फिर से कोई मुलाक़ात तो हो ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया
फिर से कोई मुलाक़ात तो हो
ख़ामोशी में भी कुछ बात तो हो ।
बिजलियां हैं , घटाएं भी काली
ख़ूब जम कर के बरसात तो हो ।
हिज्र की रात , होती है लंबी
अब कभी चांदनी रात तो हो ।
बात मौसम की हो अजनबी से
फिर नई इक शुरुआत तो हो ।
कल सुबह बात कुछ और होगी
ख़त्म बस आज की रात तो हो ।
दिल ये अपना अमानत है उनकी
दिल में उनके भी जज़्बात तो हो ।
रूठ जाते जो ' तनहा ' मनाते
कुछ , मनाने के हालात तो हो ।

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