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सितंबर 12, 2025

POST : 2014 राजनेता ( व्यंग्य - कविता ) डॉ लोक सेतिया

          राजनेता (  व्यंग्य -  कविता  ) डॉ लोक सेतिया 

दफ़्न रूह की आवाज़ कर गया 
जी रहा मगर इक शख़्स मर गया ।  
 
ऐतबार उसका ,  क्या करें भला 
और कुछ कहा , कुछ और कर गया ।  
 
मांगता सदा , ख़ैरात वोट की 
जीत कर न जाने फिर किधर गया ।  
 
रहनुमा बनाकर भूल हमने की 
देश लूटकर घर बार भर गया । 
 
क्या नशा चढ़ा सत्ता जो मिल गई 
ज़ुल्म की हदों से , है गुज़र गया । 
 
बेचने लगा अपना इमान तक 
देख कर उसे शैतान डर गया । 
 
मैं ग़ुलाम हूं  , सरकार आप हैं 
कह के बात ' तनहा ' ख़ुद मुकर गया ।  
 

 
  

सितंबर 07, 2025

POST : 2010 अनकही बात ( नज़्म / कविता ) डॉ लोक सेतिया

        अनकही बात ( नज़्म / कविता ) डॉ लोक सेतिया  

वो उठ कर जाने लगे , तो ये ख़्याल आया कि 
रह गई हमारी हर बात , अभी आधी - अधूरी है  
 
दिल ही दिल उनको मान लिया हमराही मगर 
तय करनी अभी सफ़र की कितनी लंबी दूरी है 
 
फ़ासले चंद कदमों के नज़र आते लेकिन अभी
बीच में गहरी खाई जैसी कितनी इक मज़बूरी है
 
खेल तकदीर का है मिल कर बिछुड़ना होता है 
फिर मिलना है पर अभी जुदा होना भी ज़रूरी है । 
 
शायद किसी दूसरे जहां में मुलाक़ात होगी अपनी  
अनकही रह गई आधी जो अब करनी वहां पूरी है । 
 

    

अगस्त 17, 2025

POST : 1998 सब पराए हैं ज़िंदगी ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

 सब पराए हैं ज़िंदगी ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 


सब पराए हैं ज़िंदगी , 
देख आए हैं ज़िंदगी । 
 
बिन बुलाए ही आ गए , 
चोट खाए हैं ज़िंदगी । 
 
हम खिज़ाओं के दौर में , 
फूल लाए हैं ज़िंदगी । 
 
कौन दुश्मन है दोस्त भी , 
आज़माए हैं ज़िंदगी । 
 
छा रही हर तरफ ख़िज़ा , 
गुल खिलाए हैं ज़िंदगी । 
 
छोड़ सारा जहान घर , 
लौट आए हैं ज़िंदगी । 
 
दर्द के गीत शाम - सुब्ह , 
गुनगुनाए     हैं ज़िंदगी । 
 

 
 
 

दिसंबर 18, 2024

POST : 1930 प्यार ख़ुशी सुंदरता ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

          प्यार ख़ुशी सुंदरता ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया  

सार्वजनिक जगह पर मिल बैठे 
इधर उधर की तमाम बातों से 
दिल को सभी ने ऐसे बहलाया 
चर्चा कर रहे थे कुछ लोग यही
अजनबी लगते जाने पहचाने से
क्या खोया सबने क्या कुछ पाया 
निष्कर्ष क्या कोई नहीं जानता
मिलकर सभी ने शायद था बस
फुर्सत से कुछ वक़्त यूं बिताया
समय बड़ा अनमोल नहीं समझा
निरर्थक ही समय अपना गंवाया । 
 
किसी ने अपनी प्रिय पत्नी संग 
प्यार भरा मधुर गीत नाचते हुए 
सोशल मीडिया पर वीडियो बना 
यादगार मधुर एहसास था जगाया 
प्यार सुंदरता क्या होती हमको 
राज़ कभी भी समझ नहीं आया 
दिल की बात दिल कहता है पर 
ज़माने को किसलिए दिखलाया 
बड़ी निराली जगत की रीत देखी 
कौन अपना है कौन हुआ पराया ।
 
खुश हैं हम कितने खुशनसीब हैं हम
बाहर इक आवरण लगाकर रोज़ ही 
अपने भीतर सच को कितना छुपाया
होंठों पर हंसी मगर आंखों में दर्द था 
ज़िंदगी तुमने कितना हमको रुलाया 
रूह बेचैन है तड़पती कितना लेकिन 
खूब बनावट कर सजाई हमने काया 
सभी को मालूम क्या है जीवन- सार
चेहरे को छुपा मुखौटा लगाए हैं हम 
अजब ज़माना आजकल नया आया । 
   
 


नवंबर 22, 2023

POST : 1749 ख़ामोश हो , उदास हो ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

        ख़ामोश हो , उदास हो ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 

 
कुछ दूर हो कुछ पास हो 
कैसा हसीं अहसास हो ।  
 
 
हम को ख़िज़ा का डर नहीं 
जब प्यार का मधुमास हो । 
 
 
हम अब अकेले हैं तो क्या 
इक दिन है मिलना आस हो । 
 
 
तुमको बताएं किस तरह 
तुम कौन हो क्यों ख़ास हो । 
 
 
पहला था जो अंतिम भी है 
हर पल वही आभास हो । 
 
 

 
 
 

नवंबर 02, 2023

POST : 1737 वो ज़माने आएंगे ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

         वो ज़माने आएंगे ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

यूं ही हम दिल बहलाएंगे  
फिर से वो ज़माने आएंगे । 
 
जब हाल कोई पूछेगा तो 
ख़ुद ज़ख़्म सभी भर जाएंगे । 
 
वो बिछुड़े तो दिल पर क्या गुज़री 
मिलने पर उनको बताएंगे । 
 
इन टूटी-सी उम्मीदों से 
खुद को ही हम समझाएंगे । 
 
अब तो जीना है यूं ही हमें 
बस घुट-घुट कर मर जाएंगे । 
 
         
 

 

POST : 1736 हम बिक गये ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

              हम बिक गये ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया  

दिल के हाथों सरे - आम हम बिक गये 
इस मुहब्बत में , बेदाम हम बिक गये । 
 
भूल से आ गए , मयकदे में कभी 
पी के हाथों तिरे , जाम , हम बिक गये ।
 
आये बन कर , ख़रीदार बाज़ार में 
और ले कर तिरा नाम हम बिक गये । 
 
तेरे ज़ुल्मों - सितम को भी , मेरे सनम 
जान कर तेरा इनाम , हम बिक गये ।
 
आप अपना जनाज़ा उठाये हुए 
हो के मज़बूर हर शाम हम बिक गये । 
 
कुछ नहीं मोल , बाज़ार में आपका 
जब लगाया ये इल्ज़ाम हम बिक गये । 
 
सब ही ' तनहा ' पशेमान रहने लगे 
उनको मिल जाये आराम हम बिक गये ।   

      
 


 
 

अक्टूबर 31, 2023

POST : 1734 रुसवाई ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

                रुसवाई ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया  

न बार बार आज़माया करो 
यूं ही न दिल को जलाया करो । 
 
वो न बदलेंगे कभी 
न ये उम्मीद लगाया करो । 
 
जहां होती हो रुसवाई 
न उस गली में जाया करो । 
 
मिले जो चुरा के नज़र 
उसे न कुछ समझाया करो । 
 
झूठ के चाहने वालों को 
सच न कोई बताया करो । 
 
फ़रेब हर बात में है 
इन बातों में न आया करो । 
 
कभी जो प्यार से नहीं मिलता 
न उसे घर बुलाया करो । 
 
      
 

 

POST : 1733 सदाएं ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

                    सदाएं ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया  

ग़ैरों को हम अपना कहते हैं 
हमसे अपने ही खफ़ा रहते हैं । 
 
यहां कोई किसी का नहीं 
तेरे शहर में लोग कहते हैं । 
 
तूफ़ां उठता है कोई दिल में 
जब भी उनके अश्क़ बहते हैं ।
 
हक़ उन्हीं का है इस पे 
मुहब्बत के जो दर्द सहते हैं । 
 
कहीं न जा सकेंगे अब 
वो इस दिल में रहते हैं । 
 
आसमां के सितारे भला 
कब ज़मीं पे रहते हैं । 
 
                                ( 21 मार्च 1996 )  
 

 

अक्टूबर 30, 2023

POST : 1732 फिर से कोई मुलाक़ात तो हो ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

          फिर से कोई मुलाक़ात तो हो  ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया  

फिर से कोई मुलाक़ात तो हो 
ख़ामोशी में भी कुछ बात तो हो । 
 
बिजलियां हैं , घटाएं भी काली   
ख़ूब जम कर के बरसात तो हो । 
 
हिज्र की रात , होती है लंबी  
अब कभी चांदनी  रात तो हो । 
 
बात मौसम की हो अजनबी से 
फिर नई इक शुरुआत तो हो ।
 
कल सुबह बात कुछ और होगी 
ख़त्म बस आज की रात तो हो ।  
 
दिल ये अपना अमानत है उनकी  
दिल में उनके भी जज़्बात तो हो ।  
 
रूठ जाते जो ' तनहा ' मनाते 
कुछ , मनाने के हालात तो हो ।  
 
 
                          
 

 

अक्टूबर 28, 2023

POST : 1729 आप की खातिर ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

           आप की खातिर ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया  

सहे ग़म उसकी ख़ुशी की खातिर 
तो मुस्कराए उसी की खातिर । 
 
हमारा मरना जो चाहता था 
जिये हम उस आदमी की खातिर । 
 
जो शहर में तेरे लौट आये 
है दिल की ये बेबसी की खातिर । 
 
ये ज़िंदगी जिसकी है अमानत 
पिया है ये ज़हर उसी की खातिर । 
 
मुआफ़ करना कि डूब कर की 
ये ख़ुदकुशी आप ही की खातिर । 
 

 

अक्टूबर 26, 2023

POST : 1726 किया है ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

              किया है ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया  

उसने कहा तुमने भी कभी प्यार किया है 
कहा मैंने इक बार नहीं हर बार किया है ।  
 
पूछा उसने क्या दिल का ऐतबार किया है 
दिल का क्या इकरार कभी इनकार किया है । 
 
बताओ ज़रा मुहब्बत में क्या यार किया है 
जाने दो ये सब कुछ किया बेकार किया है ।
 
क्या इश्क़ में किसी का इंतज़ार किया है 
यही उम्र भर को और लगातार किया है । 
 
आसां तो नहीं हर किसी पर यकीं करना
हमने तो हमेशा सब कुछ दुश्वार किया है ।
 
तुमने कभी खुदाओं की ईबादत भी की है 
हमने इंसानों से मुहब्बत की प्यार किया है ।  
 

   
 
 

अप्रैल 18, 2023

POST : 1651 बेदिली से दुआ की है ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

बेदिली से दुआ की है ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

बेदिली से दुआ की है
तुमने भारी खता की है ।

मारकर यूं ज़मीर अपना
खुद से तुमने जफ़ा की है ।

बढ़ गया है मरज़ कुछ और
ये भी कैसी दवा की है ।

तुम सज़ा दो गुनाहों की
हमने ये इल्तिज़ा की है ।

बिक गये चन्द सिक्कों में
बात शर्मो-हया की है ।  


 

 

POST : 1650 कहने को तो बयान लगते हैं ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

कहने को तो बयान लगते हैं ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

कहने को तो बयान लगते हैं
खाली लेकिन म्यान लगते हैं ।

वोट जिनको समझ रहे हैं आप
आदमी बेजुबान लगते हैं ।

हैं वो लाशें निगाह बानों की
आपको पायदान लगते हैं ।

ख़ुदकुशी करके जो शहीद हुए
देश के वो किसान लगते हैं ।

लोग आजिज़ हैं इस कदर लेकिन
बेखबर साहिबान लगते हैं ।



 

POST : 1649 जो भूला लोकतंत्र आचार ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

जो भूला लोकतंत्र आचार ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 

जो भूला लोकतंत्र आचार 
हुई सत्ता की जय जयकार ।

चुना था जिनको हमने , वही
बिके हैं आज सरे-बाज़ार ।

लुटा कर सब कुछ भी अपना
बचा ली है उसने सरकार ।

टांक तो रक्खे हैं लेबल
मूल्य सारे ही गए हैं हार ।

देखिए उनकी कटु-मुस्कान
नहीं लगते अच्छे आसार ।



 

सितंबर 12, 2022

POST : 1598 एहसासों के फूल ( पुस्तक समीक्षा ) समीक्षक : अमृत लाल मदान

   एहसासों के फूल  ( पुस्तक समीक्षा ) समीक्षक : अमृत लाल मदान 

                           रचनाकार कवि : डॉ लोक सेतिया  

गत वर्ष मुझे डॉ सेतिया ने फ़लसफ़ा - ए - ज़िंदगी शीर्षक से अपनी पहली किताब भेजी थी , जिसकी भूमिकासमझाने इक हस्ती आई से मुझे एक पंक्ति अभी तक नहीं भूली है । वह कहते हैं :- लिखना मेरा जूनून है , मेरी ज़रूरत भी है और मैंने इसको इबादत की तरह समझा है । इसी वर्ष उनकी तीन किताबों का सुंदर ढंग से छपकर आना वाकई उनके जूनून को दर्शाता है , उन्हें बधाई । और उनकी जुनूनी इबादत को सलाम । 
 
उनके ताज़ा कविता संग्रह ' एहसासों के फूल ' में लगभग 75 छंदबद्ध कविताएं एवं मुक्तछंद रचनाएं संग्रहीत  हैं जो सहज सीधी ज़बान में बदलती अनुभूतियों और एहसासों को ईमानदारी से अभिव्यक्त करने में सक्षम हैं । उनमें कोई शब्दाडंबर नहीं , कोई गूढ़ दर्शन की बोझिल बातें नहीं लेकिन सब में ठोस ज़िंदगी की तरल बातें हैं , जो उनके 71 वर्ष के जीवन अनुभव से निचुड़ी हुई आई हैं । 
 
 
प्रेम अनुभूतियाँ ज़िंदगी की सबसे तरलतम और सघनतम , उदास किंतु सुखद , और सृजन की अपार संभावनाओं से परिपूर्ण अनमोल अनुभूतियाँ होती हैं । ऐसी कविताएं सिरहाने के नीचे रखी जाती हैं , युवावस्था में  , और प्रौढ़ावस्था में हृदय की तहों के नीचे या स्मृतियों में । ऐसी कुछ कविताएं और ग़ज़लें हैं : वो दर्द कहानी बन गया , जाने कब मिलोगी तुम , मन की बात , उमंग यौवन की , मेरे ख़त , मेरी खबर आदि ।    
 
 
कवि केवल प्रेमिका की याद से उपजी उदासी को ही नहीं उकेरता बल्कि वृद्धावस्था में हर उस मां की उदासी को भी शिद्दत से महसूस करता है जो युवा संतान की उपेक्षा सहती है । यह ऐसा है जैसे कोई किसान युवा हुई फसलें काट लेता है और पीछे कटी हुई जड़ों का दर्द ही टीसता रह जाता है  , माँ के आंसू ऐसी ही कविता है । 
 
 
कवि का जीवन संघर्षों में और संघर्षशील मनुष्य के जीवट और आत्मविश्वास में पूरा विश्वास है । वह एक कविता में लिखता है : जीवन इक संग्राम तो क्या \ नहीं पल भर आराम तो क्या । ' थकान ' में कहता है : जीवन भर चलता रहा \ कठिन पत्थरीली राहों पर \ पर मुझे रोक नहीं सके \ बदलते मौसम भी । 
 
 
कवि नये ज़माने की नयी नारी का उद्यघोष सीता के पश्चाताप की आवाज़ में करता है , मुझे नहीं करनी थी चाहत \ सोने का हिरण पाने की ,  और एक अन्य कविता 'औरत ' में जो संग्रह की पहली कविता है वह उसकी आवाज़ यूं बनता है : " तुमने देखा है \ केवल बदन मेरा \ प्यास बुझाने को अपनी हवस की \ बांट दिया है तुमने टुकड़ों में मुझे \ और उसे दे रहे हो चाहत का नाम । एक और खूबसूरत कविता है ' हमारा अपना ताज ' पति-पत्नी का अपना प्यार का छोटा सा बसेरा । 
 
 
सामाजिक सरोकारों की कविताओं में ' काश ' शीर्षक से कविता मुझे बहुत अच्छी लगी जिसमें कवि सच्ची धर्मनिरपेक्षता सर्व धर्म समभाव का पक्षधर तो बनता है लेकिन उससे बढ़कर वह समूची मानवता के दर्द के एहसास को प्रमुखता देता है न कि मंदिर मस्जिद जाने को । कवि प्राकृतिक परिवेश का प्रेमी है और पर्यावरण संरक्षण में विश्वास रखता है । ' ठंडी ठंडी छाँव ' वृक्ष कहता है : काटना मत मुझे कभी भी \ जड़ों से मेरी \ जी नहीं सकूंगा \ अपनी ज़मीन को छोड़कर  , मैं कोई मनी प्लांट नहीं हूं । मानि वह प्राकृतिक उत्पाद के बाज़ारवाद का भी आलोचक है । 
 
 
साहित्य में कागज़ के फूल सजाने वाले कई लोग पत्थर के फूल भी बन कर नफरती बोल बोलकर बाल श्रमिकों का कैसे दिल दुखाते हैं , ये पीड़ा एहसासों के फूल खिलाने वाले डॉ सेतिया जी बखूबी समझते हैं । उनकी दृष्टि में वो साहित्य कहीं गुम हो गया है जो सद्भावना और संवेदना से खुशियों की महफ़िलें सजाता था ।  अब तो घुटन में उन्हें इस तालाब का जल प्रदूषित लगता है और सब फूल कुम्हलाए हुए । 
 
 
समाज में फैली इन दुष्प्रवृतियों से दुःखी हो कर वह कृष्ण को उनका वायदा याद दिलाते हैं जो उन्होंने अधर्म  जाने पर नया अवतार ले कर आने को कहा था । यहां उनका संस्कृति प्रेम झलकता है ।  इस प्रकार कविता दर कविता सेतिया जी जीवन यात्रा की अच्छी बुरी अनुभूतियों की सशक्त अभिव्यक्ति करते चलते हैं । हां कहीं कहीं उनकी घिसी-पिटी उपमाएं अखरती भी हैं , यथा , फूल ही फूल खिले हों \ हों हर तरफ बहारें ही बहारें ।  फिर भी बहुत ताज़गी है उनकी कविताओं में शिल्प तथा सादी ज़बान में।  उनके लिए साधुवाद की कामना करता हूं ।  
 
  अमृत लाल मदान 
अध्यक्ष , साहित्य सभा 
कैथल ( हरियाणा ) 136027 
मोबाइल नंबर - 94662-39164 

उपरोक्त पुस्तक समीक्षा आदरणीय मदान जी ने 11सितंबर 2022 आर के एस डी ( पी जी ) कॉलेज में विमोचन करते समय पढ़ कर सुनाई । मुझे याद नहीं उनसे कभी पहले आमने सामने मुलाक़ात हुई या कोई वार्तालाप हुई हो । शायद कोई बेहद संवेदशील साहित्य सृजक ही ऐसा कर सकता है केवल पुस्तक को पढ़ कर रचनाकार की मन की भावनाओं को समझ कर इतनी सही सार्थक समीक्षा करना । मुझे अपनी रचनाओं की इस से बढ़कर कोई कीमत नहीं मिल सकती है । अमृत लाल मदान जी का धन्यवाद शब्दों में नहीं किया जा सकता है । 

(   पाठक वर्ग की सुविधा के लिए ' एहसासों के फूल ' कविता संग्रह की पुस्तक व्हाट्सएप्प नंबर 
8447540078 पर संदेश भेज मंगवा सकते हैं । जल्दी ही अमेज़न पर भी उपलब्ध करवा दी जाएगी। )
 

 

मई 08, 2022

POST : 1576 वक़्त के हालात ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

          वक़्त के हालात ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 

दिल के जज़्बात यही थे , मेरे तेरे एहसास यही थे 
पास थे और दूरियां थीं , तब भी दिन रात यही थे । 
 
नहीं मिलने की थी मज़बूरी , कुछ कदम की थी दूरी
नज़रें समझतीं थी बस , होंठों पर अल्फ़ाज़ नहीं थे । 
 
डर ज़माने का यही था , मिलते थे मिल पाते नहीं थे 
धड़कनों की आवाज़ यही , जानते थे समझते नहीं थे । 
 
ज़िंदगी कैसे बिताई हमने , दास्तां सुनी सुनाई हमने 
अलग-अलग रहकर भी पर , दिल से बिछुड़े नहीं थे । 
 
प्यार की मज़बूरियां कुछ , कुछ हौंसलों की भी कमी 
थे जुदा  क्योंकि दोनों , इक मंज़िल के राही नहीं थे । 
 
सोचता हूं मैं आज तुम भी , सोचती हो बात यही कि 
ज़िंदगी पर हक़ होता काश , नसीब तो अपने नहीं थे । 
 
वो प्यार था पहला हमारा , याद है हमको वो नज़ारा 
दिल की बातें दिल में रखीं , कहना जो कहते नहीं थे । 
 
सोचता रहता हूं मैं जो , क्या तुम्हें भी महसूस होता है 
आज कुछ और बात है , मगर हालात कभी ऐसे नहीं थे । 
 

 

दिसंबर 17, 2021

POST : 1562 किस को सुनाएं से सुन ज़माने तक ( कागज़ - कलम का सफर ) डॉ लोक सेतिया

          किस को सुनाएं से सुन ज़माने तक 

             ( कागज़ -  कलम का सफर ) डॉ लोक सेतिया 

शीर्षक संक्षेप में नहीं संभव इस पोस्ट का क्योंकि 1973 में पहली ग़ज़ल कही थी ' हम अपनी दास्तां किस को सुनाएं , कि अपना मेहरबां किस को बनाएं '। करीब आधी सदी का लंबा सफर साहित्य से चाहत का मुहब्बत से जूनून होने तक का जिया है हर दिन परस्तिश की है। किताबें छपवाने की शुरुआत देर से सही मगर सोच विचार कर करने चला हूं ताकि सिर्फ मेरी ही नहीं सभी लिखने वालों की मुश्किलों दुश्वारियों और हौंसलों की बुलंदी से थकान तक का एहसास पाठक वर्ग को हो सके। जाने कितने सोच विचार अंतर्द्वंद से गुज़रते हुए कलम हाथ में उठाते हैं विचार भावना को शब्दों में पिरोना रचना का आंखों से मस्तिष्क और रूह तलक पहुंचना सिर्फ रचनाकार जानता है तपस्या क्या होती है। आपको ग़ज़ल की 151 रचनाएं पढ़ने में कुछ घंटे लगेंगे लिखने में सालों हर हर्फ़ के मायने समझने में बीते हैं। लिखना ऐसे समय में जब हर कोई सोशल मीडिया टीवी चैनल अनगिनत ऐप्प्स और गूगल पर दुनिया देखना समझना चाहता है साहस का कार्य है। इसलिए पुस्तक से साहित्य से समाज को जोड़ना अधिक महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि ज़िंदगी की वास्तविकता और सामाजिक समस्याओं की वास्तविक भावनाओं को महसूस करने को यही एक विकल्प बचा लगता है। किताब से अच्छा दोस्त कोई नहीं दुनिया में और अच्छे साहित्य से बढ़कर मार्गदर्शन कोई अन्य नहीं कर सकता है। पुस्तक के पन्ने निर्जीव वस्तु नहीं होते हैं पाठक से संवाद करते हैं कभी हमदर्द लगते हैं कभी निराशा के अंधकार से बाहर निकाल रौशनी से मिलवाते हैं। किताबें बंद अलमारी की शान बढ़ाने को नहीं हो सकती हैं बेशक इधर बहुत मशहूर जाने माने लोग सिर्फ खुद के गुणगान जीवनी और अधिकांश अनावश्यक घटनाओं की व्यर्थ चर्चा कर ख्याति हासिल करने को इसका अनुचित उपयोग करते हैं। और सरकारी संस्थान संघठन ऊंचे दाम खरीद लायब्रेरी की शोभा बढ़ाते हैं। सच्चा कलम का सिपाही अपनी नहीं समाज की बात कहता है।  

ग़ज़ल संग्रह के बाद कविताओं की उसके बाद व्यंग्य रचनाओं पर आधारित पुस्तक और चौथी किताब ज़िंदगी की कहनियों की हाज़िर करनी है। मकसद दौलत शोहरत पाना कदापि नहीं है बल्कि आपको खुद अपने आप से मिलवाने का उद्देश्य है। ये आपको निर्णय करना है खुद से नज़रें मिलाना चाहते हैं अथवा नज़र बचाना चाहेंगे। बुद्धिजीवी लोगों से समीक्षा लिखवाना अनावश्यक होगा पाठक को रचनाएं खुद से जुड़ती हुईं लगती हैं और सामाजिक सरोकार की चिंता जागृत करने को सफल होती हैं तभी सार्थकता होगी रचनाओं की। इंतज़ार नहीं स्वागत नहीं करें लेकिन निवेदन है पुस्तक जिस भी किसी लेखक की हो आपको मिलती है तो उसको रद्दी की टोकरी में फैंक कर सरस्वती का निरादर कदापि नहीं करें। पढ़ना नहीं पसंद तो जैसे अख़बार पत्रिका के संपादक खेद सहित लौटाते हैं ताकि अन्य किसी के लिए उपयोगी हो सके जैसा कदम उठाना बुरा नहीं है। लिखने वालों को इसकी आदत होती है दस जगह भेजी रचना एक जगह छप जाती है तब भी ख़ुशी मिलती है बेशक रॉयल्टी तो क्या उचित मानदेय भी हमेशा नहीं मिलता। 
 

 

दिसंबर 07, 2021

POST : 1559 तुम्हारे अश्क़ मोती हैं ( मेरा लेखन ) डॉ लोक सेतिया

       

      तुम्हारे अश्क़ मोती हैं ( मेरा लेखन ) डॉ लोक सेतिया

        सभी लोग अपनी पुस्तक के पहले पन्ने पर अपने बारे में लेखन और किताब की बात कहते हैं। मुझे लिखते हुए चालीस साल और अख़बार मैगज़ीन में रचनाएं छपते तीस साल से अधिक समय हो चुका है देश भर में पचास से अधिक पत्र पत्रिकाओं में हज़ारों रचनाएं छपी हैं । ब्लॉग पर ये 1550 से अधिक पोस्ट हैं  दस साल से नियमित लिख रहा हूं और 320000 से अधिक संख्या अभी तक पोस्ट की पढ़ने वालों की है। किताब छपवाने की हसरत रही  है और काफी रचनाओं का चयन ग़ज़ल , कविता- नज़्म , व्यंग्य , कहानी , हास-परिहास की रचनाओं पांच हिस्सों में किया गया है जो इसी ब्लॉग पर लेबल से समझ सकते हैं। लेखक दोस्त और पहचान वाले किताब छपवाने पर चर्चा करते रहे हैं। हिंदी साहित्य को लेकर ये कड़वा सच कभी खुलकर सामने नहीं आया है कि हर किसी के दुःख दर्द की बात लिखने वाले खुद अपने अश्क़ किसी को नहीं दिखाते। तुम्हारे अश्क़ मोती हैं नहीं ये जानता कोई। क्या नाम दिया जाये इस को कि साहित्य का सृजन करने वाले को रचना छपने पर इतना भी उचित मेहनताना नहीं मिलता जिस से उसका पेट भर सके। हर कोई उस से काम लेना चाहता है बिना कीमत चुकाए। मुझे तभी सालों लगे समझने में कि खुद जेब से खर्च कर किताब छपवा उपहार में उनको बांटना जो मुमकिन है पढ़ना भी नहीं चाहते समझना तो दूर की बात है क्या हासिल होगा। मगर पाठक को पढ़ने को मिलना चाहिए ये सोच कर ब्लॉग पर पब्लिश तमाम जगह छपी रचनाओं को पुस्तक रूप में सुरक्षित रखना ज़रूरी लगता है। कभी किसी को अपने लेखन के कॉपीराइट नहीं दिया है अब कानून भी अनुमति नहीं देता है। ये घोषणा करना चाहता हूं मेरा लेखक मौलिक है और उस पर केवल मेरा लेखक डॉ लोक सेतिया का ही संपूर्ण अधिकार सुरक्षित है पंजीकृत है और रहेगा हमेशा। 70 साल की आयु में ये नई शुरआत है मुझे कुछ न कुछ करते रहना पसंद है।
 
    मैंने साहित्य पढ़ा भी बहुत कम है कुछ किताबें गिनती की और नियमित कई साल तक हिंदी के अख़बार के संपादकीय पन्ने और कुछ मैगज़ीन पढ़ने से समझा है अधिकांश खुद ज़िंदगी की किताब से पढ़ा समझा है। केवल ग़ज़ल के बारे खतोकिताबत से इसलाह मिली है कोई दो साल तक आर पी महरिष जी से। ग़ज़ल से इश्क़ है व्यंग्य सामाजिक विसंगतियों और आडंबर की बातों से चिंतन मनन के कारण लिखने पड़े हैं। कहानियां ज़िंदगी की सच्चाई है और कविताएं मन की गहराई की भावना को अभिव्यक्त करने का माध्यम। लिखना मेरे लिए ज़िंदा रहने को सांस लेने जैसा है बिना लिखे जीना संभव ही नहीं है। लिखना मेरा जूनून है मेरी ज़रूरत भी है और मैंने इसको ईबादत की तरह समझा है। 
 

                            मुझे चलना पसंद है ठहरना नहीं 

   कभी कभी खुद से अपने बारे चर्चा करता हूं। आत्मचिंतन कह सकते हैं। मुझमें रत्ती भर भी नफरत नहीं है किसी के लिए भी , उनके लिए भी प्यार हमदर्दी है जिनकी आलोचना करना पड़ती है सच कहने को। कोई व्यक्तिगत भावना दोस्ती की न विरोध की मन में रहती है। कुछ अधिक नहीं पढ़ा है मैंने जीवन को जाना समझा है और उसी से सीखा है। किताबों से जितना मिला समझने की कोशिश की है विवेचना की है। बहुत थोड़ा पढ़ा है शायद लिखा उस से बढ़कर है विवेकशीलता का दामन कभी छोड़ा नहीं है और खुद को कभी मुकम्मल नहीं समझा है। क्यों है नहीं जानता पर इक प्यार का इंसानियत का भाईचारे का संवेदना का कोई सागर मेरे भीतर भरा हुआ है। बचपन में जिन दो लोगों से समझा जीवन का अर्थ मुमकिन है उन्हीं से मिला ये प्यार का अमृत कलश। मां और दादाजी से पाया है थोड़ा बहुत उन में भरा हुआ था कितना प्यार अपनापन और सदभावना का अथाह समंदर। दुनिया ने मुझे हर रोज़ ज़हर दिया पीने को और पीकर भी मुझ पर विष का कोई असर हुआ नहीं मेरे भीतर के अमृत से ज़हर भी अमृत होता गया। और जिनको मैंने प्यार का मधुर अमृत कलश भर कर दिया उनके भीतर जाने पर उनके अंदर के विष से वो भी अपना असर खो बैठा। 

  मेरी कोई मंज़िल नहीं है कुछ हासिल नहीं करना है मुझे लगता है मेरे जीवन का मकसद यही है बिना किसी से दोस्ती दुश्मनी समाज और देश की वास्तविकता को सामने रखना। समाज का आईना बनकर जीना। भौतिक वस्तुओं की चाहत नहीं रही अधिक बस जीवन यापन को ज़रूरी पास हो इतना बहुत है। सुःख दुःख ज़िंदगी के हिस्सा हैं कितने रंग हैं बेरंग ज़िंदगी की चाह करना या सब गुलाबी फूल खुशबू और सदाबहार मौसम किसी को मिले भी तो उसकी कीमत नहीं समझ आएगी। हंसना रोना खोना पाना ये कुदरत का सिलसिला है चलता रहता है। लोग मिलते हैं बिछुड़ते हैं राह बदलती हैं कारवां बनते बिगड़ते हैं हमको आगे बढ़ना होता है कोई भी पल जाता है फिर लौटकर वापस नहीं आता है ये स्वीकार करना होता है। जो कल बीता उनको लेकर चिंता करने से क्या होगा और भविष्य के गर्भ में क्या छिपा है नहीं मालूम फिर जो पल आज है अभी है उसी को अपनाना है जीना है सार्थक जीवन बनाने को। कितने वर्ष की ज़िंदगी का कोई हासिल नहीं है जितनी मिली उसको कितना जीया ये ज़रूरी है। 

    लोगों से अच्छे खराब होने का प्रमाणपत्र नहीं चाहता हूं खुद अपनी नज़र में अपने को आंखे मिलाकर देख पाऊं तो बड़ी बात है। मगर यही कठिन है। मैली चादर है चुनरी में दाग़ है और अपना मन जानता है क्या हूं क्या होने का दम भरता हूं। वास्तविक उलझन भगवान से जाकर सामना करने की नहीं हैं अपने आप से मन से अंतरात्मा से नज़र मिलाने की बात महत्वपूर्ण है। और अब यही कर रहा हूं। मैंने खुद को कभी भी बड़ा नहीं समझा है बल्कि बचपन से जवानी तक कुछ हद तक हीनभावना का शिकार रहा हूं। कारण कभी मुझे समझ नहीं आया क्यों हर किसी ने मुझे छोटा होने अपने बड़ा होने और नीचा दिखाने की कोशिश की है। बहुत कम लोग मिले हैं जिन्होंने मेरे साथ आदर प्यार का व्यवहार किया है। जाने कैसे मैंने अपना साहस खोया नहीं और भीतर से टूटने से बचाये रखा खुद को। मुझे कभी किसी ने बढ़ावा देने साहस बढ़ाने को शायद इक शब्द भी नहीं कहा होगा हां मुझे नाकाबिल बताने वाले तमाम लोग थे। मुझे किसी को नीचा दिखाना किसी का तिरस्कार करना नहीं आया और नफरत मेरे अंदर कभी किसी के लिए नहीं रही है। ऐसा दोस्त कोई नहीं मिला जो मुझे अपना समझता मुझे जानता पहचानता और साथ देता। अकेला चलना कठिन था मगर चलता रहा रुका नहीं कभी भी।

    जब भी मुझे निराशा और परेशानी ने घेरा तब मुझे इस से बाहर निकलने को संगीत और लेखन ने ही बचाया और मज़बूत होना सिखाया है। अपनी सभी समस्याओं परेशानियों का समाधान मुझे ग़ज़ल गीत किताब पढ़ने से हासिल हुआ है। इंसान हूं दुःख दर्द से घबराता भी रहा मगर जाने क्यों अपने ग़म भी मुझे अच्छे लगते रहे हैं ग़म से भागना नहीं चाहा ग़म से भी रिश्ता निभाया है। ग़म को मैंने दौलत समझ कर अपने पास छिपाकर रखा है हर किसी अपने ग़म बताये नहीं। इक कमज़ोरी है आंसू छलक आते हैं ज़रा सी बात पर हर जगह मुस्कुराना क्या ज़रूरी है कभी ऐसा हुआ कि हंसने की कोशिश में पलकें भीग जाती हैं। अपने आप को पहचानता हूं और अब तन्हाई अकेलापन मुझे अच्छा लगता है उन महफिलों से जिन में हर कोई अपने चेहरे पर सच्चाई भलेमानस की नकाब लगाए इस ताक में रहता है कि कब अवसर मिले और अपनी असलियत दिखला दे। ये दुनिया और उसकी रौनक मुझे अपनी नहीं लगती हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात मुझे बचपन से दोस्ती की चाहत रही है। बहुत दोस्त बनाए हैं साथ दोस्तों से कम रहा है बस इक सच्चे दोस्त की तलाश रही है जो मुझे समझता भी और जैसा हूं वैसा अपनाता भी शायद कहीं है कोई कभी मिलेगा भरोसा है या सपना हो सकता है। ज़िंदगी ने जितना दिया बहुत है। 
 

   फ़लसफ़ा - ए - ज़िंदगी ( अफ़साना बयां करती ग़ज़ल और नज़्म ) 

( सभी ग़ज़ल से प्यार करने वाले दोस्तों और साहित्य पढ़ने में रुचि रखने वाले बंधुओं को जानकार ख़ुशी होगी कि मेरी पहली पुस्तक ग़ज़ल एवं नज़्म की 151 रचनाओं की आपको पढ़ने को उपलब्ध करवा दी जाएगी। 

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डॉ लोक सेतिया।  )

 
 
डॉ लोक सेतिया 
एस सी एफ - 30 
मॉडल टाउन ,
फतेहाबाद ,
हरियाणा - 125050 
मोबाइल नंबर - 9416792330 
 
Blog 
http://blog.loksetia.com 
 
Email:- drloksetia@gmail.com   
 
अपनी ग़ज़ल- नज़्म को यूट्यूब चैनल पर अंदाज़-ए -ग़ज़ल नाम से बनाकर कोशिश की है अधिक चाहने वालों तक पहुंचने की कुछ महीने पहले ही। लिंक नीचे दिया है।
 
 
 https://youtube.com/channel/UC5fgxqiYhBth2eRtsQF7oDw

 

जून 13, 2020

POST : 1330 ज़िंदगी से मिलो मर जाने से पहले ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

   ज़िंदगी से मिलो मर जाने से पहले ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 

दोस्त मुझे अपना बनाने से पहले  
मुझे जान लेना भूल जाने से पहले 

ये जीने का अंदाज़ सीखो मुझसे 
मर जाना नहीं मौत आने से पहले । 

कभी आ भी आओ साथ मिलकर 
कदम दो कदम चलें हम दोनों भी 

गले से लगा लो बताओ सुनो भी 
हाल ए दिल छोड़ जाने से पहले । 

दुनिया अजब है हैं दस्तूर निराले 
हैं लिबास सफेद और दिल काले 

चलों अश्कों की बारिश में भीगें 
मिल के दोनों मुस्कुराने से पहले । 

शिकवे गिले यारो मुझ से कर लो 
जितने भी अरमान बाकी कहो तुम 

छुपाके दिल में शिकायत न रखना 
मेरी अर्थी को फिर उठाने से पहले । 

कुछ मीठी कुछ कड़वी कुछ बातें 
हंसती रुलाती कई यादें करना याद 

मेरे मजार पर शमां जलाकर मुझपे 
फूलों की इक चादर चढ़ाने से पहले । 

यही वक़्त है दो चार घड़ी हमारा 
सुनाओ कहानी तुम अपनी ज़ुबानी 

कोई और किस्सा नई बात कोई 
कहो उनके भूल जाने से पहले ।

मुहब्बत ईबादत प्यार दोस्ती है 
इसी को कहते हैं जी रहे हैं हम 

मिलके जियो जीने के लिए अब तो 
मिलो ज़िंदगी से मर जाने से पहले ।