आज़ादी एक अधूरा ख़्वाब ( विमर्श ) डॉ लोक सेतिया
भारत देश विदेशी शासन से मुक्त हो गया 1947 में , और हम 80 वीं वर्षगांठ मनाएंगे कल 15 अगस्त को लेकिन वास्तव में साधारण लोग वंचित हैं , आज़ादी पाने आज़ादी से जीने से सभी को बराबर अधिकार मिलने का ख़्वाब अभी अधूरा ही है। आज़ाद होने का मतलब बहुत बड़ा है हमको अभी कितनी तरह की गुलामी से छुटकारा पाना है , मेरी आयु 75 साल की है मगर अभी तक कभी भी आज़ादी से जीने नहीं दिया गया मुझे । बचपन में माता पिता से लेकर कितने अन्य लोग मुझे किसी न किसी तरह अपने आधीन रखने का कार्य करते रहे हैं उनका विचार था मुझको मनचाहे ढंग से रहने तो क्या सोचने समझने देखने बोलने की भी आज़ादी मिलना अनुचित होगा । बस ऐसी ही इक सोच सभी की रही है ख़ुद को मुझसे बड़ा समझदार जानकर और मेरा शुभचिंतक होने का अधिकारी मान कर मुझे अपने आधीन ख़ुशी से रहने को विवश करना उनका दायित्व था । ये सिलसिला कहीं पर भी कभी थमता नहीं है सिर्फ मुझी को नहीं जिसका जिस पर बस चलता है उसी को अपने आधीन रखने की इक रिवायत चलती आई है । सरकार जिस में सांसद विधायक जनता चुनती है और कार्यपालिका से न्यायपालिका तक सभी को नियुक्त किया जाता है सही न्यायपूर्ण व्यवस्था स्थापित रखने को वो सभी कभी भी नागरिकों की आज़ादी और अधिकारों की परवाह करते ही नहीं है । सामन्य जनता की कोई आज़ादी कोई अधिकार सुरक्षित नहीं है , बल्कि ये तमाम संस्थान संगठन उसका हनन करते रहते हैं बिना किसी संकोच के हमेशा । हमारा समाज जिसकी लाठी उसकी भैंस जैसे नियम पर चलता रहा है धनवान बलशाली गरीब कमज़ोर से सब छीन लेते हैं बेबस कर जब भी जैसे भी ।
देश की राजनीति किसी गुलामों की मंडी से कम नहीं है जिस में कुछ लोग बाकी सभी को अपने इशारों पर नचाते हैं बदले में उनको मिलता है सभी कुछ मगर आज़ादी कभी नहीं । राजनीतिक दलों का तौर तरीका कभी संविधान की भावना के अनुरूप नहीं रहा है । अदालत से निर्वाचन आयोग तक सभी ये सब होते देखते रहते हैं कुछ भी करते नहीं हैं क्योंकि उनको देश समाज संविधान से पहले स्वयं खुद की चिंता रहती है उनकी मनमानी चलती रहती है उनसे कोई सवाल नहीं पूछता कि आपकी उपयोगिकता क्या है । सांसद विधायक बनना उनका यही इक लक्ष्य था ताकि उनको शानदार जीवन रहन सहन सुख सुविधाएं मिलती रहें हमेशा , कोई कर्तव्य भी उनको निभाना होगा इस के लिए कभी भी बाध्य नहीं किया गया उनको योग्यता का कोई पैमाना उन पर लागू नहीं होता है जैसे अन्य कहीं अयोग्यता असफलता से सज़ा मिलती है और हटाया जाता है । उनकी ये भौतिकता की आज़ादी उनको मानसिक तौर पर गुलाम बनाने का ही परिणाम है उनकी सोच विचारधारा कोई मायने नहीं रखती है । सत्ता मिलते ही कुछ खास लोगों को आज़ादी मिलती है मनमानी करने से सभी को अपनी गुलामी करने को विवश करने वाले हालात पैदा करने की । उनके नियम कानून योजनाएं सभी उनकी महत्वाकांक्षाओं को पूर्ण करने और जब तक मुमकिन हो अपनी सत्ता अपनी कुर्सी को बनाये रखने को ध्यान में रख कर बनाई जाती हैं । इस आज़ाद देश के शासकों ने यही किया है धीरे धीरे एक एक कर के सभी मौलिक अधिकारों पर डाका डालना और कहने को आज़ादी की रक्षक कहलाना ।
शायद हम भूल चुके हैं कि हम भी आज़ाद हैं तभी किसी न किसी को अपना मसीहा समझ उसकी जय जय कार करते हैं , किसी शासक की तानाशाही और अहंकारी आचार व्यवहार या सत्ता का गलत उपयोग पर हम विचलित नहीं होते बल्कि सोचते हैं ऐसा ही होता है कौन नहीं करता है । सत्ता अधिकार और धन दौलत से शासक विवेकहीन बन कर देश को लूटने बर्बाद करने और केवल अपने ही ऐशो आराम को सबसे ज़रूरी समझने लगते हैं लेकिन जनता छटपटाती है कुछ करने का हौसला नहीं कर पाती है । हम किसी पिंजरे में कैद खुद को असहाय समझते हैं और सोचते हैं कोई आकर हमको पिंजरे से आज़ाद करवाएगा । अभी एक कॉलेज के कानून की पढ़ाई करने वाले भावी वकीलों ने किसी ख़ास बड़े पद पर बैठे व्यक्ति से उपाधि या स्नातक की डिग्री लेने से असहमति जताई और संसथान को अवगत करवाया कि उनको नहीं बुलाया जाये जिनके कार्य न्याय को लेकर शंका पैदा करते हैं । लेकिन खबर है उनको इस कारण डिग्री मिलने में कठिनाई हो सकती है किसी ने अपने अधिकारों का उलंघन कर ऐसा आदेश निर्देश जारी किया मगर वापस लेने को बाध्य हुए विरोध को देख कर उनको अपने विवेक से ऐसा नहीं करना चाहिए समझ नहीं आया । क्या छात्रों को अपने विचार ऐसे सार्वजनिक तौर पर व्यक्त करने का अधिकार नहीं है । बहुत कम लोगों को याद हो शायद कभी अभिनेता अमिताभ बच्चन जी की इक फ़िल्म आई थी , मैं आज़ाद हूं , वास्तव में कोई भी शख़्स उस नाम का नहीं था फ़िल्म में इक अख़बार के संपादक ने सनसनी पैदा करने को कुछ ख़त छापे थे अनाम आज़ाद नाम वाले व्यक्ति का नाम लिखकर । उन खतों में सड़ी गली व्यवस्था पर सवाल या टिप्पणियां की जाती थी जो शासन प्रशासन को स्वीकार नहीं होता है । अंत में जिसको आज़ाद बनाकर सामने लाकर पेश करना था उसको अपनी जान देकर खुद को असली साबित करना पड़ा था । आजकल अख़बार टीवी चैनल वाले जनसमस्याओं की बात नहीं करते हैं सत्ता को अपना ज़मीर बेच कर उसका गुणगान कर मालामाल हैं । जिनका सब कुछ पैसा है उनको गरीबी भूख अन्याय अत्याचार दिखाई नहीं देता क्योंकि ये जिनके साथ घटता है उस जनता से मीडिया को कोई मतलब नहीं रहा है । आज़ादी मिली है दलालों को चोर लुटेरों को वो कुछ भी करते रहें कोई रोकने टोकने वाला नहीं है । हम उनके पिंजरे से बाहर निकलना ही नहीं चाहते हैं कैद में रहकर खैर मनाते हैं क़ातिल को खुद घर बुलाते हैं । वास्तव में हम ऐसा साहस कभी नहीं करते बल्कि जिस पिंजरे में कैद हैं उसी से लगाव हो गया लगता है । साधु और पिंजरे में कैद पंछी की कहानी याद है , इक बार फिर से पढ़ कर समझते हैं ।
साधु और पिंजरे में बंद पक्षी ( बोध कथा )
पहाड़ों पर सैर करते इक साधु को घाटी में कहीं दूर से आवाज़ सुनाई दी मुझे
आज़ाद करो । ढूंढते हुए उसको इक पक्षी पिंजरे में बैठा ऐसा कहता मिला । मगर
पिंजरा तो खुला था बंद नहीं फिर भी साधु ने भीतर हाथ डालकर उसको बाहर
निकाला और आसमान में उड़ने को छोड़ दिया । अगली सुबह फिर साधु को वही आवाज़
सुनाई दी और जाकर देखा तो पाया कि पक्षी वापस उसी पिंजरे में चला आया है । उसकी आदत बन गई थी आज़ाद होने को कहना मगर खुद ही कैद होकर रहना । अब साधु ने
उस पक्षी को निकाला उड़ाया और फिर उस पिंजरे को उठाकर बहते पानी में गहराई
में फेंक दिया । इस तरह उसके लिए पिंजरा ही नहीं रहा वापस आने को । लेकिन
आजकल जो संत साधु मिलते हैं उनके पास हमारे लिए पिंजरे हैं वो कभी हमें सही
दिशा नहीं समझाने वाले । अपने विवेक से हमने ही अपने आप को स्वार्थ और
खुदगर्ज़ी के पिंजरे से मुक्त करना है । घर बैठे चिंतन कर सकते हैं क्योंकि
जब आपको बाहर नहीं जाना तभी अपने भीतर जाने का समय होता है ।
मैंने शुरुआत ख़ुद अपने आप से की थी आखिर में उस को ध्यान में रखते हुए अपनी किताब एहसासों के फूल से इक कविता पेश करता हूं ।
कैद ( कविता ) डॉ लोक सेतिया
कब से जाने बंद हूंएक कैद में मैं
छटपटा रहा हूँ
रिहाई के लिये ।
रोक लेता है हर बार मुझे
एक अनजाना सा डर
लगता है कि जैसे
इक सुरक्षा कवच है
ये कैद भी मेरे लिये ।
मगर जीने के लिए
निकलना ही होगा
कभी न कभी किसी तरह
अपनी कैद से मुझको ।
कर पाता नहीं
लाख चाह कर भी
बाहर निकलने का
कोई भी मैं जतन ।
देखता रहता हूं
मैं केवल सपने
कि आएगा कभी मसीहा
कोई मुझे मुक्त कराने
खुद अपनी ही कैद से ।

1 टिप्पणी:
अच्छा आलेख....राजनीति अभी भी गुलामों की मंडी है👌👍
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