सल्तनत का सुल्तान ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया
सियासत की चाल सीधी नहीं होती तिरछी टेड़ी होती है , जनता विधायक कैसे कैसे लोगों को चुन देती है , विधायक सांसद मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री चुनने लगे तो अंजाम क्या हो , यही सोचकर सदन का नेता सदन के सदस्य चुनने का जोख़िम नहीं उठाया जाता , संविधान खामोश रहता है कुछ नहीं कह सकता । आधुनिक संदर्भ में इक नई कहानी लिखनी पड़ेगी । राजतिलक की पुरानी रस्म को शपथ ग्रहण नाम दिया गया है शपथ खाई जाती है निभाई कभी नहीं जाती है । राजमुकट सुरक्षित रखा गया था लेकिन जब आवश्यकता पड़ी तो राजमुकट अपनी जगह नहीं मिला , सुरक्षाकर्मी तलाश करने लगे और आखिर इक पेड़ पर इक बंदर उसे लिए मिल ही गया । किसी ने बचपन की कहानी याद दिलवाई कि किसी की टोपी बंदर पहने बैठा था पेड़ पर तब तरकीब लगाई अपनी टोपी उतार कर फैंक दी तो बंदर ने भी नकल करते हुए वही किया । शाहंशाह ने अपना ताज सर से उतार कर धरती पर रखा लेकिन बंदर ने तब भी राजमुकट पहने रखा , अचानक बंदर की बंदरिया आई और धरती से ताज उठाकर झट से पेड़ की टहनी पर झूलने लगी ।
जैसे ही इक बंदर ने जाकर जंगल में सभी को ये समाचार सुनाया सभी बंदर उसी राजधानी के बाग़ में जमा होकर नाचने झूमने लगे । कुछ ऐसा लग रहा था जैसे सल्तनत का सुल्तान इक बंदर को बना दिया गया है और उसकी बंदरिया को रानी घोषित किया गया है । अभी तलक थोड़ा संशय था अब निर्धारित हो गया है कि आधुनिक शासन बंदरबांट का है इसलिए बंदरों का तख़्तो - ताज पर पहला अधिकार है रामायण काल में बंदरों का शासन रहा था कि नहीं इस सदी में बंदरों की उपेक्षा कोई नहीं कर सकता है । बिल्लियां शेर को सबक पढ़ाती रहीं और बंदर बिना किसी से राजनीति सीखे शिखर पर पहुंच गए ऐसी इक छलांग दिल्ली में ही लगाना दुनिया को हैरान करता रहा । फिर से इक बार इक बंदर ने सूरज को निगल लिया था बड़ी मुश्किल से रिहाई संभव हुई है ।
अभी भी लोग यकीन नहीं कर पाये हैं जिनको मसीहा समझते रहे वही क़ातिल निकला , भला ऐसे भी किसी को कोई ठुकराता है जिस से बेपनाह मुहब्बत की बातें की हों । दिल्ली की गलियां छोड़ कर कोई जाये भी कहां जाकर सुकून ढूंढे नहीं कोई भी ठिकाना दिल से निकलने वालों का दिल की किताब पढ़ना छोड़ दिया कब से ज़माने ने । उम्र गुज़रती थी कभी दिल लगाने में कितना लुत्फ़ था रूठने और मनाने में , ज़िक्र तक नहीं अपना उनके अफ़साने में जिनका बसेरा था इस दिल के आशियाने में । बंदर जब सत्ता पर विराजमान होते हैं सच कहें बड़े महान होते हैं पहचान उनकी बड़े बलवान होते हैं हाथ में तलवार हो तो उसी का सर कटता है जिस पर बड़े मेहरबान होते हैं । दुनिया में ऐसे भी नादान होते हैं जिनकी आह में कितने तूफ़ान होते हैं । आखिर इक मदारी को बुलवाया गया , भीड़ भाड़ में उसका मजमा सजाया गया । बंदर बंदरिया का शादी करने का खेल रचाया गया तब जाकर उनसे राजमुकट और ताज उतरवाने को दूल्हा दुल्हन बना मनवाया गया । मदारी को मंत्रीमंडल में शामिल कर उसका आभार जताया गया ।
1 टिप्पणी:
आधुनिक शासन बंदरबांट का है👍👍
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