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जुलाई 22, 2026

POST : 2088 सीजीआई का कॉपीराइट ( हास्य व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

 सीजीआई  का कॉपीराइट  ( हास्य व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया 

हमारे सैंयां क्यों रूठे नाता अपना अटूट कभी न टूटे 
शिक्षित परिश्रमी काबिल सभी गुण होकर भी हम तो
सामाजिक विषमताओं के जाल में फंसकर भटकते थे 
कभी इधर कभी उधर नाकाम थे अनाम थे गुमनाम थे। 
 
देश के सबसे बड़ी अदालत के सबसे बड़े न्यायाधीश 
आपको अखरते हैं हिकारत से ही सही आपने समझा 
करीब क्या दूर भी दिखाई नहीं देते हम किसी को भी 
अनुकंपा की हमको नाम दिया कॉक्रोच हैं हम लोग ।  
 
आपकी अनचाही संतान हैं जैसे गरीबों की बस्तियां  
आपने बनाया है आपकी शरण में रहना नसीब अपना 
आपकी इक बात से हम सभी जाग उठे हैं नाकाम लोग 
आपको बनाना चाहिए कॉक्रोच का कोई नया आयोग। 
 
आपने अपना दामन छुड़ाना चाहा है फुर्सत नहीं कह के  
अपनी ही निर्मित रचना से ऐसा बर्ताव ठीक नहीं जनाब 
ख़त्म नहीं कर सकते हमको न अपने नाते को अब आप 
आपको नहीं मालूम हमारी ताकत चलेगा इक अभियोग । 
 
दिल एक मंदिर की नायिका समझ बैठे हैं शायद आप हमें 
अभागी गीत गाकर सुनाती है विवशता अपनी पति को जो 
हम तेरे प्यार में सारा आलम खो बैठे तुम कहते भूल जाओ 
पति के प्यार के पिंजरे में ही रहना उसकी नियति जीवन भर । 
 
हम कॉक्रोच आपकी बनाई व्यवस्था का शिकार कीड़े मकोड़े
आप महान कहलाते दुनिया भर के लिए पालक तारणहार हैं 
याद करो कभी आप भी हम जैसी कोई किसी की संतान थे 
अनगिनत परीक्षाओं बाद परिणाम नहीं ग़ज़ब के वरदान थे ।   
 
आपकी विवशता भी हम समझते हैं ख़त्म भी कर नहीं सकते  
संविधान आपको सभी को एक समान न्याय देने के कहता है 
आपको परेशानी है हम जैसों का ख़ात्मा नहीं कर सकते आप 
आपने नामकरण किया था तभी कुछ  न्याय की आस रखते हैं । 
 
ख़ास लोगों पर करते करम बस हम पर ढाते सितम पर सितम 
थोड़ा सा बचा रहने दे अपनी इंसाफ़ की चौखट का कुछ भरम 
मत देख हमारी तरफ कभी भी प्यार भरी अपनी इक नज़र से 
बेमौत मत मार हमको बोलकर नफरत की बात वाले ज़हर से ।   
 
आप जैसे बड़े बड़े पदों पर बैठे लोगों ने ही ये काम किया है 
मिलकर हम बेगुनाह लोगों को अकारण ही बदनाम किया है 
नाम आपका कॉक्रोच से कभी अलग हो नहीं सकता जान लो 
आपने अपनी इक मैली चादर डाल कर जुर्म लज़्ज़त किया है ।  
 
( इक ख़त लिखा है मुख्य न्यायधीश को संबोधित करते हुए 
पढ़ना नहीं चाहते समझना नहीं चाहते उनकी मर्ज़ी है साहिब ) 
 
 Supreme Court Refuses Urgent Hearing On Plea Seeking Probe Into Allegations  Regarding Fake Advocates With Cockroach Janta Party
 

मार्च 08, 2026

POST : 2066 सबका नसीब बताते जानते नहीं खुद का हाल ( हास्य - कविता ) डॉ लोक सेतिया

   सबका नसीब बताते जानते नहीं खुद का हाल  ( हास्य - कविता )

                      डॉ लोक सेतिया 

 
पंडित जी से इक दिन पूछा बतलाओ कैसी है ग्रहचाल 
ख़ाली जेब रहना है कब तक होंगें सब लोग मालामाल  
 
नाम जानकर बोले मुझसे जैसे गुज़रे हैं पिछले सब साल 
जैसे भारत देश की हालत बिगड़ रही है साल दर साल 
 
लोक की लोकतंत्र की राशि इक है ग्रहों की उलटी चाल 
जनता का कसूर नहीं है डेमोक्रैसी का भाग्य ही बदहाल
 
भारत और भ्र्ष्टाचार दोनों का ही ग़ज़ब है अपना कमाल
कोई रहता है पात पात पर कोई रहता है हर डाल डाल 
 
बेचती हमेशा झूठे सपने राजनीति की सभी की टकसाल 
पंछी समझता है मिला है दाना नहीं समझता कैसा जाल 
  
मायाजाल में फंस कर लोग भूल गए सब अपनी सुर ताल
सय्याद दिलाता भरोसा रखता है वो सब का बड़ा ख़्याल  
 
पिंजरे के तोते की तरह बतलाते उनकी किस्मत का हाल
चुनाव नतीजे में मुमकिन ही नहीं पाती अपनी सकें निकाल 
 
राजनेताओं की प्रशासन की हमेशा होती तिरछी है हर चाल 
चाबुक है उनके हाथ में जब तक , बचाओ सब अपनी खाल 
 
सांसद विधायक सभी बिकते हैं राजधानी बन गई घुड़साल 
सर पर सबके लटक रही तलवार बचने को नहीं कोई ढाल  
 
कुछ हलवा पूरी छीन खाते सबको नहीं मिलती रोटी - दाल 
न्यायालय की बात मत पूछो निकलते हैं रोज़ बाल की खाल  
 
नचाती नाचती सत्ता की सुंदरी घने काले लम्बे जिसके बाल 
राजनीति की कालिख़ लगाई जाती तो बन जाती रंग गुलाल  
 
सितारे बदले खेल बदलेगा है काली पूरी उन की हुई है दाल  
कुंडली खुलने लगी है लोगों की किसका खून सफेद या लाल  
 
सांवली सलौनी सूरत पिया की सबको लुभाती थी बीते साल 
कोई रोग लगा है चेहरे की हवाईयां उड़ीं बिखरे बिखरे हैं बाल 
 
ख़ामोशी सी उन पर छाई है घर दफ़्तर सब की लगती हड़ताल
जन्मपत्रिका ग़ुम कौन चुरा गया तिजौरी से , होगी जांच पड़ताल   
 
 

 
 


 


     
 
 

सितंबर 16, 2025

POST : 2020 रिश्वत की है नेक कमाई ( हास्य - व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

    रिश्वत की है नेक कमाई ( हास्य - व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया  

कर्मचारी संघ की बैठक चर्चा में इक बात सामने आई 
वेतन नहीं हक मेहनत का , हम सत्ता के हैं घर जंवाई 
शासक की अनुचित बातों को ख़ामोशी से मान लेते हैं  
लूट खसूट से उनको मलाई , छाछ अपने लिए है बचाई । 
 
रिश्वत सेवा का मेवा करते हैं ,दूर जनता की कठिनाई 
कुछ भी अनुचित नहीं करते हम , लेन देन है चतुराई 
लोगों की सुनता कौन जनता सत्ता की साली - भौजाई
राजनेताओं ने हंसी मज़ाक में उसकी की मार कुटाई । 
 
रिश्वत को बदनाम कर दिया किसने कर कर के है बेईमानी
वर्ना ये भरोसे की निशानी हर किसी की होती थी आसानी 
सरकार से इक मांग हमारी बंद करनी तलवार है ये दोधारी 
बिना वेतन करेंगे काम हम पर रिश्वत से निभानी सबने यारी ।
 
काश कोई फरियाद सुने रिश्वत लेने की मिल जाये आज़ादी 
आओ हमको ख़ैरात डालकर मनचाहा करवा लो सभी लोग 
पुण्य मिलेगा जन्म जन्म में जितना दिया बढ़कर ही पाओगे  
वरमाला हाथ में लिए खड़ी स्वयंबर में जैसे कोई शहज़ादी । 
 
कैसे आज़माना योजना आयोग को नई तरकीब सुझाई गई है 
हर दफ़्तर में हर विभाग की आमने सामने बनाकर दो शाखाएं 
बीच में निर्देश लगवाएं रिश्वत देने वाले इधर अन्य उधर जाएं 
बिना रिश्वत जाने का मतलब होगा भटकते भटकते मर जाएं ।
 
रिश्वत देने वालों की तरफ सभी जाएंगे खुश होकर देंगे दुआएं 
एक बार ज़रूर आज़माएं बिना रिश्वत नहीं उधर जा पछताएं 
सफल योजना होगी सरकार की सभी का बराबर हिसाब होगा
बारिश होगी गरज बरस कर लौटेंगी आसमान से काली घटाएं ।      
 
 

 
  
 

    

सितंबर 13, 2025

POST : 2016 हैरान हैं भगवान ( क्षणिकाएं : हास्य - व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

     हैरान हैं  भगवान ( क्षणिकाएं : हास्य - व्यंग्य  ) डॉ लोक सेतिया 

क्या ऐसे होते हैं इंसान 
क्या यही है शराफ़त की पहचान , 
चोर से कहते चोरी कर कोतवाल से भी पकड़वाते , 
कोयला करने लगा है हीरे की पहचान । 
 
भाई से भाई , बेटे से बाप की करवाते लड़ाई ,
आफ़त खुद जिसने बुलाई 
शामत उसकी आई , 
खाते सभी से खूब मलाई , 
कहना मत उनको हरजाई आदत है बनाई ।  
 
बेच ईमान दौलत कितनी कमाई , 
जिसकी खाई उसकी बजाई 
दो तरफ़ा है किरपान ,   
मान न मान सभी लोग नादान 
बस इक अपनी आन बान शान । 
 
कौन किसका है कद्रदान , 
मिलता है सभी को जीने का वरदान 
मीठा ज़हर पहचान , 
किस किस की ऊंची है दुकान 
फ़ीके फ़ीके सभी पकवान ।

अपने बनकर समझते 
सभी को पायदान ,
जाके पैर न फटी बिवाई , 
वो क्या जाने पीर पराई ,
बिछा हुआ क़ालीन नीचे छुपा 
सभी कूड़ा कर्कट बाहरी शान ।  
 
ऊपर बैठा हुआ हैरान 
कोई भगवान ,
सच और झूठ की मिलावट 
करते हैं नासमझ नादान ,
पर उपदेश कुशल बहुतेरे , 
करते दुनिया पर कितने एहसान । 
 

   
 
 

सितंबर 12, 2025

POST : 2015 क्षणिकाएं ( हास्य - व्यंग्य कविताएं ) डॉ लोक सेतिया

           क्षणिकाएं ( हास्य - व्यंग्य कविताएं ) डॉ लोक सेतिया   

सरकार है कायदा है कानून संविधान है 
भूखों का पेट भरने को रोटी नहीं है , पर 
भूखे मर जाने पर मिलता सभी को बराबर 
लाखों की मुआवज़ा राशि का प्रावधान है ।  
 

2  

बड़ा ही निराला अदालती खेल है
अनगिनत बेगुनाह हैं कैदी जेलों में  
हमेशा से गुनहगारों के लिए मिलती 
बचने को अग्रिम ऐंटिसिपेटरी बेल है ।    
 

लोकतंत्र भी इक खेल तमाशा है 
कभी तोला है तो कभी वो माशा है 
मुंह में पानी है नेताओं प्रशासन के  
जनता क्या है बस मीठा बताशा है । 
 

मंच पर भाषण देते समय जनाब 
चिंता भ्रष्टाचार पर जतला रहे थे 
दलालों को इशारों इशारों में ही 
घर शाम को अपने बुला रहे थे ।  
 

 

 

POST : 2014 राजनेता ( व्यंग्य - कविता ) डॉ लोक सेतिया

          राजनेता (  व्यंग्य -  कविता  ) डॉ लोक सेतिया 

दफ़्न रूह की आवाज़ कर गया 
जी रहा मगर इक शख़्स मर गया ।  
 
ऐतबार उसका ,  क्या करें भला 
और कुछ कहा , कुछ और कर गया ।  
 
मांगता सदा , ख़ैरात वोट की 
जीत कर न जाने फिर किधर गया ।  
 
रहनुमा बनाकर भूल हमने की 
देश लूटकर घर बार भर गया । 
 
क्या नशा चढ़ा सत्ता जो मिल गई 
ज़ुल्म की हदों से , है गुज़र गया । 
 
बेचने लगा अपना इमान तक 
देख कर उसे शैतान डर गया । 
 
मैं ग़ुलाम हूं  , सरकार आप हैं 
कह के बात ' तनहा ' ख़ुद मुकर गया ।  
 

 
  

मई 17, 2025

POST : 1966 सच और झूठ की लड़ाई में ( हास्य- कविता ) डॉ लोक सेतिया

   सच और झूठ की लड़ाई में ( हास्य- कविता ) डॉ लोक सेतिया 

 
शिखर पर खड़ा हुआ है झूठ सच पड़ा हुआ खाई में  
इंसाफ़ क़त्ल होता रहता सच और झूठ की लड़ाई में
 
सियासत की अर्थी भी निकलेगी मगर बरात बन कर
जनता की डोली का दुःख दर्द दब जाएगा शहनाई में
 
शासकों को क्या खबर क्या क्या होने लगा समाज में 
जंग लाज़मी है चुनावी खेल में , हर भाई और भाई में
 
आत्मा ज़मीर आदर्श और ईमानदारी से फ़र्ज़ निभाना 
कोई कबाड़ी खरीदता नहीं ये सब सामान दो पाई में 
 
जिनको इतिहास लिखना आधुनिक समय का यहां 
भर लिया इंसानी खून उन्होंने कलम की स्याही में 
 
राजनेता अधिकारी धनवान लोग शोहरत जिनकी है 
खोटे साबित हुए सब कसौटी पर हर बार कठिनाई में 
 
सबका भला नहीं सिर्फ खुद अपने लिए जीना मरना 
खूब मुनाफ़ा अब बाजार में अच्छों की झूठी बुराई में  
 

सच और झूठ | Hindi Abstract Poem | Shahbaz Khan
   

फ़रवरी 17, 2025

POST : 1946 ग़ाफ़िल कहता ग़ाफ़िल की बात ( हास्य व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

 ग़ाफ़िल कहता ग़ाफ़िल की बात ( हास्य व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

 
दिल ही समझा ना है दिल की बात 
लहरों से होती क्या साहिल की बात ।
 
दर्द अपना किसे बताएं लोग जब अब  
मुंसिफ़ ही कहता है क़ातिल की बात ।  

दिल्ली में कोहराम मचा हुआ है कोई
कीचड़ से सुन कर कमल की बात । 

जमुना का पानी रंग बदलता नहीं कभी  
मछलियां जब करती जलथल की बात ।
 
आई डी दफ़्तर में रखा है सर का ताज़
यही पुरानी आज बनी इस पल की बात ।
 
गूंगों बहरों की बस्ती में होता शोर बहुत 
यही है दिल्ली की हर महफ़िल की बात ।  
 
 
 Delhi New CM: Who Will Be the Next CM? Delhi Election Results & Latest  Updates in Hindi | कौन बनेगा दिल्ली का मुख्यमंत्री? | Jansatta
 


 

अगस्त 13, 2024

POST : 1876 शहर शहर गली गली मेले लगे हैं ( हास्य-कविता ) डॉ लोक सेतिया

  शहर शहर गली गली मेले लगे हैं ( हास्य-कविता ) डॉ लोक सेतिया

जितने गुरु हैं देश और दुनिया भर में  
अकेले हमारे नगर में उस से अधिक 
राजनीति के बदलते चेहरे - मुखौटे हैं  
भीड़ है चमचे हैं चाटुकार हैं कुछ चेले हैं । 
 
सबको करना इक यही ही गोरखधंधा है
बाज़ार राजनीति का चढ़ता भाव जाता 
जिसको दिखाई नहीं देता है वो अंधा है 
महंगाई से रिश्ता कभी आता न मंदा है । 
 
सच्ची झूठी पाप पुण्य की जैसी हो कमाई
दयावान कहलाते हों चाहे ज़ालिम कसाई  
दौलत कहते हैं भला किस काम है आई 
गुंडे बदमाश सभी हैं दुश्मन भी और भाई । 
 
भावी विधायक सांसद हैं कितने कहां पर 
कभी भूल से चले गए जो तुम भी वहां पर 
अजब नज़ारा दिखाई देगा आपको तब तो 
तारे ज़मीं पर ख़ाक़ उड़ती होगी आस्मां पर । 
 
लूटना बन गया है धर्म देश समाज की सेवा 
बड़े सस्ते दाम मिलता है जहां हर एक मेवा
सोना उगलती है सत्ता की है जो अपनी देवी  
नशा है सत्ता का छूटता नहीं बेशक जानलेवा । 
 
दीमक यही देश को लग गई है हर इक जगह 
खोखला कर दिया है समाज को लो सब सह
नहीं कोई इनसे बचा सकता है जनता बेचारी 
नया क्या पुराना क्या सब कुछ रहा है अब ढह ।
 
पेड़ राजनीति के आम हैं शाखों पर केले लगे हैं 
शहतूत की जगह बाग़ में बस कड़वे करेले लगे हैं
जिधर देखते हैं सभाएं आयोजित कर रहे हैं चोर 
शहर शहर गली गली अब कितने ही मेले लगे हैं ।     
 
 
 
 

अगस्त 08, 2024

POST : 1875 दर्द ए दिल की दवा करते हैं ( हास्य - कविता ) डॉ लोक सेतिया

 दर्द ए दिल की दवा करते हैं  ( हास्य  - कविता ) डॉ लोक सेतिया

शायद नहीं यकीनन हम असली कम नकली अधिक बन गए हैं  
सोशल मीडिया से टीवी शो , सिनेमा या किसी सभा में जाकर ,
 
भावनाएं जागती हैं , हम अश्क़ बहाते हैं संग नाचते झूमते गाते हैं 
जगह वातावरण बदलते ही भूलकर , फिर पहले जैसे बन जाते हैं ।
 

दोस्ती प्यार रिश्तों का हर दिन कोई बाज़ार सजाते हैं बनाते हैं 
कीमत मिलती है , बिकते हैं मोल चुका कर खरीद कर ले आते हैं ,
 
भरोसा अजीब है कहते हैं करते हैं बार बार मगर उसे आज़माते हैं
जहां कोई किसी साथ मिल के ख्वाबों की दुनिया अपनी बसाते हैं ।  

 
क्यों कहते हैं कि शीशा हो या दिल हो आखिर टूट ही जाता है ,
दिल कोई खिलौना तो नहीं जो इक टूट जाए तो दूसरा ले आए 
 
दिल अपने पास रहता तो हर कोई संभाल कर रखता हमेशा ही 
इश्क़ में दिल कब किस पर फ़िदा हो जाता है बस में नहीं रहता । 
 
 
दिल चीज़ ही ऐसी है जैसे , कोई बेटी इक दिन पराए घर जाना है 
मुहब्बत का यही अफ़साना , दिल से दिल का नाता इक बनाना है ,
 
कहते हैं जिसे प्यार कोई समझा है न कभी जाना , किस पे आना है 
दिल की बस्ती में बर्बाद लोग रहते हैं जिनका नहीं कोई  ठिकाना है ।  
 

कितने पुल बनते ही टूटने को हैं फिर से बनवाए जाते हैं , बीच धारे 
कितनी भी लंबी दूरी हो कितना तेज़ बहाव गहरा पानी बीच बहता हो  ,
 
टूटे बंधन जोड़े जाते हैं इधर से उधर से सभी फिर मिल जाते किनारे 
पहले से चौड़े और मज़बूत दरिया पर पुलों से नाते निभाए ही जाते हैं । 
 

दिल किस ने किसका तोड़ा , ये अजब पहेली इक गेंदा इक चमेली है 
दिल का ऐतबार मत करना कभी प्यार मत करना कहती अलबेली है ,
 
ये खेल है लेकिन बन जाता है तमाशा कोई भी देता नहीं तब दिलासा  
आशा सुनहरे सपने बिखर जाते हैं बचती है सिर्फ हताशा और निराशा । 
 

दुनिया बदल गई है आदमी में दिल ही नहीं है मिलता सीने में सभी के 
किस्से हुए पुराने आशिक़ महबूबा साथ मरते सच्ची उनकी आशिक़ी के ,
 
इक बाज़ार बन गया सच भी कल्पना का सोशल मीडिया पर भी जहां 
झूठा है आसमान भी फरेब का जहां अकेला हर आशिक़ का है कारवां । 
 
 
टूटे हुए दिल का अंबार लगा है बाज़ार में इक ऐसा इक संसार बना है 
नाकाम मुहब्बत वालों की महफ़िल खूब जमती है जश्न हो जैसे कोई ,
 
पुरानी इक दिन तस्वीर बदलती है अपनी सबकी तकदीर बदलती है 
रांझा मजनू लैला सोहनी महीवाल बदलते हैं जूलियट हीर बदलती है ।  
 

बेवफ़ाई भी कभी कभी ज़रूरी होती है बिछुड़ना कोई  मज़बूरी होती है 
हर प्रेम कहानी लाजवाब लगती है , दास्तां अगर आधी अधूरी होती है ,
 
उसने बदला अपना रास्ता क्या हुआ हम भी नई इक और राह करते हैं
खुद तबाह नहीं होते किसी की चाहत में , दर्द ए दिल की दवा करते हैं । 
 

 साहित्य दुनिया | क़लक़ मेरठी का मशहूर शेर.. तू है हरजाई तो अपना भी यही तौर  सही तू नहीं और सही और नहीं और सही | Instagram
 
 

 

जून 25, 2024

POST : 1849 पकड़ो पकड़ो डोर सजनियां ( हास्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

 पकड़ो पकड़ो डोर सजनियां ( हास्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

 
लोकतंत्र भाग्य तेरा ऐसा संविधान का छीका टूटा , 
मत पूछो किस किस ने कितना कैसे क्यों है लूटा ।
 
जनता की तकदीर है खोटी छिन गई इक धोती ,
पहेली कौन बूझे नेता सब के सब ही हैं पनौती । 
 
किस सांसद का है कौन जगह कैसा मज़बूत खूंटा
रस्सी छूटी कमज़ोर ज़रा गठबंधन से नाता ही छूटा । 
 
भूल-भुलैयां चलो संग संग सैंयां डाल के गलबहियां ,
हमको मिल कर  करनी है ता-ता-थैया ता-ता-थैया । 
 
दुल्हन मंडप छोड़ भाग गई बारात है नाच दिखाती  ,
रपट लिख़ाओ मिल नहीं सकेगा चितचोर सिपहियां ।   

शोर है यही चहुंओर लागा चोर को मोर सजनियां ,
कटी पतंग उड़ चली पकड़ो पकड़ो डोर सजनियां ।  
 
सत्तासुंदरी नाच रही है हर दिन का है वही तमाशा ,
ख़ुश हैं शासक मौज मनाते जनता की बढ़ी हताशा ।  


   कटी पतंग - Paperwiff
 
 

जून 01, 2024

POST : 1833 ज़िंदा लाश की व्यथा ( व्यंग्य - कविता ) डॉ लोक सेतिया

       ज़िंदा लाश की व्यथा  ( व्यंग्य - कविता )  डॉ लोक सेतिया 

सब को बेजान लगता था शायद उस में जान बाक़ी नहीं है 
जीवंत लोकतंत्र का कोई भी लक्षण दिखाई नहीं दे रहा था
बस इक विभाग इसको कभी स्वीकार नहीं कर सकता था 
क्योंकि उस का होना नहीं होना निर्भर करता है इसी पर । 
 
चुनाव आयोग को देश राज्य राजनीति के अजब खेल को 
आयोजित करना पड़ता है सब खेलने वाले खिलाड़ियों की
चाहत सत्ता पाने सरकार बनाने की पूरी करने की कोशिश 
जनता इस खेल में भी सभी खेलों की तरह दर्शक होती है । 
 
जिसको लोकतंत्र नाम दिया है दो सिरों से बंधा हुआ शख़्स 
कुछ उधर से कुछ इधर से ज़ोर ज़बरदस्ती से खींचते उसको 
उनका खुला मैदान है बीच में तंग गली है जो उसको मिली है 
दोनों तरफ ऊंची दीवारों पर सलाखें ही सलाखें गड़ी हुई है ।  

ख़ुदगर्ज़ लोग उसको बेजान चीज़ समझ  लूट मार मचाते हैं 
आम लोग कभी किसी कभी किसी हाथ का हथियार बनकर 
आप इक आग में खुद अपनी ही मर्ज़ी से घर अपना जलाते हैं 
जाने किस स्वर्ग की ख़्वाहिश में ज़िंदा जल गले मौत लगाते हैं । 

ख़ुदकुशी की होगी क़त्ल हो नहीं सकता क़ातिलों का ढंग है 
एक मुर्दा जिस्म आख़िर कंधों पर जाता है जिस तरफ जाना
खुद बाद मरने कोई बोझ अपना ही ढो नहीं सकता कभी भी 
जश्न का अवसर है जीत जिस की भी लोकतंत्र रो नहीं सकता । 
 
पहले भी कई बार ऐसा होता रहा है कोई न कोई सिरफिरा 
किसी अदालत किसी थाने किसी सार्वजनिक सभा में जा 
विनती करता है दुहाई देता है कहीं ज़ख़्मी हालत में पड़ा है 
दर्द से कराहता कोई अपने को वो लोकतंत्र ये बताता हुआ । 
 
हर बार उसकी व्यथा को कोई नहीं समझता रहा पहले से
लेकिन इस बार किसी ने सोचा चलो कुछ नहीं तो इक बार 
इसको संविधान नाम वाले अस्पताल में दिखाते हैं ले जाके 
भली भांति जांच परख कर उसको स्वस्थ है या मृत बताएं । 
 
घायल था लहूलुहान था फिर भी उसको ईलाज से पहले 
अपनी पहचान बतानी थी और क्या ये कैसे किसने किया
कोई गवाह कोई साक्ष्य सबूत पेश कर सकते हो पूछा गया 
जनाब किस किस का नाम बताऊं कैसे खुद को मैं बचाऊं । 
 
राजनेताओं ने मुझे अपनी विवाहित पत्नी नहीं रखैल जान
समझा उपयोग किया मसला कुचला विवश कर कैद किया 
अखबार टीवी चैनल से सोशल मीडिया वालों तक सभी ने 
मुझे बचाने का वचन देकर मेरे साथ जो नहीं किया वो कम ।  

जनता बेचारी हर बार जाती हारी कोई समझा नहीं बिमारी
क्या बताए किसे जाकर क्या है जनता की नहीं है कोई भूल 
आम लोगों की खातिर हैं कांटे ही पग पग पर बिछे हुए हैं पर 
राजनेताओं अधिकारियों को मिलते हैं सभी गुलशन के फूल ।    

कोई योगी कोई संत महात्मा कोई रहम दिल दर्शन शास्त्री 
समझ गया ये कोई लावारिस है जिस को घर से बेघर किया 
मिलकर कुछ धनवान और चालाक लोगों ने स्वार्थी बनकर 
सभी दलों के नेताओं अधिकारियों न्याय करने वालों ने बस 
लोकतंत्र की विरासत को पाने को चुपचाप दफना दिया था । 
 
आपको किसी लाश की कब्र को देखा है कभी कहीं पर तो 
खामोश आहें और भीगापन अश्कों से गीली माटी का वहां 
आहट  सुनाता है अपने वर्तमान अतीत से भविष्य तक की 
आगाज़ सभी जानते हैं अंजाम अपना खुद नहीं जानता कोई । 
     
 भारत में लोकतंत्र की गिरावट का असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा

अप्रैल 12, 2024

POST : 1795 चुनावी आंकड़ों का बाज़ार ( हास्य-कविता ) डॉ लोक सेतिया

     चुनावी आंकड़ों का बाज़ार ( हास्य-कविता ) डॉ लोक सेतिया 

कितना अनुपम है , हर दल का इश्तिहार , 
जनता का वही ख़्वाब सुहाना , सच होगा 
देश की राजनीति का बना पचरंगा अचार
नैया खिवैया पतवार चलो भवसागर पार । 
 
देख सखी समझ आंख मिचौली की पहेली 
सत्ता होती है , सुंदर नार बड़ी ही अलबेली 
सभी बराबर अब राजा भोज क्या गंगू तेली 
मांगा गन्ना देते हैं गुड़ की पूरी की पूरी भेली ।
 
अपना धंधा करते हैं जम कर के भ्र्ष्टाचार
हम जैसा नहीं दूसरा कोई सच्चा ईमानदार 
दोस्त हैं दुश्मन , सभी हम उनके दिलदार 
दुनिया सुनती महिमा , अपनी है अपरंपार ।
 
छोड़ दो तुम सभी अपनी तरह से घरबार
इस ज़माने में ढूंढना मत कभी सच्चा प्यार 
अपने मन की करना , सोचना न कुछ तुम 
बड़ा मज़ा आता है कर सबका ही बंटाधार । 
 
हमने मैली कर दी गंगा यमुना सारी नदियां 
पापियों के पाप धुले कहां नहलाया सौ बार 
डाल डाल पर बैठे उल्लू , पात पात मेरे यार 
खाया हमने सब कुछ नहीं लिया पर डकार । 
 
अपने हाथ बिका हुआ है आंकड़ों का बाज़ार 
अपना खेल अलग है , जीतने वाले जाते हार 
काठ की हांडी हमने देखी चढ़ती बार-म-बार 
कौन समझा कभी जुमलों की अपनी बौछार ।     
 
अपना रोग लाईलाज है कौन करेगा क्या उपचार 
जितनी भी खिलाओ दवाई कर लो दुआएं भी पर 
कुछ असर नहीं होता हम को रहना पसंद बिमार 
बदनसीब जनता का ख़त्म नहीं होता इन्तिज़ार ।       
 
 
 भवसागर में नाव बढ़ाए जाता हूँ – देवराज दिनेश

मार्च 27, 2024

POST : 1788 छाई हुई घटा घनघोर है ( हास्य-कविता ) डॉ लोक सेतिया

    छाई हुई घटा घनघोर है ( हास्य-कविता ) डॉ लोक सेतिया 

चोर सबको कहता लुटेरा अजब तौर है  ,
देश की सियासत का यही नया दौर है । 
 
अब अंधेरे उजालों को समझाने लगे हैं 
बंद आंखों से देख समझो हो गई भौर है ।
 
सबको ये तमाशा लाज़मी देखना होगा 
हम्माम में सभी नंगे है ये तो हर ठौर है ।
 
इक पहेली है सच क्या और झूठ क्या 
लबों पर है कुछ दिल की बात और है ।  
 
हमने इरादा किया बनाएंगे राह इक नई 
फुर्सत मिले सोचते हैं काबिल ए गौर है ।  
 
शहंशाह को भूख है जो मिटती ही नहीं है
छीन लो गरीबों से हाथ अगर इक कौर है ।  

उनका दस्तूर है सब परस्तिश उनकी करें 
उनकी मर्ज़ी जो चाहें वही ख़ुद सिरमौर है । 
 
खुद मसीहा है हर गुनाह उसका मुआफ़ है 
जो है उसका मुख़ालिफ़ शख़्स वो चोर है । 


इस तरह यीशु मसीह की भविष्यवाणी "मैं चोर के समान आता हूँ" पूरी होती है
 
 

जनवरी 21, 2024

POST : 1776 जो खोएगा सो पाएगा ( हास्य-कविता ) डॉ लोक सेतिया

    जो खोएगा सो पाएगा  ( हास्य-कविता ) डॉ लोक सेतिया 

उनको भी अनुमति लेनी होती है
घर परिवार सभी और संसार की 
हर व्यवस्था का प्रबंध करते हैं जो
कहना पड़ा मुझ से पहले पूछा नहीं 
घोषित कर दिया मैंने आना है तब 
समझाया बस वही समझा सकती हैं 
बड़े महत्वपूर्ण प्रभावशाली लोग तो 
बिना कारण बतलाए या बहाना बना 
सूचित कर देते हैं कि उपस्थित नहीं 
हो सकते पहले से निर्धारित है कुछ 
अथवा झूठ नहीं बोल सकते तब भी 
मौसम सर्दी ठंड और घना कोहरा 
कुछ समय बाद देखेंगे कह सकते हैं ।  
 
 
भगवान अभी भी अवसर है 
सोच लो विचार कर लो कि
नहीं जाना , जाना कितने दिन 
सुना है आजकल संतान ख़ुद 
अपने माता पिता तक को भी 
इक बोझ समझने लगती है
सभी तब तक अपने होते हैं 
जब तक जमापूंजी रहती है । 
 
राजनेताओं की बात क्या है 
सत्ता की ख़ातिर धर्म ईमान 
शराफ़त इंसानियत भुलाकर 
शैतान से गठबंधन कर लेते
और जनता ठगी रह जाती है 
चुनाव में मतदान करने बाद । 
 
आपकी सभी संतानें मिलकर 
आपको आदर प्रेम और शांति 
हर स्वतंत्रता को अपनी सुविधा 
अपनी ख़ुशी अपने अधिकार भूल
अपनी दिनचर्या दरकिनार कर 
आपका वर्चस्व स्थाई रहने देंगे । 
 
कहीं ऐसा नहीं हो भविष्य में 
उनकी चाहत ख़त्म हो जाए 
मनचाहा आशिर्वाद हासिल कर 
और आप इक निर्जीव वस्तु बन 
किसी कोने में पुरानी तस्वीर की 
तरह इक सामान की तरह रखे 
अपनी बेबसी और बदहाली का 
ख़ामोश तमाशा अपनी नज़र से 
देख अश्क़ों को छुपाओ खुद से ।   
 
अचानक हर समस्या का समाधान 
करने वाले प्रकट हुए अभिवादन कर 
बताया हल ढूंढ लिया है सिनेमाई है 
दो हमशक़्ल जुड़वां भाई हरजाई हैं 
अपनी जगह जुड़वां को भेज देते हैं
चुपके चुपके मकसद जान लेते हैं 
पर्दे के पीछे का सच पहचान लेते हैं 
असली नकली कौन परखता है अब 
दुनिया में सब चलता है कौन सच 
बोलता है और सूली पर चढ़ता है । 
 
बन कर कोई छलिया धरती पर आ 
सही समय पर सबको ही चौंकाएगा
झूठे वादे झूठी बातें करने वालों को 
दो दूनी पांच का सबक जो पढ़ाएगा
हमेशा से जो होता है वही दोहराएगा
पाने वाला खोएगा खोने वाला पाएगा ।  
 

( रद्द भी हो जाते हैं दौरे कभी कभी कारण कुछ भी संभव है । )

 

 
 
 
  
  

नवंबर 21, 2023

POST : 1748 आई लव माय इंडिया ( हास्य-कविता ) डॉ लोक सेतिया

    आई लव माय इंडिया ( हास्य-कविता ) डॉ लोक सेतिया 

साड़ी - सूट चप्पल - जूते  
सब जिस रंग उसी रंग की 
माथे पर है सजती बिंदिया 
लो बन गया भारत इंडिया । 
 
बदले नेता गए बदल दल 
हुई समस्या कभी न हल 
रिश्वत लाल-फ़ीताशाही वही 
काठ की चढ़ती रहती हंडिया । 
 
लोकतंत्र का नाच है नंगा 
मैली और हो गई है गंगा 
अपराधी सब झूम रहे हैं 
नाचती सत्ता की रंडिया । 
 
लगती है नेताओं की भी मंडी 
इस बाज़ार में नहीं आती मंदी  
भिंडी बाज़ार लगते हैं सदन 
सबको ललचाती है भिंडिया । 
 
देखा देशभक्ति का हुआ तमाशा 
तोला माशा जनता की हताशा  
चाहे कुछ होता होने दो यारो 
झूमो गाओ आई लव माय इंडिया ।  
 
 

( 11 सितंबर 2003 की डायरी पर लिखी पुरानी रचना संशोधित किया है। ) 


 

नवंबर 20, 2023

POST : 1746 हास्य रस की चौपाइयां - डॉ लोक सेतिया

        हास्य रस की चौपाइयां - डॉ लोक सेतिया

 
सबक सिखाने को इक हस्ती है आई , करना सभी लोग बस नेक कमाई 
अपने दिलों से मिटा कर गहरी खाई , रहो मिल जुल बनकर सब  भाई भाई ।
 
बड़े प्यार से पास सभी को बुलाया , ख़ुदा ने भेजा फ़रिश्ता ज़मीं पे आया 
बंद करवा आंखें सच दिखलाया , सूरत सभी की असली नज़र थी आई । 
 
सबको पाप पुण्य का भय जो दिखाता , खुद उसका नहीं कोई बही खाता 
धर्म बेचता धर्म खरीदता सुबह शाम  , मत पूछो उसकी कैसी है चतुराई । 

विद्यालय का शिक्षक है भाग्य विधाता , पढ़ाई ट्यूशन फीस लेकर पढ़ाता 
चमचों को नकल करवा उत्तीर्ण कराए , शिक्षा से करता रहता है गुरुआई ।
 
डॉक्टर है ये इक सरकारी लगी है जिसे , ड्यूटी पर नहीं रहने की बिमारी 
निजी अस्पताल में उपलब्ध हमेशा है , सबको लूटता हमेशा ही हरजाई । 
 
ऊंची दुकान पर मीठे फीके पकवान , बिकता खूब मिलावटी सामान है 
तोल मोल कर बोलता मधुर बोल , होती तभी दोगुनी से चौगनी कमाई ।  
 
नेता कितना बड़ा चाहे हो छोटा , नहीं कभी भी सगा किसी का होता 
शहर राज्य देश सबका है लुटेरा , फिर भी कहलाता सबका है भाई ।
 
फ़र्ज़ नहीं निभाना उसको है आता , हरदम रहे मौज मनाता इतराता 
कागज़ी महल भी खूब बनाता जाता , हर अधिकारी होता करिश्माई । 
 
दूध है कितना कितना मिला पानी , बड़ी अजब है उसकी भी कहानी 
क्रीम मख़्खन पनीर दूध मलाई  ,  असली क्या नकली की कठिनाई । 
 
इक बाबा बना है बड़ा कारोबारी , गली गली जिसकी दुकान खुलती 
नाम पे उसके सब बढ़िया इश्तिहार  , खुद ही अपनी बजाए शहनाई ।
 
ताज़ी कहकर बासी दे जाये सब्ज़ी , दाम चौगने पर फिर भी सस्ती 
तराज़ू और गिनती में गड़बड़ है ज़रा  , बस नहीं है कुछ भी और बुराई ।
 
नगरपालिका का है इक कर्मचारी , होगा भला वह कैसे कोई अनाड़ी
तीज त्यौहार उपहार की खातिर , होती गली की पूरी तरह सफाई । 
 
सबको आईने सामने बिठा कर , इधर उधर की हर खबर सुनाकर
बाल संवारे ख़िज़ाब लगाए जो , हेयर सैलून पार्लर है अब नहीं नाई ।  
 
पत्नी को है रोज़ सताता जो ,  हरदम दहेज के ताने रहता सुनाता 
माल ससुर का सब खा जाता , बड़ा बेशर्म होता है ऐसा भी जंवाई ।    
 

 
 
   
 
 

मई 04, 2023

POST : 1659 कैसी पढ़ाई कैसी लिखाई ( हास्य रस ) डॉ लोक सेतिया

     कैसी पढ़ाई कैसी लिखाई ( हास्य रस ) डॉ लोक सेतिया

 
पकड़ी हाथ कलम न भरी दवात में कोई कोई स्याही  , 
पहाड़ यही है यही खाई पढ़ ली उन्होंने उलटी पढ़ाई ।
पहेली सब को समझ नहीं आई रुपया पैसा धेला पाई
उनका बही खाता खोले कौन किसकी शामत है आई । 
 
इक जादूगर की आंखों पर बंधी हुई थी इक काली पट्टी
कुंवे में मोटरकार चलाई रफ़्तार की सुई तक है घबराई ।
संकट से भगवान बचाए महाबली करना सबकी भलाई 
जिन राहों पर जाना वर्जित उन राहों की महिमा बढ़ाई । 
 
विद्यालय गुरुकल शिक्षक सब ज्ञानवान लोग व्यर्थ थे 
नहीं पढ़ी पढ़ाई जीवन भर कहते है जिसको चतुराई । 
लाठी जिसकी भैंस उसी की भैंस के आगे बीन बजाई 
सब तरसते छाछ नहीं मिलती दूध मलाई उसने खाई । 
 
भीख नहीं मिलती सभी को उनकी किस्मत रंग है लाई 
मांग के पेट भरते , मूर्ख खाते हक की महनत की कमाई ।
खाया जमकर अभी भी है भूखा पहेली सबको समझाई 
लाख किताबें पढ़ने वालों की होने लगी देखो जगहंसाई ।  

सबको बात उन्हीं की भाई उन जैसा नहीं कोई हरजाई 
मिल कर बैठी घर आंगन में मौसी ताई सब की भौजाई ।
एक था राजा बस राजा था नहीं थी कोई उसकी रानी 
भूल गए हम सारे लोग कहानी नानी ने क्या थी सुनाई । 
 
मौसम का मिजाज़ अलग है बादल बिन बरसात है आई 
तुमने साक़ी ग़ज़ब है ढाया नहीं बुझाई प्यास और बढ़ाई । 
झूठे सपने कितने देखे दिखलाए हक़ीक़त से नज़र बचाई 
दूल्हा भागा छोड़ बारात दुल्हन सुनती रही बस शहनाई ।   
     

 

अप्रैल 01, 2023

POST : 1641 चुप नहीं रहते तो यूं कहा करो ( हास्य-कविता ) डॉ लोक सेतिया

   चुप नहीं रहते तो यूं कहा करो ( हास्य-कविता ) डॉ लोक सेतिया 

सी लो लबों को और चुप रहा करो ,
ज़ुल्म भी हंसते हंसते सब सहा करो । 
 
चोर को साहूकार कहना सीखो भी  , 
अब ख़िज़ाओं को बहार कहा करो । 
 
ये ज़माना झूठे लोगों का है  ज़माना , 
हमको तुम सब पर ऐतबार कहा करो । 
 
देश के रहनुमाओं का यकीन करो , 
इश्तिहार पढ़कर सरकार कहा करो ।
 
उनकी हसरत मसीहा लोग समझें , 
क़ातिल पर आता है प्यार कहा करो ।
 
जिनके तख्त ओ ताज़ हुक़ूमत हो  , 
बड़े अच्छे उनके सब यार कहा करो । 
 
आप अपने ही घर में रहकर खुद को  ,
हम यहां पर हैं किराएदार कहा करो । 
 
ज़िंदगी और मौत दोनों का यकीन नहीं ,
जनाबेआली हम ख़ाकसार कहा करो । 
 
सितमगर है सितम की फ़ितरत भी है , 
ज़ख़्म देता है दिया उपहार कहा करो ।