जुलाई 25, 2026

POST : 2092 हुक्मरान डर गया ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

           हुक्मरान डर गया ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

आवाज़ आत्मा की शख़्स जो दफन कर गया  
आता तो नज़र ज़िंदा दरअसल है वो मर गया । 
 
झूठी थी उसकी बातें दिन भी थे अंधेरी रातें 
आया जो वक़्त अपनी हर बात से मुकर गया। 
 
हमने जिसे बिठाया था तख़्त ओ ताज पर वही 
ज़ालिम हमारे जिस्म को ज़ख्मों से है भर गया । 
 
कहता था मैं गरीब हूं अवसर की मुझे है तलाश 
सामान घर का बेच  कब जाने चला किधर गया। 
 
ख़ैरात मांगना हमेशा सीखा था उसने सिर्फ यही  
जो लूट कर शहर को हद से भी आगे गुज़र गया । 
 
सपने बड़े दिखाए हक़ीक़त नहीं दिखला पाया वो 
ठगों चोरों का साथी बन खज़ाना उनका भर गया । 
 
उस पर नशा चढ़ा है सत्ता का इतना ज़्यादा देखो 
अपने बनाने वाले को ही पहचानने से भी मुकर गया ।
 
करने लगा है प्यार देश के दुश्मनों से हद से बढ़कर 
शर्मो हया को छोड़कर क्या क्या नहीं वह कर गया ।
 
कोतवाल कर जोड़ कर खड़ा है चोरों की सभा में अब 
सुन कर कहानी सच्ची देखो कोई हुक्मरान है डर गया।    
 
 Saath dar gaya samjho mar Gaya - An online Hindi story written by Narendra Mahadev | Pratilipi.com
 
 
 

POST : 2091 काश मिलता एक अपना ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

         काश मिलता एक अपना ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया  

काश मिलता एक अपना 
इक यही बाक़ी है सपना । 
 
फूल - कांटे एक दोनों 
क्यों किसी में फ़र्क रखना । 
 
अब तो सागर की तरह तुम 
सीख लो चुपचाप बहना । 
 
उठ के महफ़िल से चले हम 
भूल जाना , याद करना । 
 
हम वो प्यासे लोग जिनको 
सूख जाता  , देख झरना ।
 
हम , नहीं परवाह करते 
कुछ नहीं अब और कहना । 
 
छोड़ दो ' तनहा '  ये बातें 
रोज़ जीना ,  रोज़ मरना ।  
 

 
 
 

जुलाई 24, 2026

POST : 2090 शिक्षा- नीति का सुधार जारी है ( व्यंग्य - कथा ) डॉ लोक सेतिया

 शिक्षा- नीति का सुधार जारी है ( व्यंग्य - कथा ) डॉ लोक सेतिया 

ये सारा हंगामा व्यर्थ है शिक्षा मंत्रालय की आवश्यकता नहीं रही है जो पढ़ाई संविधान लोकतंत्र मौलिक अधिकार समानता इत्यादि को आधार बनाकर चलती रही थी उस से देश का कभी कल्याण नहीं होने वाला था।  लोग नासमझ हैं नादान हैं उनको खबर तक नहीं हुई कब कैसे हमने शासन की बागडोर संभालते ही तर्कसंगत वैज्ञानिक पढ़ाई को कहीं गहराई में दफ़्न कर इक ऐसी शिक्षा प्रणाली की शुरुआत की है जिस में अधिकार या विरोध नहीं सत्ता से याचना या खैरात हासिल करने को उपलब्धि समझा जाता है। कभी सोचा है जितने भी लोग पहले शिक्षा हासिल कर सरकारी नौकरियां पाकर ऊंचे ऊंचे पदों पर पहुंचे हैं उन्होंने प्रशासनिक अधिकारी कर्मचारी से अदालत के न्यायधीश बन कर भी कुछ भी बदलाव व्यवस्था में नहीं किया बल्कि उसको और गंदा बनाकर खुद को महान घोषित किया है। सत्ता की मनमानी का समर्थन कर सही गलत की बात को दरकिनार कर खुद की खातिर कितना हासिल किया है । ऐसी शिक्षा जो आदमी को आदमी नहीं इक ख़ुदगर्ज़ विवेकहीन अधिकारी बनाती हो जिस में जनता का कल्याण कभी संभव ही नहीं हो उसको त्याग कर ऐसी व्यवस्था बनाने का प्रयास है जिस में लोगों को घना अंधकार भी ऐसा दिखाई दे जैसे सुनहरी किरणे नज़र आ रही हैं । जब पढ़ लिख कर लोग शिक्षा और स्वास्थ्य का ही नहीं तमाम उच्च शिक्षा का कारोबार व्यौपार करते हैं और पढ़ने वाले को समझदार चिंतनशील नहीं मतलबी और सिर्फ पैसे बनाने की मशीन बनाते हैं तब ऐसी पढ़ाई से देश समाज में बदलाव कभी नहीं हो सकता है । वो पुरानी शिक्षा व्यवस्था सड़ी गली लाईलाज रोग से ग्रस्त हो गई थी इसलिए उसका ख़ात्मा करना ही विकल्प बचा था । आपको बताते हैं जो शिक्षा हमने शुरू की है उसकी परिकल्पना और उद्देश्य क्या हैं और उस से आपको क्या हासिल हुआ है होने वाला है । 
 
हमने सरकार ने जैसा कि कहावत है पढ़ाते हैं सब को उलटी पढ़ाई का अर्थ जानते हुए उलटी पढ़ाई की शुरुआत की है । आपको सोशल मीडिया से मनगढ़ंत जानकारी हासिल कर दुनिया के सामने खुद अपना गुणगान करना सीखना चाहिए । यहां अवसर ही अवसर हैं आप सरकार की चाटुकारिता कर अनुकंपा से कितना कुछ हासिल करने के पात्र बन सकते हैं , पिछले कुछ सालों से सभी जगह सरकारी भर्तियों में यही मापदंड योग्यता का मानकर नियुक्तियां की जाती रही हैं । सत्तधारी दल के संचालक संगठन का सदस्य होना सबसे बड़ी योग्यता समझा जाता है । स्कूल कॉलेज की किताबी पढ़ाई से अधिकांश लोगों को कुछ भी हासिल नहीं होता है जबकि हमारी विचारधारा की धर्म और नफरत का प्रचार प्रसार करने की कला सीख कर आपको आसानी से मनचाहा वरदान मिल जाता है । टीवी चैनलों ने यही सबक सीखा है और मालामाल होते गए हैं , देश सेवा सामाजिक सरोकार की खोखली बातों से कभी किसी का पेट नहीं भरा है , सच जनहित की बात लिखने बोलने वाले या तो भूखे रहते हैं या फिर कभी झूठे आरोपों का सामना करने में असफ़ल हो जेल पुलिस थाने में कैदी बने फिरते हैं । आज़ादी से पहले की बात अलग थी अंग्रेजी शासन पर असर पड़ता था लेकिन आज की शासकीय प्रणाली किसी नियम कायदे किसी आदर्श नैतिकता की कायल नहीं है , मैं चाहे जो करूं मेरी मर्ज़ी ही उनका वास्तविक चरित्र है । जब नाचन लागी तो घूंघट काहे को समझते हुए लोकलाज को ताक पर रख दिया गया है । प्रधानमंत्री जी आपको रील बनाने से पकोड़े तलने की सलाह देते हैं जिस में किताबी शिक्षा की कोई आवश्यकता नहीं होती है । 
 
लेकिन फिर भी आपको कभी कभी शिक्षित होने का सर्टिफिकेट ज़रूरत पड़ती है और आप मोदी जी की तरह डिग्री दिखाने से इनकार नहीं कर सकते हैं । अनपढ़ हैं राजनीति गुंडागर्दी कर सकते हैं मगर जीवनसाथी चाहिए तो शिक्षित होने का प्रमाण ज़रूरी हो जाता है । लड़का या लड़की जो भी हो जीवनसाथी पढ़ा लिखा समझदार चाहता है सिर्फ झूठी बातें इधर उधर की बोलने से बात नहीं बनती है । लेकिन घबराने की आवश्यकता नहीं है आपको नकली डिग्रियां आसानी से मिल जाती हैं जिस पर सरकार कभी कोई रोक नहीं लगाती है सच तो ये है कि मालूम नहीं कितने लोग झूठी नकली डिग्रियां उपयोग कर कितने बड़े पदों पर कार्यरत हैं । नकली खाद्य पदार्थ से नकली समाज सेवा करने का धंधा भी आपको सब सुख सुविधाएं ही नहीं नाम शोहरत तक दिलवा सकता है । असली की आजकल कोई कीमत ही नहीं है नकली पर असली का लेबल लगा कर बेचने में सरकारी विभाग हमेशा सहयोग करते हैं । कुछ भी उनकी अनुमति बिना नहीं हो सकता है उनको सबकी खबर रहती है आपको तालमेल बिठाना आना चाहिए ।  
 
सरकार ने स्कूल कॉलेज भले नहीं बनाये हों सैर सपाटे तमाशे रोज़ करती रहती है ताकि आपको समय बिताने को मनोरंजन की कोई कमी नहीं महसूस हो , लेकिन आपको पैसा चाहिए तो फिर आपको सरकारी योजनाओं से लेकर कितनी तरह से जारी लूट खसूट में शामिल होना चाहिए । आपने देखा ही है भगवान का मंदिर भी चोरी डकैती का स्थान बन सकता है , जहां चाह , वहां राह इसी को कहते हैं । अभी तो सिर्फ झांकी है आगे कितना कुछ बाकी है किसी भी विभाग मंत्रालय की कोई ज़रूरत ही नहीं है ये सभी दिखावे को हाथी के दांत जैसे हैं सरकार और शासन तंत्र के असली दांत खाने वाले हैं जो सिर्फ बजट ही नहीं खाते बल्कि जनता को काटने कच्चा चबाने को तैयार हैं ।  आओ आपको इक सबक सिखाते है कुछ पढ़ना लिखना समझाते हैं इक हास्य कविता से आपको आधुनिक चौपाइयां लिखना समझाते हैं। 
 
 

वतन के घोटालों पर इक चौपाई लिखो ( हास्य-व्यंग्य कविता ) 

      डॉ लोक सेतिया

वतन के घोटालों पर इक चौपाई लिखो
आए पढ़ाने तुमको नई पढ़ाई लिखो ।

जो सुनी नहीं कभी हो , वही सुनाई लिखो
कहानी पुरानी मगर , नई बनाई लिखो ।

क़त्ल शराफ़त का हुआ , लिखो बधाई लिखो
निकले जब कभी अर्थी , उसे विदाई लिखो ।

सच लिखे जब भी कोई , कलम घिसाई लिखो
मोल विरोध करने का , बस दो पाई लिखो ।

बदलो शब्द रिश्वत का , बढ़ी कमाई लिखो
पाक करेगा दुश्मनी , उसको भाई लिखो ।

देखो गंदगी फैली , उसे सफाई लिखो
नहीं लगी दहलीज पर , कोई काई लिखो ।

पकड़ लो पांव उसी के , यही भलाई लिखो
जिसे बनाया था खुदा , नहीं कसाई लिखो । 
 

 

जुलाई 23, 2026

POST : 2089 हमें जो ज़िंदगी ने ना सताया होता ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

    हमें जो ज़िंदगी ने ना सताया होता ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया 

हमें जो ज़िंदगी ने ना सताया होता 
उसे हमने भी दुल्हन सा सजाया होता । 
 
मुस्कराना हमें भी आ गया होता , गर 
गले हमको कभी अपने लगाया होता । 
 
किसी तस्वीर की तकदीर बनती हाथों 
ब्रश जो हाथ में मेरे थमाया होता । 
 
मेरी आवाज़ से आवाज़ जो मिल जाती 
सुरीला राग मिलकर साथ गाया होता । 
 
तुझी से हम शिकायत क्यों तुम्हारी करते 
था जितना बोझ मिलकर जो उठाया होता । 
 
बिना मांगे मुहब्बत मिल ही जाती हमको  
तुम्हारे सामने सर ना झुकाया होता । 
 
कभी ना मौत को आवाज़ ' तनहा ' देते 
किसी का साथ उनको रास आया होता । 
 

 

जुलाई 22, 2026

POST : 2088 सीजीआई का कॉपीराइट ( हास्य व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

 सीजीआई  का कॉपीराइट  ( हास्य व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया 

हमारे सैंयां क्यों रूठे नाता अपना अटूट कभी न टूटे 
शिक्षित परिश्रमी काबिल सभी गुण होकर भी हम तो
सामाजिक विषमताओं के जाल में फंसकर भटकते थे 
कभी इधर कभी उधर नाकाम थे अनाम थे गुमनाम थे। 
 
देश के सबसे बड़ी अदालत के सबसे बड़े न्यायाधीश 
आपको अखरते हैं हिकारत से ही सही आपने समझा 
करीब क्या दूर भी दिखाई नहीं देते हम किसी को भी 
अनुकंपा की हमको नाम दिया कॉक्रोच हैं हम लोग ।  
 
आपकी अनचाही संतान हैं जैसे गरीबों की बस्तियां  
आपने बनाया है आपकी शरण में रहना नसीब अपना 
आपकी इक बात से हम सभी जाग उठे हैं नाकाम लोग 
आपको बनाना चाहिए कॉक्रोच का कोई नया आयोग। 
 
आपने अपना दामन छुड़ाना चाहा है फुर्सत नहीं कह के  
अपनी ही निर्मित रचना से ऐसा बर्ताव ठीक नहीं जनाब 
ख़त्म नहीं कर सकते हमको न अपने नाते को अब आप 
आपको नहीं मालूम हमारी ताकत चलेगा इक अभियोग । 
 
दिल एक मंदिर की नायिका समझ बैठे हैं शायद आप हमें 
अभागी गीत गाकर सुनाती है विवशता अपनी पति को जो 
हम तेरे प्यार में सारा आलम खो बैठे तुम कहते भूल जाओ 
पति के प्यार के पिंजरे में ही रहना उसकी नियति जीवन भर । 
 
हम कॉक्रोच आपकी बनाई व्यवस्था का शिकार कीड़े मकोड़े
आप महान कहलाते दुनिया भर के लिए पालक तारणहार हैं 
याद करो कभी आप भी हम जैसी कोई किसी की संतान थे 
अनगिनत परीक्षाओं बाद परिणाम नहीं ग़ज़ब के वरदान थे ।   
 
आपकी विवशता भी हम समझते हैं ख़त्म भी कर नहीं सकते  
संविधान आपको सभी को एक समान न्याय देने के कहता है 
आपको परेशानी है हम जैसों का ख़ात्मा नहीं कर सकते आप 
आपने नामकरण किया था तभी कुछ  न्याय की आस रखते हैं । 
 
ख़ास लोगों पर करते करम बस हम पर ढाते सितम पर सितम 
थोड़ा सा बचा रहने दे अपनी इंसाफ़ की चौखट का कुछ भरम 
मत देख हमारी तरफ कभी भी प्यार भरी अपनी इक नज़र से 
बेमौत मत मार हमको बोलकर नफरत की बात वाले ज़हर से ।   
 
आप जैसे बड़े बड़े पदों पर बैठे लोगों ने ही ये काम किया है 
मिलकर हम बेगुनाह लोगों को अकारण ही बदनाम किया है 
नाम आपका कॉक्रोच से कभी अलग हो नहीं सकता जान लो 
आपने अपनी इक मैली चादर डाल कर जुर्म लज़्ज़त किया है ।  
 
( इक ख़त लिखा है मुख्य न्यायधीश को संबोधित करते हुए 
पढ़ना नहीं चाहते समझना नहीं चाहते उनकी मर्ज़ी है साहिब ) 
 
 Supreme Court Refuses Urgent Hearing On Plea Seeking Probe Into Allegations  Regarding Fake Advocates With Cockroach Janta Party
 

POST : 2087 लोकनायक जयप्रकाश को गलत आपात्काल को उचित साबित कर दिया { ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया }

लोकनायक जयप्रकाश को गलत आपात्काल को उचित साबित कर दिया  

                          ( आलेख )  डॉ लोक सेतिया 

चलिए आपको 51 साल 24 दिन पीछे लिए चलते हैं , 25 जून 1975 की उस सभा का ये लेखक गवाह ही नहीं वहीं से शुरुआत हुई थी मेरे बौधिक सामाजिक विषयों पर खुद को समर्पित करने की । गंगा जमुना से कितना पानी बहता रहा और कितने शासक बनते बदलते रहे मगर मैं अपनी जगह पर अडिग खड़ा रहा हमेशा । कुछ शब्द और उनका भावार्थ समझना ज़रूरी है , जेपी ने उस दिन सभा में विशेष तौर पर इक बात कही थी जिसे देश की जनता से सत्ताधारी शासकों ने भुला दिया है । उन्होंने सुरक्षाबलों से आग्रह किया था कि क्योंकि उनकी निष्ठा संविधान और देश के कानून की तरफ है किसी राजनेता अथवा सरकार के प्रति नहीं इसलिए अगर कोई भी शासक आपको शांतिपूर्वक प्रदर्शन विरोध करने वाले लोगों पर लाठी गोली चलाने का आदेश दे तो उसे अनुचित असंवैधानिक समझ कर जनता पर हिंसा नहीं करनी चाहिए । अगर वह बात अनुचित थी तो जो लोग उसी आंदोलन में शामिल थे और आज सत्ता पर आसीन हैं उनको आपात्काल घोषणा पर कोई सवाल खड़ा करने या इंदिरा गांधी को दोष देने का अधिकार नहीं है। लेकिन आपात्काल की यातनाओं की दुहाई देने वाले आज 20 जुलाई को उस से कहीं अधिक तानाशाही और दमन का इतिहास रच रहे हैं । सबसे खेदजनक बात मुख्यधारा के मीडिया का एकतरफ़ा और झूठा पक्ष बनाकर विरोध को बदनाम करना है जो साबित करता है कि उनके लिए सरकारी पैसा विज्ञापन और तमाम अन्य सुख सुविधाएं प्राथमिकता हैं जनता की बात उसकी आवाज़ उसके अधिकार नहीं ।  
 

                         ये ज़ब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने  ,

                        लम्हों ने ख़ता की थी सदियों ने सज़ा पाई । 

                                   । । मुज़फ़्फ़र रज़्मी । । 

 

बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी। आज का टेलीविज़न अख़बार शोर मचा रहे है कि वो सभी देशहित में सरकार का पक्ष रख कर महान कार्य कर रहे हैं , अर्थात जनता के विरोध को अनुचित साबित करने को कुतर्क देकर तानाशाही को बढ़ावा देने का अधर्म कर रहे हैं । अगर उनका ये कदम सही है तो 1975 का संपूर्ण क्रांति अंदोलन से अन्ना हज़ारे का लोकपाल नियुक्त करने का आन्दोलन अनुचित था , जिसका समर्थन तब इन्हीं सभी चैनलों ने अख़बारों ने प्रमुखता से किया था ।  दूसरे शब्दों में ये पत्रकार अपने पुराने बड़े बड़े साहसी पत्रकारों को गलत साबित करना चाहते हैं या उनको मूर्ख समझते हैं जो उन्होंने शासक वर्ग से फ़ायदा उठाने का अवसर छोड़ जनहित की बात को उजागर कर अवसर खो दिया बहती गंगा में डुबकी लगाने से वंचित रह गए। जो अख़बार पत्रकार या लेखक या कलाकार टीवी फिल्म निर्माता सामाजिक सरोकार को छोड़ अपने लाभ की खातिर लिखता बोलता है उस को पीत पत्रकारिता कहते हैं । आज इन सभी की हालत ऐसी ही है पीलिया ही नहीं बल्कि कोई कैंसर जैसा रोग उनको लग गया है जो भीतर ही भीतर उनको खोखला कर रहा है। 
 
विसंगति देखिए जो लोग सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को नहीं मानते और अयोध्या में ढांचे को गैरकानूनी ढंग से तोड़ कर अपराधी साबित होने पर सज़ा से बच जाते हैं उनका आंदोलन सही था जिस में सभी मर्यादाओं का उलंघन किया गया और सत्ता की खातिर देश को धर्म के नाम पर विभाजित करने को कितने ही आयोजन करते रहे। लेकिन देश की वास्तविक समस्याओं पर चर्चा तक करना गुनाह कहलाने लगा है । आर्थिक बदहाली से चीन अमेरिका के सामने घुटने टेकना शौर्य कैसे कहला सकता है मगर शासक और पुलिस सुरक्षाबल अपना शौर्य प्रदर्शित करते है जनता पर लाठी आंसू गैस और ताकत का प्रदर्शन कर , उनकी सीमा पर विफलता ढक जाती है क्या ऐसा करने से।  

आखिर में शायर कुलदीप सलिल जी की लाजवाब ग़ज़ल आधुनिक दौर में सार्थक है : 

इस कदर कोई बड़ा हो मुझे  मंज़ूर नहीं 

कोई बन्दों में खुदा हो मुझे मंज़ूर नहीं।

रौशनी छीन के घर घर से चिरागों की अगर 

चाँद बस्ती में उगा हो मुझे मंज़ूर नहीं।

मुस्कुराते हुए कलियों को मसलते जाना 

आपकी एक अदा हो मुझे मंज़ूर नहीं।  

सीख ले दोस्त भी कुछ तो तजुर्बे से कभी 

काम ये सिर्फ मेरा हो मुझे मंज़ूर नहीं।  

खूब तू खूब तेरा शहर ता उम्र मगर 

एक ही आबो हवा हो मुझे मंज़ूर नहीं। 

हूं मैं कुछ आज अगर तो हूं बदौलत उसकी 

मेरे दुश्मन का बुरा हो मुझे मंज़ूर नहीं।   

हो चरागां तेरे घर में मुझे मंज़ूर सलिल 

गुल कहीं और दिया हो मुझे मंज़ूर नहीं।  

 

 
 Best Motivational Shayari in Hindi Status | मोटिवेशनल शायरी स्टेटस हिंदी
 

जुलाई 19, 2026

POST : 2086 संविधान की खोज ( व्यंग्य - कथा ) डॉ लोक सेतिया

       संविधान की खोज ( व्यंग्य - कथा ) डॉ लोक सेतिया  

कुछ दिनों से लोग उसकी चर्चा करने लगे हैं , कोई कुछ कहता है कोई कुछ और कहता है , ऐसे में किसी ने सवाल किया संविधान की हालत समझने से पहले ये तो पता चले कि वो आजकल है किस जगह किस की देखभाल में। संसद भवन से सर्वोच्च न्यायालय तक उसकी मूल भावना को देखने को मूलप्रति ढूंढने पर दिखाई नहीं दे रही है । क्या किसी ने गायब कर दिया है या छुपा दिया है अथवा किसी गहरे गढ्ढे में दफ़न कर दिया है , शोधकर्ता को आशंका है कि किसी किताब  को निरंतर बंद रखने और कभी खोल कर अधिक समय तक नहीं पढ़ने पर उसकी लिखावट से कागज़ तक जीर्ण - शीर्ण अथवा क्षरण होने या दीमक कीड़ों द्वारा खाया जाना एवं कबाड़ होना मुमकिन है। लेकिन किसी महापंडित ने बतलाया है कि संविधान की झूठी शपथ राजनेताओं ने इतनी बार उठाई है कि झूठी क़सम का बोझ बढ़ने से उसका दम घुट गया है। संविधान की चिंता उस पर चलने की उसका पालन करने की परवाह कभी भी किसी भी राजनैतिक दल ने नहीं की और सभी सरकारी प्रशासन कार्यपालिका न्यायपालिका ने उसके साथ मनमानी की है जैसे किसी बेबस अबला की आबरू को लूटते है तमाम वहशी लोग। कुछ लोग जगह जगह गुहार लगाते फिरते थे संविधान की सुरक्षा की लेकिन उनकी भी चिंता संविधान से पहले खुद अपने को लेकर रहती थी , इसलिए सोशल मीडिया पर शोर मचाना ही उनको ज़रूरी लगता था। जीवंत संविधान की शायद किसी को आवश्यकता ही नहीं महसूस हुई कभी। 
 
मैंने इंसाफ़ की गंगा को लेकर इक ग़ज़ल कही थी जो ब्लॉग मेरी किताब यूट्यूब चैनल पर उपलब्ध है और कितनी जगह प्रकाशित हुई थी कई साल पहले। 8 सितंबर 1998 की डायरी पर लिखी हुई आज भी रखी है। मैंने उस ग़ज़ल में इक शेर लिखा था जिस में संविधान को लेकर आशंका व्यक्त की थी कि जिन इमारतों पर तिरंगा फ़हराता है उन में भी शायद वो सुरक्षित नहीं है। मुझे मेरे गुरूजी ने आर पी महरिष जी ने शेर को शामिल नहीं करने अथवा फिर बदल कर झंडा शब्द करने का सुझाव दिया था और मैंने उनका आदेश मान लिया था। आज वो ज़िंदा नहीं हैं वर्ना शायद आज उनको भी लगता की शेर को रखना उचित था और झंडा नहीं तिरंगा शब्द उपयोग करना भी अनुचित नहीं था ।शायद तब ऐसी आशंका अधिकांश लोगों को नहीं थी जबकि आज सभी देख समझ रहे हैं कि देश के संविधान की वास्तविक भावनाओं से खिलवाड़ करना हर शासक की आदत बन गई है । 
 
संविधान ग़ुम  कर दिया गया है या उसका नामो - निशान मिटाकर उसकी दुहाई दी जा रही है पर उसकी तलाश कोई नहीं करना चाहता । सभी ने सत्ता और पैसे की ख़ातिर संविधान को अपनी मर्ज़ी से परिभाषित किया है , कौन कौन उसका गुनहगार है सूचि बड़ी लंबी है । जैसे कोई किसी का क़त्ल करने के बाद उसकी शोकसभा में संवेदना व्यक्त करता हो ऐसा ही शासक वर्ग करते हैं। अदालत दफ़्तर से सरकारी सभी संसथानों में रोज़ संविधान से विपरीत आचरण किया जाता है सिर्फ कहने को पालना की बार शपथ लेते समय की जाती है । कुछ दोहे पढ़ते हैं उस के बाद न्याय व्यवस्था पर मेरी ग़ज़ल सुनते हैं । 
 

देश के वर्तमान हालात पर वक़्त के दोहे : - 

( डॉ लोक सेतिया )  

नतमस्तक हो मांगता मालिक उस से भीख
शासक बन कर दे रहा सेवक देखो सीख ।

मचा हुआ है हर तरफ लोकतंत्र का शोर
कोतवाल करबद्ध है डांट रहा अब चोर ।

तड़प रहे हैं देश के जिस से सारे लोग
लगा प्रशासन को यहाँ भ्रष्टाचारी रोग ।

दुहराते इतिहास की वही पुरानी भूल
खाना चाहें आम और बोते रहे बबूल ।

झूठ यहाँ अनमोल है सच का ना  व्योपार
सोना बन बिकता यहाँ पीतल बीच बाज़ार ।

नेता आज़माते अब गठबंधन का योग
देखो मंत्री बन गए कैसे कैसे लोग ।

चमत्कार का आजकल अदभुत  है आधार
देखी हांडी काठ की चढ़ती बारम्बार ।

आगे कितना बढ़ गया अब देखो इन्सान
दो पैसे में बेचता  यह अपना ईमान।  
 
अंधे - बहरे शहर में ये बातें बेमोल 
कौन सुनेगा अब यहां तनहा तेरे बोल । 
 

 
   

जुलाई 16, 2026

POST : 2085 ख़ुद हमीं मझधार जाते रहे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

     ख़ुद हमीं मझधार जाते रहे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

ख़ुद हमीं मझधार जाते रहे 
जब किनारे पास आते रहे । 
 
अजनबी सब लोग भाये हमें
जो थे अपने वो सताते रहे । 
 
पास , चाहे दूर सबसे रहे 
प्यार की रस्में निभाते रहे ।  
 
आप पंछी की तरह उड़ गए 
मौसमों से आते - जाते रहे । 
 
उनको आना था न आये कभी 
ख़्वाब में आ कर सताते रहे ।  
 
कल कहां था दिल कहां आज है 
ख़ुद ही खोकर दिल को पाते रहे । 
 
बेख़बर लहरों से ' तनहा ' रहे 
रेत के घर  , फिर बनाते रहे । 
 

 
  
 

जुलाई 15, 2026

POST : 2084 आईना झूठ बोलने लगा है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

       आईना झूठ बोलने लगा है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

आईना झूठ बोलने लगा है 
वो तराज़ू भी डोलने लगा है । 
 
अपनी कीमत बड़ा-चढ़ा रहे सब 
अपने को आप तोलने लगा है । 
 
हर तरफ लूटमार हो रही है 
अब लहू सबका खौलने लगा है ।  
 
क्या सियासत की बात पूछते हो 
फिर वही  ज़हर घोलने लगा है । 
 
चोर को छोड़ कोतवाल अब तो 
रह गया कुछ , टटोलने लगा है । 
 
चीज़ अनमोल मिल गई किसी को 
धूल में उसको  रौलने लगा है । 
 
जान से हाथ धोएगा किसी दिन 
' लोक ' सच रोज़ बोलने लगा है ।  
 

 

जुलाई 14, 2026

POST : 2083 हर किसी के अहसान बहुत ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

       हर किसी के अहसान बहुत ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया 

 
हर किसी के अहसान बहुत
दिल के बाक़ी अरमान बहुत । 
 
सीखना क्या है , सीख लिया 
झूठ - सच की , पहचान बहुत । 
 
बस हमीं रहते घर पे सदा 
आते - जाते महमान बहुत । 
 
हमको महफ़िल में देख वहां  
हो गए सब , हैरान बहुत । 
 
मिल रहा बस इंसान नहीं 
मिल ही जाते शैतान बहुत । 
 
कुछ शराफ़त का मोल नहीं 
बिक रहे हैं , ईमान बहुत । 
 
ग़म - ख़ुशी ' तनहा ' एक यहां 
भावनाएं ,  बेजान बहुत ।     
 

 

जुलाई 06, 2026

POST : 2082 लब हैं ख़ामोश अश्क़ पीते हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

    लब हैं ख़ामोश अश्क़ पीते हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

लब हैं ख़ामोश अश्क़ पीते हैं  
लोग कुछ इस तरह भी जीते हैं । 
 
चारागर ढूंढते नहीं हम तो 
आप अपने ही ज़ख़्म सीते हैं । 
 
मयकदे में भी बैठे प्यासे हैं 
जाम मिलते ही जिनको रीते हैं । 
 
हम ख़िज़ा को बहार कह देते 
दिन युंहीं ज़िंदगी के बीते हैं । 
 
माल चोरी का बिक रहा ऐसे 
माप करने को बांस फीते हैं । 
 
आपको फ़ल मिला उसी का है 
कर्म जैसे भी रोज़ कीते हैं । 
 
पूछते लोग कौन ' तनहा ' हैं 
कुछ नहीं हम तो सिर्फ़ मनमीते हैं । 
 

  

जुलाई 05, 2026

POST : 2081 मैं कौन हूं मुझे पता ही नहीं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

 मैं कौन हूं मुझे पता ही नहीं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

 

मैं कौन हूं मुझे पता ही नहीं 
ख़ुद को कभी भी देखता ही नहीं ।  
 
हर रोज़ झूठ बोलते लोग पर 
ये बात कोई मानता ही नहीं । 
 
धनवान को तो सब हैं पहचानते 
मुफ़लिस को कोई जानता ही नहीं । 
 
इक रोज़ मर के जाएंगे सब समझ 
हर क़र्ज़ हो सका अता ही नहीं ।  
 
ज़िंदादिली से ज़िंदगी को जिएं  
थक टूट कर भी हारता ही नहीं ।  
 
खामोश रह के ज़ुल्म सहते रहे 
जो बोलना है बोलता ही नहीं । 
 
' तनहा ' बता जहान में कौन है 
जिस ने कभी भी की ख़ता ही नहीं। 
 

 

POST : 2080 दुनिया की पहचान ख़ुद से अनजान ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया

    दुनिया की पहचान ख़ुद से अनजान ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया 

सभी की उलझन यही है अपनी पहचान बनाना ज़माने भर से परिचित रहना , कभी भी कहीं भी कुछ लोग जब मिल कर बैठते हैं तब बातचीत चर्चा का विषय घूम फिर कर इसी शून्य के गिर्द घूमता रहता है । लोग जिन विषयों से ठीक से परिचित नहीं होते हैं उन पर भी पूरे विश्वास और अधिकार पूर्वक सबको उपदेश देते रहते है । अजीब विडंबना है जिस राह पर कभी चलना नहीं सीखा दुनिया को उस राह चलने की नसीहत देते हैं । आदमी संसार भर की जानकारी समझ रखता हैं बस खुद से अपने आप से कभी परिचित नहीं होता है । आजकल नकली होशियारी ए आई की चर्चा है जिस से आप कुछ भी हासिल कर सकते हैं मगर कभी उस से सवाल करें की ख़ुद मेरे बारे में भीतर अंतर्मन में क्या है तो आपको सही जवाब कभी भी नहीं मिलेगा । आज़माना जो भी जवाब मिले उस पर चिंतन करना क्या वास्तव में मेरा यही सच है हैरान मत होना आपको निराशा मिलेगी। कितना कुछ है जो आपने दुनिया से छुपाया हुआ है दिखलाते कुछ सोचते कुछ और आचरण में कुछ और करते हैं ए आई भी नहीं जानता उस आपकी वास्तविक तस्वीर को आपकी पोशीदा जीवनी को । तमाम लोग आत्मकथा लिखते लिखवाते हैं जिस में हमेशा जितना बताया गया होता है उस से अधिक को छुपाया गया होता है और ऐसा करने के लिए कितना कुछ वास्तविकता से कोसों दूर मनघड़ंत बताया जाता है। इक अजीब बात है अक्सर हम पुरातन युग के किरदारों से आधुनिक काल के लोगों की तुलना करते हुए किसी को उन जैसा भला बुरा महान अथवा नीच कहने की बात कर अनुचित करते है। दुनिया में कोई भी इंसान किसी दूसरे जैसा हूबहू मिलता ही नहीं विधाता का ये करिश्मा है मगर हम फिर भी ये हिमाकत करते हैं। अधिक विस्तार से लिखने से बेहतर है अपनी पुरानी डायरी से 20 मार्च 1996 की लिखी ग़ज़ल कहकर विषय का सार समझने की कोशिश की जाए । 
 

                 मैं कौन हूं मुझे पता ही नहीं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

 

मैं कौन हूं मुझे पता ही नहीं 
ख़ुद को कभी भी देखता ही नहीं ।  
 
हर रोज़ झूठ बोलते लोग पर 
ये बात कोई मानता ही नहीं । 
 
धनवान को तो सब हैं पहचानते 
मुफ़लिस को कोई जानता ही नहीं । 
 
इक रोज़ मर के जाएंगे सब समझ 
हर क़र्ज़ हो सका अता ही नहीं ।  
 
ज़िंदादिली से ज़िंदगी को जिएं
थक टूट कर भी हारता ही नहीं ।  
 
खामोश रह के ज़ुल्म सहते रहे 
जो बोलना है बोलता ही नहीं । 
 
' तनहा ' बता जहान में कौन है 
जिस ने कभी भी की ख़ता ही नहीं।