मेरे ब्लॉग पर मेरी ग़ज़ल कविताएं नज़्म पंजीकरण आधीन कॉपी राइट मेरे नाम सुरक्षित हैं बिना अनुमति उपयोग करना अनुचित व अपराध होगा । मैं डॉ लोक सेतिया लिखना मेरे लिए ईबादत की तरह है । ग़ज़ल मेरी चाहत है कविता नज़्म मेरे एहसास हैं। कहानियां ज़िंदगी का फ़लसफ़ा हैं । व्यंग्य रचनाएं सामाजिक सरोकार की ज़रूरत है । मेरे आलेख मेरे विचार मेरी पहचान हैं । साहित्य की सभी विधाएं मुझे पूर्ण करती हैं किसी भी एक विधा से मेरा परिचय पूरा नहीं हो सकता है । व्यंग्य और ग़ज़ल दोनों मेरा हिस्सा हैं ।
जुलाई 25, 2026
POST : 2092 हुक्मरान डर गया ( कविता ) डॉ लोक सेतिया
POST : 2091 काश मिलता एक अपना ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया
काश मिलता एक अपना ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया
जुलाई 24, 2026
POST : 2090 शिक्षा- नीति का सुधार जारी है ( व्यंग्य - कथा ) डॉ लोक सेतिया
शिक्षा- नीति का सुधार जारी है ( व्यंग्य - कथा ) डॉ लोक सेतिया
वतन के घोटालों पर इक चौपाई लिखो ( हास्य-व्यंग्य कविता )
डॉ लोक सेतिया
वतन के घोटालों पर इक चौपाई लिखोआए पढ़ाने तुमको नई पढ़ाई लिखो ।
जो सुनी नहीं कभी हो , वही सुनाई लिखो
कहानी पुरानी मगर , नई बनाई लिखो ।
क़त्ल शराफ़त का हुआ , लिखो बधाई लिखो
निकले जब कभी अर्थी , उसे विदाई लिखो ।
सच लिखे जब भी कोई , कलम घिसाई लिखो
मोल विरोध करने का , बस दो पाई लिखो ।
बदलो शब्द रिश्वत का , बढ़ी कमाई लिखो
पाक करेगा दुश्मनी , उसको भाई लिखो ।
देखो गंदगी फैली , उसे सफाई लिखो
नहीं लगी दहलीज पर , कोई काई लिखो ।
पकड़ लो पांव उसी के , यही भलाई लिखो
जिसे बनाया था खुदा , नहीं कसाई लिखो ।
जुलाई 23, 2026
POST : 2089 हमें जो ज़िंदगी ने ना सताया होता ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया
हमें जो ज़िंदगी ने ना सताया होता ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया
जुलाई 22, 2026
POST : 2088 सीजीआई का कॉपीराइट ( हास्य व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया
सीजीआई का कॉपीराइट ( हास्य व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

POST : 2087 लोकनायक जयप्रकाश को गलत आपात्काल को उचित साबित कर दिया { ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया }
लोकनायक जयप्रकाश को गलत आपात्काल को उचित साबित कर दिया
( आलेख ) डॉ लोक सेतिया
ये ज़ब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने ,
लम्हों ने ख़ता की थी सदियों ने सज़ा पाई ।
। । मुज़फ़्फ़र रज़्मी । ।
आखिर में शायर कुलदीप सलिल जी की लाजवाब ग़ज़ल आधुनिक दौर में सार्थक है :
इस कदर कोई बड़ा हो मुझे मंज़ूर नहीं
रौशनी छीन के घर घर से चिरागों की अगर
चाँद बस्ती में उगा हो मुझे मंज़ूर नहीं।
मुस्कुराते हुए कलियों को मसलते जाना
आपकी एक अदा हो मुझे मंज़ूर नहीं।
सीख ले दोस्त भी कुछ तो तजुर्बे से कभी
काम ये सिर्फ मेरा हो मुझे मंज़ूर नहीं।
खूब तू खूब तेरा शहर ता उम्र मगर
एक ही आबो हवा हो मुझे मंज़ूर नहीं।
हूं मैं कुछ आज अगर तो हूं बदौलत उसकी
मेरे दुश्मन का बुरा हो मुझे मंज़ूर नहीं।
हो चरागां तेरे घर में मुझे मंज़ूर सलिल
गुल कहीं और दिया हो मुझे मंज़ूर नहीं।

जुलाई 19, 2026
POST : 2086 संविधान की खोज ( व्यंग्य - कथा ) डॉ लोक सेतिया
संविधान की खोज ( व्यंग्य - कथा ) डॉ लोक सेतिया
देश के वर्तमान हालात पर वक़्त के दोहे : -
( डॉ लोक सेतिया )
मचा हुआ है हर तरफ लोकतंत्र का शोर
कोतवाल करबद्ध है डांट रहा अब चोर ।
तड़प रहे हैं देश के जिस से सारे लोग
लगा प्रशासन को यहाँ भ्रष्टाचारी रोग ।
दुहराते इतिहास की वही पुरानी भूल
खाना चाहें आम और बोते रहे बबूल ।
झूठ यहाँ अनमोल है सच का ना व्योपार
सोना बन बिकता यहाँ पीतल बीच बाज़ार ।
नेता आज़माते अब गठबंधन का योग
देखो मंत्री बन गए कैसे कैसे लोग ।
चमत्कार का आजकल अदभुत है आधार
देखी हांडी काठ की चढ़ती बारम्बार ।
आगे कितना बढ़ गया अब देखो इन्सान
दो पैसे में बेचता यह अपना ईमान।








