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मई 26, 2019

POST : 1100 मुहब्बत भी इबादत भी सियासत भी ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

 मुहब्बत भी इबादत भी सियासत भी ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

   या इलाही ये माजरा क्या है आखिर इस दर्द की दवा क्या है। हमको उनसे वफ़ा की है उम्मीद जो नहीं जानते वफ़ा क्या है। समझ कोई नहीं पाया इश्क़ की खुदा की खुदाई की और राजनेताओं की सियासत गहरी बातों को। जो नहीं है उसी के होने का यकीन करते हैं जो सताने में मज़ा लेते हैं दिलरुबा अल्लाह रहनुमा नाम है उनका उनकी मर्ज़ी नहीं जीने भी देते उन्हीं पर फ़िदा हैं सारे मरते हैं। कौन जाकर सवाल उनसे करे किसकी शामत आई है लोग डरते हैं। ये अजब ग़ज़ब है जिनकी बात समझ नहीं आती किसी को कोई मतलब नहीं निकलता है उनको दार्शनिक ज्ञानवान करार कर देते हैं। चलो जो होगा देखा जाएगा इक बार हौसला तो करते हैं ये जो भी हैं मुहब्बत इबादत सियासत वाले इनको सोच के तराज़ू पर तोलने को धरते हैं। 

     वही होता है जो ऊपर वाला चाहता है अगर ये सच है तो उसको जाकर पकड़ना होगा। कुछ ही अमीरों पर करम उसका ये तो बड़ी नाइंसाफी है उसकी बरकत उसकी रहमत सभी पर बराबर क्यों नहीं होती है। और ये कैसा दस्तूर बना दिया है जो दुःख दर्द देता है उसी की आरती इबादत करते हैं उसको खुश करते हैं दुःख दर्द मिटाने की झूठी उम्मीद रखते हैं। कोई उसके घर से खली हाथ नहीं आता ये सच है मगर इक ज़ख्म का ईलाज मांगते हैं और गहरे घाव कौन देता है। इस ग़म से तो पिछले ग़म कम था मांगी ख़ुशी थी मिलते ग़म ही ग़म हैं। ये अजब राजनीति की पहेली है समस्या हैं समाधान कहलाते हैं करते क्या हैं बस बातें बनाते हैं। 

  जिनके पास दिल नहीं उन्हीं से मुहब्बत की हमने। अपने खुद से अदावत की हमने। ये ग़ज़ल आखिर में सुनाऊंगा अभी छपी है पुष्पगंधा में , मुझी को नहीं मिली अभी सब पढ़ कर कहते हैं खूब कही है। ऊपर वाला कभी नहीं आया नीचे वालों की खबर लेने क्या हाल है उसकी बनाई दुनिया का। हम को ऊपर जाने की मोहलत नहीं इजाज़त मिलती है मरने के बाद तो ज़िंदगी गुज़ार ली अब जाकर शिकवा गिला करना फज़ूल है यही मान लेते हैं भरोसा रखते थे हुई भूल है। जाकर मिलने का हौसला नहीं होता सरकार के दरबार या ऊपर वाले के रचे शानदार सचखंड जैसे रौशन जगमगाते आलीशान घर के बाहर से ही घबराहट होने लगती है। दरबान खड़े समझाते हैं अदब से बात करना कुछ भी नहीं मिला तो शिकायत नहीं करना हाथ जोड़ मांगना दया करो मुझ पर रहम करो विनती आरती अरदास कोई और उपाय नहीं है। उसका धन्यवाद करते हैं उसकी रज़ा है जो दुःख दर्द बेबसी तकलीफ़ दी उसमें भी भलाई थी और भी दे सकता था नहीं दिए दर्द जो सहन नहीं होते। 

सबको देने वाला है फिर सबको जाकर उसी की मूरत को धन दौलत सोना चांदी आभूषण सुंदर परिधान पहनाने पड़ते हैं। बच्चा बोला देखकर मंदिर आलीशान एक तुम्हारे रहने को इतना बड़ा मकान। बच्चा है अभी नहीं समझता खुदाई की शान सियासत की आन बान शान कितनी ज़रूरी है। जनता भूखी जी सकती है सत्ता को छप्पन भोग की आदत है। इस दुनिया का चलन देखा कोई ताकवर है खुद को शाही ढंग से रहने की आदत है तो हर कोई मानता है शेर भूखा भी होता है तो घास नहीं खाता उसको चाहिए और जीभर मनपसंद का खाना है। किस से कैसे लिया उसकी मज़बूरी है कोई कहना नहीं ये बहाना है। फिर फ़कीर बनकर कोई आया है जिसके पास हर खज़ाना है। अपनी किस्मत खोटी है हवा खाकर जी लेते हैं पानी पीने को बचा नहीं और खाने को भी न इक दाना है। मुहब्बत की बात कैसे भूल गई उस खुदा को भी तो मनाना है। रूठे रब को मनाना आसान है रूठे यार को मनाना मुश्किल है। जग के बदले यार मिले तो यार का मोल दूं दूना किसी ने यार को अपना कपड़ा लत्ता यार को अपना गहना की बात कही थी। किसी और दुनिया की बात रही होगी अब रूठने वाले को मनाने पर गुरु जी जनाब आर पी महरिष जी त्ज़मीनें लिखते हुए कहते हैं।

         बशीर बद्र के शेरों पर तज़मीनें 

( ताज़मीनें किसी बड़े शायर की ज़मीन लेकर अपनी बात कही जाती है )

रूठने वालों से मन जाने की फरमाइश रहे 

फिर मिलें पहली तरह , 

दिल में न आलाइश रहे 

याद ऐ अहले-जहां , 

इतनी सी फहमाईश रहे 

" दुश्मनी जम कर करो , लेकिन ये गुंजाइश रहे

जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों। 

बस राजनीति करने वालों से हम दुनिया के सभी लोगों को इक यही सबक समझ नहीं आया। पढ़ा ज़रूर भुला दिया भूला नहीं है। ढाई आखर पढ़ने नहीं सीखे आज तलक हम। जानता हूं आपको लगने लगा कि बात कुछ समझ नहीं आई किस की बात थी किसकी बनती किसी और की हो गई है। आपका कोई कसूर नहीं भाई दुनिया में जाने किस किस की पढ़ाई है स्कूल कॉलेज कोचिंग क्लासेज हैं। मुहब्बत का आशिक़ी का कोई स्कूल खुला नहीं सियासत की पढ़ाई कहीं पढ़ाई जाती ही नहीं है और इबादत की बात उस जगह करते हैं जिस जगह खुदा अल्लाह भगवान होता ही नहीं। ऊपर वाला दुखियों की नहीं सुनता रे कौन है जो उसको गगन से उतारे। बस हर कोई अपने लिए मांगता है जेब कतरों को छोड़कर जो दुआ मांगते हैं। ऊपर वाले तेरी दुनिया में कभी जेब किसी की न खली रहे। कोई भी गरीब न हो जग में हर पॉकेट में हरियाली रहे।

    आपसे अपनी ग़ज़ल सुनाने का वादा किया था निभाना पड़ेगा। हाज़िर है मेरी ग़ज़ल।

ग़म से इतनी मुहब्बत नहीं करते - लोक सेतिया "तनहा"

ग़म से इतनी मुहब्बत नहीं करते ,
खुद से ऐसे अदावत नहीं करते ।

ज़ुल्म की इन्तिहा हो गई लेकिन ,
लोग फिर भी बगावत नहीं करते ।

इस कदर भा गया है कफस हमको ,
अब रिहाई की हसरत नहीं करते ।

हम भरोसा करें किस तरह उन पर ,
जो किसी से भी उल्फत नहीं करते ।

आप हंस हंस के गैरों से मिलते हैं ,
हम कभी ये शिकायत नहीं करते ।

पांव जिनके  ज़मीं  पर हैं मत समझो ,
चाँद छूने की चाहत नहीं करते ।

तुम खुदा हो तुम्हारी खुदाई है ,
हम तुम्हारी इबादत नहीं करते ।

पास कुछ भी नहीं अब बचा "तनहा" ,
लोग ऐसी वसीयत नहीं करते । 
 
 इश्क़ पर शायरी शेर संकलन
 

मई 25, 2019

POST : 1099 बोलना भी है मना सच बोलना तो दरकिनार ( सूरत ए हाल ) डॉ लोक सेतिया

    बोलना भी है मना सच बोलना तो दरकिनार ( सूरत ए हाल ) 

                                      डॉ लोक सेतिया

   बहुत शोर सुना विश्व में भारत का नाम रौशन हो रहा है। जाने ये क्या मानसिकता की बात है हम अपने बारे खुद सामने अपनी नज़र से नहीं देखते कोई विदेशी कहता है तो यकीन कर लेते हैं। मगर यहां भी मीठा मीठा गप कड़वा कड़वा थू की बात है। विदेशी हमारे बिगड़ते स्वस्थ्य बदहाल आर्थिक हालात शिक्षा की बिगड़ती दशा से लेकर देश में आम लोगों की सुरक्षा विशेषकर महिलाओं के शोषण पर नकारात्मक टिप्पणी करते हैं अपने नागरिकों को भारत आने से पहले सचेत करने को मगर हम अपमानित नहीं महसूस करते हैं। विदेश से आने वाले हर किसी को आकर शक भरी नज़र से देखते हैं मगर हम चंद रुपयों की चाह में इस को स्वीकार करते हैं। घटनाएं घटती हैं तो राज्य सरकार देश की सरकार ब्यान जारी करती है भविष्य में ये नहीं होने दिया जायेगा। इक इमारत में आग लगती है तो हमारे अग्नि शमन विभाग के पास सीढ़ी तक छोटी पड़ जाती है। अपने देश के नागिकों की जान की सुरक्षा की कीमत कुछ भी नहीं है। 

     ये खबर भी विदेशी संस्था देती है कि इन चुनावों में पिछली बार से अधिक संख्या में टिकट हर दल ने अपराधी छवि वाले लोगों को बांटे हैं और चुनाव घोषित होने के बाद जब हमारे टीवी चैनल मज़ाकिया शायरी और अनावश्यक हस्ताक्षेप एंकर करते हुए रौब गांठते हैं तब कोई विदेशी खबरची आंकड़े जमा कर सूचना देता है इस बार संसद में अपराधी पहले से कितने अधिक बढ़ जाएंगे। जब सत्ता मिलने का मतलब ही दौलत की बरसात होना हो तब अपराधी तत्व किसी और जगह खतरे उठाने क्यों जाएंगे। अब उनको जेल नहीं सुरक्षा उपलब्ध करवाई जाएगी। करिये अगर गर्व कर सकते हैं तो ऐसी तमाम बातों को जो शायद आजकल कोई समाचार ही नहीं हैं। इक आतंकवाद की दोषी चुनाव लड़ती है जीत जाती है क्या इसी तरह से हम आतंकवाद को मिटाना चाहते हैं। जिस तरह की भाषा गाली गलौच से लेकर बदज़ुबानी करने तक चुनाव में तथाकथित देश के जाने माने नेता देते रहे हैं उसको लेकर क्या देश के शिक्षित लोग थोड़ा भी चिंतित हैं। मगर कोई विदेश में बैठा लिखने वाला अचरज व्यक्त करता है इस महान देश के सच के झंडाबरदार आंखें कान बंद कर खुद अपनी बढ़ाई करने में खोये हुए हैं। नहीं उनकी हर बात सच साबित नहीं हो सकती मगर उनका आगाह करना गैर वाजिब भी नहीं है कि हम कितनी गलत दिशा को जाते जा रहे हैं। कैसे गुंडे बदमाश नेता बना लिए हैं और हम उनको जितवा कर खुद अपने लिए बड़ा खतरा मोल ले रहे हैं। चुनाव आयोग सर्वोच्च न्यायालय बेबस हैं और जब यही अपराधी किसी संवैधानिक पद पर नियुक्त किये जाते हैं तब न्याय कानून की धज्जियां उड़ती हैं क्योंकि उनको जकड़ने को उन्हीं की इजाज़त की ज़रूरत होती है। मगर आप देखेंगे जल्द ही संविधान की शपथ लेकर सबको समानता और न्याय देने की पक्षपात नहीं करने की बात भी फिर कही अवश्य जाएगी निभाई कभी नहीं जाएगी। जो अपराधी अपने दल में शामिल हो विजयी हुआ उसको कहा जाएगा जनता ने माफ़ कर दिया या बेगुनाही का सबूत है। अगर ऐसा है तो पुलिस थाने अदालत को बंद कर सभी फैसले जनता से जनमत लेकर किये जा सकते हैं भले नतीजा बड़े बड़े अपराधी निर्णय छीन सकते हैं या खरीद सकते हैं। ये ज़हर मीठा लगता है आपको तो लगे मगर इसका असर अच्छा हो नहीं सकता है। 

 

POST : 1098 दोबारा शहंशाह बनकर पहला संबोधन ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

  दोबारा शहंशाह बनकर पहला संबोधन ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

   कभी  कभी किसी लिखने वाले की सोई किस्मत जागती है तब छप्पर फाड़ कर धनवर्षा होने लगती है। किसी को साहित्य अकादमी का निदेशक बनाती है सरकार किसी को कोई रुतबा कोई सदस्य्ता मिल जाती है। मगर ऐसा नसीब से अवसर बेहद मुश्किल से किसी को मिलता है बड़े नेता का विशेष अवसर पर संबोधन को लिखने का दायित्व मिलना। इस नाचीज़ को यही काम करने को दोबारा शहंशाह बनने वाले नेता जी ने सौंपा है। ये वास्तव में गौरव की बात है और इसको लिखते हुए इसकी ऐतिहासिकता को ध्यान में रखना बेहद ज़रूरी है। अभी पांडुलिपि जमा करने जैसी बात है स्वीकार होने पर छपने से पहले खुद शहंशाह अपनी ज़ुबान से मधुर वाणी में पढ़ कर सत्ता की कमान संभालने का कार्य करेंगे। जो लिखा इस तरह से है। 

    अपने सोच समझ कर मुझे सत्ता पर सिंघासन पर सुशोभित किया है। कोई छुपी हुई भावना नहीं रही इस बार बड़े साफ शब्दों में मेरे नाम की सरकार बनाने की बात कही थी। राजा की सरकार राजा के नाम से हुआ करती है। जनता की सरकार बनाने का काम आज तक सफल नहीं हो पाया है। भारत सरकार हमेशा किसी एक नेता या दल अथवा गठबंधन की सरकार कहलाई है , पिछली बार मेरे सत्ताधारी शासक होते हुए भी दल की ही साकार कहलाती रही है बेशक दल का कोई महत्व नहीं बचा था। जब नाचन लागी तो घूंघट काहे यही विचार कर पासा फैंका था अपने नाम की सरकार वाला। शतरंज में राजा बचना चाहिए प्यादे कुर्बान होने को ही रखते हैं। अभी शंका की बात कोई नहीं है दल वाले घठबंधन वाले विपक्ष वाले सबको खबर है इस सरकार का मतलब ही मैं हूं मैं ही मैं और केवल मैं ही मैं ही हूं। अपने देखा होगा चुनाव के बाद भगवान के दरवाज़े पर भी मैं गया तो राजा की तरह की पोशाक और शानो शौकत के साथ। भगवान के भक्तों की भक्ति और संख्या अब मुझसे बढ़कर नहीं रही है। स्वर्ग के आसन की लड़ाई देवता लड़ते रहे होंगे इस भारत देश की धरती किसी स्वर्ग से कदापि कम नहीं है और मेरी विजय निर्विवाद सत्य की तरह है। 

        मैंने इस अवसर पर जो पोशाक पहनी है विशेष तौर से सिलवाई गई है जिसकी विशेषता है कि सिर्फ मेरे सच्चे भक्त ही इसकी चमक को देख सकते हैं और देखकर मेरी शोभायात्रा निलकते समय जय हो का उद्घोष कर सकते हैं। जिनको इसकी सुंदरता इसकी बेमिसाल चमक दिखाई नहीं देगी और वो जय हो शहंशाह जी की नहीं बोलेंगे उनको मुजरिम करार दिया जा सकता है मगर मैं जनता हूं सब जय हो का उद्घोष कर एकता और अखंडता की मिसाल कायम करेंगे और इतनी ऊंची आवाज़ सुनाई देगी जो ऊपर आसमान पर मुझसे पहले के शासकों को भी सुनाई देगी। आज से देश मेरा है आपका राजा मैं संविधान लोकतंत्र कानून सब मैं ही हूं। सबको  इस वास्तविकता को स्वीकार करना ही होगा कि मुझसे पहले कोई अच्छा और सच्चा ईमानदार शासक भारत ही नहीं दुनिया भर में कहीं भी हुआ नहीं है और न ही कोई कभी भविष्य में हो ही सकता है। मुझे लगता है कि अब जैसे पुराने समय में राजा का नाम उसकी तस्वीर सिक्कों पर अंकित हुआ करती थी अब देश में असली नोटों की पहचान मुझसे की जानी चाहिए। घबराना नहीं इस बार कोई नोटबंदी नहीं की जाएगी लोग चाहेंगे तो पिछले हज़ार पांच सौ वाले नोट फिर से मेरे नाम की मोहर से जारी किये जाने का भी विचार हो सकता है। लक्ष्मी काली सफेद नहीं होती है सुनहरी आभा की हर रंग की होती है। मुझे  फ़कीर समझ कर आपने मेरी झोली भर दी है बस इक चाहत अभी सीने में दबी हुई है मेरी मूर्ति बनवाने लगे तो उसकी ऊंचाई किसी की मूर्ति से कम नहीं होनी चाहिए। सरकारी विज्ञापनों की तरह अब घर घर दफ्तर दफ्तर दुकान दुकान हर रेहड़ी खोखे के धंधे की जगह मेरी तस्वीर लगाई जानी ज़रूरी होगी और सुबह शाम धूपबत्ती करने से सबकी गरीबी दुःख दर्द मिट जाएंगे की आरती गाई जाया करेगी। 

    मुझे भरोसा है शहंशाह की दिल की हर चाहत को इस लेख में शामिल किया गया है और इसको पसंद कर पढ़ने के बाद मुझे भारत रत्न की उपाधि मिल जाये तो कोई हैरानी नहीं होगी। माया की बात क्या देने वाला जब भी देता देता छप्पर फाड़ के ये हेरा फेरी फिल्म का गीत सच साबित हो भी सकता है।

मई 24, 2019

POST : 1097 साईल नहीं समझा ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

      साईल नहीं समझा ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

     आज की बात की शुरुआत इक अपनी पुरानी ग़ज़ल से , तीसरी नंबर की लिखी ग़ज़ल है । 

 

  हमको तो कभी आपने काबिल नहीं समझा - लोक सेतिया  "तनहा"

हमको तो कभी आपने काबिल नहीं समझा 

दुःख दर्द भरी लहरों में साहिल नहीं समझा । 

दुनिया ने दिये  ज़ख्म हज़ार आपने लेकिन 

घायल नहीं समझा हमें बिसमिल नहीं समझा ।

हम उसके मुकाबिल थे मगर जान के उसने 

महफ़िल में हमें अपने मुकाबिल नहीं समझा ।

खेला तो खिलोनों की तरह उसको सभी ने 

अफ़सोस किसी ने भी उसे दिल नहीं समझा ।

हमको है शिकायत कि हमें आँख में तुमने 

काजल सा बसाने के भी काबिल नहीं समझा ।

घायल किया पायल ने तो झूमर ने किया क़त्ल 

वो कौन है जिसने तुझे कातिल नहीं समझा ।

उठवा के रहे "लोक" को तुम दर से जो अपने 

पागल उसे समझा किये साईल नहीं समझा ।   

                             (  अब आज की रचना  ) 

      शीर्षक यही चुना है शायद कुछ लोगों को साईल शब्द का अर्थ नहीं मालूम हो तो पहले वही बता देता हूं । साईल कहा जाता है भिक्षुक को और ज्ञान चाहने वाले को भी , भीख मांगने वाला भिक्षुक कहलाता है । फ़कीर की बात अलग होती है झोली खाली हो या भरी हुई उसको मतलब नहीं होता । फ़कीर अगले पल की चिंता नहीं किया करते हैं । आई मौज फकीर की दिया झौंपड़ा फूंक । फकीरी करना आसान नहीं है कौन सच्चा फकीर है इसकी इक छोटी सी कहानी सुनते हैं उसके बाद आधुनिक फकीरी पर चर्चा की जानी है । 

      इक धनवान अपने बेटे को इक सन्यासी गुरु के पास लेकर गया और बताया वो फ़कीर बनना चाहता है । गुरु ने उसके बेटे को कहा पहले देख लो ये फकीराना अंदाज़ होता क्या है । गुरु  उसको अगली सुबह रात के आखिरी पल ठंड के मौसम में दूर इक सुनसान जंगल जाकर इक फ़कीर को दूर से ही देखते रहने को कहा । जब उस जगह पहुंचा तो देखा इक फ़कीर आंखें बंद किये चिंतन में व्यस्त है । इक चादर से ढका हुआ शरीर ठंड से बेखबर ध्यान में मग्न । तभी देखा कोई रथ पर उधर से गुज़र रहा था अमीर आदमी होगा जब देखा सर्दी में फ़कीर को तो अपना कीमती दोशाला उतार कर चुपके से जाकर उसको ओड़ा दिया बिना आवाज़ किये और अपनी राह बढ़ गया । कुछ ही क्षण में इक चोर उधर से गुज़रा तो उसको लगा इतना कीमती दोशाला इसके पास और चुपके से दबे पांव जाकर उसके बदन से दोशाला उठाया और लेकर चल दिया । वो सोचने लगा क्या इसको खबर ही नहीं कोई दान दे गया कोई चोरी कर गया । तभी इक राहगीर जाते जाते अपने झोले से कुछ लड्डू निकाल कर फ़कीर के सामने रख कर अपने सफर पर चला गया ताकि भूखा फ़क़ीर पेट भर सके । इतने में इक कुत्ता आया और फ़कीर के सामने से रखे लड्डू खाने लगा फिर भी फ़कीर को कोई हलचल नहीं करते देख वो अपने को रोक नहीं पाया और फ़कीर के पास जाकर कहा आपको खबर भी है कोई आपका दोशाला चुरा गया कोई आपके लड्डू खा रहा है । फ़कीर हंस दिया । जब जो जो हुआ उसका विवरण सुना तो बोला भाई मैं तो अपने आप में मस्त था मुझे इस सब से कोई मतलब ही नहीं था । कोई दोशाला डाल गया कोई दूसरा उठाकर ले गया तो मुझे क्या लेना देना , कोई मैंने मोल तो नहीं लिया था न ही मांगा ही था । जो दे गया उसको ज़रूरत नहीं रही होगी और जिसको ज़रूरत थी लेकर चला गया । जब मेरा था ही नहीं मुझे किस बात की चिंता और कोई लड्डू रख गया जिसको भूख लगी थी खा गया तो वो भी मेरे नहीं थे । इस तरह उस धनवान के बेटे को समझ आई बात दुनिया से विरक्त होना किस को कहते हैं । 

       बचपन से देखता था कुछ लोग सन्यास लेने के बाद भी रिश्तों से मोह रखते थे । दादाजी को कथा सुनाया करता था इसलिए सोचने लगा और सवाल करता आप साधु हैं तो नाते की बात क्यों कहते हैं । इक बात और पता चली कोई सन्यास लेना चाहता है तो उसको विवाह से पहले माता पिता से और विवाहित होने पर धर्मपत्नी से अनुमति लेनी होती है पहला भगवा कपड़ा घर से लेकर शुरुआत की जाती है । शायद अब आपको माजरा समझ आने लगा है । कुछ लोग घर से भागते हैं जीवन से हार के और भगवा वेश धारण कर मांग कर खाने के आदी बन जाते हैं । उनको कोई मतलब नहीं होता असली नकली संत होने से । असली फ़कीर कैसे होते हैं उनकी बात ही और होती है । ग़ालिब कहते थे बनाकर  फकीरों का हम भेस ग़ालिब , तमाशा ए अहले करम देखते हैं ।

      इक देश के शासक को अपनी शान बाकी राजाओं से बढ़कर दिखानी की चाहत थी । उसने आस पास के सभी देशों के साधु संतों और भिक्षुक फ़कीर लोगों को बुलवाया दान देने को । जितने भी आये सभी को सोने चांदी हीरे मोती जवाहरात देकर उनकी झोलियां भर कर भेजते हुए कहा अपने अपने देश जाकर बताना कोई राजा इतना बड़ा दानवीर है । इक फ़कीर दरबार से बाहर निकला और मिली खैरात को वहीं खड़े भिखारियों को बांट कर उनसे कहा जाओ अपने राजा को बताओ हमारे इक देश में ऐसे फ़कीर भी रहते हैं जो जितना भी मिले सब औरों को बांट देते हैं मगर कोई भी अहंकार दिखाते । ऐसा ही इक फ़कीर जब इक राजा के पास आया तो देखा राजा ऊपर वाले से कुछ और देने की विनती कर रहा है । वापस जाने लगा तो राजा ने रोककर पूछा मांगो क्या चाहिए और फ़कीर ने कहा मैं तो राजा समझ कर आया था मगर आकर देखा आप तो खुद ऊपर वाले से मांग रहे हैं तो लगा इक भिक्षुक से क्या लेनी भीख , मांगनी होगी तो उसी से मांगेंगे जो राजा को भी देता है ।

        नाम बदलने की इतनी जल्दी नहीं उपनाम जो रख लिया बदलने की जल्दी नज़र आई । सेवक चौकीदार नहीं अब फ़कीर हैं कहकर दिल जीत लिया सबका । संतन को क्या सीकरी से काम । मगर कभी नहीं सुना था कोई ऐसा फ़कीर होता है क्या राजसी शान क्या शासक होने का एहसास क्या खुद को महान होते देखने की चाहत जो किसी से छिपती नहीं छिपाने से । इतनी सुरक्षा की ज़रूरत किसी फ़कीर को नहीं होती है फकीरी का अर्थ ही बदल कर रख दिया है । ये लोग भी खूब हैं किसी का जादू सर चढ़कर बोलता है तो हर बात पर वाह वाह क्या बात है । इक नानक जी थे घर परिवार सब था सन्यास लेने की घर बार त्याग करने की कोई बात ही नहीं की कभी । ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर , कबीरा खड़ा बाज़ार में सबकी मांगे खैर । ये कैसा आधुनिक फ़कीर है कि  लोग डरते हैं किसी दिन किसी को सूली चढ़ाने की बात भी कह दे तो हैरान नहीं होना , जान की खैर मनानी है तो चुप रहना सीखो या उसकी जय कहना जो भी मुमकिन है । कई साईस लोग अपने बच्चों के नाम गरीबदास रखते थे जानकर उनकी अमीरी को नज़र नहीं लग जाये ये सोचते थे । और कोई फुटपाथ पर रहने वाला बच्चे का नाम अमीर चंद रख कर सोचता नाम से तकदीर बदल जाये शायद । शेक्सपीयर कहते थे नाम में क्या रखा है ।  दुनिया आपका सिक्का मानती है कौन आपको फ़कीर समझेगा ये फकीरी आपको कहीं परेशान नहीं कर दे । फ़कीर फकीरी और फकीराना अंदाज़ आप नहीं समझोगे बाबू चुटकी भर सिंदूर की कीमत क्या होती है । कोई है जो आपको अपने सर का ताज मानती है फ़कीर नहीं भले आप कभी अपना धर्म नहीं निभाओ मगर इतना ज़ुल्म भी मत ढाओ खुद को फ़कीर मत बताओ । बड़े झूठे हो चलो जाओ ।

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POST : 1096 सवाल हैं जवाब कहां हैं ( खरी बात ) डॉ लोक सेतिया

     सवाल हैं जवाब कहां हैं ( खरी बात ) डॉ लोक सेतिया 

   जीत जाने से सवाल खत्म नहीं होते हैं। और कोई कहता है जनादेश साबित करता है मेरी कोई गलती नहीं है तो आपसे पहले जिनको देश की जनता ने फिर से जितवाया क्या अपने उन पर लगाए आरोप छोड़ दिए थे। आपात्काल हटाने के बाद जिस इंदिरा गांधी की ज़मानत ज़ब्त हुई 1977 के चुनाव में 1980 में फिर उन्हीं को जितवा दिया उसी जनता ने मगर क्या कुर्सी बचाने को इमरजेंसी लगाना भूले लोग। उसी इंदिरा गांधी के कत्ल के बाद हुई हिंसा का कलंक क्या उसके बाद उनके बेटे राजीव गांधी को मिली जीत से मिट सका है। लोग पुरानी बातों को छोड़ देते हैं बुरा सपना या खराब हालात मानकर मगर भुलाते नहीं हैं। उसी तरह से किसी को जीत मिलना उसके अच्छे बुरे सभी कार्यों को वैध नहीं बनाता है। राजनीति करने वालों को ये पसंद है कि घोटालों दंगों या भ्र्ष्टाचार के आरोपों से अदालत बरी कर से सबूत नहीं मिलने के कारण या फिर जनता दोबारा वोट देकर चुन दे तो उसे अपनी बेगुनाही का तमगा बना पेश करते रहें। 

      खेल खेलते हैं तो खेलने के नियम भी पालन करने पड़ते हैं। गली के बच्चे नहीं हैं जो आउट होने पर आउट होने को राज़ी नहीं होते और निर्णय नहीं मानते हैं। अपने मैच फिक्सिंग की भी बात सुनी होगी जब कोई खिलाड़ी बिक जाता है खराब खेलता है हारता है पैसे की खातिर। सवाल किसी भी दल का नहीं है किसी भी एक उम्मीदवार का नहीं है सब के सब जीते या हारे मगर चुनाव आयोग के नियम को ताक पर रखकर करोड़ों रूपये खर्च करने के बाद। ये जीतना नैतिकता की देश के कानून की हार है। जिस देश को चलाने को निर्वाचित सांसद खुद नियम तोड़कर सीमा का उलंघन कर चुनाव लड़ते हैं उनसे भला कोई कैसे ईमानदारी की आशा कर सकता है। देशसेवा और देशभक्ति कोई तमगा नहीं है जिसको सीने पर लगाए आडंबर किया जाये खुद अपने आप से सवाल करिये अपने देश को दिया क्या और कितनी महंगी कीमत वसूल की है अपना उचित कर्तव्य भी पूरी तरह से नहीं निभाने की। 

          कहने को सोचने समझने को कितनी बातें हैं मगर इक आखिरी लाख टके का सवाल करना हर सरकार हर नेता हर जीतने वाले से ज़रूरी है। सवाल ये है कि देश का संविधान देश की जनता को अधिकार देता है खुद अपनी सरकार चुनने बनाने का मगर बनते ही हर सरकार किसी दल किसी परिवार किसी व्यक्ति की बनकर रह जाती है। हम सरकार बदलते हैं नाम बदल जाते हैं लेकिन व्यवस्था पुरानी ही जारी रहती है। सत्ता किसी एक के हाथ से किसी दूसरे के हाथ चली जाती है। जनता संसद बनाती है बदलाव लाने को मगर जनता के लिए बदलता कभी कुछ भी नहीं है। किसी शायर के दो शेर हैं याद आते हैं। 

पंछी ये समझते हैं चमन बदला है ,

हंसते हैं सितारे कि गगन बदला है। 

श्मशान की ख़ामोशी मगर कहती है ,

है लाश वही सिर्फ कफ़न बदला है। 


 


मई 23, 2019

POST : 1095 सत्ता की शतरंज ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

        सत्ता की शतरंज  ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

   चुनाव सम्पन होने के बाद नतीजे घोषित होने ही थे इस में अचरज की कोई बात नहीं है । और नतीजे आने पर किसी को विजयी किसी को पराजित भी घोषित किया जाना ही था । अब हर कोई जीत पर हार पर चर्चा करेगा किसी को जीत का किसी को हारने का ज़िम्मेदार ठहराया जाएगा । किसी को जीत का सेहरा बांध कर बधाई दी जाएगी तो किसी को हारने की वजह कहकर ठीकरा उसके सर फोड़ने की बात होगी । जिस जनता ने जितवाया या फिर हरवाने में योगदान दिया उसकी बात कहीं पीछे छूट जाएगी या औपचारिक धन्यवाद दे का समझेंगे हक अदा कर दिया । शासक कोई भी हम लोगों को कोई विशेष फर्क नहीं पड़ने वाला है । मगर कुछ बेहद महत्वपूर्ण बातें हैं जिनको समझना जानना भविष्य में काम आ सकता है । अब इस रचना में इक छुपी हुई मगर कोई राज़ नहीं ऐसी कहानी बताई जाएगी । आज की कथा की शुरुआत इसी तरह की जानी चाहिए । 

      ये झूठ के देवता के घर या फिर मंदिर कह सकते हैं उसकी महानता की सत्य कथा है । सच कभी पराजित नहीं होता मानते थे मगर झूठ हमेशा विजयी रहता है इस बात को पहले किसी ने किसी को बताया तक नहीं था । साल भर पहले खुद झूठ के देवता ने आकर मुझे उसका भव्य मंदिर बनवाने को कहा था और तब मुझे भी हैरानी हुई थी इसकी ज़रूरत से अधिक ये काम मुझे सौंपने को लेकर । 30 जून 2018 को इसी ब्लॉग पर लिखी रचना विस्तार से पढ़ी जा सकती है । उसके बाद भी बीच बीच में समय समय पर चर्चा की जाती रही है । इन चुनाओं से पहले घोषित किया गया था इस झूठ के देवता के दर्शन करने वाले की मनोकामना अवश्य पूर्ण होगी । रात दिन चौबीस घंटे दर्शन करने लोग आते हैं आएंगे आते रहेंगे भविष्य में भी । झूठ के देवता की महिमा का गुणगान बढ़ता जा रहा है और जितने भी नेता चुनाव जीतने को यहां हरियाणा के फतेहाबाद शहर आकर दर्शन करते रहे उन सभी को जीत हासिल हुई है । कोई दल का भेदभाव नहीं हुआ है सत्ता पक्ष विपक्षी सभी आने वाले विजयी भये हैं । जिनको झूठ के देवता पर भरोसा नहीं था अब हारने के बाद पछता रहे हैं । 

     समय दस्तक देता है अगर आप ध्यान रखते हैं , हर युग में अपने अपने देवी देवता अपने भक्तों को चाहने वालों को वरदान देते हैं उनका कल्याण करते हैं । जो इस बार नहीं आये फिर कभी दर्शन को आ सकते हैं । ये केवल राजनीति करने वालों का विशेषाधिकार नहीं है । झूठ बोलने से आपका भी भला ही हो सकता है कुछ भी बुरा नहीं होता बेशक आपको किसी तरह से किसी मकसद को लेकर झूठ बोलना पड़े । झूठ के देवता के पास आकर कभी सच नहीं बोलने की शपथ उठानी है और आपके सारे बिगड़े काम बन जाने हैं हर उलझन खुद ब खुद सुलझती जाएगी । कोई चढ़ावा नहीं कोई शुल्क भी नहीं बस केवल झूठ की आरती सुबह शाम उतारनी होगी । जिनको अभी तक समझ नहीं आया उनको जीतने के सबसे ज़रूरी तीन उपाय ध्यान रखना सीखना होगा जिनसे किसी ने जीत हासिल की है । पहला काम अपने जो भी किया है उसकी चर्चा रात दिन भाषण इश्तिहार सोशल मीडिया पर करने के साथ पहले के सत्ताधारी नेताओं को दोषी ठहराने का काम खूब ज़ोर शोर से करना चाहिए । दूसरी बात जो आपको करना चाहिए था मगर किया नहीं बस झूठे वादे साबित हुए उनकी बात कोई अख़बार कोई टीवी चैनल आपसे सवाल नहीं करे इसका उपाय करने को उनका मुंह बंद रखने को सरकारी खज़ाने से विज्ञापन के नाम पर पैसा देकर अपना गुणगान करवाना चाहिए । तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण कार्य है जो भी अनुचित अपने किया संविधान या संस्थाओं को लेकर उनकी भनक तक लोगों को लगने नहीं देनी चाहिए ।

        अभी तक अपने जो हुआ जैसे हुआ को लेकर बात समझी है आगे की बात और भी अधिक विचारणीय है । जब कुछ लोगों से जानना चाहा आपने  उसी सरकार को दुबारा चुना है तो क्या आपको उनका काम काज पसंद आया है सब अच्छा किया है पिछले पांच साल में सरकार ने । जवाब मिला नहीं हमारा क्या है हम तो जैसे तैसे जीने के आदी हो चुके हैं थोड़ी उम्मीद थी इस सरकार से मगर बहुत जल्दी जान लिया था ये भी पहले वालों से कम नहीं हैं । पर हमने देखा कि इस बार 
किसी नेता ने विदेश जाकर अपनी शानो शौकत खूब बढ़ा चढ़ाकर देश की गरीब वाली छवि को बदल दिया है । विदेश में रहने वाले एन आर आई अब शर्मसार नहीं होते अपने देश की भूखे नंगे गरीबों की तस्वीरों को देख कर । अब उनको अच्छा लगता है इक मामूली जनता का सेवक कहलाने वाला राजसी ढंग से विलासिता पूर्वक जीवन जीता है । ये ठीक उसी तरह है जैसे ऊंचे ऊंचे टावर्स पर जगमगाती रौशनियां मीलों तक अंधेरी बस्तियों को छुपाने का काम करते हैं । पहली बार कोई राजनेता इतनी महंगी सज धज और पहनावे से छा गया है कि पुराने गांधीवादी विचार को , लालबहादुर शास्त्री के सादगी से जीने को और सादा जीवन उच्च विचार की बात को , किसी पुराने युग की निर्रथक सोच बना दिया है जिस से लोग इतने कठिन मार्ग से बच सकते हैं । अब कोई कहां चाहता है सब कुछ उपलब्ध होते भी मनमानी पूर्वक उपयोग नहीं करें ताकि बाकी लोग थोड़ा पाने के अधिकारी बन जाएं ।

         शायद किसी को आज ये इक काल्पनिक कहानी लग सकती है मगर इस देश में बहुत लोग काफी दिनों से इक दहशत या डर लेकर घबरा रहे थे कि क्या होगा अगर इस बार इक नेता को हार का सामना करना पड़ा । क्योंकि उसको हारने का अनुभव भी नहीं था और हार को स्वीकार करने की मानसिकता भी उसके पास नहीं है जबकि पहले सभी राजनेता हार जीत को राजनीति के सिक्के के दो पहलू समझा करते थे । लोग घबरा रहे थे कि कहीं उसकी जीत नहीं हुई तो आसमान से कोई कयामत टूट सकती है । जैसे पहले इक नेता ने कुर्सी को जाने से बचाने को आपात्काल की घोषणा कर दी थी । इतिहास का वो काला अध्याय फिर से दोहराये जाने की आशंका छाई हुई थी । लोग सब झेल सकते हैं मगर कोई लोकतंत्र को ही फिर से कैद में डाल दे नहीं होने देना चाहते थे । बस अभी आगे काफी कुछ है जो सामने नहीं पर्दे के पीछे सत्ता का नाटक नेपथ्य में ख़ामोशी से चलता है । जनता से वोट कैसे हासिल करने हैं नतीजे कैसे मनचाहे जुटाने हैं ये सब चुनाव होने के बाद नतीजों तक महत्वपूर्ण रहता है , असली काम अभी आगे है । गठबंधन में सभी को बनाये रखने को कीमत पर सौदेबाज़ी से घाटे मुनाफे का आंकलन सभी करते हैं । देश की हो चाहे किसी राज्य की सरकार बनानी हो विचार आदर्श मूल्य सभी त्याग कर जनता से किये वादों को ताक पर रखकर सभी राजनीति के नाम पर ख़ुदग़र्ज़ी का खेल खेलने को शतरंज पर अपनी गोटियां चलते है , बिसात बिछाई जा रही है खिलाड़ी आमने सामने है लेकिन सभी सत्ताधरी गठबंधन वाले हैं विपक्ष को कोई बुलावा नहीं दिया । पहले बादशाह सलामत रहने पर ध्यान है शपथ ग्रहण होगा जिस में हर कोई मेहमान है । 
 
 शतरंज - विकिपीडिया


POST : 1094 गलत सवाल का सही जवाब ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

  गलत सवाल का सही जवाब ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

   अभी चुनाव नतीजे सामने नहीं आये हैं रुझान देख कर पता चला है सारे बच्चे फेल होने वाले हैं। और होता भी क्या जब सवाल किया गया हो पहले मुर्गी हुई या अंडा जवाब जो भी बताओ आपको अंक ज़ीरो मिलने तय हैं। बिना अंडे मुर्गी कैसे और मुर्गी नहीं तो अंडा कहां से। देश की जनता उलझी हुई है कब से इस ऐसे सवाल में जिसका जवाब ही नहीं जवाब खुद सवाल बन जाता है। दुष्यंत कुमार फिर बीच में चले आते हैं। हमने सोचा जवाब आएगा , एक बेहूदा सवाल आया है। मगर आज आपकी चिंता का समाधान भले नहीं हो चिंताराम की चिंता का अंत हो जाएगा। अब सही वक़्त है आपको वास्तविक सवाल भी बताया जाये चाहे आप समझ सकें या बिना समझे हंसी में टाल दें , ये चुटकुलों की खराब आदत पड़ी है हर कोई सोशल मीडिया पर संजीदा विषय को भी मज़ाक बनाने लगता है। आज इस गंभीर बात को चुटकुला मत बनाना इतनी विनती करनी है मुझे आप सभी से।

          राजनेता जानते हैं जनता को कभी कोई खुश नहीं कर सकता है। मगर जनता ही ने वरमाला जीत की पहनानी है इसलिए उसको इस गलतफ़हमी को विश्वास समझना ज़रूरी है कि हम उसकी ख़ुशी चाहते हैं। ठीक जैसे घर में पत्नी को भरोसा करवाना होता है उसकी ख़ुशी को पति आसमान से चांद सितारे तोड़ कर लेकर उसकी झोली में भर सकते हैं। पागल महिला इतना भी नहीं सोचती कि हैं सितारे कहां इतने आकाश पर हर किसी को अगर इक सितारा मिले। कश्तियों के लिए ये भंवर भी तो हैं क्या ज़रूरी है सबको किनारा मिले। बस यही सोचकर हम बड़े चैन से डूब जाने लगे थे , मगर रो पड़े। ग़ज़ल अच्छी लगी होगी बात भी समझ आई होगी। नेता जनता को और पति पत्नी को खुश करना चाहते नहीं कभी भी बस खुश रखना चाहते हैं इस झांसे में रखते रखते अपनी हर चाहत पूरी करते रहते हैं।

      जो बात संभव ही नहीं है भगवान देवता पय्यमबर भी खुश नहीं कर सकते अपनी पत्नी को देवियों को कोई मानुष भला कैसे असंभव को संभव कर दिखायेगा। कोई अलादीन का चिराग़ नहीं मेरे पास किसी दिल ये सच बोल दिया था इक नेता ने तो लोग हंसने लगे कुर्सी से बढ़कर कोई अलादीन का चिराग नहीं होता है। बेटी को हर पिता भरोसा दिलाता है राजकुमार ढूंढ लाएगा बेटी रानी बन राज करेगी। कहां ऐसे सुनहरे ख्वाब सच हुए हैं किसी राजकुमारी बेटी के। देश की जनता के सामने हर पांच साल बाद जो सवाल रखा जाता है किसी अच्छे सच्चे नेता को चुनकर भेजने का वो सवाल ही उल्टा है जिनको चुनाव लड़ना है शरीफ लोग नहीं हुआ करते शराफत से रहना है तो राजनीति की चौखट को नहीं लांघना बज़ुर्ग समझाते थे इनका कोई भरोसा नहीं गिरगिट से जल्दी बदलते हैं रंग अपना। पत्थरों के शहर में आदमी ढूंढते फिरते  हैं लोग और ज़ख़्मी होकर तीर चलाने वाले को दुआ भी देते हैं हाय री मज़बूरी। 

POST : 1093 सत्ता के मुजरे का सुहाना सफर ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

   सत्ता के मुजरे का सुहाना सफर ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

     राजनीति की वैश्या नाम बदलती है , साधना फिल्म की चंपा रजनी बन जाती है। वसंतसेना की कहानी याद थी भूल जाती है। भले घर में बहु बनकर रामायण सुनाती है सासु मां को बहुत भाती है। ये कहानियां फ़िल्मी हैं मगर सत्ता के कोठे का कड़वा सच यही है। सफर बेहद लंबा है मगर दिलकश है सुहाना है उसको कितनी बार दोहराया गया है। ये किरदार जिस किसी नायिका ने निभाया है उसकी पहचान बन गया है कोई बड़ी फ़िल्मी तारिका शायद ही है जिसने इस किरदार को नहीं निभाया हो। पाकीज़ा की मीनाकुमारी जब बदनाम गली के कोठे से गुलाबी महल की साहिब जान बन जाती है तो बड़े बड़े रईस मुजरा देखने आते हैं। ठेकेदार को अपनी औकात पता है वो दरवाज़े पर बैठा लुत्फ़ उठाता है मगर किसी खानदानी नवाब से नौंक झौंक होने पर कीमत भी चुकाता है। हंसते ज़ख्म की कहानी और है गलती से पुलिस वाले की बेटी को नाचने गाने वाली की बच्ची समझ गुंडे उठा ले जाते हैं किरदार बदल जाते हैं आखिर अपनी ही बेटी को पुलिस वाला अनजाने में वापस उसी दलदल में भेजने की बात करता है जिस जगह से पकड़ कर थाने लाया था और समझाया था बेटी किसी भले आदमी से शादी कर घर बसा लो छोड़ दो ये धंधा। किस किस जिस्मफरोश की बात की जाये।  चलो आज की राजनीति की वैश्या से मुलाकात की जाये। वही खुशबू वही शराब वही कमरा जिस्म बेचने वाली सगरेट सुलगाती हुई सोचती है और कौन होगा ये उसी की पहचान है। फ़िल्मी इत्तेफाक हुआ करते हैं आशिक़ चला आता है दोस्त ने भेजा होता है दिल बहलाने को। ये कमाल का जादू है लोग जिस मुजरेवाली पर लट्टू होते हैं हर दिन उसी का नाच गाना सुनने को चले जाते हैं। सत्ता की मुजरेवाली कभी बूढ़ी होती नहीं है चिरयौवन का वरदान मिला हुआ है। 

          पांच साल में समझना मुश्किल नहीं कि इस सत्ता की मुजरेवाली का प्यार झूठा है और बिकाऊ है। वो हर बार कोई नया पासा फैंकती है अबकि वफ़ा की मिसाल बनके दिखाएगी जन्नत की सैर पे साथ लेकर जाएगी। हम फिर उसकी चाल को  समझते और उसके झूठे आंसू झूठी मज़बूरी की कहानी सुनकर जाल में फंसने चले आते हैं। चुनाव आने पर राजनेता क्या क्या रंग दिखाते हैं नाचते झूमते नचवाते हैं खूब काली घटा बनकर छा जाते हैं मगर ये बिना पानी के बादल वोट मिलते ही बरसे बिना खो जाते हैं। लोग प्यासे के प्यासे रह जाते हैं सत्ता के खिलाड़ी अपनी प्यास बुझाते हैं जाम से जाम टकराते हैं। छलकाए जाम आइये  आपकी आंखों के नाम होंटों के नाम , कहानी बदल जाती है नायिका वही है शरीफ लड़की है शराबी से दिल लगाती है। लाख वफ़ा करती रहे बेवफ़ा कहलाती है। राजनीति करना सबकी बस की बात नहीं है पल पल बदलती रहती है बरखा रानी मौसम की तरह। सत्तर साल में कितने नाम से कितने ठिकाने बदल बदल कर सबकी प्यास बुझाने की कसम खाती है चौखट पर माथा टेकती है सर झुकाती है अच्छी बहुरानी बनकर रहने की बात करती है। समय बदलता है सेवा करने वाली मालकिन बन जाती है , किराये की दुल्हन कहीं रिश्ता निभाती है। 

      लो आज फिर उसी मोड़ पर खड़े हुए हैं हम आशिक़ बनकर। सज संवर कर निकलेगी डोली उसकी जिस की जीत की वरमाला पहनाई थी हमने रात बिना देखे पहचाने नशे की हालत में। गवाही देगा जिसने निकाह पढ़ा था और जाने क्या क्या समझा समझाया था। उसने इस बार बिल्कुल नया दिल बहलाने का हुनर सीख कर आने का भरोसा दिलाया है। कथककली से डिस्को से गुज़रा सफर अब आइटम सांग पर चला आया है। नाचने वाली को हमने भी नचवाया है। पग घुंगरू बांध मीरा नाची थी और हम नाचे बिन घुंघरू के क्या गाया है अपना रंग जमाया है। पर हम नाच देखने वाले कितनी बार नचनिया बन सकते हैं आखिर तो उनके लटके झटके ठुमके उन्हीं के हैं हम उनकी नकल कर सकते हैं वो बात नहीं हो सकती है। राज़ की बात यही है लोग समझते हैं राजकपूर नायक हीरा बाई का खेल देखने जाता है मगर मुहब्बत की बाज़ी हार जाता है तब तीसरी कसम खाता है। फिर कभी किसी नाचने वाली को अपनी गाड़ी में नहीं बिठायेगा। हम भी बार बार धोखा खाते हैं उनको हटाने की कसम खाते हैं मगर हर बार उसी कातिल को बदले लिबास में घर लेकर आते हैं। सत्ता अपना मुजरा करती है हम उनकी जीत का जश्न मनाते हैं। दुल्हनिया लेने वाले राह से डोलियां उठवा जाते हैं हम बहु बेग़म फिल्म की तरह खली डोली घर लाते हैं। चलो आपका दिल बहलाते हैं इक ग़ज़ल सुनाते हैं। 

चंद धाराओं के इशारों पर - लोक सेतिया " तनहा "

चंद धाराओं के इशारों पर ,

डूबी हैं कश्तियाँ किनारों पर।


अपनी मंज़िल पे हम पहुँच जाते ,

जो न करते यकीं सहारों पर।


खा के ठोकर वो गिर गये हैं लोग ,

जिनकी नज़रें रहीं नज़ारों पर।


डोलियाँ राह में लूटीं अक्सर ,

अब भरोसा नहीं कहारों पर।


वो अंधेरों ही में रहे हर दम,

जिन को उम्मीद थी सितारों पर।


ये भी अंदाज़ हैं इबादत के ,

फूल रख आये हम मज़ारों पर।


उनकी महफ़िल से जो उठाये गये ,

हंस लो तुम उन वफ़ा के मारों पर। 



जाते जाते इक मुजरे की भी बात हो जाए तो क्या खूब हो।  ये वीडियो पेश है पाकीज़ा फिल्म से।



 

 


मई 22, 2019

POST : 1092 राह से भटके को मंज़िल नहीं मिलती ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

  राह से भटके को मंज़िल नहीं मिलती ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

  बात सभी की है देश के सभी वर्गों की और बाकी सभी से पहले खुद अपनी भी। मंज़िल तो कुछ और ही थी जिसको पाना था मगर हम राह किसी और पर चलते रहे। राजनेताओं आम जनता से पहले हम जो तथाकथित शिक्षित लोग आईना दिखाने की बात करते हैं सच बोलने का हौंसला ही नहीं और आधा सच आधा झूठ मिलाकर चटनी की तरह परोसते हैं ताकि सबको स्वाद पसंद आये और भाई वाह कहे हर कोई। पहला सवाल आज देश में लोकसभा चुनाव का है राजनीति का है और चिंतन का है कि क्या सब ठीक है क्या यही लोकतंत्र है जिसकी बात हम करते हैं। अभी इक विषय पर अटके खड़े हैं ईवीएम मशीन को लेकर भरोसा नहीं है मगर भरोसा बचा कहां है कोई भी तो भरोसे के काबिल नहीं है जब हमें विश्वास स्थापित करना चाहिए हम शक की बात करते हैं और शक करने वाले पर शक कर इक कंचों का खेल खेलते हैं जीत हार की नहीं हिसाब की बात पर बहस है। जिनको समझ है वो विचार कर सकते हैं कि केवल मशीन बदल कर चुनाव नहीं जीता जा सकता है इतना बड़ा देश है इतनी मशीनें और उनको रखने के ढंग और सुरक्षा के तरीके के साथ हर मशीन पर जो चुनाव लड़ रहे उनके नुमायदों के हस्ताक्षर इतना सब आसानी से बड़े स्तर पर धांधली होने नहीं देता। इस पर विचार किया जा सकता है और निष्पक्ष चुनाव होना ज़रूरी है कैसे हो मंथन की ज़रूरत है विषय आसानी का भी नहीं विषय देश की व्यवस्था का है पांच साल और हर बार का है तो रास्ता कठिन हो कोई बात नहीं मगर दिशा हीनता नहीं होनी चाहिए। अभी हम दिशाहीन भटकते लग रहे हैं। असली उद्देश्य संविधान लोकतंत्र और देश की जनता की अपनी चुनी सरकार होने का है। मुद्दे से भटके नहीं भटका दिए गए हैं वास्तविक मुद्दे हैं ही नहीं और अनावश्यक चर्चा टीवी अख़बार और राजनेता करने में व्यस्त हैं। 

       क्या चुनाव ईमानदारी से लड़े जा रहे हैं कोई नहीं बात करता। हम्माम में सभी नंगे हैं शुरुआत ही गलत है कितना खर्च नियमानुसार किया जाना है परवाह ही नहीं है। कोई भी दल उम्मीदवार खड़े करते हुए अच्छे सच्चे को नहीं देखता और जीतने को जातीय समीकरण से धनबल और बाहुबल हर सही गलत ढंग अपनाया जाता है। बात विचारधारा की होनी चाहिए  मगर होता ये है कि उसकी कमीज़ मैली है मेरी चादर उजली है क्या ये मानसिक दिवालियापन नहीं है। बड़े बड़े राजनेताओं के भाषण का स्तर गिरकर इतना नीचे आ गया है कि बोलने वाले नहीं सुनने वालों को शर्म आती है क्या यही नेता हैं इनको सुनने आये थे हम। जिस देश में तीस फीसदी लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं उस में हज़ारों करोड़ चुनाव पर बर्बाद करना अपराध ही है। और किसी को गरीबी भूख पीने का पानी बदहाल शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की बात महत्वपूर्ण नहीं लगती है। क्या सत्ता पाने को सब उचित है और अगर है तो आपकी देशभक्ति और जनता की सेवा की बातें सब से बड़ा धोखा हैं। खेद की बात है कभी हमने एक मंच से आमने सामने दोनों पक्षों को बहस करते हुए देखा है शालीनता से बात की जाती थी। संसद में असहमत होते हुए भी विपक्षी की बात बड़े ध्यान से सुनते थे और गहराई से विचार भी करते थे। अपने ऐसे वास्तविक अच्छे नेताओं की परंपरा को छोड़ हम कीचड़ की होली खेलने लगे हैं गंदगी उछालते हैं। ऐसा कर अपने आप को ऊंचा नहीं उठा रहे गिर रहे हैं। 

       चुनाव कोई समय था त्यौहार से लगते थे दुश्मनी नहीं कोई जंग नहीं लगते थे। आपस की मर्यादा का उलंघन कोई नहीं करता था हमने सीखा हुआ था कमर से नीचे वार नहीं करना है। अब तो लगता है मुकाबला ही खुद को नीचे लाने का है उसने अमर्यादित भाषा उपयोग की हम गाली की भाषा से भी नीचे की बात करेंगे। मां बहन बाप दादा तक सभी को लेकर घटिया तरह की बातें क्या शोभा देती हैं देश की संसद का चुनाव किसी बस्ती की लड़ाई जैसा बन गया है। मगर इस सब में खोया क्या है ये विचार ही नहीं करते हैं। इक मंज़िल की तलाश थी ऐसा वातावरण बनाना था जिस में हर कोई भागीदार भी हो और अपने कर्तव्य निभाकर अधिकार भी हासिल कर सके। इक शायर 43 साल पहले दुनिया से रुक्सत हो चुका मगर उसका दर्द अभी भी सालता है। उनकी ग़ज़ल की किताब का शीर्षक ही समझने को काफी है। चलो साये में धूप , की बात करते हैं। पहली ग़ज़ल से शुरुआत करते हैं। 

दुष्यंत कुमार जी की ग़ज़ल और शेर :-

कहाँ तो तय था चिराग़ाँ हरेक घर के लिए ,
कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए।


यहाँ दरख्तों के साये में धूप लगती है ,
चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए।


न हो कमीज़ तो पाँवों से पेट ढँक लेंगे ,
ये लोग कितने मुनासिब हैं , इस सफ़र के लिए।


खुदा नहीं न सही आदमी का ख्वाब सही ,
कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिए।


वे मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता ,
मैँ बेकरार हूं आवाज़ में असर के लिए।


तेरा निज़ाम है सिल दे ज़ुबान शायर को ,
ये अहतियात ज़रूरी है इस बहर के लिए।


जिएँ तो अपने बगीचे में गुलमोहर के तले ,
मरें तो गैर की गलियों में गुलमोहर के लिए।


( काश हम सब इसी एक ग़ज़ल को समझ लें , और हर दिन याद रखें अपने पूर्वजों के सपनों को )
अब कुछ और शेर दुष्यंत की ग़ज़लों से :::::::


अब तो इस तालाब का पानी बदल दो ,
ये कँवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं।


कई फाके बिताकर मर गया जो उसके बारे में ,
वो सब कहते हैं अब , ऐसा नहीं ऐसा हुआ होगा।


कैसी मशालें लेके चले तीरगी में आप ,
जो रौशनी थी वो भी सलामत नहीं रही।


( क्या ये उनके लिए भी नहीं जो उजाला करने की बातें करने को आये थे और जो उम्मीद थी वो भी खत्म की )


ये रौशनी है हक़ीकत में एक छल लोगो ,
कि जैसे जल में झलकता हुआ महल लोगो।


किसी भी कौम की तारीख के उजाले में ,
तुम्हारे दिन हैं किसी रात की नकल लोगो।


वे कह रहे हैं गज़लगो नहीं रहे शायर ,
मैं सुन रहा हूँ हरेक सिम्त से ग़ज़ल लोगो।


( दुष्यंत के ये शेर जो अब सुनाने लगा बेहद ज़रूरी हैं याद रखना  )


हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए ,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।


आज यह दीवार परदों की तरह हिलने लगी ,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।


हर सड़क पर , हर गली में , हर नगर हर गाँव में ,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।


सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं ,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।


मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही ,
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए।


( मित्रो इस आग को अब अपने अपने सीनों में जलाना ज़रूरी है )


खामोश रह के तुमने हमारे सवाल पर ,
कर दी है शहर भर में मनादी तो लीजिए।


फिरता है कैसे कैसे सवालों के साथ वो ,
उस आदमी की जामातलाशी तो लीजिए।


हाथ में अंगारों को लिये सोच रहा था ,
कोई मुझे अंगारों की तासीर बताए।


रहनुमाओं की अदाओं पे फ़िदा है दुनिया ,
इस बहकती हुई दुनिया को सँभालो यारो।


कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता ,
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो।


कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए ,
मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिंदुस्तान है।


मुझमें रहते करोड़ों लोग चुप कैसे रहूँ ,
हर ग़ज़ल अब सल्तनत के नाम एक बयान है।


वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है ,
माथे पे उसके चोट का गहरा निशान है।


सामान कुछ नहीं है फटेहाल है मगर ,
झोले में उसके पास कोई संविधान है।


उस सिरफिरे को यों नहीं बहला सकेंगे आप ,
वो आदमी नया है मगर सावधान है।


वो आदमी मिला था मुझे उसकी बात से ,
ऐसा लगा कि वो भी बहुत बेज़ुबान है।


( चलो अब और आगे चलते हैं इस ग़ज़ल को पढ़ते हैं )


होने लगी है जिस्म में जुंबिश तो देखिए ,
इस परकटे परिन्द की कोशिश तो देखिए।


गूँगे निकल पड़े हैं ज़ुबाँ की तलाश में ,
सरकार के खिलाफ ये साज़िश तो देखिए।


उनकी अपील है कि उन्हें हम मदद करें ,
चाकू की पसलियों से गुज़ारिश तो देखिए।


( साये में धूप की आखिरी दो ग़ज़लें पूरी पढ़नी ज़रूरी हैं )


अब किसी को भी नज़र आती नहीं कोई दरार ,
घर की हर दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तहार।


आप बचकर चल सकें ऐसी कोई सूरत नहीं ,
रहगुज़र घेरे हुए मुरदे खड़े हैं बेशुमार।


रोज़ अख़बारों में पढ़कर ये ख्याल आया हमें ,
इस तरफ आती तो हम भी देखते फ़स्ले-बहार।


मैं बहुत कुछ सोचता रहता हूं पर कहता नहीं ,
बोलना भी है मना , सच बोलना तो दरकिनार।


इस सिरे से उस सिरे तक सब शरीके जुर्म हैं ,
आदमी या तो ज़मानत पर रिहा है या फरार।


हालते इनसान पर बरहम न हों अहले वतन ,
वो कहीं से ज़िंदगी भी माँग लाएँगे उधार।


रौनके जन्नत ज़रा भी मुझको रास आई नहीं ,
मैं जहन्नुम में बहुत खुश था मेरे परवरदिगार।


दस्तकों का अब किवाड़ों पर असर होगा ज़रूर ,
हर हथेली खून से तर और ज़्यादा बेकरार।


( चलिये इस अंतिम ग़ज़ल को भी पढ़ लें )


तुम्हारे पाँव के नीचे कोई ज़मीन नहीं ,
कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यक़ीन नहीं।


मैं बेपनाह अँधेरों को सुबह कैसे कहूँ ,
मैं इन नज़ारों का अंधा तमाशबीन नहीं।


तेरी ज़ुबान हैं झूठी जम्हूरियत की तरह ,
तू एक ज़लील सी गाली से बेहतरीन नहीं।


तुम्हीं से प्यार जताएं तुम्हीं को खा जायें ,
अदीब यों तो सियासी हैं पर कमीन नहीं।


तुझे कसम है खुदी को बहुत हलाक न कर ,
तू इस मशीन का पुर्ज़ा है , तू मशीन नहीं।


बहुत मशहूर है आयें ज़रूर आप यहाँ ,
ये मुल्क देखने के लायक तो है हसीन नहीं।


ज़रा-सा तौर-तरीकों में हेर फेर करो।
तुम्हारे हाथ में कालर हो आस्तीन नहीं।


( साये में धूप से साभार ) 


 


मई 21, 2019

POST : 1091 हमारे देश समाज का आदर्श मुहब्बत है नफरत नहीं है ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

 हमारे देश समाज का आदर्श मुहब्बत है नफरत नहीं है ( आलेख )

                                       डॉ लोक सेतिया 

    दौलत के पुजारी नहीं हैं हम हमने हमेशा सच्चाई अच्छाई ईमानदारी को सबकी भलाई को ही अपनाया है । गैरों को भी अपनाया हमने जो जिस से मिला सीखा हमने , हम उस देश के वासी हैं जिस देश में गंगा बहती है। गंगा जमुनी संस्कृति हमारी पहचान है जो भेदभाव की अलगाव की नफरत की बात करते हैं हमने कभी उनको अपना आदर्श नहीं बनाया है। कुछ बात है जो हस्ती मिटती नहीं हमारी सदियों रहा है दुश्मन दौरे जहां हमारा हम बुलबुलें हैं इसकी ये गुलिस्तां हमारा । सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तां हमारा इसी कारण है । शांति अहिंसा हमारे आदर्श हैं और हमारे नायक हमेशा लोक कल्याण की भावना को महत्व देने वाले लोग बने हैं । फिर ये कैसे हो रहा है कि कोई इन सभी आदर्शों के विपरीत आचरण करता है और ये भी चाहता है लोग उसको महान समझें या स्वीकार करें । बाकी सबको छोटा और खराब घोषित करने से कोई कैसे नायक बन सकता है उस समाज में जो मानता है बड़े होने पर विनम्रता आती है अहंकार नहीं और माफ़ करना गुण समझा जाता है बड़पन्न कहलाता है । देश के बड़े और जनता के दिल में बसे हुए नेताओं को लेकर तब जब उनका निधन हुए बड़ा अर्सा बीत चुका है सभ्यता को ताक पर रखकर अशोभनीय शब्दों का उपयोग करना क्या इसको अच्छे संस्कार कहा जा सकता है । आसमान की तरफ थूकने का अर्थ जानते हैं सभी लोग । कोई भी बड़ा और महान अपने अच्छे कामों से बनता है किसी को बुरा कहने से आप अच्छे नहीं हो सकते हैं । इस देश में अधिकतर समय सत्ताधारी विपक्ष को आदर देते रहे हैं और जब किसी ने ऐसा नहीं किया उस काल को इतिहास का काला अध्याय समझा जाता है । लेकिन आज बेहद खेदजनक बात होती है जब कोई विपक्ष को समाप्त करने की अलोकतांत्रिक बात कहता है ये भूलकर कि ऐसी सोच रखने वालों को देश कभी स्वीकार नहीं करता है । देश की एकता अखंडता सबसे अधिक महत्वपूर्ण है किसी व्यक्ति की महत्वाकांक्षा या फिर सत्ता की चाहत से बढ़कर समाज है संविधान है और सभी को समानता का जीने का विचार व्यक्त करने का बराबरी का हक भी है । नहीं विभाजित करने वालों नफरत की बात या सोच रखने वालों को देश पसंद नहीं करता है । जो ऐसा समझते हैं उनको इतिहास की धर्म की नैतिक मूल्यों की जानकारी हासिल करने ज़रूरी है । प्यार मुहब्बत भाईचारा हमारी पहचान भी हैं और हमारी महानता भी इन्हीं से है । भौतिकता की कीमत इनसे बढ़कर कदापि नहीं समझी जा सकती है । 
 

 

POST : 1090 अस्मत लुटवा बैठी अबला ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

      अस्मत लुटवा बैठी अबला ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

    जिस दुल्हन की डोली उठने से पहले ऐसा हादिसा हो जाये बेचारी रो भी नहीं सकती। खबर भी नहीं बाहर आती पर चेहरे की हवाईयां उड़ी हुई समझा देती हैं। लागा ईवीएम गायब होने का दाग़ छुपाऊं कैसे निष्पक्ष चुनाव करवाऊं कैसे। धुआं उठता है तो आग लगने का सबूत समझते हैं बिना आग धुंआ नहीं उठता कभी। पर हम लोग भी कमाल हैं मुझे क्या सबको लगता है कौन किसी के फटे में टांग अड़ाए। चलो दिल लगाने को फ़िल्मी बातें करते हैं। साधना फिल्म का गीत औरत ने जन्म दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया कोई नहीं गाता सुनता जब मामला मीटू तक चला आया है। चुनाव आयोग इस खबर की पुष्टि कैसे करता कि बहु बेग़म फिल्म की तरह ईवीएम निकाह की रात अर्थात चुनाव से पहले गायब हो गई। नवाब साहब की हवेली डोली पहुंची तब ननद ने देखा डोली खाली है और सब नौकरानियों को उस कमरे से निकाल दिया ये कहकर कि भाभी जान गर्मी से बेहोश हो गई हैं। नवाब साहब की इज़्ज़त की लाज रखनी थी किसी कोठे से नाचने वाली को ले आये पैसा पास हो तो सब मुमकिन है। उनका भी कहना है उनके लिए सब मुमकिन है जनता खिलाफ भी हो जीतना मुमकिन है। ये कमाल फिल्मी होता रहा है कि घर से शादी की रात भागी नायिका किसी कोठे पर पहुंचती है और जिस घर दुल्हन बनकर पहुंचना था कोठे वाली बनकर पहुंचती है। पहुंची उसी जगह मगर गलत ढंग से उस रास्ते से जो बदनाम गलियों से जाता है। 

     मीनाकुमारी तब भी पाकीज़ा रहती है आशिक़ की बेटी की मां बनने वाली होती है और खुद ही कब्रिस्तान चली जाती है ज़िंदा लाश की तरह। दस्तक फिल्म की नायिका बेहद शरीफ है मगर रहने को घर मिलता है बदनाम गली में और हर कोई चला आता है खरीदार बनकर।  हम हैं मताये कूचा ओ बाज़ार की तरह उठती है हर निगाह खरीदार की तरह। मजरूह लिख रहे हैं वो अहले वफ़ा का नाम , हम भी खड़े हुए हैं गुनहगार की तरह। ये बातें फ़िल्मी हैं और पुराने ज़माने की हैं जब अस्मत लुटने पर लूटने वाले का नहीं जिसकी अस्मत लुटी उसी का दोष समझते थे चुप चाप हादिसे को भुला देते थे अगर हर कोई सामने आकर अपराध दर्ज करवाता तो जाने कितने शरीफ लोग बेआबरू हो कर निकलते घर से। बेदाग़ कोई नज़र नहीं आता मुमकिन है।  हम तो अपने गुनाहों को ढकने को कविता लिखते हैं गीत लिखते हैं औरत तेरी यही कहानी अंचल में है दूध आंखों में पानी। 

       चुनाव ही गया नतीजा जो भी हो चुनाव आयोग के घर से जो आवाज़ेंसुनाई दे रही हैं उनसे लोग हैरान हैं समझदार कहते हैं उनका आपसी झगड़ा है आपको कोई हस्ताक्षेप नहीं करना चाहिए। देश की व्यवस्था लोकतंत्र की अस्मत संविधान की मर्यादा की लाज को यूं चुप रहकर लुटता नहीं देखा जा सकता है। माना आजकल कुंवारी लड़की कुंवारी हो इसकी चिंता कोई नहीं करता है जब खुद लड़के ही एक नहीं जितनी पट सकती हैं गर्ल फ्रेंड बनाते हैं मगर बूथ कैप्चर करना और ईवीएम गायब होना बराबर नहीं हैं। क्या कहते हैं उनके पास कोई पर्स ही नहीं है झोला भी खाली है कोई आगे न पीछे क्या करना है लूट कर। कोई सबको ऐसी नौकरी दे दे तो हर कोई चौकीदारी को तैयार है। विदेश जाना है शानो शौकत से बादशाह की रहना है हर सुख सुविधा हाज़िर है कोई जहाज़ तैयार है हेलीकॉप्टर भी कारों का काफिला साथ सुरक्षा भी खाने पहनने को रईसी से बढ़कर उपलब्ध है जेब में पर्स करना क्या है। अब युग ऑनलाइन का है किस बैंक में किस का कितना धन है सब गुलाबी है। 

      अब इस पर जितना कम लिखा जाये अच्छा है। आगे से उठाओ तो भी पीछे से हटाओ तो भी नंगा खुद को करना है ढका रहने दो पर्दा है पर्दा है। पर्दा जो उठ गया तो भेद खुल जाएगा। बस आखिर में इक पुरानी कहावत याद आती है जो ये है। राजनीति और वैश्यावृति दुनिया के दो सबसे पुराने पेशे हैं और दोनों में बहुत समानताएं हैं। कोई जिस्म बेचता है कोई ईमान बेचता है कोई है जो हर सामान बेचता है , खरीद लो सारा जहान बेचता है। इंसान भी खरीदता बेचता रहता है बिकने लगा है तो अपना भगवान बेचता है। तू क्या ए दिले नादान बेचता है बिकता नहीं दर्द का वो सामान बेचता है।

मई 20, 2019

POST : 1089 शोले - 2 का पहला शो ( हास - परिहास ) डॉ लोक सेतिया

    शोले - 2 का पहला शो ( हास - परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

   शोले फिल्म दो बनकर तैयार है , पहला शो फिल्म को दर्शकों को दिखाने से पहले ख़ास लोगों और मीडिया वालों के लिए होता ही है। सब अपने शामिल होते हैं और हर फिल्म की सफलता की कामना की जाती है। अख़बार टीवी पर फिल्म को लेकर जानकर लोग राय दिया करते हैं ताकि लोग दर्शक ताली बजाने को खेल तमाशा देखने चले जाएं आखिर फिल्म आम दर्शक के मनोरंजन को बनाई जाती है। असली मकसद कमाई का है इसलिए आजकल उपदेशक या संदेशक तरह की फिल्म कोई नहीं बनाता है हर कोई मौज मस्ती नाच गाने और आईटम सांग सब शामिल करता है हर किसी का ख्याल रखने को। बात राजनीति जैसी है जाति धर्म देशभक्ति भड़काना झूठ का गुणगान सब की इजाज़त है। नायक गब्बर सिंह ही है ऐसा बता रहे हैं अब गब्बर इस बैक की बात है तो गब्बर को खलनायक नहीं कहा जा सकता महानायक बता रहे हैं। कहते हैं रामगढ़ वालों ने समझ लिया है गब्बर से बचने का कोई उपाय नहीं है गब्बर को वोट देना ही एक ही रास्ता है। 

   बसंती पहले से ही गब्बर की नर्तकी बन गई है उसको गब्बर के सामने नाचना अच्छा लगता है गब्बर उसकी कला का सच्चा पारखी है। ठाकुर के हाथ भी काट दिए थे इस बार पांव भी काटने ज़रूरी थे अब जूते भी नहीं पहन सकेगा तो गब्बर का कुछ भी नहीं बिगड़ने वाला है। जय और वीरू भी ठाकुर के लिए काम नहीं करते हैं गब्बर से उनको ज़्यादा पैसा मिलता है तो उसकी महिमा का बखान करते हैं रामगढ़ वालों को समझाते हैं इतना भलामानुष डाकू कोई नहीं हुआ है आज तक। गब्बर गब्बर सबको बोलने को कहते हैं गब्बर के नाम की धूम मची है। फिल्म की कीमत का कोई अंदाज़ा नहीं है इक गब्बर के किरदार पर ही करोड़ों का खर्च किया गया है। फिल्म आने से पहले अधिकार बिक जाते हैं अब तो बनाने वाले को घाटा नहीं होता है कमाई ही कमाई है। लोग छोटे मोटे जेबकतरों को नहीं गब्बर जैसे डाकू को पसंद करते हैं हास्य अभिनेता भी गब्बर के भाई बंधु बन चुके हैं। कहानी बदल चुकी है नर्क को स्वर्ग का नाम दे दिया है गब्बर सिंह ने। अब लोग मरना नहीं चाहते स्वर्ग जाने को जीने को नर्क को स्वीकार कर लिया है ऐसा मीडिया वाले समझा रहे हैं। नेता जी इतिहास बदलने चले थे लेकिन वही पुराना इतिहास दोहरा रहे हैं कलयुगी  रामायण लिखी जा रही है राम कथा सुनाने वाले रावण की स्तुति गा रहे हैं लोग झूम रहे हैं ताली बजा रहे हैं। सरकार इधर चले आ रहे हैं। 

        दर्शक का हाल क्या होगा देखना है कमाल क्या होगा जनता की धोती वही फ़टी हुई है सत्ता का रेशमी रुमाल क्या होगा। धमाल के बाद धमाल होना है और बढ़कर धमाल क्या होगा। बता मेरे लाल क्या होगा , कालिया खामोश है कितने आदमी थे का कोई जवाब नहीं देता है। गब्बर सिंह की अदा पे हर कोई फ़िदा है मारता भी है तो हंसी ठठा करते हुए जिसको कत्ल करना है पहले खुश करता है बच गये साले तीनों बच गये भाषा अच्छी लगने लगी है। होली पर गाली अच्छी लगती है हर कोई खैरात मांगता है गब्बर को सबकी झोली खाली अच्छी लगती है। ताली बजाते रहो ज़िंदा रहना चाहते हो अगर उसको ताली अच्छी लगती है। घरवाली घर पर है कुछ नहीं बोलती जो घरवाली अच्छी लगती है। गब्बर ने बहुत विकास किया है अपने लिए शानदार अड्डा नया बनवा लिया है गब्बर का संदेश रोज़ आता है व्हाट्सएप्प पर लतीफे सुनाता है। ये गब्बर अच्छा है क्या शान से रहता है क्या अंदाज़ से डराता है हर किसी को सपने में आता है। गब्बर का बसंती से बहुत अच्छा नाता है बसंती हुई गब्बर की दीवानी है क्या कमाल की ये कहानी है। देखने वालों का हाल क्या होगा इससे बढ़कर कमाल क्या होगा हाल बेहाल हुआ है बढ़कर  बदहाल क्या होगा।

मई 19, 2019

POST : 1088 चिंतन की चिंता का चिंतन ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

     चिंतन की चिंता का चिंतन ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

    पहले इक पुरानी बोध कथा सुनते हैं । इक साधु सफर पर था और रास्ते में इक गांव पहुंचा तो ध्यान आया इक संगी साथी साधु दोस्त रहता है यहीं । उसकी कुटिया पहुंच कर किवाड़ की सांकल को बजाया तो भीतर से आवाज़ आई कौन है । मैं हूं साधु ने जवाब दिया और समझा दोस्त है आवाज़ से पहचान लिया होगा मगर कुछ देर बाद भी दरवाज़ा खुला नहीं तो फिर से सांकल बजाई और दोबारा भीतर से वही सवाल किया गया कौन है । इस बार सोचा यार ने आवाज़ नहीं पहचानी लगता है इसलिए जवाब दिया मैं हूं अपना नाम लिया जो भी रहा होगा । किवाड़ तब भी नहीं खुला मगर साधु को समझ नहीं आया ऐसा क्या है जो मुझे आवाज़ से नहीं नाम से भी नहीं पहचाना दोस्त ने । रात भर इंतज़ार करता रहा मगर दरवाज़ा बंद रहा रात भर । भोर हुई तो भीतर से साधु बाहर निकला अपनी आदत के अनुसार और तब फिर बाहर इंतज़ार करते रहे दोस्त ने कहा भाई क्या बात हुई अपने किवाड़ खोला नहीं । साधु दोस्त ने कहा तुमने क्या कहा था मैं हूं यही कहा था ना । अब बताओ क्या तुम हो इतना जानते हो सिर्फ वही एक है भगवान ईश्वर खुदा अल्लाह फिर कोई और कैसे कहता है मैं हूं और जिसको लगता है मैं हूं भला उसको किसी और के घर दर पर आने की ज़रूरत क्या है । 

कहते हैं कोई कितने सालों से चिंतन करता है । चिंतन अपने आपको खोजना है खुद को समझना होता है और संत महात्मा रात भर जागते हैं चिंतन करते हैं । चिंतन आपको दुनिया की मोह माया से अहंकार से किसी से बैर करने से छुटकारा दिलवाता है आपको कोई अपना बेगाना नहीं लगता है कुछ पाने की चाह नहीं रहती कुछ खोने का डर नहीं रहता है । आजकल कुछ लोग चिंतन शिविर लगाते हैं उनके अनुसार सब करना होता है और इक राशि भी चुकानी होती है । ये चिंतन इक कारोबार है वास्तविक चिंतन आपको अकेले अपने आप करना होता है और अकेले होने को कोई जगह नहीं तलाश करनी होती न किसी तरह का आडंबर करना होता है । चिंतन घोषणा कर साहूलियत को देख कर नहीं किया जा सकता है जब किसी को कहीं जाकर चिंतन करना हो तब अपने सभी धंधे काम काज छोड़ जाना होता है । अपने सुना तो होगा कोई राजा राज को त्याग कर चिंतन को चला गया कभी कोई राज पाने को चिंतन करने नहीं जाता सुना होगा । चिंता से मुक्त होने को चिंतन है या मुक्ति की चाह में चिंतन करने चले हो पहले जान तो लो । चिंतन सभी बंधनों से मुक्त होकर खुद को समझने को किया जाता है ऊपर वाले को पाने को चिंतन नहीं किया जाता ये आर्ट ऑफ़ लिविंग वाले लिखते हैं किताब पढ़ लेना और साथ बताया है पढ़ने से नहीं चिंतन किया जाता है सबको छोड़ अपने साथ रहने से । भागने का नाम चिंतन नहीं है जब कोई भाग जाता है और लौटकर कहता है चिंतन करने गया था । कई साधु संत चिंतन करने की बात करते करते चिंतन सिखाने वाले आध्यात्मिक गुरु बन जाते है उसके बाद भगवान होना चाहते हैं । ऐसे चिंतन को चिंतन नहीं कहते हैं चितन अपने को बड़ा नहीं समझने देता चिंतन से जानते हैं हम बेहद छोटे हैं कोई अस्तित्व नहीं है वास्तव में जैसे समंदर में इक बूंद का भी नहीं बुलबुले का सा वजूद है । बस इतना सा है चिंतन का सफर पानी करा बुदबुदा अस मानस की जात नानक जी कहते हैं । 

 

POST : 1087 किसके नाम की माला जपी है ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

    किसके नाम की माला जपी है ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

        खड़े हुए हैं अदालत में गुनहगार की तरह। धर्मराज बही-खाता देख कर हैरान हैं ये कैसे लोग हैं इनको इंसान बनाकर कितना सुंदर जीवन दिया था व्यर्थ गंवा कर वापस लौटे हैं। कीड़े मकोड़े पशु पक्षी भी ऐसे नहीं जीते सोच समझ होते भी दिमाग से काम नहीं लिया और पापी नेताओं का नाम जपते रहे कोई अच्छा नाम नहीं लिया। अपने अच्छे बुरे कर्मों का फल तो मिलना ही है झूठ की जयजयकार करने का सत्ता के भूखे लोगों को मतलबी और कपटी लोगों का गुणगान करने का महापाप किया जीवन भर उसकी भी सज़ा मिलनी है। तुम अंधे नहीं थे आंखें मिली थी सोचने को दिमाग भी मगर तुमने पागलपन में ज़िंदगी बर्बाद कर दी। आजकल कोई आशिक़ भी माशूका का नाम रात दिन नहीं रटता है जब मिले जानू जानम कहता है बाकी दिन भर मस्त रहता है। वास्तविक नाता केवल फोन से है पल भर भी दूरी सही नहीं जाती ये व्यथा कही नहीं जाती।      

 जो भी कोई कहता है मान लेते हैं , खुद अपने कत्ल का सामान लाते  हैं। हम नहीं वो लोग जो रखते हैं दिल दिमाग कोई , जो बदलते हैं दुनिया को जब ठान लेते हैं। वक़्त क्या ज़िंदगी बिता देते हैं बेकार हम मसीहा मानते हैं उन्हीं को जो हमारी जान लेते हैं। तुलसीदास को पत्नी का ताना शिक्षा दे सकता है हम किसी के चाहने वाले बनकर नाहक आपस में लड़ते हैं ढैंचू ढैंचू कहते हैं। देखो ओ दीवानों तुम ये काम न करो आदमी हो आदमी बनकर जिओ चाटुकार बनकर बदनाम इंसान का नाम न करो। 
 
          पागल कौन है कैसे बताया जाये पागल सभी खुद हैं मगर पागल बनाते हैं औरों को। पागल होने की निशानी यही है कि वो सामने असली दुनिया को नहीं देखता और पागलपन में इक अपनी दुनिया बनाकर उसी को वास्तविकता समझता है। हम लोग वास्तविक समाज से बचकर स्मार्ट फोन की झूठी बनावटी दुनिया में जीते हैं और मनोरंजन को बड़ा मकसद समझते हैं। क्या इसको समझदारी कह सकते हैं या फिर इक पागलपन छाया हुआ है। सबसे पहले उनकी बात करते हैं जो हमारे जीवन को प्रभावित ही नहीं करते बल्कि जिनको हम सब को असली समाज की तस्वीर दिखानी थी लेकिन वो वास्तविकता से बचते हुए इक काल्पनिक दुनिया को देखते और दिखलाते हैं। टीवी चैनल खबर मनोरंजन के नाम पर जिस दुनिया की बात करते हैं देश की तीन चौथाई आबादी से उसका कोई लेना देना नहीं है। फिल्म टीवी सीरियल जाने किस समाज की कैसी कहानियां और संगीत या शो दिखलाते हैं जो हमारी आस पास की दुनिया से मेल नहीं खाता है। सच नहीं है सब झूठ ही झूठ है मगर इस झूठ के सामान को बेचकर ये टीवी चैनल और फ़िल्मकार अभिनय करने वाले मालामाल हो रहे हैं। अर्थात उनको समाज को सच नहीं दिखाना मार्गदर्शन की तो बात ही क्या बस कमाई करनी है चाहे किसी भी तरह से हो। ऐसा लगता है कुछ लोग जो किसी तरह इक आरामदायक जीवन जी रहे हैं उनको बाकी समाज जो साधनविहीन है को लेकर कोई चिंता नहीं है। क्या अपने ही देश के लोगों के लिए ऐसी उदासीनता उचित है। समझा जाये तो हम पागल बन गये हैं और पागलपन पाकर खुश भी हैं।

     हमारी शिक्षा में कुछ खोट ज़रूर है जो हमें सोचने समझने भला बुरा क्या है इसका बोध कराने के किसी काम नहीं आती है। हम आंखें होते हुए भी देखते नहीं हैं परखते नहीं अंधविश्वास करते हैं और भेड़चाल के आदी हैं। पढ़ लिख कर देश की समाज की भलाई की बात की चिंता नहीं करते बस खुद अपनी चिंता रहती है। जो शिक्षा आपको अच्छा इंसान नहीं बनाती केवल इक मशीन बना देती है पैसे कमाना अपने खुद को लेकर सोचना समझना समाज और देश की कोई चिंता नहीं भले कुछ भी होता रहे हमें क्या लेना देना , ये विचार किसी शिक्षित के नहीं कूप मंडूक के लगते हैं। बहुत बातें की जाती हैं आधुनिक शिक्षा महंगी और जाने क्या क्या सिखाती है नहीं सिखलाती तो आदमी बनकर अच्छे इंसान की तरह रहना। केवल अपने मतलब को समझने समझाने वाली पढ़ाई किसी काम की नहीं है। अंक शत प्रतिशत हासिल किये मगर चाल चलन और आचरण वही रहता है स्वार्थ सिद्ध करने को सब करने को राज़ी हैं। शायद वो अनपढ़ लोग ज़्यादा अच्छे थे जो सही को सही गलत को गलत कहने का मादा रखते थे। हम लोग तो राम नाम जपना छोड़ ऐसे इंसानों के नाम की माला जपते हैं जो अच्छे इंसान भी बन नहीं पाए हैं। किस किस शैतान का नाम सुबह शाम लेते हैं हम कभी सोचा है।

POST : 1086 संकुचित स्वार्थ और झूठ फरेब की राजनीती ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

      संकुचित स्वार्थ और झूठ फरेब की राजनीती ( आलेख ) 

                                        डॉ लोक सेतिया

       आज जब देश में संसद का चुनाव आखिरी दौर तक पहुंचा चुका है तब ये हैरान करने वाली जानकारी सामने आई है कि मोदी जी ने सत्ता मिलने के कुछ ही महीने बाद चुपके से ख़ामोशी से चुनाव आयोग का नियम ही बदलवा लिया था । आजकल के आधुनिक सोशल मीडिया और व्हाट्सअप्प की पढ़ाई से ज्ञान पाने वालों को जिनको कोई खेल की जीत हार या कोई दौड़ अथवा तिरंगा लहराना आई लव माय इंडिया कहना ही देशभक्ति लगती है और जिनको देश की गरीबी से लेकर वैचारिक शून्यता तक से कोई मतलब नहीं है उनको बीते इतिहास की बात पढ़ना क्या सुनने की फुर्सत नहीं न ही ज़रूरत लगती है । जब कोई दल गांधी जी के कातिल को देशभक्त बताने वाले आतंकवादी घटना के आरोपी को दल का उम्मीदवार बनाता है और देशभक्ति की अपनी परिभाषा बनाना चाहता है जिस में धर्मं के नाम पर हिंसा की जा सकती है और वोटों की गंदी राजनीति लोगों को विभाजित करने का काम कर देश को बांटती है तब खामोश रहना देश के लिए कर्तव्य को भुलाना है । आज आपको इतिहास की कुछ घटनाओं को याद करवाते हैं ।

         12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायलय ने तब की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का चुनाव अवैध घोषित कर रद्द करने के साथ उनको अगले छह साल तक चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित कर दिया था । कारण था चुनाव में सरकारी मशीनरी का दुरूपयोग करना जब खुद पद पर रहते वो किसी सरकारी कर्मचारी की ही तरह वेतन पाती थी । किसी को इसकी उम्मीद नहीं थी और ये इक मील का पत्थर है न्यायपालिका की निष्पक्षता साबित करता हुआ साहसपूर्वक निर्णय था । जो व्यक्ति  काला धन भ्र्ष्टाचार और सत्ता का दुरूपयोग की बात करते हुए ईमानदारी का दावा करते हुए सत्ता पाता है वो अगर सत्ता मिलते ही चुनाव आयोग का नियम कानून ही इक नोट भेजकर चंद घंटों में बदलवा लेता है और नया नियम उसके चुनावी दौरों के खर्च को उसके दल का खर्च नहीं मानता और इसका बोझ जनता पर पड़ता है उसको कोई भी उचित नहीं कह सकता है । अर्थात पिछले चार साल तक मोदी जी अपने दल के चुनाव पर सभाओं पर बेतहाशा धन देश के खज़ाने से लुटवाते रहे हैं । चोरी रोकना नहीं इसको डाका डालने का अधिकार खुद ही हासिल करना समझना होगा । और ये खबर कोई आपको इतने समय तक नहीं देता  है । जब खबर देने वाले सत्ता का गुणगान करने और अपना घर भरने में लगे हों तब सच की चिंता कौन करता है । जबकि  ये नियम गलत है और भेदभावपूर्ण ही नहीं जनता के धन और सरकारी खज़ाने की लूट है जैसा लगता है तो ऐसे करने वाले को देश की भलाई करने वाला नहीं कहा जा सकता है । उस निर्णय के अनुसार पिछले जितने चुनाव हुए जिन में ये मनमानी की गई उनकी वैधता निष्पक्षता शक के दायरे में आती है । सत्ता पाने को कुछ भी करना देशभक्ति कदापि नहीं कहला सकता है । काला धन की बात छूट गई है और चुनाव पर करोड़ों रूपये बर्बाद ही नहीं किये जा रहे बल्कि सत्ता धनबल का खेल बन गई है । सबसे मालामाल दल किस तरह से ईमानदारी की बात कर सकता है क्या उनके ऊपर धन की सोने चांदी की बरसात यूं ही होने लगी है ।

     बात निकली तो पता चला है कि चुनाव आयोग भी बंटा हुआ है और सत्ताधारी नेताओं के अनुचित आचरण पर ऐतराज़ करने वाले की बात असहमति को दर्ज नहीं किया जाता है । किस बात की पर्दादारी है और जिस तरह मोदी जी ने वंशवाद परिवारवाद की आलोचना की उस से भी अधिक खतरनाक हर पद पर अपने पसंद के लोगों को नियुक्त करते जाना रहा है जो आज व्यक्तिवाद तक पहुंच गया है जो देश के संविधान और लोकतंत्र को निरर्थक बना सकता है। शायद ऐसे में आज इक जाने माने इतिहासकार रामचंद्र गुहा जी का इक अख़बार में छपा लेख बहुत सामयिक है उसके कुछ अंश पढ़ कर समझते हैं पहले प्रधानमंत्री नेहरू और आज के प्रधानमंत्री मोदी में ज़मीन आसमान का अंतर है । आपको कौन अच्छा लगता है ये आपके विवेक पर है । अमर उजाला के लेख से अंश इस तरह हैं ।


                                      नहरू का पहला चुनाव अभियान 

 पंजाब में चुनावी सभा में भाषण दे रहे थे तब प्रधानमंत्री जवाहरलाल जी ,  जब उन्हें पता चला कि उनके बाद समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण पंजाब का दौरा करने वाले हैं , तो उन्होंने श्रोताओं से कहा , मैं आपको सलाह दूंगा कि आप जाकर उन्हें सुने । कई चीज़ों में मैं शायद उनसे सहमत न हूंगा । लेकिन वह एक शानदार व्यक्ति हैं । 
 
    आज ये सुनकर कोई यकीन नहीं करेगा कि इस देश में ऐसे लोग थे जो अपने विपक्षी धुर विरोधी का भी आदर करते थे । और ऐसी घटनाएं बहुत हैं , आज खुद को महान साबित करने को आपके पर असंसदीय भाषा है बाकी सबको खराब बताने से अपशब्द कहने की क्या इनको अच्छे संस्कार और महानता की निशानी कहते हैं । ज़रा उस भाषण की बात को भी याद करते हैं । उन्होंने सभा में मौजूद लोगों को " भयावह सांप्रदायिक तत्वों " के प्रति आगाह करते हुए कहा कि वे देश में बर्बादी और मौत ला सकते हैं । उन्होंने आग्रह किया कि दिमाग की खिड़कियां खोलें और दुनिया के हर कोने से ताज़ी हवा आने दें । एक और भाषण में उन्होंने कहा था कि जो व्यक्ति सांप्रदायिक सोच वाला होता है वह छोटा व्यक्ति होता है जो कि कोई बड़ा काम नहीं कर सकता है ऐसे तुच्छ सिंद्धांतों पर आधारित देश भी छोटे हो जाते हैं। सांप्रदायिक संगठन बीमार भावनाएं फैला कर भारी नुकसान कर रहे हैं । नेहरू ने अपने भाषण में कहा कि मैं अन्य दलों का ज़िक्र करता हूं लेकिन सिर्फ सिद्धांतों के सवाल पर । मैं उन्हें व्यक्तित्व के दृष्टिकोण से नहीं देखता। वह वैसा ही कुछ कहना चाहते थे जैसा कि अब्राहम लिंकन ने एक बार नैतिक रूप से मज़बूत और साकारात्मक दृष्टिकोण वाला समाज बनाने की बात कही थी । लेखक अंत में लिखते हैं पाठक चाहें तो नेहरू के भाषणों के स्वर और विषयवस्तु की तुलना आधुनिक नेताओं के भाषण से कर सकते हैं । लेखक लिखते हैं कि मैं तो केवल अनुमान लगा सकता हूं कि आज से पचास साठ साल बाद कोई भी इतिहासकार यह दर्ज नहीं करेगा कि 2019 के चुनाव में किस किस नेता ने क्या कहा था ।

       हैरानी हुई कुछ लोग चुनाव आयोग या अन्य संस्थाओं की गिरती साख और उनको अनुचित ढंग से इस्तेमाल करने के सवाल पर कहते हैं विपक्ष हार को देख कर ये कह रहा है । ये कमाल है अभी वोट मशीनों में बंद हैं और आपको नतीजा भी मालूम है क्योंकि ये पहले से समझते हैं बेशक कोई लाख झूठा साबित हो उसके दावे खोखले साबित हों तब भी देश को उन्हीं को चुनना होगा मज़बूरी है । ये किस मानसिकता के लोग हैं जिनको देश संविधान से बड़ा कोई नेता लगता है । जो लोग कोंग्रेस में नेहरू को प्रधानमंत्री बनाने की बात पर ऐतराज़ जताते हैं और पटेल या और कितने नाम लेते हैं उनको अपने दल में कोई दूसरा क्यों नज़र नहीं आता है और अब तो दल की नहीं इक व्यक्ति की सरकार की बात करते हैं । ये दोहरे मापदंड वाले लोग कभी अपने भीतर झांक कर नहीं देखते हैं । औरों पर पत्थर फेंकने वालों को अपने शीशे के घरों की चिंता करनी चाहिए । सबको नसीहत खुद मियां फ़ज़ीहत जैसी बात लगती है । 
 
 

मई 17, 2019

POST : 1085 मैं गरीब राजा ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

             मैं गरीब राजा ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया         


      ऐ मेरे प्यारे देशवासिओ अपनी आंखों में भर लो पानी ।  इक गरीब राजा की सुनो मुझसे कहानी । मैं बहुत गरीब था मेरा देश बहुत अमीर था सोने की चिड़िया क्या लंका थी सोने की । मैंने कई साल तक भीख मांगी गुज़ारा करने को पेट भरने को । पढ़ाई काम धंधा ये ज़रा टेड़ा सवाल है जो पढ़ा याद नहीं जो किया भूल गया । बस जैसे भाग्य खुलता है लॉटरी लगती है सब अमीर लोगों ने रईस लोगों से भूखे नंगे लोगों तक सभी ने मुझे इतनी भिक्षा डाली इतनी खैरात मिली कि मैं देश का सबसे अमीर बन गया ।  सब लोग मुझे राजाजी कहकर बुलाते हैं मगर मैं खुद को अभी भी गरीब बतलाता हूं क्योंकि मुझे अभी भी लगता है मुझे और अधिक चाहिए , समझता खुद को शहंशाह महाराजा हूं पर दुनिया पर राज करने की चाहत है । अपने ठीक समझा है सिकंदर की तरह की हालत है मगर मुझे उसकी तरह दुनिया से खाली हाथ जाना नहीं है मुझे अमर होना है अमृत कलश की तलाश है मिलेगा किसी और को इक बूंद नहीं दूंगा जी भर का अकेले पीना है ।

      गरीबी क्या होती है मैं ही जानता हूं , अमीरों को देखता था तो क्या मन करता था बता नहीं सकता । मन की बात कभी कही नहीं रेडिओ पर भी मन की बात के नाम पर बेमन की बात करता रहा हूं । मेरी गरीबी मिट गई मगर अपनी कमाई से नहीं हर किसी से चंदा लेकर अमीर बनकर भी अमीरी का एहसास नहीं आया । लगता है जाने कब सब मुझसे दी हुई खैरात वापस मांग लेंगे । भला कोई भिक्षुक मिली भिक्षा वापस देता है कोई मांगता ही नहीं मगर मैंने भीक ली ही छल कपट झूठ से है तभी लगता है कोई मुझसे मेरी तरह सब छीन सकता है । देश में मूर्खों की कमी नहीं है गरीब को इतना देते हैं मांगने पर कि अमीर बना देते हैं फिर उसी से उम्मीद करते हैं गरीबों की भलाई करेगा । अमीर बनकर अमीरों जैसा बन गया हूं पहले अमीरों को देख का जो सोचता था आजकल गरीबों को देखते ही विचार आता है इनका होना क्या ज़रूरी है । मगर है ज़रूरत इनकी क्योंकि झौंपड़ी सामने नज़र आती है तभी महल की ऊंचाई और शानो शौकत समझ आती है ।

    कल इक साधु मिला था सपने में वास्तव में असली संत मुझसे मिलने क्यों आएगा । कहने लगा तुम पहले राजा हो जो बाहर से महंगी पोशाक और सज धज से रईसों से भी बढ़कर दिखाई देते हो जबकि भीतर बदन वही गरीब वाला है दिल गरीब से भी छोटा है गरीब भी आधी रोटी किसी को दे देता है तुम इतना खाकर भी भूखे के भूखे ही रहते हो । ये जाने क्या रोग है मेरी भूख जितना मिलता है खाता जाता हूं मगर दिल भरता नहीं और खाने को करता है । रात रात भर जागता रहता हूं देश भर से भिक्षा मिलती है बार बार भर पेट खाकर भी रहता भूखा का भूखा ही हूं । ये कुर्सी मिली हुई है जो अनपूर्णा की तरह सबको देती है इसको रात दिन जकड़े रहता हूं कोई मुझसे इसे छीन नहीं ले जाये डर सताता है । मुझे गरीब से राजा होना आया है फिर से राजा से गरीब होना नहीं आता मुझे । भले मैं दुनिया का सबसे गरीब हूं ऊपर वाले की नज़र में मगर मुझे राजाजी कहलाना पसंद है गरीब कहता रहता हूं मानता नहीं कोई कह नहीं सकता । मैं गरीब राजा हूं । मैंने जनता को सपना दिखलाया था जनता को समझ नहीं आया था अधिकांश लोगों को मैंने खैरात पर निर्भर होना सिखला दिया है आत्मनिर्भरता का अर्थ बदल कर हाथ फैलाना सिखला दिया है । लेकिन आज भी खुद मेरे हाथ में वही कटोरा है जो जितनी भी भीख मिलती है तब भी भरता नहीं खाली रहता है । जिस देश का राजा खुद भिखारी हो उसका भविष्य क्या वर्तमान क्या है कितनी निराली शान क्या । 

गरीब राजा की कहानी | Hindi Kahaniya | Poor King Hindi Kahani | Moral  Stories | Hindi Fairy Tales

मई 14, 2019

POST : 1084 परियों की खोज से भूतों पर शोध ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

    परियों की खोज से भूतों पर शोध ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

      इसे मोदीनामा नाम देना चाहता हूं । जो कहना नहीं चाहिए कहना चाहता हूं । बस इसी देश रहना चाहता हूं कुछ सितम सभी दुनिया के सहना चाहता हूं । होटों पे ऐसी बात मैं दबा के चली आई खुल जाये वही बात तो दुहाई है दुहाई । कोई नहीं जान पाया उनका मकसद क्या है उनको नया कुछ कर दिखाना था । स्वर्ग की परियों को ज़मीं पर लाना था परियां किस जहां में रहती हैं पता ठिकाना ढूंढ़ना था । घर से चले थे हम तो ख़ुशी की तलाश में ग़म राह में खड़े थे वही साथ हो लिए । बस परियां तलाश करने चले और भूत मिल गए तो पहले उन पर ही शोध करने की बात सोच ली । मन का वहम है कि हक़ीक़त है साबित करना था । देश के भूत वही थे उनसे नया कुछ हासिल होना कठिन था इसलिए पचास देशों की सैर की और हर देश की सरकार से यही सहयोग मांगा अपने अपने भूत का इक सैंपल दे दो शोध करना चाहता हूं । शोध का विषय सबको भाया मेरा जादू दुनिया भर में छाया । 

      वो पढ़ने वाला भी पढ़ाने वाला भी स्कूल कॉलेज भी पढ़ाई भी खुद वही । भूत भी उसकी चिकनी चुपड़ी बातों में आते गए उसके नाम के भूत लोगों के सर चढ़ जाते रहे । भूत या किसी के सर चढ़ जाता है या किसी को डराता है । बस यही काम उसको भी आता है तभी दो हिस्सों में बांटने वाला शख्स बन जाता है । बात परियों की कथा की थी भूतों की कहानी बनती गई और शीर्षक मिला डरना मना है जीने की इजाज़त नहीं है और मरना भी मना है । ये साबित किया जा चुका है भूत सच है उसका भूत जनता को भयभीत भी करता है और बचने को उसी का नाम भी जपता है । जब तक भूत भागता नहीं परियां नहीं आने वाली हैं । 

    कोई भूत भगाने वाला आया है उसने मंत्र समझाया है आपको उसका जाप करना है । ये नहीं सोचो पुण्य करना या पाप करना है बस किसी से करवाना नहीं अपने आप करना है । आप भी ठीक से याद करो दस दिन नियमित रात दिन इसी का जाप करो । शब्द जैसे लिखे हैं वही पढ़ने हैं ए ये का ध्यान रखना है । 

                जाएगा , जायेगा , जायेगा , जाएगा जाने वाला जाएगा । 

                                   108 बार माला जपनी है । 

 काल्पनिक परी-भूमि प्रकार का पोकेमॉन जो गुरुत्वाकर्षण बुलाता है (एक नए  प्रकार के संयोजन वाला पोकेमॉन)। विवरण कमेंट में : r/stunfisk

 


POST : 1083 भगवान की उलझनें बहुत हैं ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

   भगवान की उलझनें बहुत हैं ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

   कभी अपनी खुद की परेशानियों को दरकिनार कर ऊपर वाले की उलझनों पर कोई ध्यान देता तो पता चलता अपनी दुनिया से ज़्यादा परेशान खुद दुनिया बनाने वाला है। हम आप अपने घर कारोबार का हिसाब रखते हुए भी गलती कर जाते हैं मगर भगवान को तो गलती करने की भी अनुमति नहीं है सारी दुनिया का हिसाब किताब बराबर रखना ही रखना पड़ता है। हज़ार नहीं अनगिनत तरह के गणित लगाने होते हैं और कोई सीए नहीं कंप्यूटर नहीं कोई आधुनिक गूगल जैसी सुविधा नहीं ऐप्स का उपयोग नहीं। चलो इक छोटी सी लगने वाली बात को लेकर ही समझते हैं कितना कठिन नहीं लगभग असंभव कार्य है इंसाफ करना। 

                                          पहली उलझन


    पति-पत्नी गठबंधन करते हैं अगले सात जन्म का रिश्ता बनाने की सात कसम खाई जाती हैं। उसके बाद हर पत्नी करवाचौथ का उपवास रखती है अपना सुहाग बना रहे और सदसुहागिन बनकर जीना मरना चाहती है। आपको इस में कोई समस्या नहीं नज़र आई होगी जबकि बहुत कठिन है ऊपर वाले का इतनी सी बात को संभव कर दिखाना। अधिकतर पति आयु ही नहीं में भी बड़े होते हैं इक नियम जैसा बना हुआ है। अब पति की लंबी आयु से पत्नी के सदासुहागिन  के वरदान से पत्नी को पहले जाना होता है जहां छोड़ ऊपर वाले के पास , अगला जन्म उसी को पहले मिलता है और जितने साल पति बाद में अकाल चलाणा करता है अगली बार जन्म लेने में उतना अधिक वक़्त बाद में फिर से जन्म मिलता है। समस्या का समाधान तभी हो सकता है अगर अगली बार पति को महिला पत्नी को पुरुष बनाकर जन्म देने का कार्य किया जाये मगर मामला गड़बड़ है पति-पत्नी फिर वही होने का वादा कर चुके थे। ऐसे में अगले जन्म में पत्नी का जन्म पहले और पति का बाद में होना ज़रूरी है जिस से उलझन पैदा होती है। पत्नी बड़ी पति छोटा समाज को मंज़ूर नहीं होता है। इस बार उपवास रखते समय इस बात पर विचार करना। बारी बारी पत्नी का पति और पति का पत्नी बनाने का उपाय स्वीकार है या नहीं।

                                            दूसरी उलझन 

ऊपर वाला जिसको जैसा बनाता है और जिस काम करने का हुनर देता है कोई उस को पसंद करता नहीं। अब हालत ये है कि लोग अच्छे भले धंधे करते हैं मगर चाहते हैं काश चौकीदार जैसा रुतबा हासिल हो जाए। व्यवस्था बनाने को सरकार भी तय करती है किस काम का क्या बजट होगा किस को कितना वेतन मिलेगा क्या काम कितने समय तक करना होगा और नहीं किया तो कठोर करवाई की जा सकती है। सरकार से हर कोई डरता है मगर ऊपर वाले का भी कोई बजट है और सबको उसकी बात मानकर कार्य करना है बदले में नियमानुसार वेतनादि मिलेगा इस की परवाह कोई नहीं करता है। ऊपर वाला जब आमना सामना होगा तब देखा जाएगा यही सोच जिसकी जो मर्ज़ी करते हैं। ऊपर वाला बेबस है चुप चाप देखता है ये सब अपने सामने घटते हुए।

                                    तीसरी उलझन पागलपन

      शीर्षक पढ़कर अंदाज़ा मत लगाना बात दीवानगी की नहीं है पागलपन की है। पागल कौन है कैसे बताया जाये पागल सभी खुद हैं मगर पागल बनाते हैं औरों को। पागल होने की निशानी यही है कि वो सामने असली दुनिया को नहीं देखता और पागलपन में इक अपनी दुनिया बनाकर उसी को वास्तविकता समझता है। हम लोग वास्तविक समाज से बचकर स्मार्ट फोन की झूठी बनावटी दुनिया में जीते हैं और मनोरंजन को बड़ा मकसद समझते हैं। क्या इसको समझदारी कह सकते हैं या फिर इक पागलपन छाया हुआ है। सबसे पहले उनकी बात करते हैं जो हमारे जीवन को प्रभावित ही नहीं करते बल्कि जिनको हम सब को असली समाज की तस्वीर दिखानी थी लेकिन वो वास्तविकता से बचते हुए इक काल्पनिक दुनिया को देखते और दिखलाते हैं। टीवी चैनल खबर मनोरंजन के नाम पर जिस दुनिया की बात करते हैं देश की तीन चौथाई आबादी से उसका कोई लेना देना नहीं है। फिल्म टीवी सीरियल जाने किस समाज की कैसी कहानियां और संगीत या शो दिखलाते हैं जो हमारी आस पास की दुनिया से मेल नहीं खाता है। सच नहीं है सब झूठ ही झूठ है मगर इस झूठ के सामान को बेचकर ये टीवी चैनल और फ़िल्मकार अभिनय करने वाले मालामाल हो रहे हैं। अर्थात उनको समाज को सच नहीं दिखाना मार्गदर्शन की तो बात ही क्या बस कमाई करनी है चाहे किसी भी तरह से हो। ऐसा लगता है कुछ लोग जो किसी तरह इक आरामदायक जीवन जी रहे हैं उनको बाकी समाज जो साधनविहीन है को लेकर कोई चिंता नहीं है। क्या अपने ही देश के लोगों के लिए ऐसी उदासीनता उचित है। समझा जाये तो हम पागल बन गये हैं और पागलपन पाकर खुश भी हैं।

                              उलझन की उलझन सबसे बड़ी उलझन 

  अभी तक मेरा भारत महान है ऐसा कहने पर क्यों महान है कोई सवाल नहीं पूछता था। अब महान होने का सबूत मिलने लगा है। प्यार के ढाई अक्षर कौन से हैं नहीं पता झूठ दो अक्षर से बड़ा बन गया है झूठ महान भी है उसकी शान भी है। लोग सत्य की खोज किया करते थे अब कोई झूठ पर शोध किया करता है। इक रेडियो कार्यकर्म हुआ करता था अंधेर नगरी चौपट राजा जिसका न्याय कमाल हुआ करता था। चोर की दाढ़ी में तिनका तलाश करते थे भैंस लाठी वाले की हो जाती थी। गूंगी गुड़िया सबसे अच्छा गाती थी कोयल कौवे से हार जाती थी। शासक का निर्णय आखिरी होता है न्याय अपने भाग्य पर रोता है। कल तक कौन उनसे सवाल करता था खुद वही हाल बेहाल करता था जो कहता सब दोहराते थे उसके संग संग रोते गाते थे। खुद उसने किसी को बुलाया है साक्षात्कार अजब दे दिखाया है। हमने सोचा था जवाब आएगा हैरान हैं सवाल ही बेमिसाल आया है। अपने आम चुराया है किस तरह आम को खाया है ,आपकी जेब खाली है डिजिटल कैमरा आज़माया है जब बना भी था आपके पास था टेक्नोलॉजी पर सितम ढाया है इंटरनेट से पहले नेट चलाया है। काला धन की बात क्या करनी है ब्लैक एंड वाइट को कलर बनाया है। हर किसी को मज़ा आया है ये कौन है जो झूठ का पिटारा लाया है हर झूठ उसका सच कहलाया है। देश क्यों महान था कोई बताने की बात नहीं समझ आती थी ये महानता को घसीट लाया है। क्या है जो नहीं कर दिखाया है उसने भगवान का खोटा सिक्का चलाया है। अपने चार युग सुने थे पांचवां युग लेके आया है ये झूठ का युग बहुत अच्छा है हर कोई इसके सामने अभी बच्चा है। चांद सूरज हवा पानी सब पर चलती उसकी मनमानी। चोर की भी है कोई नानी जो सुनाती है अपनी कहानी। तीर ऐसा कोई चलाता है जो रात को भी दिन बनाता है रास्ते उसके जो भी आता है उसी की दास्तां सुनता सुनाता है ख्वाब देखता नहीं दिखाता है हथेली पर सरसों उगाता है। देश भूखा रह जाता है वो भी बहुत थोड़ा खाता है खाता नहीं खाने पीने की हर बात को हवा में उड़ाता है। ज़िंदगी का साथ उड़ाता चला गया हर फ़िक्र को धुवें में .....

मई 13, 2019

POST : 1082 पागल हुआ दीवाना हुआ ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

    पागल हुआ दीवाना हुआ ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

           मास्टरजी को पढ़ना पसंद नहीं था और पिता जी की ज़िद थी उनको विलायत न सही किसी और राज्य में उच्च शिक्षा दिलवानी है। अनपढ़ माता पिता को जो मर्ज़ी बताया जा सकता है फेल होने पर समझते कि हर क्लास में दो तीन साल लगाने से नींव मज़बूत होती है। ग्वालियर का नाम था दसवीं फेल बारहवीं पास कर सकते हैं पिता को मनाया और सीधे उच्च शिक्षा पाने चले गए। वापस आकर अपना स्कूल खोला और खूब कमाई की गांव की शान समझे जाते रहे भगवान उनको स्वर्ग से कम क्या दे सकता है। किसी ऐसे स्कूल से पढ़ाई पढ़कर अब कोई देश को पढ़ना लिखना सब सिखला रहा है ये कथा आधुनिक भगवान की है। हर दिन कोई न कोई ऐसी घटना बताता है जो असंभव ही नहीं होती बल्कि हास्यस्पद लगती है। विज्ञान से भगवान तक को चुनौती देती है। मनघड़ंत बात जिस आत्मविश्वास से कहते हैं सुनने वाला समझ कर भी कुछ समझ नहीं पाता है। पता लगाना कठिन है ये जनाब किस युग की बात कर रहे हैं क्या हर समय हर जगह रहे हैं असंभव को संभव करने का दावा है। जो संभव था नहीं किया ये नहीं बताते उनकी मर्ज़ी है। लोग अब शक करने लगे हैं उनको किसी मनोचिकिस्तक की राय लेने की सलाह देते हैं। 

    अचानक गढ़ा धन या कोई करोड़ों की लॉटरी लगने से मनसिक संतुलन बिगड़ जाता है। बड़ी बड़ी बातें करने लगता है खुद को ज्ञान का भंडार जाने क्या क्या कहने लगता है। लोग बुरा नहीं मानते हंसते हैं मन ही मन में पगला गया है। सबको खुश देख समझता है मेरा रुतबा ऊंचा हुआ है। कोई उसकी बात पर यकीन नहीं करता लेकिन बच्चों को अपनी शौर्य गाथा सुनकर ताली बजवाता है। बच्चों को झूठी मनघड़ंत कहानियों को सुन मज़ा आता है। किसी गांव में सभी अच्छे लोग रहते थे कोई भी सरपंच बनने के काबिल नहीं था तो पास के शहर से इक झूठा मक्कार मतलबी आया और सबको गांव को शहर बनाने का सपना दिखाया और सरपंच कहलाया। जब गांव का नाम बदल कर कबीर बस्ती को कबीर नगर किया तो सबको लगा उल्लू बनाया है। गांव में बिजली पानी सड़क कोई भी सुधार नहीं हुआ बस नाम अच्छा रख लिया। पागलखाने में पागल रोगी अपनी ख्वाबों की दुनिया बसा लेते हैं और खुश रहते हैं। कोई खुद को राजा समझता है कोई बारात लेकर महबूबा को लाने चलता है। फ़िल्मी कहानियों का असर कुछ लोगों पर बहुत देर तक रहता है। खिलौना जानकर तुम तो मेरा दिल तोड़ जाते हो। हमने देखी है उन आंखों की महकती खुशबू हाथ से छू के उसे रिश्तों का इल्ज़ाम न दो। ख़ामोशी फिल्म की नायिका नायक का उपचार करते करते खुद पागल हो जाती है। जिस कमरे से नायक की छुट्टी हुई उसी में नर्स नायिका रोगी बनकर दाखिल हो जाती है।

        इधर सुनने में आया है कि  जैसे कुछ पुरुष पत्नी से छुटकारा पाने का सपना देखते रहते हैं आजकल ऐसी भी महिलाएं हैं जो सोचती हैं काश उनका भी नसीब उस महिला जैसा होता जिसको छोड़ कर चले जाने वाला बहुत महान राजनेता कहलाता है। नारी नारी के दर्द को कभी नहीं समझती है उल्टा कई पुरुष पत्नी पीड़ित होने का नाटक करते हैं और किसी महिला की सहानुभूति हासिल कर लेते हैं। बात पति पत्नी और वो की है जिस का नायक बंदर की तरह गुलाटी मारना छोड़ता नहीं। पत्नी को छोड़ने वाले नेता को महिलाओं के अधिकारों का रक्षक समझना नामुमकिन का मुमकिन होना है। शायद जल्दी ही ऐसी महिलाएं अपने अपने पति को घर से जाने की अनुमति खुद दे सकती हैं इस शर्त पर कि उनको राजनीति में शामिल होना होगा।

       
     प्यार कहते हैं अंधा होता है मगर कोई भी अंधा किसी से प्यार नहीं कर सकता है। ये फ़लसफ़े की बात है समझने की कोशिश मत करो अगर नहीं समझ आई तो। कोई किसी बदसूरत लड़की पर फ़िदा हो अगर तो हर कोई समझेगा पागल हुआ है कोई दूसरी नहीं दिखाई दी। ज़हर कड़वा लगता है कोई नहीं पीता है मगर जब कोई मीठा ज़हर पिलाता है तो सब पी लेते हैं। उसकी बातें उसकी शैली सबको पागल करती है। ये इश्क़ रोग ही नामुराद है दिल बेवफ़ा पर ही आता है। हमको उनसे हो गया है प्यार क्या करें। पागलपन संभव असंभव की बात नहीं समझता है होनी को अनहोनी अनहोनी को होनी जब जमा हो तीनों मजनू रांझा महिवाल इक जगह। कागज़ के फूल फिल्म बनी थी आजकल शहर कागज़ी बन चुके हैं ज़रा से हवा चलती है बिखरने का डर लगता है। दिल्ली देखने को पत्थरीली है मगर वास्तव में सब कागज़ी है कोई जाकर किसी फूल को छूता है तो सभी कागज़ बिखर जाते हैं।

               याद आते हो कभी मिलते थे कितनी बातें करते थे अजनबी शहर जाकर तुम तो खामोश हो गए। कोई हमज़ुबां नहीं मिलता यहां भी। ये सच है इक  दोस्त था  कॉलेज का शिक्षक रहा है जाने क्यों यादास्त खो गई है अब कोई चिंता नहीं सताती होगी।  कल कोई मिलने गया था उनसे तो उनको अभी भी पिछले चुनाव की बात याद थी और पूछने लगे अच्छे दिन आने वाले हैं क्या अभी भी लोग इंतज़ार करते हैं।  उनकी सुई वहीं रुकी हुई है। इस बीच गंगा स्वच्छ हुई काला धन मिला गरीबी मिटी सब को छोड़ लोग इक पुराना खेल खेलने लगे हैं। पागल हो जाना भी राहत की बात हो सकती है।