हम बिक गये ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया
दिल के हाथों सरे - आम हम बिक गये
इस मुहब्बत में , बेदाम हम बिक गये ।
भूल से आ गए , मयकदे में कभी
पी के हाथों तिरे , जाम , हम बिक गये ।
आये बन कर , ख़रीदार बाज़ार में
और ले कर तिरा नाम हम बिक गये ।
तेरे ज़ुल्मों - सितम को भी , मेरे सनम
जान कर तेरा इनाम , हम बिक गये ।
आप अपना जनाज़ा उठाये हुए
हो के मज़बूर हर शाम हम बिक गये ।
कुछ नहीं मोल , बाज़ार में आपका
जब लगाया ये इल्ज़ाम हम बिक गये ।
सब ही ' तनहा ' पशेमान रहने लगे
उनको मिल जाये आराम हम बिक गये ।

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