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अगस्त 30, 2012

POST : 100 ज़िंदगी और कुछ भी नहीं ( अनकही कहानी ) डॉ लोक सेतिया

       ज़िंदगी और कुछ भी नहीं  ( अनकही कहानी ) डॉ लोक सेतिया 

 ये ज़िंदगी की दास्तान है जिस में कुछ भी स्थाई नहीं , निर्धारित नहीं , कोई सुःख दुःख कोई मिलन जुदाई कोई शिकवा शिकायत गिले होने पर भी वास्तव में कुछ नहीं बस जीवन में बदलाव होना इक निशानी है ।  सिर्फ खुद ही हमेशा उलझन है और समाधान भी , जैसा जीवन मिले स्वीकार करना चलते रहना है ।  इसी कारण खुद को छोड़ किसी और किरदार का कोई महत्व नहीं है जैसे कोई मुसाफ़िर किसी वाहन रेलगाड़ी से सफर करता है और रास्ते में कितने पड़ाव कितने यात्री आते जाते हैं कुछ पल या समय का साथ निभाते हैं ।  प्यार मनमुटाव जैसी बातें व्यर्थ हैं चिंता करने से हासिल कुछ नहीं होता है ।  अकेले आना है अकेले ही इक दिन सफ़र पूरा कर लौट जाना है , कहां से आये कहां जाना है किसी को नहीं मालूम बस चार घड़ी का मेला है ज़िंदगी ।  दिल उदास है अपनी उदासी अपना अकेलापन खुद ही महसूस होता है कोई भी ऐसा दिल से करीब नहीं जिसको बता सकें इक ख़ामोशी छाई हुई है भीतर से बाहर तक , न कोई दोस्त न कोई साथ देने को अजनबी भी दिखाई देता है ।  ज़िंदगी कोई तपता रेगिस्तान जैसी है जिस में प्यास बुझाने को सिर्फ इक मृगतृष्णा को सच समझ भागना है भागते भागते अंत हो जाता है ।  लेकिन अब दौड़ने का साहस बचा ही नहीं थक गया हूं भागते भागते । 
 
हर कहानी में कितने किरदार होते हैं ये ऐसी दास्तां हैं जिस में कोई भी किरदार ही नहीं है , खुद जिसकी बात है वो भी नहीं मिलता सिर्फ कुछ ख़्वाब कुछ भूली बिसरी यादें मिल जाती हैं कितनी ही कहानियों में ।  सभी का था जो उसका कौन अपना है उसे नहीं मिला ज़िंदगी भर ढूंढता रहा दुनिया भर में शहर शहर , गांव गांव तलाश सिर्फ उसी को जो मुमकिन है सिर्फ कल्पना ही हो वास्तव में कोई ऐसा हो ही नहीं , लेकिन उसको भरोसा था वो न केवल है बल्कि इक दिन मिलेगा भी ।  बचपन से बड़े होने तक अनगिनत लोगों से पहचान हुई सभी से साथ रहा कभी थोड़ा थोड़ा अधिक मगर हर कोई किसी मोड़ से अलग हो कर अपनी अपनी राह चला जाता रहा छोड़ कर या बिछुड़ कर ।   ज़रूरत थी तब अपनापन था संग संग चलने और मंज़िल तक रिश्ता निभाने की बातें हुई पर ज़रूरत नहीं रही तब कारण कितने थे रास्ता बदलने के लिए ।  जो भी मिलता हर कोई उस पर अधिकार समझ कर उसका उपयोग करता रहता कभी किसी पर उसको अपना अधिकार महसूस तक नहीं हुआ ।  महफ़िल में सभी अपनों की भीड़ में हमेशा अकेला अजनबी बनकर रहना उसकी नियति थी जैसे कोई अनचाहा बिना बुलाया महमान हो । 
 
कभी कभी विधाता से कहता क्या तुमने मेरे नसीब में वही शब्द नहीं लिखा जिसको लिखना ज़रूरी था शुरुआत ही प्यार शब्द से करनी थी , कभी किसी से चाहत नहीं मिली सभी ने ठोकर लगाई तिरस्कार किया छोटा समझा बराबर नहीं बिठाया कभी ।  अपनी व्यथा किसी को भी कभी सुना नहीं पाया हर कोई उसको अपनी बात कह कर चला जाता उस से नहीं पूछा क्यों इतने उदास इतने निराश रहते हो ।  अकेले ही अपने आंसूं बहाना उसकी आदत बनती गई सबके सामने ख़ामोश रहना चुपचाप दर्द सहना तकदीर ने उसे यही दिया था ।  कुछ कविताओं से इक बदनसीब की अनकही कहानी की बात समझने की कोशिश करते हैं । 
 

               कैद ( कविता )

कब से जाने बंद हूं
एक कैद में मैं
छटपटा रहा हूँ
रिहाई के लिये ।

रोक लेता है हर बार मुझे 
एक अनजाना सा डर
लगता है कि जैसे 
इक  सुरक्षा कवच है
ये कैद भी मेरे लिये ।

मगर जीने के लिए
निकलना ही होगा
कभी न कभी किसी तरह
अपनी कैद से मुझको ।

कर पाता नहीं
लाख चाह कर भी
बाहर निकलने का
कोई भी मैं जतन ।

देखता रहता हूं 
मैं केवल सपने
कि आएगा कभी मसीहा
कोई मुझे मुक्त कराने 
खुद अपनी ही कैद से । 
 
 

                  मैं ( नज़्म ) 

मैं कौन हूं
न देखा कभी किसी ने
मुझे क्या करना है
न पूछा ये भी किसी ने
उन्हें सुधारना है मुझको
बस यही कहा हर किसी ने ।

और सुधारते रहे
मां-बाप कभी गुरुजन
नहीं सुधार पाए हों दोस्त या कि दुश्मन ।

चाहा सुधारना पत्नी ने और मेरे बच्चों ने
बड़े जतन किए उन सब अच्छों ने
बांधते रहे रिश्तों के सारे ही बंधन
बनाना चाहते थे मिट्टी को वो चन्दन ।

इस पर होती रही बस तकरार
मानी नहीं दोनों ने अपनी हार
सोच लिया मैंने
जो कहते हैं सभी
गलत हूंगा मैं
वो सब ही होंगें सही
चाहा भी तो कुछ कर न सका मैं
सुधरता रहा
पर सुधर सका न मैं ।

बिगड़ा मैं कितना
कितनी बिगड़ी मेरी तकदीर
कितने जन्म लगेंगे
बदलने को मेरी तस्वीर 
जैसा चाहते हैं सब
वैसा तभी तो मैं बन पाऊं ।

पहले जैसा हूं
खत्म तो हो जाऊं
मुझे खुद मिटा डालो 
यही मेरे यार करो
मेरे मरने का वर्ना कुछ इंतज़ार करो । 
 


                   प्यास प्यार की ( कविता )

कहलाते हैं बागबां भी 
होता है सभी कुछ  उनके पास 
फिर भी खिल नहीं पाते 
बहार के मौसम में भी
उनके आंगन के कुछ पौधे ।

वे समझ पाते नहीं 
अधखिली कलिओं के दर्द को  ।

नहीं जान पाते 
क्यों मुरझाये से रहते  हैं
बहार के मौसम में भी 
उनके लगाये पौधे
उनके प्यार के बिना ।

सभी कहलाते हैं
अपने मगर
नहीं होता उनको
कोई सरोकार
हमारी ख़ुशी से
हमारी पीड़ा से ।

दुनिया में मिल जाते हैं
दोस्त बहुत
मिलता नहीं वही एक
जो बांट सके हमारे दर्द भी
और खुशियां भी
समझ सके
हर परेशानी हमारी 
बन कर किरण आशा की 
दूर कर सके अंधियारा
जीवन से हमारे ।

घबराता है जब भी मन
तनहाइयों से
सोचते हैं तब
काश होता अपना भी कोई ।

भागते जा रहे हैं
मृगतृष्णा के पीछे हम सभी
उन सपनों के लिये
जो नहीं हो पाते कभी भी पूरे ।

उलझे हैं सब
अपनी उलझनों में
नहीं फुर्सत किसी को 
किसी के लिये भी
करना चाहते हैं हम 
अपने दिल की किसी से बातें
मगर मिलता नहीं कोई 
हमें समझने वाला ।

सामने आता है
हम सब को नज़र 
प्यार का एक
बहता हुआ दरिया 
फिर भी नहीं मिलता 
कभी चाहने पर किसी को
दो बूंद भी  पानी
बस इतनी सी ही है 
अपनी तो कहानी । 
 
 

             बेबस जीवन ( कविता ) 

रातों को अक्सर
जाग जाता हूं
खिड़की से झांकती
रौशनी में
तलाश करता हूं
अपने अस्तित्व को ।

सोचता हूं
कब छटेगा
मेरे जीवन से अंधकार ।

होगी कब
मेरे लिये भी सुबह ।

उम्र सारी
बीत जाती है 
देखते हुए  सपने 
एक सुनहरे जीवन के ।

मैं भी चाहता हूं
पल दो पल को 
जीना ज़िंदगी को
ज़िंदगी की तरह ।

कोई कभी करता 
मुझ से भी जी भर के प्यार 
बन जाता कभी कोई
मेरा भी अपना ।

चाहता हूं अपने आप पर
खुद का अधिकार
और कब तक
जीना होगा मुझको
बन कर हर किसी का
सिर्फ कर्ज़दार
ज़िंदगी पर क्यों 
नहीं है मुझे ऐतबार । 
 
 

                  मुझे लिखना है  ( कविता ) 

कोई नहीं पास तो क्या
बाकी नहीं आस तो क्या ।

टूटा हर सपना तो क्या
कोई नहीं अपना तो क्या ।

धुंधली है तस्वीर तो क्या
रूठी है तकदीर तो क्या ।

छूट गये हैं मेले तो क्या
हम रह गये अकेले तो क्या ।

बिखरा हर अरमान तो क्या
नहीं मिला भगवान तो क्या ।

ऊँची हर इक दीवार तो क्या
नहीं किसी को प्यार तो क्या ।

हैं कठिन राहें तो क्या
दर्द भरी हैं आहें तो क्या ।

सीखा नहीं कारोबार तो क्या
दुनिया है इक बाज़ार तो क्या ।

जीवन इक संग्राम तो क्या
नहीं पल भर आराम तो क्या ।

मैं लिखूंगा नयी इक कविता
प्यार की  और विश्वास की ।

लिखनी है  कहानी मुझको
दोस्ती की और अपनेपन की ।

अब मुझे है जाना वहां
सब कुछ मिल सके जहाँ ।

बस खुशियाँ ही खुशियाँ हों 
खिलखिलाती मुस्कानें हों ।

फूल ही फूल खिले हों
हों हर तरफ बहारें ही बहारें ।

वो सब खुद लिखना है मुझे
नहीं लिखा जो मेरे नसीब में । 
 
 

              रास्ते ( कविता ) 

मंज़िल की जिन्हें चाह थी
मिल गई
उनको मंज़िल ।

मैं वो रास्ता हूं
गुज़रते रहे जिससे हो कर 
दुनिया के सभी लोग ।

तलाश में अपनी अपनी
मंज़िल की 
मैं रुका हुआ हूं
इंतज़ार में प्यार की ।
 
रुकता नहीं
मेरे साथ कोई भी 
कुचल कर
गुज़र जाते हैं सब
मंज़िल की तरफ आगे ।
 
सबको भाती हैं
मंज़िलें 
बेमतलब लगते हैं रास्ते ।

क्या मिल पाती तुम्हें मंज़िलें 
न होते जो रास्ते ।

रास्तों को पहचान लो 
उनका दर्द
कभी तो जान लो । 
 

                शून्यालाप ( कविता ) 

अंतिम पहर जीवन का
समाप्त हुआ अब बनवास
त्याग कर बंधन सारे
चल देना है अनायास
राह नहीं कुछ चाह नहीं
समाप्त हुआ वार्तालाप ।

विलीन हो रही आस्था
टूट रहा हर विश्वास
तम ने निगल लिया सूरज
जाने कैसा है अभिशाप ।

फैला है रेत का सागर
जल रहा तन मन आज
शब्द स्तुति के सब बिसरे
छूट गया प्रभु का साथ ।

मनाया उम्र भर तुमको
माने न तुम कभी मगर
खो जाना एक शून्य में
बनाना है शून्य को वास ।

अब खोजना नहीं किसी को
न आराधना की है आस
करना है समाप्त अब
खुद से खुद का भी साथ । 
 
 
 

                      थकान ( कविता ) 

जीवन भर चलता रहा
कठिन पत्थरीली राहों पर
मुझे रोक नहीं सके
बदलते हुए मौसम भी ।

पर मिट नहीं सका
फासला
जन्म और मृत्यु के बीच का ।

चलते चलते थक गया जब कभी
और खोने लगा धैर्य
मेरी नज़रें ढूंढती रहीं
किसी को जो चलता
कुछ कदम तक साथ साथ मेरे ।

और प्यार भरे बोलों से
भुला देता सारी थकान
जाने कहां अंत होगा
धरती - आकाश से लंबे
इस सफर का
और कब मिलेगा मुझे आराम ।



                      दो आंसू ( कविता )  

हर बार मुझे
मिलते हैं दो आंसू
छलकने देता नहीं
उन्हें पलकों से ।

क्योंकि
वही हैं मेरी
उम्र भर की
वफाओं का सिला ।

मेरे चाहने वालों ने
दिया है
यही ईनाम
बार बार मुझको ।

मैं जानता हूं
मेरे जीवन का
मूल्य नहीं है
बढ़कर दो आंसुओं से ।

और किसी दिन
मुझे मिल जायेगी
अपनी ज़िंदगी की कीमत ।

जब इसी तरह कोई
पलकों पर संभाल कर 
रोक  लेगा अपने आंसुओं को
बहने नहीं देगा पलकों  से
दो आंसू ।  
 
इक ग़ज़ल कहना चाहता हूं अभी दो शेर ही लिखे हैं , पहला और इक आखिरी बीच में ख़ाली है जगह कभी बना पाया तो पूरी ग़ज़ल कहूंगा । 
 

पास कोई नहीं बुलाएं किसे हम 

दास्तां दर्द की सुनाएं किसे हम । 

उम्र भर ढूंढता रहा दोस्त ' तनहा '

हम जिये किसलिए बताएं किसे हम ।  

एक अनकही कहानी "ek ankahi kahani"







 
 

अगस्त 29, 2012

POST : 99 मिला था कभी इक पैगाम दोस्ती का ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

       मिला था कभी इक पैगाम दोस्ती का ( ग़ज़ल ) 

                      डॉ लोक सेतिया "तनहा"

मिला था कभी इक पैगाम दोस्ती का
हमें अब डराता है नाम दोस्ती का ।

बुझाता नहीं साकी प्यास क्यों हमारी
कभी तो पिलाता इक जाम दोस्ती का ।

नहीं दोस्त बिकते बाज़ार में कभी भी
चुका कौन पाया है दाम दोस्ती का ।

करेगा तिजारत की बात जब ज़माना
रखेंगे बहुत ऊँचा दाम दोस्ती का ।

हमें जीना मरना है साथ दोस्तों के
सभी को है देना पैग़ाम दोस्ती का ।

वफ़ा नाम देकर करते हैं बेवफाई
किया नाम "तनहा" बदनाम दोस्ती का । 
 

 

POST : 98 बिजलियों का भी धड़का है बरसात में ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

        बिजलियों का भी धड़का है बरसात में ( ग़ज़ल ) 

                         डॉ लोक सेतिया "तनहा"

बिजलियों का भी धड़का है बरसात में
क्या गज़ब ढाये काली घटा रात में।

कुछ कहा सादगी से भी उसने अगर
राज़ था इक छुपा उसकी हर बात में।

कम नहीं है ज़माने के लोगों से वो
बस लिया देख पहली मुलाक़ात में।

राह तकती किसी की वो छत पर खड़ी
देखा जब भी उसे चांदनी रात में।

हारते सब रहे इस अजब खेल में
लोग उलझे रहे यूँ ही शह-मात में। 

POST : 97 मुश्किलों का नाम है ये ज़िंदगी ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

मुश्किलों का नाम है ये ज़िंदगी ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

मुश्किलों का नाम है ये ज़िंदगी
दर्द का इक जाम है ये ज़िंदगी।

याद रहता है हमें जो उम्र भर
मौत का पैगाम है ये ज़िंदगी।

मुस्कुराती सुबह आती है मगर
फीकी फीकी शाम है ये ज़िंदगी।

है कभी फूलों सी कांटों सी कभी
नित नया अंजाम है ये ज़िंदगी।

जानते ये राज़ "तनहा" काश हम
इक बड़ा ईनाम है ये ज़िंदगी।
 

POST : 96 आपने जब पिलाना छोड़ दिया ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

आपने जब पिलाना छोड़ दिया ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

आपने जब पिलाना छोड़ दिया
मयकदे हमने जाना छोड़ दिया ।

रोज़ महफ़िल जमाना छोड़ दिया
घर किसी को बुलाना छोड़ दिया ।

अब कहीं आना जाना छोड़ दिया
आपका आशियाना छोड़ दिया ।

दोस्तों का ठिकाना छोड़ दिया
दुश्मनों से निभाना छोड़ दिया ।

ज़िंदगी को डराना छोड़ दिया
अब ज़हर रोज़ खाना छोड़ दिया ।

चारागर को बुलाना छोड़ दिया
दर्द को खुद बढ़ाना छोड़ दिया ।

गैर सारा ज़माना छोड़ दिया
आज "तनहा" ने माना छोड़ दिया ।
                                                    
(  चारागर = डॉक्टर = चिकित्सक )

अगस्त 27, 2012

POST : 95 महफ़िल में जिसे देखा तन्हा - सा नज़र आया ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

      महफ़िल में जिसे देखा तन्हा - सा नज़र आया ( ग़ज़ल ) 

                         डॉ लोक सेतिया  ' तनहा '

महफ़िल में जिसे देखा तन्हा - सा नज़र आया
सन्नाटा वहां हरसू फैला - सा नज़र आया ।

हम देखने वालों ने देखा यही हैरत से
अनजाना बना अपना , बैठा - सा नज़र आया ।

मुझ जैसे हज़ारों ही मिल जायेंगे दुनिया में
मुझको न कोई लेकिन , तेरा - सा नज़र आया ।

हमने न किसी से भी मंज़िल का पता पूछा
हर मोड़ ही मंज़िल का रस्ता - सा नज़र आया ।

हसरत सी लिये दिल में , हम उठके चले आये
साक़ी ही वहां हमको प्यासा - सा नज़र आया ।   
 

 

POST : 94 इस दरजा एतबार क्यों ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

इस दरजा एतबार क्यों ( ग़ज़ल ) डॉ  लोक सेतिया "तनहा"

इस दरजा एतबार क्यों
कहते हो बार बार क्यों ।

कोई बताये किस तरह
ग़म का है इव्वास्तगार क्यों ।

मुरझाये गुल कभी नहीं
उस को न इख्तियार क्यों ।

जाने किसी के आने का
हम को है इंतज़ार क्यों ।

पूछो न हमसे आज तुम
दिल का गया करार क्यों ।

उनको सुना नई ग़ज़ल
"तनहा" है बेकरार क्यों ।   
 

 

POST : 93 हादिसों की अब तो आदत हो गई है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

       हादिसों की अब तो आदत हो गई है ( ग़ज़ल ) 

                     डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

हादिसों की अब तो आदत हो गई है
ग़म से कुछ कुछ हमको राहत हो गई है ।
 
दूर से ही लोग करते हैं इशारे 
शहर में मेरी तो शोहरत हो गई है ।

किस तरह बाज़ार सारा हम खरीदें
उनको तो हर शै की चाहत हो गई है ।

थे मुहब्बत करने वालों के जो दुश्मन
आज उनको भी मुहब्बत हो गई है ।

रात - दिन रोये तुम्हें हम याद करके  
भूलने की अब तो आदत हो गई है ।

अब ख़ुशी है और ग़म न हमको 
राम जाने जाने कैसी हालत हो गई है । 
 
सिर्फ कुर्सी चाहिए ' तनहा ' सभी को 
देश की कैसी सियासत हो गई है ।  
 

 

POST : 92 शिकवा किस्मत का न करना ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

शिकवा किस्मत का न करना ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

शिकवा किस्मत का न करना
ग़म से घबरा कर न मरना ।

माना ये दुनिया है ज़ालिम
तुम न इस दुनिया से डरना ।

नफरतों की है ये दल दल
तुम इधर से मत गुज़रना ।

अश्क पी लेना मगर तुम
प्यार को रुसवा न करना ।

तुम न पहचानो जो खुद को
इस कदर भी मत संवरना ।

हो सका न निबाह तुम से
तुम न इस सच से मुकरना । 
 
 



POST : 91 वो जो कहते थे हमको कि सच बोलिए ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

      वो जो कहते थे हमको कि सच बोलिए ( ग़ज़ल ) 

                    डॉ लोक सेतिया  ' तनहा '


वो जो कहते थे हमको कि सच बोलिये 
झूठ के साथ वो लोग खुद हो लिये । 
 
देखा कुछ ऐसा आगाज़ जो इश्क़ का 
सोच कर उसका अंजाम हम रो लिये । 
 
हम तो डर ही गये , मर गये सब के सब 
आप ज़िंदा तो हैं , अपने लब खोलिये । 
 
घर से बेघर हुए आप क्यों इस तरह 
राज़ आखिर है क्या ? क्या हुआ बोलिये । 
 
जुर्म उनके कभी भी न साबित हुए 
दाग़ जितने लगे इस तरह धो लिये । 
 
धर्म का नाम बदनाम होने लगा 
हर जगह इस कदर ज़हर मत घोलिये ।
 
महफ़िलें आप की , और  ' तनहा ' हैं हम 
यूं न पलड़े में हल्का हमें तोलिये । 
 
 

POST : 90 बहस भ्र्ष्टाचार पर वो कर रहे थे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

बहस भ्र्ष्टाचार पर वो कर रहे थे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

बहस भ्रष्टाचार पर वो कर रहे थे
जो दयानतदार थे वो डर रहे थे ।

बाढ़ पर काबू पे थी अब वारताएं
डूब कर जब लोग उस में मर रहे थे ।

पी रहे हैं अब ज़रा थक कर जो दिन भर
मय पे पाबंदी की बातें कर रहे थे ।

खुद ही बन बैठे वो अपने जांचकर्ता
रिश्वतें लेकर जो जेबें भर रहे थे ।

वो सभाएं शोक की करते हैं ,जो कल
कातिलों से मिल के साज़िश कर रहे थे ।

भाईचारे का मिला इनाम उनको
बीज नफरत के जो रोपित कर रहे थे ।  
 
मौज-मस्ती रंग-रलियां ऐश कर के 
देश पर अहसान ' तनहा ' कर रहे थे ।  
 
 

 
 
 


 
 
 

POST : 89 दर्द दे कर हमें जो सताये कोई ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

दर्द दे कर हमें जो सताये कोई ( ग़ज़ल ) डॉ  लोक सेतिया ' तनहा '

दर्द दे कर हमें जो सताये कोई
हम किधर जाएं फिर ये बताये कोई ।

रूठ कर हम तो बैठे हैं इस आस में
हम को अपना समझ कर मनाये कोई ।

दर खुला हमने रक्खा है इस वास्ते
कोई वादा नहीं फिर भी आये कोई ।

बेख्याली में कब जाने किस मोड़ पर
राह में हाथ हमसे मिलाये कोई ।

याद आये किसी की तो भर आये दिल
इस तरह भी न हम को रुलाये कोई ।

अश्क पलकों पे आ कर छलकने लगें
इस कदर आज हमको हंसाये कोई ।

शाम ढलते ही इस धुन में रहते हैं हम
काश पुरदर्द नग्मा सुनाये कोई । 
 

 

अगस्त 26, 2012

POST : 88 न आयें अगर वो करें क्या बताओ ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

न आयें अगर वो करें क्या बताओ ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

न आएं अगर वो , करें क्या बताओ
वो आएं  , बहाना कुछ ऐसा बनाओ ।

कशिश उनके दिल में भी पैदा करो तुम
उन्हें , वरना तुम , कर के कोशिश भुलाओ ।

मुहब्बत कभी , इस तरह भी हुई है
बुलायें तुम्हें पास , तुम दूर जाओ ।

उसे सिज्दा कर के हुए हम तो काफ़िर
अगर हो सके  , उस खुदा को मनाओ ।

जो उम्मीद टूटी तो फिर होगी मुश्किल
न यूं दिल को झूठे दिलासे दिलाओ ।

जगह दो न दो अपने दिल में हमें तुम
बस इक बार हमसे नज़र तो मिलाओ ।

वो अनजान बनते हैं सब जान कर भी
उन्हें हाल-ए-दिल तुम न 'तनहा' सुनाओ ।   
 

 

POST : 87 तुम ही न मिले एक ज़माना तो मिला है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

        तुम ही न मिले एक ज़माना तो मिला है ( ग़ज़ल ) 

                            डॉ लोक सेतिया  ' तनहा '

तुम ही न मिले एक ज़माना तो मिला है
ये मेरी वफाओं का मिला खूब सिला है ।

इक बूँद को तरसा किये हम प्यास के मारे
ऐसे तो बरसता न ये सावन से गिला है ।

आती रही यूं तो बहारें ही बहारें
बिन तेरे मगर दिल का कोई फूल खिला है ।

मिल जाते हैं हमदर्द यहां कहने को लेकिन
बांटे भी वो हम किससे जो ग़म तुम से मिला है ।

हंसता है खुदा जाने ये क्यूं हम पे ज़माना
आंसू कोई शायद तेरी पलकों पे ढला है ।

दो पल ही गुज़ारे थे तेरे साथ ब - मुश्किल
इक उम्र बड़ी पा के मगर  ' लोक ' चला है । 
 

 
 


 

POST : 86 रंक भी राजा भी तेरे शहर में ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

रंक भी राजा भी तेरे शहर में ( ग़ज़ल ) डॉ  लोक सेतिया "तनहा"

रंक भी राजा भी तेरे शहर में
मैं कहूं यह  बात तो किस बहर में ।

नाव तूफां से जो टकराती रही
वो किनारे जा के डूबी लहर में ।

ज़ालिमों के हाथ में इंसाफ है
रोक रोने पर भी है अब कहर में ।

मर के भी देते हैं सब उसको दुआ
जाने कैसा है मज़ा उस ज़हर में ।
 
सब कहीं सच ही पराजित हो रहा 
बच सका ज़िंदा कहां इस दहर में । 
 
जगमगाने  लग गईं रातें यहां 
कोहरा छाने लगा पर सहर में । 
 
बिक गया ' तनहा ' यहां सब का इमां  
लोग जाते हैं बदल हर पहर में  । 
 
 

 
 


 
 
 
 
 
     
 

POST : 85 उस को यूं हैरत से मत देखा करो ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

उस को यूं हैरत से मत देखा करो ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

उस को यूं हैरत से मत देखा करो
ज़िंदगी तो हादिसों का नाम है ।

जिसको ठुकराने चले तुम बिन पढ़े
दोस्ती ही का तो वो पैगाम है ।

उठ गया अब तो जहां से ऐतबार
शहर वालों में ये चर्चा आम है ।

काफिले में चल रहे हैं साथ साथ
अपनी अपनी फिर भी तन्हा शाम है ।

देख कर लाशें कभी रोते नहीं
खोदना ही कब्र उनका काम है ।

"सत्यवादी" कह के हंसता है जहां
बस यही सच कहने का ईनाम  है । 
 
बन गए ' तनहा ' मसीहा तो कई 
हर किसी पर कुछ न कुछ इल्ज़ाम है ।  
 
 
 

 

POST : 84 बस मोहब्बत से उसको शिकायत रही ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

         बस मोहब्बत से उसको शिकायत रही ( ग़ज़ल ) 

                            डॉ लोक सेतिया "तनहा"

बस मोहब्बत से उसको शिकायत रही
इस ज़माने की ऐसी रिवायत रही ।

इक हमीं पर न थी उनकी चश्मे करम
सब पे महफ़िल में उनकी इनायत रही ।

हम तो पीते हैं ये ज़हर ,पीना न तुम
उनकी औरों को ऐसी हिदायत रही ।

उड़ गई बस धुंआ बनके सिगरेट का
राख सी ज़िंदगी की हिकायत रही ।

भर के हुक्का जो हाकिम का लाते रहे
उनको दो चार कश की रियायत रही । 
 
अनसुनी बेकसों की रही दास्तां 
ज़ुल्म वालों को मिलती हिमायत रही । 
 
जिनकी झोली थी "तनहा" लबालब भरी 
सब मिले उनकी हसरत निहायत रही । 



POST : 83 बहती इंसाफ की हर ओर यहां गंगा है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

     बहती इंसाफ की हर ओर यहां गंगा है ( ग़ज़ल ) 

                    डॉ लोक सेतिया "तनहा"

बहती इंसाफ की हर ओर यहां गंगा है
जो नहाये न कभी इसमें वही चंगा है।

वह अगर लाठियां बरसायें तो कानून है ये
हाथ अगर उसका छुएं आप तो वो दंगा है।

महकमा आप कोई जा के  कभी तो देखें
जो भी है शख्स उस हम्माम में वो नंगा है।

ये स्याही के हैं धब्बे जो लगे उस पर
दामन इंसाफ का या खून से यूँ रंगा है।

आईना उनको दिखाना तो है उनकी तौहीन
और सच बोलें तो हो जाता वहां पंगा है।

उसमें आईन नहीं फिर भी सुरक्षित शायद
उस इमारत पे हमारा है वो जो झंडा है।

उसको सच बोलने की कोई सज़ा हो तजवीज़
"लोक" राजा को वो कहता है निपट नंगा है।  
 

 

POST : 82 जा के किस से कहें हमको क्या चाहिए ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

 जा के किस से कहें हमको क्या चाहिए ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

 
जा के किस से कहें हमको क्या चाहिए
ज़हर कोई न कोई दवा चाहिए ।

और कुछ भी तो हमको तम्मना नहीं
सांस लेने को थोड़ी हवा चाहिए ।

हाल -ए -दिल आ के पूछे हमारा जो खुद
ऐसा भी एक कोई खुदा चाहिए ।म 

अपनों - बेगानों से अब तो दिल भर गया
एक इंसान इंसान सा चाहिए ।

देख कर जिसको मिट जाएं दुनिया के ग़म
कोई मासूम सी वो अदा चाहिए ।

और कुछ भी नहीं है ज़रूरत हमें 
ज़िंदगी के लिए हौसला चाहिए । 
 
हर किसी को न जाने ये क्या हो गया 
सब को ' तनहा ' यहां फ़ासला चाहिए ।  
 
 

 
 


 
 

POST : 81 पास आया नज़र जो किनारा हमें ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

पास आया नज़र जो किनारा हमें ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

पास आया नज़र जो किनारा हमें
मौज ने दूर फेंका दोबारा हमें ।

ख़ुदकुशी का इरादा किया जब कभी
यूँ लगा है किसी ने पुकारा हमें ।

लड़खड़ाये तो खुद ही संभल भी गए
मिल न पाया किसी का सहारा हमें ।

हो गई अब तो धुंधली हमारी नज़र
दूर से तुम न करना इशारा हमें ।

दुश्मनों से न इतना करम हो सका
हमने चाहा जो मरना न मारा हमें ।

हमको मालूम है मौत देगी सुकूं
ज़िंदगी से मिला बोझ सारा हमें ।

बिन बुलाये यहां आप क्यों आ गये
सबने ' तनहा ' था ऐसे निहारा हमें ।