इंतज़ार क़यामत तक ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया
पहले जाने कितनी बार किस किस ने भरोसा दिलवाया था लेकिन कोई भी अपने वादों पर खरा साबित नहीं हुआ , सच कहते हैं कि ख़ुशी से मर न जाते अगर ऐतबार होता । कहने से पहले थोड़ा खुद अपने भीतर भी झांकते तो क्या बुरा था , आपको जो जो करना था चाहते थे कर दिखाना था आपने सब दस साल में कर ही नहीं लिया बल्कि कोई भी अड़चन किसी तरह की आपको नहीं रोक पाई न कोई कानूनी न कोई नैतिक न ही कोई सामाजिक मान मर्यादा की परवाह । क्या क्या कैसे कैसे किया करवाया बताने की ज़रूरत नहीं है सभी सामने है , लेकिन जब जनता की दुर्दशा बदहाली को मिटाने की बात करनी पड़ी तब 2047 तक की बात कहने लगे जनाब । कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक ये जले पर नमक छिड़कने जैसा है कि हमको अपने अपनों के लिए अभी और करने दो जनता की बारी अभी जल्दी क्या है कुछ साल और गुज़ार सकते हैं उसके बाद ज़िंदगी रही तो देख लेंगे क्या हुआ तेरा वादा। सत्ता पाने के बारह साल के समय में आपका दल दुनिया का सबसे धनवान राजनीतिक दल होने का दावा है , देश में शहर शहर आपके दल के शानदार दफ़्तर बनवा लिए हैं , खुद अपने लिए विशेष हवाई जहाज़ से कितना कुछ आपकी ख़ुशी मौज मस्ती और कितने रईसाना महंगे महंगे शौक पर देश के ख़ज़ाने को बेरहमी से खर्च किया गया है जिसे , किसी ऐसे देश में जिस में आधी आबादी की हालत इतनी खराब है कि उनके लिए अच्छी शिक्षा चिकित्सा सेवाएं तो दूर जीने की बुनियादी ज़रूरतें नहीं पूरी होती , सामाजिक अन्याय और खुदगर्ज़ी कहना उचित होगा । अभी उनको 21 साल और इंतज़ार करने की बात करना दर्शाता है कि शासक सरकार में संवेदना का नितांत अभाव है । 2014 से पहले की सरकार पर केवल इक काल्पनिक आधार पर घोटाले का आरोप लगाया गया था सी ए जी की रिपोर्ट में ऐसा कहते हुए की अगर बोली करवाई होती तो कितने करोड़ का फ़ायदा होता , आज उसी सी ए जी की कितनी रिपोर्ट सामने हैं जिस में आपकी सरकार के मंत्रालय और राज्यों की सरकारों के विभागों ने कितना पैसा कहां खर्च हुआ बताया तक नहीं है । पिछली सरकार की तर्ज़ पर कोई सी ए जी अवश्य आंकलन कर बता सकता है कि जितना पैसा आपने अपने दल और अपने ख़ास दोस्तों को फ़ायदा दिलवाया है उस से समाज में कितना कल्याण हो सकता था । ये कैसी देशसेवा है जिस में जनता बदहाल और शासक दल और उसके संगी साथी मालामाल होते जाते हैं तब भी आपको अन्य दल लुटेरे लगते हैं जिनके पास चालीस पचास साल सत्ता रहने के बाद भी इतना क्या इस से दसवां भाग भी नहीं है । ऐसा नहीं कहना चाहता कि पिछली सरकारों ने लूटा नहीं बल्कि सभी सरकारों ने सरकारी अधिकारियों ने मिल कर इतना लूटा नहीं होता तो देश कब का गरीबी भूख जैसे समस्याओं से निजात पा चुका होता ।
आपने कभी अपने पिछले दो बार सत्ता में रहने वाले पांच पांच साल का सही हिसाब नहीं दिया है कि जनता को क्या क्या उपलब्ध हुआ है वास्तव में न कि झूठे आंकड़ों में । देश आज सब से खराब हालत में है आर्थिक तौर से भी सामाजिक तौर से भी और विदेशनीति कूटनीति सभी में असफ़ल साबित हुआ है किस लिए । क्योंकि आपको सिर्फ अपने खुद को बड़ा साबित करने की चाहत ने जनता और समाज की तरफ ध्यान देने ही नहीं दिया है विडंबना इस बात की है कि सब कुछ लुटवा कर बर्बाद कर के भी आपको समझ नहीं आया कि सिर्फ खोखली बातों से कुछ ठीक नहीं होने वाला है । आपात्काल की चर्चा करते हैं जबकि आज आपने तब से कहीं अधिक बढ़कर तानाशाही तौर तरीके अपनाये हैं और हर दिन लोग पुलिस और बिना वर्दी कुछ बदमाशों से पिटते हैं जब उनको कोई विरोध शांति पूर्वक करने नहीं दिया जाता । आप अपनी गलती को ढकने को उनको बदनाम करना चाहते हैं कुछ अपशब्द जैसा कह कर । लेकिन असमानता की सीमा बढ़ने पर जब शासक वर्ग और साधरण जनता में गहरी खाई बन जाती है तब लोग अपने अधिकार हासिल करने को साहस कर अन्याय करने वालों अपनी ताकत दिखाते हैं हमेशा ।
तमाशा आपका कभी ख़त्म नहीं होता मगर खेद की बात है कि आपने उन जगहों पर भी झूठ ही बोला हैं जहां पर सिर्फ सच ईमानदारी से बोलना चाहिए था । देश का बंटवारा भी आपको अपनी राजनीति करने का अवसर लगता है जबकि आप जब से सत्तारूढ़ हुए हैं सिर्फ लोगों को बांटने का की प्रयास किया है । 15 अगस्त को बोलने वाले समझने वाले दोनों जानते थे की सब सिर्फ केवल औपचारिकता निभाना का कार्य कर रहे हैं । हैरान किया उस बाबा ने भंडाफोड़ कर कि सब कुछ गलत हो रहा है और नहीं बदले अगर आप तो उनको भी अपना धंधा छोड़ फिर आंदोलन करना पड़ सकता है । लेकिन खुद ही अपनी कहीं बात पर जैसे हंसते हुए दिखाई दिए , बात रोने की है उनको अभी समझ नहीं आया उनका खुद का एतबार कौन करता है । छाज तो बोले छलनी क्या बोले जिस में हज़ारों छेद होते हैं उनको अपने गिरेबान में झांकना चाहिए दोबारा भेस बदल कर भागना कठिन होगा समय बदल गया है । थोड़ा इस ग़ज़ल से समझ लेना कि सच की डगर पर वही चलते हैं जो जान हथेली पर रखते हैं जेल जाने से घबराते नहीं हैं ।
वो पहन कर कफ़न निकलते हैं ( ग़ज़ल )
वो पहन कर कफ़न निकलते हैंशख्स जो सच की राह चलते हैं ।
राहे मंज़िल में उनको होश कहाँ
खार चुभते हैं , पांव जलते हैं ।
गुज़रे बाज़ार से वो बेचारे
जेबें खाली हैं , दिल मचलते हैं ।
जानते हैं वो खुद से बढ़ के उन्हें
कह के नादाँ उन्हें जो चलते हैं ।
जान रखते हैं वो हथेली पर
मौत क़दमों तले कुचलते हैं ।
कीमत उनकी लगाओगे कैसे
लाख लालच दो कब फिसलते हैं ।
टालते हैं हसीं में वो उनको
ज़ख्म जो उनके दिल में पलते हैं ।
1 टिप्पणी:
2047 जले पर नमक छिड़कने जैसा है...👍 ईमानदारी से सच की जगह भी झूठ बोला है सही कहा👌👍
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