
बस इक शांति का नॉबल पुरस्कार । 
 
छोड़ो उसकी बात करना है बेकार  
अब तो समझो अगर हैं समझदार 
क्या होता है उसका कोई आधार 
शुरू करो ऐसा ही अशांति पुरस्कार 
साबित होंगे वही सबसे बड़े हक़दार ।
 
 Ashantee Medal 1873 - 74 clasp Coomassie