मेरे ब्लॉग पर मेरी ग़ज़ल कविताएं नज़्म पंजीकरण आधीन कॉपी राइट मेरे नाम सुरक्षित हैं बिना अनुमति उपयोग करना अनुचित व अपराध होगा । मैं डॉ लोक सेतिया लिखना मेरे लिए ईबादत की तरह है । ग़ज़ल मेरी चाहत है कविता नज़्म मेरे एहसास हैं। कहानियां ज़िंदगी का फ़लसफ़ा हैं । व्यंग्य रचनाएं सामाजिक सरोकार की ज़रूरत है । मेरे आलेख मेरे विचार मेरी पहचान हैं । साहित्य की सभी विधाएं मुझे पूर्ण करती हैं किसी भी एक विधा से मेरा परिचय पूरा नहीं हो सकता है । व्यंग्य और ग़ज़ल दोनों मेरा हिस्सा हैं ।
सितंबर 12, 2025
POST : 2014 राजनेता ( व्यंग्य - कविता ) डॉ लोक सेतिया
सितंबर 07, 2025
POST : 2010 अनकही बात ( नज़्म / कविता ) डॉ लोक सेतिया
अनकही बात ( नज़्म / कविता ) डॉ लोक सेतिया
अगस्त 17, 2025
POST : 1998 सब पराए हैं ज़िंदगी ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया
सब पराए हैं ज़िंदगी ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया
दिसंबर 18, 2024
POST : 1930 प्यार ख़ुशी सुंदरता ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया
प्यार ख़ुशी सुंदरता ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया
नवंबर 22, 2023
POST : 1749 ख़ामोश हो , उदास हो ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया
ख़ामोश हो , उदास हो ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया
नवंबर 02, 2023
POST : 1737 वो ज़माने आएंगे ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया
वो ज़माने आएंगे ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया
POST : 1736 हम बिक गये ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया
हम बिक गये ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया
अक्टूबर 31, 2023
POST : 1734 रुसवाई ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया
रुसवाई ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया
POST : 1733 सदाएं ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया
सदाएं ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया
अक्टूबर 30, 2023
POST : 1732 फिर से कोई मुलाक़ात तो हो ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया
फिर से कोई मुलाक़ात तो हो ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया
अक्टूबर 28, 2023
POST : 1729 आप की खातिर ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया
आप की खातिर ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया
अक्टूबर 26, 2023
POST : 1726 किया है ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया
किया है ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया
अप्रैल 18, 2023
POST : 1651 बेदिली से दुआ की है ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया
बेदिली से दुआ की है ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया
बेदिली से दुआ की है
तुमने भारी खता की है ।
मारकर यूं ज़मीर अपना
खुद से तुमने जफ़ा की है ।
बढ़ गया है मरज़ कुछ और
ये भी कैसी दवा की है ।
तुम सज़ा दो गुनाहों की
हमने ये इल्तिज़ा की है ।
बिक गये चन्द सिक्कों में
बात शर्मो-हया की है ।
POST : 1650 कहने को तो बयान लगते हैं ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया
कहने को तो बयान लगते हैं ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया
कहने को तो बयान लगते हैं
खाली लेकिन म्यान लगते हैं ।
वोट जिनको समझ रहे हैं आप
आदमी बेजुबान लगते हैं ।
हैं वो लाशें निगाह बानों की
आपको पायदान लगते हैं ।
ख़ुदकुशी करके जो शहीद हुए
देश के वो किसान लगते हैं ।
लोग आजिज़ हैं इस कदर लेकिन
बेखबर साहिबान लगते हैं ।
POST : 1649 जो भूला लोकतंत्र आचार ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया
जो भूला लोकतंत्र आचार ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया
जो भूला लोकतंत्र आचार
हुई सत्ता की जय जयकार ।
चुना था जिनको हमने , वही
बिके हैं आज सरे-बाज़ार ।
लुटा कर सब कुछ भी अपना
बचा ली है उसने सरकार ।
टांक तो रक्खे हैं लेबल
मूल्य सारे ही गए हैं हार ।
देखिए उनकी कटु-मुस्कान
नहीं लगते अच्छे आसार ।
सितंबर 12, 2022
POST : 1598 एहसासों के फूल ( पुस्तक समीक्षा ) समीक्षक : अमृत लाल मदान
एहसासों के फूल ( पुस्तक समीक्षा ) समीक्षक : अमृत लाल मदान
रचनाकार कवि : डॉ लोक सेतिया
मई 08, 2022
POST : 1576 वक़्त के हालात ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया
वक़्त के हालात ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया
दिसंबर 17, 2021
POST : 1562 किस को सुनाएं से सुन ज़माने तक ( कागज़ - कलम का सफर ) डॉ लोक सेतिया
किस को सुनाएं से सुन ज़माने तक
( कागज़ - कलम का सफर ) डॉ लोक सेतिया
दिसंबर 07, 2021
POST : 1559 तुम्हारे अश्क़ मोती हैं ( मेरा लेखन ) डॉ लोक सेतिया
तुम्हारे अश्क़ मोती हैं ( मेरा लेखन ) डॉ लोक सेतिया
मुझे चलना पसंद है ठहरना नहीं
जब भी मुझे निराशा और परेशानी ने घेरा तब मुझे इस से बाहर निकलने को संगीत और लेखन ने ही बचाया और मज़बूत होना सिखाया है। अपनी सभी समस्याओं परेशानियों का समाधान मुझे ग़ज़ल गीत किताब पढ़ने से हासिल हुआ है। इंसान हूं दुःख दर्द से घबराता भी रहा मगर जाने क्यों अपने ग़म भी मुझे अच्छे लगते रहे हैं ग़म से भागना नहीं चाहा ग़म से भी रिश्ता निभाया है। ग़म को मैंने दौलत समझ कर अपने पास छिपाकर रखा है हर किसी अपने ग़म बताये नहीं। इक कमज़ोरी है आंसू छलक आते हैं ज़रा सी बात पर हर जगह मुस्कुराना क्या ज़रूरी है कभी ऐसा हुआ कि हंसने की कोशिश में पलकें भीग जाती हैं। अपने आप को पहचानता हूं और अब तन्हाई अकेलापन मुझे अच्छा लगता है उन महफिलों से जिन में हर कोई अपने चेहरे पर सच्चाई भलेमानस की नकाब लगाए इस ताक में रहता है कि कब अवसर मिले और अपनी असलियत दिखला दे। ये दुनिया और उसकी रौनक मुझे अपनी नहीं लगती हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात मुझे बचपन से दोस्ती की चाहत रही है। बहुत दोस्त बनाए हैं साथ दोस्तों से कम रहा है बस इक सच्चे दोस्त की तलाश रही है जो मुझे समझता भी और जैसा हूं वैसा अपनाता भी शायद कहीं है कोई कभी मिलेगा भरोसा है या सपना हो सकता है। ज़िंदगी ने जितना दिया बहुत है।
फ़लसफ़ा - ए - ज़िंदगी ( अफ़साना बयां करती ग़ज़ल और नज़्म )
( सभी ग़ज़ल से प्यार करने वाले दोस्तों और साहित्य पढ़ने में रुचि रखने वाले बंधुओं को जानकार ख़ुशी होगी कि मेरी पहली पुस्तक ग़ज़ल एवं नज़्म की 151 रचनाओं की आपको पढ़ने को उपलब्ध करवा दी जाएगी।
किताब की सिमित प्रतियां लागत मूल्य पर भेजी जा सकती हैं अथवा प्रकाशक से खरीद सकते है।
फोन - 9992040688
पर मुझसे बात कर मंगवा सकते हैं।
विश्वास है आपको पसंद आएंगी मेरी चुनिंदा रचनाएं शामिल हैं।
डॉ लोक सेतिया। )

















