अगस्त 03, 2026

POST : 2100 कहीं कुछ भी नज़र आता नहीं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

      कहीं कुछ भी नज़र आता नहीं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

कहीं कुछ भी नज़र आता नहीं
ये आलम अब सहा जाता नहीं । 
 
हुई सब कोशिशें , नाकाम हैं 
मगर मुश्किल से घबराता नहीं । 
 
जो आये मौत मर हम जाएंगे 
उठा कर ज़हर ख़ुद खाता नहीं । 
 
गिला हमसे सदा सब को रहा 
उन्हें जो चाहिए लाता नहीं । 
 
था जितना पास सबको बांट कर
कहा ख़ुद को , कभी दाता नहीं । 
 
अभी भी , क़र्ज़ , कितना और है
कभी बदले में , कुछ पाता नहीं । 
 
जहां ' तनहा ' बहुत दिलकश मगर 
करें क्या , हमको जो भाता नहीं । 
 

 


   
 
 
 

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